हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

प्रेमचंद की परम्परा और हंस : वरवर राव का खुला खत

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/31/2013 10:54:00 PM


वरवर राव

मुक्तिबोध की हजारों बार दुहराई गई पंक्ति को एक बार फिर दुहरा रहा हूं : उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे/ तोड़ने ही होंगे/ गढ़ और मठ/ सब।'

कुछ साल पहले की बात है जब मेरे साथ अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक समिति और अखिल भारतीय जनप्रतिरोध मंच में काम करने वाले क्रांतिकारी उपन्यासकार और लेखक विजय कुमार ने आगरा से लेकर गोरखपुर तक हिंदी क्षेत्र में प्रेमचंद की जयंती पर एक सांस्कृतिक यात्रा आयोजित करने का प्रस्ताव दिया था। यह हिंदुत्व फासीवाद के उभार का समय था। जो आज और भी भयावह चुनौती की तरह सामने खड़ा है। उस योजना का उद्देश्य उभर रही फासीवाद की चुनौती से निपटने के लिए प्रेमचंद को याद करना और लेखकीय परम्परा को आगे बढ़ाकर इसके लिखाफ एक संगठित सांस्कृतिक आंदोलन को बनाना था।

जब ‘हंस’ की ओर से प्रेमचंद जयंती पर 31 जुलाई 2013 को ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ विषय पर बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया तो मुझे लगा की अपनी बात रखने का यह अच्छा मौका है। प्रेमचंद और उनके संपादन में निकली पत्रिका ‘हंस’ के नाम के आकर्षण ने मुझे दिल्ली आने के लिए प्रेरित किया। इस आयोजन के लिए चुना गया विषय ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ ने भी मुझे आकर्षित किया। जब से मैंने नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के प्रभाव में लेखन और सांस्कृतिक सक्रियता में हिस्सेदारी करना शुरू किया तब से मेरी अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगता ही रहा है। यह स्वाभाविक था कि इस पर विस्तार से अपने अनुभवों को आपसे साझा करूं।

मुझे ‘हंस’ की ओर से 11 जुलाई 2013 को लिखा हुआ निमंत्रण लगभग 10 दिन बाद मिला। इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेंद्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमत्रंण कार्ड में डाल देने की घोषणा कर रखी थी। बहरहाल, मैंने इस बात की तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन, क्यों और किस मंशा से बुला रहा है? मेरे साथ मंच पर इस विषय पर बोलने वाले कौन हैं?

आज दोपहर में दिल्ली में आने पर ‘हंस’ की ओर भेजे गए व्यक्ति के पास छपे हुए निमत्रंण कार्ड को देखा तब पता चला कि मेरे अलावा बोलने वालों में अरूंधती राय के साथ-साथ अशोक वाजपेयी व गोविंदाचार्य का भी नाम है। प्रेमचंद जयंती पर होने वाले इस आयोजन में अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य का नाम वक्ता के तौर पर देखकर हैरानी हुई। अशोक वाजपेयी प्रेमचंद की सामंतवाद-फासीवाद विरोधी धारा में कभी खड़े  होते नहीं दिखे। वे प्रेमचंद को औसत लेखक मानने वालों में से है। अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कारपोरेट सेक्टर के साथ जुड़ाव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी तरह क्या गोविंदाचार्य के बारे में जांच पड़ताल आप सभी को करने की जरूरत बनती है? हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति और साम्राज्यवाद की जी हूजूरी में गले तक डूबी हुई पार्टी, संगठन के सक्रिय सदस्य की तरह सालों साल काम करने वाले गोविंदाचार्य को प्रेमचंद जयंती पर ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ विषय पर बोलने के लिए किस आधार पर बुलाया गया!

मैं इस आयोजन में हिस्सेदारी कर यह बताना चाहता था कि अभिव्यक्ति पर सिर्फ प्रतिबंध ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का खतरा उठा रहे लोगों की हत्या तक की जा रही है। आंध्र प्रदेश में खुद मेरे ऊपर, गदर पर जानलेवा हमला हो चुका है। कितने ही सांस्कृतिक, मानवाधिकार संगठन कार्यकर्ता और जनसंगठन के सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया गया। हजारों लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। अभी चंद दिनों पहले हमारे सहकर्मी गंटि प्रसादम की क्रूर हत्या कर दी गई। गंटी प्रसादम जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा-आरडीएफ के उपाध्यक्ष, शहीद बंधु मित्र में सक्रिय सहयोगी और विप्लव रचियतल संघम के अभिन्न सहयोगी व सलाहकार और खुद लेखक थे। विरसम ने उनकी स्मृति में जब एक पुस्तक लाने की योजना बनाया और इस संदर्भ में एक वक्तव्य जारी किया तब हैदराबाद से कथित ‘छत्तीसगढ चीता’ के नाम से विरसम सचिव वरलक्ष्मी को जान से मारने की धमकी दिया गया। इस धमकी भरे पत्र में वरवर राव, प्रो. हरगोपाल, प्रो. शेषैया, कल्याण राव, चेलसानी प्रसाद सहित 12 लोगों को जान से मारने की चेतावनी दी गई है। लेखक, मानवाधिकार संगठन, जाति उन्मूलन संगठनों के सक्रिय सदस्यों को इस हमले में निशाना बनाकर जान से मारने की धमकी दी गई। इस खतरे के खिलाफ हम एकजुट होकर खड़े हुए और हमने गंटी प्रसादम पर पुस्तक और उन्हें लेकर सभा का आयोजन किया। इस सभा के आयोजन के बाद एक बार फिर आयोजक को जान से मार डालने की धमकी दी गई। अभिव्यक्ति का यह भीषण खतरा साम्राज्यवादी-कारपोरेट लूट के खिलाफ अभियान, राजकीय दमन की खिलाफत और हिंदुत्व फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के चलते आ रहा है। यह जन आंदोलन की पक्षधरता और क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा को आगे ले जाने के चलते हो रहा है।

हैदराबाद में अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ एक सभा को संबोधित करने के समय हिंदुत्व फासीवादी संगठनों ने हम पर हमला किया और इसी बहाने पुलिस ने हमें गिरफ्तार किया। इसी दिल्ली में जंतर-मंतर पर क्या हुआ, आप इससे परिचित होंगे। अफजल गुरू के षरीर को ले जाने की मांग करते हुए कश्मीर से आई महिलाओं और अन्य लोगों को न तो जंतर मंतर पर एकजुट होने दिया गया और न ही मुझे और राजनीतिक जेल बंदी रिहाई समिति के सदस्यों को प्रेस क्लब, दिल्ली में बोलने दिया गया। प्रेस क्लब में जगह बुक हो जाने के बाद भी प्रेस क्लब के आधिकारिक कार्यवाहक, संघ परिवार व आम आदमी पार्टी के लोग और पुलिस के साथ साथ खुद मीडिया के भी कुछ लोगों ने हमें प्रेस काफ्रेंस नहीं करने दिया और वहां धक्कामुक्की किया।

मैं जिस जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा का अध्यक्ष हूं वह संगठन भी आंध्र प्रदेश, उडीसा में प्रतिबंधित है। इसके उपाध्यक्ष गंटी प्रसादम को जान से मार डाला गया। इस संगठन के उड़ीसा प्रभारी दंडपाणी मोहंती को यूएपीए सहित दर्जनों केस लगाकर जेल में डाल दिया गया है। इस संगठन का घोषणापत्र सबके सामने है। पिछले सात सालों से जिस काम को किया है वह भी सामने है। न केवल यूएपीए बल्कि गृहमंत्रालय के दिए गये बयानों व निर्देषों में बार बार जनआंदोलन की पक्षधरता करने वाले जनसंगठनों, बुद्धिजीवियों, सहयोगियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, प्रतिबंधित करने, नजर रखने का सीधा अर्थ हमारी अभिव्यक्ति को कुचलना ही है। हम ‘लोकतंत्र’ की उसी हकीकत की आलोचना कर रहे हैं जिससे सारा देश वाकिफ है। जल, जंगल, जमीन, खदान, श्रम, … और विषाल मध्यवर्ग की कष्टपूर्ण बचत को लूट रहे साम्राजयवादी-कारपोरेट सेक्टर और उनकी तानाषाही का हम विरोध करते हैं। हम वैकल्पिक जनवादी मॉडल की बात करते हैं। हम इस लूट और तबाही और मुसलमान, दलित, स्त्री, आदिवासी, मेहनतकष, …पर हमला करने वाली और साम्राज्यवादी विध्वंस व सामूहिक नरसंहार करने वाली हिंदुत्व फासीवादी राजनीति का विरोध करते हैं।

हम ऐसे सभी लोगों के साथ हैं जो जनवाद में भरोसा करते हैं। हम उन सभी लोगों के साथ हैं जो अभिव्यक्ति का खतरा उठाते हुए आज के फासीवादी खतरे के खिलाफ खड़े हैं। हम प्रेमचंद की परम्परा का अर्थ जनवाद की पक्षधरता और फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के तौर पर देखते है। प्रेमचंद की यही परम्परा है जिसके बूते 1930 के दषक में उपनिवेशवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी लहर की धार इस सदी में हमारे इस चुनौतीपूर्ण समय में उतना ही प्रासंगिक और उतना ही प्रेरक बना हुआ है।

अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य इस परम्परा के मद्देनजर किसके पक्ष में हैं? राजेन्द्र यादव खुद को प्रेमचंद की परम्परा में खड़ा करते हैं। ऐसे में सवाल बनता है कि वे अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य को किस नजर से देखते हैं? और, इस आयोजन का अभीष्ट क्या है? बहरहाल, कारपोरेट सेक्टर की संस्कृति और हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोगों के साथ मंच पर एक साथ खड़ा होने को मंजूर करना न तो उचित है और न ही उनके साथ ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ जैसे विषय पर बोलना मौजूं है।

प्रेमचंद जयंती पर ‘हंस’ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में जो भी लोग मुझे सुनने आए उनसे अपनी अनुपस्थिति की माफी दरख्वास्त कर रहा हूं। उम्मीद है आप मेरे पक्ष पर गौर करेंगे और अभिव्यक्ति के रास्ते आ रही चुनौतियों का सामना करते हुए हमसफर बने रहेंगे।

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,

वरवर राव

31 जुलाई 2913, दिल्ली

चाँद क्यों चाहता था कि धरती रुक जाए?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2013 11:29:00 AM

तरुण भटनागर की एक कहानी आई थी, चांद चाहता था कि धरती रुक जाए. हंस के सितंबर, 2012 अंक में प्रकाशित इस कहानी में बस्तर के आदिवासी समाज का जैसा चित्रण किया गया था, उसे बहुत आपत्तिजनक, जनविरोधी और साम्राज्यवाद परस्त माना गया. सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौर में, आदिवासियों के जनसंहारों के दौर में यह कहानी सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से हमलावर, फासीवादी और दमनकारी भारतीय राज्य के पक्ष में खड़ी होती है. अनिल अनलहातु ने इस कहानी की आलोचना करते हुए यह लेख हाशिया को बहुत-बहुत पहले भेजा था, लेकिन इसका पोस्ट किया जाना टलता आया. देरी के लिए अफसोस जाहिर करते हुए, यह लेख.


“The only way of expressing emotion in the form of art is by finding an “objective correlative”; in other words a set of objects, a situation, a chain of events which shall be the formula of that particular emotion, such that when the external facts, which must terminate in sensory experiences are given the emotion is immediately evoked.”
– T.S. Eliot  in  “Hamlet and His Problems”.

