हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

'साँवला रंग' और कवि के मन का 'हरापन'

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/27/2013 05:49:00 PM


श्रम का नया सौंदर्यशास्त्र

रणेन्द्र के कविता संग्रह थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ पर भावना बेदी की टिप्पणी। रणेन्द्र का पहला उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता चर्चित रहा था और 2014 की शुरुआत में उनका दूसरा उपन्यास गायब होता देश प्रकाशित होने वाला है।

सहज संगति की चाह
पूरी हो कामना अनंतिम इसलिए
थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ
  ...
हरियाली से गुजरता
हरा होना चाहता हूँ

थोड़ा सा स्त्री होने की इच्छा ने मानो कवि के घर की देहरी पर दस्तक दी है, ये दस्तक एक जटिल और गहरा बोध है। जीवन को उसकी संपूर्णता में जानने का, उसे जीने का।

कवि की सर्जना का हरापन स्वयं उसके द्वारा ही निर्मित (कल्पनीय) नहीं है। उस हरेपन में हरे का अधिकांश रंग हर उस स्त्री के श्रम से आता है; जो खेतों, पगडंडियों, पहाड़ों, जंगलो और सूदूर बीहड़ों में जीवन को सबसे अधिक संभव बना रही है। अवसाद के इन बीहड़ों में जीवन हर रोज़ अपनी अंतिम साँसे लेता जरूर है, पर संघर्ष से उपजी जीजीविषा को हरा नहीं पाता। श्रम की उष्मा से उजाला फैलाने वाली ये आदिवासी युवतियाँ संभाव्य संसार की सर्जना करती रहती हैं। उनकी सर्जना से उगा यह हरा रंग ही कवि की स्मृति में बस गया है और चेतना से रिसकर अब कविता में बोलने लगा है।
कविता का यह बोलना कुछ ऐसे ही है जैसे घर के सदस्यों का आपस में बातचीत करना। इस प्रसंग में मराठी कवि वाहरू सोनवणे का कविता के विषय में कहा एक व्यक्तिगत अनुभव याद आता है, “एक गांव में एक झोपड़ी के आगे 15-20 लोग इकट्ठे होकर बैठे हुए थे। उनमें कुछ बूढ़ी औरतें भी थी। वे कविता क्या है, समझते ही नहीं थे। कविताओं के बारे में उनकी समझ क्या है मैंने यह जानना जरूरी समझा। मैंने अपनी कविताओं की डायरी निकाली और भिलोरी कविताएँ पढ़ने लगा। मेरी कविताएँ सुनने के बाद उन आदिवासी खेत मजदूरों ने वाह-वाह नहीं की, हँसने लगे और आखिर में बहुत गंभीर होकर कहने लगे, “सही है भाई! सच है। ये कविता नहीं यह तो हमारा जीवन ही है, जिसे तुमन जस का तस उतार कर रख दिया है।''

कवि रणेन्द्र की ये कविताएँ भी सजधज कर बहुमूल्य पोशाक पहने वाह!वाह! की गड़गड़ाहट के बीच कवि समाज और आलोचकगणों में उच्च पद पर आसीन होने की चाहत नहीं रखतीं। वह तो उन मजदूरों, किसानों और नौजवानों की संगीसाथी बनना चाहती हैं जो क्रांतिकारी गीत गाते हुए हजारों के हुजूम में राजपथ की सड़कों तक पहुंच चुके हैं। वे विकास के उस तथाकथित सच पर हमला करना चाहती हैं जो आँखों पर पट्टी बांधे चल रहा है। इसलिए वह सलवा जुडूम के दानवी शासकों को देख नहीं पाता। वे रंग की उस राजनीति पर हमला करना चाहती हैं जिसके चलते सांवले और जामुनी रंग को सुंदरता के प्रतिमानों से खारिज किया जाता रहा है।

‘थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ‘ संग्रह की अधिकतर कविताएँ सौन्दर्य और श्रम में एक सुन्दर संबंध बनाती दिखती हैं। इस सौन्दर्य के दो रूप हैं एक तरफ है मज़दूर योद्धा का सौन्दर्य। इस संदर्भ में कविता की कुछ पंक्तियो देखिए-

पूस माह में भी
तर-तर छूट रहा पसीना
फटी गंजी, घुटने लुंगी...
छिलन-चोट के लाल निशान
तमणे से चमचमा रहे
बूघन कमाण्डो के सीने पर ...
देगा वह बलिदान
न बिगुल/न तिरंगा/न कोई चक्र/न सम्मान!
हमारा वीर बहादुर/जनरल-मार्शल/बूधन जवान।“

दूसरा सौन्दर्य है बैंजनी, गंदुमी और जामुनी रंग की आदिवासी युवतियों का जो बाज़ार में बिकते सौन्दर्य वर्धक औजारों पर निर्भर नहीं है। उन्हे उस धूप से बचना नहीं पड़ता जिसमें शहरी गौरापन कुम्लाने लगता है। बलिक उनका जामुनी रंग धूप में ही पक कर जवान हुआ है इसलिए वह एक स्वाभिमान है, उनकी अपनी पहचान है। इस गर्वीले रंग ने निश्चय ही कवि की दीठ को बाँध दिया है।
‘जामुनी रंग‘ और ‘सांवरी‘ कविताओं की ये पंक्तियाँ देखिए-

‘‘दुपहर निकौनी कर
जीमनें बैठी
आदिवासी युवतियाँ...
रूप पर पसीने की लड़ियाँ
पारदर्शी मोतियों की
गहने की कड़ियां
     पर सच है
सब पर भारी था
हाय! वह जामुनी रंग‘‘

“तुम्हारी निगाहों से
नाक की तीखी कोर से
पसीने का बूँद से
बिखरता
नमक का एक कण
शत-शत अमृत कलशों पर
भारी है
हे साँवरी!''

एक तरफ घर के बाहर धूप में पकता सौन्दर्य है तो दूसरी तरफ घर के भीतर चुल्हे की आँच में आकार लेता सौन्दर्य है। कवि के अनुभव ने इस अनुपम सौन्दर्य को अपनी कविता में बहुत सहजता से पिरोया है।

‘‘चूल्हे की आँच में
दमदम दमकते नक बेसर पर
श्रम बूंदों के अमोल मोती,
बलि-बलि जाएँ जिन पर
सौ-सौ पूनो के चाँद
हे चान्दो! साँवर गुईयाँ!!‘‘

रणेन्द्र की इन कविताओं में ग्रामीण स्त्रियों का यह सौन्दर्य चाहे वो साँवर गुईयाँ विगत यौवना हो, बूधन बिरिजिया हो, बीड़ी का कश भरती स्त्री हो, धनरोपनी करती माँ या पन्नाद्याय हो ये सभी स्त्रियाँ अपने शाशवत सवालों का हल ढूँढ़ने घर से निकलती है। वे शाशवत सवाल किसी ईश्वर को पा लेने के नहीं अपने घर-गृहस्थी में, अपने समाज में जीवन को सम्मान से जीने के, उसे हर मुश्किल में संभव बनाने के हैं। हर घर में उजाला लाने के लिए हर घर से निकली इन स्त्रियों को कोई सिद्धार्थ सा नहीं कहता, ये प्रायः पुरुषशासित समाज में उपेक्षित रहती हैं। रणेन्द्र की कविताओं में इन स्त्रियों के श्रम को सौन्दर्य से जोड़ा गया है। कवि को ये स्त्रियाँ सुंदर प्रतीत होती हैं, क्योंकि ये सर्जना करती हैं। धूप-हवा और बतास सहती तुफानों के आगे दीवार की तरह डटने वाली ये आदिवासी स्त्रियाँ, रचती हैं सैकड़ों गीत और करती हैं प्रकृति से प्रेम और प्रकृति भी उपहार स्वरूप देती है उन्हें माटी की गंध और जंगलों का साँवलापन।
ये जामुनी रंग एक मेहनतकश रंग है ये सत्ता और शक्ति प्राप्त गोरे रंग की तरह विज्ञापन की कैद में रहना नहीं चाहता। ये खुद का शासक है। ये प्रकृति में उन्मुक्त विचरण चाहता है। ये ऐसा सौन्दर्य नहीं है जिसके लिए प्रचलित उपमा दी जाए “इसको भगवान (ग्लोबल देवता) ने फुरसत में बनाया है।” बल्कि इसे तो श्रम करते सर्वहारा ने गढ़ा है। कवि के शब्दों में -

“आत्मा के चकमक पत्थर से
सुलगाती है आग
ब्रह्मा को बाँयी और खिसका
खुद सृष्टा होती है स्त्री”

सर्जनधर्मी जामुनी रंग को रणेन्द्र के काव्य संग्रह “थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ“ के माध्यम से एक जन पहचान मिली है एक नया सौन्दर्य शास्त्र गढ़ा गया है। रंग की राजनीति के वर्चस्व पर हमला बोला है।

तरुण तेजपाल के घिनौने यौन अत्याचार का दोष तय करो!

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2013 10:24:00 PM

तरुण तेजपाल के घिनौने यौन अत्याचार का दोष तय करो!
पीड़ित महिला पत्रकार के पक्ष में न्यायपूर्ण कार्रवाई करो!!
साम्राज्यवादी-सामंतवादी संस्कृति को ध्वस्त करो!!

पिछले दो वर्षों में महिला की सुरक्षा की जितनी दावेदारी राज्य सरकारों और संसदीय पार्टियों ने किया है उससे कई गुना महिला उत्पीड़न की घटनाएं घटीं। पिछले दिसम्बर में बलात्कार की हुई घटना से दिल्ली ही नहीं पूरा देश सड़क पर उतर पड़ा था। इसके बावजूद न तो बलात्कार की घटनाओं में कमी आ रही है और न ही उत्पीड़न की घटनाओं में गिरावट का संकेत मिल रहा है। यह तकलीफदेह हालात एक रोजमर्रा की खबर और जीवनचर्या का हिस्सा बनता हुआ लग रहा है। मानो यह सब कुछ होना समाज का अनिवार्य हिस्सा हो। किसी सांसद, विधायक, नौकरशाह आदि का इस तरह की घटनाओं में लिप्त होना इस तरह के विचार को बनाने में न केवल मदद करता है बल्कि इस तरह के घिनौने समाज विरोधी कार्य को वैधानिकता भी प्रदान करता है। एक मीडियाकर्मी की लिप्तता इस भयावह स्थिति का एक ऐसा नमूना है जिसके नीचे वर्तमान साम्राज्यवादी-सामंतवादी आर्थिक-सामाजिक ढांचा सड़ रहा है और जिसका खामियाजा पूरा समाज और महिलाएं भुगत रही हैं।

तरुण तेजपाल, मुख्य संपादक, तहलका ने गोवा में अपनी पत्रिका द्वारा आयोजित ‘थिंक फेस्टिवल’के दौरान अपनी पत्रिका की एक पत्रकार का जिस तरह लगातार यौन अत्याचार किया है वह शर्मनाक और उत्पीड़ित महिला और समाज के प्रति घोर अपराध है। यह महिला पत्रकार तरुण तेजपाल की बेटी की मित्र है और वह उसी की उम्र की है। ‘थिंक फेस्टिवल’का आयोजन खनन कारपोरेशन्स और माफिया के सहयोग से करने वाले तरुण तेजपाल खुद को ‘लोकतंत्र’के झंडाबरदार के तौर पर पेश करते रहे हैं। पत्रकारिता के पेशे में तहलका कायम करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन के दौरान महिलाओं का ‘कॉलगर्ल’के तौर पर इस्तेमाल के दौरान भी उनपर कई आरोप लगे थे। पत्रकारिता और नैतिकता की बहस में यह मसला उस समय दब गया और उन महिलाओं के प्रति किए गए अपराध को न्याय के दायरे से ही नहीं पत्रकारिता की नैतिकता से भी बाहर ही रखा गया। उत्पीड़ित पत्रकार महिला और तरुण तेजपाल की बेटी के बीच हुए संदेशों और ई-मेल के माध्यम से तरुण तेजपाल की महिला के प्रति घिनौनी मानसिकता का काफी खुलासा होता है। इस घिनौने अपराध को लेकर तरुण तेजपाल ने जिस तरह बयानों को तोड़ा मरोड़ा है उससे भी उनके अपराध का पक्ष काफी कुछ बाहर आ जाता है। तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी ने जिस तरह महिला विरोधी पक्ष लिया है, बचाव के नाम पर जो कुछ बयान दिया है वह चितंनीय और कथित व्यवसायगत एकता के नाम पर पत्रकारिता को कलंकित करने का भी काम है।

तरुण तेजपाल को बचाने के लिए शोमा चौधरी ने जिस तरह का बयान दिया और माहौल बनाया उसकी वजह से उत्पीड़ित महिला पत्रकार को एक बार फिर यातना से गुजरना पड़ा। इस तरह के बचाव की शह पर तरुण तेजपाल ने पैंतरेबाजी कर उत्पीड़िता को एक बार फिर यातना का शिकार बनाया। पीड़िता को न्याय मिले इसके लिए जरूरी है कि तरूण तेजपाल के घिनौने कृत्य के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई हो और पीड़िता के खिलाफ माहौल बनाने वालों का दोष तय हो।

वैश्वीकरण और नवउदारवादी संस्कृति का जिस तेजी से हमारे सामने एक मॉडल खड़ा हुआ है उसे हम कारपोरेट, संसद व विधायिका, मीडिया और साम्राज्यवादी गिरोहों के गठजोड़ में देख सकते हैं। इस गठजोड़ में अहम हिस्सा है महिला को बाजार में ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’के रूप में उतारना। यह साम्राज्यवादी संस्कृति है जिसका गठजोड़ अपने देश में सामंतवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति के साथ हुआ है। मीडिया संस्थानों के मालिकों, प्रबंधकों, संपादकों...में मुनाफे की होड़, संपदा निर्माण और सत्ताशाली होने का लोभ-लालच पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति, आधुनिकता, जीवनशैली आदि आवरण में खतरनाक रूप से ऐसी संस्कृति को पेश कर रहा है जो पूरे समाज और महिला के लिए भयावह स्थिति बना रहा है। महिला उत्पीड़न का बढ़ता फैलाव और उच्चवर्गों का खुलेआम हिंसक व्यवहार एक ऐसी चुनौती है जिसे रोकने के लिए सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक मोर्चों पर संघर्ष को तेज करना होगा।

क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ) तहलका में काम करने वाले आम पत्रकार और पीड़िता जिन्होंने तरुण तेजपाल के खिलाफ बोलने का साहस किया के साथ अपनी एकजुटता प्रकट करता है। क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ) पीड़िता के पक्ष में न्याय की लड़ाई और दोषी को सजा दिलाने के संघर्ष में अपनी भागीदारी प्रस्तुत करता है।

वरवर राव
जीएन साईबाबा

तहलका का साहस अब कहां है? - अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2013 06:16:00 PM


