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बीच सफ़हे की लड़ाई

दिल्ली में संसदीय वामपंथियों का ‘आप’ राग !

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/09/2014 02:03:00 PM


रूपेश कुमार सिंह

अब जबकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई है और दिल्ली के 7वें मुख्यमंत्री के तौर पर अरविंद केजरीवाल ने गद्दी संभल ली है, तो इस पूरे चुनावी परिदृश्य में संसदीय वामपंथी पार्टियों की भूमिका का विश्लेषण एक बार फिर से जरूरी कार्यभार बन जाता है! हम थोड़ा सा पीछे लौटकर अन्ना आंदोलन की याद को अगर ताजा करें तो उस समय भी उस भ्रष्टाचार विरोधी उभार को हथियाने के लिए भाजपा से लेकर तमाम संसदीय वामपंथी पार्टियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अन्ना के मंच से भाषण देने के लिए लालायित कॉमरेडों ने उस समय अपना पूरा जोर लगाया। जब राजघाट के मंच पर ये भाषण देने आए, इन्हें तब वहां जुटे अन्ना के अनुयायियों ने उन्हें हूट किया और उन्हें भाषण तक नहीं देने दिया गया! जब केजरीवाल ने पार्टी बनाई तो अन्य पार्टियों के तरह संसदीय वाम दलों ने भी कहा कि ‘ये पार्टी नहीं चलनेवाली!’ जब दिल्ली में केजरीवाल ने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और अपना लम्बा-चौड़ा घोषणापत्र जनता के बीच रखा तो इसे भी उन्होंने बकवास ही करार दिया और 5 वामपंथी पार्टियों (भाकपा, माकपा, भाकपा-माले लिबरेशन, फॉरवर्ड ब्लॉक, एसयूसीआई (सी)) ने अलग-अलग 20 सीटों से अपने उम्मीदवार भी खड़े किये! स्वाभाविक है, जिस क्षेत्र से इन्होंने अपने उम्मीदवार खड़े किये थे, वहां इन्होंने आप का विरोध भी किया होगा, लेकिन चुनाव परिणाम आते ही इनके सुर-ताल बदल गये !

वैसे अगर कहा जाये तो इस तरह का बदलाव कोई पहली घटना नहीं थी, इनका इतिहास ही अवसरवादिता का रहा है! ये बिहार में कभी लालू का विरोध करते हैं तो कभी समर्थन और नीतीश कुमार के साथ भी यही सलूक है इनका। यूपी में कभी मुलायम सिंह से गलबहियाँ करते हैं तो कभी इनके खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन! खैर यहाँ हम दिल्ली के बारे में बात कर रहे हैं, दिल्ली में इनका गिरगिट क़ी तरह रंग बदलने का कारण, इन पार्टियों को मिले वोट से भी पता चलता है। माकपा को द्वारका, करावल नगर और शाहदरा में क्रमशः 684, 1199 और 121 वोट मिले, भाकपा को बाबरपुर, छतरपुर, मंगोलपुरी, नरेला, ओखला, पालम, पटपड़गंज, सीमापुरी, तीमारपुर और त्रिलोकपुरी में क्रमशः 794, 745, 789, 643, 660, 498, 362, 699, 637 और 476 वोट मिले, भाकपा-माले लिबरेशन को कॉन्डली, नरेला, पटपड़गंज और वजीरपुर में क्रमशः 203, 338, 146 और 172 वोट मिले, फॉरवर्ड ब्लॉक को किरारी और मुंडका में क्रमशः 173 और 175 वोट मिले और एसयूसीआई(सी) को बुराड़ी में 325 वोट मिले ! अब अगर हम इन सभी वोटों को एक साथ भी मिला दें तो वह संख्या आप को किसी एक सीट पर मिले वोटों की बराबरी भी नहीं कर सकेगी! इसलिए जैसे ही चुनाव का रुझान आप के पक्ष में आना शुरू हुआ, संसदीय वामपंथी पार्टियों के नेता और विचारकों का मूल्यांकन भी बदलने लगा! चुनाव परिणाम आने के बद तो हद ही हो गई, जब इनके महासचिवों ने प्रेस बेयान जारी कर केजरीवाल को भ्रष्टाचार विरोधी नायक के रूप में स्थापित करने की बेशर्मी भरी कोशिश शुरू कर दी, फिर क्या था, इनके विचारकों ने भी इनको आप से सीख लेते हुए अपनी नीतियों में तब्दीली लाने की सिफारिश की और सोशल साइटों पर आप के कशीदे काढ़ने शुरू कर दिए!