कहानी का शीर्षक ही “चाँद चाहता था कि धरती रुक जाए” एक भयंकर विध्वंस एवं सर्वनाश की ओर ईशारा करती है. क्या चाँद को यह नहीं पता कि धरती की गति ही धरती पर पड़ रहे सूर्य के जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को संतुलित किए हुए है, वरना धरती कब की सूरज के आग्नेय गोले में जलकर भस्म हो गयी होती. तो फिर चाँद क्यों चाहता है कि धरती रुक जाए? उत्तर कहानी देती है–‘चाँद आज ढलना नहीं चाहता. वह चाहता है कि धरती रुक जाए और वह वहीं टंगा-टंगा इस मांसल मादकता का भोग ( चक्षुभोग ) करता रहे.’

प्रश्न उठ खड़ा होता है कि आखिर कहानीकार को चाँद ऐसा ही यानी कामुक एवं भोगी ही  क्यूँ दिखा? उसे चाँद का मुंह टेढ़ा क्यों नहीं दिखा? जबकी “आंगा देव को पता था कि ‘भविष्य में उदास आँखों, पतले-सांवले चेहरे वाला एक कवि होगा और उसे लिखनी होगी एक कविता ‘अँधेरे में’’. या फिर उसे चाँद एक जली हुई रोटी का टुकड़ा क्यों नहीं नजर आया? तो इस परिघटना को समझने के लिए हमें T.S.ELIOT  के OBJECTIVE  CORRELATIVE  या रामचंद्र शुक्ल के विभावना व्यापार का सहारा लेना पड़ेगा. यथार्थवाद (कृत्रिम हो तब भी) के निरूपण की एक विशेषता है भाव का विभाव (वस्तु) में रूपांतरण. जैसे पूस की रात में हल्कू को ‘आकाश में तारे भी ठिठुरते हुए से जान पड़ते थे.’ ग.मा. मुक्तिबोध को भी चाँद का मुंह टेढ़ा ही दिखा. किन्तु जिस जिलाधिकारी के स्वागत में बस्तर के माड़ियाओं के सरकारी घोटुल में संसार के गहनतम अन्धेरे में ‘मादक और पागलपन की हद तक उत्तेजित कर देनेवाला अर्धनग्न नृत्य चल रहा हो. “जहां छाती हिला देने वाली मांदर की बेलौस थाप और थर्राती भोंगे की आवाज़ पर सुध-बुध खो चुके जवान जिस्म मशीन होकर लगातार नाचते जाते हैं, अंतहीन और उत्तेजक. चारों ओर पसीने, धुंएँ और शराब की गंध फैलती...”’ तो जाहिरन अपने भावों का प्रक्षेपण वह बाह्य जगत में भी उसी रूप में करेगा और चाँद भी उसे इसीलिए कामोदीप्त नज़र आता है.

घोटुल के बंद होने से जितने माड़िया दुखी नहीं हैं उससे ज्यादा दुखी कहानीकार प्रतीत होता है. कहानी में बस्तर का जिलाधिकारी सरकारी घोटुल बनाने के लिए उद्धत है. घोटुल से यह नॉस्टेल्जिया कैसा? यह कौन सी प्रवृति है जो आदिवासियों को घोटुल के उन्हीं आदिम अंधेरों में बंद रखना चाहती है. क्या यह नव साम्राज्यवादी नव उपनिवेशवादी दृष्टि नहीं है जहां मनुष्य एक माल या वस्तु में बदल चुका है और बाज़ार की शक्तियाँ उसका मूल्य निर्धारण करती हैं. जैसा राजेन्द्र जी ने प्रश्न उठाया है, ‘क्या उन्हें शेर, चीतों की तरह उनके स्वाभाविक जीवन और परिवेश में सुरक्षित एवं संरक्षित रखकर दूर से ही पर्यटकों को इन अभयारण्यों में उनके दर्शन कराने का तमाशा बनाए रखना बहुत मानवीय है ?’

तरुण भटनागर जी राजेन्द्र जी के इस प्रश्न के जवाब में पुनः “मानवविज्ञान में ‘नेशनल पार्क प्रिंसिपल’ ‘जैसी एक चीज रही है’ कहकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है. दरअसल यह वित्तीय पूंजी (FINANCE CAPITAL) के अंतर्गत संचालित नव बाजारवादी प्रवृत्ति है जिसने शहरी मध्य वर्ग से उसका मनुष्यत्व छिनकर उसे बाजार का एक उत्पाद बना दिया है. अपनी परम्परा एवं संस्कृति की जड़ों से कटा हुआ यह वर्ग पूरी तरह से जिसे धूमिल के शब्दों में ‘जीभ और जांघ के चालु भूगोल’ के सहारे जीता है. यह वही प्रवृत्ति है जो अंडमान के जारवा जनजाति के आदिम, प्रकृत एवं नग्न– नृत्य को फॉरेन डिग्निटरिज एवं देशी कंग्रेजों (काले अंग्रेज) के सामने इंडिजिनस डेलिकेसी (Indigenous Delicacy) के रूप में परोसती हुई कृतकृत्य होती है. The Jarwa tribe have lived in peace in the Andamans Islands for thousands of years.  Now tour companies run safaris through their jungle everyday and wealthy tourists pay police to make the women-usually naked –dance for their amusement. This footage, filmed by a tourist, shows  Jarawa women being told to dance by an off-camera police officer. (Source http://www.guardian.co.uk)

यह www.reporteronlive.com पर उपलब्ध है. इसे देखकर बताएं, सारे पाठकों से यहाँ एक प्रश्न है कि क्या आपको भी जारवाओं का यह नग्न नृत्य पागलपन की हद तक मदमस्त कर देनेवाला लगता है? मुझे तो यह हज़ार वर्षों की पीड़ा का सामूहिक विलाप लगता है. क्या शकीरा के गाने में आपको गहरे रुदन का भाव नहीं अभिलक्षित होता है. मेरा तो मानना ही यही है कि गाना एवं नाचना वस्तुतः कथार्सिस है. किन्तु यहाँ कहानीकार को इस पीड़ा में भी कामोत्तेजना के दर्शन होते हैं ‘आग की लौ में चमचमा जाती काली मजबूत देहें, देहों की सटीक खुबसूरत लाइनें, गोलाइयाँ...’ यह वही आनंदातिरेक का भाव है जो उस संस्कृत कथा के जम्बुक को होता है जो जंगल (क्या बस्तर?) में एक हृष्ट-पुष्ट, सुगठित, सुललित हिरण को देखकर सोचता है– ‘कथं एतत सुललितं मांसोहम भक्ष्यामि?’ (इसका हिरण का स्वादिष्ट मांस कैसे खाऊँगा). यहाँ कहानी में भी ‘ऐसी फड़फड़ाती देहों’  की जबर्दस्त बुभुक्षा ‘जो कहीं और देखने को नहीं मिलीं फिर. मिट्टी और अँधेरे की देह. सूत दर सूत तराशी गई देह, जिसका ज़रा सा भी मांस इधर से उधर होकर दैवीय(मांसल गोलाइयों एवं गहराइयों ) रेखाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता...जिसे बाद में दुनिया घूमते हुए बहुत सी जगह उन्हें तलाशता रहा, रिओ-डि-जेनेइरो के समुद्री किनारों से लेकर यूरोप के मादक स्ट्रिपटीज तक.’  दरअसल यह एक व्याध का क्षोभ है, बहेलिये का गुस्सा है, एक शिकारी का जंगल के नष्ट होने एवं शिकार की उपलब्धता के घट जाने का विलाप है. यह राम शरण शर्माओं का ‘लखनपालों’  की विलुप्ति का दैहिक दुःख है. यह दुःख है खाए, पीए, अघाए लोगों का वायुत्सर्ग के लिए खुली जगहों के अभाव होते जाने का दुःख क्योंकि तब शीत – ताप नियंत्रित कक्षों की दुर्गन्ध-रक्षा फिर कैसे होगी. घोटुल बना रहे ताकि वे सभ्य बने रह सकें  उसी तरह जिस तरह हरेक शहर के बाहर एक वेश्यालय होता है ताकि शहर की पतिव्रताओं का सतीत्व सुरक्षित रह सके.

अब यहाँ एक और प्रश्न उड़ खड़ा होता है कि इस कहानी को तरुण भटनागर ने ही क्यों लिखी? और तरुण भटनागर ने यही कहानी क्यों लिखी? तो भइया पहले यह बताएँ कि कहानी लिखता कौन है? क्या लेखक लिखता है? या कि कहानी खुद ही लिखती है? या वह समय लिखता है. जी हाँ, लेखक लिखता था, कहानी ही लिखती थी या फिर वह समय लिखता था जिसमें कहानी लिखी जाती थी. किन्तु इक्किसवीं सदी के शुरू होते न होते जब वित्तीय पूंजीवाद अपने बाजारवादी नव उपनिवेशवाद के साथ पूरे उफान पर आया तो इन तमामों का काम-तमाम हो गया. अब न लेखक लिखता है, न कहानी लिखती है और न ही समय लिखता है. ‘एंड ऑफ़ ऑथर’ को इन्हीं अर्थों में समझा जा सकता है. अतः अब कहानियाँ बाज़ार और इसको नियंत्रित करने वाली सत्ता लिखती है.

इस नव औपनिवेशिक साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजीवादी व्यवस्था ने बाज़ार और सत्ता को इतना सूक्ष्म बना दिया है कि वह पदार्थ की चौथी अवस्था (ठोस, तरल एवं गैस के बाद की अवस्था) प्लाज्मा अवस्था (जहां किसी भी पदार्थ के परमाणु तक धन एवं ऋण आयन में टूट जाते हैं और इस प्रकार पदार्थ धन एवं ऋण आयनों का समुच्चय बन जाता है) के रूप में  हमारे शरीर, मन एवं आत्मा (अगर कहीं है तो) तक पर आधिपत्य जमा लिया है और यही वह जगह है जहां लेखक की स्वायत्तता, स्वतंत्रता या कहें उसका लेखकीय आकाश (space ) ख़त्म हो जता है और सत्ता उसके भीतर से भाषा के रूप में अभिव्यक्त होने लगती है. लेखक तब बाज़ार और सत्ता की जरूरतों के मुताबिक़ साहित्यिक माल तैयार करने लगता है. यहाँ गौरतलब यह भी है यह सब इतने सूक्ष्म स्तर से होता है कि लेखक को इसका भान भी नहीं होता और वह लगातार इस मुगालते में रहता है कि वह स्वायत्त एवं स्वतन्त्र होकर खुद को ही अभिव्यक्त कर रहा है जबकी तथ्य यह होता है कि वह आत्म की अभिव्यक्ति के बजाए बाज़ार एवं सत्ता को ही अभिव्यक्त कर रहा होता है. उपरोक्त पंक्तियों की जमीन पर खड़े होकर जब हम इस रचनाकार की आँखों में झांकते हैं तो हमें वह नज़र दिख पड़ती है जिसकी रोशनी (या ‘अँधेरे में’ शायद) में इस कहानी के अँधेरे को देखा और लिखा गया और इसीलिए ‘माड़िया जबान में अँधेरे के लिए असंख्य शब्द है’ और रोशनी ‘पाप के साथ लुकती–छिपती दुनिया को भरमाती है जबकी अन्धेरा रास्ता दिखाता है.’ 

किसी भी कहानी को कहने की दो प्रविधियां होती हैं, ‘दृश्यात्मक एवं परिदृश्यात्मक’. दृश्यात्मक प्रविधि वह है जब कहानी में कहानीकार खुद शामिल रहता है, उसके सुख-दुःख को भोगता उसका एक हिस्सा और पात्र होता है और इस तरह वह कहानी के समय एवं आकाश से परिचित एवं उपस्थित होता है. वह उसका जरूरी संरचनात्मक घटक होता हुआ उसकी यथार्थ की निर्मिति में सहायक होता है. यहाँ आत्म की अभिव्यक्ति द्वारा ही आत्म की मुक्ति होती है. इस परिप्रेक्ष्य में इस कहानी को देखें तो क्या आप बता सकते हैं कि अगर इस कहानी को घोटुल की देखभाल करने वाले बुजुर्ग व्यक्ति ने लिखा होता तो क्या उसने भी घोटुल के अर्द्धनग्न नृत्य को उसी निगाह से देखा होता जैसे कहानीकार ने देखा है. क्या वह भी ‘आग की लौ में चमचमा जाती काली मजबूत देहें, देहों की सटीक खूबसूरत लाइनें, गोलाइयाँ’ देखता? क्या उसे भी यही लगता कि ‘चाँद चाहता है कि धरती रुक जाए और वह वहीं टंगा-टंगा इस मांसल मादकता का भोग करता रहे’? उत्तर है – नहीं,  यह तरुण भटनागर जी भी मानेंगे. क्योंकि तब वह बुजुर्ग व्यक्ति अपने समाज की पीड़ा और दुःख को भोगता हुआ उसका हिस्सा होता. वह तब ‘लखनपाल’ का दूध से भरे दुद्धुओं को चुसने वाला रा.श. जोशी नहीं हो सकता. रा.श. जोशी बनने के लिए उसे कहानी से बहिर्गमन करना पड़ता है ताकि (कहानी की ज़मीन से) दूर खड़ा होकर कहानी के परिदृश्य पर नज़रें गड़ाए इस मांसल मादकता को भोग सकें. कहानी के बाहर होते ही लेखक दिग्दर्शक की भूमिका में आ जाता है और तब वह यथार्थ का भोक्ता न होकर यथार्थ का चितेरा हो जाता है और यथार्थ के दुःख, संत्रास और पीड़ा से अलग (indifferent) होकर जीवन को कैमरे की आँख से देखते हुए कृत्रिम व बनावटी संसार रचता है. यहाँ उसे (लेखक को) यह सुविधा होती है कि जीवन को कैमरे के किस कोण से फिल्माया जाए ताकि जिन्दगी की बदसूरती एवं दुःख-दारुन्य छिप जाएं और ‘फड़फड़ाती हुई देहें, सूत दर सूत तराशी गईं अनावृत्त देहों की रेखाएं’ दिखा सकें. तरुण भटनागर इस कहानी को कहने के लिए इसी परिदृश्यात्मक प्रविधि का इस्तेमाल करते हैं. इसके उलट ज्ञानरंजन की तमाम कहानियाँ दृश्यात्मक प्रविधि में लिखी गयी हैं-चाहे वह ‘घंटा’ हो या ‘पिता’, ‘यात्रा’, ‘बहिर्गमन’ या ‘अमरुद का पेड़’ हो क्योंकि जाने अनजाने इन कहानियों में ज्ञानरंजन खुद एक पात्र के रूप में उपस्थित रहे हैं और यही कारण है कि जैसा कि वे खुद लिखते हैं कि इन कहानियों के प्रकाशन से उनके परिचित एवं संबंधी असुविधा में पड़ जाते थे, और लोग उनकी कहानियों को उनके जीवन से जोड़कर देखते थे. यद्यपि ज्ञानरंजन ने इन्हें अपनी निजी जिन्दगी से जोड़ने से इन्कार करने की कोशिश की है लेकिन सत्य यह है कि उनकी कहानियाँ इतनी जीवंत, महत्त्वपूर्ण एवं यथार्थपरक बन ही इसीलिए पाईं हैं कि कहानीकार ने इन कहानियों के त्रास को भोगा है, वह इसके हर दृश्य में मौजूद रहे हैं. यानी वह कहानी के भीतर उपस्थित हैं. इसलिए उनकी भाषा सीधी (straight) होती है प्राय: अभिधा शैली में लिखी हुई. जबकी परिदृश्यात्मक प्रविधि में लेखक भाषा के सुपर स्ट्रक्चर (Super structure) का जिसमें तमाम तरह के झूठ-फरेब, मिथ्याचरण एवं अमानवीयता को छद्म नैतिकता की चमकाऊ, चमकीली एवं लच्छेदार भाषा के अलंकरण तले छिपा लेता जाता है. शायद इसीलिए आचार्य केशव दास की (“भुषण बिनु न सोभहीं कविता, वनिता, मित’) कविता यानी भाषा को अलंकरण की आवश्यकता महसूस होती है. जबकी कबीर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है. लेकिन यहाँ तरुण भटनागर जी भाषा की अधिसंरचना (super structure) का प्रयोग करते हैं क्योंकि उन्हें जंगल के त्रास को, दुःख दर्द को भोगा नहीं हैं, आदिम तरीके प्रसव झेलती प्रसूताओं की चीखें नहीं सुनी हैं, जहां शिशु एवं प्रसुताओं की मृत्यु-दर विश्व में सर्वाधिक है. किन्तु...नहीं, उन्हें तो जंगल बड़ा रूमानी लगता है– ‘जहां वर्जनाएं नहीं हैं, वहां कुछ भी नहीं टूटता. जहां प्यार बेतरह समुद्री ज्वार होकर फैलता रहता है, जंगल की मादकता और भड़कता प्यार महासागर का प्यार है, जहां तटरेखा नहीं बन पाई है.’ जहाँ दायरा विहीन बिस्तर है, उनकी साँसों और छाती से चिपककर धड़कने वाला बिस्तर.’ यह बस्तर नहीं गोया पूरा बिस्तर है. जहां सेरेब्रल मलेरिया नहीं है! एन्सेफ़ेलाइटीस नहीं है! कुपोषण नहीं है? गरीबी नहीं है?? ‘कैसा तो अजीब शब्द है गरीब’. जी हाँ!  यही सुविधा देती है परिदृश्यात्मक प्रविधि कहानी कहने की. जहां गंगा की मौजों पर लरजते सुसज्जित बजरे पर नौका भ्रमण का लुत्फ़ लेते हुए तटवर्ती दृश्यों का निरीक्षण किया जाए एवं उनपर परिदृश्यात्मक रिमार्क्स भी कसा जाए. तो तरुण भटनागर जी ने जैसा मैंने पहले भी कहा है, इस परिदृश्यात्मक (Panaromic) प्रविधि का इस्तेमाल करते हुए यह अद्भुत कृत्रिम कथा रच डाली है, जहां विचारों के बने–बनाए खांचे में एक काल्पनिक कथा गढ़कर फिट कर दी जाती है. यहाँ कहानीकार के लिए जीवन महत्वपूर्ण नहीं है वरन वह सन्देश या विचार जिसे वह कहानी के जरिए सत्ता एवं बाज़ार के दबाव में सर्कुलेट करना चाहता है, महत्वपूर्ण हो उठता है. जैसे बाज़ार अपने उत्पाद बेचने के लिए कविता की लयात्मकता का इस्तेमाल करते हुए विज्ञापनों में जिंगल्स बनाता है, उसी तरह बाज़ार (जिसके व्यापक अर्थों में किराना से लेकर कार्पोरेट घराने तक आते हैं) अपने विचार को कहानी के प्रोडक्ट के रूप में बेचता है. परिदृश्यात्मक कहानियाँ इसी कृत्रिम यथार्थवाद की विकृत उपज होती हैं. जहां विचार एक पहेली है, ‘जहाँ नर्क कुछ नहीं होता. और ‘विचार’ ? विचार एक पहेली. कितनी अजूबी और बेठौरी आवाज़ है ‘विचार’ . विचार एक उलझा हुआ डर .विचार, कितना तो अबूछ,बूछ सके तो बूछ.’ कृत्रिम अवस्थितियों के जरिये यथार्थ रचने की यह तड़प कितनी खतरनाक एवं मानवता विरोधी हो सकती है यह तो उपरोक्त पंक्तियाँ बताती ही हैं, इसे कहानी की निम्न पंक्तियाँ और स्पष्टता से उद्घाटित करती हैं, ‘वे कहना चाहते थे, कि जो रोज़ गाता हो, रोज़ पिटा हो, रोज़ नाचता हो, वह एकदम से नहीं छोड़ सकता नाचना रोज़, गाना रोज, वे नग्न थे, बेघर और कई–कई बार भूखे भी...पर वे नाचते थे,गाते थे. भला वह चीज कैसे छूट जाए जो नग्नता एवं भूख से ज्यादा अहम हो. वे बस इतना ही कहना चाहते थे, कि उन्हें नहीं चाहिए तुम्हारा भरपेट खाना और कपड़े या यही कि जिसे तुम घर कहते या मानते हो. वे बस रात को मदमस्त नाचना चाहते थे.’

कई-कई बार भूखे रहकर भी नाचने की इस इच्छा की कल्पना करना कोई हँसी-खेल नहीं है. कल्पना की ऐसी ऊँची उड़ान कोई विरला ही भर सकता है. जिसकी तोंद भरी हो और मैं फिर कहूँगा कि खाए, पीए, अघाए सज्जनों के मनोमस्तिष्क में ही ऐसी अद्भुत कल्पना उदित हो सकती है. यह वही सोच है जो बाड़े में बंद जानवरों को पावरोटी के टुकड़े फेंकती और अंडमान के प्रिमिटिव ट्राईब जारवा, ओंगी और सेंटिनल को ब्रेड के टुकड़ों के लालच में उनके बच्चों के साथ नंगे नचवाती है.

यह कहानी जैसा कि मैंने पहले बताया है समसामयिक बाज़ार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा लिखी गई है. बस्तर के अबूझमाड़ के जंगलों में पला-बढ़ा वह बच्चा अब बस्तर का सबसे बड़ा अधिकारी हो गया है. वह बस्तर में पला-बढ़ा अवश्य है लेकिन एक बाहरी की तरह क्योंकि न तो वह जन्मना माड़िया है, न सोच से, न विचार (जिसे उलझा हुआ डर मानता है) से. कहानी के अंत में वह कहता है कि ‘वह अधिकारी बहुत पहले से षड्यंत्रों का शिकार रहा. एक ताकतवर दगाबाजी...एक जालसाज समाज, एक फरेबी समय, एक छल, हर कदम.’ एक फंदा जो जंगल में ही नहीं समाज में हर कहीं बाज़ार और उसकी नियामक सत्ताओं द्वारा बिछ रहा है. यह सब जानते और समझते हुए भी रचनाकार (बड़ी गौरतलब बात है कि) “वह इस षड्यंत्र (सत्ता और बाज़ार के) को समझना ही नहीं चाहता.’ अर्थात सत्ता और बाजार की शक्तियों ने उसे अभिन्न बना लिया है और वह अघोषित रूप से उनका प्रवक्ता बन चुका है.

पुनश्चः  कहानी पर लिखने के बाद जब मैंने लेखक और राजेन्द्र यादव के बीच के पत्राचार को पुनः पढ़ा तो लेखक के विचारों में विरोधाभास एवं कन्फ्युजन प्रतीत हुआ. मैं उनके पत्र के अंश एवं कहानी की पंक्तियां बगैर अपनी टिप्पणी के नीचे दे रहा हूँ. ‘मेरी तेरी उसकी बात’ के पृष्ठ संख्या 3 पर तरुण भटनागर जी लिखते हैं- ‘मैंने अपनी स्मृतियों, अनुभवों, और जो प्रत्यक्ष था, उसे बाद में एथिनोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी और समाजशास्त्र के चश्मे से भी देखने की कोशिश की, तो मुझे समानताएं और सुसंगतताएँ मिलीं.’  इसी तरह मेरी तेरी उसकी बात’ के पृष्ठ संख्या 8 पर लिखते हैं– ‘जनजातीय समाज में एक लंबा समय बिताने और उनके सच को प्रत्यक्ष देखने और भोगने के बाद और मानव विज्ञान के निष्कर्षों से उनके तादात्म्य के बाद.’  जहां इन पंक्तियों में लेखक ने मानव विज्ञान के ज्ञान को जनजातीय जीवन को समझने में मददगार माना है वहीं कहानी के पृष्ठ संख्या 45 पर वह लिखता है, ‘एक ताकतवर दगाबाजी,जब उसने देश के नामचीन विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलाजी प्रभाग में दाखिला लिया. एक सलीके से कहा गया धोखा, कि अगर मानव को जानना है, तो मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) पढ़ो.’

प्रेमचंद जयंती के सिलसिले में नाटक कर रहे छात्रों को गिरफ्तार कर यातनाएं दी गईं

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2013 10:39:00 AM

 
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संगठन भगतसिंह छात्र मोर्चा और सांस्कृतिक संगठन मशाल सांस्कृतिक मंच का बयान. घटना की निंदा करते हुए जेएनयू के रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट का बयान भी देखें

मशाल सांस्कृतिक मंच एवं भगतसिंह छात्र मोर्चा के द्वारा आगामी प्रेमचंद जयंती ( 31 जुलाई ) के उपलक्ष्य में गीत, नुक्कड़ नाटक और सभा का आयोजन किया गया. जिसके तहत विभिन्न जगहों पर रिहर्सल किया जा रहा है. उसी कड़ी में दिनांक 15 जुलाई 2013 को बिहार के वैशाली जिले के लालगंज क्षेत्र में कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया.

उसके बाद दिनांक 16 जुलाई 2013 को 2 बजे से मजदूर किसान सभा के नेतृत्व में पूर्वी चम्पारन जिले के मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत एवं नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, तभी वहाँ पर सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, एसटीएफ एवं स्थानीय पुलिस से भरी चार गाड़ी आ पहुंची और चारों तरफ से हम लोगों को घेर लिया गया.

उन्होंने हथियारों के साथ पोजीशन ले ली, हमारे कार्यक्रम को रोक दिया गया, गाली-गलौज करने लगे. देवकुलिया चौक को दिन भर के लिए नाकेबंदी कर दी गयी और सभी गाड़ियों की तलाशी ली जाने लगी. हम लोगों से पूछताछ करने लगे कि तुम लोग कौन हो? यहां क्या करने आये हो? किसने बुलाया है? क्या उद्देश्य है? और कहा कि तुम लोग माओवादी हो. हम लोगों ने बताया कि हम मशाल सांस्कृतिक मंच बीएचयू से हैं, 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब बीएचयू के छात्र हैं. आईडी कार्ड भी दिखाए, उसके बाद हमारे बैगों की तलाशी ली गयी. कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया.

थाने पर गिरफ्तार करके ले जाए गए लोगों में मजदूर किसान सभा के सम्राट अशोक, हरेन्द्र तिवारी, अवतार सिंह कुशवाहा, पत्रकार संजय कुमार (तलाश पत्रिका), मशाल सांस्कृतिक मंच के जन गायक युद्धेश "बेमिशाल", रितेश विद्यार्थी, संतोष, नमो नारायण, रोहित, शैलेश कुमार और महिला विकास मंच की ममता देवी आदि लोग थे.

थाने में एएसपी संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, एसटीएफ़, सीआरपीएफ़ की कोबरा बटालियन द्वारा हमसे पूछताछ की गई कि पैसे कहां से मिलते हैं? यहां क्या करने आये थे? किसने बुलाया था ? हमारे साथ घंटों पूछताछ की गई, गाली-गलौज की गई और डंडे लात-घूंसे से मारा -पीटा गया, टॉर्चर किया गया तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा.

वहां से रात 8 बजे चार गाड़ी कोबरा बटालियन के साथ मुफस्सिल थाने में ले जाकर हम लोगों से सेलफोन, बैग एवं सारे सामानों को जब्त कर लिया गया और फिर मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया, रात में खाना -पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रीन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी. रात भर विभिन्न जगहों से बिहार के विभिन्न अधिकारीयों के पास फोन जाने पर अगले दिन दिनांक 17 जुलाई को 3 बजे एप्लिकेसन लिखवाकर कि (जांच -पड़ताल में कोई भी अवैध सामग्री बरामद नहीं हुई, सही सलामत थाने से छोड़ा जा रहा है) छोड़ा गया.

उत्तरी बिहार के पूरे ईलाके वैशाली, पूर्वी चम्पारन, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर को सीआरपीएफ, पुलिस गरीब, पिछड़ों को उग्रवादी, माओवादी कह कर उठा ले जाती है. वहां की जनता में भय का माहौल है और जनता सीआरपीएफ, पुलिसिया दमन से त्रस्त है, वहां पर कोई भी छोटा-बड़ा इस तरह का कार्यक्रम नहीं करने दिया जाता है. सीआरपीएफ के सामने पुलिस की कुछ भी नहीं चलती है. सब कुछ सीआरपीएफ के निर्देश पर थाने की मदद से होता है.


मोतिहारी (बिहार) में बीसीएम और मशाल के कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों की गिरफ्तारी और यातना का विरोध करें

रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट, जेएनयू

कहानियां इस भरोसे को लोगों के बीच बांटने का एक तरीका हैं कि इंसाफ करीब है. और ऐसे एक भरोसे के लिए बच्चे, औरतें, और मर्द एक हैरतअंगेज बहादुरी के साथ लड़ेंगे. इसीलिए तानाशाह किस्से सुनाने से डरते हैं: सारी कहानियां किसी न किसी तरह उनके पतन की कहानियां हैं. -जॉन बर्जर

इंसाफ और मुक्ति की जनता की आवाजों को दबाने की फासीवादी कार्रवाइयों के तहत फासीवादी भारतीय राज्य ने 16 जुलाई को बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्र संगठन भगतसिंह छात्र मोर्चा और मशाल सांस्कृतिक मंच के साथियों को गिरफ्तार किया और उन्हें यातनाएं दीं. रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट (आरसीएफ) उत्पीड़ित जनता के सांस्कृतिक प्रतिरोध के फासीवादी दमन की कड़े शब्दों में निंदा करता है. इन संगठनों के छात्र-कार्यकर्ता प्रेमचंद जयंती के मौके पर बिहार के दौरे पर थे, जिस दौरान वे जनता के बीच राजनीतिक चेतना और संघर्ष के गीत, नुक्कड़ नाटक और जनसभाएं आयोजित कर रहे थे. मोतिहारी के पहले उन्होंने 15 जुलाई को वैशाली के लालगंज इलाके में अपने कार्यक्रम पेश किए थे. 16 जुलाई को दोपहर 2 बजे वे मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत और नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, कि सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, एसटीएफ और स्थानीय पुलिस की चार गाड़ियां आईं और उन्हें घेर लिया. दोनों संगठनों द्वारा जारी किए गए बयान के मुताबिक, हथियारबंद राजकीय बलों ने:
हथियारों के साथ पोजीशन ले ली, हमारे कार्यक्रम को रोक दिया गया, गाली-गलौज करने लगे. देवकुलिया चौक की दिन भर के लिए नाकेबंदी कर दी गयी और सभी गाड़ियों की तलाशी ली जाने लगी. हम लोगों से पूछताछ करने लगे कि तुम लोग कौन हो? यहां क्या करने आए हो? किसने बुलाया है? क्या उद्देश्य है? और कहा कि तुम लोग माओवादी हो. हमलोगों ने बताया कि हम मशाल सांस्कृतिक मंच, बीएचयू से हैं, हमने 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब बीएचयू के छात्र हैं. आई.डी. कार्ड भी दिखाए, उसके बाद हमारे बैगों की तलाशी ली गई. कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया.

हथियारबंद बलों ने कम से कम 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें इन दोनों संगठनों के लोग भी शामिल थे. उनके बयान के मुताबिक, थाने में पुलिस और सीआरपीएफ ने गिरफ्तार किए गए लोगों को यातनाएं दीं:
थाने में एएसपी संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, एसटीएफ़, सीआरपीएफ़ की कोबरा बटालियन ने हमसे पूछताछ की: पैसे कहां से मिलते हैं? यहां क्या करने आये थे? किसने बुलाया था? हमारे साथ घंटों पूछताछ, गाली-गलौज और डंडे लात-घूंसे से मारा-पीटा गया, टार्चर किया गया, तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा....हमलोगों के सेलफोन, बैग एवं सारे सामान को जब्त कर लिया गया और फिर मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया, रात में खाना -पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रिन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी.

उत्पीड़ित जनता पर साम्राज्यवादी-ब्राह्मणवादी शासक वर्ग का उत्पीड़न और दमन ज्यों ज्यों तेज हो रहा है, जनता के जनवादी अधिकारों और उसके संसाधनों पर हमले बढ़ रहे हैं, त्यों त्यों जनता का जुझारू संघर्ष भी मजबूत हो रहा. इसकी संगत में जनता प्रतिरोध की क्रांतिकारी सांस्कृति भी विकसित कर रही है. संस्कृति मौजूदा शासक वर्ग द्वारा अपने उत्पीड़न और शोषण को बनाए रखने का एक अहम औजार है और जनता इस औजार को अपनी क्रांतिकारी संस्कृति के जरिए भोथरा कर रही है. इसलिए शासक वर्ग लगातार जनता के संस्कृतिकर्मियों और लेखकों, कवियों, पत्रकारों और कलाकारों पर दमन को तेज कर रहा है. उसका फरमान है कि जो भी कहा, लिखा और गाया जाए, जो भी सृजित किया जाए, वह शासक वर्ग की हिमायत में हो. इस फरमान को नकार देने वालों पर राजकीय जुल्म का सिलसिला चल रहा है. हमने देखा है कि किस तरह सुधीर ढवले, जीतन मरांडी, अरुण फरेरा, कबीर कला मंच के कलाकारों आदि की गिरफ्तारियां हुई हैं और हो रही हैं.

लेकिन जहां जुल्म है, वहां इंसाफ की लड़ाई भी है और उसकी उम्मीदें भी. और जहां उम्मीदें हैं, वहां गीत हैं, कविताएं हैं, नाटक हैं, कहानियां हैं. शासक वर्ग चाहे जितना भी दमन कर ले, चाहे जितनी भी आवाजों को दबाने की कोशिश करे, जनता के संघर्ष बढ़ते रहेंगे और उसकी आवाजें ऊंची और ऊंची होती रहेंगी.

सरकारी लंगर यानी ‘मिड-डे-मील’ खिलाने की राजनीति

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/18/2013 06:38:00 PM


बिहार के छपरा में मिड डे मील खाने से मरे बच्चों के लिए अपराधी कुछेक व्यक्ति हैं, या पूरी शिक्षा व्यवस्था है? और जिस समाज में बच्चों को भूख मिटाने के नाम पर स्कूल में आने का लालच दिया जा रहा हो, क्या उसकी पूरी सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक संरचना पर ही सवाल खड़े नहीं होते? वरिष्ठ लेखक सुभाष चन्द्र कुशवाहा का यह लेख कई सवालों की तरफ इशारा करता है.
 
