हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जुझारू जनसंघर्षों की परंपरा में एक जुझारू कविता 'अंधेरे में'

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/26/2013 06:55:00 PM



मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में के पचास साल पूरे होने पर इस कविता और मुक्तिबोध के बारे में बहस एक बार फिर तेज हुई है. नए संदर्भों और हालात में कवि और कविता को देखने का आग्रह बढ़ा है. कवि, कार्यकर्ता और भोर के प्रधान संपादक रंजीत वर्मा का यह लेख इसी सिलसिले की एक कड़ी है.

मुक्तिबोध की कविता ’अंधेरे में’ एक गुरिल्ला कविता है। इस कविता ने पहली बार हिंदी कविता को लड़ने की भाषा दी। यह संघर्ष की कविता है और साथ ही कविता के संघर्ष का भी यह एक नायाब उदाहरण है। ’अंधेरे में’ कविता पचास साल की हो गई लेकिन इसके विचार में वही तेजी है और उतनी ही फुर्ती से यह कविता आज भी हमले के वक्त अपना पोजीशन ले लेती है। कभी यह स्वप्न में चली जाती है तो कभी कविता ’गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि सा’ होकर अंडरग्राउंड हो जाती है तो कभी बरगद के ’तल खोह अंधेरे’ में किसी पागल के गान में जगह बनाती है तो कभी भागती है दम छोड़, घूम जाती है कई मोड़, जबकि ’फंसाव घिराव तनाव है सब ओर’ और चहुं ओर ‘किसी जनक्रांति के दमन निमित्त यह मार्शल लॉ’ जैसी स्थिति है, ‘जमाने की जीभ निकल पड़ी है’ और जहां कोई पीछा कर रहा होता है लगातार। इस कविता के लिखे जाने के चार साल बाद लोगों को नक्सलबाड़ी में बसंत का वज्रनाद सुनाई दिया, बयालिस साल बाद 2005 में लोगों ने देखा कि किस तरह नक्सलियों के सफाए के नाम पर सलवा जुड़ूम जैसा निंदनीय कार्यक्रम चलाया गया जिसमें संघर्ष कर रहे आदिवासियों के खिलाफ उनके ही भाई बंधुओं को लामबंद कर खड़ा कर दिया गया. लेकिन जब लगा कि इस कार्यक्रम को सर्वोच्च न्यायालय में सरकार संवैधानिक कार्रवाई नहीं ठहरा पाएगी, और आगे चलकर यही हुआ भी, तो  उसे थोड़ा नेपथ्य में डालते हुए 2009 में यानी ’अंधेरे में’ लिखे जाने के छियालिस साल बाद सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन ग्रीन हंट जैसी हत्यारी कार्रवाई शुरू की और जो आज भी न सिर्फ बदस्तूर जारी है बल्कि अब इसने अपना विस्तार भी कर लिया है। और अब यह शहरी बुद्धिजीवियों के घरों के दरवाजे खटखटाने लगी है और आधी रात एक आवाज किसी को भी गूंजती सुनायी दे सकती है-‘स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता, क्रॉस एक्जामिन हिम थॉरोली।’ और यह थॉरोली जांच दिमाग की कैसे की जाती है इसका भी ब्योरा दिया है मुक्तिबोध ने:

मस्तक-यंत्र में कौन विचारों की कौन-उर्जा
कौन-सी सिरा में कौन-सी धकधक,
कौन-सी रग में कौन-सी फुरफुरी,
कहां है पश्यत कैमरा जिसमें
तथ्यों के जीवन दृश्य उतरते,
कहां कहां सच्चे सपनों के आशय
कहां कहां क्षोभक-स्फोटक सामान!
भीतर कहीं पर गड़े हुए गहरे
तलघर अंदर
छिपे हुए प्रिन्टिंग प्रेस को खोजो।
जहां कि चुपचाप ख्यालों के परचे
छपते रहते हैं, बांटे जाते।
इस संस्था के सेक्रेटरी को खोज निकालो।

इन सबके बावजूद न तो आंदोलन की धार को कुंद किया जा सका है और न तो इस कविता के अंदर जो प्रेरकशक्ति है उसका विध्वंस किया जा सका है जबकि इस बीच उदारीकरण ने इस देश में एक तरह से मानो कारनामा ही कर दिया। उसने कर्ज में डूबा एक ऐसा खुशहाल मध्यवर्ग इस देश में पैदा कर दिया जिसके लिए कविता या क्रांति या संघर्ष या निम्न वर्ग या उसकी परेशानियां या जद्दोजहद कोई मायने नहीं रखतीं। वह अपनी खुशियों और एकाकीपन में इस तरह डूब गया कि वह अपने निकट के इतिहास से भी खुद को दूर कर लिया। हालांकि यह सब अचानक नहीं हुआ बल्कि वह अपने चरित्र में पहले से ही ऐसा था बस अनुकूल समय आने भर की बात थी जो उदारीकरण के आने के बाद उसे मिल गया और वह हद से बाहर निकल गया। मुक्तिबोध ने इसे अपने समय में ही पहचान लिया था। उन्होंने रात के अंधियारे में जिस जुलूस को देखा था उसमें मध्यवर्ग के ही पत्रकार, कवि, नेता, विद्वान आदि उद्योगपतियों और कुख्यात गुंडों के साथ शामिल थे। इस जुलूस को उन्होंने किसी मृत दल की शोभा यात्रा कहा क्योंकि इनकी जमीर मर चुकी थी और इन्होंने ’स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया’ था। यह कविता की ताकत है कि जब से यह कविता सामने आई है ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरा होगा जब इस कविता को हिंदी में कहीं न कहीं किसी न किसी ने उद्धृत नहीं किया होगा या मन ही मन याद नहीं किया होगा या किसी दूसरे को नहीं सुनाया होगा। हो सकता है यह कहना सही हो कि कविता क्रांति नहीं कर सकती लेकिन यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि क्रांति के बीजों को कविता सुरक्षित रखती है।

मुक्तिबोध को इस बात का पूर्वानुमान था, जैसा कि अक्सर कहा भी जाता है कि कोई सशस्त्र आंदोलन जल्द ही विस्फोट के साथ सामने आने वाला है। हो सकता है उनकी बात सही हो क्योंकि 1967 में हुआ नक्सलबाड़ी आंदोलन ने अपनी विरासत में यह रूप धारण किया था। और एक सजग कवि होने के कारण जाहिर है कि मुक्तिबोध भी इस पूरी विरासत से अच्छी तरह वाकिफ थे। ‘अंधेरे में’ वे लिखते हैं:

गेरुआ मौसम उड़ते हैं अंगार
जंगल जल रहे जिन्दगी के अब
जिनके कि ज्वलंत-प्रकाषित भीषण
फूलों से बहती वेदना नदियां
जिनके कि जल में
सचेत होकर सैकड़ों सदियां, ज्वलंत अपने
बिम्ब फेंकती।

ये पंक्तियां यूं ही नहीं आ गयी हैं बल्कि इसके पीछे विद्रोह की सदियों पुरानी लंबी परंपरा है जिसे वे अपनी इन पंक्तियों में अभिव्यक्त कर रहे हैं। ये तमाम विद्रोह विभिन्न नामों से जाने जाते हैं इसके बावजूद वे एक कड़ी बनाते हैं। इस पूरी कड़ी को जोड़कर देखना बहुत जरूरी है।

अगर हम छत्तीसगढ़ के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि वहां विद्रोह की लंबी परंपरा रही है। मुक्तिबोध वहीं के थे अतः जाहिर है कि वे इन सबसे पूरी तरह अवगत थे। अमूमन देखा यह गया है कि पूरे देश में जनांदोलनों की शुरुआत कार्नवालिस एक्ट के तहत स्थायी बंदोबस्ती प्रथा लागू किये जाने के फलस्वरूप हुई जिससे छोटे किसानों, बंटाईदारों को जो अमूमन पिछड़ी जाति के हुआ करते थे, भीषण उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा लेकिन छत्तीसगढ़ में समानता को लेकर प्रतिरोध के स्वर को 17वीं शताब्दी में ही सुना जाने लगा था जो कार्नवालिस एक्ट के आने के बाद धीरे धीरे उग्र रूप लेने लगा था। सतनामी पंथ, कबीर पंथ और रैदासी परंपरा के लोगों ने पूरे छत्तीसगढ़ में लोगों के बीच अपनी जड़ें जमा ली थीं। ये समानता की बात करते थे और इनका स्वर प्रतिरोध का था। छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास की पहचान इन सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों के द्वारा सवाल उठाए जाने की प्रक्रिया से बहुत अच्छे से की जा सकती है। 19वीं शताब्दी में जब मालगुजारी बंदोबस्ती का कानून अंग्रेजों ने छत्तीसगढ़ में लागू किया तो सनातनी लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया और बंटाईदारों और छोटे किसानों को बड़ी संख्या में गोलबंद किया, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भूमकाल विद्रोह था। 1910 में यह बस्तर के 84 परगना में से 46 परगना में फैल गया था। आधुनिक काल में छत्तीसगढ़ में इसे आदिवासियों का पहला बड़ा सशस्त्र विद्रोह कहा जा सकता है। यह मुख्यतः इसलिए शुरू हुआ क्योंकि अंग्रेज सरकार ने पहली बार ‘सुरक्षित जंगल’ की घोषणा की और ठेकेदारों को अनुमति दी कि जंगलों से लकड़ी काट कर पटरी बिछाने के लिए उसे रेलवे को मुहैया करें। यही वक्त है जब जंगलों का सरकारी स्तर पर सफाया शुरू हुआ और आदिवासी विस्थापित होने लगे। विद्रोह की विकटता को देख कर इन्हीं दिनों सरकार ने कई जनजातीय समुदायों को कानून बनाकर जाति के आधार पर जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया ताकि पुलिस के लिए उन्हें कहीं से भी और बिना किसी कारण के ही उठा लेना और जेल में ठूंस देना या यहां तक कि उनकी हत्या कर देना अदालत और दुनिया के समक्ष जायज ठहराया जा सके। ये वही जनजातियां थीं जिन्होंने जंगल के अंदर भीषण लड़ाइयां लड़ी थीं। ठेकेदारों के लिए मुश्किल था बिना सेना की मदद के जंगलों से लकड़ी काट ले जाना। यह कानून एक बड़ा हथियार साबित हुआ। अब पुलिस या सेना के लिए यह बहुत आसान था पूरे आंदोलन को हिंसक तरीके से नियंत्रित करना। गुरिल्ला युद्ध एकमात्र विकल्प था आंदोलनकारियों के सामने।

भूमकाल आंदोलन के पहले कम से कम नौ महत्वपूर्ण विद्रोह हो चुके थे जिनका नामोल्लेख करना यहां जरूरी है ताकि आंदोलन की उस जमीन को समझा जा सके जिसकी मिट्टी से मुक्तिबोध पैदा हुए। वे हैं- हल्बा विद्रोह (1774-79), भोपाल पतनम संघर्ष (1795), परालकोट विद्रोह (1825), तारापुर विद्रोह (1842-54), मारिया विद्रोह (1842-63), प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1856-57), कोई विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी विद्रोह (1878-82) और तब जाकर 1910 में शुरू होता है भूमकाल विद्रोह। ये सारे विद्रोह इसलिए हुए क्योंकि अंग्रेज उनपर अपनी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था थोप रहे थे जिससे उनकी अपनी संस्कृति और सामाजिक संरचना ध्वस्त होती नजर आ रही थी। और दूसरी ओर वे अपनी जान देने को तैयार थे लेकिन अपनी जीवनशैली को छोड़ने को कतई तैयार नहीं थे। इस तरह कहा जा सकता है कि ये सारे आंदोलन और खासकर भूमकाल आंदोलन जो पिछले सभी आंदोलनों के मुकाबले काफी उग्र था मूलतः सत्ता द्वारा मचाई जा रही लूट, शोषण और दमन के खिलाफ था।

क्या ऐसा लग नहीं रहा कि एकदम थोड़े अंतर के साथ आज भी यही सब हो रहा है? आज जंगल की लकड़ी ही नहीं बल्कि खनिज संपदा पर भी उनकी निगाह है। इस बार ठेकेदार की जगह कॉर्पोरेट घराने इस लूट में शामिल हैं जिनके हाथ में सरकार ने पट्टा थमा दिया है। साथ ही वे इस लूट को अंजाम दे सकें इसलिए उनकी मदद को भारत सरकार ने जबरदस्त तरीके से सेना को उनका रास्ता साफ करने को लगा दिया है। फिर भी राह उनके लिए पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गयी है। भारी विरोध है, आंदोलन है, सत्ता की हिंसा के जवाब में हिंसा भी है लेकिन इसके बावजूद यह पहले से ज्यादा संगठित भी है। और न सिर्फ संगठित हैं बल्कि पहली बार विद्रोह की इस लंबी परंपरा में विचारधारा दिखाई देने लगी। इस बार उन्हें नियंत्रित करने के लिए अपराधी ठहराने वाले सिर्फ उसी पुराने कानून से काम नहीं चल सकता था अतः एक नया और बेहद दमनकारी कानून लाया गया और वह था 2005 में बना जन सुरक्षा अधिनियम कानून। इस कानून के साथ सरकार भारतीय जनमानस में यह बात बिठा देने में भी सफल हो गई है कि माओवादी होना एक संगीन जुर्म है। माओवादी होने की सरकारी व्याख्या के अनुसार वे सभी माओवादी हैं जो इस लूट में सरकार की दमनात्मक कार्रवाइयों का विरोध व्यावहारिक स्तर पर भले न करें लेकिन सैद्धांतिक तौर पर करते हों और वे आदिवासी जो अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए सीधे संघर्ष में हैं उनसे किसी भी प्रकार की थोड़ी भी सहानुभूति रखते हों।

जाहिर है यह सहानुभूति रखने वाला और सैद्धांतिक बहस चलाने वाला वर्ग मध्यवर्ग है और अपनी इस परिभाषा के द्वारा सरकार ने इसी मध्यवर्ग को कसने की कोशिश की है क्योंकि सरकार नहीं चाहती कि मध्यवर्ग या शहरी बुद्धिजीवी सैद्धांतिक तौर पर ही सही लेकिन उनके समर्थन में उतरे।