तहलका के संस्थापक और प्रधान संपादक तरुण तेजपाल द्वारा गोवा में पत्रिका की एक युवा पत्रकार पर किए गए गंभीर यौन हमले के मामले पर अरुंधति रॉय की टिप्पणी। अनुवाद: रेयाज
 
तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स को छापा था. मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है. मैं मीडिया के शोरशराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं. एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है. लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है. अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिए घूमने लगे हैं. अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे. तरुण कई बरसों से मेरे एक दोस्त थे. मेरे साथ वे हमेशा उदार और मददगार रहे थे. मैं तहलका की भी प्रशंसक रही हूं, लेकिन मुद्दों के आधार पर. मेरे लिए तहलका के सुनहरे पल वे थे जब इसने आशीष खेतान द्वारा गुजरात 2002 जनसंहार के कुछ गुनहगारों पर किया गया स्टिंग ऑपरेशन और अजित साही की सिमी के ट्रायलों पर की गई रिपोर्टिंग को प्रकाशित किया. हालांकि तरुण और मैं अलग अलग दुनियाओं के हैं और हमारे नजरिए (राजनीति भी और साहित्यिक भी) भी हमें साथ लाने के बजाए दूर करते हैं. अब जो हुआ है, उसने मुझे कोई झटका नहीं दिया, लेकिन इसने मेरा दिल तोड़ दिया है. तरुण के खिलाफ सबूत यह साफ करते हैं कि उन्होंने ‘थिंकफेस्ट’ के दौरान अपनी एक युवा सहकर्मी पर गंभीर यौन हमला किया. ‘थिंकफेस्ट’ उनके द्वारा गोवा में कराया जाने वाला ‘बौद्धिक’ उत्सव है. थिंकफेस्ट को खनन कॉरपोरेशनों की स्पॉन्सरशिप हासिल है, जिनमें से कइयों के खिलाफ भारी पैमाने पर बुरी कारगुजारियों के आरोप हैं. विडंबना यह है कि देश के दूसरे हिस्सों में ‘थिंकफेस्ट’ के प्रायोजक एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें अनगिनत आदिवासी औरतों का बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं और हजारों लोग जेलों में डाले जा रहे हैं या मार दिए जा रहे हैं. अनेक वकीलों का कहना है कि नए कानून के मुताबिक तरुण का यौन हमला बलात्कार के बराबर है. तरुण ने खुद अपने ईमेलों में और उस महिला को भेजे गए टेक्स्ट मैसेजों में, जिनके खिलाफ उन्होंने जुर्म किया है, अपने अपराध को कबूल किया है. फिर बॉस होने की अपनी अबाध ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने उससे पूरे गुरूर से माफी मांगी, और खुद अपने लिए सजा का एलान कर दिया-अपनी  ‘बखिया उधेड़ने’ के लिए छह महीने की छुट्टी की घोषणा-यह एक ऐसा काम है जिसे केवल धोखा देने वाला ही कहा जा सकता है. अब जब यह पुलिस का मामला बन गया है, तब अमीर वकीलों की सलाह पर, जिनकी सेवाएं सिर्फ अमीर ही उठा सकते हैं, तरुण वह करने लगे हैं जो बलात्कार के अधिकतर आरोपी मर्द करते हैं-उस औरत को बदनाम करना, जिसे उन्होंने शिकार बनाया है और उसे झूठा कहना. अपमानजनक तरीके से यह कहा जा रहा है कि तरुण को राजनीतिक वजहों से ‘फंसाया’ जा रहा है- शायद दक्षिणपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा. तो अब एक नौजवान महिला, जिसे उन्होंने हाल ही में काम देने लायक समझा था, अब सिर्फ एक बदचलन ही नहीं है बल्कि फासीवादियों की एजेंट हो गई? यह एक और बलात्कार है- उन मूल्यों और राजनीति का बलात्कार जिनके लिए खड़े होने का दावा तहलका करता है. यह उन लोगों की तौहीन भी है, जो वहां काम कर रहे हैं और जिन्होंने अतीत में इसको सहारा दिया था. यह राजनीतिक और निजी, ईमानदारियों की आखिरी निशानों को भी खत्म करना है. स्वतंत्र, निष्पक्ष, निर्भीक. तहलका अपना परिचय इन शब्दों में देता है. तो कहां है
 अब वो साहस?

Distortion of Historical facts & Misinterpretation of Urdu Poetry

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/15/2013 12:14:00 PM


A note on Narendra Modi's speeches. Iqbal Javed wrote this, who is an engineer by profession.

Urdu is a beautiful language. We are pleased to see that Mr. Modi is beneficiating from this language, inspite of his party’s stand, describing it a “Videshi Bhasha” repeatedly.

Deen – e- Hijazi ka woh Bebaak Beda
Nishan Jiska Aks- e- Alam mein Pahuncha
Muzahim Huwa Khatrah Na Jisko
Na Oman mein thithka na Qulzum
(Red Sea) mein Jhijhka
Kiye Paar Jis ne Saaton Samandar

Wo Duba Dahan – e- Ganga mein Aa kar (on the bank of Ganga) “

This is the extract from “Musaddas Hali” composed by Maulana Altaf Hussain Hali.

“Musaddas” in urdu means Six line of Verses.

This “Musaddas” was read by Mr. Modi at the “Hunkar Rally” of BJP at Patna on 27th Oct, 2013.

He wrongly interpreted this & made its connection to the invasion of Alexander the Great in India. He described it as that Alexander, after conquering the world and crossing seven seas reached Patna & was defeated by Chandra Gupt & hence in this way submerged into Ganga. This means, he was defeated at this place.

Historical fact is that Alexander arrived on the Bank of Indus in 327 BC & defeated King Porus and conquered Punjab. After this victory his Army men, refused to go advance further as they were too much exhausted so he returned from Punjab itself. He died in the way at Babylon in 323 BC.

Chandra Gupt Maurya, not Chandra Gupt, was Alexander’s contemporary. In fact, he had met Alexander there in Punjab & joined his Army, perhaps seeking his assistance to capture Magadh. In 321 BC, he got victory in Magadh region with the help of Chanakaya (Kautilya).

Mr. Modi is emphasizing that Alexander was “Prasth” in the hands of Chandra Gupt Maurya. How a dead person (Alexander the great), can be defeated? This is nothing but “Lashon ki Rajniti” as frequently uttered by the mouth of Mr. Mukhtar Abbas Naqvi, a BJP spokesman in TV debate/comments on other party’s speeches. This type of lectures are delivered by a “Dreamer in Dreamlands”

This Musaddas exclusively a message to the muslims of Indian subcontinent due to negligence, lethargy & not proper recognition of message of Islam, they allowed it to be degraded which is synonymous in meaning in the drowning on the bank of Ganga.

In that speech, what we heard from Mr. Modi was Deen-e- Illahi, instead of Deen-e-Hijazi. Actually in Islam, both have same meaning but due to invention of Deen-e- Illahi by Akbar the great creates confusion. This new fashion of Deen – e Illahi totally differed from the Real Deen – e- Illahi  or Deen-e-Hijazi.

The real message of Musaddas decribed by Hali that the “Fearless fleet of Deen-e-Hijazi, started journey from Mecca & Madinah and it signs helped to focus world attention. Dangers did not obstruct its smooth passage and there was no resistance in its movement. Neither it stopped anywhere in the Gulf of Oman nor it hesitated in crossing the Red sea. They crossed all seven seas but submerged on the Bank of Ganga at the end.

