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द डॉक्टर एंड द सेंट: एक छोटा सा अनुवाद और अरुंधति से एक संवाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/16/2014 09:54:00 PM


पिछले दिनों बाबासाहेब बी. आर. आंबेडकर की चर्चित और क्रांतिकारी किताब एन्नाइहिलेशन ऑफ कास्ट (जाति का उन्मूलन) का विस्तृत टिप्पणियों समेत एक नया संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसमें अरुंधति रॉय की 150 पन्ने की प्रस्तावना भी शामिल है. द डॉक्टर एंड द सेंट शीर्षक वाली इस प्रस्तावना के अलग अलग अंश कारवां, आउटलुक और द हिंदू में छप चुके हैं, अरुंधति का एक साक्षात्कार आउटलुक में आ चुका है और लेखिका ने देश में अनेक जगहों पर इस सिलसिले में व्याख्यान और भाषण दिए हैं. इसी बीच प्रस्तावना के सिलसिले में, और एक गैर-दलित होते हुए आंबेडकर की रचना पर लिखने के अरुंधति के ‘विशेषाधिकार’ का मुद्दा उठाते हुए कुछ लेखकों और समूहों ने अरुंधति और किताब के प्रकाशक की आलोचना की है. इनके अलावा फेसबुक पर भी इस सिलसिले में अलग अलग बहसें चल रही हैं. अरुंधति ने इनमें से कुछ का जवाब देते हुए एक टिप्पणी जारी की है जिसे यहां पढ़ा जा सकता है.

5 मार्च 2014 को इंडिया हैबिटेट सेंटर में किताब पर एक बातचीत रखी गई, जिसमें पहले अरुंधति ने एक छोटा सा भाषण दिया और इसके बाद हिंदी के जानमाने कवि असद जैदी के साथ एक संवाद में भाग लिया. पेश है इस संवाद सत्र की रिकॉर्डिंग. साथ में, द डॉक्टर एंड द सेंट के आखिरी हिस्से का अनुवाद. अनुवाद: रेयाज उल हक

हालांकि हम जिस दौर में जी रहे हैं वे उसे कलियुग कहते हैं. राम राज्य में भी शायद बहुत देर नहीं है. चौदहवीं सदी की बाबरी मसजिद को, जो कथित रूप से अयोध्या में 'भगवान राम' की जन्म भूमि पर बनाई गई थी, हिंदू फासीवादियों ने आंबेडकर की बरसी 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया. हम इस जगह पर भव्य राम मंदिर बनाए जाने के खौफ में जी रहे हैं. जैसा कि महात्मा गांधी ने चाहा था, अमीर लोग अपनी (और साथ-साथ हरेक की) दौलत के मालिक बने हुए हैं. चार वर्णों की व्यवस्था बेरोकटोक राज कर रही है: ज्ञान पर बड़े हद तक ब्राह्मणों का कब्जा है, कारोबार पर वैश्यों का प्रभुत्व है.  क्षत्रियों ने हालांकि इससे अच्छे दिन देखे हैं, लेकिन अब भी ज्यादातर वही देहातों में जमीन के मालिक हैं. शूद्र इस आलीशान हवेली के तलघर में रहते हैं और घुसपैठ करने वालों को बाहर रखते हैं. आदिवासी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं. और रहे दलित तो हम उन्हीं के बारे में तो बातें करते आए हैं.

क्या जाति का खात्मा हो सकता है?

तब तक नहीं जब तक हम अपने आसमान के सितारों की जगहें बदलने की हिम्मत नहीं दिखाते. तब तक नहीं जब तक खुद को क्रांतिकारी कहने वाले लोग ब्राह्मणवाद की एक क्रांतिकारी आलोचना विकसित नहीं करते. तब तक नहीं जब तक ब्राह्मणवाद को समझने वाले लोग पूंजीवाद की अपनी आलोचना की धार को तेज नहीं करते.

और तब तक नहीं जब तक हम बाबासाहेब आंबेडकर को नहीं पढ़ते. अगर क्लासरूमों के भीतर नहीं तो उनके बाहर. और ऐसा होने तक हम वही बने रहेंगे जिन्हें बाबासाहेब ने हिंदुस्तान के ‘बीमार मर्द’ और औरतें कहा था, जिसमें अच्छा नहीं होने की चाहत नहीं दिखती.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ द डॉक्टर एंड द सेंट: एक छोटा सा अनुवाद और अरुंधति से एक संवाद ”

  2. By Manto on March 18, 2014 at 9:01 AM

    Vah bhai vah jati khatm ke nare lagane vale, jati unmulan ki bat karne vale khud jati suchak puchh (ray, mishra, sharma) or pata nahin kya kya lagae firte hai. Jati ko sahu meie khatma chahte hai to kya vi apne jati suchak sur name nahin hata sakte? Ryaz bhai aap achhi tara jante hai ki ismein koi bari bat nahi hai......

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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