तब और अब की जो यह दो स्थितियां हैं इन्हीं के बीच ‘अंधेरे में’ कविता है। किसी दीवार की तरह नहीं बल्कि पुल की तरह। एक सिरा इसका अतीत से जुड़ता है जबकि दूसरा भविष्य से। इस कविता से होकर गुजरे बिना न पिछले लगभग तीन सौ साल के संघर्ष के इतिहास की त्रासदी को समझा जा सकता है और न सत्ता द्वारा चलाए जा रहे दमनात्मक कार्रवाई को ही जो आज भी बदस्तूर जारी है। चांद का मुंह टेढ़ा है कविता संग्रह की भूमिका में अपने समय के महत्वपूर्ण कवि शमशेर बहादुर सिंह ‘अंधेरे में’ कविता के बारे में लिखते हैं, ‘‘यह कविता आधुनिक जन-इतिहास का, स्वतंत्रता-पूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है। इसमें अजब और अद्भुत रूप से व्यक्ति और जन का एकीकरण है। देश की धरती, हवा, आकाश, देश की सचमुच मुक्ति, आकांक्षी नस-नस इसमें फड़क रही है।’’ ‘स्वतंत्रता-पूर्व और पश्चात’ कहने का मतलब कि शमशेर बहादुर सिंह ने 1947 को केंद्र बिंदु माना यानी वे भी ’अंधेरे में’ या मुक्तिबोध की अन्य कविताओं में सिर्फ अतीत देख रहे थे। वे आने वाली घटना से इस कविता को न जोड़ पा रहे थे और न उस वैचारिक लड़ाई से जो आने वाले दिनों में बेहद तीक्ष्ण रूप धारण करने जा रही थी। जब मुक्तिबोध कहते है, ‘मैं आततायी-सत्ता के सम्मुख’ तो उनके ऐसा कहते ही शोषण और दमन के खिलाफ संघर्ष का वह रूप दिखाई देने लगता है जो स्वतंत्रता संग्राम से एक स्तर पर जुड़ तो जरूर रहा था लेकिन दूसरे स्तर पर वह आजादी का जो मतलब लिए हुए था वह गांधी और नेहरू से इतर था। ’अंधेरे में’ कविता में गांधी को देखकर कवि के मुख से अचानक निकल पड़ता है: ’इस तरह पंगु!!’ और तभी कवि को हतप्रभ करते मानो गांधी खुद कह उठते हैं- ‘हम हैं गुजर गए जमाने के चेहरे/आगे तू बढ़ जा।’ इस पॉलिटिक्स को समझे बिना बेहद मुश्किल है ’अंधेरे में’ कविता को समझना।

हिंदी की जो भी बड़ी प्रतिभाएं उस समय थीं उन सभी ने ‘अंधेरे में’ कविता को अपने अपने तरीके से समझने की कोशिष की लेकिन लगभग सभी ने कविता को समझने के जो बने बनाये साहित्यिक उपकरण या मापदंड जो स्वभाविक रूप से उनके पास उपलब्ध थे उन्होंने उसी का सहारा लिया चाहे वह नामवर सिंह हों या रामविलास शर्मा। किसी ने भी सैकड़ों साल से बन रहे उस वातावरण को समझने की कोशिश नहीं की जिसका इस कविता को रचने में महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने भी इस कविता को समझने के लिए खुद को बदलने की जरूरत नहीं समझी। जब आप किसी भी चीज के रचे जाने की उस पूरी परिस्थिति से अनभिज्ञ रहेंगे तो जाहिर है कि उसमें आपको रहस्यवाद दिखाई देगा जैसा कि रामविलास शर्मा को दिखाई दिया। नामवर सिंह की अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक कविता के नए प्रतिमान के परिशिष्ट में ‘अंधेरे में’ पर दो आलेख हैं। ’अंधेरे में: पुनश्च’ नामक दूसरे लेख में जिसे नामवर सिंह ने बाद में 1974 में पुस्तक के दूसरे संस्करण के वक्त जोड़ा ताकि ’अंधेरे में’ कविता को लेकर हिंदी साहित्य में जो धुंध फैली हुई है उसे साफ किया जा सके और यह काम उन्होंने बखूबी किया भी। रामविलास शर्मा की इस कविता को लेकर दी गई तमाम स्थापनाओं का जमकर और तार्किकपूर्ण तरीके से इसी लेख में उन्होंने खंडन किया है और इस कविता को लेकर डॉ. शर्मा की समझ पर चुटकी भी खूब ली है। दूसरे टिप्पणीकारों की भी उन्होंने अच्छी खबर ली है और जहां वे गलत थे ठीक वहीं उन्होंने अंगुली रखी है। लेकिन दुख की बात यह है कि वे खुद भी इस कविता की तह तक पहुंचने में बहुत सफल नहीं रहे हालांकि साहित्यिक मापदंड के सहारे जितनी अच्छी व्याख्या की जा सकती थी उन्होंने की है पर उस जमीन को परखने से चूक गए जिसकी कोख से यह कविता किसी विस्फोट की तरह प्रस्फुटित होती है।

’अंधेरे में’ कविता मुक्तिबोध की अंतिम कविता है। इसमें उनके विकास का विराट फलक सामने आता है। कविता यहां अपने अंतिम सौंदर्य के साथ मौजूद है। यह कविता एक छलांग है मुक्तिबोध के जीवन में। ’अंधेरे में’ का ’मैं’ जो है वह मुक्तिबोध की पहले की रचनाओं में आए ’मैं’ से भिन्न है। ‘अंधेरे में: पुनश्च’ में नामवर सिंह कहते हैं, ’इस मैं का निरंतर प्रयास है कि इस भिन्न वर्ग से एकात्म कर ले और इस प्रकार मुक्ति की प्राप्ति करे।’ नामवर सिंह यहां जिसे ’भिन्न वर्ग’ समझ रहे हैं ’मैं’ उससे अलग नहीं है क्योंकि वह उसी वर्ग से आता है। दरअसल यह चेतनाधर्मी वर्ग है जो बदलाव की चाहत लिए सैकड़ों साल से संघर्षरत है। ’अंधेरे में’ का ’मैं’, ’वह’ और ’अभिव्यक्ति’ इसलिए कई जगह एकाकार से होते नजर आते हैं और जहां ऐसा होता है वहां वर्ग संघर्ष की तेज ध्वनि सुनाई देने लगती है। और इनका अलग होना भी रणनीति का एक हिस्सा है। ऐसा मुक्तिबोध तभी करते हैं जब ’मैं’ पर खतरा मंडराता नजर आता है, जब उन्हें लगता है कि ’मैं’ आततायियों के गिरफ्त में आने वाला है तो मुक्तिबोध ’मैं’, ’वह’ और ’अभिव्यक्ति’ तीनों को अलग-अलग कर देते हैं ताकि उनकी पहचान छिपायी जा सके और सत्ता द्वारा चलाये जा रहे इस कठोर दमनात्मक कार्रवाई के समय उन्हें भूमिगत कर उनकी आत्मरक्षा की जा सके।

मुक्तिबोध, नागार्जुन और त्रिलोचन हिंदी के ये तीन ऐसे कवि हैं जो भले ही कई दूसरे कवियों की तरह आते थे मध्यवर्ग से लेकिन जिन्होंने खुद को वर्गच्युत कर सर्वहारा वर्ग की जमात में शामिल कर लिया था, लेकिन यहां भी एक अंतर है। नागार्जुन और त्रिलोचन जहां किसी फक्कड़ की तरह वहां थे वहीं मुक्तिबोध सर्वहारा वर्ग में एक योद्धा की तरह थे, वे उनकी ही आवाज थे कविता में। इस तरह का चौथा उदाहरण हिंदी साहित्य में हो सकता है न मिले शायद इसलिए इस तरह के वर्ग-परिवर्तन को लक्षित कर कभी सोचा नहीं गया। यहां तक कि नामवर सिंह भी नहीं सोच पाए और लगातार मध्यवर्ग को ग्लैमर प्रदान करते रहे। मुक्तिबोध जब कहते हैं- ’किसी की खोज है उनको/किसी नेतृत्व की’ तो नामवर सिंह तुरंत कह उठते हैं- ‘परंपरा से बुद्धिजीवी वर्ग के लोग ही यह नेतृत्व प्रदान करते आए हैं।’ मुक्तिबोध जब कहते हैं- ‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये लोग’ या जब वे कहते हैं- ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास’ तो नामवर सिंह जवाब देते हुए कहते हैं- ’निस्संदेह कुछ लोग ऐसे हैं जो एकदम क्रीतदास नहीं हैं’ फिर आगे कहते हैं- ’अपने वर्ग की स्वाभाविक मध्यवर्गीय कमजोरियां इनमें भी हैं किंतु इन्हें अपनी कमजोरियों का पूरा एहसास है। इनमें आत्मसमीक्षा इतनी तीव्र है कि ये वर्तमान व्यवस्था के बने रहने के लिए अपने-आपको जिम्मेदार ठहराते हैं और इस प्रकार एक गहरे अपराध-बोध से पीड़ित रहते हैं। इसलिए ये उस व्यवस्था को तोड़ने के लिए स्वयं भी टूटने को तैयार दिखते हैं।’ 

नामवर सिंह का यह जो जवाब है या जो व्याख्या है क्या सही है? अगर कोई व्यक्ति मध्यवर्ग में होने की वजह से सचमुच अपराध-बोध से ग्रस्त है तो वह खुद को मध्यवर्ग से डीक्लास कर सर्वहारा वर्ग के बीच जाने की कोशिश करेगा न कि मष्यवर्ग में रहते हुए ही टूट जाने की हद तक जाकर व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा होगा। यह कोरी भावुकतापूर्ण सोच है क्योंकि एक मध्यवर्गीय जिंदगी इतनी जगह नहीं देती। इसी लेख में आगे मजदूर की वर्गचेतना का हवाला देते हुए वे मध्यवर्ग की वर्ग-चेतना का विश्लेषण करते हुए कहते हैं ‘इसी प्रकार मध्यवर्गीय व्यक्ति की वर्गचेतना केवल इतने ही तक सीमित नहीं है कि वह अपने-आपको मध्यवर्ग का सदस्य मानकर उस वर्ग के तात्कालिक हितों के लिए संघर्ष करे; बल्कि उसकी सच्ची वर्गचेतना इस बात मे है कि वह मजदूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंततः अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके लिए पूंजीवाद के विनाश में मजदूर वर्ग का साथ दे।’ क्या यह संभव है कि कोई अपने वर्ग में रहे और उस वर्ग की चिंता भी करे और साथ ही दूसरे वर्ग से भी खुद को जोड़ ले और फिर उस वर्ग के हित में ही अपने वर्ग का हित देखने लगे। दो वर्गों के हित एक कैसे हो सकते हैं इस पर नामवर सिंह ने प्रकाश नहीं डाला है। उन्होंने यह भी कहने की जरूरत नहीं महसूस की कि जिस मध्यवर्ग को वे सर्वहारा वर्ग की तरह एक वर्ग मान रहे हैं उसका आधार क्या है जबकि पहले के कई चिंतकों, विचारकों जैसे कि बर्ट्रेंड रसेल ने ही कहा था कि मध्यवर्ग कोई वर्ग नहीं है और इस वर्ग के लोगों की तुलना रेल का इंतजार कर रहे प्लेटफॉर्म पर खड़े लोगों से की थी। मौका हाथ आते ही ये उच्चवर्ग की ओर छलांग लगाते देर नहीं करते। इनके अंदर कोई वर्ग-चेतना नहीं होती। ये अपने वर्ग से उच्चवर्ग की ओर भागने के फिराक में लगे लोग हैं। इसलिए एक बड़ा समुदाय होते हुए भी मध्यवर्ग कोई वर्ग नहीं बनाता। वह अलगाव में रहता है और आपसी स्वार्थ की टकराहट में जीता है।

नामवर सिंह मार्क्स का हवाला देते कहते हैं, ’वर्ग-चेतना के लोप से ही मजदूर वर्ग ’अलगाव’ का अनुभव करता है’ और फिर सर्वहारा वर्ग के लिए दिए गए मार्क्स की इस स्थापना को वे मध्यवर्ग पर भी लागू कर देते हैं और इतना ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग के हित से मध्यवर्ग के हित को जोड़ भी देते हैं और वह भी पहले से मौजूद बिना किसी समाज-विज्ञान के सिद्धांत के और वे खुद भी कोई सिद्धांत प्रतिपादित नहीं करते हैं। उन्हें यहां भी मार्क्स को याद करना चाहिए था। आर लैंडर को दिए अपने साक्षात्कार में मैजिनी को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में मार्क्स कहते हैं ’वह मध्य वर्ग के गणतंत्र की पुरानी धारणा का ही प्रतिनिधित्व करता है। हम मध्यवर्ग से कोई मेल मिलाप नहीं करना चाहते हैं। अब वह आधुनिक आंदोलनों से उसी तरह पिछड़ गया है जैसे जर्मनी के वे अध्यापक, जो अब भी यूरोप में भावी सांस्कृतिक लोकतंत्रवाद के मसीहा माने जाते हैं। 1948 में यह एक सच्चाई थी, जब जर्मनी का मध्यवर्ग (इंग्लैंड में प्रचलित अर्थ में) पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। लेकिन अब वे जर्मन अध्यापक पूरी तरह प्रतिक्रियावादियों के साथ हैं और सर्वहारा वर्ग उन्हें पूरी तरह भूल चुका है।’’ (देखें संकट के बावजूद़, चयन, सम्पादन एवं अनुवाद मैनेजर पाण्डेय) यह साक्षात्कार मार्क्स ने 1871 में दिया था। प्राव्दा के 3 मई 1918 के अंक में एक लेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है, ‘रूसी सर्वहारा क्रांति का पहला और अग्रणी ’आंतरिक शत्रु’ का गठन निम्न मध्यवर्ग द्वारा किया गया।’ तो यह है मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की ऐतिहासिक भूमिका और इसी मध्य वर्ग को नामवर सिंह मुक्तिबोध के कंधे ‘अंधेरे में’ शायद हिंदी की पहली कविता है जो मध्यवर्ग की कहीं से हिमायत नहीं करती बल्कि बेहद कड़े शब्दों में उसकी भर्त्सना करती है।

मध्यवर्ग के अवसरवाद और समझौतापरस्त चरित्र की शिनाख्त करती यह कविता आगे बढ़ती है और ऐसी लड़ाई में उसकी किसी भी प्रकार की सकारात्मक भूमिका को सिरे से तब तक खारिज करती है जब तक कि वह खुद को वैचारिक रूप से डीक्लास करके सर्वहारा वर्ग में शामिल न कर ले। लेकिन नामवर सिंह इस कविता में पता नहीं कैसे यह पड़ताल कर लेते हैं कि मुक्तिबोध को मध्यवर्ग में ही संभावना दिखाई पड़ती है। वे ‘अंधेरे में: पुनश्च’ लेख में लिखते हैं, ‘किंतु इन सबके बावजूद इसी वर्ग में मुक्तिबोध को संभावना के बीज दिखाई पड़ते हैं और मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व का यही वह पहलू है जो उन्हें खूंखार सिनिक, संशयवादी होने से बचा लेता है।’ विडंबनापूर्ण स्थिति तो यह है कि वे ‘मैं’ को राजनैतिक चेतना से लैस होकर गतिविधियों में उतरा देख तो लेते हैं लेकिन पता नही उसमें कौन-सा मध्यवर्गीय चरित्र ढूंढ़ लेते हैं कि तत्काल कह उठते हैं, ‘मध्यवर्ग का सबसे संवेदनशील और जाग्रत व्यक्ति’। अब उनकी इस मासूमियत पर कौन न फिदा हो। आखिर देखिए तो सही कि उन्होंने किस तरह मध्यवर्ग की महत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने की कोशिश की है जबकि मुक्तिबोध ने किसी प्रत्यक्षदर्शी गवाह की तरह विस्तार से उस जुलूस का वर्णन किया है जिसमें तमाम मध्यवर्गीय पेशे से जुड़े लोग रात के अंधेरे में अपराधियों और लुटेरों के साथ मिलीभगत किए जुलूस में शरीक हैं। फिर भी नामवर सिंह मासूम कोशिश करते नजर आते हैं और वे सिर्फ कोशिश भर ही नहीं करते बल्कि मौका ताड़ कर यह भी साथ-साथ कड़े शब्दों में चेता जाते हैं कि हिंदी कविता में मध्यवर्ग की महत्ता को नकारने का मतलब कविता में खूंखार ढंग से सिनिकल हो जाना है, संशयवादी हो जाना है।