जबकि असलियत सभी जानते हैं कि केजरीवाल प्रसिद्ध एनजीओ कर्मी रहे हैं और आरक्षण विरोधियों के समर्थक भी! एनजीओ किस तरह से जनता को बरगलाता है, ये किसी से छुपा नहीं है और आप का पूरा घोषणापत्र या एजेंडा एक एनजीओ के तरह ही सुधारवादी घोषणाओं से भरा पड़ा है! आप आर्थिक नीतियो या फिर राज्य दमन के सवाल पर कुछ नहीं बोलती!

अंत में कुछ सवाल

भाकपा-माले लिबरेशन के दिल्ली राज्य सचिव संजय शर्मा ने 28 दिसम्बर को प्रेस बयान जारी कर कहा है ‘दिल्ली में शक्तिशाली तीसरी ताकत के रूप में ‘आप’ का उभार और आम लोगों के बुनियादी सवालों का राजनीति में केन्द्रीय एजेण्डा बन जाना स्वागत योग्य परिघटना है। ‘आप’ के उदय ने आन्दोलन आधारित राजनीति के महत्व को पुर्नस्थापित किया है, साथ ही यथास्थितिवादी राजनीति के पैरोकारों, खासकर कांग्रेस और भाजपा, के विकल्प के लिए आम जनता की तलाश को महत्वपूर्ण रूप से रेखांकित किया है। ‘आप’ के घोषणापत्र में दिल्ली के मेहनतकशों के बहुत से सवाल शामिल हैं, जिस कारण उन्हें इस तबके से महत्वपूर्ण समर्थन भी मिला."

ये बयान कई सवाल खड़े करता है:

1)    अगर ‘आप’ ने आम लोगों के बुनियादी सवालों को राजनीति के केन्द्रीय एजेंडे में ला दिया, तो अब तक आप क्या कर रहे थे कॉमरेड?

2) अगर "आप" ने आन्दोलन आधारित राजनीति के महत्व को पुनर्स्थापित किया है तो आपलोग आन्दोलन कर रहे हैं या नौटंकी?

3) "आप" की चुनावी सफलता की ओट में सुधारवादी कार्यनीति आपका प्रमुख एजेंडा तो नहीं बन जाएगा?

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  1. 7 टिप्पणियां: Responses to “ दिल्ली में संसदीय वामपंथियों का ‘आप’ राग ! ”

