हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

राजेंद्र यादव से हमारी उम्मीदें हमेशा बनी रहीं: वरवर राव

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2013 06:17:00 PM


राजेंद्र यादव को क्रांतिकारी कवि वरवर राव की श्रद्धांजली

लगभग 30 साल से चले आ रहे हमारे बीच के संवाद को राजेंद्र यादव ने मेरे नाम एक लंबा पत्र लिखकर हमेशा के लिए बंद कर दिया। मैंने उन्हें जवाब दिया था और पिछले दिनों हुए विवाद और बहस में अपने दो पत्रों से अपनी अवस्थिति को सभी के सामने रखा भी था। इसके बाद उन्होंने मुझे एक लंबा पत्र लिखा और ‘हंस’ में संपादकीय भी लिखा। इसे आगामी महीने में ‘अरूणतारा’ में इसका तेलुगू अनुवाद हम प्रस्तुत करेंगे। यह सब इसलिए कि राजेंद्र यादव से हमारी उम्मीदें हमेशा बनी रहीं। हमारे बीच उनका नहीं रहना एक भरी हुई जगह के अचानक ही खाली हो जाने जैसा है, हम सभी के लिए एक क्षति है।

1980 के दशक में जब आंध्र प्रदेश में दमन का अभियान जोरों पर था और सांस्कृतिककर्मी से लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तक को बख्शा नहीं जा रहा था उस समय की ही बात है राजेंद्र यादव ‘हंस’ को लेकर आए। उसी दौरान उन्होंने पत्र व्यवहार से हमसे संपर्क किया। हमारी कविताएं भी उन्होंने प्रकाशित कीं। राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ को प्रेमचंद की परंपरा और विरासत को आगे ले जाने के वादे और नारे के साथ प्रकाशित किया था। शायद उनकी यही दावेदारी उनको विवाद के घेरे में ले आती रही। उनकी यही दावेदारी मुझे उनसे जोड़ती थी और इसी के तहत विवाद भी बनता रहा।

2002 तक आंध्र प्रदेश में राजकीय दमन अपने घिनौने रूप में सामने आ चुका था और गुंडा-गिरोहों द्वारा सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की खुलेआम हत्याएं की जा रही थीं। मेरे ऊपर पर भी इसी तरह के खतरे थे। मैं थोड़े समय के लिए उस दिल्ली आया। 2002 में ही राजेंद्र यादव से पहली मुलाकात हुई। उनकी तमाम विवादास्पद हरकतों के बावजूद मेरी उनसे एक उम्मीद जो पहले से बनी हुई थी, इस मुलाकात के बाद भी कायम रही। हैदराबाद वापस जाने पर उनसे संपर्क नहीं टूटा। यह उन पर मेरा भरोसा ही था कि पिछले दिनों हुए आयोजन के लिए जो निमंत्रण पत्र भेजा उसमें अन्य वक्ताओं का नाम न होने के बावजूद इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद बने विवाद के बाद मुझे उनके साथ संवाद टूट जाने की उम्मीद नहीं थी और उन्होंने लंबा पत्र लिखा भी।

एक साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी पूरे समाज को प्रभावित करता है। राजेंद्र यादव का नहीं रहना हिंदी साहित्य के साथ साथ पूरे साहित्य जगत की भी क्षति है। साहित्य के मोर्चे पर जीवन के अंतिम क्षण तक लगातार सक्रिय रहने वाले मित्र राजेंद्र यादव को विनम्र श्रद्धांजली और नमन!

कॉमरेड: शुभम श्री की नई कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2013 03:31:00 PM

शुभम श्री की नई कविताएं.


कॉमरेड

(1)
पूरी शाम समोसों पर टूटे लोग
दबाए पकौड़े, ब्रेड रोल
गटकी चाय पर चाय
और तुमने किया मेस की घंटी का इंतजार
अट्ठाइस की उम्र में आईना देखती
सूजी हुई आंखें
कुछ सफेद बाल, बीमार पिता और रिश्ते
स्टूडियो की तस्वीर के लिए मां का पागलपन
घर
एक बंद दरवाजा
---
हमारी आंखों में
तुम हंसी हो
एक तनी हुई मुट्ठी
एक जोशीला नारा
एक पोस्टर बदरंग दीवार पर
एक सिलाई उधड़ा कुर्ता
चप्पल के खुले हुए फीते की कील
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम
भी हो तुम चुपके से
---
यूं ही गुजरती है ज़िंदगी
पोलित ब्यूरो का सपना
महिला मोर्चे का काम
सेमिनारों में मेनिफेस्टो बेचते
या लाठियां खाते सड़कों पर
रिमांड में कभी कभी
अखबारों में छपते
पर जो तकिया गीला रह जाता है कमरे में
बदबू भरा
उसे कहां दर्ज करें कॉमरेड?

