हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आनंद तेलतुंबड़े का चंडीगढ़ में पूरा भाषण, आलोचना और जवाब

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/24/2013 02:00:00 AM



आप इस वीडियो को देखिए. पिछले कई दिनों से चंडीगढ़ सम्मेलन के आयोजकों की तरफ से इसी वीडियो को लेकर दावे किए जा रहे थे. मेहरबानी करके इसे पूरा देखें. और अगर आप खोज सकें तो खोजें कि कहां आनंद तेलतुंबड़े ने अपनी बातें वापस ली हैं, कहां उन्होंने उससे कुछ अलग कहा है, जो वे पिछले लगभग दो दशकों से लिखते-कहते आए हैं. कहां उनकी बातों में तालमेल की कमी और असंगति लग रही है. अगर आप बता सकें तो जरूर बताएं. चूंकि वीडियो में सारी बातें आ गई हैं, इसलिए हाशिया को अलग से इस पर टिप्पणी करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है.

लेकिन कुछ दूसरी बातों पर कुछ टिप्पणी किए जाने की जरूरत है. अभिनव सिन्हा ने एक पोस्ट में और फिर टिप्पणियों के एक लंबे सिलसिले में बार बार यह कहा है कि हाशिया ने एक मुहिम चला रखी है और यहां साजिश रची जा रही है. हाशिया पर इस मामले पर यह सिर्फ दूसरी पोस्ट है. क्या सिर्फ एक अकेली पोस्ट को  मुहिम और साजिश मानना जायज है? हां, हाशिया ने दूसरे पक्ष या पक्षों को प्रस्तुत नहीं किया, इसलिए नहीं किया क्योंकि दूसरे पक्ष एक दूसरी वेबसाइट पर पहले से ही आ रहे थे और हाशिया को उन सबको कट-पेस्ट करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. लेकिन हाशिया ने उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया और अपनी अब तक की अकेली पोस्ट में इस बहस की शुरुआती और एक मुख्य पोस्ट का लिंक भी जोड़ा था, ताकि पाठक वहां तक पहुंच सकें और दूसरे पक्ष को जान सकें. वैसे हाशिया हर मामले में इसे जरूरी नहीं समझता कि वह दोनों पक्षों को पेश करे. हाशिया की रुचि इसमें है भी नहीं, खास कर किसी ऐसे मामले में तो और भी नहीं, जब एक पक्ष की सारी और पूरी बातें पहले से ही कहीं और प्रकाशित हो रही हों. इनका एक लिंक दे दिया जाना ही काफी होगा, जैसा कि इस मामले में भी किया गया.

हाशिया का मानना है कि बाबासाहेब अंबेडकर और जाति विरोधी संघर्षों के बाकी नायकों को देखने के नजरिए में फर्क असल में भारतीय समाज और दुनिया की व्यवस्थाओं को देखने और उन्हें बदलने के संघर्ष में फर्क से पैदा होता है. यह फर्क इससे भी आता है कि आप मार्क्सवाद को कैसे लेते हैं, उसे अपने व्यवहार में कैसे उतारते हैं. तेलतुंबड़े इस समाज को जिस तरह से देखते हैं और उसे बदलने की चाहत रखते हैं, दरअसल उनकी वही जमीन उन्हें डॉ. अंबेडकर, फुले और दूसरे नायकों के योगदानों को अहमियत देने और उनके विजन को क्रांतिकारी संघर्षों से जोड़ने की जरूरत बताती है (‘अंबेडकरवाद’ और मार्क्सवाद में समन्वय की बड़बोली बातों और तेलतुंबड़े की इस बात में एक मजबूत और साफ फर्क है, इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए). हाशिया मनमाने तरीके से, जान बूझ कर और जबरदस्ती अपनी स्थापनाएं, विचार और नतीजे दूसरों के सिर पर, यहां तेलतुंबड़े के ऊपर, थोपने की निंदा करता है.

यह अभिनव के बचकाने ‘मार्क्सवादी’ अहंकार की ही एक और मिसाल है कि बार बार उन्होंने हाशिया को यह वीडियो पोस्ट करने की चुनौती दी. हाशिया  पर यह वीडियो पोस्ट किया जा रहा है और ऐसे मौके पर हाशिया की मंशा एकाध सुझाव देने की है. पहला तो यह कि आप ऐसी हिंदी में न बोलें, जिसको समझने के लिए उसका फिर से
हिंदी में अनुवाद करने की जरूरत पड़े. और दूसरी यह, कि चुनौतियां देने से पहले सोच लें कि आप जिस कंटेंट के बूते चुनौती दे रहे हैं, वो पुख्ता हो. यह वीडियो आपके दावों की पुष्टि नहीं करता. तीसरी बात, आनंद ने सही कहा है कि आपके पूरे गिरोह से ब्राह्मणवादी जातीय नफरत की बू आती है. यह बात हाशिया की पिछली पोस्ट में अनिता भारती के कमेंट्स पर आपकी खुद की टिप्पणियों से सही साबित होती है. बेहतर होगा कि आप यह बेवकूफी भरी हरकतें बंद कर दें. आप महान ‘मार्क्सवादी’ होंगे, ‘क्रांतिकारी’ भी होंगे, ‘दार्शनिक’ और ‘कार्यकर्ता’ और ‘विचारक’ भी हो सकते हैं, लेकिन ऐसी घटिया और बेहूदगी भरी टिप्पणियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी.

और अंत में: अगर आप इसे मुहिम मान रहे हैं, तो हाशिया को इससे भी कोई गुरेज नहीं है.

'मार्क्सवादियों' की ब्राह्मणवादी बेवकूफियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/22/2013 09:24:00 PM


चंडीगढ़ में जाति प्रश्न और मार्क्सवाद पर हुए सम्मेलन के अप्रोच पेपर, इसकी आनंद तेलतुंबड़े द्वारा की गई आलोचना और इसके बाद हुई बहसें अब तक मोटे तौर पर उपेक्षित रही हैं. इसकी जगह सम्मेलन की सतही रिपोर्टिंग हुई है, जिसने सम्मेलन में चली बहसों को ही एक तरह से, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से, विस्तार दिया. सम्मेलन में जिस तरह से बाबासाहेब अंबेडकर और जाति विरोधी संघर्षों के योगदानों को खारिज करने की कोशिश की गई थी, और आयोजकों द्वारा इस मकसद के लिए तेलतुंबड़े के लेखन को भी बेईमानी के साथ तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था, वह फिर से दोहराया गया और कार्यक्रम की रिपोर्टिंग में तेलतुंबड़े को यह कहते हुए दिखाया गया कि अंबेडकर के सारे प्रयोग महान विफलता में समाप्त हुए. सारे संदर्भों को काट कर कुछ चुने हुए वाक्यों को पेश करने से ऐसा लगा मानो तेलतुंबड़े ने आंबेडकर, आरक्षण और जाति विरोधी संघर्षों के योगदानों को, आयोजकों के सुर में सुर मिलाते हुए, खारिज कर दिया है. इसकी खबर महाराष्ट्र में प्रकाशित होने के साथ ही यह मुद्दा गरमाया. हिंदी में भी कुछ विचारकों, टिप्पणीकारों और पत्रकारों ने  इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं. लेकिन मामले को साफ करते हुए आनंद तेलतुंबड़े ने एक संक्षिप्त सा बयान जारी किया है. साथ ही में महाराष्ट्र के रिपब्लिकन पैंथर्स ने भी आयोजन और उसमें तेलतुंबड़े के भाषण से संबंधित एक बयान मराठी में जारी किया है. इन दोनों का हिंदी अनुवाद हाशिया पर पेश किया जा रहा है. चूंकि अनुवाद को आसान बनाने की कोशिश में पारिभाषिक शब्दों का इस्तेमाल करने से बचा गया है, इसलिए सावधानी बरतते हुए साथ में इनका अंग्रेजी पाठ भी पेश किया जा रहा है और किसी भ्रम की स्थिति में अंग्रेजी पाठ को ही आधिकारिक माना जाना चाहिए. -हाशिया

मैं सम्मेलन में अपने बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने का विरोध करता हूं. मेरे बयान में तथाकथित मार्क्सवादियों के रूढ़िवादी और ब्राह्मणवादी रवैए की सख्त आलोचना की गई थी, जिन्होंने पूरे जाति-विरोधी आंदोलन को खारिज किया और वे बेशर्मी के साथ बाबासाहेब अंबेडकर के प्रति असम्मान से भरे हुए थे. मैंने उन पर यह आरोप लगाया कि वे जातिवादी हैं और हिंदुत्ववादियों-ब्राह्मणवादियों के समान हैं. यह उनके कबीले के लिए मुमकिन सबसे बदतर आरोप था. मैंने यह आरोप भी लगाया कि इससे भी आगे वे भारतीय क्रांति को नुकसान पहुंचा रहे हैं. मैंने दूसरी बातों के साथ यह भी कहा कि इस देश के लोकतंत्रीकरण में अंबेडकर का योगदान, सारे कम्युनिस्टों के योगदान को आपस में मिला दें तब भी उससे महान था. इसलिए, मेहरबानी करें और मेरे नाम पर झूठी अफवाहें न फैलाएं. 
-आनंद तेलतुंबड़े

डॉ. आनंद तेलतुंबड़े ने चंडीगढ़ सम्मेलन में तथाकथित मार्क्सवादियों की तीखी आलोचना की

रिपब्लिकन पैंथर्स, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र से आनेवाले हम रिपब्लिकन पैंथर्स के सदस्य चंडीगढ़ सम्मेलन में मौजूद थे. जिस तरह हस्तक्षेप ब्लॉग और आयोजकों के संगठन के मुखपत्र बिगुल में डॉ. आनंद तेलतुंबड़े के नाम पर अंबेडकर विरोधी झूठी बातें जोड़ी जा रही हैं, इसे देख कर हमें गहरा दुख हुआ है. हम यह महसूस करते हैं कि रूढ़िवादी मार्क्सवादियों और उनके गिरोहों की तीखी आलोचना को नजरअंदाज कर देना और उन्हें संदर्भ से काटे हुए छिटपुट वाक्यों के आधार अंबेडकरविरोधी के रूप में पेश करना एक बेईमानी से भरी कार्रवाई है, जिसका मकसद तेलतुंबड़े की छवि को न केवल दलितों के बीच बल्कि क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बीच भी धूमिल करना है.

उन्होंने बड़ी आसानी से डॉ. तेलतुंबड़े द्वारा सम्मेलन के आयोजकों के रूढ़िवादी नजरिए (पोजीशन) की उस तीखी आलोचना को नजरअंदाज कर दिया है जिसे आयोजकों ने अपने अप्रोच पेपर में अपनाया था. अप्रोच पेपर, आम तौर पर रहने वाली सामग्री को छोड़ के अलावा, निचली जातियों और खास कर दलितों और इससे भी अधिक बाबासाहेब अंबेडकर के पूरे संघर्षों के बारे में पूरी तरह नफरत से भरा था. डॉ. तेलतुंबड़े, जिन्होंने शुरू में अपने व्यस्त कार्यक्रम के चलते आयोजकों को मना कर दिया था, बाद में जालंधर से कुछ देर के लिए सम्मेलन में आने पर मान गए थे, जहां वे समता सैनिक दल के स्थापना दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए थे. यह बुलावा उन्हें खुद सम्मानित वरिष्ठ अंबेडकरवादी नेता मि. एल.आर. बाले द्वारा दिया गया था. वे 13 की रात को देर से पहुंचे और वे सम्मेलन में विशेष भाषण देने वाले थे. अगले दिन, जब उन्हें बोलने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने भाषण देने की जगह अप्रोच पेपर की विकृतियों की आलोचना की. उन्होंने कहा कि अप्रोच पेपर में कुछ भी नया नहीं था, बल्कि पुराने रूढ़िवादी मार्क्सवादी नजरिए को ही दोहराया भर गया था जिसके हिमायती, उनका मानना है कि, ज्यादातर भारतीय मार्क्सवादी हुआ करते थे. वक्त की कमी के चलते उन्होंने अप्रोच पेपर में दिए गए अपने हवालों पर ही खुद को केंद्रित किया और इसके बारे में समझाया कि कैसे उसमें प्रस्तुत किए गए उनके हरेक शब्द को तोड़ा-मरोड़ा गया है. चूंकि इस विषय पर उनके नजरिए को पूरा देश जानता है, उन्होंने आरोप लगाया कि यह तोड़-मरोड़ जान-बूझ कर, सोचे-समझे तरीके से की गई थी और इनसे गहरे जातिवादी पूर्वाग्रहों की बू आती थी. उन्होंने कहा कि पहले तो किसी के बयान की तोड़-मरोड़ करना और फिर उसको जोर-शोर से खारिज किया जाना एक मार्क्सवादी पद्धति नहीं है.

अपवाद के रूप में अप्रोच पेपर में उनके एक बयान का जिक्र था, जिसे उन्होंने एसएफआर, जेएनयू द्वारा प्रकाशित जाति का उन्मूलन की प्रस्तावना के रूप में लिखा था. बेशक इसे भी तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था, कि तेलतुंबड़े ने अंबेडकर के जाति के उन्मूलन को मार्क्स के कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र जितना महत्वपूर्ण माना है. सौभाग्य से एक जाने माने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता असित दास ने इससे ठीक पहले वह वास्तविक बयान पढ़ा था, जो कि इस तरह है: 'पूंजीवादी दुनिया के लिए जो कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र है, वही जातीय भारत के लिए जाति का उन्मूलन है.’ इसने आयोजकों के झूठ को उजागर कर दिया. डॉ. तेलतुंबड़े ने इसके बारे में समझाया कि कैसे इसमें से अंबेडकर और दलितों के खिलाफ आयोजकों के जातीय पूर्वाग्रहों की बू आती है. अपनी व्याख्या के दौरान उन्होंने कहा कि बाबासाहेब अंबेडकर ने कभी भी एक आदर्श समाज की अपनी धारणा को व्यक्त करने से आगे बढ़ कर कोई स्थायी सिद्धांत देने का दावा नहीं किया. वे बुनियादी रूप से कोलंबिया में अपने प्रोफेसर जॉन डिवी की प्रेरणा से, प्रगतिशील व्यवहारिकता पर चलते थे, जो इस पर भरोसा करते थे कि किसी भी सैद्धांतिक धारणा की परख व्यवहार में होती है ताकि व्यवहार को रोशनी मिल सके. इसने अपने तौर-तरीके (मेथडोलॉजी) में नाकामियों को सहज ही कबूल किया था. अंबेडकर की महानता इस उपमहाद्वीप की अनोखी समस्या पर ध्यान केंद्रित करने और ईमानदारी के साथ इसके खिलाफ संघर्ष करने में थी. इसलिए वे सही थे या गलत, यह अप्रासंगिक हो जाता है. यह अनुभव से साबित एक तथ्य है कि अंबेडकर अपने द्वारा की गई कोशिशों में से ज्यादातर में नाकाम रहे. शुरू में उन्होंने यह कल्पना की थी कि सवर्ण हिंदुओं के उन्नत तत्व कुछ तयशुदा सुधारों को बढ़ाने के लिए आगे आएंगे, लेकिन जल्दी ही, महाड में उनके बारे में उनका भ्रम टूट गया और वे राजनीतिक मौके हासिल करने की तरफ मुड़ गए. उन्होंने बड़ी मेहनत से दलितों के लिए अलग राजनीतिक पहचान हासिल की लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं कर पाए क्योंकि गांधी द्वारा किए गए ब्लैकमेल ने उसे नाकाम बना दिया. उन्होंने राजनीतिक आरक्षणों को भी हासिल किया लेकिन उन्हें यह महसूस हुआ कि ये आरक्षण शासक वर्ग के हितों की ही सेवा कर रहे थे और उन्होंने 1953 में आरक्षण को वापस लेने की मांग की. दिलचस्प बात ये है कि वे खुद कभी भी आरक्षित सीटों पर नहीं जीत पाए, यहां तक कि राजनीतिक रूप से बहुत छोटे कद के उम्मीदवारों के खिलाफ भी. पिछले 60 बरसों से व्यवहार में लाए जा रहे दूसरे आरक्षण (नौकरी और शिक्षा में) दलितों के महज 10 फीसदी हिस्से को ही ऊपर उठा पाए हैं, बाकी बचे हुए 90 फीसदी दलित दूसरे की तुलना में जहां के तहां हैं. उन्होंने दलितों के बीच उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया लेकिन यह भी कारगर नहीं रहा और उन्हें यह कहना पड़ा कि पढ़े-लिखे दलितों ने उन्हें धोखा दिया है. उन्होंने बड़ी उम्मीद से संविधान लिखा, लेकिन उन्हें यह ऐलान करना पड़ा कि यह हर किसी के लिए अच्छा नहीं है और यह कि उन्हें भाड़े के एक टट्टू की तरह इस्तेमाल में लाया गया. उन्होंने 'रेडिकल’ बौद्ध धर्म को अपनाया और कल्पना की कि वे पूरे भारत को बौद्ध बना देंगे, लेकिन बौद्ध धर्म आज केवल उनके अपने समुदाय तक ही सीमित है और बस एक अतिरिक्त पहचान बन कर रह गया है. इस तरह कोई उनकी नाकामियों को गिन सकता है. लेकिन तब इस अर्थ में हरेक महान इंसान नाकाम रहा है. पूरी दुनिया मार्क्स को नाकाम मानती है. यह नाकामी तो कहीं अधिक गंभीर है, क्योंकि अंबेडकर के उलट मार्क्स ने एक 'महान सिद्धांत’ (ग्रांड थ्योरी) दिया था. यह इतिहास की किसी भी अन्य नाकामी से कहीं अधिक गंभीर है.

डॉ. तेलतुंबड़े ने आयोजकों की इसको लेकर बार-बार आलोचना की कि उनके इस रवैए में से कि मार्क्स ने आखिरी बात कह दी है, हिंदुत्ववादियों की बू आती है, जो यह मानते हैं कि हरेक बात वेदों में कह दी गई है. उन्होंने इसको समझाते हुए कहा कि आईआईटी में, जहां वे इन दिनों पढ़ाते हैं, ऐसी बातें पूरे विश्वास के साथ कही जाती हैं कि पूरा विज्ञान और तकनीक सिर्फ भारत में ही जन्मा है और दूसरे सभी लोगों ने इसे यहां से चुरा लिया है. उन्होंने आयोजकों के पूरे विमर्श की इससे तुलना की और कहा कि इसे मार्क्सवाद के रूप में नहीं लिया जा सकता. उन्होंने कहा कि पूरे गैर-मार्क्सवादी संघर्ष को नकारना सिर्फ जातिवादी रवैए को ही दिखाता है. अंबेडकर मार्क्सवादी नहीं थे. मार्क्सवाद के बारे में उनके गंभीर संदेह (रिजर्वेशन) थे. लेकिन तब भी इसको लेकर उनके मन में असम्मान नहीं था, इस अनौपचारिक टिप्पणी के बावजूद कि यह केवल भौतिक सुखों पर विचार करता है और इंसानी जीवन के आध्यात्मिक पहलू को नजरअंदाज करता है. उन्होंने हमेशा मार्क्सवाद को अपने फैसलों की कसौटी के रूप में उपयोग किया, जो कि कठमांडू में उनके आखिरी व्याख्यान 'बुद्ध या कार्ल मार्क्स’ में साफ साफ जाहिर होता है. अनेक स्व-नियुक्त मार्क्सवादियों समेत अपने समय के अनेक लोगों की तरह, मार्क्सवाद की उनकी अवधारणा सतही थी और हम इसे आज सही नहीं भी मान सकते हैं. लेकिन क्या यह उनके योगदानों का मूल्यांकन करने के लिए प्रासंगिक है, यह बात तेलतुंबड़े ने पूछी. उन्होंने जोर दिया कि अंबेडकर का योगदान सिर्फ दलितों की मुक्ति के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के लोकतंत्रीकरण में कुल मिला कर सभी मार्क्सवादियों से महान था.

तेलतुंबड़े ने कहा कि शुरुआती बचपन से ही उनके विचार मार्क्सवादी रहे हैं, लेकिन वे मार्क्सवादियों के ऐसे रूढ़िवादी, जड़ और ब्राह्मणवादी रवैए के कारण आज भी खुद को मार्क्सवादी कहने से डरते हैं. उन्होंने कहा कि उनका मार्क्सवाद द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के इसके केंद्रीय उसूल पर आधारित है. इससे पैदा हुई बाकी सारी चीजें ऐतिहासिक अनुभवों की रोशनी में समीक्षा का विषय हैं, भले ही वे मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन या किसी भी दूसरे व्यक्ति की कोशिशों का नतीजा हों. उन्होंने सावधान किया कि मार्क्स और एंगेल्स के दिनों से दुनिया काफी बदल गई है. उन्होंने सूचना तकनीक, जैव तकनीक, नैनो तकनीक वगैरह जैसी आधुनिक तकनीक के शुरू होने और बढ़ते हुए मध्य वर्ग के संदर्भ में कुछ समस्याओं को पेश किया. उन्होंने कहा कि उनके पास ऐसी चीजों की एक लंबी फेहरिश्त है, जो मार्क्सवाद के बारे में फिर से सोचने को प्रेरित कर सकती हैं. लेकिन रूढ़िवादी मार्क्सवादी कभी भी इसे कबूल नहीं करेंगे. यह मार्क्सवादियों का 'उत्साह से भरा’ रवैया ही था, कि मार्क्स को खुद भी यह एलान करना पड़ा था कि वे मार्क्सवादी नहीं हैं. तेलतुंबड़े ने बड़े दर्द के साथ कहा कि आयोजकों ने उन्हें उन मार्क्स और मार्क्सवाद के बारे में ऐसी सख्त बातें कहने को बाध्य कर दिया, जो उन्हें इतने प्यारे हैं. इससे भी आगे जाते हुए उन्होंने कहा कि इधर वे इन 'वादों’ को भी अस्मिताओं के रूप में देखने लगे हैं. किसी भी दूसरी अस्मिता की तरह ये भी सिर्फ जनता को बांटते हैं और उनकी क्रांतिकारी क्षमता को कमजोर करते हैं.

उन्होंने शुरुआती कम्युनिस्टों पर अपने ब्राह्मणवादी रवैए से मार्क्सवाद को जड़ सूत्र बना देने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि उन लोगों ने भारत का वर्ग विश्लेषण कने के लिए पश्चिमी सांचों को ज्यों का त्यों उधार लेकर सबसे बड़ा ऐतिहासिक पाप किया. अगर उन्होंने वर्ग की लेनिन की परिभाषा को अपने भीतर उतार लिया होता तो उपमहाद्वीप में जनता के जीवन जगत (लाइफ वर्ल्ड) के रूप में जातियां वर्गों की अवधारणा से बाहर नहीं की जा सकती थीं. उनके पास भारत की ठोस हकीकत को सुलझाने के लिए मार्क्सवाद के उन्नत औजार थे लेकिन उन्होंने उनको आधार और अधिरचना की एकांगी उपमा में समेट दिया.  उन्होंने जो किया वह ‘आधार’ से जुड़ा था और दूसरों का काम मामूली अधिरचना से जुड़ा हुआ. इसी तरीके से वे अंबेडकर का मजाक उड़ाते रहे, जिन्होंने 1930 के दशक में उनसे दोस्ती का रुझान दिखाया था. अगर वे मार्क्सवाद पर चले होते तो जाति विरोधी संघर्षों को वर्ग संघर्ष के अभिन्न हिस्से के रूप में बनाते हुए जातियों को वर्गों में शामिल किया जा सकता था. लेकिन उनकी ब्राह्मणवादी बेवकूफी के चलते जातियां उनके विश्लेषण से बाहर रह गईं जिसने अपने पीछे वर्ग और जातियों का मूर्खतापूर्ण द्वैत खड़ा किया. उनके द्वारा आयोजकों के नजरिए की तीखी आलोचना करने और जाति विरोधी संघर्षों का बचाव करने के बाद, आयोजकों के कुछ प्रतिनिधियों ने तेलतुंबड़े को खारिज करने के लहजे में लंबे-लंबे भाषण दिए. इसके बाद जब उन्हें बोलने के लिए बुलाया गया, तो उन्होंने बस यह कहा कि उन लोगों ने जो किया वह एक बार फिर एक तोड़-मरोड़ ही थी. उनके लंबे भाषण को खारिज करते हुए, उन्होंने कहा कि चूंकि उन्होंने कभी वो बातें नहीं कहीं, जिनको काटने के लिए इतनी मेहनत की जा रही है, इसलिए जवाब देने की कोई जरूरत नहीं है. इसके बजाए, उन लोगों ने जॉन डिवी के दर्शन की जो  व्याख्या थी, उसे कबूल किया.