16 जुलाई को छपरा जिले के एक प्राथमिक विद्यालय में मिड-डे-मील खाने से बाइस बच्चों की मौत हो गई और 60 से अधिक बच्चे अस्पतालों में जीवन और मृत्यु के बीच उलझे हुए हैं। मिड-डे-मील खाने से बच्चों के बीमार पड़ने या मरने की यह कोई पहली घटना नहीं है। छपरा जिले की घटना के अगले दिन मधुबनी जिले में मिड-डे-मील खाने से 17 बच्चे अस्पताल पहुंच गए। जब से मिड-डे-मील नामक सरकारी लंगर शुरू हुआ है, ऐसे समाचार आम हैं। गरीबों का दुर्भाग्य उनका पीछा नहीं छोड़ता। आज प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई के नाम पर मिड-डे-मील है। शिक्षा विभाग का करोड़ों का बजट, प्राथमिक शिक्षा और मिड-डे-मील के नाम पर, डकारने का काम हो रहा है। प्राथमिक विद्यालयों में हाजिरी वृद्धि के बावजूद पढ़ाई के निम्न स्तर पर प्रधानमंत्री भी चिंता जता चुके हैं। वहां गरीबों के बच्चे वजीफा और मिड-डे-मील के लालच में नाम लिखाते हैं, पढ़ने के लिए नहीं। कई बच्चे तो दो-दो सरकारी विद्यालयों में नाम लिखाते हैं जिससे दो-दो जगहों से वजीफा मिल सके। प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने योग्य अध्यापक नहीं है। एकाध हैं भी तो पूरा दिन लंगर की तैयारी में निकल जाता है। ऐसे में जिन्हें अपने बच्चों के पढ़ाने की चिंता हो, गांव-कस्बे में खुले निजी स्कूलों में जाएं, इस नीति का मूल मकसद यही है।

देश में लगभग सात लाख प्राथमिक अध्यापकों की कमी है। नियमित अध्यापकों की जगह अनुपयुक्त शिक्षा मित्र, शिक्षा के दुश्मन साबित हो रहे हैं। उन्हें खुद पढ़ने की जरूरत है, पढ़ाएंगे क्या? हाजिरी वृद्धि तो इसलिए की जा रही है कि प्रधान और अध्यापक, मिड-डे-मील का राशन और अन्य लाभ, सरकार से प्राप्त करते रहें।

प्राथमिक शिक्षा को बर्बाद करने के पीछे चालाक मानसिकता है। निजी स्कूलों की लहलहाती फसल, जिनमें पैसों वालों के लड़के पढ लिख कर अपना भविष्य संवार रहे हैं, उनके विरूद्ध विद्रोह न हो, इसके लिए जरूरी है वजीफा और खिचड़ी खिलाना। आखिर गरीब जनता को लगना चाहिए कि सरकार उनकी चिंता में गली जा रही है। चालाक लोग जानते हैं कि गरीबों को राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर करने के लिए जरूरी है, उन्हें शिक्षा से काट देना। एक तथाकथित लोकतांत्रिक देश में सीधे-सीधे ऐसा करना संभव नहीं, इसलिए यह सब मिड-डे-मील के बहाने किया जा रहा है। गरीब हितैषी दिखने के लिए बच्चों को टाई, बेल्ट, पोशाक और किताब मुफ्त में दी जा रही है। स्कूल चलो अभियान के नाम पर तमाम एन.जी.ओ. लाखों कमा रहे हैं। कहा जा रहा है कि शिक्षा पर कुल बजट का 4 प्रतिशत खर्च किया जा रहा है पर ज्यादातर प्राथमिक स्कूलों में मात्र एक अध्यापक हैं, वे भी स्कूल भवन बनवाने, मिड-डे-मील का हिसाब-किताब लगाने में व्यस्त हैं। इनके अलावा जनगणना, पल्स पोलियो, चुनाव जैसे काम भी हैं। कई स्कूल तो बिना अध्यापक के चल रहे हैं। सच्चाई यह है कि अपने देश में गरीबों को शिक्षा नहीं दी जा रही, उन्हें कटोरा लेकर आने और मिड-डे-मील खाने का झुनझुना पकड़ाया गया है। उन्हें ककहरा से आगे पढ़ने की जरूरत नहीं। वजीफा लें, खाना खाएं, बिना अध्यापक के पढ़ें। उत्तीर्ण हों और नरेगा मजदूर बनें। अब अनुत्तीर्ण होने का संकट भी नहीं।

अस्सी-नब्बे के दशक तक गंवई स्कूलों से पढ़े तमाम लड़के शासन-प्रशासन की धुरी बन जाते थे। इसी से बौखला कर शिक्षा देने की ऐसी नीति अपनाई गई कि मामला पलट जाए। आज गांव के पढ़े बच्चे उच्च या व्यावसायिक शिक्षा की ओर नहीं जा रहे। पहले पेड़ तले, बिना मिड-डे-मील खाये पढ़ाई हो जाती थी। अब तो बच्चों की टुकटुकी पक रही खिचड़ी की ओर रहती है। श्यामपट पर गणित, विज्ञान या भाषा नहीं, पकवानों के नाम होते हैं। मुफ्त में खाना, किताबें, वजीफा, साइकिल, बस्ता, भूकम्परोधी भवन, सब कुछ देने का मकसद पढ़ाई देना नहीं है। वहां योग्य अध्यापक देने की कोई नीति नहीं बनाई जा रही है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के अलावा वह सब कुछ होता है, जिससे गरीबों को भरमाये रखा जाये। कक्षा आठ तक पढ़े लड़के तेरह का पहाड़ा नहीं सुना सकते। गरीबों को शिक्षा उपलब्ध कराने वाली सरकारी संस्थाएं जानबूझकर बीमार बना दी गई हैं और दूसरी ओर निजी पांचसितारा स्कूलों में दाखिले के लिए लाखों खर्च किये जा रहे हैं। वहां कम्प्यूटर, प्रोजेक्टर से शिक्षा दी जा रही है। एक को ककहरा दूसरे को आधुनिक शिक्षा, यही है सर्वशिक्षा नीति का मकसद। बेशक जनगणना रिपोर्ट में 74 फीसदी आबादी साक्षर हो गई हो पर यह साक्षरता मात्र नाम लिखने भर को है। ऐसी साक्षरता सामाजिक हस्तक्षेप के लिए कतई नहीं है।

गरीबों की हिमायती सरकारें दोहरी शिक्षा नीति पर प्रहार क्यों नहीं करतीं ? समान नागरिकों को समान शिक्षा पाने का हक क्यों नहीं दिया जाता?  गुणात्मक शिक्षा से गरीबों को वंचित कर प्रतियोगिता परीक्षाओं से अलग करने की चाल है। प्रतियोगी परीक्षाओं का सारा ढांचा पैसे वालों के लिए तैयार किया जा रहा है। देश में खुल रहे महंगे कोचिंग संस्थान और महंगी पुस्तकें गरीबों को दौड़ से बाहर कर रही है। गरीबों के बच्चे जिन प्राथमिक स्कूलों में खिचड़ी खाने के लालच में जाते हैं वहां पढ़ाई किसके सहारे होगी, एक बानगी देखिए। देश के 6,51,064 प्राथमिक स्कूलों में से 15.67 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में एक या एक भी शिक्षक नहीं हैं। जहां हैं वहां पढ़ाने के बजाए, खाना पकाने की तैयारी में लगे रहते हैं। छठे सम्पूर्ण भारतीय सर्वेक्षण में बीस फीसदी स्कूलों में सिर्फ दो अध्यापक पाए गए। सातवें सर्वेक्षण में पाया गया कि प्राथमिक स्कूलों के कुल 25,33,205 पूर्णकालिक शिक्षकों में से लगभग 21 प्रतिशत अप्रशिक्षित हैं। यह विचार करने का विषय है कि जब स्कूलों में अध्यापक ही नहीं होंगे तब क्या खिचड़ी खिलाने से बच्चे पढ़ पायेंगे? 2011 में लोकसभा में बताया गया कि देश में कुल 6.89 लाख प्राथमिक अध्यापकों की कमी है। इनमें से उत्तर प्रदेश में 1.4 लाख , बिहार में 2.11 लाख, मप्र में 72,980, प बंगाल में 86,116,  असम में 40,800, झारखंड में 20,745, पंजाब में 16,766 और महाराष्ट्र में 26,123 प्राथमिक अध्यापकों की कमी है। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी अनिवार्य कर दी गई है। नौकरियों के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता की संस्कृति पैदा कर देने से सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने का झुनझुना लोगों को लुभायेगा ही। ऐसे में अंग्रेजी पढ़ाने वाले अध्यापक भी तो चाहिए। अगर इस तथ्य को दृष्टि में रखें तो केवल उत्तर प्रदेश में तीन लाख प्राथमिक अध्यापकों की जरूरत होगी।

वर्तमान केन्द्रीय बजट में स्कूल भवन बनवाने पर तो जोर दिया जा रहा है, पर इन स्कूलों में बेहतर शिक्षा कैसे दी जाए, इस पर कोई कार्य योजना बनाने की जरूरत नहीं समझी गई है। ‘मिड-डे-मील’ ने प्राथमिक स्कूलों से शिक्षा को बेदखल किया है। सरकार को गरीबों की मदद करनी है तो सीधे बच्चों के मां-बाप को करे। उन्हें राशन दे पर स्कूलों में पढ़ाई और अन्य रचनात्मक कार्य ही होने चाहिए। शिक्षा मित्रों के सहारे या अयोग्य मृतक आश्रितों को अध्यापक बना कर शिक्षण कार्य नहीं किया जा सकता। अगर यह व्यवस्था उचित है तो इसे निजी स्कूलों में क्यों नहीं लागू किया जाता?  शहरी मांएं पैरेंट्स डे पर अपने बच्चों की प्रोग्रेस जानने जाती हैं जबकि गांव की मांओं को कहा जाता है कि ‘बारी, बारी मांएं आएं, जाचें, परखें तभी खिलाएं।’ तो क्या यह नीति गंवई बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की है या सर्व शिक्षा अभियान के बहाने उन्हें शैक्षिक अपाहिज बनाकर ऊपर बढ़ने से रोकने का एक कुचक्र है?

तो उदय प्रकाश हिंदी के लेखक नहीं हैं!

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/17/2013 07:07:00 PM


कथाकार और कवि उदय प्रकाश के बारे में आलोचक वीरेन्द्र यादव की टिप्पणी. शुक्रवार से साभार.

यह सचमुच विस्मयकारी है कि जब समूची दुनिया में अमेरिका की राजनीतिक चौधराहट और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद सवालों के घेरे में है तो हिंदी का एक लेखक गर्वोक्ति के साथ यह घोषणा कर रहा है कि वह ‘पहला ऐसा हिंदी लेखक बना है, जिसके जीवन काल में ही कोई रचना अमेरिका में प्रकाशित हो सकी है।’ पिछले दिनों हिंदी के ‘आत्मनिर्वासित’ लेखक उदय प्रकाश ने अपनी कहानी ‘पीली छतरी वाली लड़की’ के अमेरिका में प्रकाशन से खुद को ‘सम्मानित’ महसूस करते हुए आह्लाद के साथ अपनी यह खुशी फेसबुक पर दर्ज की। वैसे कुछ वर्षों पूर्व भी वे इसी कहानी को लेकर यह दावा कर चुके हैं कि पश्चिमी दुनिया में कुर्रतुलैन हैदर के उपन्यास ‘आग का दरिया’ की स्वीकृति के बाद ‘पीली छतरी वाली लड़की’ ने वहां नई ऊंचाइयों को छुआ है।’ जब इस कहानी को अनूदित करने के लिए अमेरिकी संस्था ‘पेन’ द्वारा अनुवादक को ‘ट्रांस्लेशन फंड ग्रांट’ मिली थी तो समाचार इस तरह  छपा था कि जैसे उदय प्रकाश को ही ‘पेन’ अवार्ड मिल गया हो। इस बीच अंग्रेजी की एक साप्ताहिक पत्रिका ने उदय प्रकाश के साक्षात्कार के बीच उनके महत्व को रेखांकित करते हुए यह भी छापा है कि यह सम्मान उस अमेरिकी साहित्य संसार की ओर से दिया गया है, जहां पुस्तकों की नियति सलमान रुश्दी सरीखी हस्तियां तय करती हैं। यहां मंतव्य इन दावों को प्रश्नांकित करने का न होकर उस हीन ग्रंथि को समझने का है, जो अपने देश,समाज,संस्कृति और साहित्य की श्रेष्ठता व मूल्य निर्धारण पश्चिमी मानदंडों और स्वीकृति के ही आधार पर तय करती है। विशेषकर तब जब उदय प्रकाश हिंदी के ऐसे समादृत और समर्थ लेखक हों, जिन्हें किसी देशी-विदेशी सम्मान का मुखापेक्षी होने की कोई विवशता नहीं है।