यह स्थापना नामवर सिंह ने 1974 में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ’कविता के नए प्रतिमान’ के दूसरे संस्करण में रखी और उसके बाद की हिंदी कविता को आप सरसरी निगाह से देख जाइए। आप समझ जाएंगे कि इस स्थापना ने हिंदी कविता का कितना नुकसान किया है। मध्यवर्गीय सोच और चिताओं से त्रस्त, मध्यवर्गीय सुख और सुविधाओं को तलाशती और उनके न मिलने पर असुरक्षा, हताशा और संषय में नाक तक डूबी कविताओं की जैसे बाढ़-सी आ गई। ये लोग ही कवि भी कहलाए और जो इस उपभोक्तावादी चिंताओं से बाहर इस पूरी स्थिति को बदल डालने का हौसला लिए कविताओं में संघर्षरत थे उनकी न सिर्फ राजनैतिक चेतना बल्कि उनकी कविता को भी नकारने की शुरुआत यहीं से होती है। यहां तक कि हिंदी साहित्य में नक्सलबाड़ी धारा का जो प्रभाव था उसे भी नकारा जाने लगा। ऐसी भयानक स्थिति खड़ी हो गई कि किसी भी प्रकार की वैचारिक लड़ाई हिंदी कविता से गायब हो गई। यहां तक कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव से निकल कर जो कवि आए थे उनमें से भी कई ने इस भयानक स्थिति के दबाव में अपने स्वर बदल लिए और जिन्होंने नहीं बदले उन्होंने या तो आत्महत्या कर ली या गहरी हताशा में चले गए। देखते ही देखते हिंदी कविता का जुझारूपन खत्म हो गया और आज चालीस साल बाद इसका चेहरा लगभग भीख मांगते कटोरे या जुगाड़ में लगे किसी आदमी की तरह हो गया है।

नामवर सिंह ने एक काम जरूर अच्छा किया कि रामविलास शर्मा का जबरदस्त खंडन किया और हिंदी कविता को रहस्यवाद या अस्तित्ववाद के अंधेरे से बचा लिया लेकिन उसे मध्यवर्गीय मानसिकता के महामकड़जाल में फंसा दिया। ताज्जुब होता है कि आखिर वे आलोचकगण क्या कर रहे थे जो नामवर सिंह के साथ या कुछ बाद में आलोचना के क्षेत्र में आए थे और आगे चलकर बड़े आलोचक भी कहलाए। उन्हें ही यह काम करना था ठीक उसी तरह जैसे नामवर सिंह ने किया रामविलास शर्मा के साथ। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसे हिंदी कविता के साथ सबसे बड़ा किया गया छल ही माना जाना चाहिए। हिंदी में राजनीतिक चेतना वाली यह पहली सर्वहारा कविता है जो इतनी ताकतवर है और चालाकी देखिए इसे ही मध्यवर्ग का स्तुतिगान करने वाली किसी लचर कविता में बदल दिया।

An Appeal for restraint to all by the family and friends of Khurshid Anwar

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/25/2013 09:13:00 PM


खुर्शीद अनवर के परिजनों और दोस्तों की तरफ से एक अपील जारी करके कहा गया है कि मामले को लेकर गैरजरूरी बयान देने और टिप्पणी करने से बचा जाए. उम्मीद की जानी चाहिए कि अब शिकायतकर्ता लड़की और मामले की जांच किए जाने की मांग करने वालों पर अपमानजनक हमले बंद होंगे.

We are friends, family and well-wishers of the late Dr. Khurshid Anwar.  We have come together to keep alive the memory of his signal contribution to peace, secularism and communal harmony in the subcontinent, including his pioneering work in training thousands of volunteers to uphold these ideals over a long career as a grassroots activist.

We are deeply shocked and concerned at the trial by media and social media, which he was irresponsibly subjected to in the last few months, on a matter which had never been subjected to any kind of formal scrutiny by any responsible authority.

We seek to catalyze discussions on these aspects, via blogs, social media as well as public events and in responsible sections of the mainstream press. We strongly affirm the freedom of expression of the press as well as of individuals, but insist that such freedoms place an onus upon all to act with responsibility.

In keeping with this spirit of responsibility, we strongly discourage and dissociate ourselves from any attempts to reveal the identity of, or otherwise target the lady who has leveled serious allegations against Dr Anwar. As his family, personal friends and comrades, we do find it impossible to believe such allegations against a fiercely committed feminist such as himself, but do not presume to judge the matter ourselves.

Anybody who is indulging in any irresponsible statements about the lady in question is only doing a disservice to the memory of Khurshid Anwar.

We request all those commenting on the matter to desist from any conjectures and speculation upon the matter, and let the investigation take its course.

Ali Javed
Meenakshi Sundriyal
Ritwik Agrawal

तानाशाह खत्म होंगे और जनता सत्ता छीन लेगी: चार्ली चैपलिन की याद

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/25/2013 04:00:00 PM



महान अभिनेता और फिल्मकार चार्ली चैपलिन का निधन आज के दिन 1977 में हुआ था. एक असमानता पर टिके हुए वर्गीय समाज में विसंगतियों, त्रासदियों और मानवीय उल्लास के पलों को अपनी फिल्मों में दिखाने वाले इस कलाकार के बारे में जितना कुछ लिखा और कहा गया, और जिसे दुनिया भर की जनता का जितना प्यार मिला शायद ही किसी दूसरे फिल्मी कलाकार को वैसा प्यार मिला हो. चार्ली को याद करते हुए उनकी आत्मकथा के दो अंश, जिनमें से एक में वे अपनी फिल्म ग्रेट डिक्टेटर के दौरान अमेरिका में कम्युनिस्ट कह कर प्रताड़ित किए जाने के प्रसंग के बारे में बता रहे हैं. चार्ली को कम्युनिस्ट होने के आरोप में अमेरिका में इस तरह सताया गया कि चालीस साल इस देश में बिताने के बाद उन्हें हार कर स्विटजरलैंड में जाकर बसना पड़ा. यह प्रसंग आज भारत में लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को माओवादी कह कर उन्हें सताए जाने की याद दिलाता है. आत्मकथा के यहां दिए गए दूसरे हिस्से में वे तत्कालीन चीनी राष्ट्राध्यक्ष चाऊ एन लाई से मुलाकात और माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीनी क्रांति के बारे में अपनी राय जाहिर कर रहे हैं.

इस पोस्ट के आखिर में चार्ली का द ग्रेट डिक्टेटर के आखिर में दिया गया भाषण है, जिसमें वे साम्राज्यवादी युद्धों और वर्गीय शोषण के खिलाफ बोल रहे हैं. अमेरिका और दूसरी साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों में और भारतीय राज्य द्वारा अपने ही देश की जनता के खिलाफ विकास के नाम पर थोपे गए युद्ध के दौर में इस भाषण को फिर से पढ़ा/देखा जाना चाहिए.


अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के दौरान मैंने युनाइटेड आर्टिस्ट्स के कारोबार की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। अब मेरे वकील ने चेताया कि कम्पनी 1,000,000 डॉलर के घाटे में चल रही है। जब इसके अच्छे दिन थे तो हर वर्ष 40,000,000 से 50,000,000 डॉलर तक का लाभ कमा कर दे रही थी। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि मुझे दो से ज्यादा लाभांश मिले हों। अपनी समृद्धि के शिखर पर युनाइटेड आर्टिस्ट्स ने चार सौ अंग्रेज़ी थियेटरों में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी जुटा ली थी और इसके लिए उसे एक पाई भी नहीं चुकानी पड़ी थी। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता कि ये सब हमने कैसे हासिल किया था। मुझे ऐसा लगता है कि ये हमें हमारी फिल्मों के निर्माण की गारंटी देने के बदले दिये गये थे। दूसरी अमेरिकी फिल्म कम्पनियों को इसी तरह से ब्रिटिश सिनेमा में बहुत बड़ी राशि के स्टॉक लेने पड़े थे। एक ऐसा वक्त भी आया था कि रैंक संगठन में हमारी इक्विटी का हिस्सा 10,000,000 डॉलर के बराबर था।

लेकिन एक-एक करके युनाइटेड आर्टिस्ट्स के शेयरधारकों ने अपने शेयर कम्पनी को वापिस बेच दिये थे और इनकी चुकौती करने में कम्पनी की हालत पतली हो गयी थी। अचानक मैंने पाया कि मैं युनाइटेड आर्टिस्ट्स की कम्पनी का आधा मालिक हूं और ये कम्पनी 1,000,000 डालर के घाटे में चल रही थी। मैरी पिकफोर्ड मेरी पार्टनर थी। उसने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हुए चेतावनी भरा पत्र लिखा कि सभी बैंकों ने और कर्जे देने से मना कर दिया है। मुझे इस बात की ज्यादा चिंता नहीं थी क्योंकि हम इससे पहले भी कर्जे में आ चुके थे और सफल फिल्मों ने हमें हमेशा इन संकटों से बाहर निकाल लिया था। इसके अलावा, मैंने अभी अभी मोन्स्योर वेरडाउ पूरी की थी और मैं ये मान कर चल रहा था कि ये बॉक्स ऑफिस पर खूब सफल रहेगी। मेरे प्रतिनिधि आर्थर कैल्ली ने कम से कम 12,000,000 डॉलर की कमाई का अनुमान लगाया था और अगर ये सच हो जाता तो ये हमारी कम्पनी के कर्जे तो उतारेगी ही, 11,000,000 डॉलर का मुनाफा भी दे जायेगी।

हॉलीवुड में मैंने अपने दोस्तों के लिए एक निजी शो की व्यवस्था करायी थी। अंत में, थॉमस मान, लायन फ्यूशवेंगर और कई दूसरी विभूतियां खड़ी हो गयीं और एक मिनट से भी ज्यादा तक तालियां बजाती रहीं।

पूरे विश्वास के साथ मैंने न्यू यार्क में कदम रखा। लेकिन मेरे वहां पहुंचते ही डेली न्यूज़ ने मुझ पर हमला कर दिया:

चैप्लिन अपनी नयी फिल्म के प्रदर्शन के लिए शहर में हैं। 'मेरे सहयात्रियो•' के रूप में उनके सम्बोधन के बाद मैं उन्हें न्यौता देता हूं कि वे प्रेस में अपना चेहरा दिखायें क्योंकि मैं वहां पर उनसे एक या दो परेशान करने वाले सवाल पूछूंगा।

युनाइटेड आर्टिस्ट्स के प्रचार स्टाफ ने इस बात पर देर तक विचार विमर्श किया कि क्या मेरे लिए अमेरिकी प्रेस से मिलना ठीक रहेगा। मैं परेशान था क्योंकि उस दिन सुबह ही मैं विदेशी प्रेस से मिल चुका था और उन्होंने बहुत गर्मजोशी और उत्साह के साथ मेरा स्वागत किया था। इसके अलावा मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो गीदड़ भभकियों से डर जायें।

अगली सुबह हमने होटल में एक बड़ा-सा कमरा आरक्षित कराया और मैं अमेरिकी प्रेस से मिला। जब कॉकटेल सर्व कर दिये गये तो मैं हाज़िर हुआ, लेकिन मैंने ताड़ लिया कि दाल में कुछ काला है। मैं एक छोटी सी मेज के पीछे से एक छोटे से मंच से बोला। मैं अपनी आवाज़ में जितनी मिश्री घोल सकता था, घोली और बोला,'आप लोग कैसे हैं, देवियो और सज्जनो, मैं यहां पर इसलिए हाज़िर हुआ हूं ताकि मैं अपनी फिल्म के बारे में और अपनी भावी योजनाओं के बारे में जो भी तथ्य आप जानना चाहें, उनके बारे में बता सकूं।'

वे लोग चुप रहे। 'सब एक साथ मत बोलिये,' मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

आखिरकार पहली पंक्ति के पास बैठी एक महिला पत्रकार ने श्रीगणेश किया,'क्या आप कम्युनिस्ट हैं?'

'नहीं,' मैंने दृढ़ता से जवाब दिया,'अगला सवाल प्लीज़।'

इसके बाद भुनभुनाने की एक आवाज़ आने लगी। मुझे लगा कि डेली न्यूज़ वाले वे वही मेरे शुभचिंतक होंगे, लेकिन उनकी गैर हाज़री साफ तौर पर महसूस की जा सकती थी। लेकिन जो वक्ता खड़े हुए वे अपना ओवरकोट पहने हुए मैले कुचैले से लगने वाले निरीह प्राणी थे और वे अपने उन कागज़ों पर झुके हुए थे जिनमें से वे पढ़ रहे थे।

'माफ कीजिये,' मैंने कहा,'आपको फिर से पढ़ना पढ़ेगा, आप जो भी कह रहे हैं, मैं उसका एक भी शब्द समझ नहीं पा रहा हूं।'

उन्होंने शुरू किया, 'हम, कैथोलिक युद्ध के...'

मैंने टोका,'मैं यहां पर किसी  कैथोलिक युद्ध के वरिष्ठ भुक्तभोगियों के सवालों का जवाब देने के लिए नहीं आया हूं। ये बैठक प्रेस के लिए है।'

'आप अमेरिका के नागरिक क्यों नहीं बने हैं?' एक और आवाज़।

'मुझे अपनी राष्ट्रीयता बदलने की कोई वज़ह नज़र नहीं आती। मैं अपने आपको विश्व का नागरिक समझता हूं।' मैंने जवाब दिया।

थोड़ी देर के लिए हंगामा मच गया। दो या तीन एक साथ बोलना चाहते थे। अलबत्ता, एक आवाज़ दूसरी आवाज़ों पर हावी हो गयी,'लेकिन आप अपनी रोज़ी रोटी तो अमेरिका से कमाते हैं!'

