हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह लड़का तो लेखक बनने वाला है!

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2014 12:25:00 PM




आज क्रांतिकारी जादुई यथार्थवाद के बेमिसाल किस्सागो गाब्रिएल गार्सिया मार्केस का निधन हो गया. उनको याद करते हुए प्रभात रंजन का यह लेख. इसे वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मार्केज़: जादुई यथार्थ का जादूगर से लिया गया है.

जैसे-जैसे गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ नामक वह बालक अपने नाना के घर में बड़ा होने लगा उसको लेकर घर के बड़े-बुजुर्ग तरह-तरह के सपने बुनने लगे। आखिर वह घर का पहला लड़का था, घर के सारे सपने तब उसी से जुड़ने लगे थे। बचपन में मार्केज़ को दीवार पर चित्रकारी करने की आदत पड़ गई। नाना का प्रोत्साहन था। लेकिन घर की औरतों ने जब बालक गाबितो को इसके लिए टोकना शुरु किया और घर की दीवार को गंदा करने से रोकना शुरु किया तो नाना ने अपने ऑफिस की एक दीवार को सफेद रंग से पेंट करवा दिया और बाजार से उनके लिए चित्रकारी की तरह-तरह की पेंसिलें ले आए ताकि उनके दुलारे नाती के चित्रकला अभ्यास में किसी तरह की बाधा नहीं आए। मार्केज़ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि एक दिन उन्होंने सुना कि नाना किसी से कह रहे थे कि एक दिन उनका नाती पेंटर बननेवाला है, लेकिन मार्केज़ ने उनकी इस बात को कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि पेंटर का मतलब उन्होंने समझा दरवाजे की रंगाई करनेवाला, जिसमें उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।

अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि करीब चार साल की उम्र में जो लोग उनको जानते थे वे उनको याद करते तो कहते,  वह एक दुबला-पतला लड़का था, अपने में खोया रहनेवाला। जो तरह-तरह की कहानियां बनाता था, कभी झूठे-कभी सच्चे, अक्सर झूठे। उनकी सुनाई ज्यादातर कहानियां रोजमर्रा की घटनाओं को लेकर होती थीं। वह उनको इस तरह सुनाते कि कहानियां लगने लगतीं। अक्सर वे बड़े-बुजुर्गों की कही हुई बातों को ही अपने अंदाज में सुना दिया करते। इस तरह से सुनाते कि कहानी का भ्रम होने लगता। उनको इस तरह से कहानियां सुनाते देखकर अतीन्द्रिय शक्तियों में जबर्दस्त आस्था रखनेवाली उनकी नानी इस नतीजे पर पहुंची कि हो न हो यह लड़का बाद में भविष्यवक्ता निकले, समय के आरपार देख लेने वाला।

इसका कारण यह था कि अपनी नानी की ही तरह बालक गाबितो तरह-तरह के सपनों को याद करके सुनाया करता था। जैसे एक बार उसने कहा कि कल रात मैंने एक सपना देखा है जिसमें नाना के मुँह से एक जिन्दा पक्षी निकलता दिखाई दे रहा था। नानी इस सपने से डर गईं और उनको लगा कि यह सपना इस बात की ओर संकेतित कर रहा है कि उनकी मृत्यु होनेवाली है। मार्केज़ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अब सोचने पर लगता है कि इस तरह की किस्सागोई जिसे आम तौर पर परिवार वाले झूठ या बातें बनाने के खाते में डालते थे असल में एक उभरते हुए लेखक की बुनियादी तकनीक थी ताकि यथार्थ को और अधिक मनोरंजक और समझने योग्य बनाया जा सके, लोगों के लिए उसे रुचिकर बनाया जा सके। 

लेकिन जल्दी ही वह वक्त आया जिसके सन्दर्भ में मार्केज़ ने अपनी आत्मकथा ‘लिविंग टु टेल द टेल’ में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की इस उक्ति को उद्धृत किया है, ‘बहुत कम उम्र में ही मुझे अपनी शिक्षा को बाधित करना पड़ा स्कूल जाने के लिए’ यानी उनकी औपचारिक शिक्षा का दौर आरंभ हुआ। मार्केज़ के बचपन के किस्सों के संदर्भ में यह बात आई थी कि अराकाटक के घर में रहते हुए बचपन में उनकी व्यावहारिक शिक्षा पुष्ट हुई। लेकिन कर्नल के इस सबसे बड़े नाती की औपचारिक शिक्षा भी तो अच्छी होनी चाहिए थी। मार्केज़ के पिता अभावों के कारण तथा किसी प्रकार के आर्थिक समर्थन न होने के कारण सेकेंडरी से आगे नहीं पढ़ पाए थे लेकिन उनकी माँ ने अराकाटक के पास के शहर के बेहतरीन स्कूल में शिक्षा पाई थी। इसलिए कर्नल ने अपने नाती का नामांकन शहर के एक मांटेसरी स्कूल में करवाया ताकि वह अंग्रेजी सीखकर अमेरिका में अपने जीवन को बेहतर बनाने जा सके। उसको घर में पढ़ाने के लिए एक शिक्षिका को भी नियुक्त किया गया। लेडी फर्गुसन वह महिला थी जो मार्केज़ की पहली ट्यूटर बनीं। 

मार्केज़ ने अपने शिक्षा के दिनों को याद करते हुए लिखा है कि उनको आरंभ में पढ़ने में, पढ़ना सीखने में बहुत मुश्किल हुई। यानी आम बच्चों की तरह अक्षरों-शब्दों को पढ़ना वे सहजता से नहीं सीख पाए। पढ़ना सीखने के बाद जो पहली किताब उन्होंने पढ़ी उसका नाम उनको बहुत बाद में पता चला। अपने घर के स्टोररूम में उनको एक फटी-चिटी किताब मिली जिसके कई पन्ने भी गायब थे। लेकिन उसको पढ़ने में उनको बेहद आनंद आया और उनको पहली बार लगा कि पढ़ना भी उतना ही आनंददायक हो सकता है जितना कि अराकाटक की गलियों में घूमना या झूठ-सच बातें बनाना। उस किताब की अपनी सबसे प्रिय कहानी भी उन्होंने अपनी आत्मकथा में उन्हीं दिनों की स्मृतियों के आधार पर उद्धृत की है। कहानी यह है कि एक मछुआरे ने अपने पड़ोसी से कहा कि वह अगर उसे अपना जाल दे दे तो वह उस दिन जो पहली मछली पकड़ेगा उसे दे देगा। मछुआरे ने अपना वादा पूरा किया। बाद में उसके पड़ोस में रहनेवाली महिला ने मछली को तलने के लिए काटा तो उसे बादाम के आकार का एक हीरा उसके पेट से मिला। बहुत बाद में मार्केज़ को पता चला कि उस किताब का नाम था- ‘द थाउजेंड एंड वन नाइट्स’। बहरहाल, उस किताब को डूबकर पढ़ते देख उस दिन उसके घर के एक सदस्य ने कहा था- ‘अरे! यह लड़का तो एक दिन लेखक बननेवाला है’।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ यह लड़का तो लेखक बनने वाला है! ”

  2. By Kamal Choudhary on April 18, 2014 at 6:13 PM

    Naman! Bahut shaandaar lekhk par shaandaar likha hai Prabhaat jee ne....Dhanyavaad!!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें