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बीच सफ़हे की लड़ाई

वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड कैसे लिखा गया

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/18/2014 12:55:00 PM



आज क्रांतिकारी जादुई यथार्थवाद के बेमिसाल किस्सागो गाब्रिएल गार्सिया मार्केस का निधन हो गया. उनको याद करते हुए प्रभात रंजन का यह लेख. इसे वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मार्केज़: जादुई यथार्थ का जादूगर से लिया गया है. साभार.

उनके दिमाग में बरसों पुराना उपन्यास ‘द हाउस’ घूमने लगा था। लेकिन उसे लिखें कैसे यह सोचते-सोचते बरसों बीत चुके थे। दो उपन्यास, कहानियों का संकलन प्रकाशित हो चुका थे लेकिन वह उपन्यास... बीच-बीच में उसका नाम मार्केज़ के दिमाग में कौंधता रहता था- ‘द हाउस’। अंतरराष्ट्रीय लेखक बनने की सारी तैयारी हो चुकी थी। कमी थी तो बस उस उपन्यास की जो उनको उस स्तर पर स्थापित कर देता।

बड़े नाटकीय ढंग से एक दिन उनको उस उपन्यास को लिखने का तरीका भी सुझाई दे गया। 1965 की बात है। गेराल्ड मार्टिन ने लिखा है कि एक सप्ताहांत वे अपने परिवार को घुमाने के लिए आकपुल्को ले जा रहे थे। उस पहाड़ी कस्बे तक पहुंचने का रास्ता बड़ा घुमावदार था। गाड़ी चलाते-चलाते उनको उपन्यास की पहली पंक्ति कौंध गई। उनको समझ में आ गया था कि कैसे उस उपन्यास को लिखना है जिसके बारे में वे करीब 20 साल से सोच रहे थे। उन्होंने तत्काल गाड़ी मोड़ी और मेक्सिको सिटी की ओर वापस चल पड़े। वापस पहुंचते ही उन्होंने लिखना शुरु कर दिया। 18 महीने तक खुद को उन्होंने कमरे में बंद कर लिया। 18 महीने के बाद जब वे बाहर आए तो उनके हाथ में उस उपन्यास की पांडुलिपि थी जिसने उनको बाद में नोबेल पुरस्कार दिलवाया और उनकी पत्नी के हाथों में 18 महीने के भुगतान न किए गए तरह-तरह के बिल। अपनी एक भेंटवार्ता में मार्केज़ ने बाद में कहा, ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड’ को मैंने करीब दो साल में लिखा। लेकिन टाइपराइटर पर बैठने से पहले मैंने पंद्रह या सोलह सालों तक उसके बारे में सोचा था। उनके जीवनीकार ने लिखा है कि अठारह साल तक उसके बारे में सोचा था। 

उनकी पत्नी को याद आया बरसों पहले फटेहाली की अवस्था में मार्केज़ ने उनसे बड़ी गंभीरता से कहा था, जब मैं चालीस साल का हो जाउंगा तो कुछ ऐसा लिखूंगा जो यादगार होगा। 1967 में जब ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ नामक वह उपन्यास प्रकाशित हुआ तो मार्केज़ की उम्र संयोग से चालीस की हो चुकी थी। संघर्ष का दौर बीत चुका था। लेखकीय उपलब्धियों और समृद्धि का दौर शुरु हो चुका था जिसकी उन्होंने बरसों प्रतीक्षा की थी। ‘नो वन राइट्स टु कर्नल’ के कर्नल की तरह जो अपने कभी न आनेवाले पेंशन की प्रतीक्षा किया करता है। फर्क बस इतना था कि मार्केज़ नामक इस लेखक की प्रतीक्षा फलदायी साबित हुई। 

वे अठारह महीने मार्केज़ की पत्नी मरसेदेस के लिए शायद सबसे असुरक्षा भरे दिन थे। विज्ञापन लेखक और फिल्म पटकथा लेखक के रूप में मार्केज़ का कैरियर अच्छा चल रहा था कि अचानक उन्होंने फिर से सब कुछ छोड़ दिया। शुरुआती महीनों में तो पिछली जमा-पूंजी से घर का खर्च चलता रहा। फिर समस्या शुरु हुई। सबसे पहले मार्केज़ ने अपनी गाड़ी बेची। वह ओपेल कार जो उनको बहुत प्रिय थी और पहली बार जब उनको अपने उपन्यास के लिए पुरस्कार मिला था वह उसके पैसे से खरीदी गई थी। फिर टेलिफोन कटवाना पड़ा। एक तो घर का खर्च कम करने के लिए, दूसरे फोन रहने पर मित्रों से बात करने में उनका काफी समय बर्बाद हो जाता था। फोन नहीं रहने पर समय भी बचने लगा और बातचीन न करने पर खर्च भी। उसके बाद एक-एक करके फ्रिज, टेलिविजन, रेडियो का नंबर आया। उसके बाद बच्चों की नियमित फीस जमा हो सके इसको ध्यान में रखते हुए मरसेदेस ने अपने गहने बेचने शुरु कर दिए। दुकानदार ने दयानतदारी दिखाते हुए उनको लंबी उधारी पर सामान देना स्वीकार कर लिया जिससे घर का चूल्हा जलता रहा। मकान मालिक भी इसके लिए तैयार हो गया कि वह बिना किराया लिए उनको लंबे समय तक घर में रहने देगा। घर में उन अठारह महीनों में सामान के नाम पर मरसेदेस का हेयर ड्रायर, हीटर, बच्चों के कुछ सामान और एक टेप रेकार्डर रह गया लिखते समय जिस पर मार्केज़ गाने सुना करते थे। बीटल्स का गाना ‘हार्ड डेज़ नाइट’ उस दौरान उनका प्रिय गीत बना रहा।

पहली बार 39 साल की अवस्था में मार्केज़ कुछ ऐसा लिख रहे थे जिसकी सफलता को लेकर वे स्वयं मुतमइन थे। हालांकि कुछ ही दिनों पहले लुई हार्स्स ने प्रमुख लैटिन अमेरिकी लेखकों से बातचीत पर आधारित अपनी किताब जब अर्जेंटीना के एक प्रमुख प्रकाशक सुदामेरिकाना को दी तो उसने उनसे मार्केज़ के बारे में पूछा क्योंकि बाकी सारे लेखकों को तो वह जानता था बस एक गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ के बारे में उसने नहीं सुन रखा था। उसने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने मशहूर लैटिन अमेरिकी लेखकों के बीच यह लगभग गुमनाम लेखक कौन है? हेस्स ने जवाब दिया कि आने वाले समय में देखिएगा यह बाकी सारे लेखकों से भी मशहूर हो जाएगा। खैर, और कोई आश्वस्त हो न हो मार्केज़ को लगने लगा था कि यही वह उपन्यास है जो उनको गुमनामी के अंधेरे से निकालेगा। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचाएगा।

इसीलिए इसे लिखते हुए वे बीच-बीच में अपने मित्रों के संपर्क में भी आए। विशेषकर उन मित्रों के जिनके साथ संघर्ष के दिनों में उन्होंने लेखक-वेखक बनने का सपना देखा था। बीच में एक छोटी सी यात्रा उन्होंने अराकाटक की भी की लेकिन इस बार वहां वे अपनी मां के साथ नहीं गए बल्कि उन्हीं मित्रों के साथ। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने अपने मित्र मेंदोज़ा से कहा था, यह मेरे बाकी उपन्यासों से एकदम हटकर है। इसमें मैंने जान लगाई है। देखना या तो इस उपन्यास से या तो मैं अर्श पर होउंगा या फर्श पर गिर जाउंगा। या तो लोग इसके दीवाने हो जाएंगे या इसे पढ़ते हुए अपने बाल नोचेंगे। इन बातों से लगता है कि बहुत सोच-समझकर उन्होंने इसे लिखने का रिस्क लिया था।

इससे पहले तो यह हुआ था कि उनके उपन्यास ‘नो वन राइट्स टु कर्नल’ को कोलंबिया की एक लघुपत्रिका ने कृपापूर्वक प्रकाशित किया था लेकिन ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ का एक अध्याय उन्होंने स्वयं कोलंबिया के मशहूर अखबार ‘एल स्पेक्तादोर’ को प्रकाशन के लिए दिया जिसमें उनकी आरंभिक कहानियां छपी थीं। जिसके एक स्तंभकार ने उनकी आरंभिक कहानियों को पढ़कर यह घोषणा की थी कि एक नए सितारे का आगमन हो गया है। ‘एल स्पेक्तादोर’ ने उपन्यास का वह अंश 1 मई 1966 के अंक में बहुत प्रमुखता से छापा। जो पाठकों को पसंद भी आया। उनके मित्र और मेक्सिकन लेखक कार्लोस फुएन्तेस उन दिनों पेरिस में थे। मार्केज़ ने उपन्यास के पहले तीन अध्याय उनको पढ़ने के लिए भेजे। उन्होंने बाद में लिखा कि उसे पढ़कर वे चकित रह गए कि कोई लेखक इस तरह से भी लिख सकता है। उन्होंने तुरंत वह अंश लैटिन अमेरिका के एक अन्य कद्दावर लेखक जूलियो कोर्ताज़ार को पढ़ने के लिए भेज दिया। संयोग से उनकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही थी। ध्यान रहे कि मार्केज़ के विपरीत इन दोनों लेखकों की लैटिन अमेरिकी लेखक के तौर पर तब तक अंग्रेजी में पहचान बन चुकी थी। इनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से मार्केज़ का आत्मविश्वास निश्चित तौर पर और बढ़ा होगा।

कार्लोस फुएन्तेस तो उन अंशों को पढ़कर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनको छपने के लिए पेरिस से प्रकाशित होनेवाली एक साहित्यिक पत्रिका के प्रवेशांक के लिए दे दिया। उसी अंक में कार्लोस फुएन्तेस का एक इंटरव्यू भी प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कहा, उन्होंने ‘हाल ही में मार्केज़ के लिखे जा रहे उपन्यास के पहले 75 पेज पढ़े। निस्संदेह यह एक मास्टरपीस है। पूरा होने के बाद जब यह छपकर आएगा तो निश्चिय ही लैटिन अमेरिका के अब तक के सारे लेखन को पीछे छोड़ देगा’। उपन्यास के छपने से पहले यह बहुत बड़ी भविष्यवाणी थी। वह भी एक जाने-माने लेखक द्वारा की गई। लोग अचंभित रह गए क्योंकि इससे पहले ऐसा कभी हुआ नहीं था।

बहरहाल, इस सारे हो-हल्ले के बीच बिना उससे प्रभावित हुए उन्होंने अपना उपन्यास पूरा कर लिया। उपन्यास पूरा होने के बाद उन्होंने दोस्त मेंदोज़ा को सबसे पहले पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा कि उपन्यास 11 बजे के करीब पूरा हो गया लेकिन घर में मरसेदेस नहीं थी कि उसे बता पाते। फोन था नहीं कि दोस्तों को फोन करके बता पाते। तीन बजे तक उनको मन मसोसकर रहना था जब घर के बाकी सदस्य आते। इस बीच उनके घर के पास एक नीली कार आकर रुकी और थोड़ी देर में उनके दोनों लड़के आए। उनके कपड़ों पर जगह-जगह नीले रंग लग गए थे जो उन्होंने पेंटिंग करते हुए लगाए थे। मार्केज़ को लग गया कि यह किताब खूब बिकनेवाली है। क्योंकि नीले रंग को वे अपने लिए शुभ मानते थे और इस किताब को पूरा करने के बाद उनको सबसे पहले नीला रंग दिखा था। उनको इसमें शुभ संकेत लग रहा था। लेखक के रूप में बेहतर भविष्य का।

इससे पहले के मार्केज़ के किताब को प्रकाशक बड़ी मुश्किल से मिले थे लेकिन इस उपन्यास को छापने के लिए अर्जेंटीना का वही मशहूर प्रकाशक पहले से ही तैयार था जिसने प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी लेखकों की भेंटवार्ताओं की किताब में मार्केज़ का नाम देखकर यह जिज्ञासा प्रकट की थी कि यह लेखक कौन है। सुदामेरिकाना नामक उस प्रकाशक को भेजने से पहले उन्होंने उपन्यास की एक पांडुलिपि बोगोटा में अपने दोस्त जरमन वर्गास को भेजी और पूछा कि उसने अपना और बारांकीला के अपने दोस्तों के जो संदर्भ दिए हैं क्या वे उचित हैं? पहले वर्गास और फिर फुएनमेयर ने लिखा कि वे बुएंदिया घराने के आखिरी वारिस के दोस्त बनकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। बाद में जरमन वर्गास ने बोगोटा के एक पत्र में उपन्यास पर लेख लिखा, एक किताब जिसकी धूम मचने वाली है। अप्रैल 1967 में प्रकाशित यह लेख एक तरह से कोलंबिया की धरती से उपन्यास की सफलता को लेकर की गई पहली घोषणा थी। बाद में जरमन वर्गास के इस लेख की भी खूब चर्चा हुई।

उसके बाद उन्होंने उपन्यास की पांडुलिपि अपने दोस्त प्लीनियो मेंदोज़ा को भिजवायी। उसने उपन्यास पढ़ने के लिए ऑफिस से छुट्टी ले ली। उपन्यास खत्म करने के बाद उसने अपनी पत्नी से कहा कि इस बार मार्केज़ ने बाज़ी मार ली है। देखना यह उपन्यास अपने जलवे बिखेरेगा। उसने कुछ और दोस्तों को भी पढ़ने के लिए उपन्यास दिया और सबकी यही राय थी कि ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ जैसा उपन्यास उन्होंने नहीं पढ़ा है। इसी बीच जुलाई 1966 में अखबार के लिए पांच साल बाद मार्केज़ ने कोई लेख लिखा। अखबार था वही ‘एल स्पेक्तादोर’। लेख का शीर्षक था- ‘पुस्तक के लेखक का दुर्भाग्य’। इसमें उन्होंने लिखा कि पुस्तक लिखना अपने आप में एक आत्मघाती व्यवसाय है। कोई और पेशा ऐसा नहीं है जो इतना अधिक श्रम, इतनी अधिक एकाग्रता की मांग करता हो। जबकि बदले में तात्कालिक तौर कोई लाभ नहीं होता। लेकिन सवाल उठता है कि जब लेखन के साथ इस कदर दुर्भाग्य जुड़ा है तो लेखक आखिर लिखता क्यों है। इसका जवाब है कि एक आदमी उसी तरह से लेखक होता है जिस तरह से कोई आदमी अश्वेत होता है या कोई यहूदी होता है। सफलता से प्रोत्साहन मिलता है, पाठकों के प्यार से तोष मिलता है, लेकिन ये एक तरह से अतिरिक्त लाभ हैं क्योंकि एक अच्छा लेखक तो वैसे भी लिखता रहेगा, चाहे उसके जूते मरम्मत की मांग कर रहे हों और उसकी किताबें बिक नहीं रही हों।

बहरहाल, पूरी तरह से आश्वस्त हो जाने के बाद उन्होंने पांडुलिपि अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में प्रकाशक सुदामेरिकाना को भेजने का निश्चय किया। पत्नी मरसेदेस के साथ वे पोस्ट ऑफिस गए पांडुलिपि को ब्यूनस आयर्स के प्रकाशक को भेजने के लिए। पैकेट में टाइप किए हुए 490 पृष्ठ थे। वजन करके काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा, कुल बयासी पेसो हुए। मरसेदेस ने अपने पर्स से पैसे निकाले तो केवल पचास पेसो निकले। आधी पांडुलिपि ही उतने पैसे में भेजी जा सकती थी। भेजकर घर आए और हेयर ड्रायर और हीटर भी बेच दिया। उससे जो पैसे आए बाकी पांडुलिपि उससे प्रकाशक के पास भेज दी। कुछ दिनों बाद जब उनके मित्र अलवारो मुतिस अर्जेंटीना जा रहे थे तो उनके हाथ से उपन्यास की एक और प्रति उन्होंने प्रकाशक के पास भिजवा दी। इस उपन्यास के चक्कर में घर सारा खाली हो गया था। उपन्यास के पक्ष में सकारात्मक बात अब तक केवल यही हुई थी कि इस बार पहली बार उनको प्रकाशक नहीं ढूंढना पड़ा था। खैर, जब अलवारो मुतिस ने अर्जेंटीना पहुंचकर सुदामेरिकाना के संपादक को फोन करके बताया कि वह मार्केज़ के उपन्यास की पांडुलिपि लेकर आए हैं तो उसने छूटते ही जवाब दिया कि मैंने पढ़ लिया है और वह सचमुच बेजोड़ है।     