उन्होंने उसी को दोहराया, जिसे वे बरसों से कहते आए हैं कि भारत में दलितों की भागीदारी के बगैर क्रांति मुमकिन नहीं है और दलितों की मुक्ति क्रांति के बगैर नहीं हो सकती. अप्रोच पेपर हकीकत की जैसी तस्वीर पेश करता है, जैसा कि वे देख रहे हैं, दलितों को सिर्फ और दूर ही करेगा. उन्होंने इसके प्रति चेताया कि ऐसा रवैया पहले ही चीजों को इस हद तक ले गया है कि दलित आसानी से किसी प्रतिक्रियावादी शिविर में तो शामिल हो सकते हैं लेकिन कम्युनिस्टों को वे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानेंगे. हालांकि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण रवैए को अनेक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं द्वारा मजबूती मिली है, लेकिन कम्युनिस्ट इसमें अपनी भूमिका से बच नहीं सकते. इधर अनेक दलित युवक कम्युनिस्टों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जिसका श्रेय दलित आंदोलन के पतन को जाता है, लेकिन अप्रोच पेपर में जैसी चीजें हैं, वो यकीनन उन्हें बेचैन करेंगी और फिर से उन्हें दूर कर देंगी. उन्होंने मार्क्स के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए इस पर दुख जताया कि अप्रोच पेपर ने केवल यथार्थ को पेश करने भर की कोशिश की थी, जबकि उनके लिए सवाल इसे बदलने का है.

यह डॉ. तेलतुंबड़े द्वारा वहां कही गई बातों का दर्द में डूबा हुआ सार है. ऐसे गहन संदर्भ को नजरअंदाज करते हुए यहां-वहां से कुछ वाक्यों को उठा लेना मार्क्सवाद से पतित होने का एक बेईमानी भरा रास्ता है.

-वीरा साथीदार, राजू कदम, शरद गायकवाड़, श्वेता बिरला, सुमेध जाधव

अंग्रेजी पाठ

I protest the distorted reporting of my statements in the conference, which was scathingly critical of the orthodox and brahmanic attitude of the so called Marxists there who trashed the entire anti-caste movement and were unashamedly disrespectful of Babasaheb Ambedkar. I had accused them of being casteist and likened them to the hindutva-brahmanist, the worst possible attribution to their tribe, doing further harm to Indian revolution and had stated among other things that the contribution of Ambedkar to democratization of the country was greater than all the communists together. Please do not spread canard in my name.
-Dr. Anand Teltumbde

Dr. Anand Teltumbde mounted scathing attack on the so called Marxists in Chandigarh Conference

We the members of the Republican Panthers from Maharashtra who were present in the Chandigarh conference are deeply pained to see the attribution of Anti-Ambedkar canard to Dr Anand Teltumbde in the Hastkshep blog and Bigul, the organ of the organizers’ outfit. We feel that ignoring his spirited attack on the orthodox Marxists of their ilk and projecting him as anti-Ambedkar with stray sentences sans context is a deceitful action to malign his image not only among dalits but the radical communists.   

They have conveniently ignored the scathing attack Dr Teltumbde mounted on the orthodox position the conference organizers had taken in their approach paper. The approach paper, leaving apart the usual stuff, was completely disdainful of the entire struggle of the lower castes, particularly dalits, and more so of Babasaheb Ambedkar. Dr Teltumbde, who had declined their invitation initially because of his busy schedule, had accepted to come for a short time from Jalandhar, where he was invited as a chief guest in the foundation day programme of Samata Sainik Dal by none other than the respected senior Ambedkarite leader Mr L R Baley. He reached late in the evening of 13th and was expected to make a special speech in the conference. The next day, when he was called upon to make a speech he instead targeted the distortions indulged in the approach paper. He said that there was nothing new in the approach paper and rather the reiteration of the old orthodox position which he thought most Indian Marxists were apologetic about. For the paucity of time he just focused on the reference in the approach paper to him and explained how each and every word was a distortion. Since his opinions on the subject were known to the entire country, this distortion, he alleged was willful and deliberate and smacked of deep casteist prejudice. He said that firstly distorting the statement of a person and then celebrating its refutation was no Marxist method.

The approach paper had taken an exception to his statement in the introduction he had written to the Annihilation of Caste published by the Students for Resistance in JNU, of course after distorting it, that he treated Ambedkar’s Annihilation of caste to be as important as Marx’s Communist Manifesto. Fortunately, Asit Das, the renowned civil rights activist had just before read out the actual statement, which was “What the Communist Manifesto is to the capitalist world Annihilation of Caste is to the caste India”, which itself has exposed the lie of the organizers. Dr Teltumbde explained how it smacked of the casteist prejudice of the organizers against Ambedkar and dalits. In course of his explanation he said that Babasaheb Ambedkar did not claim to have given any lasting theory of society beyond the expression of his conception of an ideal society. He basically followed progressive pragmatism inspired by his professor in Columbia, John Dewey, which relied on any theoretical postulate being tested in practice so as to make the latter enlightened. It intrinsically accepted failures in its methodology. Ambedkar’s greatness lay in his focus of the unique disease of the subcontinent and sincerely struggling against it. Whether he was right or wrong therefore becomes irrelevant. It is an empirical fact that Ambedkar failed in most things he had tried. Initially, he imagined that the advanced elements of the caste Hindus would come forward to undertake certain reforms but soon in Mahad, he got disillusioned with them and turned towards political opportunities. He labouriously won the separate political identity for Dalits but could not use it as Gandhi’s blackmail annulled it. He won political reservations but realized that they rather served the ruling class interests and demanded their withdrawal in 1953. Interestingly, he himself could never get elected on the reserved seats even against the political pigmies. Other reservations (jobs and education) operated over 60 years could barely uplift 10 percent of dalits; the balance 90 percent of Dalits being where they were in relation to others. He promoted higher education among Dalits but it also did not work and had to lament that the educated Dalits had cheated him. He wrote the Constitution with great hope but had to declare that it was no good for anyone and that he was used as a hack. He embraced ‘radical’ Buddhism and imagined that he would make entire India Buddhist but Buddhism today is confined to only his community and is reduced to an additional identity. One may thus easily recount his failures. But then every great man has failed in that sense. The entire world considers that Marx has failed. This failure is far more serious because unlike Ambedkar Marx had given a ‘grand theory’. It is far more serious than any other failures in history.

Dr Teltumbde repeatedly criticized the organizers that their attitude that Marx has said the last word smacked of Hindutva-vadis who consider that everything was given in Vedas. He explained that in the IIT where he currently teaches, such things are convincingly spoken that entire science and technology was born only in India and all others had stolen it from here. He compared the entire discourse of the organizers with it and cautioned that it cannot be taken as Marxist. He said that trashing the entire non-Marxist struggles only showed their casteist attitude. Ambedkar was no Marxist. He had serious reservations about Marxism. But still he was not disrespectful about it notwithstanding his casual remarks that it only considered material wellbeing and ignored the spiritual aspects of human life. He always used Marxism as a benchmark to assess his own decisions as clearly revealed by his last lecture in Kathmandu “Buddha or Karl Marx”. Like many people of his times, including many self-appointed Marxists, his conception of Marxism was superficial and today we may not consider it as valid. But is it relevant in evaluating his contributions, he asked. He emphasized that the contribution of Ambedkar not only to dalit emancipation but to the democratization of Indian society is greater than that of all Marxists together.  

He said that his convictions have been Marxist since early childhood but he still would be scared to call himself Marxist because of such orthodox, dogmatic and brahmanic attitude of the Marxists. He explained that his Marxism is based on its core tenet of dialectical materialism. Rest everything being derivative is subject to review in light of historical experience, notwithstanding whether it is attempted by Marx, Engels, Lenin or anybody else. He cautioned that the world has changed beyond recognition since the days of Marx and Engels. He posed some problematics in terms of advent of modern technologies like information technology, bio technologies, nano technologies, etc.; burgeoning middle classes and said that he has a long list of such things that might prompt rethink of Marxism. But the orthodox Marxists would never acknowledge it. It was this ‘enthusiastic’ attitude of the Marxists that Marx himself had to declare that he was not Marxist. He expressed his pain that the organizers had pushed him to say such bitter things about Marx and Marxism, which he held so dear to him. He went beyond and stated that lately he came to think of these ‘isms’ also as identities. Like any other identities they only divide people and weaken their revolutionary potential.

He accused the early communists of making Marxism into a dogma with their brahmanic attitude and committing the biggest historical sin in borrowing the western moulds for class analysis of India. Had they even internalized Lenin’s definition of class, castes as the life world of people in the subcontinent could not have been excluded from the conception of classes. They had advanced tools of Marxism to dissect the concrete reality of India but they reduced them into a simplistic metaphor of base and superstructure. What they did belonged to the ‘base’ and others’ to the unimportant superstructure. It is this way they kept ridiculing Ambedkar, who had tended to befriend them in 1930s. If they had followed Marxism, castes could have been embodied into classes making anti-caste struggle as an integral part of the class struggle. But because of their brahmanic folly, castes got left out of their analysis, leaving behind the idiotic duality of class and caste. After his spirited criticism of the position of the organizers and defence of the anti-caste struggles, some of the representatives of the latter made longish speeches in a tone of refuting him. When he was called upon to speak after them, he simply said that all that they did was indulging again in distortion. Trashing their lengthy speeches, he said that since he never said things that were labouriously refuted, there was no need for him to offer rejoinder. He rather accepted their philosophical elaboration of John Dewey, etc.

He repeated what he has been saying for many years that there is no revolution in India without participation of Dalits and there is no emancipation of Dalits without revolution. The approach paper purporting to picture reality as they see only helps alienating dalits further. He cautioned that this attitude has brought the things to such a fore that dalits can easily join any reactionary camp but would consider the communists as their biggest enemy. Although this unfortunate attitude is hardened by many a historical processes, the communists cannot be absolved of their role. Many dalit youth of late have begun to be attracted towards communists; thanks to the degeneration of the dalit movement, but such attitudes as in the approach paper will surely disturb and re-alienate them. He expressed his lament using Marx’s word that the approach paper had just tried to present reality; his point was to change it.

This is the ruthful gist of what Dr Teltumbde spoke there. To pick up stray sentences ignoring such a thick context is a dishonest way unbecoming of any Marxist.
-Veera Sathidar. Raju Kadam. Sharad Gaikwad. Sweta Birla. Sumedh Jadhav.

अथ मार्शा-स्टीफन प्रेमकथा: शुभम श्री की कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/19/2013 11:16:00 PM

शुभम श्री की नई कविता. शुभम फिलहाल जेएनयू से हिंदी साहित्य का अध्ययन कर रही हैं. अपने समय और समाज को लेकर सजग, चिंतित और सचेत युवा और संभावनाशील लेखकों/कवियों में एक नाम शुभम का भी है.