Now, I think, Mr.Modi is preferring pure urdu words in his speeches. On 29th Oct, 2013, he forgot the words “Bhagya & Chhavi & was compelled to use these words as follows:


Kaash Sardar Saheb hamare pehle Pradhan Mantri hote to aaj desh ki Taqdeer bhi alag hoti aur Desh ki Tasveer bhi alag hoti”

जनसंहार की राजनीति और प्रतिरोध

Posted by चन्द्रिका on 11/04/2013 10:07:00 AM


सुष्मिता

सोन नदी की निष्ठुरता में अब भी कोई कमी नहीं आई हैं। मध्य बिहार में इसके दोनों किनारों पर गरीबों का इतना खून बहाया गया कि इसका पानी खून से लाल हो गया। लेकिन तब भी यह ऐसे बहती रही जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह सोन का निर्विकार भाव से बहना नहीं था बल्कि यह उसकी सामंतों के प्रति पक्षधरता ही थी कि उसने अपने पानी से सामंतों के खेतों को सींचकर उन्हें ताकतवर बनाया। सैकड़ो महिलाओं, नौजवानों और बच्चों के खून तथा इनके परिवार वालों के विलाप ने इसके प्रवाह पर कोई प्रभाव नहीं डाला। ठीक वैसे ही जैसे देश के मध्य वर्ग को इन गरीबों की हत्या, बलात्कार और इनके विलाप से कोई परेशानी नहीं होती। बल्कि यह वर्ग तो मानता है कि देश की सुरक्षा के लिए सरकारी एजेंसियां अच्छा काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के रिहंद इलाके से निकलकर घोर सामंती प्रभुत्व वाले इलाकों से गुजरने वाली यह नदी सैकड़ों हत्याओं की गवाह बनती आयी है।

उसी सोन नदी के एक छोर पर बसा गांव बाथे 1997 में अचानक दुनिया के नक्शे पर आ गया। इसी तरह इस गांव से महज 15-20 किलोमीटर की दूरी पर बसा अरवल भी 1986 में दुनिया के नक्शे पर आ गया था। 1 दिसंबर, 1997 को सहार की तरफ से आए रणवीर सेना के हत्यारों ने इस बाथे में मजदूर किसान संग्रामी परिषद् (माओवादियों का करीबी माना जाने वाला संगठन, नामक किसानों के संगठन के 56 समर्थकों और कार्यकर्ताओं और भाकपा (माले, लिबरेषन के 3  समर्थकों की गोली मारकर बर्बरता पूर्वक हत्या कर दी थी। मारे गए तमाम लोग दलित समुदाय के थे। अभी 9 अक्टूबर 2013 को इस हत्याकांड के तमाम आरोपियों के बरी हो जाने की वजह से फिर बाथे चर्चा में है। इस मामले में निचली अदालत ने 16 आरोपियों को फांसी दी थी जबकि 10 को आजीवन कारावास की सजा दी थी। उच्च न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य के अभाव की बात कहते हुए तमाम लोगों को बरी कर दिया। इस पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जा रही हैं। संसदीय पार्टियां इस पूरी परिघटना को जहां चुनावी नजरिए से देख रही हैं, वहीं कम्युनिस्ट नामधारी कुछ पार्टियां निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। लेकिन यहां यह समझने की जरूरत है कि क्या यह महज निचली अदालत और ऊपरी अदालत के फैसले में विरोध का मामला है; कुछ लोग इन नरसंहारों को दलितवादी नजरिए से देखते हुए इसके पीछे काम कर रहे शासक वर्गीय तंत्र को ओझल कर देते हैं। ऐसे में जनसंहार और प्रतिरोध की पूरी राजनीति को समझने के लिए इन जनसंहारों को पुरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा।

जनसंहार की राजनीति

बिहार में 1976 से लेकर 2001 तक लगभग 700 दलितों और पिछड़ों की ऊंची जातियों की सेना और पुलिस द्वारा हत्या की गयी है। अगर इन जनसंहारों की राजनीति को समझना है तो इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। शासक वर्गों की मदद से सामंतों द्वारा कराए गए जनसंहार एक खास दौर में सामने आए हैं, और यह दौर मुख्य रूप से 70 से लेकर 90 के दशक तक है। यहां यह सवाल बनता है कि यह सामंतों का महज दलितों पर हमला था तब ये नरसंहार 70 के दशक से पहले क्यों नहीं किए गए। उस समय तो सामंतों द्वारा दलितों पर हमला करना बेहद सुविधाजनक था। यहां मूल बात यह है कि 1970 के दशक में देश में उभरी  राजनीति ने देश के सामने नए सवाल सामने रखे। इस राजनीति ने जनता के समक्ष यह साबित करने की कोशिश की कि सामंती उत्पीड़न जमीन और इज्जत के सवाल शासक वर्गों के खिलाफ लड़ाई से ही हल किए जा सकते हैं न कि सरकारी कानूनी दायरे में। इस संघर्ष ने व्यापक उत्पीड़ित जनता को हौसला दिया और इन तमाम सवालों को संविधान के दायरे से बाहर संघर्ष के मैदान में हल करने के लिए संघर्ष शुरू हो गया। इस संघर्ष को आतंकित और नेस्तनाबूद करने के लिए शासक वर्गों ने जनसंहार का सहारा लिया। इस तरह ये जनसंहार सामंती उत्पीड़न, जमीन और इज्जत जो कि सीधे राजसत्ता के साथ जुड़े हुए थे, के लिए संघर्ष के दौर की उपज थे। शासक वर्ग की प्रतिक्रिया जाहिर तौर पर पुराने तंत्र को बचाए रखने के लिए ही थी।

अब यहां प्रश्न यह बनता है कि आखिर उन मुद्दों का क्या हुआ, जिनकी वजह से इतने लोगों ने अपनी शहादतें दीं। आज इन जनसंहारों और फैसलों पर अपनी राजनीति चमकाने वालों की तो भरमार है लेकिन तमाम लोग उन सवालों से बचने की कोषिष कर रहे हैं। जाहिर तौर पर शासक वर्गों का उत्पीड़ित जनता पर ये हमले जनता के राजनीतिक सवालों को सैनिक हमलों के जरिए कुचल देने की साजिषों का ही एक हिस्सा थे। इसे दलितवाद और महज न्यायिक ढोंग के चश्मे से देखना अंततः इस पूरे संघर्ष को नकारने की तरह ही होगा। अरवल जनसंहार पूरे देश में अपने तरह का बर्बर जनसंहार था जिसे मिनी जलियांवाला बाग कहा गया था। इसमें एक शांतिपूर्ण सभा को घेरकर पुलिस ने 25 लोगों की हत्या कर दी थी और इसमें 60 लोग घायल हो गए थे। आज इसपर कोई बात नहीं करना चाहता क्योंकि यह उनके संसदीय राजनीतिक हितों के अनुकूल नहीं है। दरअसल इन तमाम निजी सेनाओं और जनसंहारों को जनता के प्रतिरोध और शासक वर्गों की प्रतिक्रिया के रूप में ही देखना ज्यादा माकूल है।