आखिरकार उपन्यास प्रकाशित हुआ। कहते हैं कि ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ उपन्यास के प्रकाशन ने केवल मार्केज़ नामक उस लेखक की तस्वीर ही नहीं बदली उसने विश्व साहित्य का मानचित्र भी बदलकर रख दिया। इस उपन्यास ने इतनी बड़ी विभाजक रेखा खींची इससे पहले किसी गैर-यूरोपीय लेखक ने नहीं खींची थी। विलियम केनेडी ने इस उपन्यास के बारे में अपने आकलन में लिखा  कि ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ के बाद लिखी गई यह पहली साहित्यिक कृति है तथा समस्त मानवजाति को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए। कार्लोस फुएन्तेस ने इस उपन्यास को लैटिन अमेरिका का बाइबिल बताया। एक और प्रसिद्ध लैटिन अमेरिकी उपन्यासकार मारियो वर्गास ल्योसा ने इसके बारे में कहा कि यह लैटिन अमेरिकी वीरता का महान उपन्यास है। अपने एक लेख में उन्होंने इसे एक असाधारण उपन्यास बताया।

30 मई 1967 को उपन्यास प्रकाशित हुआ। स्पेनिश भाषा में करीब 352 पन्नों के इस उपन्यास की कीमत करीब दो अमेरिकी डॉलर रखी गई। पहले प्रकाशक ने तय किया कि 3000 प्रतियों का संस्करण छापा जाए। जो लैटिन अमेरिका के लिहाज से अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन जिस तरह से लैटिन अमेरिकी साहित्य के दिग्गजों ने इसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिक्रिया दिखाई थी उसके बाद प्रकाशक ने सोचा कि संस्करण को बढ़ाकर 5000 प्रतियों का कर दिया जाए। लेकिन पुस्तक विक्रेताओं ने जिस तरह से इस उपन्यास को लेकर उत्साह दिखाया उससे उत्साहित होकर प्रकाशक ने पुस्तक के प्रकाशन के दो सप्ताह पहले संस्करण को बढ़ाकर 8000 प्रतियों का कर दिया। पहले सप्ताह में पुस्तक की 1800 प्रतियां बिक गईं और बेस्टसेलर लिस्ट में उपन्यास तीसरे स्थान पर आ गया। दूसरे सप्ताह तक पहले संस्करण की सारी प्रतियां बिक गईं। अगले छह महीनों में पुस्तक के तीन संस्करण आए और उसकी 20000 प्रतियां और बिक गईं। करीब 20 साल पहले ‘एल स्पेक्तादोर’ अखबार के समीक्षक की भविष्यवाणी आखिरकार सही साबित हुई। एक नए सितारे का जन्म हो चुका था। उस समय लैटिन अमेरिकी लेखन के तीन सितारे माने जाते थे- कार्लोस फुएन्तेस, कोर्ताज़ार, मारियो वर्गास ल्योसा। यह चौथा नाम उन सब पर भारी पड़ रहा था। ऐसी असाधारण सफलता के बारे में लैटिन अमेरिका के किसी लेखक ने कभी सोचा भी नहीं था। एक आलोचक ने लिखा कि लोगों ने इसे उपन्यास की तरह से नहीं लिया बल्कि जीवन के रूप में देखा।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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