अथ मार्शा-स्टीफन प्रेमकथा


वर्षों गुलमोहर तोड़ता रहा स्टीफन
रक्ताभ शिखाओं पर कदमताल करता
प्रार्थना करती रही मार्शा जोड़ा फूल की
डलिया भर गुलमोहर थे
कहां था उसका जोड़ा फूल ?
पर उस बरस जो गुलमोहर फूला
जगा स्टीफन का कवि हृदय
गालों पर खिले गुलमोहर
हथेली में कुम्हलाया जोड़ा फूल
मार्शा ने वसंत का रूप धरा
थरथराने लगी हवाएं
कांपने लगा स्टीफन
...
नाचते नाचते ताल टूट जाती है
बीड़ी में भी राख ही राख
रांची जाएगी बस !
उसे ढोल उठाने भी नहीं ले जाएगा कोई
भार से झुके शरीफों का रस टपकता है
कोए तालू से चिपकते हैं
मिठास नहीं रुचती
कच्चे अमरूद की खोज में भटक रहा है स्टीफन
...
कास का जंगल रांची नहीं जाता
जाती है बस
टका लगता है
इसू को अढ़हुल गछना सफल हुआ
उन्हें सामान ढोने वाला चाहिए !
...
बस की सीट गुद गुद करती है
नशा लगता है, नींद भी
नहीं, मार्शा ही बैठेगी सीट पर
स्टीफन खड़ा रहेगा
रह रहकर महुआ किलकता है
बेहोशी टूटती नहीं
खिड़की के पास मार्शा
उसके बगल में स्टीफन
खड़ा पसिंजर देह पर लदता है न इसलिए
उल्टी करने में भी दिक्कत नहीं होगी
मार्शा का मन घूमेगा तो
वो जेब में इमली का बिया रख लेगा
नहीं नहीं,
ये वाला सपना नहीं
वही उल्टी करेगा खिड़की से
मार्शा की देह से सटकर
तब भी पीठ नहीं सहलाएगी ?
उंह, सपने में भी लाज लगती है
...
सरदार कुड़कुड़ाता है
छूटते ही हंसी-ठट्ठा
नंबरी छिनाल है सब
मार्शा को रह रहकर पेट में करेंट लगता है
झालमुढ़ी खाया नहीं जाता
स्टीफन ठोंगा ले लेता है
इतनी मिर्ची में ही बस !
चः चः
बस निश्चल खड़ी है
स्टीफन का दिल दहलता है
मार्शा की आंख
...
लेडिस भीतर
जेंस छत पर
यह कैसा नियम ?
स्ठीफन जेंस है कि लेडिस
मार्शा दुविधा में है
सरदार ही जाने
...
ढोल कस कर पकड़ने पर भी डर लगता है
जरकिंग से पेट दुखाता है
लगता है ढोल समेट खड्डे में गिर पड़ेगा
छत तप रही है
स्टीफन के पिघलते हुए हृदय में
सीट पर बैठने की इच्छा कसकती है
पहले धीरे धीरे, फिर तेज
...
अनजान रास्तों पर
सिर्फ पेड़ पहचान में आते हैं
आदमी एक भी नहीं
ठसाठस भरी बस में
स्टूल पर मार्शा नहीं
घर नजर आता है स्टीफन को
ताड़ के पंखे की फर-फर हवा
उसके पसीने की गंध जाने कैसी तो लगती है ।
...
बस की फर्श फर बैठा हवा खाता स्टीफन
उसकी नाक पर लाली है, मार्शा के गालों पर
लड़कियों के दल का अट्टहास
मधुर है
छत की मार से
यहां का करुणा मिश्रित उपहास
...
यह तो किसी स्वप्न में नहीं देखा था
कि हतदर्प योद्धा की तरह यात्रा करनी होगी
माथा घूमता है, जी मिचलाता है
यह तो मार्शा को होना था
उसे क्यों हुआ
जेंस बनने में कहां चूक हुई ?
मन होता है मार्शा के हाथ से पंखा फेंक दे
और
फूट फूट कर रोए उसकी गोद में
सरदार ने बहुत कस कर माराSS
...
उसने गुलमोहर का सबसे सुंदर फूल तोड़ा
सबसे सुरीली बांसुरी बजाई
सबसे अच्छा शिकार किया
सबसे तेज नाचा
फिर भी वो चली गई
भाई-बहनों का पेट मोरपंख से नहीं भरता
स्टीफन नहीं जान पाया
मार्शा जानती थी
...
बेर डूबी
कोरे घड़े की तरह डूब गया उसका दिल
छाती में दर्द होता है
आंखों में चुनचुनाहट
जाने हवा-बयार लगी कि मंतर का बान
देह में ताप है कि मन में
पंखा होंकने से मन और घूमता है
जीवन की सारी उपलब्धियां व्यर्थ हैं
उसकी जीत, उसका मान, उसकी कला
एक थरिया भात तक नहीं कमा सका
हर बार हारा है स्टीफन
...
लड़कियां चली गईं
जंगल उदास हुए, घर बंजर
एकाएक टूटा आकर्षण का तिलिस्म
दिनरात लुकाछिपी खेलता वसंत
सूखे पत्तों सा दरक गया
पहले बच्चों की चहचहाहट को पाला लगा
फिर
चेहरों पर
गरमी की अंतहीन दोपहर पसर गई
...
मन नहीं लगता
चांद का निकलना
रात की सूचना है
और सूर्योदय
मैदान जाने की वेला भर
जंगलों को नमी
और
स्टीफन के कवि-हृदय को नौकरी की तलाश है !
...
मार्शा के घर पर खपड़े लगे
लिपे हुए आंगन में
उसकी हथेलियों की छाप धुंधला गई
चिकनी दीवारों से मिट गए सदा-सुहागिन के फूल
अब वहां
सीतको साबुन का विज्ञापन है
...
स्टीफन खपड़े तोड़ देना चाहता है
चांदी की हंसुली भी
जो मार्शा की मां ने पहना है
लेकिन हर बार
कटोरे में माड़-भात खाता टुडू दिख जाता है
हड्डियों पर मांस चढ़ रहा है
स्टीफन पर बुखार
...
एक एक कर लौट रही हैं लड़कियां
माएं जड़ हैं, पिता मौन
पैसे मुर्दा पड़े हैं
सुरमी गिन रही है
सरदार ने अठारह बार
ईंट भट्टे वाले ने तीन महीने
दिल्ली में साल भर
मृत्युशोक में डूबे हैं घर, जंगल, पहाड़
...
हर पर्व में लौटता है स्टीफन
समंदर पार से पंछी लौटते है
रेल, बस, मौसम, फूल, हवा, बरसात
सब लौटते हैं
सिवाय मार्शा के
...
कोई नहीं जानता
सुना है उधर भाड़े पर बच्चा पैदा करने का काम चलता है
बिदेस सप्लाई भी
कौन जाने सादी-ब्याह ही...
कोई नहीं जानता
मार्शा का पता
स्टीफन का भाग्य।

मोहम्मद अफजल गुरु की रूह को सुकून मिले

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/16/2013 09:37:00 PM


भारत के फासीवादी राज्य द्वारा मो. अफजल गुरु की कानूनी हत्या के बाद आई प्रतिक्रियाओं में सबसे ज्यादा पढ़ी गई प्रतिक्रियाएं अरुंधति रॉय की हैं. उन्होंने लगातार इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया है. और सबसे मजबूत दलीलों के साथ दर्ज कराया है. 2006 में संसद पर हमले के मामले के विभिन्न पहलुओं पर लेखों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ था- 13 दिसंबर: ए रीडर. उसमें एक लेख और उसकी प्रस्तावना अरुंधति ने ही लिखी थी. यह संग्रह अपने नए रूप में और कुछ नई सामग्री के रूप में फिर से प्रकाशित हो रहा है. इसके लिए अरुंधति ने एक नई प्रस्तावना लिखी है. इसका अनुवाद जितेन्द्र कुमार ने किया है, जिसे हाशिया पर संपादित करके पोस्ट किया जा रहा है.

अफजल गुरु की याद में

नई दिल्ली के जेल में ग्यारह साल के बाद, जिसमें से ज्यादातर वक्त एकांत में कालकोठरी में मृत्यु दंड की प्रतीक्षा में बीता था, फरवरी की एक साफ सुथरी सुबह, अफजल गुरु को फांसी पर लटका दिया गया। भारत के एक पूर्व सॉलीसीटर जेनरल व सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता ने इसे हड़बड़ी में छुपाकर लिया गया फैसला बताया है; फांसी दिए जाने का यह ऐसा फैसला है, जिसकी वैधता पर गंभीर प्रश्न चिह्न लग गए हैं।

जिस व्यक्ति को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तीन उम्र कैद और दो मृत्यु दंड की सजा तजवीज की हो, और जिसे लोकतांत्रिक सरकार ने फांसी पर लटकाया हो, उस प्रक्रिया पर वैधानिक प्रश्न कैसे लगाया जा सकता है? क्योंकि फांसी पर लटकाए जाने के सिर्फ दस महीने पहले, अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट में वैसे कैदियों की याचिका पर कई बैठकों में सुनवाई पूरी हुई थी जिनमें कैदियों को बहुत ज्यादा समय तक जेल में रखा गया है। उन कई मुकदमों में एक मुकदमा अफजल गुरु का भी था जिसमें सुप्रीम कोर्ट के बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। लेकिन अफजल गुरु को फैसला सुनाए जाने से पहले ही फांसी दे दी गई है।

सरकार ने अफजल के परिवार को उनका शरीर सौंपने से मना कर दिया है। उनका अंतिम संस्कार किए बगैर, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के संस्थापक मकबूल भट्ट की कब्र की बगल में दफना दिया गया, जो कश्मीर की आजादी के सबसे बड़े प्रतीक थे। और इस तरह तिहाड़ जेल के चहारदीवारी के भीतर ही दूसरे कश्मीरी की लाश अंतिम रस्म अदा किए जाने की प्रतीक्षा कर रही है। उधर कश्मीर में मजार-ए-शोहदा के कब्रिस्तान में एक कब्र लाश के इंतजार में खाली पड़ी है। जो लोग कश्मीर को जानते-समझते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे कल्पित, भूमिगत आदमकद कोटरों ने अतीत में कितने चरमपंथी हमलों को जन्म दिया है।

हिन्दुस्तान में, ‘कानून का राज कायम होने’ का ढ़िंढोरा पीटे जाने का जश्न थम गया है, सड़कों और गलियों में गुंडों द्वारा फांसी पर चढ़ाए जाने की खुशी में मिठाई बंटनी बंद हो गयी है (आप कितनी देर बिना चाय ब्रेक के मुर्दे के पोस्टर को फूंक सकते हैं?), कुछ लोगों को फांसी की सजा दिए जाने पर आपत्ति जताने और अफजल गुरु के मामले में निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) हुई या नहीं, कहने की छूट दे दी गई। वह बेहतर और सामयिक भी था, एक बार फिर हमने ज़मीर से लबालब जनतंत्र देखा।
बस उन बहसों को नहीं देख सके जो छह साल पहले ही चार साल देर से शुरू हुई थीं। सबसे पहले यह किताब 2006 के दिसबंर में छपी थी जिसके पहले भाग के लेखों में विस्तार से सुनवाई के बारे में चर्चा हुई है। इसमें कानूनी विफलता, ट्रायल कोर्ट में उन्हें वकील नहीं मिलने की बात, कैसे सूत्रों के तह तक नहीं जाया गया और उस समय मीडिया ने कितनी घातक भूमिका निभायी।

इस नए संस्करण के दूसरे खंड में फांसी दिए जाने के बाद लिखे गए लेखों और विश्लेषणों का एक संकलन है। पहले संस्करण के प्राक्कथन में कहा गया है, 'इसलिए इस पुस्तक से एक आशा जगती है' जबकि यह संस्करण गुस्से में प्रस्तुत किया गया है।

इस प्रतिहिंसक समय में, अधीरता से कोई भी यह पूछ सकता है: विवरणों और कानूनी बारीकियों को छोड़िए। क्या वे दोषी थे या वे दोषी नहीं थे? क्या भारत सरकार ने एक निर्दोष व्यक्ति को फांसी पर लटका दिया है?

जो भी व्यक्ति इस किताब को पढ़ने का कष्ट करेगा, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि अफजल गुरु के ऊपर जो आरोप लगाए गए थे, उनके लिए वे दोषी साबित नहीं हुए थे- भारतीय संसद पर हमला रचने के षड्यंत्रकारी या फिर जिसे फैशन में 'भारतीय लोकतंत्र पर हमला' भी कहा जाता है, (जिन्हें मीडिया लगातार गलत तरीके से अपराधी ठहराता रहा है जबकि अभियोजन पक्ष द्वारा उन पर हमला करने का आरोप नहीं लगाया गया और न ही उन्हें किसी का हत्यारा कहा गया। उनके ऊपर हमलावरों का सहयोगी होने का आरोप था)। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध के लिए उन्हें दोषी पाया और उन्हें फांसी की सजा दी। अपने उस विवादास्पद फैसले में, जिसमें ‘समाज के सामूहिक विवेक को तुष्ट करने के लिए’ किसी को फांसी पर लटका दिए जाने की बात कही गई है।  उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था, केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य थे।

आतंकवाद विशेषज्ञ और अन्य विश्लेषक गौरव के साथ बता रहे हैं कि ऐसे मामलों में 'पूरा सच' हमेशा ही मायावी होता है। संसद पर हमले के मामले में तो बिल्कुल  यही दिखता है। इसमें हम 'सच' तक नहीं पहुंच पाए हैं। तार्किक रूप से, न्यायिक सिद्धांत के अनुसार 'उचित संदेह' की बात उठनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक आदमी को जिसका अपराध महज ‘उचित संदेह से परे’ स्थापित नहीं हो पाया, फांसी पर लटका दिया गया।

चलिए हम मान लेते हैं कि भारतीय संसद पर हमला हमारे लोकतंत्र पर हमला है। तो क्या 1983 में तीन हजार ‘अवैध’ बांग्लादेशियों का नेली जनसंहार भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था? या 1984 में दिल्ली की सड़कों पर तीन हजार से अधिक सिखों का जनसंहार क्या था? 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था क्या? 1993 में मुंबई में शिवसैनिकों के नेतृत्व में हजारों मुसलमानों की हत्या भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था? गुजरात में 2002 में हुए हजारों मुसलमानों जनसंहार क्या था? वहां प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य, दोनों प्रकार के सबूत हैं जिसमें बड़े पैमाने हुए जनसंहार में हमारे प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के तार जुड़े हैं। लेकिन ग्यारह साल में क्या हमने कभी इसकी कल्पना तक की है कि उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है, फांसी पर चढ़ाने की बात को तो छोड़ ही दीजिए। खैर छोड़िए इसे। इसके विपरीत, उनमें से एक को- जो कभी किसी सार्वजनिक पद पर नहीं रहे- और जिनके मरने के बाद पूरे मुंबई को बंधक बना दिया था, उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। जबकि दूसरा व्यक्ति अगले आम चुनाव में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है।

