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राष्ट्रीय मुक्ति और संस्कृति: अमिल्कर कबराल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/13/2013 06:32:00 PM


पश्चिमी अफ्रीकी देश गिनी बिसाऊ के मुक्ति आंदोलन के नेता अमिल्कर कबराल का जन्म 12 सितंबर 1924 को बफाता नामक कस्बे में हुआ था। 1945 में उन्होंने कृषि विज्ञान की शिक्षा के लिए लिस्बन स्थित संस्थान में प्रवेश किया और 1952 में वहां से डिग्री हासिल की। उन दिनों अंगोला, मोजांबीक और गिनी बिसाऊ में पुर्तगाल का शासन था। छात्र जीवन के दौरान कबराल ने पुर्तगाल में जनतांत्रिक शक्तियों के साथ संपर्क किया और वहां के जनतांत्रिक आंदोलन में भूमिगत रूप से सक्रिय रहे। 1953 में स्वदेश लौटने पर राजधनी बिसाऊ में उन्हें कृषि इंजीनियर की नौकरी मिली। यहां भी उनकी राजनीतिक गतिविध्यिां जारी रहीं और 1955 में उन्हें सरकार विरोधी होने का आरोप लगाकर नौकरी से निकाल दिया गया और देश छोड़ने का भी हुक्म हुआ। 1955-56 में अंगोला में उन्हें एक नौकरी मिली जहां अंगोला के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता अगोस्तिनो नेतो से मुलाकात हुई। कबराल ने अंगोला की मुक्ति के लिए बने संगठन एमपीएलए की स्थापना में नेतो की मदद की। सितंबर 1956 में कबराल ने गिनी बिसाऊ और केप वेर्दे की आजादी के लिए पीएआईजीसी नामक संगठन की स्थापना की और 1960 से सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत कर दी। 20 जनवरी 1973 को पुर्तगाल द्वारा नियुक्त भाड़े के सैनिकों ने कबराल की हत्या की।
 

अब तक राजनीतिक और सैनिक दृष्टि से कबराल ने अपने संगठन को इतना शक्तिशाली बना दिया था कि पुर्तगाली शासकों के लिए अध्कि समय तक गिनी में टिके रहना संभव नहीं था। सितंबर 1973 में गिनी बिसाऊ को पूर्ण आजादी मिल गई।
 

अमिल्कर कबराल ने साहित्य और संस्कृति से संबंधित प्रश्नों पर बहुत विस्तार से लिखा है और राजनीतिज्ञ के साथ-साथ एक संस्कृतिकर्मी के रूप में भी उनको सारी दुनिया में सम्मान प्राप्त है। कबराल का कहना है कि कोई भी जनता जो विदेशी प्रभुत्व से अपने को मुक्त कराती है सांस्कृतिक दृष्टि से भी तभी स्वतंत्रता पा सकती है जब उत्पीड़क देश तथा अन्य देशों की संस्कृति के सकारात्मक तत्वों को बिना किसी हिचक और ग्रंथि के अपना कर वह अपनी संस्कृति के उन्नत मार्ग पर बढ़ने के लिए तैयार हो। अगर साम्राज्यवादी शासन के लिए यह जरूरी है कि वह सांस्कृतिक उत्पीड़न करे तो राष्ट्रीय मुक्ति के लिए भी जरूरी है कि वह मुक्ति आंदोलन को एक सांस्कृतिक कर्म समझे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन संघर्ष कर रही जनता की संस्कृति की संगठित राजनीतिक अभिव्यक्ति है।
 

अमिल्कर कबराल ने 20 फरवरी 1970 को न्यूयार्क में संस्कृति और मुक्ति आंदोलन के अंतर्संबंधों पर एक व्याख्यान दिया था जिसका संक्षिप्त रूप ‘राष्ट्रीय मुक्ति और संस्कृति’ शीर्षक के अंतर्गत यहां प्रस्तुत है।– आनंद स्वरूप वर्मा, अनुवादक एवं संपादक, समकालीन तीसरी दुनिया


नाजी पार्टी के प्रमुख प्रचारक ग्योबेल्स ने जब सुना कि उसके यहां संस्कृति पर लोग बातचीत कर रहे हैं तो उसने अपनी रिवाल्वर तान ली। इससे पता चलता है कि नाजियों को, जो साम्राज्यवाद की सबसे दुखद अभिव्यक्ति थे-यह स्पष्ट था कि संस्कृति का क्या महत्व है और विदेशी प्रभुत्व का प्रतिरोध करने में इसकी कितनी बड़ी भूमिका हो सकती है। इतिहास हमें बताता है कि कुछ खास परिस्थितियों में विदेशियों के लिए जनता पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना बहुत आसान है। लेकिन इतिहास से ही हमें यह भी शिक्षा मिलती है इस प्रभुत्व के भौतिक पहलू चाहे जो भी हों इसको बरकरार तभी रखा जा सकता है जब गुलाम बनाई गयी जनता के सांस्कृतिक जीवन का स्थायी तौर पर और संगठित रूप से दमन कर दिया जाए। वास्तविकता यह है कि किसी देश की जनता पर शासन करने के लिए हथियारों से भी ज्यादा कारगर तरीका यह है कि उसके सांस्कृतिक जीवन को या तो बिल्कुल लकवाग्रस्त कर दिया जाए या समाप्त कर दिया जाए। कारण यह कि अगर देशज सांस्कृतिक जीवन शक्तिशाली रूप में मौजूद है तो विदेशी प्रभुत्व कभी भी निश्चिंत होकर अपना शासन स्थायी नहीं बना सकता। किसी भी क्षण, जो आंतरिक और बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है, सांस्कृतिक प्रतिरोध (अविनाशकारी) विदेशी प्रभुत्व का पूरी तरह मुकाबला करने के लिए नया रूप (राजनीतिक, आर्थिक, हथियारबंद) ग्रहण कर सकता है।

साम्राज्यवादी प्रभुत्व के लिए आदर्श स्थिति इस बात का चुनाव करना है कि-- या तो शासित देश की समग्र आबादी को पूरी तरह वह समाप्त कर दे ताकि सांस्कृतिक प्रतिरोध की संभावना ही खत्म हो जाए, अथवा- शासित देश की जनता की संस्कृति को नुकसान पहुंचाए बिना खुद को उन पर थोपने में उसे सफलता मिल जाए। कहने का मतलब यह कि उस देश की जनता पर स्थापित आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व एवं उस देश की जनता के सांस्कृतिक व्यक्तित्व के बीच एक सामंजस्य बैठा लिया जाए। पहली परिकल्पना में देशज आबादी के नरसंहार की बात निहित है और यह विदेशी प्रभुत्व की पूरी अवधरणा को भी व्यर्थ साबित करती है क्योंकि अगर जनता का अस्तित्व ही नहीं रहेगा तो शासन किस पर किया जाएगा। दूसरी परिकल्पना की पुष्टि अभी तक इतिहास के जरिए नहीं हो सकती है। मानव समुदाय के संदर्भ में जो व्यापक अनुभव हमारे पास हैं उनसे पता चलता है कि दूसरी संभावना भी व्यावहारिक नहीं है। यह संभव ही नही है कि आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व तथा शासित देश के लोगों के सांस्कृतिक व्यक्तित्व के बीच कोई सामंजस्य बैठाया जा सके।

इस चुनाव से बचने के लिए - जिसे ‘सांस्कृतिक प्रतिरोध की दुविधा’ कहा जा सकता है-साम्राज्यवादी औपनिवेशिक प्रभुत्व ने कुछ ऐसे सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की है जो विशुद्ध रूप से नस्लवाद पर आधारित सिद्धांत है और जिनको अगर व्यवहार में लाया जाए तो नस्ली तानाशाही के आधार पर (जिसे जनतंत्र भी कह देते हैं) देशज आबादी की स्थायी घेराबंदी करना है। मिसाल के तौर पर देशज आबादी के बारे में ‘समाहित करने’ (एसिमिलेशन) का तथाकथित सिद्धांत कुल मिलाकर संबद्ध जनता की संस्कृति को नकारने का एक उग्र उपाय ही साबित हुआ। इस सिद्धांत की जबर्दस्त विफलता से साफ पता चलता है कि इसके अंदर व्यावहारिकता का तत्व नहीं के बराबर है। आपने देखा होगा कि पुर्तगाल सहित अनेक उपनिवेशवादी शक्तियों ने इस सिद्धांत को आजमाया। पुर्तगाल के तानाशाह सालाजार ने यह कहकर कि अफ्रीका का अस्तित्व ही नहीं है कितनी बड़ी मूर्खता का परिचय दिया था। रंगभेद नीति के तथाकथित सिद्धांत के बारे में भी यही बात सच है। इसे एक नस्लवादी अल्पसंख्यक समूह ने दक्षिणी अफ्रीका की जनता के आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व के आधार पर विकसित और लागू किया और मानवता के खिलाफ बर्बर अपराध को जन्म दिया।
ये व्यावहारिक अनुभव विदेशी साम्राज्यवादी प्रभुत्व के नाटक की अच्छी जानकारी देते हैं क्योंकि शासित जनता के सांस्कृतिक यथार्थ से इनकी सीधे मुठभेड़ होती है। इससे यह भी पता चलता है कि मानव समाज में ‘सांस्कृतिक स्थिति’ और ‘आर्थिक (तथा राजनीतिक) स्थिति के बीच कितना मजबूत और अन्योनाश्रित संबंध है।

विदेशी प्रभुत्व का प्रतिरोध करने में जो तमाम कारक काम में आते हैं उनमें संस्कृति का महत्व इसलिए भी बहुत ज्यादा है क्योंकि सैद्धांतिक और वैचारिक आधार पर उस समाज की वास्तविकताओं की सशक्त अभिव्यक्ति संस्कृति में ही होती है। संस्कृति एक ही समय में जनता के इतिहास का परिणाम भी है और इतिहास की नियामक शक्ति भी। इसका मनुष्य तथा उसके परिवेश, लोगों तथा किसी समाज में रह रहे लोगों के बीच संबंधों के विकास पर जो भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है वह बहुत महत्वपूर्ण है। इस तथ्य से अनजान रहने का मतलब है विदेशी प्रभुत्व का मुकाबला करने में पीछे रहना और यही अनेक अंतर्राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की विफलता की भी कहानी है।

अब थोड़ा हम राष्ट्रीय मुक्ति की प्रकृति पर चर्चा कर लें। इस ऐतिहासिक परिघटना को हम समकालीन संदर्भों में देखेंगे अर्थात साम्राज्यवादी प्रभुत्व के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति की अवधरणा को रखेंगे। चाहे कैसा भी साम्राज्यवादी प्रभुत्व क्यों न हो इसकी एक खास विशेषता यह है कि यह उत्पादक शक्तियों की विकास प्रक्रिया को हिंसात्मक तरीके से रोकता है और इस प्रकार शासित लोगों की ऐतिहासिक प्रक्रिया को नकारता है। अब यह देखें कि किसी भी समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास का स्तर और इन शक्तियों की सामाजिक उपयोगिता की प्रणाली (स्वामित्व प्रणाली) उत्पादन के स्वरूप को तय करती है। हमारी राय में उत्पादन का स्वरूप, जिसके अंतर्विरोध कमोबेश वर्ग संघर्ष की तीव्रता के जरिए अभिव्यक्त होते हैं, किसी भी मानव समुदाय के इतिहास के प्रमुख कारक है। उत्पादक शक्तियों का स्तर ही इतिहास की वास्तविक और स्थायी चालक शक्ति है।

प्रत्येक समाज अथवा प्रत्येक जनसमूह के लिए, जिसे एक विकासमान इकाई के रूप में माना जाता है, उत्पादक शक्तियों के स्तर से ही इस बात का संकेत मिलता है कि वह समाज विकास की किस अवस्था में है। इससे इस बात का भी संकेत मिलता है कि उस समाज को निर्मित करने वाले विभिन्न समूहों या तत्वों के बीच किस तरह का भौतिक संबंध है जो वस्तुगत रूप में अथवा आत्मगत रूप में अभिव्यक्त होता है। मनुष्य और प्रकृति तथा मनुष्य और उसके परिवेश के बीच संबंधों और संबंधों के प्रकारों, व्यक्ति तथा समाज के सामूहिक अवयवों के बीच संबंधों एवं संबंधों के प्रकारों की भी जानकारी उत्पादक शक्तियों के स्तर से ही मिलती है। इनके बारे में बात करने का अर्थ है इतिहास के बारे में बात करना लेकिन इसका अर्थ संस्कृति के बारे में भी बात करना है। सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की जो भी वैचारिक अथवा आदर्शवादी विशिष्टताएं हों, संस्कृति जनता के इतिहास का एक आवश्यक तत्व है। संभवतः संस्कृति इस इतिहास का वैसा ही उत्पाद है जिस प्रकार किसी पौधे का उत्पाद है फूल। इतिहास की ही तरह अथवा यों कहें कि चूंकि यह इतिहास है इसलिए भी उत्पादन प्रणाली तथा उत्पादक शक्तियों का स्तर ही संस्कृति का भौतिक आधार है। संस्कृति अपनी जड़ों को खाद-मिट्टी रूपी उस परिवेश में गहरे जमाती है जिसमें इसका विकास हो और यह समाज की जैवीय प्रकृति को अभिव्यक्त करता है जो कमोबेश बाह्य तत्वों द्वारा प्रभावित हो सकती है। इतिहास हमें उन संघर्षों और असंतुलनों (आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक) की सीमा और प्रकृति की जानकारी देता है जो सामाजिक विकास की विशिष्टताएं हैं। संस्कृति विकास के प्रत्येक चरण में इन संघर्षों के समाधन के लिए सक्रिय उस गतिशील संश्लेषण से हमें अवगत कराता है जिसका अपने अस्तित्व और विकास की तलाश के लिए सामाजिक चेतना के जरिए निर्माण हुआ है।

किसी पौधे से निकले फूल की ही तरह संस्कृति में भी एक ऐसे पौधे के निर्माण और उर्वरण की क्षमता (अथवा दायित्व) है जो इतिहास की निरंतरता को सुनिश्चित करता है और साथ ही संबद्ध समाज के विकास की संभावना की गारंटी देता है। इस प्रकार यह समझा जाता है कि साम्राज्यवादी प्रभुत्व जब गुलाम देश की जनता के ऐतिहासिक विकास को नकारता है तो वह बुनियादी तौर से उसके सांस्कृतिक विकास को भी नकारता है। यह भी समझा जा सकता है कि क्यों साम्राज्यवादी प्रभुत्व अन्य सभी विदेशी प्रभुत्व की तरह अपनी खुद की सुरक्षा के लिए सांस्कृतिक उत्पीड़न का सहारा लेता है और शासित लेागों की संस्कृति के मूल तत्वों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पूरी तरह नष्ट कर देने का प्रयास करता है।

राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के इतिहास का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि इन संघर्षों के शुरू होने से पहले आमतौर पर संस्कृति के क्षेत्र में अभिव्यक्ति का परिमाण बढ़ जाता है और उत्पीड़क देश की संस्कृति को नकारते हुए अपनी खुद की सांस्कृतिक अस्मिता को स्थापित करने का सफल अथवा असफल प्रयास बहुत तेज हो जाता है। साम्राज्यवादी प्रभुत्व को झेलते हुए जनता की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति चाहे जो भी हो, हम देखते हैं कि संस्कृति में ही प्रतिरोध के वे बीज छिपे होते हैं जो आगे चलकर मुक्ति आंदोलन के निर्माण और विकास में सहायक होते हैं।

हमारी राय में राष्ट्रीय मुक्ति की बुनियाद जनता के उस अभिन्न अध्किार में निहित है जो अपना खुद का इतिहास होने की मांग करती है। इसलिए राष्ट्रीय मुक्ति का उद्देश्य उन अध्किारों को फिर से हासिल करना है जिन्हें साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने नष्ट कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका अर्थ है राष्ट्रीय उत्पादक शक्तियों के विकास की प्रक्रिया को मुक्ति दिलाना। यही वजह है कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन तभी और केवल तभी शुरू हो सकता है जब राष्ट्रीय उत्पादक शक्तियां पूरी तरह से हर प्रकार के विदेशी प्रभुत्व से स्वतंत्र हों। कोई भी जनता जो विदेशी प्रभुत्व से अपने को मुक्त कराती है सांस्कृतिक दृष्टि से भी तभी स्वतंत्रता पा सकती है जब उत्पीड़क देश तथा अन्य देशों की संस्कृति के सकारात्मक तत्वों को बिना किसी हिचक और ग्रंथि के अपना कर वह अपनी संस्कृति के उन्नत मार्ग पर बढ़ने के लिए तैयार हो। इस प्रक्रिया में वह विदेशी संस्कृति के सभी हानिकारक प्रभावों से अपने को मुक्त भी करती है।

इसीलिए यह कहा जा सकता है कि अगर साम्राज्यवादी शासन के लिए यह जरूरी है कि वह सांस्कृतिक उत्पीड़न करे तो राष्ट्रीय मुक्ति के लिए भी यह जरूरी है कि वह मुक्ति आंदोलन को एक सांस्कृतिक कर्म समझे।