  2. By vipin on January 10, 2014 at 5:19 PM

    मुझे लग रहा है कि रुपेश जन राजनीति करने वाले वामपंथी दलों को खुद-ब-खुद संसदीय मानकर उन पर 'आप राग' थोपने की हड़बड़ी कर रहे हैं. अन्ना आन्दोलन जिस भ्रस्टाचार के मुद्दे पर उभरा था उससे वामपंथी दल मौन कैसे रह सकते थे, उन्होंने आन्दोलन की आलोचनाएँ की लेकिन अपने झंडे-बैनर-विचारों के साथ आन्दोलन में भागीदारी भी की. सीपीएम के विचारक हों या माले के दोनों ने ही भ्रस्टाचार की अपनी व्याख्या नव-उदारवादी नीतियों और राजनीति के कारपोरेटीकरण के कुफल के रूप में की थी. प्रभात पटनायक ने तो लोकपाल को तानाशाही का सबब भी बता डाला था, और अरुंधती ने भी यही कहा था. आज ‘आप’ के सन्दर्भ में वामपंथी दलों द्वारा अपनाई कार्यनीति जन मुद्दों पर आप की घोषणाओं का स्वागत करते हुए उनसे राजनीतिक प्रतिद्वंदिता करने की दिख रही है, जिससे शायद किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. यही नहीं, ‘आप’ के वैचारिकी की वे निर्मम आलोचना भी कर रहे हैं. प्रभात पटनायक या प्रकाश करात तक ने यही किया है. माले का औपचारिक लेख नहीं आया लेकिन उनके मुखपत्र में आई फुटकर टिप्पणियाँ किसी वैचारिक विभ्रम का संकेत नहीं देती हैं, किसी 'आप राग' के लक्षण तो कत्तई नहीं. जिस एक प्रेस विज्ञप्ति से रुपेश ने इतने सारे निष्कर्ष निकाले हैं उसका लब्बोबुबाब ‘आप’ के साथ अपनी प्रतिद्वंदिता की जन-कार्यनीति के बाबत पहली टिप्पणी से अलग कुछ भी नहीं है. बुर्जुवा दलों के साथ कार्यनीतिक अवसरवाद को लेकर वाममोर्चे की खूब आलोचना पहले ही हो चुकी है और देश के सबसे बड़े वामपंथी ब्लॉक का यह अवसरवाद न रहा होता तो शायद आज देश में वामपंथी राग आप से कही ज्यादा गूंज रहा होता. उनका संसदवाद भी नया नहीं है. लेकिन संसदीय और गैर संसदीय संघर्षों के उचित संतुलन की ईमानदार कोशिशों में लगे दलों के बारे में संसदवाद का ठप्पा कितना उचित है यह जरुर विचारणीय है, क्योंकि ऐसा होने पर तो देश में सिर्फ माओवादी ही शुद्ध बचेंगे और दुर्भाग्य से जन राजनीति से दूर रहने के कारण इस सन्दर्भ में उनका आकलन कर पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं होगा. यह जरुर कहा जा सकता है कि गुटीय प्रतिबद्धताओं की संकीर्णता और आरोप व लेबल लगाने की हड़बड़ी से देश के वामपंथी आन्दोलन की सच्ची एकता और भविष्य की संभावनायें और धूमिल होती जाएँगी.

  3. By Rupesh Kumar Singh on January 10, 2014 at 5:51 PM

    सबसे पहली बात तो ये कि अन्ना आंदोलन क़ी आलोचना किसी भी वाम दल ने नहीं क़ी थी , हाँ, लिबरेशन ने जरूर अन्ना के मांगों के साथ कुछ और भी मांग जोड़ा था लेकिन दूसरी तरफ जब अन्ना अनशन पर बैठे थे तो लिबरेशन ने भी उसी दिन कई जगह पर अनशन किया था और जब भारत बंद का आह्वान किया गया अन्ना के तरफ से तो उसका भी समर्थन किया गया था , खैर अन्ना क़ी परिणती हमने देख ली , कि कैसे आंदोलन पतित हुआ और कॉंग्रेस और भाजपा उसे भुनाने क़ी कोशिश कर रही है, केजरीवाल क़ी जीत को मैं साफ तौर पर कॉर्पोरेट के एक नये चेहरे क़ी जीत क़ी नजर से ही देखता हूँ और ऐसे में उस से सीखने क़ी बात करना , अपनी बुनियादी राजनीति को भूलने के अलावा और कुछ नहीं है !

  4. By vipin on January 10, 2014 at 6:27 PM

    मैंने कहा कि अन्ना आन्दोलन में वामपंथी दलों ने अन्ना की टोपी-बैनर तले नहीं बलिक अपने झंडे-बैनर-विचारों के साथ अलग से भागीदारी की. दूसरी तरफ अन्ना आन्दोलन की वैचारिक आलोचना भी जरुर की गयी और यह सबको पता है. सीपीएम के करात और पटनायक के लेख देखिये. उनके लोकपाल के प्रस्ताव को कुछ वामपंथी विचारको द्वारा फासिस्ट तक बताया गया था. और भ्रस्टाचार पर माले की विवेचना अन्ना की वैचारिकी से बिलकुल अलग है. कोई वामपंथी दल केजरीवाल के दल के प्रति अपनी कार्यनीति तय करते समय यह नहीं भूल सकता कि केजरीवाल को वोट देने वालों में दिल्ली के गरीब मजदूर शामिल हैं. और अभी तक, मेरी समझ से, उनकी कार्यनीति में यही दिख रहा है.