इस सर्द, बुदजिली भरे रास्ते में, खाली, अतिरंजित इशारों की नकली प्रक्रिया के तहत भारतीय मार्का  फासीवाद हमारे उपर आ खड़ा हुआ है।

श्रीनगर के मजार-ए-शोहदा में, अफजल की समाधि के पत्थर पर (जिसे पुलिस ने हटा दिया था  और बाद में जनता के आक्रोश की वजह से फिर से रखने के लिए बाध्य हुई) लिखा है:

‘देश का शहीद, शहीद मोहम्मद अफजल, शहादत की तिथि 9 फरवरी 2013, शनिवार। इनका नश्वर शरीर भारत सरकार की हिरासत में है और अपने वतन वापसी का इंतजार कर रहा है।’

हम क्या कर रहे हैं, यह जानते हुए भी अफजल गुरु का एक पारंपरिक योद्धा के रूप में वर्णन करना काफी कठिन होगा। उनकी शहादत कश्मीरी युवकों के अनुभवों से आती है जिसके गवाह दसियों हजार साधारण युवा कश्मीरी रहे हैं। उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है, उन्हें जलाया जाता है, पीटा जाता है, बिजली के झटके दिए जाते हैं , ब्लैकमेल किया जाता है और अंत में मार दिया जाता है।( उन्हें क्या-क्या यातनाएं दी गई उसका विवरण आप परिशिष्ट तीन में पढ़ सकते हैं)। जब अफजल गुरु को अति गोपनीय तरीके से फांसी पर लटका दिया गया, उन्हें फांसी पर लटकाए जाने की प्रक्रिया को बार-बार प्रहसन के रूप में पर्दे पर दिखाया गया। जब पर्दा नीचे सरका और रोशनी आयी तो दर्शकों ने उस प्रहसन की तारीफ की। समीक्षाएँ मिश्रित थी  लेकिन जो कृत्य किया गया था, वह सचमुच ही बहुत घटिया था।

'पूर्ण' सच यह है कि अब अफजल गुरु मर चुके हैं और अब शायद हम कभी नहीं जान पाएंगे कि भारतीय संसद पर हमला किसने किया था। भारतीय जनता पार्टी से उनके भयानक चुनावी नारे को छीन लिया गया है: 'देश अभी शर्मिंदा है, अफजल अभी भी जिंदा है' । अब भाजपा को एक नया नारा तलाशना होगा।

गिरफ्तारी से बहुत पहले अफजल गुरु एक इंसान के रूप में पूरी तरह टूट चुके थे। अब जब कि वे मर चुके हैं, उनकी लाश पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। लोगों के गुस्से को भड़काया जा रहा है। कुछ समय के बाद हमें उनकी चिट्ठियां मिलेगीं, जो उन्होंने कभी नहीं लिखीं, कोई किताब मिलेगी, जो उन्होंने नहीं लिखी । साथ ही, कुछ ऐसी बातें भी सुनने को मिलेंगी जो उन्होंने कभी नहीं कहीं। ये बदसूरत खेल बदस्तूर जारी रहेगा लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलेगा। क्योंकि जिस तरह वे जीते थे और जिस तरह वे मरे, वह कश्मीरी यादों में लोकप्रिय रहेगा, एक नायक के रूप में, मकबूल भट्ट के कंधे से कंधा मिलाकर और उनकी मिली-जुली आभा से हिल-मिल कर।

हम बाकी लोगों के लिए, उनकी कहानी तो बस ये है कि भारतीय लोकतंत्र पर वास्तविक हमला कश्मीर में सैनिकों के बल पर भारतीय साम्राज्य है।

मोहम्मद अफजल गुरु की रूह को सुकून मिले।

राज्‍य हिंसा का एक और नमूना – धुले: एक और जांच रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/15/2013 09:40:00 PM

धुले: 'दंगा' नहीं, राज्य द्वारा मुसलमानों का एक और कत्लेआम (एक डॉक्यूमेंटरी)




गुजरात और मध्यप्रदेश की सीमा से लगे हुए महाराष्ट्र के धुले जिले में 6 जनवरी को होटल में पैसे के लेन-देन के आपसी विवाद को लेकर शुरू हुआ झगड़ा जल्द ही हिन्दू एवं मुस्लिम समुदाय के बीच पत्थर बाजी में तब्दील हो गया। इस हिंसा की परिणति पुलिस की गोली से मारे गए छः मुस्लिम नौजवानों (1) इमरान अली कमर अली (25) (2) असीम शेख नासिर  (21) (3) सउद अहमद रईस पटेल (18) (4) हाफिज मो. आसीफ अब्दुल हलीम (22) (5) रिजवान हसन शाह (24) (6) युनुस अब्बास शाह (20) के रूप में हुई। लगभग 55 मुस्लिम नौजवानों, जिनमें से लगभग 40कोगोली लगी, पुलिस की हिंसा के शिकार हुए। 58ऐसे लोग हैं जिनके घर,वाहन, दुकान, ठेलागाड़ी को क्षतिग्रस्त किया गया। धुले में हुई इस साम्प्रदायिक हिंसा की खासियत यह है कि न तो पुलिस और न ही कोई साम्प्रदायिक संगठन झूठ बोल सकता है, क्योंकि धुले में लगभग 3 बजे के आसपास जब विवाद ने पत्थरबाजी का रूप ले लिया तब उसके बाद के ज्यादातर फुटेज वीडियोक्लिपिंग अथवा फोटोग्राफ के रूप में मौजूद हैं। धुले में हुई इस हिंसा की हकीकत जानने के लिए वर्धा के हिंदी विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापक, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पुणे के स्‍वतंत्र पत्रकार ने 19-20 जनवरी को धुले जिले का दौरा किया।

सांप्रदायिक हिंसा की पृष्‍ठभूमि

शहर के माधवपुरा में स्थित एक होटल जिसके मालिक किशोर वाघ हैंजो किराष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं इनकी भाभी NCP की नगर सेविका (Corporator) हैं, से मुस्लिम समाज के एक युवक का 20 अथवा 30 रूपये को लेकर कुछ विवाद हुआ। जिसपर होटल के लोगों ने उस मुस्लिम युवक को मारा-पीटा जिसके चलते युवक पास में ही स्थित मच्‍छी बाजार पुलिस चौकी अपनी शिकायत दर्ज कराने गया। पुलिस के द्वारा इस पूरे मामले को अगंभीरता से लेने के साथ ही उस युवक को आजादपुर के पुलिस थाने में जाने को कहा गया। पुलिस से न्‍याय न मिलने के बाद नौजवान अपने कुछ मुस्लिम मित्रों के साथ फिर से होटल में गया। जिसके कुछ देर बाद दोनों समुदायों में पत्‍थरबाजी शुरू हो गई। जाँच दल को स्‍थानीय लोगों ने बताया कि पुलिस ने आते ही बिना देर किए मुस्लिम समुदाय पर फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस के द्वारा ऐसा कोई भी प्रयास नहीं किया गया जिससे दोनों तरफ की भीड़ को हटाया जा सके। पुलिस ने भीड़ को चेतावनी देना तथा सार्वजनिक रूप से संबोधित करना भी उचित नहीं समझा। लोगों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज एवं आंसू गैस का भी सहारा नहीं लिया गया। पुलिस के द्वारा की गई इस कार्रवाई में मुस्लिम समुदाय के अंदर आक्रोश और तीखा हो गया एवं पुलिस द्वारा की गई फायरिंग लगभग 6.30 बजे तक चलती रही। पुलिस के द्वारा की गई फायरिंग का मकसद भी भीड़ को तितर-बितर करना नहीं था। बल्कि ज्‍यादातर फायरिंग कमर के ऊपरी हिस्‍से में ही की गई। पुलिस के द्वारा यह तर्क भी दिया गया कि फायरिंग इसलिये की गई कि मुस्लिम समुदाय की तरफ से हमला ‘एसिड बमों’से हो रहा था जिसके चलते भारी संख्‍या में पुलिस के जवान घायल हुए। लेकिन यह पूरी तरह से पुलिस के द्वारा प्रचारित किया जा रहा झूठ है। जिसकी पुष्टि वीडियों क्लिपिंग से भी होती है।सरकारी हास्पिटल के जो रिकार्ड हैं उसमें भी यह तथ्‍य देखने को आया कि पुलिस के जवानों को जो चोटें आयी वो बहुत कम हैं एवं प्राथमिक उपचार (first aid) के बाद अधिकांश जवानों को छुट्टी दे दी गई।


इस सांप्रदायिक हिंसा में लगभग 50 लोग पुलिस की फायरिंग से तथा 10 लोग पुलिस की मार-पीट से घायल हुए। लेकिन कोई भी घायल व्‍यक्ति सरकारी हास्पिटल में अपना इलाज कराने के लिए नहीं गया। जांच दल को स्‍थानीय लोगों ने बताया 2008 में जब यहाँ दंगा हुआ था, तब मुस्लिम समाज के लोगों ने सरकारी हास्पिटल में इलाज के लिये जाने की कोशिश की थी। उस समय उन पर हिंदू सांप्रदायिक संगठनों के गुंडों ने हमला किया था। हास्पिटल के मुस्लिम कर्मचारियों को भी बुरी तरह पीटा गया था। अपने इसी कटु अनुभव के चलते इस बार की सांप्रदायिक हिंसा से घायल हुए मुस्लिम समाज के लोग अपने इलाज के लिये प्राइवेट हास्पिटल में गए। जांच दल को पीडि़त व्‍यक्तियों ने यह भी बताया कि किसी भी घायल व्‍यक्ति को पुलिस के द्वारा अस्‍पताल में भर्ती नहीं कराया गया। सभी पीडि़त व्‍यक्तियों को परिवार या उनके अपने समाज के लोगों के द्वारा ही भर्ती कराया गया। मारे गए व्‍यक्ति के घर के सदस्‍य एवं घायल व्‍यक्ति डर के चलते F.I.R. तक दर्ज कराने के लिये पुलिस थाने नहीं गए, क्‍योंकि उन्‍हें डर था कि उनको ही पुलिस के द्वारा दंगाई घोषित कर दिया जायेगा।

30 से ऊपर मुस्लिम घरों को लूटा एवं जलाया गया। हिंदू समुदाय के भी लगभग छ: घर जलाये गए। मुस्लिम यह बताने के लिये तैयार थे कि किन-किन लोगों (हिंदुओं) ने घरों को जलाया एवं लूट-पाट की। जांच दल को तस्‍लीम बी यूसूफ और मोहम्‍मद युसफ ने बताया कि शिवम टेलर के मालिक और मोहन राखा ने उनके घर को जलाया। लेकिन आज भी वे रोज अपनी दुकान खोलते हैं और पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है।”

मुस्लिम घरों को लूटने, जलाने एवं तहस-नहस करने का काम हिंदू भीड़ के द्वारा पुलिस की आंखों के सामने हो रहा था। जांच दल को जो फोटोग्राफ और क्लिपिंग मिली है। उनसे भी साफ है कि मुस्लिम समुदाय के घर पुलिस के आने के बाद ही जलाये गए हैं। एक क्लिपिंग में बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट रूप से दिख रहा है कि पुलिस के जवान खुद ही कर्फ्यू के दरम्‍यान लूट-पाट एवं वाहनों को तोड़ रहे हैं।

जांचदल को स्‍थानीय लोगों ने यह भी बताया कि घटना स्‍थल और जिन –जिन जगहों पर फायरिंग हुई उसको बिना पंचनामा किए अगले ही दिन पानी से साफ कर दिया गया। पुलिस एवं स्‍थानीय प्रशासन लोगों के आर्थिक नुकसान को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहा है। पंचनामें में नुकसान हुए फ्रिज की कीमत 700/- रूपये तथा टी.वी. की कीमत 100/- रूपये दर्ज की गई है।

सांप्रदायिक हिंसा का मुस्लिम समाज पर प्रभाव

2008 के दंगें के बाद से ही मुस्लिम समाज काफी दहशत में है और अपने में ही काफी सीमित हुआ है। 2008 के पहले तक जो मुस्लिम हिंदू बस्तियों में रहते थे आज वे मुस्लिम बस्तियों में ही दहशत एवं असुरक्षा के चलते रहने को मजबूर हैं।

