हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह है कानून का राज? : आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/12/2014 10:24:00 AM


हाशिया पर आप जाने माने जनवादी अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक आनंद तेलतुंबड़े के वे मासिक स्तंभ नियमित रूप से पढ़ते रहे हैं, जिन्हें वे इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में मार्जिनस्पीक नाम से लिखते हैं. इसके अलावा भी समय समय पर उनके लेख, व्याख्यान और टिप्पणियां हाशिया पर आते रहे हैं. अब हिंदी की प्रतिष्ठित वैचारिक पत्रिका समयांतर में यह स्तंभ नियमित रूप से हिंदी में प्रकाशित होगा. इसके अलावा आनंद की अन्य रचनाएं प्रमुखता से हाशिया पर पोस्ट की जाती रहेंगी. अनुवाद: रेयाज उल हक.

गोंदिया सत्र न्यायालय से 22 मई 2014 को सभी आरोपों से बरी होने के बाद सुधीर ढवले नागपुर केंद्रीय जेल से छूट गए. लेकिन पुलिस द्वारा माओवादियों के साथ तथाकथित संपर्क रखने के नाम पर गिरफ्तार किए गए इस जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता को बाहर आने में 40 महीने लगे. उनके साथ साथ आठ सह-आरोपितों को भी अदालत ने बरी कर दिया. 2005 में ढवले की ही तरह एक दलित कवि शांतनु कांबले को ठीक ऐसे ही आरोपों के साथ गिरफ्तार किया गया था, और किस्मत से जमानत पर छूटने से पहले उन्हें 100 से ज्यादा दिनों तक यातनाएं सहनी पड़ीं. अब अदालत से वे सभी आरोपों से बरी हैं. अरुण फरेरा चार बरसों से ज्यादा समय से जेल में रहे, यातनाएं झेलीं और पुराने आरोपों में बरी हो जाने के बाद बार बार नए आरोपों में गिरफ्तार करके उन्हें परेशान किया गया. तब कहीं जाकर वे अपने आखिरी मामले में जमानत पर छूट सके. इससे एक कम चर्चित मामला जनवरी 2012 में चंद्रपुर के एक सामाजिक संगठन देशभक्ति युवा मंच के 12 नौजवानों तथा नागपुर के बंधु मेश्राम की गिरफ्तारियों का है. इन सब पर वही आरोप लगाए गए और आगे चल कर ये सभी अदालत द्वारा छोड़ दिए गए. लेकिन छूटने से पहले उन्हें एक से तीन बरस तक पुलिस की यातनाएं, उत्पीड़न तथा जेल में अपमान झेलना पड़ा. इसी कड़ी में अनिल ममाने और दूसरे दो लोगों की गिरफ्तारियों का मामला भी है, जिन्हें अक्तूबर 2007 में तब गिरफ्तार किया था जब वे नागपुर के दीक्षाभूमि में किताबें बेच रहे थे.

हालांकि थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन ये मामले आखिरकार याद आ जाते हैं, क्योंकि ये ज्यादातर उन लोगों से जुड़े मामले हैं जो शहरी इलाकों से आते हैं. मीडिया में उन पर खबरें आती हैं और अदालतों में उनका बचाव हो पाता है. लेकिन दूर दराज के इलाकों के अनगिनत ऐसे मामले हैं जहां माओवादी होने के बहुत अस्पष्ट आरोपों के साथ गिरफ्तार नौजवान लड़के और लड़कियां जेलों में बंद हैं. उनमें से कई पर तो कई आरोप तक नहीं तय किया गया है और उनकी सुनवाई करने के लिए कोई संस्था नहीं है. लाचारी के साथ वे हर पल अपनी जिंदगी को तबाह होते देखते हैं.