(2)
टेप से नापकर 20 सेंटीमीटर का पोल और उसका शरीर
बराबर हैं
तिस पर एक झलंगी शर्ट 90 के शुरुआती दिनों की
और जींस पुरातत्व विभाग का तोहफ़ा
पैंचे की सिगरेट के आखिरी कश के बाद भी
पराठे का जुगाड़ नहीं
तो ठहाके ही सही
सेकेंड डिवीजन एम.ए, होलटाइमर
मानसिक रोगी हुआ करता था
पिछले महीने तक
दिवंगत पिता से विरासत में पार्टी की सदस्यता लेकर
निफिक्र खिलखिलाता
ये कॉमरेड
दुनिया की खबर है इसे
सिवाय इसके कि
रात बाढ़ आ गई है घर में
पंद्रह दिनों से बैलेंस जीरो है !

भाकपा (माले)

पापा का मर्डर
चाचा लापता
ड्राइंग बेरंग
निकर बड़ी
नंबर कम
डांट ज्यादा
पेंसिल छोटी
अंगूठा बड़ा
---
इससे पहले कि ग्रेनाइट चुभ जाए
गोलू ने लगाई रेनॉल्ड्स की ठेपी पेंसिल के पीछे
सो पेंसिल भी गिरी कहीं बैग के छेद से
अब जो जोर-जोर से रो रहा है गोलुआ
इसको अपना पेंसिल दे दें?

मोजे में रबर

वन क्लास के गोलू सेकेंड ने
क्लास की मॉनीटर से
सुबह सुबह अकेले में
शर्माते हुए
प्रस्ताव रखा-
अपनी चोटी का रबर दोगी खोल कर?
‘सर मारेंगे’
‘दे दो ना
सर लड़की को नहीं मारेंगे
मेरा मोजा ससर रहा है !’

मेरा बॉयफ्रेंड

(छठी कक्षा के नैतिक शिक्षा पाट्यक्रम के लिए प्रस्तावित निबंध)

मेरा बॉयफ्रेंड एक दोपाया लड़का इंसान है
उसके दो हाथ, दो पैर और एक पूंछ है
(नोट- पूंछ सिर्फ मुझे दिखती है)
मेरे बॉयफ्रेंड का नाम हनी है
घर में बबलू और किताब-कॉपी पर उमाशंकर
उसका नाम बेबी, शोना और डार्लिंग भी है
मैं अपने बॉयफ्रेंड को बाबू बोलती हूं
बाबू भी मुझे बाबू बोलता है
बाबू के बालों में डैंड्रफ है
बाबू चप चप खाता है
घट घट पानी पीता है
चिढ़ाने पर 440 वोल्ट के झटके मारता है
उसकी बांहों में दो आधे कटे नीबू बने हैं
जिसमें उंगली भोंकने पर वो चीखता है
मेरा बाबू रोता भी है
हिटिक हिटिक कर
और आंखें बंद कर के हंसता है
उसे नमकीन खाना भौत पसंद है
वो सोते वक्त नाक मुंह दोनों से खर्राटे लेता है
मैं एक अच्छी गर्लफ्रेंड हूं
मैं उसके मुंह में घुस रही मक्खियां भगा देती हूं
मैंने उसके पेट पर मच्छर भी मारा है
मुझे उसे देख कर हमेशा हंसी आती है
उसके गाल बहुत अच्छे हैं
खींचने पर 5 सेंटीमीटर फैल जाते हैं
उसने मुझे एक बिल्लू नाम का टेडी दिया है
हम दुनिया के बेस्ट कपल हैं
हमारी एनिवर्सरी 15 मई को होती है
आप हमें विश करना
*मेरा बॉयफ्रेंड से ये शिक्षा मिलती है कि
बॉयफ्रेंड के पेट पर मच्छर मारना चाहिए
और उसके मुंह से मक्खी भगानी चाहिए ।