'अच्छी बात है,' मैंने मुस्कुराते हुए कहा, 'अगर आप इसे आर्थिक रूप से तौलना चाहते हैं तो मैं आपके सामने सारे आंकड़े गिनवा देता हूं। मेरा कारोबार अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप का है और मेरी कमाई का सत्तर प्रतिशत विदेशों से आता है। और मज़े की बात, उस पर सत्तर प्रतिशत कर का लाभ अमेरिका को मिलता है। अब आप ही देख लीजिये, मैं आपका कितना अच्छा पेइंग गेस्ट हूं!'

कैथोलिक लीज़न के पक्षधर ने एक बार फिर अपना सिर उठाया,'आप अपना धन यहां पर कमाते हैं या नहीं, हम लोग, जिन्होंने फ्रांस के तटों पर अपने सैनिक उतारे हैं, इस बात पर आपसे खफा हैं कि आप इस देश के नागरिक नहीं हैं।'

'आप ही अकेले ऐसे सज्जन नहीं हैं जिनके सगे फ्रांस के तटों पर उतरे हैं,' मैंने बताया, 'मेरे दो बेटे भी पैटन की सेना में हैं और एकदम मोर्चे पर हैं और वे न तो आपकी तरह तथ्यों को भुना रहे हैं और न ही उनका फायदा ही उठा रहे हैं।'

'क्या आप हैंस आइस्लर को जानते हैं?' एक अन्य रिपोर्टर।

'हां, वे मेरे बहुत प्यारे दोस्त हैं और वे बहुत अच्छे संगीतकार हैं।'

'क्या आपको पता है कि वे कम्युनिस्ट हैं?'

'मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि वे क्या हैं, मेरी दोस्ती राजनीति पर आधारित नहीं है।'

'फिर भी ऐसा लगता है कि आप कम्युनिस्टों को पसंद करते हैं?' एक अन्य रिपोर्टर।

`किसी को भी ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि मुझे क्या पसंद करना चाहिये और क्या नहीं। हम अभी तक उस तरह के संबंधों तक नहीं पहुंचे हैं।'

तभी उसी उत्तेजना के बीच में से एक आवाज़ उभरी, 'कैसा लगता है ऐसा कलाकार होना जिसने छोटे लोगों की खुशियों और समझ के साथ पूरी दुनिया को इतना समृद्ध किया हो और अमेरिकी प्रेस के तथाकथित प्रतिनिधियों की नफ़रत और फटकार का पात्र बनाया जाना और मज़ाक का पात्र बनना?'

मैं सहानुभूति के दो बोल सुनने के लिए इतना तरस गया था कि मैं अचानक टोक बैठा, 'माफ कीजिये, मैं आपकी बात नहीं समझ पाया। क्या आप अपना सवाल दोहरायेंगे?'

मेरे प्रचार प्रबंधक ने मुझे टहोका मारा और फुसफुसाया, 'ये आदमी तो आपके पक्ष में ही बात कर रहा है। उसने बहुत ही उम्दा ही बात की है।' ये अमेरिकी उपन्यासकार और कवि जिम एगी थे जो उस समय टाइम्स मैगजीन के लिए विशेष फीचर लेखक और समीक्षक के रूप में काम कर रहे थे।

'माफ कीजिये,' मैंने कहा, 'मैं आपकी बात सुन नहीं पाया, क्या आप अपनी बात दोहरायेंगे?'

'मुझे नहीं पता कि मैं ऐसा कर पाऊंगा या नहीं,' कहा उन्होंने। वे थोड़ा परेशान हो गये थे, फिर भी उन्होंने लगभग वही शब्द दोहरा दिये।

मुझे कोई जवाब ही नहीं सूझा। इसलिए मैंने अपना सिर हिलाया और कहा, 'कोई टिप्पणी नहीं, लेकिन आपका आभार!'

इसके बाद तो मैं उखड़ ही गया। उनके भले लगने वाले शब्दों ने मुझसे और लड़ने की ताकत ही छीन ली थी। 'मुझे खेद है देवियो और सज्जनो,' मैंने कहा,'मैं तो ये मान कर चल रहा था कि ये प्रेस सम्मेलन मेरी फिल्म के बारे में साक्षात्कार है, इसके बजाये, ये तो राजनैतिक उठा पटक में बदल गया है। इसलिए मुझे और कुछ नहीं कहना है।'

साक्षात्कार के बाद मैं भीतर ही भीतर बीमार हो गया था, क्योंकि मैं जानता था कि मेरे खिलाफ एक मज़बूत उग्र मोर्चा खोल दिया गया है।

इसके बावज़ूद मैं इस पर यकीन नहीं कर सका। मुझे द ग्रेट डिक्टेटर पर बधाई देते हुए बहुत ही शानदार पत्र मिले थे और उससे जो कमाई हुई थी, वह पहले की सारी फिल्मों की कमाई पार कर गयी थी और फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले मुझे बहुत सारे प्रतिकूल प्रचार का सामना करना पड़ा था। मुझे मोन्स्योर वेरडाउ की सफलता पर पूरा भरोसा था और युनाइटेड आर्टिस्ट्स के स्टाफ की भी यही राय थी।

मैरी पिकफोर्ड ने फोन करके बताया कि वह ऊना और मेरे साथ प्रीमियर में आना चाहेगी, इसलिए मैंने उन्हें हमारे साथ '21' पर खाना खाने के लिए आमंत्रित किया। मैरी डिनर पर बहुत देर से पहुंची थीं। उन्होंने बताया कि उन्हें एक कॉकटेल पार्टी की वजह से देरी हो गयी। वहां से निकलने में उन्हें बहुत मुश्किल हो रही थी।

जिस वक्त हम थियेटर में पहुंचे तो बाहर अपार  भीड़ जुट चुकी थी। जिस वक्त हम लॉबी में से रास्ता बना कर निकल रहे थे, हमने देखा कि एक आदमी रेडियो पर प्रसारण कर रहा है: 'और अब चार्ली चैप्लिन और उनकी पत्नी आ पहुंचे हैं। आहा, और उनके साथ उनके मेहमान के रूप में हैं मूक फिल्मों के दिनों की शानदार अभिनेत्री जो अभी भी पूरे अमेरिका की हर दिल अजीज हैं। ये हैं मिस मैरी पिकफोर्ड। मैरी, क्या आप इस शानदार प्रीमियर के बारे में कुछ नहीं कहेंगी?'

लॉबी ठसाठस भरी हुई थी। मैरी किसी तरह से भीड़ में से रास्ता बनाते हुए माइक्रोफोन तक पहुंचीं। वे अभी भी मेरा हाथ थामे हुए थीं।

'और अब, देवियो और सज्जनो, पेश हैं मैरी पिकफोर्ड!'

खींचे जाने और धकेले जाने के बीच मैरी ने कहा, 'दो हज़ार साल पहले यीशु का जन्म हुआ था और आज की रात...' वे आगे कुछ नहीं कह पायीं। चूंकि वे अभी भी मेरा हाथ थामे हुए थीं, उन्हें भीड़ के एक धक्के ने माइक से परे धकेल दिया। मैं अक्सर इस बात पर हैरान होता हूं कि वे आगे क्या कहने वाली थीं।

उस रात थियेटर का माहौल असहज करने वाला था। एक भावना काम कर रही थी कि दर्शक कुछ सिद्ध करने के लिए आये हैं। जिस पल फिल्म शुरू हुई, बेचैन प्रत्याशा और अतीत के सुखद अहसास, जिनके साथ मेरी फिल्मों का स्वागत हुआ करता था, उनकी जगह पर बीच बीच में कुछेक सिसकारियों के बीच बिखरे बिखरे, नर्वस हंसी के पल थे। मुझे ये स्वीकार करना ही होगा कि सिसकारी भरी ये प्रतिक्रियाएं प्रेस की सारी नाराज़गी से भी ज्यादा तकलीफ दे रही थीं।

जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गयी, मेरी चिंता बढ़ती गयी। हँसी के पल थे लेकिन ये बिखरे हुए थे। ये पुराने वक्त के, द गोल्ड रश के, या सिटी लाइट्स के या शोल्डर आर्म्स के ठहाके नहीं थे। ये थियेटर में चल रही सिसकारियों के खिलाफ चुनौतीपूर्ण हँसी थी। मेरा दिल डूबने लगा। मैं अपनी सीट में और देर तक नहीं बैठ पाया। मैंने ऊना से फुसफुसाया, 'मैं बाहर लॉबी में जा रहा हूं। अब और सहन नहीं होता मुझसे।' उसने मेरा हाथ दबाया। मेरे हाथ में मुचड़ा हुआ कार्यक्रम पत्रक था, इसे मैं इतना ज्यादा तोड़ मरोड़ चुका था कि ये मेरी हथेलियों को पसीने से गीला करने लगा। इसलिए मैंने उसे अपनी सीट के नीचे फेंक दिया। मैं दबे पांव बीच वाले रास्ते पर आया और लॉबी की तरफ निकल गया। मैं ठहाके सुनने और उनके बीच में से उठ कर परे चले आने के बीच बंट गया था। तब मैं हौले हौले चलता हुआ बीच वाली मंज़िल तक यह देखने के लिए आया कि वहां पर क्या चल रहा है। एक आदमी बाकी और लोगों की तुलना में सबसे ज्यादा हँस रहा था। निश्चित तौर पर मेरा कोई दोस्त रहा होगा। लेकिन ये विकृत और नर्वस हँसी थी मानो वह कुछ सिद्ध करना चाहता हो। बाल्कनी में भी यही हाल चल रहा था।

दो घंटे तक मैं लॉबी में, गली में और थियेटर के आस पास चहलकदमी करता रहा और फिर वापिस थियेटर में फिल्म देखने आ जाता। ये सब बीच बीच में चलता रहा। आखिर फिल्म खत्म हुई। अर्ल विल्सन, स्तम्भकार, जो बहुत ही प्यारा आदमी था, मुझसे लॉबी में मिलने वाले लोगों में सबसे पहला था। 'मुझे ये बहुत अच्छी लगी।' उसने 'मुझे' पर बहुत ज़ोर दिया। तब मेरे प्रतिनिधि आर्थर केली बाहर आये। 'बेशक, ये एक करोड़ बीस लाख का धंधा तो नहीं ही करने जा रही है।' उसने कहा।

'मैं आधे पर ही समझौता कर लूंगा,' मैंने मज़ाक में कहा।

इसके बाद हमने लगभग एक सौ पचास लोगों को खाने की दावत दी। उनमें से कुछ पुराने दोस्त थे। उस शाम वहां पर तरह तरह की बातें हुईं और शैम्पेन सर्व किये जाने के बावजूद मामला हताश करने वाला था। ऊना जल्दी ही वहां से चली गयी लेकिन मैं आधा घंटा और रुका रहा।

हरबर्ट बेयार्ड स्वोपे, जिन्हें मैं पसंद करता था और समझदार समझता था, फिल्म के बारे में मेरे दोस्त डॉन स्टीवर्ट से बहस कर रहे थे। स्वोपे को ये पसंद नहीं आयी थी। उस रात कुछ ही लोगों ने मुझे बधाई दी। डॉन स्टीवर्ट, जो मेरी तरह खुद भी थोड़े नशे में थे, बोले, 'चार्ली, आस पास बहुत से हरामी मौजूद हैं जो आपकी फिल्म पर राजनीति की रोटियां सेंकना चाहते हैं। लेकिन फिल्म बहुत ऊंची चीज़ बनी है और दर्शक इसे पसंद करेंगे।'

इस समय तक मैं इस बात की परवाह नहीं कर रहा था कि कौन क्या कह रहा है। अब मुझमें विरोध करने की ताकत नहीं बची थी। डॉन मुझे होटल तक छोड़ने आये। जब हम पहुंचे तो ऊना पहले ही सो चुकी थी।

'कौन सी मंज़िल है?' डॉन ने पूछा।

'सत्रहवीं'

'हे भगवान, आपको पता है कि ये कौन सा कमरा है? ये वही कमरा है जिसमें वो लड़का लेज पर निकल आया था और कूद कर जान देने से पहले वहां पर बारह घंटे तक खड़ा रहा था।'

उस शाम का इससे बेहतर क्लाइमेक्स और क्या हो सकता था। अलबत्ता, मैं ये मानता हूं कि मैंने अब तक जितनी भी फिल्में बनायी हैं, उनमें से मोन्स्योर वेरडाउ सबसे ज्यादा चतुराई और समझदारी से बनायी गयी फिल्म है।

मेरी हैरानी की सीमा न रही जब मोन्स्योर वेरडाउ न्यू यार्क में छ: सप्ताह तक चलती रही और उसने बहुत अच्छा कारोबार किया। लेकिन ये अचानक ही मंदी पड़ गयी। जब मैंने युनाइटेड आर्टिस्ट्स के ग्रैड सीअर्स से इस बारे में पूछा तो उसने बताया, 'आप जो भी फिल्म बनाते हैं, वह पहले तीन या चार हफ्ते तक तो बहुत अच्छा कारोबार करती है। कारण ये है कि आपके बहुत सारे पुराने प्रशंसक हैं। लेकिन उनके बाद आती है आम जनता। और सच कहें तो प्रेस आपके पीछे कम से कम दस बरस से लट्ठ ले कर पड़ी हुई है और उस लट्ठबाजी की कुछ तो असर होना ही था। यही वजह है कि कारोबार में मंदी आ गयी है।'

'लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि लोगों में हास्य बोध है।' मैंने पूछा।

'यहां देखिये,' उसने मुझे डेली न्यूज और हर्स्ट के अखबार दिखाये, और ये  अखबार सारे देश में जाते हैं।'

एक अखबार में एक चित्र दिखाया गया था जिसमें मोन्स्योर वेरडाउ दिखाने वाले एक थियेटर के बाहर न्यू जर्सी कैथोलिक लीज़न के लोग हाथ में प्लेकार्ड ले कर धरना दे रहे थे। उन लोगों के हाथों में जो बोर्ड थे, उन पर लिखा था,

'चार्ली कॉमरेड है'
'देशद्रोही को देश से बाहर निकालो'
'चैप्लिन बहुत दिन तक मेहमान बन कर रह लिया'
'चैप्लिन, कृतघ्न और कम्यूनिस्टों से सहानुभूति रखने वाला'
'चैप्लिन को रूस भेजो'

जब किसी व्यक्ति पर निराशा और तकलीफ की दुनिया टूट पड़ती है तो अगर वह हताशा की तरफ नहीं मुड़ता तो दर्शन और हास्य की तरफ मुड़ जाता है। और जब ग्रैड ने मुझे धरना देने वालों की तस्वीर दिखायी, तो उस वक्त थियेटर के बाहर एक भी दर्शक नहीं था। मैंने मज़ाक में कहा, 'स्पष्ट ही ये तस्वीर सुबह पांच बजे ली गयी होगी।' अलबत्ता, जहां कहीं भी मोन्स्योर वेरडाउ बिना बाधा के दिखायी  गयी, इसने सामान्य की तुलना में बेहतर ही कारोबार किया।