अमेरिका और पश्चिमी दुनिया में मान्यता पाने की लेखकीय ललक की इस चर्चा के दौरान याद आते हैं गजानन माधव मुक्तिबोध, जिन्होंने आज से 55 वर्ष पूर्व अपनी कहानी ‘क्लाड ईथरली’ को इसी मुद्दे पर केंद्रित करते हुए लिखा था कि ‘...आजकल के लेखक और कवि अमेरिकी, ब्रिटिश तथा पश्चिम यूरोपीय साहित्य तथा विचारधाराओं में गोते लगाते हैं और वहां से अपनी आत्मा को शिक्षा और संस्कृति प्रदान करते हैं !...क्या हमने इण्डोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुम्बा के काव्य से?...तो मतलब यह है कि अगर उनकी संस्कृति हमारी संस्कृति है, उनकी आत्मा हमारी आत्मा और उनका संकट हमारा संकट है, तो हमारे यहां भी साम्राज्यवादी, युद्धवादी लोग क्यों नहीं हो सकते ! मुख़्तसर किस्सा यह है कि हिंदुस्तान भी अमेरिका ही है।’   महत्वपूर्ण यह भी है कि मुक्तिबोध ने यह तब कहा था, जब न तो उत्तर औपनिवेशक विमर्श चर्चा के केंद्र में था और न ही आज की ‘ओरिएंटलिज्म’ की बहस थी। यह वास्तव में विडंबनात्मक है कि जिन मुक्तिबोध को उदय प्रकाश अपनी चेतना में रचा-बसा मानते हैं और जिन्हें अपनी कहानी ‘मोहन दास’ में नैतिक उपस्थिति के रूप में दर्ज करते हैं, अपनी सोच और जीवन में उन्हीं के विरुद्ध खड़े दिखते हैं। आखिर क्यों?

उदय प्रकाश पश्चिम की मान्यता के प्रति आग्रहशील ही नहीं हैं बल्कि वे हिंदी के प्रति अब हिकारत का भाव भी रखने लगे हैं। वे स्वयं को हिंदी का लेखक कहलाना पसंद नहीं करते क्योंकि वे अब हिंदी को ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन मानने लगे हैं। उनका कहना है कि उन्हें हिंदी सीखने में उतनी ही मशक्कत करनी पड़ी जितनी कि अंग्रेजी सीखने में क्योंकि उनकी अपनी बोली छत्तीसगढ़ी और बघेली है! वे कनाडा के लेखक थामस हाईवे से अधिक अपनापा महसूस करते हैं क्योंकि क्री आदिवासी समुदाय का होने के कारण जिस तरह थामस अंग्रेजी के भाषाई उत्पीड़न के शिकार हैं, उसी तरह उदय प्रकाश उस हिंदी खड़ी बोली उत्पीड़न के जो अंग्रेजों के समय में रेल और फोर्ट विलियम कालेज के साथ परवान चढ़ी। दरअसल उदय प्रकाश का हिंदी समाज और भाषा से यह कल्पित बेगानापन उनकी उस आत्म-उत्पीड़न ग्रंथि का परिणाम है, जो स्वयं को सदैव उत्पीड़ित छवि में ढालना चाहता है। उनकी यह स्वनिर्मित उत्पीड़ित छवि कितनी हास्यास्पद है इसकी बानगी उनके इस कथन से आंकी जा सकती है, ‘मुझे हिंदी कविता की रिजर्व बोगी से उसी तरह निकाल बाहर किया गया था, जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में गांधी को गोरों के लिए आरक्षित बोगी से अंग्रेजों ने बाहर निकाल दिया था।’

अभी पिछले सप्ताह अंग्रेजी साप्ताहिक तहलका (13 जुलाई) ने उदय प्रकाश पर लिखते हुए उचित ही यह सवाल उठाया है कि ‘जिस लेखक को मिनोसाटा, रोटरडम से लेकर बर्लिन तक भाषण देने के लिए बुलाया जाता हो और जिसे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर साहित्य अकादमी सहित राष्ट्रीय मान्यताएं मिल चुकी हों, वह सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी होने का दावा कैसे कर सकता है?’ दरअसल उदय प्रकाश सत्तातंत्र के विरुद्ध समय-समय पर जिस तरह के बयान देते रहे हैं, उससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। विशेषकर तब जब जिस साहित्य अकादमी को वे दलालों, समझौता-परस्तों व अवसरवादियों का अड्डा और जिसके पुरस्कारों व फेलोशिप को लेन-देन की संस्कृति करार दे चुके हों, उसी के पुरस्कार को वे स्वयं स्वीकार ही नहीं करते बल्कि उसे प्राप्त करके वे ‘राज्य के नागरिक के रूप में अपेक्षाकृत सुरक्षित’ महसूस करने के साथ-साथ इसे साहित्य अकादमी का नया प्रस्थानबिंदु भी मानने लगे हों। सच तो यह है कि हिंदी की जिस सत्ता संरचना से वे स्वयं को बहिष्कृत घोषित करते रहते हैं, उसी से वे अपनी प्राण वायु ग्रहण करते रहे हैं। यह अनायास नहीं है कि वे उन अशोक वाजपेयी को ‘युग पुरुष’ करार देते हैं, जो उन्हें पुरस्कृत करने वाली साहित्य अकादमी पुरस्कार समिति की ज्यूरी में थे। उन्हें यह गौरव भी प्राप्त है कि उनके कविता संग्रह ‘एक भाषा हुआ करती है’ के ब्लर्ब के लेखक अशोक वाजपेयी ही हैं। ‘द्विजदेव सम्मान’ और ‘कृष्णबलदेव सम्मान’ भी उन्हें अशोक वाजपेयी के सौजन्य से ही मिला है। और भी बहुत से देशी-विदेशी सम्मान उनकी झोली में हैं ही। दो राय नहीं कि वे इस सब के सुयोग्य पात्र भी हैं लेकिन फिर वह कौन सा कुलीनतावादी शक्तिकेंद्र है, जिससे वे निरंतर युद्ध की मुद्रा में हैं? जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अपनी शिरकत को वे लेखकीय गरिमा प्रदान करने वाला मानते ही हैं।

उदय प्रकाश अक्सर ब्राह्मणवाद, फासीवाद और सांप्रदायिकता को उचित ही अपने निशाने पर रखते हैं। लेखक होने के कारण वे स्वयं को दलित, भाषा का आदिवासी व अल्पसंख्यक भी घोषित करते रहते हैं लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि उन्हें न तो पूर्वांचल के नरेंद्र मोदी कहे जाने वाले योगी आदित्यनाथ के हाथों सार्वजानिक रूप से सम्मान ग्रहण करने से कोई गुरेज है और न ही उस छतीसगढ़ की भाजपा सरकार के स्पीकर व मंत्री द्वारा पुरस्कृत होने से, जो आदिवासियों के दमन के कीर्तिमान बना रही है। दिलचस्प तथ्य यह है कि जहां वे एक तरफ माथे पर लाल तिलक धारण कर छतीसगढ़ की भाजपा सरकार का पुरस्कार ग्रहण करते हैं वहीं दूसरी तरफ यह आशंका भी व्यक्त करते हैं कि कहीं उन्हें ‘नक्सल’ करार देकर गिरफ्तार न कर लिया जाए। और यह कहना भी नहीं भूलते हैं कि यदि ऐसा हो गया तो कोई भी वामपंथी लेखक संगठन उनकी मदद करना तो दूर उनकी यंत्रणा को बढ़ाने का ही काम करेगा। कहना न होगा कि यह उदय प्रकाश की अपनी ‘मौलिकता’ है कि वे जिससे पुरस्कृत होते हैं, उसी से दंडित होने की काल्पनिक संकल्पना कर अपने ‘पोलिटिकली इनकरेक्ट’ आचरण के प्रति एक रक्षाकवच भी निर्मित करते रहते हैं।

दिलचस्प यह है कि उदय प्रकाश अपने बयानों, अभिव्यक्तियों और आचरण में विरुद्धों के अद्वितीय समन्वयक हैं। वे स्वयं को गैर-राजनीतिक वाम बताते हैं। मार्क्सवाद से उनका इतना मोहभंग हो चुका है कि अब वे समूची राजनीतिक प्रणाली को ही संदेह की दृष्टि से देखते हैं और मतदान तक नहीं करते लेकिन इसके साथ ही वे बर्लिन में मार्क्स-एंगेल्स के बुतों और लन्दन में मार्क्स की कब्र के सामने खड़े होकर अपना फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया में प्रचारित करने के लोभ का संवरण भी नहीं कर पाते। अज्ञेय को वे अपनी ही तरह ‘निर्वासित’ लेखक मानते हैं, इसीलिए उन्हें ‘वामपंथी’ सिद्धकर उनका पुनर्वास करने का दायित्व भी निभाते हैं। मुक्तिबोध के हवाले से वे खुद को ‘कलम का हम्माल’ भी बताते हैं लेकिन अपने लिए ‘अभिजात वैभव’ का उत्सवी अवसर सुलभ कराने के लिए समूचे परिवार की तरफ से सार्वजानिक आभार व्यक्त करने में भी कोई संकोच नहीं व्यक्त करते। उदय प्रकाश को यह महारत भी हासिल है कि जब वे दिल्ली से अपनी रिहाईश बदलकर राजधानी परिक्षेत्र के बाशिंदे बनते हैं तो यह लिखना जरूरी समझते हैं कि ‘दिल्ली में तालिबानी-फासीवादी वर्णवादियों के बीच काफ़िर की तरह था। अबु गरेब का कैदी या ग्वातेमाला के टार्चर कैम्प में रखे किसी बंदी की तरह।’

यह सचमुच सुखद है कि दिल्ली के ‘टार्चर कैम्प’ से निकलकर अब उदय प्रकाश जिस ताजी हवा में सांस ले रहे हैं, वह अंग्रेजी पत्रिकाओं में भी इन दिनों चर्चा का विषय है। ‘तहलका’ के अनुसार उदय प्रकाश को अपने ‘रूफ टॉप गार्डेन’ और अपने फ्लैट की असेंट दीवारों पर गर्व है। उनकी विदेशी कुतिया का नाम काफ्का की प्रेमिका मिलेना के नाम पर है। कहना न होगा कि अंग्रेजी की दुनिया में उदय प्रकाश एक जीवित मिथक सरीखे हैं। कभी उन्हें ‘दलित लेखक’ बताया जाता है तो कभी ‘उपन्यासकार’। प्रेमचंद व मंटो का तो उन्हें उत्तराधिकारी ही करार दिया गया है। स्वीकार करना होगा कि उदय प्रकाश हिंदी समाज की ऐसी मौलिक परिघटना हैं, जिन्होंने मुक्तिबोध के इस प्रश्न को अर्थहीन बना दिया है कि,‘पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?’

नक्सलवादियों की लड़ाई जल, जंगल और ज़मीन की सामूहिक लड़ाई है: राजेन्द्र यादव

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/06/2013 09:31:00 PM


हंस के जुलाई 2013 में प्रकाशित इस बातचीत में हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने सलवा जुडूम के कर्ता धर्ता महेंद्र कर्मा पर हमले के संदर्भ में माओवादी आंदोलन से जुड़े विभिन्न सवालों के जवाब दिए हैं. पढ़िए पूरी बातचीत.