इस बार की सांप्रदायिक हिंसा के बाद जहां-जहां से मुस्लिम बस्तियां शुरू होती हैं वहां पर पुलिस के द्वारा बैरिकेट तथा अतिरिक्‍त पुलिस बल की तैनाती की गई थी। मानो सांप्रदायिक हिंसा के लिए मुस्लिम समाज ही जिम्‍मेदार हो। पीडि़तों को ज्‍यादातर राहत उनके रिश्‍तेदारों, कुछ NGO तथा इस्‍लामिक संगठनों के द्वारा ही पहुंचायी जा रही है।

मुस्लिम समुदाय के लोगों का मानना है कि पुलिस ने जानबूझकर एवं चुनकर मुस्लिमों पर ही फायरिंग की। जबकि पत्‍थरबाजी दोनों तरफ से हो रही थी। 2008 के दंगे तथा 6 जनवरी की हालिया घटना के बाद मुस्लिम समाज के सभी लोगों का यह मानना है कि दंगे के समय खास तौर पर पुलिस प्रोफेशनल तरीके से काम न करके हिन्‍दुओं की तरह व्‍यवहार करती है। जांच दल को पीडि़तों ने बताया कि पिछले कुछ समय से पुलिस इस मौ‍के की तलाश में थी। खासकर 2008 के दंगे के बाद से। तब से ही पुलिस सबक सिखाने की धमकियां दे रही थी।

धुले जिले की कुल आबादी का 25% मुस्लिम समुदाय से आता है। ज्‍यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग पावरलूम इण्‍डस्‍ट्री, गैरेज में काम, ठेला चलाना, मजदूरी तथा छोटी-छोटी दुकान चलाकर अपनी जीविका चलाते हैं। कुल मुस्लिम आबादी का 95% निम्‍न मध्‍यमवर्गीय पृष्‍ठभूमि से है। धुले के मुस्लिम समाज में अंसारी तथा खानदेशी मुसलमान हैं। अंसारी ज्‍यादातर विस्‍थापित होकर उत्तरप्रदेश तथा बिहार से 19 वीं शताब्‍दी में यहां आकर बसे थे। ज्‍यादातर अंसारी मुसलमान यहां पर पावरलूम के पेशे से जुड़े है। पावरलूम का काम भी टेक्‍सटाइल मिल के बंद होने के बाद से लगातार संकट के दौर से गुजर रहा है। पावरलूम में काम करने वाला एक मुस्लिम मजदूर एक हफ्ते में लगभग 600/- से 700/- रूपये कमाता है। जितने दिन कर्फ्यू रहा, उतने दिन तक उनकी जीविका का कोई दूसरा साधन नहीं था।

सांप्रदायिक हिंसा का सबसे बुरा प्रभाव मुस्लिम महिलाओं पर पड़ा है। महिलाएं एवं लड़कियां पूरी तरह से घर के अंदर कैद कर दी गई हैं। 2008 के पहले तक लड़कियां भी बाजार जाया करती थीं। लेकिन पूर्व में हुए दंगे के बाद से उनकी पूरी जिंदगी चहरदीवारी के अंदर सिमट गई है। घर की सबसे बुर्जुग महिला ही घर से बाहर किसी आवश्‍यक काम से निकलती है। मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा पर भी इसका नकारात्‍मक प्रभाव पड़ा है और अब वे प्राथमिक शिक्षा से भी वंचित हो गई हैं। ”धुले की कुल आबादी 3.7 लाख है और यहां 7 इंजिनियरिंग, दो मेडिकल तथा सात अन्‍य कालेज हैं। जिनकी कुल क्षमता 18000 सीट की है। जबकि आबादी का 25% मुसलमान में से केवल 25% या 915 मुस्लिम छात्र उच्‍च शिक्षा को प्राप्‍त कर रहे है।” इंडियन एक्सप्रेस में जिशान शेख की रिपोर्ट- 13 जनवरी 2013

हिंदू समाज एवं सांप्रदायिक हिंसा

जांच दल के लोग जब शहर के दूसरे हिस्‍से, जहां पर सांप्रदायिक हिंसा की घटना नहीं हुई थी, के हिंदू समुदाय के लोगों से मिले और घटना के बारे में जानना चाहा कि वे लोग हालिया घटनाक्रम और मुस्लिम समुदाय के बारे में क्‍या राय रखते हैं। तो मालूम पड़ा कि अधिकांश हिंदू समुदाय अफवाहों का शिकार है तथा 2008 के दंगे के बाद से खास तौर पर हिंदू समुदाय के बीच सांप्रदायिक विचारों का प्रचार-प्रसार और तेज हुआ है।

स्थानीय लोगों के अनुसार 6 जनवरी2013 के दिन भारत और पाकिस्‍तान का तीसरा एक दिवसीय मैच था और जब पाकिस्‍तान मैच जीत रहा था तो मुसलमान पटाखे छोड़ रहे थे। लेकिन जैसे ही पाकिस्‍तान मैच हारने लगा तो मुसलमानों ने पत्‍थर बाजी शुरू कर दी जिसके चलते पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी। कुछ लोगों के अनुसार हैदराबाद के मुस्लिम नेता अकबरूद्दीन ओवासी के भाषण की वीडियों क्लिपिंग हर मुस्लिम नौजवान के मोबाईल में है और जिसके चलते मुसलमान एक जगह इकट्ठा हुए और पत्‍थरबाजी करने लगे। शिवसेना के शहर के मुखिया भूपेन्‍द्र लहामगे ने प्रशासन से कहा है कि इसका बेहद नकारात्‍मक असर धूले पर पड़ रहा है। जांच दल ने जब अकबरूद्दीन ओवासी की इन क्लिपिंग की हकीकत मुस्लिम समुदाय से जाननी चाही तो यह मालूम पड़ा कि अधिकांश लोग ओवासी के नाम से ही परिचित नहीं हैं तो वे उनकी क्लिपिंग को अपने मोबाईल में क्‍यों रखेगें।
2008 में जो दंगा धुले में हुआ था, उसके बाद बार एसोसिएशन ने मुस्लिम समुदाय के लोगों के केस को लड़ने से मना कर दिया था। (ठीक इसी तरह की घटना यू.पी में भी हुई थी जब बार एसोसिएशन ने कथित आंतकी मुसलमानों के केस को लड़ने से मना किया था। मो. शोएब एडवोकेट मुस्लिम नौजवानों का केस लड़ने के लिए तैयार हुए तो उन पर सांप्रदायिक संगठन के लोगों द्वारा हमला किया गया था।) हम देखते हैं कि वकील खुद ही जज की भूमिका में आ गए थे। सांप्रदायिक संगठनों ने सरकारी हास्पिटल के डाक्‍टरों को भी धमकी दी थी कि मुसलमानों का इलाज न करें। मेडिकल स्‍टोर ओनर्स यूनियन ने भी 2008 में ही यह फरमान जारी किया था कि मुसलमानों को दुकान से कोई भी दवा न दी जाए। इस बार की हिंसा में भी वकीलों के एक बड़े तबके ने सार्वजनिक रूप से पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई को जायज ठहराया और उनकी प्रशंसा की। सांप्रदायिक संगठनों ने शैक्षणिक संस्थाओ, मीडिया तथा अन्‍य माध्‍यमों से हिंदू समुदाय के एक बड़े हिस्‍से का सांप्रदायिकरण पिछले कुछ वर्षों में किया है। 2008 के दंगे तथा 6 जनवरी 2013 की हिंसा के बाद यह साफ है कि नागरिक समाज का एक बड़ा हिस्‍सा सांप्रदायिक हुआ है।

तथाकथित सेकुलर राजनीति

2008 के दंगे में जहां एक तरफ हिंदू रक्षा समिति, बजरंग दल, शिवसेना जैसे संगठनों की अहम भूमिका थी, वहीं दूसरी तरफ तथाकथित रूप से सेकुलर राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के स्‍थानीय नेता सक्रिय रूप से दंगे में शामिल थे। इसका फायदा भी NCP को तीन माह बाद होने वाले नगर पालिका के चुनाव में मिला था। इस बार की सांप्रदायिक हिंसा में भी हिंदू भीड़ का नेतृत्‍व किशोर वाघ व उसका बेटा कर रहा था। (पुलिस के द्वारा दर्ज की गई प्राथमिक रिपोर्ट में भी यह बात दर्ज है)। इसके अलावा NCP के जमीनी कार्यकर्ता हिंदू भीड़ में शामिल थे तथा पुलिस के सांप्रदायिक मनोबल को ये सारे लोग और बढ़ा रहे थे।
2014 में लोकसभा चुनाव के साथ-साथ महाराष्‍ट्र के विधानसभा के चुनाव भी होने हैं तथा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तथाकथित सेकुलर तथा सांप्रदायिक दोनों तरह की पार्टियों के लिए फायदेमंद ही हैं। महाराष्‍ट्र में सांप्रदायिक खेल खेलने में कांग्रेस भी NCP और अन्‍य सांप्रदायिक पार्टियों से पीछे कैसे रह सकती है।प्रदेश में कांग्रेस ने साम्‍प्रदायिक ताकतों को काउन्‍टर करने के लिए हनुमान सेना का गठन किया है। (दैनिक भास्‍कर 24 अक्टूबर, 2012”हनुमान सेना को लेकर राजनीतिक हलचल” के शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई है–“बजरंग दल के समानांतर कांग्रेस की हनुमान सेना भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। शिवसेना के साथ भाजपा के संबंधों में मिठास का पैमाना घटते जा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि हनुमान सेना को हथियार बना कर शिवसेना भाजपा को कुछ मामलों में नुकसान पहुंचा सकती है।.… बजरंग दल कार्यकर्ताओं के पाला बदलने की संभावना को देखते हुए पैनी नजर रखी जा रही है।.… दो दिन पहले पूर्व नागपुर में हनुमान सेना की घोषणा की गई। वित्‍त व ऊर्जा राज्‍यमंत्री राजेंद्र मुलक व शिवसेना के जिला प्रमुख शेखर सावरबांधे की उपस्थिति में पूर्व मंत्री सतीश चतुर्वेदी ने कहा कि कांग्रेस की हनुमान सेना जन विकास के मुद्दों पर आक्रामक भूमिका में रहेगी।…. लेकिन हनुमान सेना को लेकर कहा जा रहा है कि वह कांग्रेस के लिए ऐसा विकल्‍प बनाने के उद्देश्‍य के साथ गठित की गई है, जिसमें बजरंगियों के अलावा शिवसैनिकों का समायोजन किया जा सके।…. अब तक ये संगठन भाजपा के लिए मददगार बने हुए हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों संगठन असंतोष के दौर से गुजर रहे हैं।…. बजरंगियों की शिकायत रहती है कि उन्‍हें अनुशासन के नाम पर सक्रिय कार्य करने से रोका जा रहा है। भाजपा में पूछ-परख कम हो रही है। चर्चा है कि कुछ असंतुष्‍ट कार्यकर्ताओं ने ही मोबाइल संदेश भेजकर बजरंगदल कार्यकर्ताओं से हनुमान सेना में शामिल होने का निवेदन किया।”)

भ्रष्‍ट और सांप्रदायिक पुलिस

धुले की पुलिस भ्रष्‍टाचार के मामले में देश के दूसरे तथा महाराष्‍ट्र के अन्‍य जिलों से भी आगे है। 2 अक्‍टूबर 2012 के लोकमत में छपी खबर के मुताबिक पुलिस कर्मचारी के सरकारी आवास में 300 दारू के खोखे (पेटी) बरामद हुई जिसकी कीमत 10 लाख 84 हजार 200 रू है। यह घटना तो एक नमूना भर है। अवैध शराब, कैरोसिन, केमिकल के जो भी अवैध धंधे यहां पर बड़े पैमाने पर चलते हैं। यह सब कुछ पुलिस के संरक्षण में ही होता है। ”2008 के दंगे के बाद धुले की पुलिस ने जो चार्जशीट दायर की थी, उसमें यह दावा किया गया था कि पूरे भारत में जो आतंकवादी गतिविधियां है उसमें मुस्लिम ही मास्‍टर माइंड हैं।”- इंडियन एक्‍सप्रेस 31 जनवरी 2013