जो बातें अभी कही गयी हैं उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन संघर्ष कर रही जनता की संस्कृति की संगठित राजनीतिक अभिव्यक्ति है। इसीलिए इस आंदोलन का नेतृत्व करने वालों के पास संघर्ष के ढांचे के अंतर्गत संस्कृति के मूल्य की तथा जन संस्कृति की साफ समझ होना बहुत जरूरी है। हमारे युग में आमतौर से यह सुनने को मिलता है कि सभी लोगों की अपनी एक संस्कृति है। यह बीते दिनों की बात है कि जब जनता पर अपना प्रभुत्व मजबूत करने के लिए संस्कृति को सुविधाप्राप्त लोगों या राष्ट्रों तक ही सीमित कर दिया गया था और जब अज्ञानतावश अथवा किसी चाल के तहत संस्कृति को एक तकनीकी स्वरूप दे दिया गया था। मसलन चमड़ी के रंग के आधार पर अथवा आंख की बनावट के आधार पर इसकी व्याख्या की जाती थी। जनता की सांस्कृतिक धरोहर के रक्षक और इसके प्रतिनिधि होने के कारण मुक्ति आंदोलन को इस तथ्य के प्रति सजग रहना चाहिए कि जिस समाज का वह प्रतिनिधित्व कर रहा है उसकी भौतिक स्थितियां चाहे जो हों, वह समाज ही संस्कृति का वाहक और उसका निर्माता है। इसके अलावा मुक्ति आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा जनवादी स्वरूप ग्रहण करना चाहिए, संस्कृति का लोकप्रिय रूप अपनाना चाहिए जो कभी भी समाज के एक या कुछ हिस्सों का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता है।

सामाजिक संरचना के समग्र विश्लेषण में, जिसे करने में प्रत्येक मुक्ति आंदोलन का अनिवार्य रूप से सक्षम होना चाहिए, समाज के प्रत्येक समूह की सांस्कृतिक विशिष्टताओं का एक महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि संस्कृति का जहां एक जनवादी स्वरूप है वहीं इसे एक समान नहीं कह सकते। इसका विकास समाज के सभी क्षेत्रों में समान रूप से नहीं होता। मुक्ति संघर्षों के प्रति प्रत्येक सामाजिक समूह का रुख उसके आर्थिक हितों से निर्देशित तो होता ही है, यह बड़े पैमाने पर उसकी संस्कृति से भी प्रभावित होता है। यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि संस्कृति के स्तर पर जो तमाम विभिन्नताएं हैं उन्हीं से मुक्ति आंदोलन के प्रति उन लोगों के व्यवहार की विभिन्नताओं का भी पता चलता है जो उसी सामाजिक-आर्थिक समूह से आते हैं।

हमारे देश की खास परिस्थितियों में संस्कृति के स्तर की विभिन्नताएं थोड़ी जटिल है। दरअसल गांव से शहर के बीच, एक जातीय समूह से दूसरे के बीच, एक आयु वर्ग से दूसरे के बीच, किसान वर्ग से लेकर मजदूर वर्ग के बीच और यहां तक कि एक ही सामाजिक समूह में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच संस्कृति का परिमाणात्मक और गुणात्मक स्तर उल्लेखनीय रूप से काफी भिन्न है। मुक्ति आंदोलन को चाहिए कि वह इन सभी बातों को ध्यान में रखकर ही अपनी रणनीति तैयार करे।

कुछ ऐसे समाजों में जहां की सामाजिक संरचना अलग ढंग की है जैसे बैलेंटे में-सांस्कृतिक स्तर का विभाजन कमोबेश समान है और जो विभिन्नताएं हैं वे कुछ व्यक्तियों के अथवा आयु वर्गों की विशिष्टताओं से जुड़ी हुई हैं। दूसरी तरफ ऐसे समाज में जहां का सामाजिक ढांचा श्रेणीबद्ध है (मसलन फुला में) सामाजिक पिरामिड के नीचे से लेकर ऊपर तक महत्वपूर्ण विभिन्नताएं देखने को मिलती हैं। सामाजिक संरचना में यह विभिन्नताएं एक बार फिर संस्कृति और अर्थव्यवस्था के बीच के घनिष्ठ संबंध को प्रदर्शित करती हैं। इसके साथ ही इनसे यह भी पता चलता है कि इन दो जातीय समूहों का मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में भिन्न-भिन्न रवैया क्यों है।

यह भी सही है कि मुक्ति आंदोलन में संस्कृति की भूमिका निर्धारित करने के प्रयास में सामाजिक और जातीय समूहों की विविधता से थोड़ी दिक्कत पैदा होती है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि मुक्ति संघर्ष की निर्णायक भूमिका के प्रति हमें आंख नहीं मूंदनी चाहिए-उस समय भी जब ऐसा लगता हो कि वर्ग संरचना विकास की भ्रूणावस्था मैं है। औपनिवेशिक प्रभुत्व के अनुभव से हमें पता चलता है कि उपनिवेशवादियों ने शोषण की प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा असरदार बनाने के प्रयास में गुलाम देशों की जनता के सांस्कृतिक जीवन का दमन करने की न केवल एक प्रणाली विकसित की बल्कि आबादी के एक हिस्से को सांस्कृतिक अलगाव में भी डाल दिया। यह काम उन्होंने या तो देशज लोगों को अपनी संस्कृति में समाहित करके किया अथवा आम जनता और देशज अभिजात्य वर्ग के बीच एक सामाजिक खाई के जरिए पूरा किया। समाज को विभाजित करने अथवा विभाजन को और असरदार बनाने की प्रक्रिया के फलस्वरूप आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खासतौर से शहरी अथवा ग्रामीण निम्न पूंजीपति वर्ग (पेटीबुर्जुआ) उपनिवेशवादियों की मानसिकता को अपनाने में लग गया और उसने खुद को अपने ही देश की जनता के मुकाबले सांस्कृतिक दृष्टि से श्रेष्ठ समझ लिया तथा अपने देशवासियों के सांस्कृतिक मूल्यों की या तो अवहेलना करने लगा या उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखने लगा। उपनिवेशवादी संस्कृति से प्रभावित बुद्धिजीवियों के एक बहुत बड़े हिस्से में यह बात देखी जाती है। ऐसे बुद्धिजीवियों की सामाजिक स्थिति को और मजबूत बनाने के लिए उपनिवेशवादियों ने इनको मिलने वाली सुविधओं में जो वृद्धि की उससे मुक्ति आंदोलन के प्रति उनके नजरिए में भी जबर्दस्त तब्दीली आई।

चाहे जो हो हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि जब राजनीतिक स्वाधीनता की संभावनाएं दिखाई दे रही हों तो बड़ी संख्या में संघर्ष की धारा में वे व्यक्ति आ सकते हैं जो अभी औपनिवेशिक संस्कृति के प्रभाव से अछूते हैं। ऐसे लोग अपनी शिक्षा, वैज्ञानिक अथवा तकनीकी ज्ञान के आधार पर मुक्ति आंदोलन में उच्च स्थान भी प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी अवस्था में सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों धरातलों पर सतर्कता बहुत जरूरी है। क्योंकि अन्य क्षेत्रों की ही तरह मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में भी देखें तो हर चीज जो चमक रही है, जरूरी नहीं कि वह सोना ही हो। बहुत सारे ऐसे राजनीतिक नेता-जिनको काफी ख्याति मिल चुकी हो-हो सकता है कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हों। औपनिवेशिक प्रभुत्व के अधीन इस वर्ग (परंपरागत चीफ, अभिजन, धर्मिक नेता) का राजनीतिक प्राधिकार बहुत नाममात्र का होता है और व्यापक जनसमुदाय को इस बात की जानकारी रहती है कि वास्तविक प्राधिकार औपनिवेशिक प्रशासकों के पास है। तो भी सत्ताधरी वर्ग बुनियादी तौर पर अपना सांस्कृतिक प्रभुत्व जनता पर बनाए रखता है और इसके बहुत महत्वपूर्ण राजनीतिक निहितार्थ होते हैं।

यह एक तथ्य है कि उपनिवेशवादी शासक, जो सामाजिक पिरामिड के आधार में स्थित जनता की सांस्कृतिक गतिविधियों का दमन करता है, पिरामिड के शीर्ष पर स्थित सत्ताधरी वर्ग के सम्मान और संस्कृति की रक्षा में लगा रहता है और उसको मजबूत बनाता है। वह उपनिवेशवादी कबीले के ऐसे सरदारों को प्रतिष्ठित पदों पर लाता है जो उसका समर्थन करते हैं और जिनको व्यापक जन समुदाय की भी थोड़ी-बहुत स्वीकृति मिली रहती है। कबीले के इन सरदारों को कुछ भौतिक सुविधाएं प्रदान की जाती है जैसे उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जाएगी, उनके शासन के लिए एक इलाका निर्धारित कर दिया जाएगा, धार्मिक नेताओं के साथ उनके उद्भावनापूर्ण संबंध विकसित होने में मदद की जाएगी, उनके लिए मस्जिदें आदि बनवा दी जाएंगी आदि-आदि। इसके अलावा उन्हें वे सारी आर्थिक और सामाजिक सुविधाएं भी प्राप्त होंगी जो सत्ताधारी वर्ग को सुलभ हैं। ऐसा होने के बावजूद वे समूह के रूप में अथवा व्यक्तिगत तौर पर मुक्ति आंदोलन के साथ नहीं जुड़ेंगे, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। अनेक परंपरागत और धार्मिक नेता मुक्ति संघर्ष के शुरुआती दिनों में इसमें शामिल हुए हैं और इस प्रकार उन्होंने मुक्ति आंदोलन को मजबूत करने में योगदान दिया है।

लेकिन यहां फिर सतर्कता बरतनी होती है। सामान्य तौर पर औपनिवेशिक प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए और विशिष्ट स्थिति में अपने देश के संदर्भ में जिन बातों का उल्लेख किया गया है, उस पर ध्यान दें तो हम देखेंगे कि उत्पीड़क सत्ताधारी वर्ग में कुछ उच्च अधिकारी, कुछ बुद्धिजीवी और ग्रामीण इलाकों में बसे सुविधसंपन्न लोगों के प्रतिनिधि हैं। जब हम मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में इनके सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों पर विचार करते हैं तो इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हमारे सामने आते हैं। इन विभिन्न सामाजिक समूहों के व्यवहार में उनके अपने खास वर्ग की भी भूमिका होती है। सुविधसंपन्न वर्ग मुक्ति संघर्ष में किस तरह की भूमिका निभा सकता है अथवा उसका सकारात्मक योगदान क्या हो सकता है इसके मूल्यांकन में कमी किए बगैर मुक्ति आंदोलन के संचालकों को चाहिए कि वे अपने कार्य का आधार लोक संस्कृति को बनावें। औपनिवेशिक दमन का मुकाबला सांस्कृतिक हथियार से किया जा सकता है। मुक्ति आंदोलन के पहले चरण को शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और मजदूरों की सांस्कृतिक गतिविधियों से शुरू किया जा सकता है। मुक्ति आंदोलन तथा उस जनता के बीच, जिसका यह आंदोलन प्रतिनिधित्व करता है, राजनीतिक और नैतिक एकता का अर्थ है उन तमाम सामाजिक समूहों के बीच सांस्कृतिक एकता हासिल करना जो किसी भी मुक्ति संघर्ष के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एकता एक तरफ तो परिवेशजन्य यथार्थ एवं जनता की बुनियादी समस्याओं और आकांक्षाओं के बीच पूरी तरह तादात्म्य स्थापित करके तथा दूसरी तरफ संघर्ष में शामिल विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच प्रगतिशील सांस्कृतिक पहचान के जरिए हासिल की जा सकती है।

अपने विकास के साथ मुक्ति आंदोलन को चाहिए कि वह विविध हितों के बीच समरसता पैदा करे, अंतर्विरोधों को हल करे तथा मुक्ति और प्रगति की तलाश में समान उद्देश्यों को परिभाषित करे। अगर आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इन उद्देश्यों को पूरी तरह अपने मन में बैठा लेता है और तमाम कठिनाइयों एवं कुर्बानियों के बावजूद अपने संकल्प पर अडिग रहता है तो यह बहुत बड़ी राजनैतिक और नैतिक विजय कही जाएगी। यह एक ऐसी सांस्कृतिक उपलब्धि होगी जिसका मुक्ति आंदोलन के विकास और इसके सफल होने में निर्णायक महत्व है।

उत्पीड़कों की संस्कृति और उत्पीड़न के शिकार लोगों की संस्कृति के बीच जितना ही अधिक अंतर होगा उतना ही ज्यादा इस विजय की संभावना तेज हो जाएगी। इतिहास ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी विजेता को उस देश की जनता पर शासन करना कम कठिन होता है जिस देश की जनता की संस्कृति और विजेता की संस्कृति काफी हद तक मिलती-जुलती है।

उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा अफ्रीका में जो ढेर सारी गंभीर गलतियां की गयीं उनमें से एक गलती यह थी कि उसने अफ्रीकी जनता की सांस्कृतिक शक्ति को या तो नजरअंदाज किया या उसे कम करके आंका। यह प्रवृत्ति पुर्तगाल शासित उपनिवेशों में खासतौर से देखने में मिली-यहां उपनिवेशवादी ताकतें अफ्रीकी लोगों के सांस्कृतिक मूल्यों के अस्तित्व को नकार कर ही संतुष्ट नहीं हुई बल्कि उन्होंने हर तरह की राजनैतिक गतिविधियों में भी भाग लेने से अफ्रीकियों को रोके रखा। पुर्तगाली उपनिवेशों की जनता द्वारा किये गये राजनीतिक सशस्त्र प्रतिरोध को अफ्रीका के अन्य क्षेत्रों की तरह ही साम्राज्यवादियों ने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता से कुचल दिया और उसके इस काम में कुछ देशी सत्ताधरी वर्गों ने मदद पहुंचाई। अभिजात्य वर्ग के लोगों में से उन लोगों को एकदम नष्ट कर दिया गया जो जनता के इतिहास और जनता की संस्कृति के प्रति निष्ठावान थे। पूरी की पूरी आबादी को मौत के घाट उतार दिया गया। हर तरह के अपराध और शोषण का सहारा लेकर उपनिवेशवादी साम्राज्य स्थापित किये गये लेकिन जनता के सांस्कृतिक प्रतिरोध को नष्ट नहीं किया जा सका। उपनिवेशवादियों से हाथ मिलाकर काम कर रहे कुछ सामाजिक समूहों द्वारा छल किये जाने के बावजूद अफ्रीकी संस्कृति हर तरह के तूफानों को झेलती हुई अपनी अस्मिता को बचाये रख सकी। इसने गांवों में, जंगलों में और उपनिवेशवाद के शिकार लोगों की अगली पीढ़ी के दिलों में शरण ली।

जिस प्रकार कोई बीज उन अनुकूल स्थितियों का इंतजार करता है जिसमें वह अपनी वंश परंपरा को आगे ले जाने और उसे विकसित करने के लिए अंखुए का रूप ले सके, उसी प्रकार अफ्रीकी जनता की संस्कृति राष्ट्रीय मुक्ति के लिए चल रहे संघर्ष के दौरान फिर प्रस्पफुटित हो रही है। इन संघर्षों का कोई भी स्वरूप क्यों न हो, इन्हें सफलता मिले अथवा विफलता और संघर्ष का दौर लंबा हो या कम, ये इस उपमहाद्वीप के इतिहास में स्वरूप और सारतत्व दोनों की दृष्टि से एक नये युग की शुरुआत कर रहे हैं और अफ्रीकी जनता के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तत्व का संचार कर रहे हैं। संस्कृति इतिहास की उपज है और यह प्रत्येक क्षण में समाज की तथा निजी रूप में एवं सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य की भौतिक और आत्मिक सच्चाई को अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक संस्कृति में कुछ बुनियादी एवं गौण तत्व होते हैं, इसमें शक्ति भी होती है और कमजोरी भी, इसमें खूबियां भी होती हैं और खामियां भी, इसके सकारात्मक पहलू भी होते हैं और नकारात्मक भी तथा इसमें प्रगतिशील तत्व भी होते हैं और जड़ता पैदा करने वाले तथा पीछे ले जाने वाले तत्व भी। इस दृष्टि से अगर हम देखें तो हम यह भी पाते हैं कि संस्कृति एक समाजिक यथार्थ है जो मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा से परे है। इस पर उसकी चमड़ी के रंग अथवा उसकी आंखों के आकार का कोई असर नहीं पड़ता।

जैसा कि हमने पहले कहा मुक्ति आंदोलन को चाहिए कि वे अपने क्रियाकलापों को जनता की संस्कृति की सम्यक जानकारी पर आधारित करें और उनके सांस्कृतिक तत्वों के वास्तविक महत्व को तथा प्रत्येक सामाजिक समूह के विविध सांस्कृतिक स्तरों को समझे। मुक्ति आंदोलन को इस योग्य भी होना चाहिए कि वह जनता के सांस्कृतिक मूल्यों की बुनियादी और गौण बातों को जाने, इसके सकारात्मक और नकारात्मक, प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी, शक्तिशाली और कमजोर पहलुओं को पहचाने। मुक्ति आंदोलन के नेताओं को इस बात का जितना ही ज्यादा एहसास होगा कि मुक्ति का मतलब केवल राजनीतिक आजादी हासिल करना नहीं है बल्कि उत्पादक शक्तियों को समग्र रूप से स्वतंत्र कराना है तथा लोगों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रगति का निर्माण करना है, वे उतनी ही शिद्दत के साथ मुक्ति संघर्ष के चौखटे के अंदर संस्कृति के मूल्यों को विश्लेषित करने की जरूरत महसूस करेंगे। सांस्कृतिक मूल्यों के ऐसे विश्लेषण की जरूरत उस समय और भी तीव्र हो जाती है जब औपनिवेशिक दमन का मुकाबला करने के लिए मुक्ति आंदोलन को एक सशक्त राजनीतिक संगठन के नेतृत्व में जनता को लामबंद करना पड़ता है ताकि राष्ट्रीय मुक्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष छेड़ा जा सके।

(यह पूरा भाषण अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है)

लुटेरे उद्योगपति और विद्रोही: दूसरी किस्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/12/2013 04:36:00 PM

हावर्ड ज़िन की चर्चित किताब अ पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स के 11 वें अध्याय  रॉबर बैरन्स ऐंड रेबेल्स का हिंदी अनुवाद. इसके अनुवादक हैं लाल्टू. अध्याय लंबा है, इसलिए हम इसे क्रमश: पोस्ट कर रहे हैं. पहली किस्त आप पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए दूसरी किस्त.
 