बूबू

दूदू पिएगी बूबू
ना
बिकिट खाएगी
डॉगी देखेगी
ना
अच्छा बूबू गुड गर्ल है
निन्नी निन्नी करेगी
ना
रोना बंद कर शैतान, क्या करेगी फिर ?
मम्मा पास

बूबू-2

खिलौने सीज़ हो गए तो
पेन के ढक्कन से सीटी बजाई
डांट पड़ी
तो कॉलबेल ही सही
ड्राइंग बनाई दो चार
और कपड़े रंग डाले
अखबार देखा तो प्रधानमंत्री का श्रृंगार कर दिया
मूंछे बना दी हीरोइनों की
मन हुआ तो
जूतों के जोड़े बिखेरे
नोचा एक खिला हुआ फूल
चबाई कोंपल नई करी पत्ते की
हैंडवॉश के डब्बे में पानी डाला
पिचकारी चलाई थोड़ी देर
रसना घोला आइसक्रीम के लिए
तो शीशी गिराई चीनी की
चॉकलेट नेस्तनाबूद किए फ्रिज से
रिमोट की जासूसी की
शोर मचाया जरा हौले हौले
कूदा इधर उधर कमरे में
खेलती रही चुपचाप
पापा जाने क्या लिख रहे थे सिर झुकाए
बैठी देखती रही
फिर सो गई बूबू
सपने में रोया
पलंग से गिरी अचानक
तो बुक्का फाड़ के रोया
अभी पापा की गोद में
कैसी निश्चिंत सोयी है छोटी बूबू

उस लड़के की याद

तीन दिन की शेव में
हर लड़का हॉट लगता है
(ऐसा मेरा मानना है)
और जिम के बदले
अस्पताल में पड़ा हो हफ्ते भर
तो आंखें दार्शनिक हो जाती हैं
पीली और उदास
जलती हुई और निस्तेज
बिना नमक की हंसी और सूखी मुस्कुराहटें
चले तो थक जाए
भरी शाम शॉल ओढ़ कर शून्य में ताके
एक बार खाए, तीन बार उल्टी करे
दुबक जाए इंजेक्शन के डर से
उस लड़के के उदास चेहरे पर हाथ फेरती लड़की
मन ही मन सोचती है
मैं मर जाउं पर इसे कुछ न हो
बीमार लड़के प्रेमिकाओं पर शक करने लगते हैं
मन नहीं पढ़ पाते बीमार लड़के

सफल कवि बनने की कोशिशें

ऐसा नइ कि अपन ने कोशिश नइ की
सूर्योदय देखा मुंह फाड़े
हाथ जोड़े
जब तक रुक सका सूसू
चांद को निहारा
मच्छरों के काट खाने तक
हंसध्वनि सुना किशोरी अमोनकर का
थोड़ी देर बाद लगावेलू जब लीपीस्टिक भी सुना
कला फिल्में देखीं
कला पर हावी रहा हॉल का एसी
वार एंड पीस पढ़ा
अंतर्वासना पर शालू की जवानी भी पढ़ी
बहुत कोशिश की
मुनीरका से अमेरिका तक
कोई बात बने
अंत में लंबी गरीबी के बाद अकाउंट हरा हुआ
बिस्तर का आखिरी खटमल
मच्छरदानी का अंतिम मच्छर मारने के बाद
लेटे हुए
याद आई बूबू की
दो बूंदें पोंछते पोंछते भी चली ही गईं कानों में
तय करना मुश्किल था
रात एक बजे कविता लिखने में बिजली बर्बाद की जाए
या तकिया भिगोने में
अपन ने तकिया भिगोया
आलोचक दें न दें
अलमारी पर से निराला
और बाईं दीवार से मुक्तिबोध
रोज आशीर्वाद देते हैं
कला की चौखट पर
बीड़ी पिएं कि सुट्टा
व्हिस्की में डूब जाएं कि
पॉकेट मारी करें
सबकी जगह है ।

औरतें

उन्हें एशिया का धैर्य लेना था
अफ्रीका की सहनशीलता
यूरोप का फैशन
अमेरिका का आडंबर
लेकिन वे दिशाहीन हो गईं
उन्होंने एशिया से प्रेम लिया
यूरोप से दर्शन
अफ्रीका से दृढ़ता ली
अमेरिका से विद्रोह
खो दी अच्छी पत्नियों की योग्यता
बुरी प्रेमिकाएं कहलाईं वे आखिरकार