नाइंसाफी की कार्यवाही

सुधीर ढवले को नागपुर में उनके कॉलेज के दिनों से ही एक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता रहा है, जहां वे 1980 के दशक के एक जुझारू छात्र संगठन विद्यार्थी प्रगति संगठन (वीपीएस) का हिस्सा थे. उन्होंने अपने विचारधारात्मक रुझानों तथा उन जन संगठनों के साथ अपने जुड़ाव को कभी छुपाया नहीं, जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा का प्रचार करते हैं जिसे मोटे तौर पर नक्सलवाद और अब माओवाद के नाम से जाना जाता है. लेकिन ढवले माओवादी पार्टी के साथ और इसकी हिंसक कार्रवाइयों समेत उसकी गतिविधियों के साथ किसी भी तरह के संबंध से इन्कार करते रहे हैं. मुंबई आने के बाद वे सांस्कृतिक आदोलन में सक्रिय हुए और 1999 में एक वैकल्पिक विद्रोही साहित्य सम्मेलन का आयोजन करने में अग्रणी भूमिका निभाई. यह आयोजन राज्य द्वारा प्रायोजित मुख्यधारा के साहित्य के विरोध में था. इस पहलकदमी ने विद्रोही सांस्कृतिक चलवल की शक्ल अख्तियार की जिसका विद्रोही नाम से अपना द्विमासिक मुखपत्र था. धवले इसके संपादक बने. जल्दी ही विद्रोही महाराष्ट्र के जुझारू कार्यकर्याओं के लिए एक आधार बन गया. उन्होंने पर्चे और किताबें लिखने में अपनी साहित्यिक खूबी का इस्तेमाल किया. जाहिर है कि यह लेखन उन्होंने आदिवासियों और दलितों के मौजूदा संघर्षों के समर्थन में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रचार करने के लिए किया. उन्होंने 6 दिसंबर 2007 को रिपब्लिकन पैंथर्स की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई, जो अपनी पहचान ‘जातियों के उन्मूलन के लिए एक आंदोलन’ के रूप में बताता है. वे खैरलांजी में खौफनाक जातीय उत्पीड़न के बाद राज्य भर में शुरू हुए विरोध आंदोलनों में सक्रिय रहे थे. तब महाराष्ट्र के गृह मंत्री ने यह गैर जिम्मेदार बयान दिया था कि इन आंदोलनों को नक्सलवादियों ने भड़काया है. तभी से धवले पुलिस की नजरों में थे. निजी स्तर पर, एक सादगी भरा जीवन जीते हुए उन्होंने अपना पूरा समय इन गतिविधियों को दिया. इसमें उनकी पत्नी भी उनके साथ रहीं, जो वीपीएस की एक पुरानी कॉमरेड थीं और जो मुंबई में बाइकुला के डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल में काम करती हैं.

वर्धा में उनकी गिरफ्तारी के बाद, जहां वे किसी दलित साहित्यिक सम्मेलन में बोलने के लिए गए थे, पुलिस ने मुंबई में उनके घर पर ऐसे छापा मारा मानो वे कोई बहुत खतरनाक आतंकवादी हों. इसके बाद उनकी पत्नी और बच्चों को चिंताजनक तौर पर बहुत मुश्किलों और अपमान से गुजरना पड़ा. उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो पूरी तरह तबाह हो गई, उनका 12वीं में पढ़ने वाला बेटा फेल हो गया. सम्मानित सामाजिक हस्तियों वाली डिफेंस कमेटी ने गृह मंत्री आरआर पाटील से तीन बार उनकी हिमायत में बातें रखीं, उनके निर्दोष होने की पुष्टि की. लेकिन कमेटी पाटील को डिगा पाने में नाकाम रही. ऐसा दिख रहा था कि पाटील ढवले को सताने का मन बना चुके थे. इस बीच जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह गैरकानूनी था. क्योंकि किसी आरोपित के किसी बयान के आधार पर या उनके घर से बरामद किए गए साहित्य के आधार पर पुलिस माओवादियों के साथ उनके संबंध को जिस तरह झूठे तरीके से स्थापित करना चाह रही थी, उसे सर्वोच्च न्यायालय बहुत पहले खारिज कर चुका था. लेकिन पुलिस का यह कहना था कि सबूतों के पुख्ता होने बारे में फैसला करना अदालत का काम है, और वह इस बहाने की ओट में पूरी गैरजिम्मेदारी के साथ अपने आरोपों पर अड़ी रही कि सुधीर ढवले गैर कानूनी गतिविधियों और माओवादी साजिशों के भागीदार थे. अदालत ने पुलिस के मामले को खारिज करते हुए उन्हें बरी कर दिया. लेकिन क्या इससे हुए नुकसानों की भरपाई मुमकिन हैॽ हां, इससे यह जरूर हुआ है कि ढवले को सजा दिलाने और उनके जैसे अनेक कार्यकर्ताओं को आतंकित करने की पुलिस की योजना बिखर गई है. आज ढवले अपनी निजी जिंदगी में पूरी तरह तबाह हो गए हैं, लेकिन अपने मकसद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके चेहरे पर गहरी उदासी भरी मुस्कान को जरा भी कम नहीं कर पाई है.