पिछले दिनों छतीसगढ़ में कांग्रेस के सरकारी नेताओं के एक दल पर नक्सलवादियों के नेतृत्व में जनता के एक बड़े हुजूम ने हमला कर दिया। तीस लोग मारे गए। सचमुच यह एक उत्तेजक खबर थी। घर पर कथाकार विवेक मिश्र आये हुए थे। उनसे इस विषय पर चर्चा होने लगी, तो सोचा क्यों ना इस चर्चा को सबके साथ बाँटा जाए।

विवेक मिश्र के सवाल और राजेन्द्र यादव के जवाब


हाल ही में कांग्रेस नेताओं के एक दल पर हुए नक्सली हमले ने पूरे देश को चौंका दिया। इसे नक्सलियों की सरकार से छिड़ी सीधी लड़ाई और लोकतन्त्र पर हुआ हमला माना जा रहा है। आप इसे कैसे देखते है?

मूलत: यह हमला कांग्रेस की लीडरशिप पर है, सबसे प्रमुख टार्गेट था- कर्मा क्योंकि उसने सलमा जुडूम बनाया था। एक और बात दिखाई देती है, छत्तीसगढ़ सरकार ने इस दल का रूट बदलवाया था; बदले हुए रूट की जानकारी वहाँ से निकली है? इसके पीछे बीजेपी सरकार की योजना हो सकती है। मारे गए लोगों में तीस लोग बताए जाते हैं, जिनमें पाँच-छह कांग्रेस के बड़े नेता हैं। इसमें कुछ सुरक्षा गार्ड भी जरूर हताहत हुए होंगे। सूची देख कर लगता है कि नक्सलियों को इसकी पूरी जानकारी थी कि कौन-कौन लोग हैं और कुल मिला के उनकी संख्या क्या है। आपको याद होगा, पाकिस्तान के प्रेसिडेंट जनरल जिया उल हक के साथ आम की पेटियां रखी गयी थीं। उसी विस्फोट में जिया उल हक और दूसरे लोगों की मृत्य हुई। इनमे अमेरिकी राजदूत भी था। ज़रूर इस योजना की जानकारी विरोधियों को थी।

क्या इससे सलमा जुडूम का समर्थन बढ़ेगा?

नहीं, सलमा जुडूम को कभी आदिवासियों, या गैर आदिवासियों का समर्थन नहीं मिला, कर्मा और विश्वरंजन इसके मेन इंजीनियर थे।

जिस नक्सल आंदोलन को एक समय बदलाव और क्रान्ति की शुरुआत के रूप में देखा जाता था और जिसे कई स्तरों पर सामाजिक, राजनैतिक ही नहीं बल्कि बुद्धिजीवियों का वैचारिक और नैतिक समर्थन भी प्राप्त था। आज इनके बीच एक दूरी दिखाई देती है। आज ऐसा लगता है जैसे यह आंदोलन न होकर एक अराजक और हिंसक विद्रोह है। नक्सलवाद हिंसा का पर्याय समझा जाने लगा है।


विडम्बना यह है कि हम यहाँ दिल्ली में एक एयरकंडीशन कमरे में बैठ के उनके बारे में बात कर रहे हैं, जिनसे हमारा सीधा संबंध नहीं रहा। आज वहाँ के हालात की ज़मीनी जानकारी हमें नहीं है, इसलिए हमारे लिए यह बौद्धिक और वैचारिक विमर्श है। मैं ऐसा मानता हूँ कि बुद्धिजीवियों का जो वैचारिक समर्थन है, वह बना रहेगा। क्योंकि वह समर्थन अन्याय के ख़िलाफ़, दमन के ख़िलाफ़ उठती आवाज़ का है। हिंसा कभी एक तरफ़ा नहीं होती, कई झूठी मुठभेड़ें होती हैं, बेगुनाह मारे जाते हैं, उनका क्या? जब अन्याय होगा और कहीं सुनवाई नहीं होगी तो लोग बंदूक उठाएंगे।

इसे अराजक कहना सही नहीं। उनकी हिंसा में एक अनुशासन है। अगर अनुशासन नहीं होता तो वे इतना बढ़ नहीं सकते थे। अरुंधति रॉय, गौतम नौलखा बहुत अंदर तक उनके साथ गए हैं और कई दिनों उनके बीच रहे हैं, उन्होंने उनके बीच जिस प्रकार के अनुशासन की प्रशंसा की है, उसके बिना शायद इतने बड़े क़दम उठाए ही नहीं जा सकते।

एक किसी बहुत पुराने कवि की पँक्तियाँ हैं-
अवश्य हिंसा अतिनिंध कर्म है
पर कर्तव्य प्रधान है यही
ग्रह पूरित हो न सर्पादि से
वसुधा में पनपे न पातकी

 

नक्सलियों की हिंसा सबको दिखती है और अनेक बार बहसों और आपसी विमर्शों का कारण बनती है, मगर उस हिंसा के बारे में कोई नहीं बोलता, जिसमें लाखों लोगों को जीवन की मूलभूत जरूरतों, सुरक्षा और संरक्षण से वंचित कर दिया जाता है। सरकार और बड़े कॉरपोरेट संस्थानों द्वारा की जाने वाली हत्याएं क्यों हमारा ध्यान नहीं खींचतीं? उन पर बात क्यों नहीं होती? सोना, चाँदी, यूरेनियम इत्यादि के लिए करोड़ों-अरबों का जो लेन-देन होता है, जिससे आदिवासियों का किसी तरह से भी कोई लेना-देना नहीं होता, उसमें उनके हित के लिए क्या रखा जाता है? आज जंगल भी उनके लिए सुरक्षित नहीं हैं, उन्हें भी थोक के भाव बेचा जा रहा है। वे अपनी ही ज़मीन से बेदखल किए जा रहे हैं। ऐसे में वे या तो भूखे मरने को विवश होते हैं, या पलायन करते हैं। अगर वे लोग इस चतुर्दिक आक्रमण के विरोध में बंदूक उठा लेते हैं, तो ग़लत कहाँ हैं? ये सही है कि उनका यह विद्रोह अराजक असंतुष्टों का प्रत्याक्रमण नहीं है। उनके पीछे बाक़ायदे समाज और राजनीति को बदलने का दर्शन लेकर आने वाले तेजस्वी और मेधावी विद्यार्थी हैं, जो अपनी जान की परवाह न करते हुए, शहरी सुख-सुविधाएं छोड़कर, इनके बीच रहते हैं। वे उनकी ही तरह रहते-खाते हैं और राजनैतिक रूप से उन्हें प्रशिक्षित करते हैं। इसलिए मेरा ख्याल है कि इस तरह के विस्फोटक आक्रमणों को लेकर कोई नतीजा निकालना एक तरह की जल्दबाज़ी ही होगी। युद्ध के मोर्चों पर जो हजारों लोग मार दिए जाते हैं क्या वे जानते हैं कि सामने वाला दुश्मन क्यों है! दोनों पक्ष अपनी अपनी तरह हत्याएँ करते हैं। विदर्भ और आंध्रप्रदेश आदि में जो ढाई-तीन लाख किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं। क्या वे हत्याएँ नहीं हैं? हत्या करना और आत्महत्या की मजबूरी पैदा करना क्या मूलतः एक ही बात नहीं है? इन हत्याएँ पर सत्ता को इसी तरह का धक्का क्यों नहीं लगता?

राज्य एवं केन्द्र सरकारों की आदिवासियों के विकास के लिए कई योजनाएं हैं। उनका हमेशा यह दावा होता है कि वह आदिवासियों की समस्याओं से निपटने के लिए निरन्तर प्रयास कर रही है ?
 

सरकारी योजनाएं जिस तरह चलती हैं, जिनमें लाखों-करोड़ों कुछ जेबों में पहुँचाए जाते हैं, उससे आज हम सभी परिचित हैं। इसमें यह कहना कि सरकार करना चाहती है, कर रही है, यह सब आँखों में धूल झोंकना है। अब तो इन बिचौलियों के इतने स्वार्थ हो गए हैं कि वे सरकार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से आने वाले लाखों-करोड़ों के धनप्रवाह को क्यूँ छोड़ेंगे? अगर सरकार सचमुच ही इस धन को उन कामों में लगाना चाहती है, जिसके लिए वह आवंटित हुआ है, तो बिचौलियों की क्या जरूरत है? वे चाहते हैं यह स्थिति बनी रहे।

वामपंथी दलों में राजनैतिक और बैद्धिक स्तर पर पहले इस विषय पर जैसी एक जुटता और जोश दिखता था, वैसा अब नहीं, एक बिखराव सा है।
 

मुझे लगता है इस विषय पर वामपंथियों में बिखराव तब आया जब उन्होंने संसदीय प्रणाली को चुना। उनके अनेक दिग्गज नेता सांसद रहे। चाहे इन्द्रजीत गुप्ता हों या सोमनाथ चटर्जी। फिर भी हम देखते हैं कि संसदीय चुनावों में भाग लेने वाली सारी पार्टियों में वाम दल सबसे अलग थे। एक-दो व्यक्तिगत उदाहरण छोड़ दें, तो आज भी भ्रष्टाचार के कोई भी आरोप उनपर पर नहीं हैं। आज प्रधान मन्त्री बनने के लिए मोदी, राहुल नीतीश इत्यादि के बीच जो घमासान मची है, ऐसे समय में हमे याद रखना चाहिए कि ज्योति बसु ने बाक़ायदे प्रधान मन्त्री बनने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

नक्सलवादियों पर भी समय-समय पर व्यापारियों से वसूली और लूट के आरोप लगते रहे हैं, कहा जाता है कि आज वे स्कूलों, अस्पतालों और पूजा स्थलों पर भी हमले करने से नहीं चूकते।
 

आज नक्सलवादियों पर जो लूट या वसूली के आरोप हैं। उनके पीछे की सच्चाई को जाने बिना, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना शायद जल्दबाज़ी होगी। यह सही है कि इतने बड़े संगठनों को चलाने के लिए साधनों की जरूरत तो पड़ती है… और जब नक्सलवादियों पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वे मंदिरों, पंचायत घरों, स्कूलों और अस्पतालों पर हमले करते हैं, तो उस समय यह क्यों नहीं देखा जाता कि ये स्कूल, अस्पताल, किस तरह पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के स्थायी अड्डे बना दिए जाते हैं। सरकार के लिए यह भले ही लॉ एण्ड ऑर्डर का प्रश्न हो, नक्सलियों के लिए निश्चय ही यह अधिकारों और सिद्धान्तों की लड़ाई है। लड़ाई कैसी भी हो इसमें मारे तो मासूम और निरीह भी जाते हैं। सीमा पर जब कोई सिपाही किसी सामने वाले को मारता है तो उससे उसकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होती, पर यहाँ सरकारी बल जब दुश्मन पर हमला करते हैं, तो जीते हुए गाँवों और जंगलों में जैसा तांडव मचाते हैं, वह हम जानते हैं। स्त्रियों का बलात्कार करना, बच्चों को क़त्ल करना, साधारण लोगों को तरह-तरह की यातनाएं देना- ये सब जीते हुए सुरक्षा बलों के सर्वमान्य अधिकार हैं, जबकि दूसरी ओर नक्सलवादी जिन क्षेत्रों पर क़ब्जा करते हैं, वहाँ विकास, शिक्षा, संगठन उनकी प्राथमिकता होती है।

आज लिखने-पढ़ने और वर्तमान समय में खड़े होकर भविष्य के लिए अपना विचार बनाने वाला युवा एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ उसके सामने कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है, राजनैतिक पार्टियाँ रोज़ मुखौटे बदल रही हैं, वामपंथ के बड़े-बड़े पैरोकारों का नक्सलवाद से मोह भंग हो रहा है, ऐसे में आने वाली पीढ़ी किस के पक्ष में खड़ी हो?
 