जब तक भाषा देती रहेगी शब्द

साथ देगा मन
असंख्य कल्पनाएं करूंगी
अपनी क्षमता को
आखिरी बूंद तक निचोड़ कर
प्यार करूंगी तुमसे
कोई भी बंधन हो
भाषा है जब तक
पूरी आजादी है ।

प्यार

गंगा का
सूरज का
फसलों का
फूलों का
बोलियों का अपनी
और
तुम्हारा
मोह नहीं छूटेगा
जैसा भी हो जीवन
जब तक रहेगी गंध तुम्हारे सीने की जेहन में
मन नहीं टूटेगा।

यह व्यवस्था दलितों को न्याय नहीं दे सकती

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/11/2013 06:13:00 PM


हाल में लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर उच्च न्यायालय द्वारा रणवीर सेना से जुड़े अभियुक्तों को बरी कर दिए जाने के फैसले पर पटना (बिहार) स्थित एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान के निदेशक डीएम दिवाकर की टिप्पणी. बीबीसी हिंदी डॉट कॉमसे साभार.
 
बिहार के जहानाबाद ज़िले के लक्ष्मणपुर और बाथे गांव में 58 लोग मारे गए थे, मारे जाने वालों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी थे. ऐसे मामले में सभी अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया जाना न केवल दलितों के ख़िलाफ़ है बल्कि इस न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर भी एक बड़ा धब्बा है.

न्यायलय का यह फ़ैसला दुर्भाग्यपूर्ण और शॉकिंग है. न्यायालय इस बात पर चुप है कि ये 58 लोग कैसे मारे गए और उसके अभियुक्त कौन थे.

अगर यह व्यवस्था इतनी अपंग है कि वो 58 लोगों के नरसंहार का साक्ष्य नहीं खोज पा रही है तो उसे कोई हक नहीं कि वो दलितों और ग़रीबों को इस संविधान, न्यायालय और पुलिस की दुहाई दे. आख़िरकार यह व्यवस्था किस आधार पर ग़रीबों को इस व्यवस्था पर भरोसा करने को कह सकती है.

हम गर्व करते हैं कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं लेकिन इस व्यवस्था में दलितों और ग़रीबों को न्याय नहीं मिला तो वे इस संविधान पर से विश्वास खो देंगे.

संसदीय राजनीति की इस प्रक्रिया और इसके संविधान में कहा गया है कि हम एक साथ रहेंगे, हम कोई विभेद नहीं करेंगे, समानता का अवसर होगा.

हमारा पहला मौलिक अधिकार है जीने का अधिकार. इस संसदीय संविधान के तहत यह अधिकार ही सुरक्षित नहीं है.

अगर यह संविधान ग़रीबों को उनके मौलिक अधिकार की सुरक्षा नहीं दे सकता तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए, इसकी व्याख्या होनी चाहिए.

हमारे देश के राष्ट्रपति कई बार कह चुके हैं कि अगर ग़रीब तक न्याय नहीं पहुँचेगा तो लोकतंत्र की सुरक्षा नहीं हो सकती.

अगर लोकतंत्र समाज को यह विश्वास नहीं दिलाता है कि यह न्याय व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था ग़रीबों को न्याय और सुरक्षा दे सकता है तो यह लोकतंत्र अपना नैतिक आधार खो देगा.

अगर लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा तो वो कानून अपने हाथ में लेंगे और लोग कानून अपने हाथ में लेंगे तो समाज में अवव्यवस्था फैलेगी.

कुछ लोग इसे जाँच व्यवस्था की ख़ामी मात्र बता रहे हैं. इसे ख़ामी तब माना जा सकता था जब कुछ मामले में यह व्यवस्था न्याय करती और कुछ मामलों में काम नहीं करती.

जिस तरह दलितों के नरसंहार के विभिन्न मामले में अभियुक्त बरी होते जा रहे हैं उससे पता चलता है कि यह एक साज़िश है.

जब किसी मज़दूर को पकड़ना होता है तो पुलिस के पास ढेरों मुखबिर होते हैं लेकिन जब अमीरों को पकड़ना होता है तो इनके मुखबिर न जाने कहाँ चले जाते हैं.