एक मानवीय त्रासदी

ढवले की गिरफ्तारी से पहले और बाद में बेहिसाब गिरफ्तारियां हुई हैं: उनमें से अरुण फरेरा की गिरफ्तारी के बारे में मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा हुई. ढवले की ही तरह, जो लोग फरेरा को जानते थे वे पुलिस के आरोपों पर बहुत गुस्से में थे और वे फरेरा के बचाव में आगे आए. तब नक्सल विरोधी सेल के तत्कालीन मुखिया एसएसपी यादव ने यह बेहद गैरकानूनी धमकी दी कि उन्हें भी नक्सल समर्थकों के रूप में गिरफ्तार किया जा सकता है. फरेरा को हर तरह की यातनाएं दी गईं, उन्हें परेशान किया गया. इसी के तहत उन्हें नार्को टेस्ट से भी गुजरना पड़ा जिसके नतीजों ने तब एक छोटी मोटी खलबली पैदा कर दी थी, जब फरेरा ने टेस्ट के दौरान यह बयान दिया कि बाल ठाकरे महाराष्ट्र में नक्सली गतिविधियों के लिए पैसे देते हैं. जिस तर्क के आधार पर ढवले की गिरफ्तारी हुई थी, उसी के आधार पर पुलिस को कम से कम ठाकरे से पूछताछ करनी चाहिए थी. आखिर पूछताछ के दौरान पुलिस चाहती ही है कि आरोपित व्यक्ति किसी का नाम ले और इस तरह फरेरा ने नार्को टेस्ट के तहत जो तथ्य उजागर किया था वह पुलिस के अपने ही दावों की कसौटी पर कहीं ज्यादा प्रामाणिक था. अदालत में फरेरा के खिलाफ कोई आरोप टिक नहीं पाया लेकिन पुलिस उन्हें चार से ज्यादा बरसों तक जेल में रखने में कामयाब रही. अब फरेरा ने राज्य के खिलाफ 25 लाख रुपए के मुआवजे का एक मामला दाखिल किया है. उनके बारे में चाहे जो फैसला आए, बाकियों को तो बस अपने साथ हुई नाइंसाफी को जैसे तैसे कबूल करना होगा.

ढवले के साथ जो आठ दूसरे लोग बरी हुई वे सभी दलित थे और उन सबको झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें भी पुलिस के हाथों वैसी ही यातनाएं, उत्पीड़न, अपमान और कैद भुगतना पड़ा, जो बहुत साफ तौर पर गैर कानूनी है. उनके अलावा, खबरों के मुताबिक नागपुर जेल में 44 और लोग बंद हैं, जिन्हें पुलिस ने माओवादी बता कर गिरफ्तार किया है. उनमें से सात औरतें हैं. बेशक उनमें हाल में हुई हेम मिश्रा, प्रशांत राही और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की गिरफ्तारियां भी शामिल हैं. इनकी खबरें मीडिया में आईं और इन गिरफ्तारियों की भारी निंदा भी हुई. लेकिन इनके अलावा दूसरे लोगों में गढ़चिरोली जिले के भीतरी इलाकों से गिरफ्तार किए गए वे आदिवासी नौजवान हैं जिनमें से ज्यादातर को आसपास की किसी नक्सल कार्रवाई के मामले में लपेट कर गिरफ्तार किया गया है. उनके चेहरे और नामों को लोग नहीं जानते. उनमें से दो आदिवासी नौजवान ऐसे हैं जो नागपुर सेंट्रल जेल के सबसे लंबे समय तक रहने वाले कैदी हैं. पहले, 26 साल के रमेश पंढरीराम नेताम हैं, जो एक छात्र संगठन के कार्यकर्ता हैं और पिछले छह सालों से जेल में हैं. उनके मां-बाप कथित तौर पर उन जन संगठनों में थे, जिनका संबंध माओवादियों के साथ जोड़ा जाता है. उनकी मां बयानबाई दंडकारण्य आदिवासी महिला संगठन में सक्रिय थीं और उन्हें गढ़चिरोली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. पुलिस द्वारा दी जा रही यातना के दौरान ही उनकी मौत हो गई. गांववालों ने इस हत्या का विरोध किया था, लेकिन उनकी आवाज मुख्यधारा के मीडिया तक कभी नहीं पहुंच पाई. उनके पिता के बारे में कहा जाता है कि दो साल पहले उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. जब भी वे छूटने को होते हैं, पुलिस उन पर नए आरोप लगा कर उन्हें जेल में बनाए रखती है. ऐसा एक बार नहीं बल्कि तीन तीन बार हो चुका है. दो महीने पहले अपने ऊपर सारे मामले खत्म होने के बाद उन्होंने जेल से जाने के लिए अपना सामान बांध लिया था, लेकिन पुलिस ने उन पर दो नए मामले लगा दिए और छूटने से रोक लिया. दूसरे का नाम बुद्धु कुल्ले टिम्मा (33 साल) है जो गढ़चिरोली के भीतरी इलाके के एक गांव से हैं. उन्हें तीन साल पहले सभी मामलों से बरी कर दिया गया था लेकिन वे अब भी जेल में हैं क्योंकि पुलिस ने उन पर छह नए मामले लगा दिए. सभी आदिवासी कैदियों के निरक्षर किसान होने के चलते उनकी लाचारी और मानवीय त्रासदी की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