जॉन डी राकेफेलर की शुरुआत क्लीवलैंड शहर में एक पुस्तक विक्रेता के रूप में हुई। वह व्यापारी बना, उसने धन इकट्ठा किया और निर्णय लिया कि नए तेल-खनिज के उद्योग के आने से, तेल-खनिजशोधकों पर नियंत्रण रखने वाला ही पूरे उद्योग जगत पर नियंत्रण कर पाएगा। उसने 1862 में पहला तेल-खनिजशोधक खरीदा, और 1870 तक ओहायो राज्य की स्टैंडर्ड आयल कंपनी बना ली और रेल-कंपनियों के साथ गुप्त समझौते किए कि अगर वे उन्हें अपनी कीमतों पर रियायतें दें तो वह उनके जरिए तेल एक जगह से दूसरी जगह भेजेगा- इस तरह अपने प्रतियोगियों का व्यापार ही वह खा गया।

एक स्वच्छंद तेल शोधन-व्यापारी ने कहा: “अगर हम अपना व्यापार उनके हाथों बेच न दें … तो हमें कुचल दिया जाएगा … एक ही खरीदार बाज़ार में था और हमें उन्हीं की शर्तों पर सौदा करना था।” इस तरह के मेमो (निर्देश) स्टैंडर्ड आएल कंपनी के अफसरों को ज़ारी किए गए: “विल्कर्सन और सहयोगी कंपनी को सोमवार 13 तारीख को तेल की एक गाड़ी गई है … पेंच जरा और घुमाओ।” स्टैंडर्ड आयल कंपनी के लोगों ने बफलो शहर में एक प्रतियोगी तेल शोधक कंपनी के मुख्य मेकेनिक के साथ मिलीभगत से एक विस्फोट करवाकर उस कंपनी को धमाकों के झटकों से हिला कर रख दिया।

1899 तक स्टैंडर्ड आयल कंपनी ऐसी होल्डिंग कंपनी बन चुकी थी, जिसके नियंत्रण में अन्य कई कंपनियों के स्टाक आ चुके थे। पूँजी 11 करोड़ डालर की थी, मुनाफा हर साल 4 करोड़ 50 लाख डालर था और जान डी राकेफेलर की कुल संपत्ति का अनुमान 20 करोड़ डालर का था। जल्दी ही वह लोहा, तांबा, कोयला, जहाजरानी और बैंकों (चेज़ मैनहाटन बैंक) के व्यवसाय में आने वाला था। हर साल मुनाफा 8 करोड़ 10 लाख डालर तक बढ़ने वाला था और राकेफेलर परिवार की संपत्ति 2 अरब डालर तक हो जानी थी।

ऐंड्रू कार्नेगी 17 साल की उम्र में टेलीग्राफ क्लर्क था, फिर वह पेंसिलवानिया रेलरोड कंपनी के अध्यक्ष का सचिव बना। इसके बाद वह वाल स्ट्रीट (न्यूयार्क की प्रख्यात गली, जहाँ दुनिया के सबसे पुराने स्टाक एक्सचेंज में एक है) में बड़ी कमीशनों पर रेलरोड बांड बेचने लगा। जल्दी ही वह लखाधिपति हो गया। 1872 में वह लंदन गया, इस्पात बनाने की नई बेसेमर प्रक्रिया देखी और लाखाधिक डालरों के खर्च से इस्पात का कारखाना बनाने के लिए संयुक्त राज्य लौटा। कांग्रेस द्वारा अपनी सुविधा के अनुसार तय की गई ऊँची चुंगी दरों के द्वारा विदेशी स्पर्धा दूर रखी गई। 1880 तक कार्नेगी प्रतिमाह 10000 टन इस्पात उत्पन्न कर रहा था। इससे उसे प्रतिवर्ष 15 लाख डालर मुनाफा होने लगा। सन 1900 तक वह हर साल 4 करोड़ डालर कमाने लगा। इसी साल उसने एक रात्रिभोज पार्टी में अपना इस्पात कारखाना जे.पी. मार्गन को बेच देने का  समझौता किया। एक कागज़ पर उसने कीमत लिखी: 49,20,00,000 डालर।

मार्गन ने सं.रा. इस्पात कारपोरेशन बनाया, जिसमें कार्नेगी की कंपनी को दूसरों के साथ जोड़ा गया। उसने 1,30,00,00,000 डालरों के स्टाक और बांड बेचे (सभी कंपनियों की कुल कीमत से 40 करोड़ अधिक)। एकीकरण के एवज में उसने 15 करोड़ डालर की फीस ली। इतने सारे स्टाक मालिकों और बांड मालिकों को मुनाफा कैसे बांटा जा सकता था? इसके लिए यह निश्चित किया जाना जरूरी था कि कांग्रेस चुंगी दरों की वृद्धि का अनुमोदन कर विदेशी इस्पात बाज़ार में आने से रोके; स्पर्धा रोके और कीमत 28 डालर प्रति टन निश्चित रखे और 2,00,000 लोगों को हर रोज बारह घंटों तक अपना परिवार किसी तरह ज़िंदा रखने भर लायक दिहाड़ी पर काम करवाया जाए।

और कहानी बढ़ती रही - धूर्त, कुशल व्यापारी एक के बाद एक उद्योगों में अपने साम्राज्य बनाते, स्पर्धा का गला घोंटते, ऊँची कीमतें रखते, मजूरी कम देते, सरकारी भर्त्तूकी (सब्सिडी) का फायदा उठाते। ये उद्योग “कल्याणकारी राज्य-सत्ता” से लाभ लेने वाले पहले तबके में थे। सदी बदलने तक अमेरिकन टेलीफोन और टेलीग्राफ कंपनी का राष्ट्रीय टेलीफोन तंत्र पर पूरा एकाधिपत्य हो गया। कृषि मशीनरी का 85 प्रतिशत इंटरनेशनल हार्वेस्टर कंपनी बना रही थी और हर दूसरे उद्योग में संसाधन कम से कम हाथों में नियंत्रित होते गए। इन एकाधिकार व्यापार-संस्थाओं (मोनोपोली) में से कई सारों में बैंकों के हित (पूँजी) जुड़े थे और कारपोरेशन (व्यवसाय-मंडलों) अध्यक्षों का एक बहुत ताकतवर नेटवर्क बैंकों द्वारा ही संचालित था। इनमें से हरेक कई दूसरी व्यवसाय-मंडलों की बोर्ड की सभाओं में बैठता था। बीसवीं सदी की शुरुआत में तैयार की गई एक सीनेट रीपोर्ट के अनुसार अपने जीवन के शिखर काल में मार्गन अड़तालीस निगमों (कारपोरेशनों) के बोर्ड का सदस्य था। राकेफेलर सैंतीस निगमों के बोर्ड का सदस्य था।

इसी बीच संयुक्त राज्य की सरकार ठीक उसी राह पर चलती रही, जैसी कार्ल मार्क्स ने एक पूँजीवादी राज्य के लिए कल्पना की थी: शांति बनाए रखने के लिए निष्पक्षता का नाटक करते हुए धनी लोगों की मदद करना। ऐसा नहीं था कि धनी लोगों में आपस में सहमति थी। नीतियों को लेकर उनके झगड़े चलते रहते। उच्च-वर्ग के झगड़ों को शांतिपूर्ण तरीकों से निपटाना, निम्न-वर्गों के विद्रोहों पर नियंत्रण करना और व्यवस्था के दीर्घकालीन स्थायित्व की सुरक्षा के लिए उपयुक्त नीतियाँ बनाना राज्य-सत्ता का उद्देश्य था। 1877 में रदरफोर्ड हेएस के चुनाव में डेमोक्रेट और रिपब्लिक पार्टियों के बीच समझौते से दिशा तय हो गई। चाहे डेमोक्रेट जीतें या रिपब्लिकन, राष्ट्रीय नीतियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्त्तन नहीं होना था।

जब 1884 में डेमोक्रेट ग्रोवर क्लीवलैंड, प्रेसीडेंट के पद पर के लिए खड़ा हुआ, देश के लोगों का आम खयाल यह था कि वह एकाधिकार व्यवसाय संस्थाओं (मोनोपोली) और निगमों की ताकत का विरोधी था, और रीपब्लिकन पार्टी, जिनका प्रार्थी जेम्स ब्लेन था, धनी लोगों के हितों के पक्ष में थी। पर जब क्लीवलैंड ने ब्लेन को हरा दिया, जे गूल्ड ने उसे तार पर संदेश भेजा: “मेरा विश्वास है…कि देश के विशाल व्यवासायिक हित आपके हाथों में सुरक्षित होंगे।” और उसने ठीक ही सोचा था।

क्लीवलैंड के मुख्य सलाहकारों में एक विलियम ह्विटनी था, जो कि लखपति था और व्यापार-मंडलों का वकील था, जिसने स्टैंडर्ड आयल के धनाढ्य परिवार में शादी की और क्लीवलैंड ने उसे नौसेना का सेनाधिकारी (मंत्री) नियुक्त किया। उसने तुरंत कार्नेगी के कारखानों से कृत्रिम ऊँची कीमतों पर इस्पात खरीदकर “फौलादी नौसेना” बनाने का काम शुरु किया। क्लीवलैंड ने खुद उद्योगपतियों को भरोसा दिया कि उसके चुने जाने पर उन्हें घबराना नहीं चाहिए; “मेरे प्रेसीडेंट रहने की अवधि में व्यवसाय हितों में प्रशासकीय नीतियों से कोई हानि नहीं पहुंचेगी… एक पार्टी से दूसरी को कार्यकारी भार के ह्स्तांतरण से मौजूदा हालातों को कोई गंभीर झटका नहीं लगेगा।”

प्रेसीडेंट के चुनाव में असली मुद्दों को नहीं उठाया गया था; विशेष नीतियों के अपनाने से कौन से हितों को ज्यादा फायदा होगा और किनको क्षति पहुंचेगी, इसकी स्पष्ट समझ नहीं थी। आम चुनावी प्रचार का ही माहौल था, जिसमें पार्टियों में बुनियादी समानताओं को छिपाकर व्यक्तित्व, अफवाहों और तुच्छ बातों पर ही अधिक ध्यान दिया गया। उस समय के गहरे समझदार साहित्य आलोचक हेनरी ऐडम्स ने चुनाव के बारे में अपने एक मित्र को लिखा:

यहाँ हम ऐसी राजनीति में डूबे हुए हैं, जिसके रोचक स्वरूप को शब्दों में नहीं बखाना जा सकता। बड़े-बड़े मुद्दे हैं… पर मजे की बात है असली मुद्दों पर कोई बात नहीं करता। आम सहमति से वे इन विषयों को चर्चा से बाहर ही रखते हैं। इन पर बातें करनें से हम घबराते हैं। इनकी जगह प्रेस में बड़ी ही मजेदार बहस इस बात पर चल रही है कि मिस्टर क्लीवलैंड की कोई अवैध संतान है या नहीं या एक या अधिक रखैलों के साथ उनका संसर्ग था या नहीं।

सन् 1887 में जब खजाने में बहुत ज्यादा अतिरिक्त कोष था, एक अकाल के दौरान टेक्सास राज्य के किसानों को बीज खरीदने में राहत दिलवाने के लिए क्लीवलैंड ने 1 लाख डालर के आबंटन के बिल के खिलाफ ‘वीटो’ अधिकार का उपयोग किया। उसने कहा: “ऐसे मौकों पर संघीय सहायता से … सरकार की ओर से पितृत्वमूलक सहयोग की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और हमारे राष्ट्रीय चरित्र की दृढ़ता में कमी आती है।” पर उसी साल क्लीवलैंड ने अपने अतिरिक्त स्वर्ण भंडार का उपयोग कर धनी बांड-धारकों को 100 डालर प्रति बांड की नियत राशि से 28 डालर अधिक की दर पर भुगतान किए- यह कुल 4करोड़ 50 लाख डालर का उपहार था।

क्लीवलैंड प्रशासन द्वारा मुख्य सुधार कार्य को देखने पर अमरीका में सुधार के कानूनों पर से परदा उठता है। 1887 का अंतर्राज्यीय व्यापार कानून, उपभोक्ताओं के पक्ष में रेल-कंपनियों के नियंत्रण के लिए बना था। बास्टन ऐंड मेइन व अन्य रेलकंपनियों के पक्ष के वकील और जल्द ही क्लीवलैंड का एटर्नी जनरल बनने वाले, रिचर्ड ओलनी, ने अंतर्राज्यीय व्यापार आयोग के खिलाफ शिकायत कर रहे रेल कंपनी के अधिकारियों को बतलाया “रेलकंपनी के दृष्टिकोण से” आयोग को रद कर देना उचित न होगा।

उसने समझाया:

यह आयोग… रेलकंपनियों के बिल्कुल पक्ष में है या किया जा सकता है। इससे रेल कंपनियों पर सरकारी नियंत्रण की आम माँग की तुष्टि होती है, वहीं यह नियंत्रण नाममात्र को ही है… कौशल इसी में है कि आयोग का ध्वंस न कर, इसका फायदा उठाया जाए।

1887 के राष्ट्र के नाम संवाद (स्टेट आफ द यूनियन मेसेज) में ऐसी ही बात क्लीवलैंड ने खुद कही थी, साथ ही एक चेतावनी भी: “सुरक्षित,संतुलित और सोचे-समझे सुधार के लिए अब मौका दिया जा रहा है। और हममें से कोई इस बात को न भूल जाए कि कभी ऐसा हो सकता है कि लताड़े हुए और परेशान लोग… अन्यायों को तेजी से और पूरी तरह ख़त्म करने की जिद पकड़ लें।”

गृहयुद्ध के बाद के वर्षों के अपने रोचक अध्ययन द पोलीटिकोस (राजनीतिविद) में मैथ्यू जोसेफसन ने क्लीवलैंड के बाद 1889 से 1893 तक प्रेसीडेंट बने रीपब्लिकन बेंजामिन हैरिसन के बारे में लिखा है: “बेंजामिन हैरिसन अकेला ऐसा शख्स था जिसने रेलवे कारपोरेशनों में वकील और सैनिक दोनों की हैसियत से काम किया था। उसने संघीय अदालत में हड़तालियों (1877 के) के खिलाफ सजा की पैरवी की थी … और हड़ताल के दौरान उसने सैनिकों की एक कंपनी (टुकड़ों) को संगठित कर उनकी कमान भी सँभाली थी…”

हैरिसन के शासनकाल में भी सुधार की बातें हुईं। 1890 में पारित शर्मन अविश्वास कानून की परिभाषा थी “गैरकानूनी बाधाओं से व्यापार-वाणिज्य को बचाने का कानून।” इसके तहत राज्यों के बीच या विदेशों के साथ व्यापार को रोकने के लिए एक जुट होना या षड्यंत्र करना गैरकानूनी करार दिया गया। कानून निर्माता सीनेटर जान शर्मन ने एकाधिकार व्यवसाय के आलोचकों को शांत करने की ज़रूरत के बारे में इस तरह समझाया: “पुराने समय में… एकाधिकार व्यवसाय होते थे, पर आज जैसे विपुल व्यापार-दानव नहीं थे। आपको उनका सहयोग करना ही होगा, नहीं तो समाजवादी, साम्यवादी, और ध्वंसकों के लिए तैयार रहें। आज समाज में ऐसी विस्फोटक ताकते हैं जैसी पहले कभी नहीं थी…”

जब 1892 में क्लीवलैंड को फिर से प्रेसीडेंट चुना गया, यूरोप गए ऐंड्रू कार्नेगी को अपने इस्पात कारखानों के मैनेजर हेनरी क्ले फ्रिक से ख़त मिला: “प्रेसीडेंट हैरिसन के लिए मुझे बड़ा अफसोस है, पर प्रशासन में परिवर्तन से हमारे हितों को किसी प्रकार का नुकसान पहुँचने की कोई संभावना मुझे नहीं दिखती।” 1893 के आतंक और मंदी से देश में हो रहे विक्षोभ को रोकने के लिए क्लीवलैंड ने सेना का उपयोग किया। ऐसा वाशिंगटन शहर में आए बेकार लोगों की “कोक्सी की सेना” के दमन के लिए और बाद में फिर अगले साल रेल-कंपनियों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर की हड़तालों को तोड़ने के लिए किया गया।

इसी बीच, अपने गंभीर, काले कपड़ों वाले न्याय का चेहरा लिए होने के बावजूद, उच्च न्यायालय ने भी उच्च शासक-वर्गों के हित में अपनी भूमिका अदा की। जब उसके सदस्य ही प्रेसीडेंट द्वारा चुने जाते हैं और सीनेट उनको पद ग्रहण करने की अनुमति देता है, तो वे स्वच्छंद हो ही कैसे सकते हैं? जब इसके सदस्य अक्सर पहले धनी वकील रह चुके हों और करीब-करीब हमेशा ही उच्च-वर्ग से आए हों, तो और गरीबों के बीच उसकी निष्पक्ष भूमिका हो ही कैसे सकती थी? उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में न्यायालय ने अंतर्राज्यीय व्यापार पर नियंत्रण स्थापित कर राष्ट्रीय तौर पर नियंत्रित अर्थव्यवस्था की कानूनी बुनियाद खड़ी की थी, और संधि के मसौदों को पवित्रता का चरित्र देकर कॉरपोरेट पूंजीवाद का कानूनी आधार भी बना दिया था।