जनसंघर्ष और शासक वर्ग

1970 के दशक में जब जौहर के नेतृत्व में भोजपुर में किसानों का व्यापक संघर्ष शुरू हुआ तब से ही शासक वर्गों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आने लगी। कहा जाता है कि सहार के बेरथ, बाघी और एकबारी में 1974 में ऊंची जातियों के जमींदारों द्वारा स्थापित प्रशिक्षण केंद्रों को आरएसएस ने मदद की। इसके अलावा 28 मई, 1975 को तत्कालीन पुलिस उप-महानिरीक्षक (नक्सल)  शिवाजी प्रसाद सिंह ने एलान किया कि बिहार सरकार ने भोजपुर और पटना जिले के सभी स्वस्थ पुरुषों को हथियारों से लैस करने का फैसला किया है, ताकि वे नक्सलवादियों के खिलाफ अपनी रक्षा कर सकें। इसके एक सप्ताह पहले ही पूर्व-मध्य क्षेत्र के पुलिस उप-महानिरीक्षक ने आदेश दिया था कि भोजपुर, नालंदा, रोहतास और गया जिले के तमाम गैर लाइसेंसशुदा हथियारों को जब्त कर लिया जाए, क्योंकि नक्सलवादी जमींदारों के हथियार छीनने में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा 1975 के उत्तरार्ध आते-आते बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने बिना किसी प्रचार के भोजपुर की या़त्रा की और जमींदारों तथा उनके बेटों के लिए स्थापित फायरिंग एंड शूटिंग सेंटर का उद्घाटन किया। इस दौरान तमाम नियमों को ताक पर रखते हुए ऊंची जातियों के लोगों को भारी मात्रा में हथियार के लाइसेंस जारी किए गए। 28 मई, 1975 को ही नक्सलवादी मामलों से संबद्ध पुलिस उप-महानिरीक्षक (नक्सल) षिवाजी प्रसाद सिंह द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि भोजपुर और पटना जिले के जिलाधीशों से कहा गया है कि वे उग्रवादियों के प्रभाव वाले गांवों का दौरा करें और मौके पर ही उन लोगों को हथियार के लाइसेंस जारी कर दें जिनके अंदर इन हथियारों को चलाने की क्षमता है’। इस तरह 1970 के दषक में संघर्ष के शुरू होते ही शासक वर्ग ने एक संगठित प्रतिक्रिया व्यक्त की और सामंतों को हथियारबंद किया। 6 मई, 1973 को ही भोजपुर के चवरी में पुलिस ने अर्धसैनिक बलों की मदद से एक हत्याकांड रचा था। इसमें 4 किसान मारे गए थे। इसकी जांच के लिए एक आयोग भी बना, जिसने 1976 में अपनी रिपोर्ट जारी की और इसे मुठभेड़ बताकर पुलिस को निर्दोष साबित कर दिया। शासक वर्ग की इतनी तीखी प्रक्रिया के बावजूद संघर्ष तेज होता ही गया और 1980 का दषक संघर्षों के उफान का दषक साबित हुआ। तत्कालीन गया जिले के जहानाबाद में संघर्षों का व्यापक उभार देखा गया। सामंती उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाकू संघर्ष संगठित किए गए। गैर मजरुआ जमीन पर कब्जे का अभियान शुरू हो गया। जैसे ही संघर्ष शुरू हुआ शासक वर्ग ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। संघर्ष की तीव्रता को देखते हुए शासक वर्ग ने तीखा दमन अभियान चलाया।

जहानाबाद के इलाके में 1985 की शुरुआत में ही ’ऑपरेषन ब्लैक पैंथर’ नामक एक बर्बर अभियान चलाया गया था। इसके लिए राज्य स्तर पर एक टास्कफोर्स गठित किया गया था। दिसंबर 1985 तक ’ऑपरेशन ब्लैक पैंथर’ का पहला दौर समाप्त हुआ। इसके संचालन के लिए गठित टास्क फार्स की बैठक मार्च, 1986 में की गई। इसमें शामिल केंद्रीय गृह मंत्री अरुण नेहरू (तत्कालीन गृहमंत्री) और महेंद्र सिंह (निजी सेनाओं का संरक्षक और कांग्रेस एमपी) समेत सरकारी अधिकारी शामिल थे। इसने तुरंत ही दूसरे दौर के दमन अभियान की शुरुआत की घोषणा की। बिहार सरकार के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि नक्सलवादियों को तुरंत ही नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। इस तरह उत्पीड़ित जनता के ऊपर दमन का सरकारी फैसला असल में सामंती ताकतों से सलाह मशविरे के साथ ही हो रहा था। अप्रैल, 1986 में सरकारी बलों को सुसज्जित करने और कमांडो तैनात करने की घोषणा की गई। जहानाबाद का संघर्ष इन तमाम सरकारी साजिशों के बावजूद तेज होता गया। ईपीडब्ल्यू में अपनी रिपोर्ट में नीलांजना दत्ता लिखती है कि ’1986 की शुरुआत तक इस क्षेत्र में मजदूरों-किसानों के संगठन मजदूर किसान संग्राम समिति ने कुर्मी जमींदारों की निजी सेना भूमि सेना को परास्त कर दिया था। इसने पूरे बिहार के समक्ष प्रतिरोध का उदाहरण प्रस्तुत किया था। अब सामंतों में आतंक था और इस तरह राजसत्ता ने दमन के नए तरीकों पर काम करना शुरू कर दिया’। भूमिसेना के खात्मे के बाद ही ब्रह्मर्षि सेना और लोरिक सेना को संगठित किया गया। लेकिन जनता के संघर्ष के बल पर तमाम निजी सेनाएं धराशायी हो गयीं। नीलांजना दत्ता की रिर्पोट के अनुसार ’तत्कालीन मजदूर किसान संग्राम समिति ने 5 मार्च से 3 अप्रैल तक निजी सेनाओं और पुलिस के हमले के बावजूद बड़े पैमाने पर जन गोलबंदी की। यह सेनाओं को डराने के लिए पर्याप्त था और अब सीधे सत्ता उनकी मदद में आयी। पूरे तंत्र को दमन के अनुरूप बनाया गया। तत्कालिन एसडीओ, ब्यास जी ने इन सेनाओं की मदद करने से इन्कार किया तो उनका तबादला कर दिया गया। एक नए पदस्थापित पुलिस अधिकारी वीर नायायण को भी निजी सेना से सहयोग नहीं करने की वजह से बदल दिया गया। इसके बाद तुरंत जहानाबाद को पुलिस जिला घोषित कर दिया गया। 16 अप्रैल, 1986 को जहानाबाद में बीएमपी के पूर्व कमांडेंट सीआर कासवान, जो भूमिहार जाति का था को एसपी स्तर के अधिकारी के बतौर पदस्थापित किया गया। इसके बाद 19 अप्रैल, 1986 को तत्कालीन पार्टी युनिटी के करीबी माने जाने वाले मजदूर किसान संग्राम समिति की खुली सभा को घेरकर सीआर कासवान के निर्देशन में अरवल में गोलियां चलायीं। दरअसल यह जनता को आतंकित करने के लिए सरकार के निर्देशन में रचा गया हत्याकांड था। एक रिपोर्ट बताती है, ‘‘कई लोगों को संदेह है कि यह एक उच्च स्तर की सरकारी साजिश थी। एसपी (सीआईडी) एससी झा ने इस घटना के जांचोपरांत पुलिस के डीजी और गृह सचिव को 5 मई को एक चिट्ठी लिखी। उन्होंने आरोप लगाया कि रामाश्रय प्रसाद सिंह (बिहार के मंत्री), महेंद्र प्रसाद (सांसद, राज्य सभा), जगदीष शर्मा और रामजतन सिन्हा (दोनों कांग्रेस के विधायक) और सीपीआई के एक अन्य विधायक आरपी सिंह पटना-गया-जहानाबाद के इलाके में अपने राजनीतिक हितों के लिए जातीय तनाव और हिंसा प्रोत्साहित कर रहे है।’’ इसके बाद तुरंत इस अधिकारी का तबादला कर दिया गया और 26 मई को सरकार द्वारा उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके बाद सरकारी आदेश पर एक कनीय अधिकारी को उनकी जगह दे दी गई। इतना ही नहीं जब अरवल के तत्कालिन डीएम ने अरवल हत्याकांड की न्यायिक जांच हेतु मुख्यमंत्री को लिखा तो डीएम को अरवल के स्थिति की रिपोर्ट भेजने से रोक दिया गया। ये तमाम तथ्य इन जनसंहारों के पीछे की साजिष और शासक वर्ग द्वारा प्रोत्साहन को स्पष्ट करते हैं।