कानून की परवाह किसे हैॽ

इन मामलों में कार्यवाही संबंधी एक और गैर कानूनी काम यह किया जा रहा है कि मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए होती है. यह सुनवाई गढ़चिरोली की अदालत में स्थानीय अधिवक्ताओं की मौजूदगी में होती है. लेकिन चूंकि आरोपितों को अदालत में नहीं ले जाया जाता, इसलिए उनके और अधिवक्ताओं के बीच कोई संवाद नहीं हो पाता है. अदालत में जो कुछ भी चल रहा होता है, उससे आरोपित को अंधेरे में रखा जाता है. वे यह नहीं जान पाते कि गवाहों ने ठीक-ठीक क्या कहा, कौन सी दलीलें दी गईं और जज ने क्या टिप्पणी की. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में उन्हें इन सारी वाजिब सूचनाओं से वंचित रखा जाता है, जिसके वे हकदार हैं. इसके नतीजे में जब उन्हें अपना आखिरी बयान देने की जरूरत पड़ती है तो उनके बयान में सुनवाई के संदर्भ नदारद रहते हैं. कम से कम एक मामला ऐसा है, जिसमें सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले के लिए मुख्य रूप से पुलिस द्वारा इस तकनीक के गलत इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

इनमें से हरेक इंसान बेहिसाब तकलीफ से गुजरता है, उसके परिवार वालों को बेहिसाब तनाव झेलना पड़ता है, समाज में भारी अपमान और टकराव से गुजरना पड़ता है. उनके पारिवारिक रिश्ते तबाह हो जाते हैं और वे औसतन अपने उत्पादक जीवन के 4 से 5 साल बिना किसी गलती के गंवा देते हैं. उनमें से हरेक को पुलिस रिमांड के दौरान कम या ज्यादा गैर कानूनी यातनाएं सहनी पड़ती हैं. इसके बाद जब वे न्यायिक हिरासत में जाते हैं तो उन्हें अपमानजनक हालात में रहना पड़ता है. हो सकता है कि लोगों को गिरफ्तार करने और अपने पास मौजूद सूचनाओं के आधार पर आरोप तय करने के पुलिस के पेशेवर विशेषाधिकार से किसी को कोई शिकायत नहीं हो. ये आरोप न्यायिक सुनवाई के विषय हैं और वे वहां साबित हो सकते हैं और खारिज भी हो सकते हैं. लेकिन तब क्या हो जब इस विशेषाधिकार का बेदर्दी से और भारी पैमाने पर गलत इस्तेमाल होने लगेॽ बदकिस्मती से सभी तथाकथित माओवादी मुकदमों के नतीजे साफ साफ पुलिस की इस बुरी मंशा को दिखाते हैं जिसके तहत वह कोशिश करती है कि कुछ चुने हुए लोगों को जितने लंबे समय तक हो सके जेल में रखा जाए और इस तरह दूसरों को उनके नक्शेकदम पर चलने से डराया जाए. कानून के मुताबिक दोषी व्यक्ति को सजा देने की बारी अदालत की होती है, लेकिन जैसा कि इन मामलों से यह जाहिर होता है, वह व्यक्ति अपना अपराध साबित होने से पहले ही पुलिस के हाथों सजा पा चुका होता है.

तब फिर कानून-व्यवस्था की रखवाली मानी जाने वाली पुलिस यहां के कानून से बेपरवाह कैसे हो सकती हैॽ सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पूरी गंभीरता से स्थापित किया है कि महज किसी संगठन से जुड़ाव या किसी विचारधारा को मानना या किसी तरह का साहित्य अपने पास रखना तब तक एक अपराध नहीं हो सकता है, जब तक यह साबित नहीं हो जाए कि उस व्यक्ति ने कोई हिंसक कार्रवाई न की हो या दूसरों के ऐसा करने की वजह नहीं बना हो. यहां तक कि अगर कोई किसी प्रतिबंधित संगठन तक का एक निष्क्रिय सदस्य बन जाए, तब भी यह अपराध के दायरे में नहीं आता. अगर यहां का कानून का राज चलता है तो क्या पुलिस को इसके बारे में पता नहीं होना चाहिएॽ हरेक मामले में अदालतों ने पुलिस के तौर-तरीकों पर उसकी निंदा की है, लेकिन पुलिस हर बार बेधड़क होकर पुरानी गलतियां दोहराती है. अगर ढवले बाहर आते हैं तो साईबाबा को भर्ती कर लिया जाता है ताकि पुलिस की यह गैर कानूनी दास्तान आगे बढ़ती रहे!
 

(समयांतर के जुलाई 2014 अंक में प्रकाशित.)

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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