1895 में अदालत ने शर्मन कानून की ऐसी व्याख्या पेश की, जिससे कि इसकी कोई ताकत न रहे, इसके अनुसार चीनी के शोधन में एकाधिकार का होना निर्माण में एकाधिकार था, न कि व्यापार में, इसलिए शर्मन कानून का उपयोग कर इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता (सं.रा. बनाम ई सी नाईट कं.) अदालत ने यह भी कहा कि अन्तर्राज्यीय हड़तालों के खिलाफ शर्मन कानून का इस्तेमाल किया जा सकता है, चूँकि हड़तालों से व्यापार में बाधा पहुँचती है। ऊँची आय पर ऊँचे कर लगाने की कांग्रेस की कोशिश को भी अदालत ने गैरकानूनी घोषित किया (पोलाक बनाम फार्मर्स लोन ऐंड ट्रस्ट कंपनी)। बाद के वर्षों में अदालत ने स्टैंडर्ड आयल व अमेरिकी तंबाकू एकाधिकार व्यापारों को तोड़ना अस्वीकार कर दिया। यह तर्क दिया गया कि शर्मन ऐक्ट का इस्तेमाल व्यापार में सिर्फ "ना सिर पैर की” बाधाओं को रोकने के लिए किया जा सकता है।

न्यूयार्क के एक बैंक मालिक ने 1895 में उच्च न्यायालय को टोस्ट (दारु चढ़ाते) करते हुए कहा: “महाशयों, पेश है संयुक्त राज्य का उच्च न्यायालय -  डालर का संरक्षक, निजी संपत्ति का रक्षक, संपत्ति की लूट का दुश्मन, गणतंत्र का मुख्य खंभा।”

चौदहवें संशोधन के कानून बन जाने के कुछ ही समय बाद उच्च न्यायालय ने काले लोगों की सुरक्षा में इसकी भूमिका का खंडन करना शुरू किया और व्यापार-मंडलों की सुरक्षा के लिए इसे बढ़ाना शुरु किया। पर 1877 में उच्च न्यायालय के निर्णय से (मन बनाम इलीनाय राज्य) अनाज उठाने की मशीनों के लिए किसानों से लिए जाने वाली कीमत पर नियंत्रण करने वाले राज्य के कानूनों को स्वीकृति मिली। अनाज उठाने की मशीन की कंपनी ने पैरवी की कि वह एक ऐसी व्यक्ति है जिसकी संपत्ति उससे छीन ली गई है। इससे चौहदवें संशोधन की इस घोषणा को अमान्य किया जा रहा था, जिसमें कहा गया था, “न कोई राज्य किसी व्यक्ति से गैरकानूनी तरीके से उसकी जिंदगी, स्वतंत्रता या संपत्ति छीनेगी।” उच्च न्यायालय ने इसे नहीं माना और कहा कि अनाज उठाने वाली मशीनें महज निजी संपत्ति न थीं, बल्कि उसमें “जनहित” निहित था और इसलिए उनपर नियंत्रण किया जा सकता है।

इस निर्णय के एक साल बाद, धनी लोगों के लिए काम करते वकीलों के संगठन, अमरीकी बार (वकील) संघ ने अदालत के निर्णय को पलटने के लिए शिक्षा प्रचार शुरू किया। कई बार इसके सभापतियों ने कहा, “अगर साम्यवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ संपत्ति के हित के पक्ष में ट्रस्टों (निधियों) को औजार की तरह उपयोग किया जा सकता है, तो उनका (ट्रस्टों का) होना वांछनीय है। और: “अक्सर एकाधिकार  ज़रुरी और फायदेमंद भी होता है।”

सन् 1886 तक उन्हें सफलता मिल गई। राज्यों की विधानसभाओं ने जागरुक किसानों के दबाब पर रेल-कंपनियों द्वारा किसानों से ली जा रही दरों पर नियंत्रण के कानून पास कर दिए थे। उस साल उच्चतम न्यायालय ने कहा (वाबाश बनाम इलीनाय राज्य) कि राज्यों को ऐसा करने का अधिकार नहीं था और यह संघ की ताकत में उनका हस्तक्षेप था। इस एक साल में ही व्यापार-मंडलों पर नियंत्रण के लिए पारित 230 राज्य कानूनों को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया।

इस समय तक उच्चतम न्यायालय ने यह तर्क स्वीकार कर लिया था कि व्यापार-मंडल “व्यक्ति” थे और उनका धन चौदहवें संशोधन द्वारा उचित रुप से, संरक्षित संपत्ति थी। कहने को, यह संशोधन नीग्रो जाति के अधिकार की रक्षा के लिए पारित हुआ था, पर 1890 से 1910 तक चौदहवें संशोधन से जुड़े जो मामले उच्चतम न्यायालय में आए, उनमें उन्नीस तो नीग्रो लोगों से सबंधित थे, 288 व्यापार-मंडलों से जुड़े थे।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संविधान के व्याख्याता मात्र नहीं थे। वे विशेष पृष्ठभूमि से आए लोग थे, जिनके विशेष स्वार्थ थे। 1875 में उनमें से एक (न्यायाधीश सैमुएल मिलर) ने कहा था: “ऐसे न्यायाधीशों से बहस में उलझना व्यर्थ है जिन्होंने चालीस साल तक रेलरोड कंपनियों की और इस तरह के तमाम पूंजीवादी हितों की वकालत की हो…” 1893 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश डेविड जे ब्रूअर ने न्यूयार्क के वकील संगठन को भाषण देते हुए कहा:
 “यह एक अमिट नियम है कि समाज का धन कुछ ही लोंगों के हाथ में होगा… अधिकांश लोग उस दीर्घ आत्म-विरति और संचय को सहने को अनिच्छुक हैं, जिससे धन जुटाना संभव होता है … और इसलिए हमेशा ऐसा होता रहा है, और जब तक मानव स्वभाव को फिर से नहीं ढाला जाता, ऐसा हमेशा सच होगा कि राष्ट्र की संपत्ति कुछ ही लोगों के हाथ में होगी, और अधिकांश लोग दैनिक काम से मिले पैसों पर ही जिएंगे।

यह महज 1880 या 1890 के बाद के वर्षों की सनक ही नहीं थी – इसकी शुरुआत राष्ट्र संस्थापक पिताओं तक की थी, जिन्होंने ब्लैकस्टोन’स कामेंट्रीज़ (ब्लैकस्टोन की टिप्पणियों) के युग में कानून सीखे थे, जिसमें कहा गया था: “निजी संपत्ति के प्रति कानून का इतना सम्मान है कि इसको छीने जाने की लेशमात्र अनुमति भी कानून नहीं देता; कतई नहीं, भले ही इससे संपूर्ण समाज का आम भला होता हो।”

आधुनिक काल में नियंत्रण के लिए ताकत या कानून से भी अधिक कुछ और ज़रूरी होता है। इसके लिए यह ज़रूरी है कि शहरों और फैक्ट्रियों में खतरनाक तादाद में मौजूद विद्रोह की संभावना वाले लोगों को यह समझाना कि जो भी है, ठीक ही है। इसलिए स्कूलों, धार्मिक प्रतिष्ठानों, लोकप्रिय साहित्य में यह पढ़ाया गया है कि धनी होना श्रेष्ठ होने की निशानी है, ग़रीबी व्यक्तिगत असफलता का प्रतीक है। एक ग़रीब व्यक्ति के लिए ऊपर चढ़ने की एक ही राह है। असाधारण कोशिशों और असाधारण सौभाग्य के बल पर धनिक वर्ग में शामिल होना ही वह राह है।

गृहयुद्ध के बाद के उन दिनों में येल विश्वविद्यालय के कानून महाविद्यालय से डिग्री प्राप्त, पादरी और सर्वाधिक बिकने वाली किताबों के लेखक रसल कॉनवेल नामक एक व्यक्ति ने पाँच हजार से भी अधिक बार ‘हीरों के विस्तीर्ण क्षेत्र’ नामक एक ही भाषण देश भर के करीब करोड़ लोगों को सुनाया। उसकी वाणी यह कहती थी कि पर्याप्त कठिन काम करने पर कोई भी धनी हो सकता है – अगर ध्यान से देखा जाए, तो किसी भी जगह ‘हीरों के विस्तीर्ण क्षेत्र’ बिखरे पड़े हैं। उदाहरणत: -
मैं कहता हूं कि तुम्हें धनी होना चाहिए, और धनी होना तुम्हारी जिम्मेदारी है…. धनी होने वाले व्यक्ति समाज में पाए जाने वाले सबसे ईमानदार व्यक्ति हैं। मैं साफ-साफ कह दूं … अमरीका में सौ में से अट्ठानबे धनी व्यक्ति ईमानदार हैं। इसलिए वे धनी हैं। इसलिए उनके पास लोगों ने पैसे दिए हैं । इसलिए वे विशाल उद्योग चलाते हैं और साथ काम करने को लोगों को जुटा सकते हैं। …
… गरीबों के साथ मेरी सहानुभूति है, पर सहानुभूति के लायक गरीबों की संख्या बहुत कम है। ऐसे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखना, जिसे ईश्वर ने उसके कुकर्मों की सजा दी है, … ग़लत है … ध्यान रहे कि अमरीका में कोई ऐसा ग़रीब नहीं है जिसे अपनी कमियों के कारण ग़रीबी नहीं झेलनी पड़ रही है।

कॉनवेल टेंपल विश्वविद्यालय का संस्थापक था। राकेफेलर ने देशभर में महाविद्यालयों को दान दिया था और शिकागो विश्वविद्यालय की स्थापना में मदद की। सेंट्रल पैसिफिक (मध्य प्रशांत-रेलकंपनी) के हंटिंगटन ने दो नीग्रो महाविद्यालयों को पैसे दिए- हैंम्पटन इंस्टीचिउट और टस्केगी इंस्टीचिउट। कार्नेगी ने महाविद्यालयों और पुस्तकालयों को पैसे दिए। जॉन्स हॉपकिन्स (विश्वविद्यालय) की स्थापना एक लखपति व्यवसायी ने की थी। और लखपति कार्नेलियस वैंडरबिल्ट, एज़रा कॉर्नेल, जेम्स ड्यूक और लीलैंड स्टैन्फोर्ड ने अपने नामों से विश्वविद्यालय बनाए।

अपनी विशाल आय का हिस्सा इस तरह बाँटकर धनी लोग दानी कहलाए। इन शिक्षा संस्थाओं ने विरोध को प्रोत्साहित नहीं किया; इन्होंने अमेरिकन व्यवस्था के दलालों को प्रशिक्षित किया- शिक्षक, डाक्टर, वकील, प्रशासक, इंजीनियर, तकनीशियन, राजनीतिविद- ऐसे लोग जिन्होंने व्यवस्था पर आफत आने पर बीच-बचाव का काम करते हुए व्यवस्था को गतिमान रखा।

इसी बीच, सरकारी स्कूली शिक्षा के प्रसार से कार्यकुशल और आंशिक रूप से कुशल मज़दूरों की एक पूरी पीढ़ी ने लिखना, पढ़ना और सवाल करना सीखा। यही नए औद्योगिक युग का पढ़ा-लिखा श्रमिक वर्ग बना। यह ज़रूरी था कि ये लोग अधिकारियों के प्रति आज्ञाकारी हों। 1890 के बाद के वर्षों के बारे में अध्ययन कर रहे एक पत्रकार ने लिखा: “शिक्षक की निर्दयी सत्ता साफ दिखती है, उसकी उँगली तले पूरी तरह दबे छात्र चुपचाप और स्थिर हैं, कक्षा का आध्यात्मिक माहौल गीला और ठंडा है।”

इसके पहले 1859 में मैसाचुसेट्स राज्य के शिक्षा बोर्ड के सचिव ने लोवेल शहर के मिल मालिकों की अपने मजदूरों को शिक्षित करने की आकांक्षा को इस तरह समझाया था:
अपने श्रमिकों की मेधा के बारे में अन्य वर्गों या हितों की अपेक्षा फैक्ट्री के मालिक ज्यादा चिंतित है। अगर ये श्रमिक अच्छे पढ़े-लिखे हों और मालिक न्यायोचित ढंग से उनसे निपटें, तो विवाद और हड़ताल कभी न हों, न ही जनता की सोच को पाखंडी व्यक्ति भ्रम में उलझा सकें और न ही अस्थाई और विभाजक सोच से ही उनका नियंत्रण हो।

जोएल स्प्रिंग ने अपनी पुस्तक एजुकेशन ऐंड द राइज़ आफ द कॉरपोरेट स्टेट (शिक्षा और कॉरपोरेट-निर्भर राज्य-सत्ता) में लिखा है: "उन्नीसवीं सदी के स्कूल की कक्षा में फैक्ट्री जैसा माहौल पनपना अकारण नहीं था।"

यह हाल बीसवीं सदी में भी चलता रहा, जब विलियम बेगली की क्लासरुम मैंनेजमेंट (कक्षा प्रबंधन) शिक्षकों के प्रशिक्षण की मान्य पाठ्य-पुस्तक हो गई और इसके तीस मुद्रण आए। बेगली ने कहा: “शिक्षा के सिद्धांतों का सही अध्ययन करने वाला कक्षा की यांत्रिक रुटीन में उन शैक्षणिक ताकतों को पहचान सकता है, जो बच्चे को एक छोटे से दुष्ट से कानून और शृंखला मानने वाला प्राणी बनाते हैं, जिसमें सभ्य समाज में रहने की योग्यता है।

खुद पर फिदा मार्क्सवादियों और छद्म अंबेडकरियों के नाम

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/08/2013 06:15:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े का यह लंबा लेख उस बहस से उपजा है, जिसमें मार्क्सवादी होने का दावा करने वाले कुछ गिरोहनुमान संगठनों ने अपनी ब्राह्मणवादी मूर्खताओं का सार्वजनिक प्रदर्शन ही नहीं किया, उन्होंने यह भी दिखा दिया कि अपनी मार्क्सवादी दिखने वाली शब्दावली की ओट में वे शासक वर्ग के यथास्थितिवादी हितों से वह कितनी गहराई तक जुड़े हुए हैं. इसी के साथ, इस बहस ने कुछ नकली अंबेडकरियों (अंबेडकराइटों) की अस्मिता की राजनीति और अवसरवाद को भी उजागर किया, जो जाति के उन्मूलन और समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण की चर्चा चलते ही कानों पर हाथ धर लेते हैं और दूर छिटक जाते हैं. यथास्थिति उनका सबसे बड़ा मकसद है. इन दोनों पक्षों पर आनंद तेलतुंबड़े ने काफी विस्तार से लिखा है.

मार्च के दूसरे हफ्ते से लेकर अप्रैल के पहले हफ्ते तक यह बहस काफी विस्तार से हस्तक्षेप पर चली और हाशिया पर आनंद तेलतुंबड़े और रिपब्लिकन पैंथर्स के बयानों को जगह दिया गया. तेलतुंबड़े ने इस पूरे प्रसंग पर काफी दर्द के साथ और बेहद गुस्से में यह आलेख मार्च के आखिरी हफ्ते में लिखा था, जो मूल अंग्रेजी में सन्हति पर प्रकाशित हुआ. हाशिया पर इसका अनुवाद पेश किया जा रहा है. अनुवाद: रेयाज उल हक



साफ साफ कहूं तो मैं चंडीगढ़ जाने के लिए खुद को कोसता हूं. इसलिए उतना नहीं कि मैं महाराष्ट्र में कुछ नकली अंबेडकरियों द्वारा छेड़े गए अंतहीन विवाद से शर्मिंदा हूं, बल्कि इसलिए कि जड़ दिमाग वाले कुछ घमंडी लोगों के एक गिरोह द्वारा खुद को मार्क्सवादियों के रूप में पेश किए जाते हुए देख कर मुझे गहरा दुख हुआ है. मैंने कल्पना की थी कि वहां जातियों की मौजूदा दशा पर और उनके खात्मे के संभावित तरीकों पर गंभीर बहस होगी. लेकिन कुछ घंटों की अपनी छोटी सी मौजूदगी में मुझे यह अहसास हुआ कि इसका मकसद अपने अप्रोच पेपर में पेश किए गए नजरिए को बाहरी लोगों की भागीदारी से और समृद्ध बनाना नहीं था, बल्कि यह साबित करना था कि कैसे वे ही सही हैं और दूसरे सभी गलत.

ऐसे सम्मेलनों का मकसद परेशान करने वाले कुछ मुद्दों पर समझदारी विकसित करने के लिए आजाद और खुली बहसों को मुहैया कराना होता है. ये आमसभाओं की तरह नहीं होतीं, जिनमें आयोजक एकतरफा तौर पर लोगों के सामने अधूरी और बेनतीजा बहस को सार्वजनिक करने का फैसला कर सकते हैं. ऐसा महज इसलिए कि व्यापक जनता समझ के उसी स्तर पर नहीं होती, जिस पर सम्मेलन के प्रतिनिधि हुआ करते हैं, जिनको संबोधित करके बातें कही जाती हैं. इसलिए आयोजकों की बुनियादी गलती यह रही कि उन्होंने अपने इस दावे को साबित करने के लिए सम्मेलन के आधे-अधूरे रिकॉर्डों को सार्वजनिक कर दिया, कि वे विजेता हैं. अगर उनमें जिम्मेदारी का जरा भी अहसास होता तो उन्होंने ऐसा नहीं किया होता. अकेले यह बात ही साबित करती है कि वे जाति की भारतीय हकीकत को समझने से कितनी दूर हैं और वे ऐसे नाजुक मुद्दे को हाथ लगाने के लिहाज से कितने अपरिपक्व हैं.