पिक्चर को देश के सभी बड़े सर्किटों में बुक किया गया था। लेकिन अमेरिकी ल़ाजन की तरफ से और दूसरे समूहों की तरफ से धमकी भरे पत्र मिलने पर उन्होंने शो दिखाने बंद कर दिये। लीज़न ने धमकाने का प्रभावशाली तरीका अपनाया था कि अगर वे कोई चैप्लिन फिल्म दिखा रहे होते या कोई ऐसी फिल्में दिखा रहे होते जिसे वे अनुमोदित नहीं करते थे तो वे वितरकों को पूरे एक बरस तक थियेटर का बहिष्कार करने की धमकी देते थे। डेनवर में पहली रात फिल्म ने बहुत अच्छा कारोबार किया लेकिन इस तरह के धमकी भरे व्यवहार के कारण उसे उतार दिया गया।

न्यू यार्क की ये वाली हमारी यात्रा अब तक की यात्राओं की तुलना में सबसे ज्यादा नाखुश करने वाली थी। रोज़ाना हमें फिल्म के रद्द किये जाने की खबरें मिलतीं। इसके अलावा, मुझे ग्रेट डिक्टेटर को ले कर चोरी के इल्ज़ाम में फंसा दिया गया था और प्रेस और जनता की भीषण नफ़रत और विरोध के चरम बिन्दु पर पहुंचने पर और जब कि सीनेट में चार सीनेटर हाथ धो कर मेरे पीछे पड़ गये थे, मेरी इस इच्छा के विरुद्ध कि इस मामले को थोड़ा स्थगित कर दिया जाये, मामले को जूरी के सामने ले जाया गया।

आगे बढ़ने से पहले मैं ये कह कर कुछ बातें साफ कर लेना चाहता हूं कि मैंने हमेशा अकेले के बलबूते पर अपनी पटकथाएं खुद ही सोची और लिखी हैं। मामला अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि न्यायाधीश ने यह घोषणा कर दी कि उनके पिता मर रहे हैं और कि हम समझौता कर लें ताकि वह मामला निपटा सकें और अपने पिता के पास जा सकें। दूसरे पक्ष ने इसमें तकनीकी फायदा देखा और समझौते के प्रस्ताव को लपक कर स्वीकार कर लिया। अगर सामान्य परिस्थितियां होतीं तो मैंने मामले को आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया होता, लेकिन एक तो मैं उस वक्त अमेरिका में अलोकप्रियता के शिखर पर था और इस तरह के न्यायालय के दबाव में आ गया था, मैं डरा हुआ था कि आगे न जाने क्या हो जाये, हमने समझौता कर लिया।

12,000,000 डॉलर कमाने की सारी उम्मीदें धूल में मिल चुकी थीं। अब तो उसकी कीमत वसूल करने के भी लाले पड़े हुए थे। एक बार फिर युनाइटेड आर्टिस्ट्स गहरे संकट में पड़ गयी थी। किफायत करने की दृष्टि से मैरी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मैं अपने प्रतिनिधि आर्थर कैल्ली की छुट्टी कर दूं और जब मैंने उसे याद दिलाया कि मैं भी कम्पनी का आधा मालिक हूं तो मोहतरमा नाराज़ हो गयीं।

'अगर मेरा प्रतिनिधि जाता है, मैरी, तो आपका प्रतिनिधि भी ज़रूर जायेगा।' मैंने कह दिया। इससे अवरोध पैदा हो गया और मुझे मज़बूरन कहना पड़ा,'अब हम दोनों में से ही एक कम्पनी खरीदे और दूसरा बेचे। अपनी कीमत बोलिये।' लेकिन मैरी कोई कीमत लगाने के लिए तैयार नहीं थीं और न ही मैं कीमत लगाने में पहल कर रहा था।

आखिर, ईस्टर्न सर्किट ऑफ थियेटर्स का प्रतिनिधित्व करने वाली वकीलों की एक फर्म हमारी संकट मोचक बन कर सामने आयी। वे कम्पनी पर नियंत्रण चाहते थे और 12,000,000 डॉलर देने के लिए तैयार थे। 7,000,000 डॉलर नकद और 5,000,000 डॉलर शेयरों के रूप में। ये बहुत ही अच्छा सौदा था।

'देखो,' मैंने मैरी से कहा,'आप मुझे अभी नकद 5,000,000 डॉलर दे दीजिये और बाकी आप रख सकती हैं।' वे इस बात से सहमत हो गयीं और कम्पनी को भी इसमें एतराज़ नहीं था।

कई हफ्तों तक सौदेबाजी करने के बाद इस आशय के दस्तावेज तैयार कर लिये गये। आखिरकार मेरा वकील मेरे पास आया और बोला, 'चार्ली, अगले दस मिनट बाद आपकी हैसियत पचास लाख डॉलर की हो जायेगी।'

लेकिन दस मिनट बाद उसने फोन किया, 'चार्ली, सौदा खटाई में पड़ गया है। मैरी ने पैन अपने हाथ में ले लिया था और हस्ताक्षर करने ही वाली थीं कि अचानक बोलीं,'नहीं, चार्ली को पचास लाख डॉलर अभी ही क्यों मिलें और मुझे दो बरस तक इंतज़ार करना पड़े!' हमने तर्क दिया कि उन्हें सत्तर लाख डॉलर मिल रहे हैं, आपकी तुलना में बीस लाख डॉलर ज्यादा। लेकिन उन्होंने ये बहाना बना दिया कि उससे उनकी आय पर टैक्स को ले कर समस्या हो जायेगी। ये हमारे लिए सुनहरी मौका था। बाद में हमें कम्पनी को बहुत कम कीमत पर बेचने पर मज़बूर होना पड़ा।

हम कैलिफोर्निया लौट आये और मैं मोन्स्योर वेरडाउ के पचड़े से पूरी तरह से मुक्त हो चुका था इसलिए मैं एक बार फिर आइडिया सोचने के लिए तैयार होने लगा। इसकी वज़ह ये थी कि मैं आशावादी था और मुझे अभी भी इस बात का यकीन नहीं था कि मैं अमेरिकी जनता का प्यार पूरी तरह से खो चुका हूं, कि वे राजनैतिक रूप से इतने सजग हो सकते हैं कि या हास्य से इतने हीन हो सकते हैं कि किसी भी ऐसे व्यक्ति का बहिष्कार कर दें जो उन्हें हँसाता रहा है। मेरे पास एक आइडिया था और इसके दबाव के तले मैं इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कर रहा था कि नतीजा क्या होगा। फिल्म बननी ही बननी थी।

दुनिया चाहे जितने भी आधुनिक बाने धारण कर ले, उसे प्रेम कहानी हमेशा अच्छी लगती है। जैसा कि हैज़लिट ने कहा है, संवेदना में मेधा की तुलना में ज्यादा अपील होती है और कि ये कला के कार्य में कहीं बड़ा योगदान करती है। इस बार मेरा आइडिया एक प्रेम कहानी का था। इसके अलावा, ये मोन्स्योर वेरडाउ की पागलपन भरी निराशा की तुलना में दूसरी तरह की फिल्म होती। लेकिन महत्त्वपूर्ण बात ये थी कि इसका आइडिया मुझे उत्तेजित किये हुए था।

लाइमलाइट को तैयार करने में अट्ठारह महीने का समय लगा। इसके लिए बारह मिनट के बैले संगीत की रचना की जानी थी। ये काम हिमालय में से गंगा निकालने जैसा मुश्किल सिद्ध हुआ क्योंकि मुझे बैले की भाव भंगिमाओं की कल्पना करनी थी। अतीत में तो ये होता था कि जब फिल्म पूरी हो जाती थी तभी मैं संगीत रचना किया करता था और ऐसी हालत में मैं एक्शन देख सकता था। इसके बावज़ूद, मैंने नृत्य की मुद्राओं की कल्पना करते हुए सारे संगीत की रचना की। लेकिन जब संगीत पूरा हो गया तो मैं हैरान परेशान था कि ये बैले के लिए माफिक बैठेगा या नहीं क्योंकि नृत्य की कोरियोग्राफी तो नर्तकों द्वारा खुद ही सोची और पेश की जायेगी।

आंद्रे एग्लेवस्की का बहुत बड़ा प्रशंसक होने के नाते मैंने सोचा कि उन्हें बैले में लिया जाये। वे न्यू यार्क में थे इसलिए मैंने उन्हें फोन किया और उनसे पूछा कि क्या वे अलग ही संगीत रचना पर 'ब्लूबर्ड' नृत्य करना चाहेंगे। मैंने उनसे ये भी कहा कि वे अपने साथ नृत्य करने के लिए किसी बैलेरिना का नाम भी सुझायें।

ब्लूबर्ड नृत्य ट्राइकोवस्की के संगीत पर आधारित है और पैंतालीस सेकेंड तक चलता है। इसलिए मैंने कमोबेश इतनी ही अवधि के लिए संगीत रचना तैयार की थी।

हम पिछले कई महीने से पचास कलाकारों वाले आर्केस्ट्रा के साथ बारह मिनट का बैले संगीत बनाने की दिशा में काम कर रहे थे इसलिए मैं आंद्रे साहब की प्रतिक्रिया जानने को बेचैन था। आखिरकार, बैलेरिना मेलिसा हेडन और आंद्रे एग्लेवस्की ये संगीत रचना सुनने के लिए विमान से हॉलीवुड आये। जिस वक्त वे इसे सुनने के लिए बैठे तो मैं बहुत ज्यादा नर्वस था और आत्म सजग था। लेकिन भगवान का शुक्र है, दोनों ने इसे अनुमोदित कर दिया और बताया कि ये बैले के अनुरूप है। मेरे फिल्म कैरियर के पलों में से ये सबसे ज्यादा रोमांचक पल थे - उन्हें इस धुन पर नृत्य करते देखना। उन्होंने इसमें जो अर्थ भरे, वे आह्लाद से भर देने वाले थे और इसने संगीत को एक महाकाव्यात्मक महत्ता प्रदान की।

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कोरियाई संकट के दौरान जब पूरी दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर सांस रोके खड़ी थी, चीनी दूतावास ने फोन करके पूछा कि क्या मैं जिनेवा में चाउ एन लाइ के सामने सिटी लाइट्स के प्रदर्शन की अनुमति दूंगा? चाउ एन लाइ यह निर्णय लेने वालों की धुरी में थे कि युद्ध होगा या शांति स्थापित की जायेगी।

अगले दिन प्रधानमंत्री ने जिनेवा में हमें अपने साथ खाना खाने के लिए आमंत्रित किया। हम जिनेवा के लिए चलने वाले ही थे कि प्रधानमंत्री के सचिव ने फोन करके बताया कि महामहिम को सम्मेलन में देर हो सकती है और कि हम उनके लिए इंतज़ार न करें। वे बाद में आकर लंच में शामिल हो जायेंगे।

जब हम वहां पहुंचे तो हमारी हैरानी की सीमा न रही जब हमने चाउ एन लाइ को हमारे स्वागत में अपने घर की सीढ़ियों पर इंतज़ार करते हुए देखा। पूरी दुनिया की तरह मैं भी यह जानने के लिए बेचैन था कि सम्मेलन में क्या हुआ। इसलिए मैं उनसे पूछ बैठा। उन्होंने विश्वास के साथ मेरा कंधा थपथपाया, 'सब कुछ अच्छी तरह से तय हो गया है।' कहा उन्होंने, 'बस पांच मिनट पहले।'

मैंने इस बारे में कई रोचक किस्से सुने थे कि किस तरह से कम्यूनिस्टों को तीसरे दशक में भीतरी चीन में काफी अंदर तक धकेल दिया गया था और किस तरह से माओ त्से तुंग के नेतृत्व में बिखरे हुए कम्युनिस्ट एक साथ जुटे थे और जैसे जैसे वे पीकिंग की तरफ बढ़ते गए, कारवां बढ़ता गया। उन्होंने साठ करोड़ चीनी जनता का विश्वास वापिस जीता।

चाउ एन लाइ ने उस रात हमें माओ त्से तुंग की पीकिंग में जीत की मर्मस्पर्शी कहानी सुनायी। वहां पर दस लाख चीनी लोग उनके स्वागत में खड़े थे। एक बहुत बड़े मैदान के एक सिरे पर पंद्रह फुट ऊंचा एक बड़ा सा प्लेटफार्म बनाया गया था। जब वे पीछे से सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आये तो सबसे पहले उनका सिर नज़र आया। लाखों लोगों ने पूरे गले से चिल्ला कर उनका स्वागत किया और जैसे जैसे वे पूरे नज़र आते गये, ये शोर बढ़ता ही गया। जब चीन के विजेता माओ त्से तुंग ने विशाल जन समूह देखा तो एक पल के लिए खड़े रह गये तब उन्होंने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढका और फूट फूट कर रोये।

चाउ एन लाइ ने चीन की प्रसिद्ध मार्च के दौरान उनके साथ कठिनाइयों और दिल तोड़ने वाली कई घटनाओं में सांझेदारी की और जब मैं उनके मेहनती खूबसूरत चेहरे की तरफ देख रहा था तो हैरान हो रहा था कि वे कितने शांत और ऊर्जावान दिखते होंगे।

मैंने उन्हें बताया कि पिछली बार मैं 1936 में शंघाई गया था।

'ओह, हां।' उन्होंने सोचते हुए कहा,'ये हमारे कूच पर निकलने से पहले की बात है।'

'हां, अब तो आपको इतनी दूर नहीं जाना,' मैंने मज़ाक में कहा।

डिनर के समय हमने चीनी शैंपेन पी (खास बुरी नहीं थी) और रूसी लोगों की तरह कई बार जाम टकराये। मैंने चीन के भविष्य के लिए जाम उठाया और कहा कि हालांकि मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं, मैं चीनी जनता और सब लोगों के लिए बेहतर ज़िंदगी के लिए उनकी आशाओं और इच्छाओं में पूरे दिल से उनके साथ हूं।

द ग्रेट डिक्टेटर के अंत में चार्ली का भाषण


मुझे खेद है लेकिन मैं शासक नहीं बनना चाहता. ये मेरा काम नहीं है. किसी पर भी राज करना या किसी को भी जीतना नहीं चाहता. मैं तो किसी की मदद करना चाहूंगा- अगर हो सके तो- यहूदियों की, गैर यहूदियों की- काले लोगों की- गोरे लोगों की.

हम सब लोग एक दूसरे लोगों की मदद करना चाहते हैं. मानव होते ही ऎसे हैं. हम एक दूसरे की खुशी के साथ जीना चाहते हैं- एक दूसरे की तकलीफों के साथ नहीं. हम एक दूसरे से नफ़रत और घृणा नहीं करना चाहते. इस संसार में सभी के लिये स्थान है और हमारी यह समृद्ध धरती सभी के लिये अन्न-जल जुटा सकती है.