दिक्कत ये है कि इनमें से कोई भी इस ज़मीनी लड़ाई का हिस्सा नहीं रहा है, न इससे गहराई से जुड़ा है। आज हमारी ज्यादतर जानकारियाँ सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संचालित अख़बारों, टीवी चैनलों जैसे माध्यमों से आती है। हम इसी मीडिया की सूचनाओं या बहसों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं। हो सकता है हमारे बीच ऐसे भी कुछ मित्र हों, जो कभी इन पार्टियों से सीधे जुड़े थे, मगर किन्ही कारणों से उनका मोह भंग हुआ, और आज हमारे बीच, वे ही जब छाती ठोककर कहते हों कि हाँ यह बात इसी तरह हुई थी, मैंने इसे देखा था, इसलिए मैं कह सकता हूँ। पर जब वह यह सब कहते हैं, तो यह नहीं बताते कि उनका विचारधारा से पूर्ण जुड़ाव कब टूटा और आज की उनकी राय, टूटने की उस कड़वाहट से प्रेरित तो नहीं है।

इस समय में जो संवाद स्थापित कर सकते थे, वे या तो ख़ुद को इस समस्या से अलग कर चुके हैं, या इस विषय पर राजनीति कर रहे हैं, तब क्या संभावनाएं शेष रह जाती हैं?
 

वस्तुत: सरकारी तन्त्र में सुख की साँस लेने वालों और रात-दिन जंगलों, पहाड़ों में भटकने वाले लोगों में बहुत दूरी है, दोनो पक्षों के बीच कोई संवाद नहीं है। इसलिए सरकार उसे ताक़त के बलपर कुचल देना चाहती है और जवाब में वे गुरिल्ला युद्ध की तरह मौके तलाश कर वार करते हैं। यह संवाद जानबूझ कर समाप्त किया गया है क्योंकि पहले ऐसे मौके भी आए जब सरकार और माओवादियों के प्रतिनिधि, किसी एक जगह बैठकर, समस्याएं सुलझाने के लिए इकट्ठे हुए और सरकार ने यह सोचकर कि दुश्मन के इतने महत्वपूर्ण प्रतिनिधि एक साथ कहाँ मिलेंगे सारे विद्रोही नेताओं को दबोच लिया। सरकार की नीयत को इसी से समझा जा सकता है, ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं। अविश्वास के इस वातावरण में कोई क्यूँ संवाद करना चाहेगा? यदि संवाद करना है, तो वह दिल्ली मुम्बई के भव्य कक्षों में नहीं होगा, सरकारी नुमाइंदों को उनके जंगलों में जाना पड़ेगा, ताकि उनके साथ धोखा न किया जा सके। तभी शायद यह पता लग सकेगा कि सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए कितनी गंभीर है। अगर सरकार यह समझती है कि हेलीकॉपटर से पैरा मिलिटरी फोर्स और पुलिस भेजकर इसे दबाया देगी, तो कहना होगा कि उसने दुनिया के किसी भी विद्रोह से कुछ नहीं सीखा। सुविचारित और सुसंगठित क्रान्तिकारी उभार इन दमन के हथकड़ों से कभी भी समाप्त नहीं किए जा सकते। इस तरह बस उन्हें थोड़े समय के लिए स्थगित किया जा सकता है। आप ख़ुद चम्बल क्षेत्र के अंदरूनी भागों से परिचित हैं। वहाँ रोज़-रोज़ सुनाई देने वाले बागियों को भी आपने निकट से देखा है, जो अपने छोटे-बड़े दल बनाकर वर्षों प्रशासन से लोहा लेते रहते हैं। इनमें सबसे ज्वलंत उदाहरण मान सिंह और फूलन देवी का है। व्यक्तिगत अन्याय का दंश इन्हें बीहड़ों में उतरता है, जब वे देखते हैं कि न्याय कहीं नहीं है, तो बन्दूक उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। अगर इन बागियों को भी वैचारिक, सैद्धान्तिक और राजनैतिक प्रशिक्षण मिला होता तो निश्चय ही ये भी एक नक्सलवाद का रूप प्रस्तुत कर रहे होते। फ़र्क सिर्फ़ यह है कि इनकी लड़ाई अकेली अपनी लड़ाई है और नक्सलवादियों की लड़ाई जल, जंगल और ज़मीन की सामूहिक लड़ाई है।

गंटी प्रसादम जिंदा रहेंगे

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/06/2013 03:12:00 AM

रेयाज उल हक

वे जिंदा रहेंगे.

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कल दोपहर में उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि हत्यारों के तलवारों और गोलियों ने उनकी गर्दन और सीने को इतना नुकसान पहुंचाया कि कम से कम तीन घंटों के ऑपरेशन के बावजूद उनकी जान बचाई नहीं जा सकी. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि शहीदों, उनके परिजनों और जख्मी साथियों की फिक्र करने के लिए वे हमारे आसपास अब और नहीं होंगे. और न ही वे दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी गूंजती हुई आवाज से, अपने गुस्से और अपनी समझ से हमें मजबूत बना सकेंगे. इनसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता. शहीदों की जिंदगी उनकी हत्याओं के साथ खत्म नहीं होती. वह जारी रहती है. अपने लोगों के संघर्षों में. जुल्म और नाइंसाफी के खिलाफ, जनता की लड़ाइयों में फतह हासिल होने तक उनकी जिंदगियां सांस लेती हैं. जनता उन्हें प्यार करती है, हत्यारे उनसे नफरत करते हैं और शासक वर्ग उनसे डरता है.

यह वो डर ही है, जो राज्य और शासक वर्ग को जनता के प्यारे साथियों और नेताओं को जनता से छीन लेने की कोशिश करने पर मजबूर करता है. शासक वर्ग सपने देखता है कि नेताओं से महरूम अवाम भटक जाएगी, हाथ पर हाथ धरे बैठ जाएगी. फासीवादी शासक वर्ग की कोख से इसीलिए हत्यारे गिरोह पैदा होते हैं.

रिवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के उपाध्यक्ष, कमेटी फॉर द रिलेटिव्स एंड फ्रेंड्स ऑफ मार्टियर्स के कार्यकारी सदस्य और विप्लवी रचयितलु संघम (विरसम या रिवॉल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन) से जुड़े गंटी प्रसादम पर चलाई गई गोलियां और तलवार के वार इसके सबूत हैं कि शासक वर्ग हमेशा इतिहास को भुला देता है. वह भुला देता है कि हत्याएं और दमन जनता के संघर्षों और सपनों को कभी कुचल नहीं पाए.

वह भुला देता है कि अपने औपनिवेशिक कब्जे के लगभग 400 वर्षों के दौरान स्पेनी हत्यारों ने लातिन अमेरिका में दसियों लाख मूल निवासी इंडियनों की हत्याएं कीं, लेकिन जब 01 जनवरी 1899 को क्यूबा की आजादी के साथ लातिनी अमेरिका से आखिरी स्पेनी सैनिक स्पेन के लिए रवाना हुआ, तब 6 करोड़ से ज्यादा लोग आजादी का जश्न मनाने के लिए जिंदा थे. 

वह भुला देता है कि समाजवाद को उसकी पैदाइश के वक्त ही दम घोंट कर मार देने के मकसद के साथ 1918 की गर्मियों में सोवियत संघ में उतरे 13 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों को दो साल के बाद हजारों मौतों और नुकसानों को अपनी झोली में डाले, नाकामी की शर्मिंदगी लेकर लौट जाना पड़ा था.

1945 से लेकर अब तक अमेरिका ने 40 विदेशी सरकारों का तख्तापलट करने की कोशिश की है, 30 से ज्यादा लोकप्रिय और चुनी हुई सरकारों को गिराया है और 25 से ज्यादा देशों पर बम गिराए हैं. इस सारी कोशिश में उसने बीसियों लाख लोगों और हजारों राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं की हैं. लेकिन वह भुला देता है कि इतना कुछ करने के बावजूद स्थिरता के लिहाज से और भविष्य के लिहाज से वह दुनिया के इतिहास का सबसे कमजोर साम्राज्य है. जिन देशों को उसने भारी फौजी बूटों के नीचे दबा रखा है, वह उनके बारे में भी पूरे भरोसे के साथ कुछ नहीं कह सकता. इस वक्त, जिस तेजी से आप इन अक्षरों को पढ़ रहे हैं, उससे दोगुनी तेजी से, अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दुनिया भर में चल रही अवामी जंग के हिस्से के बतौर साम्राज्यवाद के किलों पर गोलियां दागी जा रही हैं.

ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को सूरज उगने से भी पहले तीन नौजवानों को फांसी पर चढ़ा दिया था. इस जुर्म में दुनिया भर में मशहूर कर दिए गए अहिंसा के कथित पैगंबर की भी सहमति थी. लेकिन आज, आठ दशक बीतने के बाद भी वे तीनों नौजवान इतने खतरनाक हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को उनके लेखों, बयानों और चिट्ठियों वाली किताबें खरीदने और बेचने वालों पर देशद्रोह के मुकदमे लागू करने पड़ते हैं. उनमें से एक नौजवान का चेहरा इस देश में विरोध में तनी हुई हर मुट्ठी में से झांकता है: भगत सिंह का चेहरा.

28 जुलाई 1972 को जिस देश के एक अदना से थाने में पुलिस हिरासत में चारू मजुमदार को मार डाला गया, उसी देश के प्रधान मंत्री को चार दशकों के बाद यह ऐलान करना पड़ा कि चारू के सपनों और मकसद को अपने कंधों पर ढोने वाला, दुनिया के सबसे निर्धनतम और सबसे उत्पीड़ित तबका संपत्ति और लूट की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है.

शासक वर्ग इतिहास को भूल जाए तो भूल जाए, इतिहास उसे कभी नहीं भूलता.

कल जिस जिंदगी को खत्म कर दिया गया, क्या उसकी ताकत को कोई खत्म कर पाएगा? उसकी जला दी गई आखिरी हड्डी के साथ, सड़क से लेकर अस्पताल के बिस्तर तक बहे खून की आखिरी बूंद के साथ, गुजरते हुए पल के साथ बुझ रही आखिरी सांस के साथ, कितने नारे, कितने संघर्ष, कितनी कहानियां, कितनी यातनाएं, कितने मोर्चे और कितने सपने होंगे, जिन्हें खत्म किया जा सकेगा? क्या सचमुच? क्या सचमुच कोई गोली ऐसी बनी है, जो कहानियों का कत्ल कर सके? कविताओं का? सपनों का? नारों का? विचारों का?

उनके आखिरी कदम एक शहीद के परिजन को अस्पताल में देखने जाने के लिए उठे थे. आज हम उनकी शहादत को सलाम करने जा रहे हैं.

संघर्ष और इंसाफ की उस आवाज को सलाम. आने वाले दिनों में, जब खेतों में पसीना बहाते किसानों और कारखानों में पिसते मजदूरों, मुसलमानों और दलितों, पिछड़ों, औरतों तथा उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं-उत्पीड़ित जनता-का कारवां लड़ाई के मोर्चे से जीत के नारों के साथ लौटेगा और अपने फौलादी सपनों और अपनी जीत के झंडों के साथ सड़कों और गलियों को, खेतों और कारखानों और वादियों और जंगलों को भर देगा, और जिन शहादतों को सबसे पहले याद किया जाएगा और सलामी दी जाएगी, तब किसी को गंटी प्रसादम के नाम की याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

और उसके बाद भी, सारे जमाने के सभी शहीदों की तरह, वे जिंदा रहेंगे.

कॉमरेड गंटी प्रसादम.

लाल सलाम साथी.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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