मीडिया को सनसनी की तलाश रहती है और वे मेरी बातों को संदर्भों से काटते हुए, उनमें से यहां-वहां से कुछ बातों को चुन कर उन पर टूट पड़े. उन्होंने कहा कि मैंने बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा दलितों की मुक्ति के लिए की गई सारी कोशिशों को महान विफलता कहा था. असल बात तो ये है कि अप्रोच पेपर में यह बात पहले से ही मेरे नाम पर मढ़ दी गई थी और इस तरह मैं पहली बार ऐसा धमाकेदार खुलासा नहीं कर रहा था. ऐसी राय मैं विभिन्न संदर्भों में अनेक बरसों से जाहिर करता आ रहा हूं और कभी भी इसे बाबासाहेब अंबेडकर के अपमान के रूप में नहीं लिया गया. जहां तक हिंदी अखबार तक बात के लीक होने की बात है, अभिनव सिन्हा इसे पत्रकारों को देने से इन्कार करते हैं, लेकिन क्या वे इसकी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्योंकि जिस तरह से वे मेरे द्वारा अपनी बात से पलट जाने के रूप में मेरे ‘दूसरे बयान’ पर अटके हुए हैं, वो यह दिखाता है कि मैं जिस संदर्भ के साथ वहां खड़ा हुआ था और अपनी बातें रखी थीं, उसके बारे में उनमें कितनी अज्ञानता है, चाहे वो असली हो या दिखावटी. मैंने शुरुआत में ही अपना संदर्भ साफ कर दिया था कि मुझे इस अप्रोच पेपर में कुछ भी नया नहीं मिला है, सिवाय उस भयानक तोड़-मरोड़ के जिनमें ज्योतिबा फुले, बाबासाहेब अंबेडकर और पेरियार जैसे महान व्यक्तियों के नेतृत्ववाले जाति-विरोधी आंदोलनों की अंतर्वस्तु का ब्योरा देते हुए उन्हें लगभग खारिज कर दिया गया था. इसी तरह से एक निश्चित रेडिकल नजरिए के साथ इन आंदोलनों पर लिखने वाले जानेमाने लेखकों जैसे गेल ओमवेट, सुभाष गाताड़े और मुझे भी खारिज किया गया था. जाति के बारे में ‘मार्क्सवादी’ इतिहासलेखन पर हमेशा लिखी जानेवाली बातों के अलावा, इस पूरे पेपर से गैर-मार्क्सवादी (इसे भारतीय संदर्भ में जाने-पहचाने शब्दों जातिवादी और ब्राह्मणवादी होने से अलगाने वाली रेखा बहुत बारीक है) आंदोलनों, सिद्धांत और विचारों के खिलाफ गहरे पूर्वाग्रह की बू आ रही थी. इसलिए मैंने आयोजकों को फटकारने के खयाल से सिर्फ इन तोड़-मरोड़ों को उजागर भर करने का फैसला लिया, कि इस तरह के जातिवादी रवैए के साथ वे जाति पर बहस करने के लायक नहीं हैं. मैंने अप्रोच पेपर से सिर्फ एक पैराग्राफ चुना जिसमें जातियों पर मेरी तथाकथित राय पर बात की गई थी. ऐसा मैंने सिर्फ इसलिए किया क्योंकि मैंने अपने लिए जो मकसद तय किया था, उस दिशा में मैं सबसे बेहतर यही कर सकता था.

वह पैराग्राफ हिंदी में यों था:

‘‘मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद में समन्वय के एक और प्रमुख प्रस्तोता आनन्द तेलतुम्बड़े एक ओर तो यह मानते हैं कि जाति-उन्मूलन की अम्बेडकर की सारी परियोजनाएँ निष्फल सिद्ध हुईं फिर भी न जाने क्यों अम्बेडकर की पुस्तक जाति-उन्मूलन को (जिसकी विवेचना हम ऊपर कर चुके हैं) भारत में ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ जितना महत्वपूर्ण बताते हैं। तेलतुम्बड़े आरक्षण को एक भँवरजाल मानते हैं और लगातार घटती नौकरियों के इस दौर में उसे निरर्थकप्राय मानते हैं। अस्मिता-राजनीति के भी वे कटु आलोचक हैं। लेकिन मूलाधार-अधिरचना रूपक के फ्रेमवर्क में जाति को समझने के बजाय वे इस फ्रेमवर्क को ही जाति और वर्ग के सम्बन्धों को समझने की राह में बाधा समझते हैं और भारतीय क्रान्ति के लिए जाति को वर्ग संघर्ष से न जोड़ पाना भारतीय कम्युनिस्टों की अक्षम्य भूल मानते हैं। मूलाधार-अधिरचना के प्रश्न पर हम अपनी बात ऊपर कह चुके हैं। तेलतुम्बड़े से भी हमें जाति-उन्मूलन की कोई दिशा नहीं मिलती, न ही यह पता चलता है कि जाति को वर्ग संघर्ष की रणनीति से जोड़ने के लिए अम्बेडकर से मार्क्स वाद को क्या अवदान हासिल होगा!’’

इसके पहले एक वाक्य था, जिसमें मेरा हवाला इस तरह दिया गया था:


‘‘हाँ, ऐसे अधिकांश मा-ले ग्रुप, गेल ओमवेत, आनन्द तेलतुम्बड़े, सुभाष गाताडे आदि-आदि अम्बेडकर के इस मौलिक सैद्धान्तिक अवदान पर विस्फारित-नेत्र रह जाते हैं कि जाति-व्यवस्था महज श्रम विभाजन नहीं बल्कि श्रमिकों का भी विभाजन है और यह चीज़ भारत की विशिष्टता है। नासमझी हमें सामान्य बातों को भी मौलिक मानकर चकित होने के लिए मज़बूर करती है...’’

जातियों के विभाजन को छोटा करके मानते हुए, उसे एक उत्पादन व्यवस्था में किसी की जगह तय करने की व्यवस्था जैसे दूसरे विभाजनों के (ऐसे विभाजन मानसिक और शारीरिक श्रम, कुशल और अकुशल श्रमिकों, स्थायी और अस्थायी मजदूरों, ब्रिटेन में ब्रिटिश और आयरिश मजदूरों और अमेरिका में गोरे और काले मजदूरों के बीच हैं-ये मिसालें खुद उनके द्वारा ही दी गई हैं) स्तर पर ले आने की महान अज्ञानता को भी छोड़ दीजिए, जरा इस वाक्य के अपमानजनक लहजे पर गौर कीजिए. यह गलत जगह आधारित, घमंड जो कि जाति विरोधी आंदोलनों, उनके नेताओं और उनके ऊपर लिखने वालों के बारे में बहस पर छाया रहा.

अब जो लोग मेरे लेखन से वाकिफ हैं, उन्हें यह बात कहीं नहीं मिलेगी कि मैंने कभी अंबेडकरवाद और मार्क्सवाद के समन्वय की हिमायत की है. बल्कि मैंने कभी अंबेडकरवाद शब्द का इस्तेमाल भी नहीं किया है, जिसे मेरे नाम के साथ जोड़ा जा रहा है. जाति का उन्मूलन के प्रति जैसा रवैया रखने का मुझ पर आरोप लगाया जा रहा है, कि यह कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र जितना ही अहम है, इससे यह संकेत मिलता है मानो जाति का उन्मूलन बेकार है. अप्रोच पेपर में दूसरों के नजरियों का मजाक उड़ाने या उन्हें नकारने के साथ साथ उनके अपने नजरिए को ही सही समझदारी बताने के हवाले भरे पड़े हैं. जाहिर है, आयोजकों ने मेरे बारे में यह राय उस प्रस्तावना के आधार पर, जिसे मैंने जेएनयू में एसएफआर द्वारा जारी एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट के पुनर्प्रकाशन के मौके पर लिखा था, और इंटरनेट पर मौजूद कुछ हालिया साक्षात्कारों के आधार पर बनाई है. मैं पिछले 30 बरसों से इन मुद्दों पर लिखता रहा हूं और मेरी राय कार्यकर्ताओं और इस विषय से सरोकार रखने वाले विद्वानों के बीच खासी जानी-पहचानी हुई है. जाहिर है कि आयोजकों ने मेरी किताबें अच्छे से नहीं पढ़ी हैं, जहां मैंने समकालीन जाति प्रश्न पर बात की है और जाति के उन्मूलन की एक रूपरेखा पेश की है. यहां तक कि उन्होंने जिन स्रोतों का हवाला दिया है, उनमें भी ऐसी गलत व्याख्या की गुंजाइश नहीं है और इस तरह मुझे लगा कि उन्होंने जानबूझ कर दूसरों के विचारों के महत्व को कम करना चाहा था. इससे जातीय पूर्वाग्रहों की बू आती थी. इससे भी अधिक, उनमें जॉर्ज बुश जैसी उद्दंडता थी कि ‘या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ.’ पारंपरिक मार्क्सवादी दायरे के भीतर, उत्पीड़ित जनता की बढ़ती हुई संख्या के व्यापक संगठन के निर्माण के प्रति दुश्मनी भरा यह रवैया नया नहीं है. मैंने बस इसको आड़े हाथों लेने का फैसला किया.

इसलिए मेरी पूरी टिप्पणी उनके रवैए के स्तर पर दिखनेवाली नाकामी पर रोशनी डालने तक सीमित थी. उनके पेपर में यह सबसे आपत्तिजनक रूप में निचली जातियों, खास कर दलितों के जाति-विरोधी संघर्षों के खिलाफ पूर्वाग्रह की शक्ल में जाहिर हो रहा था. मैंने उचित तरीके से दर्शकों के सामने इसके संदर्भ और मकसद को साफ किया. मैंने यह दिखाने की कोशिश की कि कैसे यह तोड़ मरोड़ जानबूझ कर और सोचसमझ कर की गई थी और इसलिए उसमें से जातीय पूर्वाग्रहों की बू आती थी. अगर कोई इस संदर्भ को समझ ले, तो मेरी पूरी टिप्पणी को एक उचित नजरिए से समझा जा सकेगा. इसका मार्क्स या अंबेडकर की हिमायत या विरोध से कोई लेना देना नहीं था. इसका उनके दर्शनों और तौर-तरीकों की तुलना से भी कोई लेना देना नहीं था, जो करने से मैं वैसे भी नफरत करता हूं. उनको खारिज करना तो दूर, इसका संबंध इनका या इनके आंदोलनों का विरोध करने से भी नहीं था. मिसाल के लिए, घोषणापत्र के मुद्दे को लेते हैं. उन्होंने मुझ पर यह आरोप लगाया कि मैं बाबासाहेब अंबेडकर के जाति का उन्मूलन को मार्क्स के कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र जितना महत्वपूर्ण मानता हूं. इस तरह का अपरिपक्व लेखन ही विचारधाराओं और आंदोलनों को ऊंच-नीच के क्रम (हाइरार्की) में रखने की उनकी ब्राह्मणवादी सनक को जाहिर कर देता है. जिस तरह कि पूंजीवाद हरेक चीज को बिकाऊ वस्तु में बदल देता है, ब्राह्मणवाद हर चीज को ऊंच-नीच के क्रम में रखता है. मेरे लिए यह सौभाग्य की बात थी, कि सीडीआरओ के असित दास ने, जिन्होंने वहां मुझसे पहले बात रखी थी, मेरे द्वारा लिखा हुआ वह मूल वाक्य पढ़ा था: ‘पूंजीवादी दुनिया के लिए जो कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र है वही जातीय भारत के लिए जातियों का उन्मूलन है,’ और उन्होंने भी इस बात को उठाया था कि इसे इसी रूप में अप्रोच पेपर में व्यक्त नहीं किया गया था. मेरे लेखन में उनके क्षेत्रों (डोमेन) को पूरी तरह से अलग अलग दिखाया गया था. मेरी चिंता इन घोषणापत्रों के सही होने या किसी और तरह से उनके विश्लेषण की नहीं थी. जहां तक जाति का उन्मूलन की बात है, उन्होंने जिस प्रस्तावना का हवाला दिया था, उसमें खुद भी समकालीन जातियों पर इसके लागू होने के बारे में मेरे संदेहों की झलक मिलती है. घोषणापत्र अपने वक्त और स्थान में संघर्षों की अभिव्यक्ति होते हैं. वे शून्य में पैदा नहीं होते. उनका सटीक होना या उनमें गलती होना अपरिहार्य रूप से उन संघर्षों से जुड़ा होता है, जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं. सिर्फ वक्त ही इसके बारे में तय कर सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि जबकि सिन्हा ने मेरे बयान का गलत मतलब निकालते हुए उसे अंबेडकर को सही ठहराने वाले बयान के रूप में लिया, तो दूसरी तरफ दलितों के बीच गलत खबरों और निहित स्वार्थों वाले लोगों ने, छद्म अंबेडकरियों ने उन बयानों को अंबेडकर के अपमान के रूप में पेश किया. असल में मैंने इनमें से कोई भी काम नहीं किया है. मेरा बिल्कुल ऐसा कोई मकसद नहीं था. ‘अंबेडकरवाद’ शब्द के संदर्भ में मैंने अपना पुराना रुख ही बार बार दोहराया कि मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई चीज अस्तित्व में है. मैंने अंबेडकर के संघर्षों और बहस-मुबाहिसों के पीछे के दर्शन या पद्धति के संदर्भ में अपने प्रमाण पेश किए. अनेक विद्वानों ने इसके बारे में लिखा है कि बाबासाहेब अंबेडकर कोलंबिया में अपने प्रोफेसर जॉन डिवी से कितनी गहराई से प्रभावित थे. उन्होंने खुद ही 1952 में उनके बौद्धिक एहसानों को कबूल करते हुए कहा था कि अपने पूरे बौद्धिक अस्तित्व के लिए वे जॉन डिवी के एहसानमंद हैं. डिवी जिस प्रगतिशील व्यवहारवाद या उपकरणवाद (इंस्ट्रुमेंटलिज्म) के दर्शन से जुड़े थे, वह मानता था कि ज्ञान अस्थायी है, एक समृद्ध सिद्धांत और प्रबुद्ध व्यवहार तक पहुंचने के क्रम में किसी भी सैद्धांतिक मान्यता की परख व्यवहार में होना जरूरी है. मैंने महज इसका जिक्र किया, जैसा कि डिवी पर लिखने वाले अनेक लोगों ने कहा है, कि इस पद्धति को वैज्ञानिक पद्धति माना जा सकता है, क्योंकि वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में यही करते हैं. सिन्हा ने इसका गलत मतलब निकालते हुए इसे मेरे द्वारा डिवी को जायज ठहराने और इस तरह अंबेडकर की हिमायत के रूप में लिया. कैसी बेवकूफी है! मेरी बातों का मतलब इस दर्शन की सच्चाई पर जोर देना था कि इसे यों ही खारिज नहीं किया जा सकता. मैं किसी को जायज नहीं ठहरा रहा था और न ही किसी का समर्थन या विरोध कर रहा था. इसी क्रम में मैंने दुनिया में आए नए बदलावों की रोशनी में अनेक मार्क्सवादी सूत्रों पर फिर से सोचे जाने की जरूरत बताई थी. मैंने कहा कि मार्क्सवादी तरीके से सोचने के लिए उकसाने वाली बातों की एक लंबी फेहरिश्त मेरे पास है. तो क्या मैं मार्क्स की आलोचना कर रहा था या उन्हें खारिज कर रहा था? केवल बेवकूफ लोग ही ऐसा कहेंगे. मेरा जोर उन लोगों को संवेदनशील बनाना था जो दुनिया की हकीकतों के प्रति खुली सोच रखने के मामले में इस या उस वाद की अंधश्रद्धा से भरे हुए हैं. सिर्फ इसलिए कि आखिरकार क्रांतियां इन्हीं दुनियाओं में होनी हैं न कि उनके दिमागों में या उन किताबों में जिनके प्रति उनमें इतनी श्रद्धा है.