“जीवन का रास्ता मुक्त और सुन्दर हो सकता है, लेकिन हम रास्ता भटक गये हैं. लालच ने आदमी की आत्मा को विषाक्त कर दिया है- दुनिया में नफ़रत की दीवारें खडी कर दी हैं- लालच ने हमे ज़हालत में, खून खराबे के फंदे में फसा दिया है. हमने गति का विकास कर लिया लेकिन अपने आपको गति में ही बंद कर दिया है. हमने मशीने बनायी, मशीनों ने हमे बहुत कुछ दिया लेकिन हमारी माँगें और बढ़ती चली गयीं. हमारे ज्ञान ने हमें सनकी बना छोडा है; हमारी चतुराई ने हमे कठोर और बेरहम बना दिया. हम बहुत ज्यादा सोचते हैं और बहुत कम महसूस करते हैं. हमे बहुत अधिक मशीनरी की तुलना में मानवीयता की ज्यादा जरूरत है, इन गुणों के बिना जीवन हिंसक हो जायेगा.

“हवाई जहाज और रेडियो हमें आपस में एक दूसरे के निकट लाये हैं. इन्हीं चीजों की प्रकृति आज चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है- इन्सान में अच्छई हो- चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है- पूरी दुनिया में भाईचारा हो, हम सबमे एकता हो. यहाँ तक कि इस समय भी मेरी आवाज़ पूरी दुनिया में लाखों करोणों लोगों तक पहुँच रही है- लाखों करोडों हताश पुरुष, स्त्रियाँ, और छोटे-छोटे बच्चे- उस तंत्र के शिकार लोग, जो आदमी को क्रूर और अत्याचारी बना देता है और निर्दोष इंसानों को सींखचों के पीछे डाल देता है; जिन लोगों तक मेरी आवाज़ पहुँच रही है- मैं उनसे कहता हूँ- “निराश न हों’. जो बदहाली हम पर थोप दी गई है, वह कुछ नहीं, लालच का गुज़र जाने वाला दौर है. इंसान की नफ़रत हमेशा नहीं रहेगी, तानाशाह मौत के हवाले होंगे और जो ताकत उन्होंने जनता से हथियायी है, जनता उसे वापिस छीन लेगी और (आज) भले ही लोग मारे जा रहे हों, मुक्ति कभी नहीं मरेगी.

“सिपाहियों! अपने आपको इन वहशियों के हाथों में न पड़ने दो- ये आपसे घृणा करते हैं- आपको गुलाम बनाते हैं- जो आपकी जिंदगी के फैसले करते हैं- आपको बताते हैं कि आपको क्या करना चाहिये, क्या सोचना चाहिये और क्या महसूस करना चाहिये! जो आपसे मसक्कत करवाते हैं- आपको भूखा रखते हैं- आपके साथ मवेशियों का सा बरताव करते हैं और आपको तोपों के चारे की तरह इस्तेमाल करते हैं- अपने आपको इन अप्राकृतिक मनुष्यों, मशीनी मानवों के हाथों गुलाम मत बनने दो, जिनके दिमाग मशीनी हैं और जिनके दिल मशीनी हैं! आप मशीनें नहीं हैं! आप इंसान हैं! आपके दिल में मानवाता के प्यार का सगर हिलोरें ले रहा है. घृणा मत करो! सिर्फ़ वही घृणा करते हैं जिन्हें प्यार नहीं मिलता- प्यार न पाने वाले और अप्राकृतिक!!

“सिपाहियों! गुलामी के लिये मत लड़ो! आज़ादी के लिये लड़ो! सेंट ल्यूक के सत्रहवें अध्याय में यह लिखा है कि ईश्वर का साम्राज्य मनुष्य के भीतर होता है- सिर्फ़ एक आदमी के भीतर नहीं, नही आदमियों के किसी समूह में ही अपितु सभी मनुष्यों में ईश्वर वास करता है! आप में! आप में, आप सब व्यक्तियों के पास ताकत है- मशीने बनाने की ताकत. खुशियाँ पैदा करने की ताकत! आप, आप लोगों में इस जीवन को शानदार रोमांचक गतिविधि में बदलने की ताकत है. तो- लोकतंत्र के नाम पर- आइये, हम ताकत का इस्तेमाल करें- आइये, हम सब एक हो जायें. आइये हम सब एक नयी दुनिया के लिये संघर्ष करें. एक ऎसी बेहतरीन दुनिया, जहाँ सभी व्यक्तियों को काम करने का मौका मिलेगा. इस नयी दुनिया में युवा वर्ग को भविष्य और वृद्धों को सुरक्षा मिलेगी.

“इन्हीं चीजों का वायदा करके वहशियों ने ताकत हथिया ली है. लेकिन वे झूठ बोलते हैं! वे उस वायदे को पूरा नहीं करते. वे कभी करेंगे भी नहीं! तानाशाह अपने आपको आज़ाद कर लेते हैं लेकिन लोगों को गुलाम बना देते हैं. आइये- दुनिया को आज़ाद कराने के लिये लडें- राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ डालें- लालच को ख़्त्म कर डालें, नफ़रत को दफन करें और असहनशक्ति को कुचल दें. आइये हम तर्क की दुनिया के लिये संघर्ष करें- एक ऎसी दुनिया के लिये, जहाँ पर विज्ञान और प्रगति इन सबको खुशियों की तरफ ले जायेगी, लोकतंत्र के नाम पर आइए, हम एकजुट हो जायें!

हान्नाह! क्या तुम मुझे सुन रही हो?

तुम जहाँ कहीं भी हो, मेरी तरफ देखो! देखो, हन्नाह! बादल बढ़ रहे हैं! उनमें सूर्य झाँक रहा है! हम इस अंधेरे में से निकल कर प्रकाश की ओर बढ़ रहे हैं! हम एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं- अधिक दयालु दुनिया, जहाँ आदमी अपनी लालच से ऊपर उठ जायेगा, अपनी नफ़रत और अपनी पाशविकता को त्याग देगा. देखो हन्नाह! मनुष्य की आत्मा को पंख दे दिये गये हैं और अंततः ऎसा समय आ ही गया है जब वह आकाश में उड़ना शुरु कर रहा है. वह इंद्रधनुष में उड़ने जा रहा है. वह आशा के आलोक में उड़ रहा है. देखो हन्नाह! देखो!’


(आत्मकथा अनुवाद: सूरज प्रकाश)

त्रासदी, मीडिया ट्रायल और इन्साफ के सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/24/2013 02:15:00 PM

खुर्शीद अनवर की मौत से जुड़े अनेक पहलुओं पर जिस गैर जिम्मेदारी से बहसें चलाई गईं, उस लड़की के पक्ष में बोलने वालों-जिसने अपने खिलाफ अपराध की शिकायत की थी-और पूरी जांच की मांग करने वाले लेखकों, टिप्पणीकारों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ जिस तरह फेसबुक पर और उससे बाहर बदतमीजी भरी, अपमानजनक (और अनेक बार उत्पीड़न की सीमा तक जाने वाली) टिप्पणियां की गईं, वह न सिर्फ सामंती और पितृसत्तात्मक समाज के एक और अंधेरे कोने को उजागर करता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि खुद को वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील कहने वाले लोगों का एक हिस्सा इस अमानवीय, गैरजनवादी गलाजत में नाक तक डूबा हुआ है. इस पूरे मामले ने उस गैर जिम्मेदार रवैए को भी साफ साफ उजागर किया है, जिसके तहत स्त्रियों के खिलाफ पितृसत्तात्मक अपराधों के मामलों में चर्चाएं चलाई जाती हैं. हाशिया ऐसी सारी अपमानजनक टिप्पणियों, हमलों और तोहमतों की निंदा करता है और उन लोगों के साथ खड़ा है, जो यह मांग करते रहे हैं, और कर रहे हैं, कि मामले की पूरी तफसील से जांच होनी चाहिए और सच्चाई को सामने आना चाहिए. इसके साथ-साथ, मौजूदा स्थितियों में जिस तरह से उचित और संभव हो, शिकायतकर्ता लड़की के लिए इंसाफ को यकीनी बनाया जाना चाहिए.

इस मामले से जुड़े कुछ विशेष पहलुओं पर आशुतोष कुमार ने यह नोट लिखा है, जिसे हाशिया पर पोस्ट किया जा रहा है.

खुर्शीद अनवर की अस्वाभाविक मृत्यु के बाद मीडिया/सामाजिक मीडिया पर चली चर्चाओं और बहसों का जो रूप उभर कर आया है, उस से कुछ हैरतंअगेज़ सवाल उठते हैं. इन सवालों पर गौर करना हमारे दौर में न्याय की समझदारी और संभावना, न्याय के लिए किये जाने वाले संघर्ष और उसमें मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका का सटीक आकलन करने के लिए जरूरी है.

पहला सवाल: यह क्यों और कैसे मान लिया गया कि 18 दिसंबर की त्रासद घटना एक ‘आत्महत्या’ थी ?  ऐसी किसी भी घटना के बाद सहज रूप से जो पहला सवाल उठता है , वह यही होता है कि यह कोई दुर्घटना थी, अथवा ह्त्या या आत्महत्या. मौजूदा मामले में, शोक, सदमे और चिंता की व्यापक अभिव्यक्ति के बावजूद यह बुनियादी सवाल क्यों नहीं उठाया गया?  जबकि परिस्थितियाँ-व्यक्तिगत और वस्तुगत दोनों-ऐसी थीं, जो चीख-चीख कर आत्महत्या की थियरी के भोथरेपन की ओर इशारा कर रही थीं?

क्या एक ऐसे शख्स के अचानक आत्महत्या कर लेने की बात स्वाभाविक प्रतीत होती है,जो महीनों से कथित ‘मीडिया ट्रायल’ का मजबूती से, प्रभावशाली मुखरता के साथ, सामना करता आया हो? दूसरे पक्ष से जम कर बहसें की हों, उन्हें बार बार चुनौती दी हो?

जिसने किसी और के लेने के पहले खुद अपनी ओर से आरोपों के सम्बन्ध में डंके की चोट पर अपना नाम जाहिर किया हो?

जिसने अभी-अभी कथित दुष्प्रचार-कर्ताओं के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया हो?

जो बार-बार संघर्ष करने का अपना संकल्प दुहराता आया हो?

जिसने 'पीड़िता' के सामने आने और और मामले के सम्बन्ध में एफ आइ आर दर्ज किए जाने की लगातार मांग की हो?

जिसे लम्बी दुखद प्रतीक्षा के बाद अपनी निर्दोषिता साबित करने का पहला वास्तविक मौक़ा हासिल हुआ हो?

जो समझ सकता हो कि मृत्यु यह अवसर उस से अंतिम रूप से छीन सकती है?

मान भी लें कि किसी वज़ह से, गहन अवसाद के किसी तात्कालिक झोंके में, उन्होंने अपने जीवन के समापन का फैसला कर लिया तो क्या वे उसके लिए द्वारका से वसंत कुंज तक का लंबा सफर तय करने लायक समय खुद को दे सकते थे? क्या सचमुच इतना समय था उनके पास? जबकि कहा जा रहा है कि वे सुबह दस बजे अपने  दोस्त के घर से, द्वारका से, निकले और दुखद घटना का समय साढ़े दस बजे के पहले का बताया जा रहा है?

जबकि वे समझ सकते हों कि तीसरे माले की छत से गिरने पर मृत्यु सुनिश्चित नहीं है, ज़िंदगी भर की किसी भीषण शारीरिक क्षति के साथ जीवित रह जाना अधिक संभावित है?

क्या ये सारी परिस्थितियाँ चीख- चीख कर नहीं कह रहीं कि जो कुछ हुआ, वह आत्महत्या के सिवा कोई दुर्घटना या सुनियोजित ह्त्या तक हो सकती है?

तब एक बार भी यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया ?

आत्महत्या की थियरी को हवा दे कर उनके कथित मित्रो की तरफ से इस तरह के कयासों को पनपने का मौक़ा क्यों दिया गया, कि अब तक पूरी शिद्दत से लड़ते आये खुर्शीद अनवर लड़की के द्वारा आरोपों की पुष्टि होते ही खुद को अकेला और अरक्षित महसूस करने लगे?

आखिर अभी तक किसी के पास कोई आधार, कोई कारण, नहीं है, यह मान लेने का.

हो सकता है, आत्महत्या हो. लेकिन नहीं भी हो सकता है.

सवाल यह है कि इस सवाल को क्यों उठने नहीं दिया गया?

दूसरा सवाल, एकमत से कथित आत्महत्या के लिए 'मीडिया ट्रायल' को जिम्मेदार बताया जा रहा है.

लेकिन इस सिलसिले में दो जगजाहिर हकीकतों की जान बूझ कर उपेक्षा की जा रही है. एक -17 दिसम्बर के इंडिया टीवी के कार्यक्रम के पहले फेसबुक के अलावा कहीं इस प्रकरण की कोई चर्चा नहीं थी. फेसबुक पर मरहूम की सक्रियता और चर्चाकारों के खिलाफ मानहानि का उनका मुक़दमा दिखाता है कि कम से कम उसे इस हादसे का एकमात्र कारण मान लेना सहज नहीं है. तब क्या एकमात्र टीवी कार्यक्रम को मीडिया ट्रायल की संज्ञा दी जा सकती है? क्या यह संभावना नहीं हो सकती कि उन्हें सदमा मीडिया के व्यवहार से ज़्यादा अपने कथित करीबी दोस्तों द्वारा उस टीवी कार्यक्रम के तत्काल और तत्पर स्वागत से पहुंचा हो? क्या यह कोई संभावना ही नहीं है? क्या यह विचार -योग्य ही नहीं है?

अगर है, तो क्यों इसकी लगातार उपेक्षा की गयी है?

दो-  फेसबुक पर चली चर्चाएँ कभी एकतरफा नहीं थीं. रेप की कहानियां सुनाने वाले जितने थे, उनका विरोध करने वाले उनसे कई गुना ज्यादा थे. इन चर्चाओं में शुरुआत से ही 'पीडिता' का जम कर चरित्रहनन किया गया. वह भी बेहद अश्लील और हिंसक भाषा में. बार बार. सिर्फ उसे ही नहीं, जिस किसी ने उसके पक्ष में मुंह खोलने की हिम्मत की, उसे ही इस फेसबुकी हिंसा का निशाना बनाया गया.

तब 'मीडिया ट्रायल' की चर्चा चलाने वाले इस प्रसंग के इस पहलू की तरफ क्यों ध्यान नहीं दे रहे? अगर फेसबुक की भूमिका पर ही जोर दिया जा रहा है, तो पीड़िता के साथ किया गया व्यवहार उसका अनिवार्य और उतना ही तकलीफदेह हिस्सा है. इस हिस्से की सम्पूर्ण उपेक्षा को बहुत ध्यान से देखना और समझना बेहद जरूरी है. इस उपेक्षा को सिर्फ इसलिए महत्वहीन नहीं माना जा सकता कि पीड़िता एक उपेक्षित इलाके की है, गरीब है, और हमारी मित्र -परिचित नहीं है.

इन दो सवालों के जोड़ से तीसरा और सब से भारी सवाल पैदा होता है.