अगर सरकार पुलिस व्यस्था के प्रति सख़्ती नहीं बरतती तो दलितों का सरकार से भी भरोसा उठ जाएगा.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके पहले ऐसे ही एक मामले में उच्च न्यायलय के फैसले के ख़िलाफ उच्चतम न्यायालय जाने की बात कही थी. सरकार गई भी.
बेलावर, बिहार, रणवीर सेना

बिहार के बेलावर गाँव में गठित हुई रणवीर सेना के ऊपर इन नरसंहार में शामिल होने का आरोप लगता रहा है.

लेकिन यह केवल ऊपरी अदालतों तक जाने का मामला नहीं है.

अगर सरकार केवल उच्चतम न्यायालय में जाकर चुप रह जाती है और ऐसे मामलों की जाँच के लिए अपने प्रशासन और पुलिस महकमे पर दबाव नहीं बनाती तो दलित इस सरकार पर से भरोसा खो देंगे और इस सरकार के प्रति दलित का रवैया बदल जाएगा.

मेरा मानना है कि इस फ़ैसले का न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा. यह फ़ैसला देश के ग़रीबों को अपने ढंग से एकजुट होने का आधार देगा जो इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होंगे.

मैं मानता हूँ कि भारतीय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, सुरक्षा और सत्ता का स्वरूप आज भी दलित के पक्ष में न्याय देने की स्थिति में नहीं आ पाया है.

दलित आंदोलन को इसे अपने गहराई और मजबूती से इसे हल कर सकता है. यह व्यस्था इसे मदद करने की स्थिति में नहीं है. यह निर्णय इस बात का एक प्रमाण है.

रुपा झा से बातचीत पर आधारित. बीबीसी हिंदी से साभार.

प्यार करना एक राजनैतिक काम है.