शम्सुन्निसा (65 वर्ष) ने जांच दल को बताया कि अगले दिन कर्फ्यू था और पुलिस के लोग तोड़फोड़ एवं लूटपाट कर रहे थे तो महिलाओं ने सामूहिक रूप से अपने-अपने घरों से निकलकर पुलिसवालों को रोकने की कोशिश की। इस पर पुलिस ने कुछ महिला पुलिस कर्मियों, जो वर्दी में नहीं थी, से कहकर शम्‍सुन निशा की पिटाई करायी जिसके चलते उनका हाथ टूट गया तथा कई जगह जख्‍म भी आए।पुलिस के अधिकारी फायरिंग को जायज ठहराते हुए यह तर्क दे रहे हैं कि यदि फायरिंग न की गई होती तो फिर से 2008 वाला मंजर होता और दंगा पूरे शहर में फैल गया होता।

दिल्‍ली में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के द्वारा सिविल सेवाओं के मार्गदर्शन के लिए संचालित ‘संकल्‍प’ नाम की संस्‍था, निम्‍न मध्‍यवर्गीय पृष्‍ठभूमि से आने वाले छात्रों को लगभग नि:शुल्‍क हॉस्‍टल एवं कोचिंग की सुविधा उपलब्‍ध कराती है और यहां से प्रतिवर्ष ठीक-ठाक संख्‍या में भारतीय प्राशासनिक सेवाओं में छात्रों का चयन होता है। यह जरूरी नहीं है कि ”संकल्‍प’ से सुविधाएं लेने वाले सभी छात्र R.S.S. की विचारधारा को मानते हों। लेकिन जब उनका चयन हो जाता है तो निश्चित रूप से वे किसी भी पद पर रहें परन्‍तु R.S.S. के प्रति एक नरम रूख अवश्‍य रखते हैं।

ठीक इसी तर्ज पर महाराष्‍ट्र में भी शिवसेना के द्वारा पुलिस में भर्ती के लिए होने वाली परीक्षा के लिए ‘प्री-ट्रेनिंग कैम्‍प’ आयोजित किए जाते हैं। इन ट्रेनिंग कैम्‍प में शामिल होने वाले प्रतिभागी निश्‍चय रूप से शिवसेना जैसी पार्टियों के प्रति कृतज्ञ रहते हैं एवं ट्रेनिंग कैम्‍प के बहाने ही छात्रों के अंदरसांप्रदायिक जहर भी भरा जाता है। सांप्रदायिक हिंसा के समय में खासतौर पर पुलिस के अंदर की सांप्रदायिक चेतना जीवित हो जाती है।

धुले के ‘लोकमत’ मराठी समाचार पत्र के 26 अक्‍टूबर 2012 के अंक में विजय दशमी के अवसर पर तस्‍वीर के साथ ‘कैप्‍शन’ में एक खबर प्रकाशित हुई है कि एक तरफ आरएसएस के लोग विजय दशमी के दिन शस्‍त्रों की पूजा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ धुले के पुलिस कार्यालय में पुलिस के सभी वरिष्‍ठ अधिकारी भी शस्‍त्र पूजा के कार्यक्रम को संचालित कर रहे हैं। धुले में ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्‍ट्र में पुलिस का भयानक स्‍तर पर सांप्रदायिकरण हुआ है।

धुले के बारे में

धुले महाराष्‍ट्र के खानदेश इलाके में आता है। धुले जिले की सीमाएं गुजरात और मध्‍यप्रदेश दोनों राज्‍यों से सटी हुई हैं और इन दोनों प्रांतों में BJP की सरकार है। परिसीमन के बाद धुले के संसदीय क्षेत्र में मालेगांव का शहरी इलाका भी शामिल किया गया है। और मालेगांव वह इलाका भी है जहां पर मुस्लिम आबादी बड़े पैमाने पर रहती है और जिसे हिंदू चरमपंथी ताकतों के द्वारा 2006 और 2008 में निशाना बनाया गया था। असीमानंद जो मालेगांव बम ब्‍लास्‍ट का मुख्‍य अभियुक्‍त है, पुलिस के सामने अपनी स्‍वीकारोक्ति में कहा था कि मुस्लिम बाहुल्‍य क्षेत्र होने के चलते ही मालेगांव को निशाना बनाया गया था। मालेगांव में दूसरा बम ब्‍लास्‍ट सितम्‍बर 2008 में किया गया तथा 5 अक्‍टूबर 2008 को ही हिंदू रक्षा समिति के नेतृत्‍व में धुले में दंगा कराया गया था।

धुले, गुजरात और मध्‍यप्रदेश की सीमा के साथ जलगांव एवं नंदूरबार जिले से भी लगा हुआ है। धुले तथा जलगांव का कुछ इलाका आदिवासी बहुल है तथा नंदूरबार जिला तो पूरी तरह से आदिवासी बहुल ही है, जहां पर हिंदूसांप्रदायिक संगठनों के द्वारा बड़े पैमाने पर धर्मान्‍तरण की गतिविधियां तथा शबरी मेला आदि नियमित एवं बड़े पैमाने पर आयोजित किए जाते हैं। इन इलाकों में राष्‍ट्रीय स्‍वंयसेवक संघ (R.S.S.)ने अपना जनाधार काफी मजबूत कर लिया है। 2008 में दंगा धुले शहर में शुरू हुआ लेकिन ऐसे भी ग्रामीण इलाकों में उस समय हिंसा हुई थी जहां पर पूरे गांव में केवल 4 या 5 मुस्लिम परिवार ही रह रहे थे। धुले जिले से और मालेगांव से आंतकवादी गतिविधियों को संचालित करने के नाम पर, सिमी के नाम पर मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारियां हुई थी जिसके चलते पूरे इलाके में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ था।

धुले में शराब, केरोसिन, पेट्रोल, भंगार (कबाड़) का काम बड़े पैमाने पर अवैध तरीके से होता है जिसमें दोनों समुदाय के बेरोजगार लोग शामिल हैं यह काम पूरी तरह से पुलिस के संरक्षण में तथा राजनैतिक पार्टी के नेताओं की मिली भगत से संपन्‍न होता है। दो राष्‍ट्रीय राजमार्ग धुले से होकर जाते हैं जिनसे सैकड़ो की संख्‍या में ट्रक रोज गुजरते हैं। इनसे अवैध वसूली करने के साथ-साथ जिन केमिकल्‍स को अवैध तरीके से हासिल किया जाता है, उनकी पहचान के लिये अब रसायन विज्ञान (Chemistry) में बी.एस.सी. होना जरूरी है तभी वे केमिकल की पहचान कर सकते हैं। जिनको पारिश्रमिक के तौर पर 4 से 5 हजार रूपये दिए जाते है।

अतीत में धुले जिले में काफी व्‍यापक पैमाने पर कपास की खेती होती थी और अंग्रेजी हुकूमत के दौर में यहां पर टेक्‍सटाइल मिल भी लगाई गयी थी। जिसमें काफी संख्‍या में लोगों को रोजगार मिला हुआ था। 50 के दशक में धुले के अंदर कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का काफी अच्‍छा जनाधार था। 1957में धुले की 11 सीटों में 10 पर भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने अपनी जीत दर्ज की थी तथा 1 सीट आर.पी.आई. के लिये छोड़ी थी। जनता पर कम्‍युनिस्‍ट नेताओं का काफी प्रभाव था। हिंदू एवं मस्लिम समुदाय के बीच यदि कोई झगड़ा होता भी था तो उसको आपसी बातचीत करके ही हल कर लिया जाता था। कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने यहां पर तांगेवाले तथा रिक्‍शेवालों के बीच भी अपनी यूनियन बनायी थी तथा मुंबई के बाद सबसे बेहतर स्थिति में वामपंथी आंदोलन धुले में ही था। टेक्‍सटाइल मिल, बुनकर उद्योग जिसमें अधिकांश मुस्लिम समुदाय (अंसारी) के लोग ही शामिल थे। हिन्‍दू समुदाय में खास तौर पर गवली जाति के लोग दुग्‍ध उत्‍पादन में संलग्‍न थे तथा प्रतिदिन एक लाख लीटर दूध मुंबई को सप्‍लाई किया जाता था। आस-पास खूब जंगल था जिसके चलते पानी का संरक्षण पर्याप्‍त मात्रा में होता था। चीनीमिल यहां पर सहकारिता के अंतर्गत थी। सहकारिता आंदोलन भी यहां पर काफी मजबूत था। 60 के दशक में टेक्‍सटाइल मिल का बन्‍द होना, कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में डिवीजन, ट्रेड यूनियन आंदोलन का महाराष्‍ट्र में कमजोर पड़ना,फासीवादी ताकतों का उदय, तथा नई आर्थिक नीतियों का प्रवेश जिसने लघु उद्योग (पावरलूम उद्योग) तथा कृषि को पूरी तरह से हाशिये पर ढकेल दिया। जिसके परिणाम स्‍वरूप बेरोजगारी भयानक स्‍तर पर बढ़ी। ‘धुले में बेरोजगारी कीदर 26.17 प्रतिशत है, जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर यह बेरोजगारी 7.6 प्रतिशत की है एवं उसमें भी अधिकांश बेरोजगारी मुस्लिम समुदाय में ही है’। -इंडियन एक्सप्रेस में जिशान शेख की रिपोर्ट- 13 जनवरी 2013

8 जनवरी 2013 के ‘लोकमत समाचार’ ने संपादकीय कालम में ‘महाराष्‍ट्र में एफ.डी.आई.’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख छापा है। ”प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश के मामले में देश के अन्‍य राज्‍यों को महाराष्‍ट्र ने पीछे छोड़ दिया है, यहां तक कि नरेन्‍द्र मोदी का कथित वाइब्रेंट गुजरात भी प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश में महाराष्‍ट्र से ही नहीं कई राज्‍यों से पीछे है। उद्योग मंत्रालय के आकड़ों के मुताबिक पिछले 12 वर्षों में जितना प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश हुआ है, उसका एक तिहाई हिस्‍सा महाराष्‍ट्र की झोली में आया है। इस दौरान महाराष्‍ट्र में 3366.43 अरब रू. का प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश हुआ” इस खबर से ऐसा मालूम पड़ता है कि पूरे महाराष्‍ट्र में औद्योगिकीकरण बड़े जोर-शोर से चल रहा है जबकि हकीकत कुछ और ही है। औद्योगिकीकरण महाराष्‍ट्र के कुछ ही शहरों तक सीमित है। खासतौर से मुंबई, औरंगाबाद, पुणे, ठाणे, नासिक। जबकि काफी हिस्‍सा जिसमें विदर्भ, खानदेश का बड़ा हिस्‍सा आता है। आज भी प्राक्-औद्योगिक अवस्‍था से ही गुजर रहा है

महाराष्‍ट्र के अंदर इस तरह के औद्योगिकीकरण ने आंतरिक उपनिवेशवाद की स्थिति पैदा कर दी है। 2012 और जनवरी 2013 के माह में 3 बड़े दंगों को यहां की अवाम देख चुकी है। सांप्रदायिक हिंसा की ये सभी घटनायें महाराष्‍ट्र के उन इलाकों में हुयी हैं, जहां पर प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश का शतांश भी नहीं आया है। धुले में नियमित रूप से छ: घंटे की बिजली कटौती बचे-खुचे पावरलूम उद्योग को भी नष्‍ट कर रही है। सांप्रदायिक हिंसा का इन इलाकों में होने का एक आशय यह भी निकलता है कि छोटी पूंजी से जुड़े व्‍यवसायों को सचेतन तरीके से क्षति पहुँचायी जा रही है। 1999 से ही यहां पर कांग्रेस और राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की मिली-जुली सरकार है। इस सरकार ने दलित, स्‍त्री, अल्‍पसंख्‍यक (खासतौर पर मुस्लिम) किसान, मजदूर, समुदाय के सशक्‍तीकरण के लिये कोई भी प्रयास नहीं किए हैं, उल्‍टे विदर्भ में सबसे ज्‍यादा किसानों की आत्‍महत्‍याएं दर्ज की गई हैं। सांप्रदायिक हिंसा की ये घटनायें निश्चित रूप से आने वाले 2014 के विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में शासकवर्गीय पार्टियों को फायदा पहुँचायेगीं।

जांच दल के सदस्‍य –भारत भूषण तिवारी (स्वतंत्र पत्रकार, पुणे), अमीर अली अजानी (सामाजिक कार्यकर्ता, वर्धा), लक्ष्‍मण प्रसाद, गुंजन सिंह एवं शरद जायसवाल

शरद जायसवाल एवं गुंजन सिंह द्वारा जारी

धुले में मुसलमानों के कत्लेआम पर डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन, जेएनयू की आरंभिक रिपोर्ट यहां पढ़ें. डीएसयू की  पूरी रिपोर्ट (अंग्रेजी) में यहां से डाउनलोड की जा सकती है.