मैंने कहा कि मार्क्स के उलट बाबासाहेब अंबेडकर ने किसी महान सिद्धांत का दावा नहीं किया. बल्कि मार्क्स के प्रति उनका बुनियादी संदेह इस महान सिद्धांत में उनके गहरे अविश्वास से ही पैदा हुआ था. अपने कम संसाधनों के साथ बाबासाहेब ने व्यवहारवादी पद्धति अपनाई और इस क्रम में उन्होंने अक्सर अपनी रणनीतियां और कार्यनीतियां बदलीं. मिसाल के लिए, पहले वे हिंदूवाद में सुधारों में भरोसा करते थे जैसे कि अछूतों की तकलीफें दूर की जा सकती हैं. जल्दी ही उनका यह भरोसा महाड में सवर्ण हिंदुओं द्वारा दिखाई गई दुश्मनी से और पूरे समाज द्वारा इस मुद्दे पर अपनाई गई चुप्पी से बिखर गया, जैसा कि अब भी होता है. इसके बाद उन्होंने उन राजनीतिक मौकों की ओर रुख किया जो सांप्रदायिक राजनीति के साथ सामने आ रहे थे. उन्होंने अछूतों के लिए अलग राजनीतिक पहचान पर जोर देना शुरू किया और जल्दी ही गोलमेज सम्मेलन में गांधी के सख्त विरोध के खिलाफ अछूतों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हासिल कर लिया. लेकिन लागू होने से पहले ही इसका दम घोंट दिया गया. गांधी के मशहूर उपवास ने अंबेडकर को ब्लैकमेल किया और उन्हें इसे छोड़ने और पूना समझौते के तहत आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों और दूसरे वादों को मानने पर मजबूर किया. यह पूरी योजना एक चालबाजी साबित हुई और अंबेडकर को महसूस हुआ कि आरक्षित सीटें असल में दलित हितों के ईमानदार प्रतिनिधित्व को खत्म करने के लिए शासक वर्गीय दलों के हाथ में एक औजार हो गई हैं. उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (आईएलपी) के साथ प्रयोग किया और वर्गीय आधार पर राजनीति शुरू की, कम्युनिस्टों के साथ हाथ मिलाने में भी दिलचस्पी ली लेकिन उनके ‘ब्राह्मणवाद’ से भी परिचित हुए. औपनिवेशिक ताकतें जिस तरह सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दे रही थीं, उनके सामने यह प्रयोग भी बहुत कम दिनों तक चल पाया. फरवरी 1942 की क्रिप्स मिशन रिपोर्ट इसके लिए आखिरी धक्का साबित हुई और उन्होंने आईएलपी को खत्म करके शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की शुरुआत की. इसी समय वे वायसराय की कैबिनेट में मंत्री बने और शुरुआती तरजीही व्यवस्था को आरक्षण के कोटा सिस्टम में बदलने और ढेर सारे श्रम कानूनों को लाने में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई. जब वायसराय की कार्यकारी परिषद भंग की गई तो तीन साल के लंबे अरसे तक सत्ता हस्तांतरण की सारी बहस के दौरान उन्होंने महसूस किया कि उन्हें परे कर दिया गया है. आखिर में उन्हें गांधी की रणनीति के तहत सर्वदलीय कैबिनेट में शामिल किया गया. संविधान सभा बनने के दौर में उन्होंने भारत के भावी संविधान का मसौदा तैयार किया और ‘राजकीय समाजवाद’ की एक योजना पेश की. बजाहिर रुकावटों के खिलाफ वे संविधान सभा में पहुंचने में कामयाब रहे लेकिन यह कामयाबी बहुत दिनों तक नहीं बनी रह सकती, क्योंकि पूर्वी बंगाल की निशानदेही पाकिस्तान के रूप में कर दी गई, जहां से वे चुने गए थे. गांधी के कहने पर कांग्रेस एक बार फिर उन्हें संविधान सभा में ले आई और उन्हें इसकी सबसे अहम समिति – मसौदा समिति – का अध्यक्ष बनाया. शुरू में उन्होंने संविधान में आस्था जताई थी लेकिन जल्दी ही उनका इससे मोहभंग हो गया और उन्होंने इसे पूरी तरह ठुकरा दिया. अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में बौद्ध धर्म के ‘रेडिकल’ संस्करण में धर्मांतरण करके उन्होंने 1935 की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा किया.

अगर कोई इस संक्षिप्त जीवन-चित्र पर वस्तुगत नजर डाले तो पाएगा कि बाबासाहेब अंबेडकर दलितों की मुक्ति के अकेले मकसद के साथ हालात के मुताबिक अपनी रणनीतियां और कार्यनीतियां बदलते रहे. व्यवहारवाद को छोड़ कर उन्होंने कोई दूरगामी सिद्धांत नहीं खोजा और न ही कोई सैद्धांतिक विचार खोजा जो उनका प्रतिनिधित्व कर सके. वे अपनी उदार प्रतिबद्धता, स्थापित छवियों को तोड़ने वाले रवैए, बौद्धिक ईमानदारी, कड़ी मेहनत, सच्चाई और निष्कपटता के लिहाज से एक आदर्श, एक रोल मॉडल हो सकते हैं. लेकिन शायद उन्हें खींच-तान कर भविष्य का सामना करने के लिए खड़ा नहीं किया जा सकता. अगर वे अपनी पूरी जिंदगी विकास कहते रहे और खुद को बदलते रहे, तो कैसे कोई उन्हें भविष्य में विस्तार दे सकता है? बेहद सोच समझ कर किए गए इस अध्ययन के संदर्भ में ही मैं लिखता रहा हूं कि कोई अंबेडकरवाद नहीं हो सकता, जिसे विद्वानों का एक तबका यों ही इस्तेमाल में लाता रहता है और अंबेडकरी दलितों द्वारा जिसको भावनात्मक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है. मैंने इन सबका सार-संक्षेप सम्मेलन में रखा. मैंने कहा कि मार्क्सवाद से मेरा खुद का परिचय मेरे बचपन से शुरू हुआ था और प्रतिबद्धता के स्तर पर मैं मार्क्सवादी पद्धति पर चलता हूं लेकिन मैं खुद को अब भी मार्क्सवादी नहीं कहूंगा. क्योंकि सबसे पहले तो मार्क्सवादी लोग जिस तरह की जड़ता दिखाते हैं, उसको मैं कबूल नहीं करता, और दूसरे, मैं शायद मैं इन सभी वादों से दूर रहता हूं क्योंकि वे अनजाने ही अस्मिताओं के रूप में काम करते हैं और आखिरकार लोगों को बांटते हैं. मैंने मार्क्सवाद की अपनी अवधारणा की व्याख्या द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के केंद्र के रूप में की, जब तक कि इसे भौतिक विज्ञानों द्वारा खारिज नहीं कर दिया जाता. इसके आगे इस (द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के) केंद्र से जन्मे मार्क्सवाद के ज्यादातर हिस्से में गलतियों का होना मुमकिन है और इसलिए उसे खुद को सही साबित करने के लिए तैयार रहना चाहिए. ग्रांड थ्योरी के दावेदारों को बदलती हुई हकीकत के बरअक्स इसकी वैधता के बारे में सचेत रहना होगा. लेकिन बदकिस्मती से, तथाकथित मार्क्सवादियों ने मार्क्सवाद को एक धर्म बना दिया है, इसे आस्था का एक मामला बना लिया है कि मार्क्स ने आखिरी बात कह दी है. इसी रवैए ने मार्क्स को यह कहने पर मजबूर किया था, ’ईश्वर का शुक्रिया कि मैं एक मार्क्सवादी नहीं हूं’ और यह मुझे भी इससे मिलती-जुलती बात कहने पर मजबूर करता है.

बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन पर एक सरसरी नजर भी यह संकेत देती है कि उन्होंने हर चरण में नाकामियों का सामना किया. उन्होंने जिन चीजों की उम्मीद की थी, वे साकार नहीं हुईं. दलितों के जिस राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए उन्होंने इतनी मशक्कत की थी, वह अभिशाप साबित हुई. वे खुद आरक्षित सीटों पर राजनीतिक रूप से बौने कद के उम्मीदवारों के मुकाबले भी कभी जीत नहीं सके. उन्होंने दलितों के लिए उच्च शिक्षा पर जोर दिया और कॉलेज खोले, लेकिन जल्दी ही इस पर अफसोस जाहिर किया कि पढ़े-लिखे लोगों ने उन्हें धोखा दिया है. उन्होंने जाति के उन्मूलन का मंत्र दिया लेकिन आधुनिक भारत में जातियों को मिलती संवैधानिक वैधता ही उनके हाथ लगी. हम ऐसे अनचाहे अंजामों को गिनाते रह सकते हैं, जो उन्हें पूरी जिंदगी अपनी कोशिशों के नतीजे में हासिल होते रहे. अगर कोई दलितों की मौजूदा दशा पर नजर डाले, तो हमें इससे मिलती-जुलती तस्वीर दिखेगी. जबकि कुछ मुट्ठी भर दलितों ने महत्पवूर्ण तरक्की की है, दलितों की व्यापक बहुसंख्या गैर-दलितों की तुलना में ठहराव का शिकार है या यहां तक नीचे ही गिरी है. व्यापक रूप से कहें तो अछूतपन, हालांकि संविधान में इस पर पाबंदी है, हालिया सर्वेक्षणों द्वारा मिले संकेतों के मुताबिक खुलेआम व्यवहार में लाया जा रहा है. जातियां एक आधुनिक संस्थान के रूप में आक्रामक बनी हुई हैं. यहां तक कि दलित भी, और अजीब विडंबना है कि अंबेडकरी होने का दावा करने वाले दलित भी, जातीय पहचानों पर गर्व से इतराते हैं. उत्पीड़न की घटनाओं के आधार पर मापें तो, जिसे मैं जातिवाद का सबसे बेहतर प्रतिनिधि मानता हूं, तो जातियां यकीनन और भी संगीन हुई हैं. अंबेडकर ने दलितों के लिए जो संस्थान खोले, जैसे कि पीपुल्स एडुकेशनल सोसाइटी, बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया, समता सैनिक दल, उन सबमें बेतरतीबी पसरी हुई है. अंबेडकरी राजनीति के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना ही बेहतर.

अगर इन चीजों का मतलब नाकामी नहीं है तो फिर उन्हें और क्या कहा जा सकता है? यह बात दिन की रोशनी की तरह ही साफ है, लेकिन दलित इसे एक आघात की तरह लेते हैं और नाराज हो जाते हैं. वे नहीं जानते कि अपने व्यवहार से वे अंबेडकर को और नाकाम ही कर रहे हैं. अंबेडकर दलितों से प्रबुद्ध होने की अपेक्षा रखते थे, लेकिन हकीकत को देखने से इन्कार करके वे इतराते हुए खुद को निर्बुद्ध के रूप में पेश करते हैं. क्या वे कभी अपने भीतर झांकते हुए इसे महसूस करेंगे कि अंबेडकर के साथ वफादारी का दावा करनेवाला उनका हर व्यवहार अंबेडकर-विरोधी है और असल में अंबेडकर के लिए अपमानजनक है? अकेले बाबासाहेब अंबेडकर ही नहीं, इतिहास में इंसानी मुक्ति के सार्वभौभिक मकसद का सपना देखने वाले हरेक महान इंसान को महान नाकामियों का सामना करना पड़ा है. लेकिन फिर भी यह तथ्य बना हुआ है कि इंसानियत अपने वजूद के लिए उनकी एहसानमंद रहती है, उनकी कामयाबियों से भी ज्यादा उनकी नाकामियों के प्रति. अपनी जिंदगियों के बेहतर बनाने में उनके योगदानों को हम नकार नहीं सकते. ऐसे तथ्यों का कठोर एहसास दलितों को उनकी, खुद पर थोपी हुई नींद से ही जगाएगा. उनकी नाकामियों को महसूस करने के जरिए ही हम उस दर्द और यात्राओं को महसूस कर पाएंगे, जिनसे होकर बाबासाहेब अंबेडकर गुजरे थे, उनके योगदानों को समझ पाएंगे और उनके सपनों को पूरा करने के लिए कोशिशें करने की अपनी जिम्मेदारी को अपने भीतर उतार पाएंगे. क्या उन्हें उनके जीवन के थकान भरे अंत को याद नहीं करना चाहिए जब पीछे मुड़ कर अपने जीवन का विश्लेषण करते हुए वे अचानक रो पड़े थे और कहा था कि उन्होंने जो भी किया उसने सिर्फ मुट्ठी भर शहरी लोगों को ही फायदा पहुंचाया, वे गांवों में रहनेवाली व्यापक बहुसंख्या के बारे में कुछ भी नहीं कर सके? इस एहसास के कारण ही उन्होंने मिलने के लिए आई हुई मराठवाड़ा की एक एससीएफ टीम में शामिल बी.एस. वाघमारे से जमीन के लिए संघर्ष शुरू करने को कहा था. पूरे इतिहास में दलितों की असली समस्या पर हुआ अकेला महत्वपूर्ण संघर्ष 1964 का देशव्यापी सत्याग्रह था, जिसके बारे में मेरा अंदाजा है कि इस संघर्ष को भी उन्होंने ही अपने आखिरी वर्षों में शुरू किया था. यह बात उन सभी तथाकथित अंबेडकरियों के सामने मामले को साफ कर देती है, जिन्होंने इस मुद्दे पर मेरे खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाईं मानो मैं ये बातें पहली बार कह रहा होऊं!

ज्यादातर महान लोगों को एक महान नाकामी के बतौर देखा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने अपने लिए जो मकसद तय किए उन्हें वे कभी हासिल नहीं कर पाए. हरेक युग में संघर्षों और अनगिनत महान लोगों की कोशिशों के बावजूद इंसानी मुक्ति का मकसद, जो अलग अलग जुबानों और तरीकों से जाहिर हुआ है, बहुत पुराने जमाने से अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ. बाबासाहेब अंबेडकर का मकसद क्या था? उन्होंने खुद इसे अपने एक आदर्श समाज के चरित्र की अवधारणा के रूप में बताया था ‘आजादी, समानता और भाईचारा.’ क्या यह पूरा हुआ? यहां तक कि दलितों की मुक्ति का उनका सहायक मकसद तक अधूरा रह गया. मैंने पहले ही उन बातों का जिक्र किया है, जिनको वे हासिल करना चाहते थे लेकिन जिनका उल्टा उन्हें हासिल हुआ. उन्होंने कल्पना की कि वे पूरे भारत को बौद्ध बना देंगे. लेकिन तथ्य ये है कि बौद्ध धर्म दलितों में भी सिर्फ उनकी अपनी जाति के लोगों के बीच सीमित है. बाबासाहेब ने नायक पूजा को नापसंद किया था, लेकिन इसके उलट उन्हें एक असाधारण नायक और पूज्य व्यक्ति बना दिया गया. उन्होंने निर्ममता से देवताओं और देवियों की चीर-फाड़ की, लेकिन दुखद है कि वे खुद किसी भी देवता से बड़े देवता बना दिए गए. उन्होंने अतर्कसंगतता और छल-कपट से नफरत किया, लेकिन अपने अनुयायियों की कृपा से उन्हें इसमें घसीट लिया गया. उन्होंने बौद्धिक बेईमानी से नफरत की, उनके अनुयायियों ने इसे एक गुण ही बना दिया. उन्हें मूर्तिभंजक होने पर गर्व था, उन्हें खुद अब तक की सबसे बड़ी मूर्ति बना दिया गया. उन्होंने अपने अनुयायियों से उम्मीद की थी कि वे प्रबुद्ध बनेंगे और उनके रथ को आगे ले जाएंगे. उनके अनुयायियों ने दुनिया से खुद को काट लिया और उनके अंधभक्त बन गए, एक भक्तिपंथ बन गया. इसकी वजहें चाहे उनके अनुयायी हों या हालात, यह तथ्य बरकरार है कि वे अपने मसकद से बहुत पीछे रह गए.

मेरा दूसरा बिंदू, जो अनकहा रह गया (और जिसने सिन्हा को इसपर खेल जाने का मौका दिया), लेकिन जो ठीक ठीक ‘ग्रांड थ्योरी’ और ‘पुनर्विचार’ पर मेरी टिप्पणी के संदर्भ में ही निहित था, वो कॉमरेडों को मार्क्स की नाकामियों के प्रति संवेदनशील बनाने का था, जो इतिहास की दूसरी किसी भी नाकामी से कहीं अधिक नुकसानदेह है. अंबेडकर की नाकामी उनकी पद्धति और प्रगतिशील व्यवहारवाद में निहित थी. सिन्हा द्वारा डिवी के दर्शन पर अपने लंबे व्याख्यान में बेहद विस्तार से की गई व्याख्या, जिसके बारे में मैं कबूल करता हूं कि मैंने उसे पसंद किया और ऐसा अपने दूसरे बयान में कहा भी, गैर जरूरी थी. उसके बारे में मैंने ठीक पहले ही बयान में इशारा किया था. मैंने मार्क्सवादी दर्शकों को यह याद दिलाने की कोशिश की कि मार्क्सवाद एक इतिहास और जड़ बन चुका, जीवाश्म हो चुका दर्शन नहीं है और न ही यह मार्क्स के प्रति वफादारी जताने का कोई काम है. बल्कि यह अपने आस पास की गतिशील हकीकत को समझने की पद्धति है ताकि इंसानियत को बेहतर बनाने के लिए इस हकीकत को बदला जा सके. हम आसानी से इन नाकामियों को गिना सकते हैं जैसा कि मैंने बाबासाहेब अंबेडकर की नाकामियों के संदर्भ में किया या फिर इतिहास के ज्यादातर महान इंसानों की नाकामियों के संदर्भ में होता है, जिसमें मार्क्स भी शामिल हैं. हालांकि मार्क्स की नाकामी ज्यादा विराट बन गई क्योंकि उनका सिद्धांत एक ‘ग्रांड थ्योरी’ था. अगर हम आस्थाओं को परे कर दें तो मार्क्स के सूत्रीकरण यथार्थ की पुष्टि करने में भी नाकाम रहे, इसमें बदलाव लाने में तो और भी ज्यादा नाकाम रहे. पूंजीवाद, अपने अंतर्निहित संकटों के बावजूद इसे पीछे छोड़ने में सक्षम हुआ और यहां तक कि उसने इसे हाशिए पर धकेल दिया. क्या मार्क्सवादियों को इसके बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए? अगर मैं ऐसा कहता हूं तो मैं मार्क्स को बिल्कुल भी नीचा नहीं दिखा रहा हूं. वे मेरे सबसे ज्यादा प्रशंसनीय विचारकों में से एक बने हुए हैं. इसलिए मार्क्सवादियों को अपने आपको भुलावा नहीं देना चाहिए कि मार्क्स ने आखिरी बात कह दी है, और एक तरह से सिद्धांत का अंत हो गया है. उन्होंने अपनी विचारधारा की अशुद्धियों को छुपाने के लिए एक ज्यादा विस्तृत शब्दावली विकसित कर ली है. आजीवन कॉमरेड रहा एक व्यक्ति अचानक एक गद्दार, प्रतिक्रियावादी और जनता के दुश्मन में बदल सकता है!

