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बीच सफ़हे की लड़ाई

किसकी चाय बेचता है तू

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/16/2014 05:39:00 PM


पेश है ब्रजरंजन मणि की यह कविता. अगर यह नहीं भी बताया जाए कि कविता किस पर लिखी गई है तो हजारों अल्पसंख्यक मुसलमानों के खून और बर्बादी से सने अपने चेहरे पर चाय बेचने वाले की मासूमियत ओढ़ कर प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले इस शख्स को आप आसानी से पहचान सकते हैं. ब्रजरंजन मणि जाने माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. भारतीय समाज में जाति और प्रभुत्व तथा प्रतिरोध संबंधी उनकी दो किताबें प्रकाशित हुई हैं: Debrahmanising History: Dominance and Resistance in Indian Society तथा Knowledge and Power: A Discourse for Transformation.

अपने को चाय वाला क्यूँ कहता है तू
बात-बात पे नाटक क्यूँ करता है तू
चाय वालों को क्यों बदनाम करता है तू
साफ़ साफ़ बता दे किसकी चाय बेचता है तू !

खून लगाकर अंगूठे पे शहीद कहलाता है
और कॉर्पोरेट माफिया में मसीहा देखता है
अंबानी-अदानी की दलाली से 'विकास' करता है
अरे बदमाश, बता दे, किसकी चाय बेचता है तू !

खंड-खंड हिन्दू पाखंड करता है
वर्णाश्रम और जाति पर घमंड करता है
फुले-अंबेडकर-पेरियार से दूर भागता है
अरे ओबीसी शिखंडी, किसकी चाय बेचता है तू !

मस्जिद गिरजा गिराकर देशभक्त बनता है
दंगा-फसाद की तू दाढ़ी-मूछ उगाता है
धर्म के नाम पर बस क़त्ले-आम करता है
अरे हैवान बता तो, किसकी चाय बेचता है तू !

धर्मपत्नी को छोड़ कुंवारा बनता है
फिर दोस्त की बेटी से छेड़खानी करता है
काली टोपी और चड्डी से लाज बचता है
अरे बेशर्म, किसकी चाय बेचता है तू !

काली करतूतों से शर्म नहीं करता है
कोशिश इन्सान बनने की ज़रा नहीं करता है
चाय वालों को मुफ्त में बदनाम करता है
अरे मक्कार अब तो कह दे, किसकी चाय बेचता है तू !

अपने को चाय वाला क्यूँ कहता है तू
बात-बात में नाटक क्यूँ करता है तू
चाय वालों को क्यों बदनाम करता है तू
साफ़ साफ़ बता दे किसकी चाय बेचता है तू!

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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