क्या एकतरफा 'मीडिया ट्रायल' की थियरी को एकमात्र और अंतिम सत्य के रूप में स्थापित करने के लिए ही 'आत्महत्या' की थियरी को, बिना किसी संदेह और सवाल के, प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है?

क्योंकि ये दोनों थियरियाँ एक दूसरे से जुड़ कर आसानी से भरोसा करने लायक 'खबर' बन जाती हैं. मीडिया ट्रायल की वज़ह से आत्महत्या की बात इस तरह से दिमाग में उतर जाती है कि मन में कोई सवाल ही पैदा न हो. दुर्घटना या हत्या की संभावना की ओर इशारा करने से इसमें खलल पैदा हो सकता था.

हम ये बिलकुल नहीं कह रहे कि 18 दिसम्बर का हादसा आत्महत्या हो ही नहीं सकता.

हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि ऐसा नहीं भी हो सकता है.

और यह कि इस भी का गायब हो जाना, इस संभावना का सम्पूर्ण नकार, अत्यंत आश्चर्यजनक और अस्वाभाविक बात है.

और ऐसी स्थिति में हमें अपने आप से और हर किसी से एक सवाल जरूर पूछना होगा.

किसी तात्कालिक भावनात्मक दबाव में मीडिया ट्रायल की वज़ह से आत्महत्या की थियरी को एकतरफा ढंग से, अंतिम सत्य के रूप में, प्रचारित करके क्या हम  कमजोर और उत्पीड़ित तबके के मन में उस सामाजिक मीडिया के इस्तेमाल को लेकर नए सिरे से भय और दहशत की भावना नहीं पैदा कर देंगे, जिससे पहली बार उसे आवाज की एक जगह हासिल हुई है? अभी तो जिसके पास कोई सत्ता नहीं, मीडिया नहीं, सुरक्षा नहीं, समर्थन नहीं, उसके पास सामाजिक मीडिया और उसकी आज़ादी उम्मीद की एक किरण है. इस किरण के होने भर से सत्ता तंत्रों में  भारी बेचैनी और बौखलाहट है. वे पहले से इसे बुझा देने को आतुर हैं. अगर यह शर्त लाई जाए कि जब तक अदालत में आरोप साबित न हों, तब तक उस पर चर्चा करना 'मीडिया ट्रायल' या अपराध है, तो सब से पहले और सब से ज़्यादा उत्पीड़ितों को ही इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

बेशक मीडिया ट्रायल के गम्भीर खतरे हैं. लेकिन किसी चर्चा को मीडिया ट्रायल बता कर उस पर दोषारोपण करने के पहले क्या उस चर्चा के सभी पक्षों को पर समान रूप से  ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि वह निराधार चर्चा है या उसका कोई प्राथमिक आधार मौजूद है? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि उस चर्चा के पीछे नीयत किसी अन्याय की संभावना को उजागर करने की है या उस पर पर्दा डालने की?

पिछले कई दिनों से कुछ भयभीत और कुछ भावावेशग्रस्त मित्र फेसबुक पर हमें हत्यारा घोषित करते घूम रहे हैं. हमें दिनरात अश्लील और हिंसक गालियों से नवाज रहे हैं. पीड़िता और उसके हक में कुछ भी कहने की हिम्मत करने वाले किसी भी व्यक्ति से वे ऐसा ही सलूक कर रहे हैं. हमने उन्हें जवाब नहीं दिया है, न देंगे. लेकिन हम समूची घटना की, उसके हर पहलू की, मुकम्मल जांच की मांग करते रहेंगे. यह तय है कि अदालत में दोष सिद्ध होने तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता, लेकिन यह भी तय  है कि कहीं न कहीं कोई अपराध हुआ जरूर है. अपराध की अवस्थिति इन दो पक्षों में कहीं हो हो या किसी तीसरे पक्ष में. उसका पता चलना ही चाहिए ताकि निर्दोषता स्थापित हो सके और दोष उजागर.

इससे आगे बढ़ कर हम यह मांग भी करते हैं कि इस प्रसंग में हुए समूचे मीडिया-प्रकरण की  जांच की जाए. सभी संबधित लोगों और एजेंसियों की भूमिकाओं की जांच की जाये , जिससे पता चले कि किस ने कहाँ कहाँ अपराध के इलाके में आवाजाही की है.

चूंकि झूठ का चौतरफा प्रचार चल रहा है, सिर्फ मित्रों और शुभ-चिंतकों के लिए,  हम यहाँ यह भी दर्ज करना चाहते हैं कि इस मामले में हमारी वास्तविक भूमिका क्या रही है. हमारे पास जब इसे लाया गया तब हमने ऐपवा की नेता कविता कृष्णन के साथ मशविरा किया और जो इसे ले कर आये थे, उनको दिवंगत के अपने संस्थान में आतंरिक और गोपनीय जांच के लिए ले जाने की सलाह दी.

हमने आज तक सिर्फ एक बार इस घटना के बारे में फेसबुक पर लिखा है. निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए एक छोटा सा नोट. यह नोट 18 दिसंबर को 11 बजे पोस्ट किया गया. यानी मर्मान्तक घटना के वास्तव में घटित हो चुकने के बाद, हालांकि हमें तब तक उसकी जानकारी नहीं हुई थी. कुछ ही समय बाद, फेसबुक से ही हमें हादसे की जानकारी हुई और हमने शोक और सदमे के हवाले से उसे तत्काल हाइड कर दिया और अपनी दीवार पर दर्ज कर दिया दिया कि अगर जरूरत हुई तो इसे अन्हाइड भी किया जा सकेगा. लेकिन वह सुरक्षित है, और उन लोगों के नाम भी सुरक्षित हैं, जिहोंने उसे लाइक किया, लेकिन जिनमें से कई अब हमें संगसार करने के अभियान में शरीक हो गए हैं.  कोई त्रासदी दूसरी से कमतर नहीं होती. हम बीती हुई त्रासदियों को मिटा नहीं सकते, लेकिन आने वाली त्रासदियों से बचने के लिए उनसे सीखने की कोशिश जरूर कर सकते हैं.

अरविंद केजरीवाल के नाम एक खुला पत्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/24/2013 03:00:00 AM


अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के कथित आंदोलनों के बारे में हाशिया की समझ पहले से बहुत साफ रही है-हम इन आंदोलनों का विरोध करते हैं हैं. हमने इन्हें सामंती, ब्राह्मणवादी, विश्व बैंक प्रायोजित सांप्रदायिक फासीवादी आंदोलन के रूप में खारिज किया है. अब जब अरविंद केजरीवाल सरकार बनाने जा रहे हैं और अन्ना हजारे लोकपाल पर संतुष्ट हो गए हैं, इस धुआंधार आंदोलनी दौर का एक चरण खत्म हुआ माना जाना चाहिए. ये आंदोलन भारत के ब्राह्मणवादी-साम्राज्यवाद परस्त राज्य के खिलाफ लोगों के जुझारू गुस्से को भटकाने और उसके राज्य की हिमायत में एकजुट करने की अपनी भूमिका को निबाह चुके हैं. हालांकि आनेवाले दिनों में इनकी सक्रियता बनी रहेगी, और उनके खिलाफ संघर्ष भी.

फिलहाल ई-मेल से हासिल हुआ यह पत्र अरविंद केजरीवाल के नाम.

आआपा से हमारे कुछ सवाल। कल रात (22.12.2013) को हमारी सामाजिक संस्था “We The People of India - हम भारत के लोग” जिसमें दिल्ली के विभिन्न वर्गों से जुड़े लोग शामिल है, ने "आआपा और अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र" ईमेल से भेजा था और आज सुबह हमने इसे स्पीड पोस्ट से भी भेजा है। हम सभी  सामाजिक लोग दिल्ली में बनने वाली नई सरकार और उनके नुमाईंदों से यह जानना चहाते है कि वह अपने कार्यकाल में समाज के वंचित शोषित तबके और आम जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्ता कैसे सिद्द करेगे। इसी को लेकर हमने कुछ आआपा और उनके नेता केजरीवाल से कुछ सवाल रखे है। हमें उम्मीद है वे इन सवालों का जबाव जरुर देगे।

श्री अरविंद केजरीवाल, 22 दिसम्बर 2013.
आम आदमी पार्टी (आ आ पा),
भूतल , A-119,
कोशाम्बी,
गाज़ियाबाद -201010.

प्रिय अरविंद केजरीवाल जी,

वर्तमान विधानसभा में मिले समर्थन से आप आगामी दिनों में दिल्ली में सरकार बनाने जा रहे हैं और इसके लिए आप सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी के दर्शन के अनुरूप आम जनता से राय ले रहे हैं, जो बहुत अनूठा और स्वागतयोग्य कदम है.
आपको भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखते हुए हम दिल्ली के विभिन्न वर्ग के आम नागरिक - ‘We The People of India - हम भारत के लोग’ - आपसे हमारी दिन-ब-दिन की ज़िन्दगी से जुड़े चंद सवाल पूछना चाहते हैं.
हमें पूरी उम्मीद है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपनी प्रतिबद्धता के अनूरूप आप हम साधारण नागरिकों के प्रश्नों का उत्तर अवश्य देंगे.

धन्यवाद
“We The People of India - हम भारत के लोग”

मूलचंद (रिटायर्ड अधिकारी)
दीपक कुमार (पायलट)
अनीता भारती (लेखिका व सामाजिक कार्यकर्ता)
डॉ. गंगा सहाय मीना (प्रोफेसर)
रत्नेश (सामाजिक कार्यकर्ता)
गुरिंदर आजाद (सामाजिक कार्यकर्ता)
सेवंती (सामाजिक कार्यकर्ता)
राजीव (सामाजिक कार्यकर्ता)
अरुण रूपक (सामाजिक कार्यकर्ता)
डॉ राहुल (चिकित्सक)
धरम सिंह (रिटायर्ड अधिकारी)
दीपक सिंह (वकील)
जयनाथ (रिटायर्ड अधिकारी)
सी बी राहुल (सामाजिक कार्यकर्ता)
सुभाष कुमार (सामाजिक कार्यकर्ता)
तथा अन्य कार्यकर्ता.

निवेदक :
We The People of India - हम भारत के लोग’
C/o कप्तान दीपक कुमार,
C-1/214, दूसरा तल,
जनकपुरी,
दिल्ली - 110058.
आआपा –आम आदमी पार्टी से कुछ सवाल
1. संसद द्वारा लोकपाल विधेयक पारित हो गया है. इस सम्बन्ध में हम जानना चाहते हैं कि जब इस विधेयक के तहत राज्यों को अपने यहाँ लोकायुक्त नियुक्त करने के मामले में नियम में संशोधन करने का अधिकार है, ऐसे में क्या आप दिल्ली में इसके अधीन कोर्पोरेट घरानों, धार्मिक संगठन और एनजीओ, जो की व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार फैलाने में अधिक भूमिका निभाते है, को भी शामिल करना चाहेंगे?

2. आप अपने जन-लोकपाल बिल में दलितों-आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित करेंगे? जन लोकपाल बिल में इन वर्गों के हितो की रक्षा कैसे की जाएगी?

3. आप का कहना है कि आप स्थानीय क्षेत्र के विकास में मोहल्ला समिति और स्थानीय लोगों की राय को ही महत्व देंगे, ना कि कोई निर्णय ऊपर से लागू करेंगे. इस सम्बन्ध में हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि देश की स्वतंत्रता के समय से ही संविधान और समाज में शीत युद्ध चल रहा है, जैसे तमाम सामाजिक बुराइयां जैसे-दहेज, बाल श्रम, लिंग भेद, जाति, अस्पृश्यता आदि को समाज सही मानता आया पर संविधान/क़ानून की नज़र में ये सब अपराध है. ऐसे में यदि आप हर चीज़ में जन भावना के नाम समाज की राय मांगने की नीति की शुरुआत कर देंगे तो क्या भविष्य में ये कथित जन भावना, खाप का रूप लेकर संविधान पर प्रश्न चिन्ह तो नहीं लगा देंगी? इस बाबत हम जानना चाहते हैं कि आप संविधान/क़ानून को महत्व देंगे या आम जनता की राय का नाम लेकर हरियाणा की तरह दिल्ली में भी खाप संस्कृति को बढ़ावा देंगे?

4. बिजली के सम्बन्ध में आपका वादा है, कि आप इसका दाम आधा कर देंगे, पर दिल्ली में जहां बिजली का उत्पादन बहुत ही कम होता वहीँ समाज का उच्च वर्ग एसी, गीज़र, वाशिंग मशीन इस्तेमाल कर बिजली और पर्यावरण को नुकसान पहुचाते हैं, बिजली और पानी कोई असीमित संसाधन नहीं है. बिजली उत्पाचदन के लिए बनाए जाने वाले बांधों से लाखों लोग विस्थासपित होते हैं. बिजली को सस्ताे करने की प्रक्रिया में उन विस्थायपितों के अस्तित्वि का सवाल आपके लिए महत्व.पूर्ण नहीं है? उनमें से बहुत से विस्थाउपित पुनर्वास के अभाव में दिल्लीा का रुख करते हैं. उनके बारे में आपकी क्याे राय और योजना है? साथ ही अमीरों द्वारा बिजली से चलने वाले यंत्रों के अत्येधिक प्रयोग से पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान के बारे में आपकी क्याे राय और योजना है?

5. यदि आप किसी भी रूप में बिजली की दर कम करेंगे तो इससे होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई किस माध्यम से करेंगे?आम आदमी को सब्सिडी का बोझ न उठाना पड़े इसके लिए क्या आप अमीर या संपन्न वर्ग से टैक्स इत्यादि वसूलेंगे ?

6. आपकी सफलता में ऑटो चालको की बड़ी भूमिका है, पर अक्सर देखने में आया है कि ऑटो चालक मीटर से चलने से मना करते हैं, और कई बार दुगना किराया वसूलते हैं. इन तमाम परेशानियों को देखते हुए पिछली सरकार ने ऑटो चालक पर नियंत्रण, हेड क्वार्टर तक पहुंचाने का यंत्र लगाने की कोशिश की थी, पर ऑटो चालकों के विरोध के चलते यह लागू नहीं हो पाया था, क्या आप आम जनता को ऑटो की तकलीफ से मुक्ति दिलाने के लिए इसे लागु करवाएंगे? ऑटो चालकों के मनमाने रुख के लिए काफी हद तक ‘ऑटो मालिक व ऑटो – वित्तदाता माफिया’ जिम्मेदार है, जिसके चुंगल में ऑटो चालक अक्सर होते हैं. इस माफिया को समाप्त करने के लिए आप क्या करेंगे, जिससे की वास्तव में ऑटो चालाक अपनी मेहनत की कमाई से वंचित न हों?