Posted by चन्द्रिका on 10/10/2013 02:27:00 AM

कीर्ति सुन्द्रियाल

समाज में प्रेम कहानियों के अनगिनत किस्से और मिशालें दी जाती रही हैं। फिल्मों के पर्दों से लेकर सामाजिक बहसों में बड़ा वर्ग प्रेम के साथ खड़ा हुआ दिखता है। इसके बावजूद जब हरियाणा के एक गांव में दो प्रेमियों की हत्याएं होती हैं और हत्याओं के समर्थन में पूरा गांव खड़ा होता है, तो वह हत्याओं को वाजिब करार देता है। घर के लोग और रिश्तेदार इस हत्या को जायज मानते हैं। ये वे लोग हैं जिनके पास मध्यम वर्ग की सभी सुविधाएं, आधुनिकता के सारे माध्यम मौजूद हैं। फिर यह कैसा समाज है जो प्यार करने पर जान ले लेता है? भारतीय समाज असफल प्रेम कहानियों पर आंसू बहाने वाला समाज रहा है। हीर रांझा जैसी जोड़ियों को प्यार की मिशाल के तौर पर पेश करना एक चालाकी भी है, क्योंकि असफल प्रेम कहानियों से पितृसत्तात्मक व्यवस्था और संस्कृति को किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं होता। प्यार शायद ऐसा रिश्ता है जिसमें यथास्थितिवाद को तोड़ने का मौलिक गुण है, इसलिए जड़ व्यवस्थाएं इससे डरती हैं। इसलिए प्यार एक राजनीतिक काम हो जाता है। खासतौर से उनके लिए जो व्यवस्था के बदलाव के पक्ष में खड़े होते हैं। उनके लिए भी जो व्यवस्था बदलाव के पक्ष में नहीं हैं पर प्रेम करते हैं या करना चाहते हैं। कहानियों, फिल्मों से इतर भारतीय समाज में प्यार करना अभी भी अच्छा नहीं माना जाता। जब कोई प्यार करता है तो समाज के कैमरे में उसकी हर गतिविधि कैद होती है और यहां कुछ तो आपके सामने कहा जा रहा होता है और कुछ चटकारे लेते हुए फुसफुसाहटों के साथ बताया जा रहा होता है। ऐसा क्यों है कि प्यार की लोग घंटों चीड़फाड करते हैं? युवा समूहों में भी प्यार के बारे में सबसे ज्यादा बातचीत होती है पर वह बातचीत सेक्सुअल प्लेजर लेने के लिए ज्यादा होती है। इस मुद्दे पर गम्भीर बहसों के बजाय वे सबसे ज्यादा इन्हीं चीजों पर बात करते हैं, क्योंकि वे इसे राजनीतिक काम के रूप में कभी नहीं देखते। यह उनके जीवन में राजनीति से एक इतर प्रसंग होता है। भारतीय समाज में प्यार को पा लेना एक कठिन लड़ाई है। यह लड़ायी हमें अपने आसपास के लोगों, मां-बाप, भाई-बहन, रिश्तेदारों, दोस्तों से लड़नी पड़ती है। बड़े रूप में यह लड़ाई राज्य के साथ बनती है क्योंकि अपने छोटे संस्थानों पर हुए हमले से वह हिलता है। अगर दो लोगों के प्रेम संबंधों में जाति, वर्ग, सामाजिक हैसियत की साम्यता है तो भी ऐसे सम्बन्धों को सम्मान और मान्यता समाज नहीं देता जितना वह परिवार द्वारा तय किये गये रिश्तों को देता है। अगर प्रेम संबंध इन सब के विपरीत है यानि उनके बनाए गए मापदंडों के जो जाति, भाषा, संस्कृति, वर्ग और सुन्दरता के तथाकथित मानकों को तोडते हैं, तो वे प्रेम निश्चित ही अपने चरित्र में परिवर्तन कामी होते हैं। समाज के डर से ऐसे लाखों प्रेम आखों में पैदा होते हैं और वहीं पर खत्म भी हो जाते हैं। कुछ लोग जो थोडा साहस करते हैं, वह प्यार को वास्तविकता में जीने का प्रयास करते हैं, लेकिन जैसे ही उसे सार्वजनिक करने की बात आती है तो वे समाज के डर से पीछे हट जाते हैं। समाज के डर के अलावा उनके भीतर भी जाति और वर्ग की सत्ता काम कर रही होती है, उससे कई लोग लड़ना नहीं चाहते क्योंकि वह समाज की गैरबाराबरी की सत्ता से टकराना नहीं चाहते। बल्कि इसी व्यवस्था में समाहित होकर सुविधाजनक जीवन जीना चाहते हैं। इसलिए वे एक समय के बाद प्रेम को भी अपने स्वार्थ के हिसाब से तौलने लगते हैं, और जैसे ही प्यार का पलड़ा हल्का होता है उसे जीवन से उठाकर फेंक देते हैं। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने प्यार के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहते हैं। वे लोग प्यार को जीवन और समाज से जोड़कर देखते हैं। इसलिए वह अपने प्रेम संबंधों को जीने के लिए किसी भी तरह के खतरे को स्वीकारते हैं। वह स्थापित प्यार विरोधी संस्थाओं परिवार, पितृसत्ता, जाति, वर्ग, धर्म सभी मान्य और मजबूत मठों को चुनौती देते हैं, क्योंकि वह समाज की हर मान्यता को खारिज करते हैं इसलिए वह सब कुछ नये तरह का चाहते हैं। समाज, संस्कृति, राजनीतिक व्यवस्था वह सब कुछ को बदलते देखना चाहते हैं। वह इस तरह का समाज चाहते हैं