मैंने दुनिया में सामने आए कुछ नए विकासों को गिनाया, जो मार्क्सवादी व्यवहार में शामिल किए जाने की मांग करते हैं और कहा कि मेरे पास ऐसी चीजों की एक लंबी सूची है. सिन्हा इस तथ्य पर खुशी से झूम उठे कि मैंने कभी मार्क्स की नाकामी का जिक्र नहीं किया है. मैंने एक लिखा हुआ भाषण नहीं दिया था. मैं बिना किसी तैयारी के एक ऐसी भाषा (हिंदी) में बोल रहा था जिसका मैं आदी नहीं था और एक ऐसे समूह के सामने बोल रहा था जो शायद उस बात से अनजान था जो मैं बोल रहा था इसलिए मेरा बयान उतना सुसंगत नहीं भी हो सकता था लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसने मुझे वह बात लोगों तक पहुंचाने में कोई रुकावट डाली, जिसको रिपब्लिकन पैंथर्स ने अपने स्तर से स्वतंत्र रूप से याद किया है. मेरी पूरी दलील का जोर उन्हें इस बात के प्रति संवेदनशील बनाना था कि उन्हें सिर्फ इसलिए उन ऐतिहासिक आंदोलनों और जननायकों को खारिज करते हुए अहंकारी नहीं बनना चाहिए, कि वे उनके कबीले से ताल्लुक नहीं रखते. भारत के मार्क्सवादियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दलितों में मौजूद अलगाव से पार पाना और उनका भरोसा जीतना है.

अंबेडकर मार्क्सवादी नहीं थे. जैसा कि मैंने कहा, उन्होंने डिवी से मार्क्सवाद की आलोचना विरासत में पाई थी. इसे कोई भी बिना खास जहमत के देख सकता है. उन्होंने डिवी से फेबियनवाद भी हासिल किया था, जो तब और मजबूत हो रहा था जब वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दाखिल हुए. यह एक ऐसा संस्थान था जिसे फेबियन सोसाइटी ने स्थापित किया था और जिसमें फेबियनवाद के संस्थापक सिडनी और बियाट्रिस वेब जैसे लोग अब भी पढ़ा रहे थे. फेबियनवाद मार्क्सवाद का विरोध करता था और समाजवाद के बारे में उसका एक घालमेल भरा नजरिया था. फेबियनवादी सोचते थे कि क्रांतिकारी साधनों के बजाए, समाजवाद को धीरे-धीरे और सुधार के रास्ते से लाया जाएगा, और इसे सर्वहारा के बजाए प्रबुद्ध मध्यवर्ग द्वारा हासिल किया जाएगा. बाबासाहेब अंबेडकर में भी इन अवधारणाओं की झलक मिलती है. बाद में जाकर फेबियनों को मजदूरों को संगठित करने की जरूरत महसूस हुई और उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (आईएलपी) का गठन किया. इसी फेबियन आईएलपी की तर्ज पर अंबेडकर ने अपनी आईएलपी बनाई थी. इस गहरे प्रभाव के बावजूद वे बदहाल जनता के भीतर मार्क्सवाद के प्रति संभावित आकर्षण से अनोखे रूप से अवगत भी थे और हमेशा इन तौर-तरीकों को मार्क्सवादियों के तौर-तरीकों से श्रेष्ठ, शायद अनिवार्य तौर तरीकों के रूप में पेश करते रहे. वे इसके विरोधी नहीं थे जैसा कि उनके मराठी लेखन में रूसी क्रांति और इसके नायकों के अकसर जिक्र के सिलसिले में देखा जा सकता है. सिर्फ बाद में जाकर ही, बंबई के कम्युनिस्टों के साथ कड़वे अनुभवों के साथ, उनमें उनके प्रति एक तरह का विद्वेष पैदा हुआ. मैं उन्हें मार्क्सवाद को एक कसौटी के रूप में इस्तेमाल करते हुए देखता हूं, एक ऐसी चीज के रूप में जो उनकी अपनी पद्धतियों के बाद सबसे बेहतर पद्धति है. 1953 में, उन्होंने अपने प्रतिनिधि दादासाहेब गायकवाड़ को लिखा कि उन्होंने देख लिया है कि उनकी पद्धति काम नहीं कर रही है और इसलिए उनके लोग अगर चाहें तो कम्युनिस्ट बन सकते हैं. इसके बावजूद, अब भी यह कहा जा सकता है कि मार्क्सवाद की उनकी समझ समुचित होने से दूर थी. उन्होंने कभी भी मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों का हवाला नहीं दिया और न ही उन्हें छुआ. हालांकि एक बार उन्होंने कहा था कि उन्होंने मार्क्सवाद पर सारे मार्क्सवादियों को मिला कर भी ज्यादा किताबें पढ़ी हैं. अगर यह सही भी हो तो उनमें एक भी किताब क्लासिक नहीं रही होगी. कठमांडू में अपने आखिरी व्याख्यान में भी, जहां उन्होंने बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद की तुलनात्मक तस्वीर पेश की थी, उन्होंने मार्क्सवाद के बारे में महज ऐसी चीजों का हवाला दिया जिनको मार्क्स का कोई भी समझदार पाठक गंभीरता से नहीं लेगा. ऐसे अनुमानों से अंबेडकरियों तक को भी क्यों अपमानित महसूस करना चाहिए? क्या उनका व्यवहार अतार्किक नहीं है? क्या यह अंबेडकर का सच्चा अनुयायी बनना है?

भारतीय समाज के प्रति अंबेडकर के योगदानों का मूल्यांकन करने में इस बात का बिल्कुल भी कोई महत्व नहीं है कि उन्होंने मार्क्सवाद की परवाह नहीं की. वे निचले से भी निचले तबके के लोगों की चेतना को मानवाधिकारों तक उन्नत करने वाले अकेले व्यक्ति थे. वे जाति के सवाल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाने वाले और जाति के उन्मूलन का नारा देने वाले पहले व्यक्ति थे. कम्युनिस्टों के योगदानों को कोई भी नकार नहीं सकता और कमोबेश यह सच है कि देहातों में उनके द्वारा चलाए गए वर्ग संघर्षों ने जातियों को कमजोर किया. लेकिन आखिरी तौर पर यह कबूल किया जा सकता है कि अंबेडकर का प्रभाव उन सबके प्रभाव से आगे जाता है. कोई इस चेतना की गुणवत्ता की परख कर सकता है, लेकिन यह एक अलग मामला है. भारत में यह लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का एक जरूरी कदम के रूप में देखा जा सकता है. इसी अर्थ में मैंने कहा था कि भारत के लोकतंत्रीकरण में उनका योगदान सभी कम्युनिस्टों के योगदानों को आपस में मिला कर भी बड़ा था. यह भाषण के दौरान जान बूझ कर कही गई एक बात थी, क्योंकि मैं चाहता था कि कम्युनिस्ट इस पर सोचें कि उन्होंने कैसे-कैसे मौके छोड़े हैं और उन गलतियों के नतीजे क्या रहे हैं.

मैं भारत के वर्ग विश्लेषण के लिए यूरोपीय सांचों के आयात के लिए शुरुआती मार्क्सवादियों को दोषी ठहराता रहा हूं. लेनिन ने वर्गों की परिभाषा इस तरह दी:
‘वर्ग लोगों के वे बड़े समूह हैं जिनके बीच का फर्क ऐतिहासिक रूप से तयशुदा एक सामाजिक उत्पादन व्यवस्था में हासिल उनकी जगह के द्वारा, उत्पादन के साधनों के साथ उनके संबंधों के द्वारा (ज्यादातर मामलों में कानून द्वारा निर्धारित और सूत्रबद्ध), श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका के द्वारा, और इसके नतीजे में सामाजिक संपदा में उनकी हिस्सेदारी के पहलुओं द्वारा, जिसे वे छोड़ते हैं और उसको अपनाने के उनके तौर तरीकों द्वारा तय होता है 
-(व्लादिमीर आई. लेनिन: ‘ए ग्रेट बिगनिंग: हीरोइज्म ऑफ द वर्कर्स इन द रियर: ‘कम्युनिस्ट सुब्बोत्निक्स’: ‘कलेक्टेड वर्क्स’ में, अंग्रेजी संस्करण, खंड 29, मॉस्को, 1965, पृ. 421)

मेरा दावा है कि अगर शुरुआती कम्युनिस्टों ने लेनिन की इस परिभाषा को अपने भीतर उतार लिया होता, तो जातियों को बाहर रख कर वर्ग और जाति का बेवकूफी भरा द्वंद्व निर्मित नहीं हुआ होता. यहां तक कि वे आज भी ‘आधार और अधिरचना’ की मार्क्सवादी उपमा को मजबूती से दोहराते रहते हैं. सिन्हा अब भी मेरे बयान में इस बात को एक बड़ी समस्या के रूप में देखते हैं कि यह उपमा भारतीय क्रांति की राह में सबसे बड़ी बाधा है. किसी दलित मार्क्सवादी से पूछिए और वो इस उपमा को खारिज कर देगा. क्यों? यही भारत और इसके जातीय विभाजन की हकीकत है! अब यह मत कहिए कि केवल गैर-दलितों ने ही ‘शुद्ध’ मार्क्सवाद को ग्रहण किया है. इस उपमा के इर्द-गिर्द एक खासा विवाद रहा है जिसने सांस्कृतिक मार्क्सवाद के क्षेत्र में सैद्धांतिक विकास की शुरुआत की थी. लेकिन हम इस मामले में दखल नहीं देंगे. समय के साथ भारतीय मार्क्सवादियों ने यह बात समझ ली कि जातियां महज ऊपरी संरचना का पहलू भर नहीं हैं बल्कि उत्पादन आधार तक उनका विस्तार है. 1920 के दशक में जातियां कम से कम व्यापक अर्थों में लोगों के जीवन को परिभाषित करती थीं और इस तरह अगर वे वर्ग विश्लेषण में शामिल कर ली जातीं, तो जाति विरोधी संघर्ष वर्ग संघर्ष का अभिन्न हिस्सा हुआ होता और जिसने अलग जाति विरोधी संघर्षों की जरूरत को खत्म कर दिया होता, जिसे एक दूसरे ही रास्ते पर जाना था जो कि गया भी. मैंने इसे कम्युनिस्टों का सबसे बड़ा पाप कहा है. इस बात पर भी आयोजकों की तरफ से एक भारीभरकम तोड़ मरोड़ किया गया था. बेशक जो 1920 के दशक में मुमकिन था, उसी बात को 2013 में करने की कोशिश नहीं की जा सकती. लेकिन यह बात समझनी चाहिए कि तब एक भारी गलती की गई थी. हैरानी की बात है कि मार्क्सवादियों की तरफ से कभी इसे कबूल भी नहीं किया गया. जाति के सवाल पर उनके द्वारा अचूक दावों के साथ, कि यह पहले वाले से बेहतर है, हर तरह की प्रबुद्धता जाहिर करने के दौरान आप उनके सामने यह आसान सा मुद्दा रखिए और आप देखेंगे कि कैसे वे इस उपमा से ऐसे चिपकते हैं मानो यह मार्क्सवाद की केंद्रीय विषय वस्तु हो.

मैंने अनेक बार कहा है कि जाति का केंद्रीय चरित्र अमीबा की तरह है. यह केवल विभाजित होना जानती है. जातियों को बुनियादी तौर पर ऊंच-नीच के क्रम की जरूरत होती है. ये ऐसी किसी जगह में जीवित नहीं रह सकतीं जहां ऊंच-नीच का क्रम न हो. बाहरी दबाव से इनमें सिकुड़ने का रुझान दिखता है, लेकिन आप यह दबाव हटा दीजिए और वे फिर से विभाजित होने लगेंगी. सभी जाति विरोधी आंदोलनों ने यह अनुभव किया है लेकिन वे जातियों के इस केंद्रीय चरित्र पर गौर करने में नाकाम रहे हैं. बाबासाहेब अंबेडकर ने सभी अछूतों को एक वर्ग के रूप में संगठित करते हुए अपने जाति विरोधी संघर्ष को वर्गीय आधार पर चलाने की कोशिश की. उनमें जातियों की जगह ‘वर्ग’ का इस्तेमाल करने का झुकाव था. जाति पर अपने पहले ही निबंध में, जब वे कोलंबिया में बस एक छात्र हुआ करते थे, उन्होंने जातियों के चरित्र पर मजबूत अनुमान पेश किए (मैं जानता हूं, सिन्हा और उनके गिरोह के कॉमरेड इससे खुश नहीं होंगे). कहने की जरूरत नहीं है कि वर्ग की उनकी अवधारणा मार्क्सवादी नहीं थी बल्कि वह वेबरवादी अर्थ के ज्यादा नजदीक थी. लेकिन आगे बढ़ने के साथ ही, हालात के आगे बार-बार उन्हें जातियों पर पहुंचना पड़ा. नतीजे में, अनेक लोगों को यह सुनना खराब लगता है कि उनका संघर्ष जाति आधारित संघर्ष नहीं था. उनके आंदोलन से जिस ‘दलित’ ने आकार हासिल किया और छलावा देते हुए जो व्यावहारिक के रूप में सामने आया, जिसमें सभी उप जातियों को एक साथ बांध दिया गया है, वो आज 60 साल के बाद उप जातियों के उभार के साथ अपने अस्तित्व के खात्मे का सामना कर रहा है. दलितों के लिए इस तर्कसंगत नतीजे को समझना जरूरी है कि जातियां किसी भी क्रांतिकारी बदलाव के लिए किसी संघर्ष को खड़ा करने का आधार नहीं हो सकतीं. इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उन्हें जातीय मुहावरों से बचना होगा और उन्हें वर्गीय आधारों की ओर बढ़ना होगा. यह समझने के लिए हालात आज पहले के किसी भी दौर से ज्यादा अनुकूल हैं क्योंकि हरेक जाति ने अपने भीतर एक वर्ग स्तर बना लिया है, जो बाकियों के साथ पहचाने जाने का दिखावा करता है लेकिन असल में उनका शत्रु है. दलितों के लिए मार्क्सवाद को शुद्ध बनाने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनके द्वारा अंबेडकर के उपयोग की संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं. बाबासाहेब अंबेडकर ने उन्हें जाति के उन्मूलन का सपना दिया था. पूरा करने के लिहाज से यह एक अच्छा सपना है. इसकी राह में आनेवाली हरेक चीज को अंबेडकर-विरोधी कह कर खारिज किया जाना चाहिए. जातियां अकेले दलितों द्वारा नष्ट नहीं की जा सकतीं, इसकी सीधी सी वजह ये है कि दलितों ने इसे नहीं बनाया है. जब तक व्यापक समाज इस काम को अपने हाथ में नहीं लेता, जातियों का उन्मूलन नहीं हो सकेगा. इसलिए दलितों को अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान ‘प्रमाणपत्रों’ के आधार पर नहीं बल्कि जीवन अवस्था, यानी वर्ग, में उनकी जगह के आधार पर करनी चाहिए. मैं वामपंथियों को भी इससे एक उल्टी सलाह देता रहा हूं कि उन्हें रूढ़िवाद छोड़ देना चाहिए और जातियों को क्रांति की राह में प्रमुख बाधा के रूप में देखना चाहिए और इसे अपने व्यवहार में दिखाना भी चाहिए. इस जुबानी जमाखर्च से काम नहीं चलेगा कि वे बोलते वक्त बड़ी होशियारी भरी बातें बोलें लेकिन पुरानी उपमाओं पर टिके रहें. उनके सिद्धांत और उनके व्यवहार में यह प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए कि वे असल में बदल गए हैं. इन दोनों आंदोलनों, न कि वादों, के इस क्रमिक मेल से ही एक नया क्रांतिकारी आंदोलन जन्मेगा जो भारतीय क्रांति को तेज करेगा. इसी दलील के साथ मैं दोनों पक्षों को बरसों से चेतावनी देता आया हूं: ‘बिना क्रांति के दलितों की मुक्ति नहीं होगी और बिना दलितों की भागीदारी के क्रांति नहीं होगी.’ क्या इसमें कोई अंबेडकर-विरोधी बात है? या क्या मैं वही बातें बोल रहा हूं जो सिन्हा ने कहीं?