आनंद चक्रवती इस पूरी परिघटना की व्याख्या इन शब्दों में करते है, ‘दरअसल ये तमाम सामंती निजी गिरोह राजसत्ता के ही मजबूत औजार थे। शासक वर्ग और राज्य के बीच अलगाव बर्जुआ तंत्र का चरित्र है और बिहार में यह हासिल होने से काफी दूर है। यहां जमींदार न केवल शासक वर्ग हैं बल्कि अपने आदेशों को मनवाने के लिए राज्य मशीनरी पर काबिज हैं। वे राज्य का हिस्सा हैं या फिर उसका विस्तार हैं। बिहार में राज्य मशीनरी में न केवल आधिकारिक तंत्र शामिल है, बल्कि जमींदारों और उनके हथियारबंद गिरोहों के गैर आधिकारिक औजार है‘। इस तरह तमाम तथ्यों को ध्यान में रखा जाए तो इन तमाम जनसंहारों को जनता के संघर्षों को कुचलने के लिए शासक वर्गों ने अपनेे मुखौटे संगठनों के जरिए अंजाम दिया।

निजी सेनाओं के खिलाफ प्रतिरोध

भोजपुर और जहानाबाद में कई निजी सेनाएं बनीं। खासकर जहानाबाद-पटना के इलाके में तो एक के बाद एक निजी सेनाओं की बाढ़ सी आ गयी। जहां भी निजी सेनाएं बनी हों उन्होंने जहानाबाद को ही अपना आतंक का क्षेत्र बनाया। भूमि सेना बनी तो पुनपुन में लेकिन उसने जहानाबाद में भारी आतंक मचाया हालांकि जहानाबाद भूमि सेना के लिए कब्रगाह भी साबित हुआ। अगस्त, 1994 में रणवीर सेना का गठन भोजपुर में किया गया लेकिन वहां से चारा-पानी लेकर इसने लगभग 3 साल के भीतर ही सोन पार करके जहानाबाद के इलाके में आतंक मचाना शुरू कर दिया। दरअसल निजी सेनाओं के गठन और उसके मजबूत बनने की पूरी प्रकिया को ऐतिहासिक संदर्भ में समझना जरूरी है। निजी सेनाएं बनती हैं हमेशा जातीय आधार पर लेकिन प्रतिरोध की ताकतें इन सेनाओं में अपने संघर्ष के दौर में उसका वर्गीय स्तर पर विभाजन कर उसे कमजोर करती हैं और फिर उसे प्रतिरोध के बूते नष्ट करती है। रणवीर सेना ने भोजपुर में आधार बनाते हुए मध्य बिहार के इलाकों में अपने हमले तेज किए। यहां लिबरेशन ने रणवीर सेना के खिलाफ मजबूत प्रतिरोध खड़ा करने के बजाए अपने संसदीय हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियां तय कीं। इसने अपने लड़ाकू आधार को अपने संसदीय राजनीति के अनुरूप वोट बैंक के रूप में ढाल लिया था।

जहानाबाद में लड़ाकू जनसंघर्षों और प्रतिरोध की बदौलत 1985 के अंत तक भूमि सेना का खात्मा हो गया। ऐसे में शासक वर्गों ने सीधे हमले की योजना बनायी और इसे अरवल में अंजाम दिया। अरवल जनसंहार ने सामंतवाद विरोधी संघर्षों में नए आयाम विकसित कर दिए। अब संघर्ष के अनुभवों ने यह साफ कर दिया था कि सामंतवाद विरोधी संघर्ष को एक मुकाम पर पहुंचाने के लिए संघर्ष का विस्तार राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष तक करना होगा। इस तरह जहानाबाद जिले में शुरु हुए आंदोलन ने न्याय और मुक्ति की आकांक्षाओं को सामंतवाद विरोधी संघर्षों के जरिए राजसत्ता के खिलाफ लड़ाई तक विकसित किया।

अब बिहार में लड़ाई के दो मॉडल सामने थे। भोजपुर में कार्यरत लिबरेशन ने जहां समझौते के मॉडल को सामने रखा वहीं जहानाबाद में संघर्षरत पार्टी युनिटी ने संघर्ष का विस्तार राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष तक किया। ये दोनों मॉडल आज भी अपने-अपने तरीके से कार्यरत हैं। भोजपुर में रणवीर सेना ने जब तीखा हमला शुरू किया तब लिबरेशन ने तीखे हमले के प्रतिरोध के बजाए समझौते का रास्ता आख्तियार किया। बथानी टोला जनसंहार के बाद जारी केंद्रीय कमिटी के पर्चे में लिबरेशन का कहना है, ‘हम हमेशा शांति के पक्ष में रहे हैं। शांति पसंद लोगों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए हमने शांति के पहल की शुरुआत की। बिहटा में किसान महासभा द्वारा आयोजित स्वामी सहजानंद सरस्वती के जन्मदिन के अवसर पर हमने शांति वार्ता शुरू की। श्रीमती तारकेश्वरी सिन्हा और श्री ललितेश्वर शाही सहित भूमिहार जाति के कुछ आदरणीय महानुभावों नें इसमें हिस्सा लिया। हमारी तरफ से केंद्रीय कमिटी सदस्य और पूर्व राज्य सचिव कॉ. पवन शर्मा उपस्थित थे। वार्ता काफी सकारात्मक रही। इसके दो दिन बाद पार्टी के महासचिव ने आरा में संवाददाता सम्मेलन में शांति के लिए एक अपील जारी किया। इस अपील को अखबारों ने काफी महत्व भी दिया। तमाम शांति पसंद लोगों ने इसका स्वागत किया। हमें रणवीर सेना की तरफ से सकारात्मक जवाब की आशा थी। इसके बाद हमने एक मित्र के जरिए, जो मध्यस्थता कर रहा था, रणवीर सेना को एक संदेश भेजा कि रणवीर सेना भी ऐसा ही करे। रणवीर सेना की प्रतिकिया काफी निराशाजनक थी। इस तरह शांति की हमारी कोशिशें विफल हो गयी थीं। हमारी आशा थी कि प्रशासन भी हमारी मदद करेगा। हमने जून, 1996 में दर्जनों जन बैठकों के जरिए शांति अभियान की शुरुआत की। जल्दी ही पांच गांवों में रणवीर सेना और हमारे संगठनों के लोगों के बीच अंतर्विरोधों को सुलझा लिया गया।’ इस तरह लिबरेशन की रणवीर सेना के साथ समझौतों की कोशिशों ने रणवीर सेना को प्रोत्साहित किया और फिर सोन के इस तरफ जहानाबाद में रणवीर सेना ने अपनी कार्रवाइयां शुरु कीं।