जिसमें समानता हो और प्यार करने व जीने की आजादी हो। यहीं से प्यार व्यवस्था विरोध का एक नया मोड लेता है। व्यक्तिगत प्यार के आड़े रोज व्यस्थायें टकराती हैं, शहर, गांव, गली-मुहल्लों और कस्बों में प्यार करने वाले पितृसत्ता और जाति व्यवस्था से टकराते हैं। रोहतक के प्रेमी युगल की तरह उन्हें अपनी हत्या के लिए भी तैयार रहना पड़ता है। भारतीय समाज में प्यार करना बेशर्मी जैसा बना हुआ है, इसीलिए शायद यहां दो लोगों के प्यार करने पर परिवार की इज्जत चली जाती है। किसी पुरूष के बलात्कार करने पर यहां परिवार की इज्जत नहीं जाती पर अन्तर्जातीय, अन्तधर्मीय गरीब-अमीर के आपस में प्यार करने से इस समाज की इज्जत चली जाती है। प्यार करना एक व्यक्तिगत फैसला भले ही हो पर यह राजनीतिक मसला ही बनता है। आपके न चाहते हुए भी प्यार सत्ताओं के संबंधों से ही संचालित होता है। जड़ समाज के लिए यह गंभीर मसला है क्योंकि यह सामाजिक बदलाव का एक दरवाजा खोलता है, स्थापित सत्ता संबन्धों को चुनौती देता है, और जब भी प्यार से इस तरह की चुनौती मिलती है उसका गला घोंट दिया जाता है। इसलिए जो लोग प्यार करने में विश्वास रखते हैं, उन्हें प्यार को गंम्भीरता से लेना चाहिए। प्यार को राजनीतिक दायरे में सोचना चाहिए, प्यार करने की स्वतंत्रता के लिए व्यक्तिगत संघर्ष जितना जरूरी है, उसे बचाये रखने लिए सामुहिक संघर्ष भी उतना ही जरूरी है। प्यार में होना ही प्यार किये जाने के लिए काफी नहीं होता, इसके लिए हमें अपने समाज और राजनीतिक संरचना को समझना भी जरूरी है, तभी हम प्यार को बचा सकते हैं और सामाजिक बदलाव के हिस्से के रूप में उसकी भूमिका बना सकते हैं। नहीं तो कुछ समय बाद अन्य रिश्तों की तरह प्रेम भी नीरस, परेशान करने वाला और जीवन में बोझिल सा हो जाता है। और अन्त में जब बदलाव और असहमतियों की गुंजाइश खत्म हो जाती है तो यही प्यार उत्पीडक हो जाता है। जिस उत्पीड़न का बड़ा हिस्सा महिलाओं के ही हिस्से में आता है। कुछ लोग या तो इसका समाधान संबंध तोडने में खोजते हैं या फिर इसे सामंती समाज की तरह वह भी इज्जत का मामला बना देते हैं और उसके साथ घिसटते रहते हैं। जिस तरह लोग प्यार किये जाने को स्वीकार नहीं करते उसी तरह प्यार करने वाले प्यार के टूट जाने को भी स्वीकार नहीं कर पाते हैं। सामंती समाजों की तरह यह भी उनके लिए इज्जत का ही रूप बनता है। इस दबाव में कई लोग बिना प्यार के कई सालों तक साथ गुजार देते हैं, वे अपने जीवन को जीने के बजाय सामाजिक बंधनों और सामंती मूल्यों को ही जी रहे होते हैं। यह उनके अराजनीतिक नजरिये से प्यार को देखने का ही परिणाम होता है। समाज की बजाय प्रेम संबंधों में रहने वाले व्यक्तियों के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि अब उनके बीच प्यार नहीं रहा। प्यार क्यों था और अब क्यों नहीं रहा, इसका विश्लेषण करने की बजाय वह इसे ढ़ोते रहना चाहते हैं। प्यार करना उनके लिए मायने रखता है, लेकिन खत्म होने को वे विश्लेषित ही नहीं करना चाहते, क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया होती है आत्मविश्लेषण व समाज और व्यक्ति के बीच संघर्ष की। उनमे प्रेम को बचाने की कोई तड़प भी नहीं होती। अन्य रिश्तों की तरह प्यार को भी ढ़ोने की आदत लोगों को ज्यादा सुविधाजनक लगती है। जबकि अन्य रिश्तों से अलग यह उनका चुनाव होता है, यह थोपा गया नही होता, इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों की ज्यादा गुंजाइश इसमे बनती है। इसलिए कठिन सवालों से वही प्रेमी टकराने की कोशिश करते हैं जो प्रेम को राजनीतिक मानते हैं, और उसे अन्य राजनीतिक मसलों की तरह महत्व देते हैं। दो लोगों का प्रेम एक मजबूत प्रतिरोधी सत्ता का निर्माण करती है, जिनकी जड़े सामाजिक राजनैतिक संरचनाओं में होती हैं। अगर प्रेम संबंधों में विरुद्ध की सत्ता को समझने और इसे कमजोर करने का प्रयास नहीं होता तो जाति, वर्ग, पितृसत्ता की ही जीत होती है, क्योंकि उनके अनुभवों और मान्यताओं का इतिहास बड़ा है। ऐसे में प्यार जोकि अपने शुरूआती समय में समानता और सम्मान की पराकाष्ठा पर होता है, वह एक ठंडी बर्फ की नदी में बदल जाता है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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