एक और मामला है, जिसको फर्जी अंबेडकरियों ने उठाया और जो आरक्षण नीति के साथ जुड़ा हुआ है. मैंने ‘कोटा’ आधारित मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की उत्पत्ति की तरफ ध्यान दिलाया, जो वायसराय की कार्यकारी परिषद के लेबर मेंबर के नाते बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा जारी किए गए एक सीधे-सादे मेमोरेंडम से शुरू हुआ था. यही नीति आजादी के बाद भी जारी रही, बस इसमें आदिवासियों के लिए एक अनुसूची जोड़ दी गई. संविधान में इससे संबद्ध उच्छेद अनुसूचित जाति (एससी), जनजातियों (एसटी) और पिछड़े वर्गों (बीसी) के आरक्षणों के लिए तर्क के रूप में उनके पिछड़ेपन को पेश करता है. भारत जैसे पिछड़े देश में पिछड़ेपन को समानता के एक आम उसूल के अपवाद के रूप में पेश करना एक मजबूत आधार नहीं लगता. इसके पीछे का आधार जाति आधारित बहिष्करण होना चाहिए था. इस बहिष्करण की पीड़ा अकेले अनुसूचित जातियों ने भुगती थी, आदिवासियों ने नहीं जो जातियों के दायरे से बाहर थे और पिछड़े वर्गों ने तो निश्चित तौर पर नहीं. अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण इस उसूल पर होना चाहिए था कि यह उनकी अक्षमता (पिछड़ापन) नहीं है बल्कि यह व्यापक समाज द्वारा समान सदस्यों के रूप में उनसे व्यवहार न कर पाने की अक्षमता है जिससे बराबरी लाने वाली, राज्य की एक ताकत के रूप में आरक्षण की जरूरत पड़ी. अगर अनुसूचित जातियां पिछड़ी नहीं होतीं तब भी समाज ने जातियों की अपनी गहराई तक धंसी धारणा के कारण उन्हें कभी भी उनका हिस्सा नहीं दिया होता. इसमें अगला पहला सुधार इसके प्रभाव के दायरे के संबंध में हुआ होता. यह महज छोटे से सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित नहीं होता बल्कि यह पूरे सामाजिक क्षेत्र को अपने दायरे में लेता: जैसे कि सार्वजनिक, निजी और हरेक चीज को. ऐसे सूत्रीकरण ने मौजूदा अनेक नीतिगत खामियों को दूर कर दिया होता: अपने आप खत्म हो जाने वाली विशेषता का अभाव, व्यापक समाज में स्वीकृति का अभाव, इसका लाभ उठाने वाली आबादी पर इसके मानसिक-सांस्कृतिक प्रभाव के बारे में चिंता का अभाव वगैरह. पिछड़ेपन के उलट अनुसूचित जातियों का जातीय बहिष्करण एक ठोस हकीकत थी न कि विवादास्पद. तब जाति के उन्मूलन की जिम्मेदारी व्यापक समाज पर आ गई होती, जिस पर यह जिम्मेदारी होनी ही चाहिए. व्यापक इस नीति को खत्म करने के क्रम में जाति के उन्मूलन के मकसद को पूरा करता. समाज ने जिस कलंक को जन्म दिया था, उससे ये लाभान्वित लोग बरी हो जाते और उन्हें निचली जाति होने के पारंपरिक तोहमत को भी शायद नहीं उठाना होता. आज अनुसूचित जातियां मानसिक दबाव के रूप में भारी कीमत चुका रही हैं, जो हर कहीं उनके पिछड़ेपन को कायम रखता है. जब मैं यह बात कह रहा हूं तो मैं आदिवासियों और पिछड़ी जातियों के खिलाफ नहीं हूं. मैं स्वीकार करता हूं कि पिछड़ेपन के आधार पर उनमें भी उतने ही पिछड़े लोग हैं जितने अनुसूचित जातियों में हैं. और उनके बारे में भी राज्य की जिम्मेदारी बनती है. लेकिन आरक्षण एक कड़वी गोली है और इसे किफायत से ही इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए. जातियों में फिर से जान डाले बिना लोगों के पिछड़ेपन को दूर करने के और भी दूसरे नीतिगत उपकरण हैं. शासक वर्ग कभी भी इस सुनहरी मुर्गी को हाथ से जाने नहीं देगा लेकिन जनता के पक्ष में खड़े बुद्धिजीवियों को आंख मूंद कर उनकी बातों पर नहीं चलना चाहिए.

अनुसूचित जातियों के इन आरक्षणों को भी सामाजिक हकीकत पर विचार करते हुए सावधानी से लागू किए जाने की जरूरत है. अनुसूचित जाति एक प्रशासनिक श्रेणी है जो अनगिनत जातियों और विभिन्न परिवेशों (ग्रामीण बनाम शहरी) और उनमें रह रहे लोगों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत के सामाजिक यथार्थ से मेल नहीं खाती. अपेक्षाकृत बेहतर सामाजिक-आर्थिक स्थितियों वाले शहरों और महानगरों में रहने वाले लोगों की एक छोटी सी संख्या द्वारा बाकी की आबादी के मुकाबले आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा हड़प लिया जाना तय है. इससे भी आगे ये आरक्षण उनकी स्थिति को और मजबूत करेंगे और व्यापक बहुसंख्या को नुकसान की तरफ धकेलेंगे. इसलिए, जबकि ऊपर दिए गए तर्कों के आधार पर अछूतों को दिया गया आरक्षण जायज था, लाभ उठाने वाले समूहों के भीतर इसको पारिवारिक ईकाई के आधार पर लागू किया जाना चाहिए था. जो परिवार उन्नत स्थितियों में थे वे आरक्षण के पहले दौर का फायदा उठा लेते लेकिन वे उस आबादी से बाहर हो जाते, जिसे आगे लाभ मिलने वाला था. इस सीधे से उसूल ने दलितों के बीच जातीय मुहावरों को हतोत्साहित किया होता और अनुसूचित जाति की आबादी के भीतर लाभों के समान बंटवारे को सुनिश्चित किया होता. मौजूदा आरक्षण नीति का सबसे साफ दोष भी दूर हो गया होता कि यह फायदा तो एक व्यक्ति को पहुंचाता है लेकिन कीमत पूरी जाति से वसूलता है. मैंने इस योजना का प्रस्ताव बरसों पहले रखा था और अगर किसी को इसके बारे में कोई संदेह हो तो इसे लागू करने में मदद करने की आम पेशकश भी की थी. शासक वर्ग, जिसके लिए आरक्षण की मौजूदा योजना लोगों को बांटने के लिए सबसे कारगर हथियार साबित हुई है, वह यकीनन इसको नजरअंदाज करेगा. लेकिन जाति को निरुत्साहित करने वाली इस योजना ने दलितों के बीच भी किसी प्रतिक्रिया को जन्म नहीं दिया. यह तथ्य कायम है कि हरेक व्यक्ति अपनी जाति से प्यार करता है, आप जितने नीचे जाएंगे उतना ही आप अपनी जाति से प्यार करेंगे. खैर, कॉमरेड सिन्हा, यह आरक्षण पर मेरा स्थायी रुख है. अपने रिकॉर्ड में मेरे शब्दों को मत तलाशिए क्योंकि ऐसी जटिल बातों की व्याख्या उन लोगों के सामने नहीं की जा सकती जो अपनी खुद की आवाज को छोड़ कर किसी और बात को सुनने को तैयार नहीं हों. और नकली अंबेडकरियो, नीति के ऐसे विश्लेषण में क्या कहीं बाबासाहेब का अपमान किया गया है? अगर आपको ऐसा लगता है तो फिर देश जिन बुराइयों का दर्द सब रहा रहा है, आप यकीनन उन सबके लिए बाबासाहेब को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

आखिर में, 55 पन्नों के इस दस्तावेज के आखिरी दो पन्नों में जिस कार्ययोजना के साथ अप्रोच पेपर खत्म होता है उससे आपको खोदा पहाड़ निकली चुहिया का एहसास होगा. यह अच्छे लगने वाले उन सारे बयानों से भरा हुआ है जो जाति पर किसी भी कम्युनिस्ट दस्तावेज में पाए जा सकते हैं. मैं कहूंगा कि तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में अपने जाति विरोधी मोर्चों के जरिए ठोस जातीय मामलों को उठाते हुए सीपीएम कहीं आगे निकल गई है. यह बात कि जनता के बीच जाति-विरोधी प्रचार करने वाले हजारों प्रचारक हमारे पास होने चाहिए, कि हमें मांगों के आम घोषणा पत्र में दलित मांगों को प्राथमिकता देनी चाहिए, कि जाति आधारित वैवाहिक विज्ञापनों, खाप और दूसरे जाति आधारित संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करनी चाहिए, कि कम्युनिस्टों को जातियों का पालन नहीं करना चाहिए वगैरह वगैरह. ये सारी बातें मामूली चाहतों की एक फेहरिश्त है और किसी मार्क्सवादी सैद्धांतिक कौशल को जाहिर नहीं करतीं. जाति व्यवस्था के खिलाफ बोलते हुए कोई भी आसानी से ऐसे कदमों के बारे में बात करेगा, चाहे वो मार्क्सवादी हो या गैर मार्क्सवादी. यह किस सैद्धांतिक सूत्रीकरण को पेश करता है? ये सारे उदार बुर्जुआ रुख से ताल्लुक रखते हैं. बहस के लिए ही मैं अंबेडकर की हिमायत नहीं कर रहा हूं. अपनी स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज में 1947 में उन्होंने जिन कदमों को पेश किया है, उन पर गौर कीजिए. क्या वे कदम जातियों का मुकाबला करने के इन घिसे-पिटे नुस्खों से कहीं अधिक क्रांतिकारी नहीं हैं?

अब सुनिए, मैंने अपनी किताब साम्राज्यवाद-विरोध और जातियों का उन्मूलन में जातियों के उन्मूलन का एक तौर-तरीका पेश किया है. यह समुचित सैद्धांतिक विश्लेषण और साइबरनेटिक्स में मेरे अपने शोध पर आधारित है. एक, मैंने पाया कि औपनिवेशिक काल से 1960 के दशक तक पूंजीवादी हमलों में कर्मकांडी जातियां काफी हद तक कमजोर हुईं और इस तरह परंपरागत ऊंच-नीच के अर्थ में जातियों की बात करना बेमतलब है. समकालीन जातियां दलितों और गैर-दलितों में सिमट गई हैं. दो, देहातों में जातीय विरोध धनी किसानों के वर्ग और ग्रामीण सर्वहारा के बीच सामने आता है, जो ज्यादातर दलितों में से आते हैं. ये विरोध मुख्यत: आर्थिक हितों पर आधारित होते हैं लेकिन वे गैर-आर्थिक (सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक) कारणों पर जोर देते हैं. धनी किसान अपनी जाति के लोगों के साथ जातीय संबंधों का इस्तेमाल करते हुए इसे आसानी से दलितों और पिछड़ी जातियों के बीच जातीय टकराव में बदल सकते हैं. तीसरे, बेरोकटोक उत्पीड़नों की वजह दलितों की अपनी कमजोरी है (जैसा कि बहुत पहले 1936 में ही अंबेडकर द्वारा इसकी पहचान की गई थी). राज्य और इसके उपकरणों के साथ धनी किसानों का गठजोड़ दलितों और गैर-दलितों के बीत शक्ति असंतुलन को बढ़ाता है. काफी हद तक यह प्रभावशाली कारक है. चौथा, आमतौर पर समाज में तरक्की कर चुके तबकों को राजनीतिक अर्थव्यवस्था के जरिए जाति की बुराई के खिलाफ लोगों को शिक्षित करना चाहिए, न कि एक सांस्कृतिक या नैतिक तरीके से. इसमें अपेक्षा की जाती है कि यह धनी किसानों और उनकी जाति के दूसरे लोगों के बीच जातीय संबंधों को कमजोर करेगा, जो दलितों के खिलाफ हमलों में उनके सहायक होते हैं. पांचवे, इन सबके बाद भी ऐसे तत्व होंगे जो इन चीजों को नहीं समझेंगे और उत्पीड़न में हिस्सा लेंगे. उनके साथ शारीरिक रूप से निबटने की जरूरत है. यहां वामपंथ के लिए दखल देने का मौका और भूमिका सामने आती है. इस प्रक्रिया का नतीजा यह होगा कि वामपंथ दलितों का भरोसा जीत लेगा और इस तरह जातियों का उन्मूलन करने वाली ताकतें उन्नति करते हुए मजबूत होंगी. मैं इसे अपनी रूपरेखा के लिए बनाए गए बारीक ब्योरों (वर्कशीटों) से नहीं भर रहा हूं. आप इतना भर कीजिए और आप खुद को जातियों के उन्मूलन के करीब पाएंगे.

आखिर में, खुद पर ही फिदा मार्क्सवादियों से मैं यह कहना चाहूंगा कि शब्दों के बूते अकड़ना और उनके सार को नजरों से ओझल कर देना बचकानापन है. रिपब्लिकन पैंथर्स को दिया गया आपका पूरा जवाब मेरे दूसरे बयान पर टिका हुआ है कि मैंने आपसे सहमत होते हुए, पहले जो कुछ भी कहा था उसे रद्द कर दिया. गजब! मेरे दूसरे बयान की ठीक पहली लाइन ही यही है कि मैंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जिसे खारिज करने के लिए आपने इतनी मेहनत की और आप फिर से बातों को तोड़ने मरोड़ने में लग गए. आपने अपने मन से अंदाजा लगाते हुए किसी ने क्या कहा है और फिर उसकी बातों जोशो-खरोश से खारिज करना मेहनत की बर्बादी करने जैसा है. जब मैंने कहा कि आपने जो कहा था उसमें ज्यादातर से मैं सहमत हूं तो मेरा मतलब आपके अप्रेच पेपर के सार से (मैंने कभी नहीं कहा कि मैं इसे संपूर्णता में नकारता हूं. मैंने कहा कि इसे पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं यह सब पहले भी पढ़ चुका हूं) और साथ ही डिवी के दर्शन पर आपके लंबे वक्तव्य से था (जिसे मैंने सावधानी के साथ सुना). यकीनन ‘ज्यादातर’ में सारी बातें नहीं आती हैं. मुझे अपने वादे पूरे करने के लिए जालंधर जाना था इसलिए मैं जल्दी में था. मैंने बेचैनी के साथ कुछ कहा (इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने जो कहा वो मेरा इरादा नहीं था और अब मैं अपनी बातों से पलट रहा हूं) और वहां से चला आया, जिसे मेरे मुख्य बिंदुओं पर आपके साथ मेरी सहमति के रूप में नहीं देखा जा सकता है. जब मैंने सिन्हा से कहा कि उन्होंने फिर से मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है तो उन्होंने कहा, ‘ऐसा मुझे ध्वनित हुआ.’ जो बात कही नहीं गई हो, उसे सुनना मतिभ्रम कहलाता है और अगर यह बार-बार हो तो एक मार्क्सवादी के लिए काफी गंभीर बात है क्योंकि तब वो हकीकत को नहीं देख सकता. एक वरिष्ठ कार्यकर्ता होने के नाते, घमंड से भरी हुई उस उद्दंडता के खिलाफ मैंने आपको सलाह दी थी, जो आपने उन लोगों के खिलाफ दिखाई जो मेरे साथ आए थे. मेहरबानी करके उस पर गौर करिएगा.

और अब छद्म अंबेडकरियों से. मैं कहूंगा कि आपने यहां-वहां से उठाई गई मेरी पंक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, सीधी-सादी दलित जनता के बीच मेरे खिलाफ झूठी अफवाहें फैला कर कि मैंने बाबासाहेब अंबेडकर की तौहीन की है, अपनी विशेष अज्ञानता का ही परिचय दिया है. ऐसा आपने मेरी उस राय के आधार पर किया, जिसे पिछले 30 बरसों से ज्यादा समय से अपने अध्ययन के आधार पर किताबों, लेखों और भाषणों के जरिए कहता आया हूं. यह मैं नहीं बल्कि आप हैं, जिन्होंने एक ऐसे आदमी के खिलाफ उनके लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए बाबासाहेब अंबेडकर का अपमान किया, जो उन्हें शासक वर्ग के खेमे से दूर रखने के मकसद से अकेले काम कर रहा है. ये आपलोग हैं जिन्होंने बाबासाहेब का अपमान किया है. न केवल अभी बल्कि पिछले 57 वर्षों में तब तब आपने उनका अपमान किया है, जब आप उन्हें और उनके विचारों को एक जड़ अस्मितापरक मूर्ति में कैद करते हैं, जब व्यवस्थित रूप से दलित जनता को इस मूर्ति के प्रति श्रद्धावान बनाते हैं और उन्हें उनके जीवन और मौत के मुद्दों से भटका देते हैं, जब राजकीय रियायतें, पदों पर नामांकन, चुनावी टिकट हासिल करने, मंत्री बनने के लिए शासक वर्गों की नजर में अच्छा बनने के लिए अंबेडकर की छवि का कारोबार करते हैं, राज्य से ये चीजें और ऐसी ही दूसरी अनेक चीजें आपकी स्वार्थी उपलब्धियों के रूप में आपको मिलती हैं और बदले में आप शासक वर्ग की नीतियों की हिमायत करते हैं जिसने दलित जनता का व्यवस्थित रूप से शोषण किया है. जब आप अंबेडकर की बातों का व्यवस्थित रूप से तोड़ मरोड़ करते हैं ताकि आप अपनी काली करतूतों को जायज ठहरा सकें और जब आप दलित हितों के दलाल बनते हैं, तब आप अंबेडकर का अपमान कर रहे होते हैं. आपने केवल उनका अपमान ही नहीं किया है, उनकी हत्या की है. वह मैं हूं जिसने बाबासाहेब अंबेडकर के प्रति रत्ती भर भी भक्ति जाहिर नहीं की, आपलोगों के गिरोह के उलट, मैंने जो भी किया उसे बेहतर बनाने के लिए उनके आदर्शों का अनुसरण किया, उत्पीड़ित जनता के पक्ष में मजबूती से टिका रहा, उनकी हिमायत में आस पास की दुनिया का विश्लेषण करने की क्षमताओं को अपने भीतर बनाए रखते हुए और अपनी पूरी क्षमता से बाबासाहेब अंबेडकर के ‘आजादी, बराबरी और भाईचारे’ के सपने को पूरा करने की कोशिश कर रहा है. आपने बाबासाहेब अंबेडकर का अपमान किया, आपने मेरा अपमान किया और आपने उन सबकी पवित्र विरासत का अपमान किया जिन्होंने इंसानी मुक्ति के लिए जद्दोजहद की है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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