निजी सेनाओं और सामंती उत्पीड़न से मुक्ति तथा न्याय का सवाल सीधे तौर पर सामंती उत्पीड़न और इन निजी सेनाओं के चरित्र से जुड़ा हुआ है। यहां तमाम तथ्य दिखाते हैं कि ये तमाम निजी सेनाएं शासक वर्गों द्वारा शोषित-उत्पीड़ित जनता के संघर्ष को कुचलने के लिए दमन का एक मुखौटा मात्र था। जब इन मुखौटों से भी शासक वर्ग सामंतों की रक्षा में विफल होने लगा तब उसने सीधे जनता पर हमला शुरू किया। इस तरह शासक वर्गों के एक औजार के रूप में इन निजी सेनाओं को समझे बगैर इसके खिलाफ प्रतिरोध का सवाल महज दिवास्वप्न पर ही खत्म होगा। आज शासक वर्ग सामंतवाद विरोधी संघर्षों को कुचलने के लिए और ज्यादा बर्बर और दमनकारी रुख अपना रहा है। अब निजी सेनाओं की जगह खुफिया गिरोहों और ग्रामीण स्तर पर एसपीओ ने ले ली है। ऐसे में वर्तमान दौर में जनता के न्याय, पहचान और मुक्ति का संघर्ष सीधे तौर पर राजसत्ता विरोधी संघर्षों से सीधे तौर पर जुड़ गया है।

जनसंहार और न्याय

बाथे जनसंहार के आरोपियों के बरी होने के बाद शासक वर्ग द्वारा न्याय के संहार पर बहस काफी तेज है। शायद विगत में भोजपुर में इसके पहले यही बहस बथानी नरसंहार के आरोपियों के बारे में भी हो रही थी। हाइकोर्ट हमें यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि इस हत्याकांड के आरोपियों के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे। कुछ लोग हमें समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि निचली अदालत ने तो ठीक ही फैसला दिया था सारा दोष हाईकोर्ट का है। हर कोई अपनी सुविधा के अनुसार अपने तर्क बना रहा है। इस फैसले के जरिए न्यायालय  अपने वर्गीय चरित्र को ही और ज्यादा स्पष्ट कर रही है। यदि हत्याकांड के आरोपी हत्या में शामिल नहीं थे तब फिर हत्यारों को ढूंढ़ने का जिम्मा किसका है? जहां तक निचली अदालत के फैसले के सही ठहराए जाने का मामला है तो यह प्रचारित करने वाले लोग भी इस साजिश में बराबर के हिस्सेदार हैं। बाथे हत्याकांड के बारे में पूरी तरह साफ है कि इसकी योजना भोजपुर में बनायी गयी थी। उस समय तक रणवीर सेना जहानाबाद में इस स्तर के हमले के लिए जरूरी आधार नहीं बना पाया था। बल्कि यह जनसंहार रणवीर सेना के जहानाबाद तक के विस्तार की ही कोशिश थी। इस हत्याकांड का संचालन करने वाले रणवीर सेना के मुख्य सरगना भी भोजपुर के ही थे। बाथे के कानूनी मामलों के जानकारों का कहना है कि इस हत्याकांड में 19 आरोपी भोजपुर से थे। इन तमाम आरोपियों के खिलाफ निचली अदालत में गवाहियां बदलवायी गयीं और इस तरह निचली अदालत ने भोजपुर के रणवीर सेना से जुड़े तमाम सरगनाओं को बरी कर दिया। यह संयोग नहीं हो सकता कि भोजपुर के तमाम सरगना रिहा हो जायें। शायद यह विगत दिनों में भोजपुर में किए गए समझौते का कर्ज चुकता किया गया था। इसीलिए निचली अदालत के फैसले को इतना न्यायोचित ठहराया जा रहा है।

निचली अदालत या फिर उच्च न्यायालय द्वारा आरोपियों का बरी किया जाना कोई आष्चर्यजनक और नयी बात नहीं हैं। अरवल जनसंहार के आरोपियों का क्या हुआ? तमाम नरसंहार के आरोपी ऐसे ही बरी किए गए क्योंकि ये तमाम घटनायें तो शासक वर्गों के आतंक का ही विस्तार थीं। लेकिन जो सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है वो यह है कि क्या बथानी या फिर बाथे के आरोपियों को सजा मिल जाने भर से इन जनसंहार में मारे गए लोगों के साथ न्याय हो जाएगा? क्या 1976 से लेकर 2001 तक मारे गए 700 लोगों के साथ न्याय महज हत्यारों को सजा मिलने भर से हो जाएगा? सबके न्याय के अपने-अपने पैमाने हैं। हर कोई न्याय को अपनी सुविधा के अनुसार विश्लेषित करता है। लेकिन मेहनतकश उत्पीड़ित जनता के लिए न्याय का सपना उनके जीवन के सवालों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी बन जाता है कि आखिर उन मुद्दों और सवालों का क्या हुआ जिसके लिए उन्हें सामंतों या फिर पुलिस के हाथों अपनी जान गंवानी पड़ी? आखिर उस संघर्ष का क्या हुआ जिसके लिए हजारों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दीं?

ऐतिहासिक रूप से यह साफ है कि ये जनसंहार इसलिए रचे गए क्योंकि गरीबों ने इज्जत, पहचान और न्याय के लिए संघर्ष के साथ खुद को जोड़ा। इसलिए इज्जत, पहचान और न्याय के लिए मुकम्मल संघर्ष ही मारे गए लोगों के साथ न्याय होगा। जनता ने संघर्ष का रास्ता इसलिए आख्तियार किया क्योंकि संविधान और न्यायालय उन्हें न्याय नहीं दे पाए। ऐसे में इस संघर्ष की वजह से मारे गए लोगों के हत्यारों को सजा भी जाहिर तौर पर न्यायालय नहीं दे सकती। इस न्याय का सवाल भी जनता के संघर्षों से ही जुड़ा हुआ है। मसला सामंती प्रभुत्व के खात्मे, इज्जत, पहचान और जीवन का है। इसे जनसंहार के आरोपियों की सजा भर तक समेट देना न केवल उन मारे गए लोगों के साथ अन्याय होगा, बल्कि धोखाधड़ी भी। कुछ लोग नरसंहार के आरोपियों की सजा के लिए एसआइटी के गठन की मांग कर रहे है। दरअसल इन घिसे-पीटे तरीकों का दौर कब का खत्म हो गया। क्या चबरी गोलीकांड के हत्यारों को आयोग के जरिए कोई सजा हुई? अरवल जनसंहार के बाद भी एक ’पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ का गठन हुआ। इसने तमाम लोगों की गवाहियां लीं। अरवल जनसंहार के हत्यारों का क्या हुआ? उन्हें दंडित करने के बजाए प्रोत्साहित किया गया। इसके अलावा यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जनता के न्याय की आकांक्षाएं समझौतों के जरिए पूरी नहीं की जा सकतीं। रणवीर सेना के बर्बर होने के बाद भोजपुर में शांति कायम करने के नाम पर गांव-गांव में शांति समितियां गठित की गईं। किसी से छिपी हुई बात नहीं है कि किस कीमत पर भोजपुर में शांति स्थापित की गयी। इन शांति समितियों ने केवल न्यायालय में चल रहे मामलों को वापस लेने के समझौते किए। इतना ही नहीं रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह ने अपने बरी होने की घटना को सही बताते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार को यह बताया कि ‘आज जो लोग न्याय का हल्ला मचा रहे हैं उनसे क्यों नहीं पुछते कि दनवार बिहटा के (सहार का एक जमींदार) ज्वाला सिंह की हत्या में आरोपित एक पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य को कैसे रिहा कराया गया है।’ अब इन तमाम मामलों को कोर्ट से बाहर कैसे मैनेज किया गया है यह तो मैनेज कराने वाले जानें, लेकिन इतना तो तय है कि इन समझौतों से जनता की न्याय की आकांक्षाओं को कभी हासिल नहीं किया जा सकता। शासक वर्ग के जन आंदोलनों पर दमन का तर्क शुरू से ही रहा है कि इन्हें संघर्ष के बजाए सरकार के साथ मिल-बैठकर संविधान सम्मत फैसला करना चाहिए। लेकिन जनता के न्याय का सवाल इन सब भ्रमों से पहले ही पार पा चुका था, ऐसे में शांति के सरकारी तरीके इन आंदोलनों के आत्मसमर्पण के ही बराबर थे। न्याय की सारी आंकाक्षाओं का रास्ता संघर्षों के रास्ते से ही होकर गुजरता है। तमाम मारे गए लोगों के लिए न्याय का सवाल सामंती प्रभुत्व के खात्मे और इससे भी अधिक राजसत्ता के सवाल के साथ जुड़ा हुआ है। इसके बिना न्याय और मुक्ति की सारी आकांक्षाएं महज संसदीय राजनीति का एक खिलौना बनकर रह जाएंगी।