7. आपने आपके पत्र में ठेका प्रणाली का विरोध किया है, जो बहुत अच्छी बात है, इस सम्बन्ध में हम आपको अवगत कराना चाहते हैं कि दिल्ली मेट्रो व् अन्य संस्थानों में कई ठेका कंपनियों ने ठेका कर्मचारियों के वेतन से पीएफ काटकर पीएफ कमिश्नर कार्यालय में जमा करने के बजाय डकार गयी है. इसके अलावा श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही है जो की कई बार मीडिया में उजागर भी हो चुके हैं, हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या आप ठेका प्रणाली का पूर्णतः अंत करेंगे और दोषी ठेकेदारों पर कठोर कार्रवाई करेंगे? श्रम कानूनों को लागू करवा कर मजदूर वर्ग को सहारा देंगे या मुनाफाखोरो को खुश करेंगे?

8. आप जानते ही हैं कि दिल्ली में ज़मीन की कमी हैं और इसकी कीमत बहुत ज्यादा है, पर यहाँ की प्राइम लोकेशन जैसे अक्षरधाम,लोदी एरिया, क़ुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, छतरपुर आदि में बड़े भाग पर हिंदू मंदिर और संस्थाओं को ज़मीन दी गयी है, क्या समाज के गरीब वर्ग के हित में इस ज़मीन से मंदिरों का कब्जा हटाकर इसे गरीब वर्ग और जनकल्याण के लिए उपलब्ध करायेंगे? यदि नहीं तो क्यों?

9. आपने यह माना है कि सरकारी स्कूलों में अच्छी शिक्षा नहीं मिलती और आप इसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, यह बेशक अच्छी बात है पर क्या आप इसके साथ राईट तो एडुकेशन के तहत शहर के निजी स्कूलों में गरीब-दलित के बच्चों का प्रवेश सुरक्षित करेंगे? इस संदर्भ में आपकी क्या कार्य योजना है?

10. आपने सरकारी अस्पतालों में वृद्धि और सुविधाओं को निजी अस्पताल की तरह करने की घोषणा की है, जो बहुत अच्छी बात है, पर क्या आप निजी अस्पतालों में दलित-गरीब तबके के नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था आरम्भ करेंगे? यदि हां तो इसकी रूपरेखा स्पष्ट करे.

11. महिला सुरक्षा आप का अहम मुद्दा रहा है, और ऐसी किसी घटना पर आप प्रदर्शन करते रहे है पर हमने देखा कि दलित-आदिवासी महिलाओ के अत्याचार में आप मौन रहते है, हरियाणा में महिलाओ पर हुए अत्याचार इसका उदहारण है क्या आप बताएँगे कि दलित-आदिवासी महिला अत्याचार के मामले की गंभीरता को देखते हुए एक पृथक दलित-आदिवासी महिला आयोग का गठन करेंगे. यदि नहीं तो क्यों?

12. संविधान-प्रदत्तक अजा/अजजा के लिए आरक्षण व्यकवस्थाप के बारे में आपकी क्या- राय है? दिल्ली सरकार के अधीन एससी/एसटी की खाली पड़ी रिक्तियों और बैकलॉग को भरने के बारे में आपके पास क्याध कार्य-योजना है? (कृपया स्पष्ट जवाब दें)
13. दिल्ली में रह रहे आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिया गया है I दूसरे राज्यों से विस्थापित हो कर राजधानी क्षेत्र में आकर बसी अनुसूचित जनजाति की आबादी को दिल्ली में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान करने और उनको सविंधान प्रदत्त सुविधाए मुहैया कराने के लिए आपकी क्या कार्ययोजना है?

14. केंद्र सरकार ने गैस सिलेंडर से सब्सिडी घटाकर इन्हें मंहगा कर दिया है, इस सम्बन्ध में हम बताना चाहते हैं कि शहर के गरीब, कागज़ात और पैसो के अभाव में गैस कनेक्शन नहीं ले पाते हैं, जिसके चलते उन्हें मार्केट दर से कहीं अधिक दर पर (120 रूपए प्रति किलो) छोटे सिलेंडर भरवाने पर मज़बूर होते हैं, क्या आप गरीब तबको को बिना कागज़ात के रियायती दर पर छोटे सिलेंडर उपलब्ध कराएँगे. यदि हां तो क्या उसका बोझ आम आदमी पे पड़ेगा? अगर नहीं तो कैसे?

15. दिल्ली के तमाम अमीर रिहायशी इलाकों में एलपीजी की सप्लाई के लिए गैस पाईप लाइन बिछी होती है पर जेजे कॉलोनी और गरीब बस्ती में कहीं भी यह सुविधा नहीं है, क्या आप सस्ती दरो पे गरीबों की बस्ती में इसे उपलब्ध करायेंगे? अगर नहीं तो क्यूँ और अगर हां तो कब तक और कैसे?

16. शहर का गरीब तबका सिर्फ सार्वजनिक यातायात के साधनों में ही सफर करता है, पर बसों को अक्सर कार जैसे निजी वाहनों के चलते जाम का सामना करना पड़ता है, और अपना कीमती समय सफ़र में व्यतीत करता है इसके साथ ही अधिक किराये का भुगतान भी करना पड़ता है, क्या आप गरीब वर्ग पर अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए इसके किराए में कमी करते हुए बीआरटीएस सिस्टम लागू करेंगे? निजी वाहनों पे पाबन्दी लगाने के लिए क्या कदम उठाये जायेंगे ?

17. शहर में घरेलू कामगार, शोषण का शिकार होते हैं, क्या आप इनके लिए न्यूनतम वेतन और पीएफ सुनिश्चित करेंगे और इसे लागू कराने के लिए आपके पास क्या कार्ययोजना है?

18. आपकी नज़र में आम आदमी कौन है. कौन से वर्ग आम आदमी की श्रेणी में आते है जिसके मद्देनज़र आप अपनी नीतिया तय करेंगे?

प्यासी है नील: मिस्र के क्रांतिकारी शायर अहमद फवाद नज्म की कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/13/2013 06:32:00 PM






अल-फोगामी के नाम से मशहूर इन्कलाबी शायर अहमद फवाद नज्म का इस 3 दिसंबर को इंतकाल हुआ. अरबी भाषा के इस मिस्री शायर को अवामी और इन्कलाबी शायर माना जाता रहा है. नज्म को अपने राजनीतिक नजरिए के कारण कई बार जेल जाना पड़ा. वे मिस्र के राष्ट्रपतियों गमाल अब्दुल नासिर, अनवर सादात और होस्नी मुबारक के तीखे आलोचक थे. कविताएं लिखने के अलावा वे गाते भी थे और संगीतकार शेख इमाम के साथ मिलकर उन्होंने अनेक यादगार संगीत प्रस्तुतियां दीं. पेश है उनकी कुछ चुनी हुई कविताएं. ये हिंदी अनुवाद अरबी से अंग्रेजी में वाला किसे द्वारा किए गए अनुवाद पर आधारित हैं. हिंदी अनुवाद: रेयाज उल हक

कौन हैं वे और हम कौन हैं?


कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
दौलत और ताकत वाले
और हम गरीब और महरूम
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
अंदाजा लगाओ कि कौन किसका हुक्मरान है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
हम वे हैं जो बनाते हैं हर चीज, हम मजदूर
हम अल-सुन्ना हैं, हम हैं अल फर्द
हम ऊंचे और चौड़े
हमारी सेहत से फलती हैं जमीन
और हमारे पसीने से मैदानों में भरती है हरियाली
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसकी सेवा कर रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
हवेलियां और कारें उनकी
और चुनी हुई औरतें
हवस से भरे हुए जानवर
उनका पेशा है अपनी अंतड़ियां भरना
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको खा रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
हम ही तो जंग हैं, उसका पत्थर और उसकी आग
हम वो फौज हैं जो जमीन को आजाद कराती है
हम शहीद हैं
चाहे हारें या जीतें
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको मार रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
वे महज संगीत के पीछे की तस्वीरें हैं
वे सियासत के लोग
कुदरती तौर से खाली दिमाग
लेकिन सजावटी रंगीन तस्वीरें
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको धोखा दे रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
वे पहनते हैं सबसे ताजा फैशन
मगर हम रहते हैं एक कमरे में सात
वे खाते हैं गोश्त और मुर्ग
और हम महज फलियां और कुछ नहीं
वे घूमते हैं निजी हवाई जहाजों में
और हम ठुंस कर चलते हैं बसों में
उनकी जिंदगी सुंदर और सजीली
वे एक नस्ल हैं और हम दूसरी
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको हराएगा?

प्यासी है नील


प्यासी है नील
ओ लड़कियों, नील प्यासी है
मुहब्बत के लिए, माजी की यादों में डूबी हुई
किनारों पर
न रोशनी है
न हवा का एक भी झोंका
न ही नी
और न जूही

ओ शाहिंदा, सुनाओ अपनी दास्तान
ओ अम्मा, अपनी उदास आवाज में
ओ अम्मा, खेतों की तरह हरी आंखों के साथ
जिनमें कुलांचे भरते हैं जंगी घोड़े
अल कानातर जेल कैसी है?
कैसे हैं कैदी?
जेल में तुम्हारे कॉमरेड कैसे हैं?

ओ चरागाह की रोशनियों
ओ मिस्र, तुम कैदियों से भरे हुए हो
और तुम्हारी पोशाकें हैं
जेल की कोठरियां

और तुम्हारे फैले हुए खेत
सिकुड़ कर फंदे में कस लेते हैं किसानों को
चिमनियों का धुआं
मजदूरों के रंग का है

कोड़े मारने वालों की चोटों में फंसी हुई
ओ नील की नन्हीं लड़की
इस दौर में कोई अंतरा नहीं है
लेकिन लाखों हैं बहादुर
जो अपने हर कदम पर सोचते हैं
बचते हैं कानून की मुठभेड़ से
लेकिन जब वक्त आता है
अजदहे की पीठ पर सवार
सारी रुकावटों को तोड़ डालते हैं वे
और गिरा देते हैं सारी जेलें.
---
शाहिंदा: एक नासिरवादी कार्यकर्ता हैं, जिनके पति की 1966 में जमींदारों ने हत्या कर दी थी क्योंकि वे कृषि सुधारों की हिमायत कर रहे थे.
अल कानातिर जेल: काहिरा की एक जेल
अंतारा: अरबी नज्दी हीरो और शायर

हड़ताल


अवाम के खुदा के नाम पर
हड़तालियों के खुदा
फाकाकश
महरूम
इतने बरसों से

शहरों की दास्ताने गाने वालों
आओ और हमारे शहरे के बारे में गाओ
यहां हैं हम
हमेशा की तरह वादे पर कायम

कितनी प्यारी हैं नज्में और गीते
तल्ख मेहनत के दिनों में
मुहब्बत के बारे में कही गई बातें कितनी प्यारी हैं?
तंगी के इन दिनों में

हम वे हैं जो रास्ता भूल गए
और बिखर गए
एक दूसरे से
लेकिन जेलों में हम मिलेंगे
आह कॉमरेडों
रास्तों की भूलभुलैया से
जब रातों में
चांद दबा हुआ होता है
जब एक दोस्त चलते हुए अंधेरे में
टकरा जाता है
अपने किसी दोस्त से
और महज दो कदमों से शुरू हुआ सफर
जारी रहता है बरस भर

कहां हैं हम आज?
और कितने हैं हम?
कल कितने होंगे?
और कहां होंगे?
रोज हम जाते हैं एक जगह
लेकिन गिनती बढ़ती जाती है

हर रोज
हम खोलते हैं दरवाजे
और हर रोज
हम मिटाते हैं अपनी बाधाएं
हर रोज
हम खड़ी करते हैं इमारतें
हर रोज
हम हटाते हैं मलबा
हर रोज हम भर जाते हैं गीतों से
हर रोज
हम जन्म देते हैं मदाद को

हमें रहना होगा इसी तरह
जेलों के भीतर
जेलों के बाहर
कितनी प्यारी हैं नज्में और गीत
तल्ख मेहनत से भरे इन दिनों में
और कितना हैरान कर देने वाला है वो हरा तना
खंडहरों के वसंत में
हम वे हैं जो रास्ता भूल गए और
हरेक ने
मिलकर
लिखा किताब का एक एक पन्ना

नफरत के काबिल हैं
वे पीठें जो शर्मिंदगी में झुक गईं
सरकार के रहनुमा के आगे और खान के आगे
नफरत के काबिल हैं वो शब्द जो गले में रह गए
ताकि जबान की बातें जाहिर न होने पाएं
गुलामी में सराबोर
नफरत के काबिल है रोटी का हर वो टुकड़ा जो जलालत में डूबा हुआ है
नफरत करो कायरों से

ओ कॉमरेडो
तुम्हीं ने बख्शी पत्थरों को ठोस ताकत
मैं तुम्हें पुकारता हूं
डूबे हुए दिल की गहराइयों से
नीरसता और ऊब के बीच से

तुम, जो सुबह के करीब हो
इसकी रोशनी और इसकी बुलंदी के,
आवाजों को जमा करो
मसजिदों में
और सुनो
शहर की गाती हुई चीखों को जो गुमनामी से जाग उठी हैं
एक हो
एक हो
एक हो
---
मदाद: सूफियों का एक गीत

हमारे राष्ट्रपति के साथ क्या मुश्किल है?


मैं कभी खीझता नहीं, और मैं हमेशा जो कहूंगा
उसके लिए मैं जिम्मेवार हूं
कि राष्ट्रपति एक रहमदिल इंसान हैं
लगातार वे अपने अवाम के लिए काम करने में लगे रहते हैं
लगे रहते हैं उनका पैसा बटोरने में
बाहर, स्विटजरलैंड में, उसे हमारे लिए जमा करते हुए
खुफिया बैंक खातों में
हमारे भविष्य की फिक्र में बेचारा आदमी
क्या तुम उसकी रहमदिली को नहीं देख सकते?
ईमान और भलमनसाहत के साथ
वे महज तुम्हें भूखा ही तो रखते हैं, ताकि तुम अपना वजन घटा सको
उफ, कैसी जनता हो तुम! खाने की भूखी
कैसी नादानी! तुम ‘बेरोजगारी’ की बात करते हो
और कैसे हालात नाकारा बन गए हैं
यह आदमी तुम्हें बस आराम करता देखना चाहता है
आखिर आराम कब से बोझ बन गया है?
और ये रिजॉर्टों की बातें
उन्हें राजनीतिक जेलें क्यों कहा जाता है?
इतना शक्की होने की क्या जरूरत है?
वे तो चाहते हैं कि आप थोड़ा मजे करें
जहां तक ‘द चेयर’ की बात है
बिना किसी शक के
यह हमारी गलती है!!
क्या हम उन्हें एक टैफ्लॉन चेयर नहीं खरीद सकते थे?
मैं कसम खाता हूं, तुमने इस बेचारे को गलत समझा है
उसने अपनी पूरी जिंदगी गंवा दी, और किसके लिए?
यहां तक कि तुम्हारा खाना तक उसने खाया, तुम्हारी भलाई के लिए!
अपने रास्ते की हर चीज को निगलता रहा
इतने सबके बाद, हमारे राष्ट्रपति के साथ मुश्किल क्या है?

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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