  5. By Rupesh Kumar Singh on January 10, 2014 at 7:01 PM

    दंगाई मोदी के साथ, भ्रष्ट कोंग्रेस के साथ और समाजवादी मार्के वाली भ कई पार्टियों के साथ गरीब मजदूर है , तो क्या उनकी नीतियों को भी आत्मसात करेंगे वाम दाल ? क्या वामपंथी ये वामपंथी दल ये भूल गये हैं कि उनका सपना तो शोषण विहीन समाज क़ी स्थापना है या वो भी अब इसी व्यवस्था के अंदर कुछ सुधार चाहते है ? ये तय तो करना ही होगा कि "इन पार्टनरों क़ी पॉलिटिक्स क्या है ?

  6. By Rupesh Kumar Singh on January 10, 2014 at 7:22 PM

    यदि " आप" को मज़दूरों ने रेस्पोंड किया है तो उस तर्क से ये भी सबित होता है की जनता ने आपके स्लोगन को रेजेक्ट कर दिया ऐसे मे क्या हमे ये भी मान लेना चाहिये की अब आपका स्लोगन रेजेक्ट हो गया और "आप "का स्लोगन ही जनता का स्लोगन है. और अगर ये सही है तो फिर ये बात यहाँ तक जा सकती है कि आज कम्युनिस्ट फोर्सेस के स्लोगन को लोगों ने रेजेक्ट कर दिया है और ऐसे मे कम्युनिस्ट पार्टी की जरूरत नहीं है.!

  7. By vipin on January 10, 2014 at 11:03 PM

    मुझे लगता है कि हम आप कुछ अलग-अलग ही बतियाये जा रहे हैं. पहली बात तो यह राजनीति का एक सर्वमान्य ककहरा है जिस पर हम बेवजह बहस कर रहे हैं. बुर्जुवा राजनीतिक दल भी पूंजीवादी लोकतंत्र में बुर्जुवा से इतर एक सामाजिक आधार रखता है, जिसको उनसे अलग करना और वर्ग-संतुलन को अपने पक्ष में करते जाना वामपंथ की फौरी राजनीति का सार है. मुझे आश्चर्य हो रहा है कि आप इस बुनियादी तरीके को ही प्रश्नांकित कर रहे हैं. मैंने कार्यनीति के इस सार पर कोई बहस नहीं देखी है और यह सोचना एक निरर्थक कल्पना है कि वामपंथ की यह लडाई शासक वर्गीय राजनीति, विचारधारा और लक्ष्य को अपनाकर लड़ा जाना कोई नैसर्गिक अनिवार्यता है. हर तरह के शोषण को समाप्त करना कम्युनिस्टों का दूरगामी लक्ष्य है, लेकिन कोई इसे वामपंथी राजनीति की फौरी कार्यनीति का आधार बनाये तो यह उसका सिरफिरापन ही कहलायेगा. चुनाव हार जाने से कम्युनिस्ट पार्टी अपने दूरगामी लक्ष्य नहीं त्याग देती और न ही कम्युनिस्ट पार्टी का विलोप कर देती है. भारतीय सन्दर्भ में भी यह एक कपोल कल्पना है क्योंकि ऐसा कच्चापन घोर संसदवादी समझे जाने वाले भारतीय वामपंथी दल ने भी अभी तक नहीं दिखाया है.

  8. By Rupesh Kumar Singh on January 11, 2014 at 11:06 AM

    "हर तरह के शोषण को समाप्त करना कम्युनिस्टों का दूरगामी लक्ष्य है " , क्या ये याद भी है इन वामपंथी दलों को या सिर्फ चुनाव बाजी ही इनका मुख्य लक्ष्य है ?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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