सितंबर 1996 में रणवीर सेना द्वारा बथानी जनसंहार के बाद सहार से लिबरेशन के तत्कालीन विधायक रामनरेश राम सहित इनके कई नेता बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के इस्तीफे और आरा के डीएम-एसपी के निलंबन के सवाल पर पटना में अनशन पर बैठ गए। उस समय मुख्यमंत्री ने जनता के गुस्से को शांत करने के लिए महज डीएम-एसपी का स्थानांतरण कर दिया। इसके अलावा राजस्व विभाग द्वारा एक आम जांच की घोषणा हो गयी। इसे लिबरेशन ने अपनी जीत बताते हुए बंद का आह्वान वापस ले लिया। अब बंद की जगह पटना में एक विजय जुलूस निकाला गया। इस तरह लिबरेशन ने एक वीभत्स जनसंहार के खिलाफ उभरे जनाक्रोश को एक लड़ाकू दिशा देने के बजाए प्रतिरोध के टोकनिज्म का एक नया रास्ता निकाल लिया। यदि उस समय अधिकारियों का स्थानांतरण ही लिबरेशन की जीत थी फिर बथानी का फैसला उसके लिए व्यथित करने वाली बात कैसे बन गया? हालांकि इस घटना के बाद बथानी के दौरे पर आये तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सीपीआई के इंद्रजीत गुप्त ने इसे राज्य में पुलिस प्रशासन की पूरी तरह विफलता बताया। बिहार सरकार के तत्कालीन डीजी ने खुलेआम स्वीकार किया कि पुलिस इस वीभत्स हत्याकांड को रोक सकती थी। अब पता नहीं ऐसे वीभत्स हत्याकांड में महज अधिकारियों का स्थानांतरण ही जनता की जीत किस तरह मान लिया गया! आज फिर कुछ लोग न्याय की तमाम आकांक्षाओं को एसआइटी और निचली-उपरी अदालतों की बहस में उलझाकर इस पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा होने से बचाना चाहते हैं। जनता ने तमाम आयोगों और न्यायिक फैसलों का हस्र देख लिया है। इन घिसे-पिटे तरीको के जरिए कोई जनता की न्याय की आकांक्षाओं को भले ही बहला-फुसला ले लेकिन इन्हें न्याय नहीं मिल सकता। भारत की शोषित-उत्पीड़ित जनता की न्याय और मुक्ति की आकांक्षा को समझौते की राजनीति ने एकदम शुरू से ही दिवास्वप्न में तब्दील कर दिया। लेकिन 1970 के दषक में तमाम बेड़ियों और समझौते की राजनीति के विभ्रमों को तोड़ती हुई जनता ने संघर्ष और कुर्बानियों का नया रास्ता पकड़ा। तमाम तरह के दमन और हत्या की राजनीति द्वारा प्रतिरोध को खत्म करने की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं। अब समझौते की राजनीति बेनकाब हो गयी थी। सवाल महज बाथे में मारे गए लोगों के साथ न्याय का नहीं है बल्कि सवाल संघर्ष के दौरान कुर्बान हुए जगदीश मास्टर, रामेश्वर, बुटन, कृष्णा सिंह समेत अरवल, बाथे, शंकरबीघा के तमाम लोगों के साथ का है। जाहिर तौर पर बाथे के लोगों के न्याय का सवाल भी उन तमाम कुर्बान हुए लोगों के न्याय के साथ जुड़ी हुई है।

 शासक वर्ग आज सामंतवाद विरोधी संघर्षों को कुचलने के लिए और ज्यादा बर्बर और दमनकारी रुख अपना रहा है। अब निजी सेनाओं की जगह हत्यारे गिरोहों (विजिलांते गैंग्स) और ग्रामीण स्तर पर एसपीओ ने ले ली है। वर्तमान में संघर्ष को कुचलने के लिए सरकार का आंदोलन विरोधी औजार विषेष तरह की खुफिया पुलिस बन गयी है। ऐसे में वर्तमान दौर में जनता के न्याय, पहचान और मुक्ति का संघर्ष सीधे तौर से राजसत्ता विरोधी संघर्षों के साथ जुड़ गया है। राजसत्ता के खिलाफ संघर्षों को बिना व्यापक किए जनता के न्याय और मुक्ति का सवाल खयाली पुलाव और लोकप्रिय प्रचार का महज एक औजार बनकर रह जाएगा। वर्तमान में शासक वर्ग ने अपने तंत्र को बचाए रखने के लिए जब नए तरीके इजाद किए है तब सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों को भी नए तरीके के संगठन और संघर्ष का स्वरूप विकसित करना होगा। इतिहास गवाह है कि जनता के न्याय और मुक्ति की आकांक्षाओं को सैनिक और विद्रोह विरोधी कार्रवाइयों से खत्म नहीं किया जा सका है। आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल करेंगी कि क्यो खून से पानी के लाल होने के बाद भी सोन ऐसे ही बहती रही। निष्पक्ष रहने का दिखावा करना भी एक तरह की पक्षधरता ही है।

मेहनतकशों ने अपने संघर्षों के बदौलत इतिहास की दिशा बदल दी है। सोन को भी अपनी पक्षधरता साफ करनी होगी। इसे भी अपनी निष्ठुरता छोड़नी ही होगी अन्यथा यह भी इतिहास में विलीन हो जाएगी। इतिहास में ऐसा ही हुआ है और यही दुनिया के विकास का विज्ञान भी है। आज न सही लेकिन कल यह होकर रहेगा। ऐसे में उन मुद्दों के लिए, जिनकी वजह से इन हत्याकांडों को अंजाम दिया गया, संघर्ष तेज करना ही बाथे समेत तमाम जनरंहारों में सामंतों और पुलिस द्वारा मारे गए लोगों के लिए इंसाफ हासिल करने तरफ बढ़ाया गया कदम होगा।

संदर्भः-

1 भोजपुरः बिहार में नक्सलवादी आंदोलन, कल्याण मुखर्जी
2 ईपीडब्ल्यू, निलांजना दत्ता
3 ईपीडब्ल्यू, अरविंद सिन्हा
4 ईपीडब्ल्यू, आनंद चक्रवर्ती
5 बिहाइन्ड द किलिंग्स इन बिहार, पीयूडीआर की रिपोर्ट
6 भाकपा माले लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी द्वारा बथानी नरसंहार के बाद जारी पर्चा
7 अरवल जनसंहार की एपीडीआर द्वारा रिपोर्ट

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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