अनुपिया: बम संकर टन गनेस

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/15/2013 12:50:00 AM


राकेश कुमार सिंह की किताब बम संकर टन गनेस का एक और अंश.

डोरा से आने में चन्दर सिंह के डेरा के बाद एक टोला है। डेरे पर काम करने वाले मजदूरों का। एक भी गैर दलित परिवार नहीं है वहां। वहीं सझिलावा से लगे अपनी जमीन पर कुछेक बरस ललन बाबा ने दुकानदारी की। जिन दिनों उन्होंने दुकानदारी शुरू की थी उन दिनों उन्हें मुंशीजी की उपाधि मिल चुकी थी। शादी के बाद बच्चा बाबा ने भी कई बरस वहां आंटा चक्की चलाया। उसी टोले में सड़क की दायीं ओर पहला घर धनवीर का है और दूसरा या तीसरा अनुपिया का। अनुपिया गांव की बेटी हैं। रिश्तेदारी होती तो फुआ होती हमारी। लेकिन बहुत साफ वजहों से हमारे गांव में ऐसी रिश्तेदारियां नहीं विकसित हो पायीं। नहीं मालूम कि उनकी शादी कब, किससे और किस गांव में हुई थी। जब से होश संभाला, उन्हें छपरा में ही देख रहा हूं। एक ही जगह पर। पहले घर अपेक्षाकृत छोटा था।

अनुपिया डेरा पर खेती-बाड़ी में रोपनी-सोहनी, कटाई-पिटाई वगैरह करती थीं। बारी-झाड़ी का काम भी संभालती थीं। कई दफा, शाम के वक्त उनको डेरा पर बारी में लगी सब्जियों और अमरूद की रखवाली करते भी देखा है। छोटा कद। सामान्य चेहरा, आंख में हमेशा कांची लगी होती थी। बोलती रेघा-रेघा कर थीं। उन्हें हमेशा चिप्पी लगे मटमैले लुगे में ही देखा। उनकी दोनों तर्जनियों में ठेले पड़े थे। उनके बदन पर झुल्ला (ब्लाउज) कब देखा था, याद नहीं। हमेशा लुगा के अंचरा वाले हिस्से को मोड़कर कांख से होते हुए पीछे कमर में खोंसे। नंगे पांव।

अब भी अनुपिया खैनी खाती हैं। अंचरा के एक कोर में उनकी चुनौटी बंधी होती है। मांगने पर वे औरों को भी एक-दो जुम खैनी दे दिया करती थीं। बन लेने के लिए अनुपिया हर दूसरे या तीसरे दिन, तीसरे पहर गांव जाया करती थीं। आंगन में प्रवेश तो था, पर दोगल्ली या मुहार से बहुत आगे तक नहीं। वहीं बैठ कर अनुपिया ईया से देर तक बतियाती रहती थीं। खेती-बाड़ी की कम, घर-परिवार या टोला-पड़ोस का ज्यादा। जैसे कि लडि़का-फरिका कैसा है, हारी-बीमारी तो नहीं लगी किसी को, किसी की बेटी की शादी तो नहीं आ रही, वगैरह-वगैरह। एक तरह से कहें तो तब अनुपिया ईया के लिए डेरा और उसके आस-पास के खबरों का स्रोत हुआ करती थीं। ईया के लिए ही क्या आंगन में मेरी माई और चाचियों के लिए भी। घंटे-डेढ घंटे बातचीत के बाद अनुपिया का बन जोखा जाता। जिसे साथ लाए किसी टुकड़े में बांध कर वे सिर पर रख लेतीं। कभी-कभी बन लेकर खोराकी खरीदने सीधा शिवशंकर बाबाजी की दुकान या फिर बजार पर चली जातीं। बन में मकई, गेहूं, धान, या हद से हद केरइया या फिर खेसारी दिया जाता था। रहड़ी, मसूरी, सरसो, तोड़ी या मूंग कभी नहीं तौली गयी।

जिस दिन अनुपिया जल्दी आ जाती थीं, उस दिन माई या कोई चाची उनसे तेल मलवाती थीं। असोरा पर अरगन्नी से ओत करके औरतें साया की डोरी ढीली करके लेट जाती थीं चटाई पर। ब्लाउज के हुक तो लेटे-लेटे ही खोल लेती थीं। अनुपिया बगल में रखे मलिए से कडुआ तेल ले कर पहले अपने तरत्थियों पर दो बार रगड़तीं और उसके बाद चटाई पर लेटी औरत के बदन पर अउंसा करती थीं। तब तक अनुपिया लगी रहतीं जब कि पोर-पोर में तेल न समा जाए। कभी-कभी एक की मालिश खतम होते ही आंगन की कोई दूसरी औरत निहोरा करने लगती थीं, ‘हे अनुपिया, तनका हमरो टहरा न दिऊ।’ फिर अनुपिया कहती थीं, ‘आई न हे दुलहिन, देखू न कतेक अबेर हो गेलई। आएब न फेरू बन ला ओई दिन, त टहरा देब।’ इसके बावजूद कभी-कभी उन्हें मालिश करनी ही पड़ती थी। बदले में उन्हें कोई मजदूरी तो नहीं मिलती थी। कभी किसी ने खाना खिला दिया या फिर बीड़ी-खैनी के लिए चवन्नी-अठन्नी दे दी। बस। कभी आंगन की कोई औरत इस्तेमाल से बाहर हो चुकी साड़ी दे देती थी, जिसे बाद में अनुपिया पेओन लगा करा कर पहनती थीं।

अकेले तीन-तीन बच्चों को कैसे संभाला होगा उन्होंने! बड़े बेटे का नाम भोंमला यानी असर्फी राम है। मेहनती पर अक्षर ज्ञान से परे। इस निरक्षता का मूल उनकी जाति और गरीबी थी। अचरज होता है कि इतना ‘मानवीय’ बनने वाले अनुपिया के घिरस लोगों ने उन्हें ये क्यों नहीं बताया कि बच्चों की पढाई-लिखाई महत्त्वपूर्ण है। जबकि अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर वे हमेशा सजग रहे। छोटी सी उम्र में बच्चों को हाॅस्टलों में डालने में भी उन्हें परेशानी नहीं हुई। आगे की पढाई के लिए चाउर, दाल और आलू की मोटरी मुजफ्फरपुर पहुंचाते रहे। गैलन में दूध और हर हफ्ते कपड़े में बांध कर दही भेजना नहीं भूले। उन्हें ये क्यों नहीं समझ आया कि अनुपिया के बच्चों को भी पढना चाहिए। उल्टा अनुपिया या अनुपिया जैसों के छोटे-छोटे बच्चे चाउर-दाल का मोटा माथे पर लाद कर बस तक पहुंचाते थे। यदा-कदा आज भी ऐसी स्थिति देखने को मिल जाती है।

मेरे हिसाब से हमारे परिवार वालों के इस रुख की दो वजहें थीं। वे घनघोर व्यक्तिवादी थे। जातिवादी भी। खुद और परिवार के अलावा किसी और के बारे में सोचने का समय नहीं था उनके पास। और दूसरा, जाने-अनजाने उनके मष्तिस्क में ये बात बैठी थी कि अनुपिया जैसों के बच्चे पढ-लिख गए तो उनका काम-काज कौन करेगा। धर्मग्रन्थ और कुलपुरोहित, हंसौर के अदिकलाल मिश्र और उनके खानदान के बाबाजी लोग तो थे ही जातीय तरतमता की व्याख्या और उसके अनुरूप व्यवहार का ज्ञान देने के लिए।

असर्फी निरक्षर थे। मेरे होश संभालने तक चरवाही का प्रभार उनके छोटे भाई चिकरना यानी कैलाश राम ने संभाल लिया था। ‘प्रोमोट’ हो कर डेरा के अन्य कामों में जुट गए थे असर्फी। हरवाही, दउनी, ओसाई वगैरह जैसे खेती-बाड़ी के कामों मे उनकी अहम भूमिका होने लगी थी। तैयार अनाज, जलावन, वगैरह बैलगाड़ी पर लाद कर घर पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी बन गयी थी। वे बहलवान बन गए थे। कई मर्तबा जब वे डेरा से गांव के लिए गड़ी जोतते थे तो मैं भी उस पर सवार हो जाता था। आगे बैठता था, बिल्कुल जुए के पास। उनसे जिद करता था कि पगहा मुझे भी पकड़ाएं, मैं भी गाड़ी हांकूंगा। असर्फी प्यार से मना करते थे और मुझे इधर-उधर की बातों में उलझाए रखने की कोशिश करते थे। फिर भी मेरे न मानने पर खुली सड़क देख कर एक-आध मिनट के लिए पगहा हाथ में थमा देते थे। फिर मैं ठांव-ठांव करता बैलों की पूंछ के अगल-बगल डंडे से हल्की चोट करने लगता। 

कैलाश अनुपिया के दूसरे बेटे का नाम है। बचपन में चिकरना पुकारते थे लोग उसे। हमउम्र है कैलाश। जैसी कद-काठी बचपन में थी, अब भी वैसी ही है। चिकरना भी खींच-खांच कर नाम लिखना सीख पाया। बस। पढाई करता भी कैसे, स्कूल जाने के समय पर हमारे परिवार वालों ने चरवाही-घसवाही में उलझाए रखा था उसे। नौजवानी ने दस्तक देना शुरू ही किया था कि कैलाश बाहर कमाने जाने वाले एक समूह में शामिल हो कर पंजाब चला गया। आबो-हवा बदली। पता चला कि तरियानी छपरा और डेरे के बाहर भी एक दुनिया है। बड़ी। आजाद। अवसरों से भरी हुई। कैलाश कुछ नकद कमा कर घर लौटा। नकदी के स्वाद और महत्त्व को कैलाश अच्छी तरह समझ चुका था। आठ-आठ आने के लिए उसकी मां को लोगों की चिरौरी करनी होती थी, कैलाश को याद था। कैलाश ने डेरे के काम-काज से खुद को पूरी तरह काट लिया।

बाहर आते-जाते कैलाश ने राज मिस्त्री का काम सीख लिया। अब वो अपने घर का पहला स्किल्ड लेबर बना। काम की दिक्कत नहीं रही। शुरुआत में दिल्ली-पंजाब के कुछ चक्कर लगाए। बाद में सासाराम जाने लगा। अब भी जाता है। सासाराम में काम करते हुए कैलाश ने कुछ पैसे जोड़े। गांव में थोड़ी-बहुत जमीन ली। कम उम्र में ही कैलाश की शादी हो गई थी। पिता भी जल्दी बन गया था। बच्चे अब बड़े हो गए हैं। स्कूल जाते हैं। और खेती-बाड़ी के काम में अपनी मां का हाथ भी बंटा दिया करते हैं। कैलाश का आना-जाना लगा रहता है। वैसे गांव में भी उसके पास पर्याप्त काम रहता है। लेकिन मजदूरी कम मिलती है। कई बार उधार रह जाती है। पिछली बार कैलाश धनुकटोली और अलोरा के बीच पूल जोड़ता मिला था। बताया था कि पूरे काम का उसे ठीका मिला है। मालूम नहीं मजदूरी पूरी मिली कि नहीं।

नथुनी अनुपिया का सबसे छोटा लड़का है। असर्फी और कैलाश की अपेक्षा लंबा और चेहरे-मोहरे से सुंदर। उन दोनों से थोड़ा ज्यादा साक्षर भी। कैलाश के बाद नथुनी ने ही चरवाही संभाली थी। पर ज्यादा दिन चली नहीं। खेती-बाड़ी का काम ढलान पर था। हमारे पापा और चाचाओं में बांट-बखरे हो गए। नथुनी के व्यक्तिगत जीवन के लिए अच्छा हुआ। बंधुआ मजदूरी से मुक्ति की शुरुअता हुई। कुछ समय तक उसने तरियानी चैक पर किसी दुकान पर काम किया और उसके बाद एक साइकिल दुकान पर रिपेयरिंग का काम सीखने लगा। काम सीख कर उसने काफी समय इधर-उधर नौकरी की। एक-आध दफे बाहर भी गया। हमारे एक चाचा की किसी रिश्तेदारी में पूणे भी गया था। कई साल हुए, गांव लौट आया। अब अपने घर पर ही साइकिल मरम्मत करता है। साथ में बटाई-उटाई पर थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी भी।

अनुपिया के तीनों बेटों का परिवार अलग-अलग हो गया है। आंगन भी एक नहीं रहा। असर्फी के बच्चे बड़े हो चुके हैं। बड़ा बेटा तो कमाने के लिए बाहर जाने लगा है। मझला पढने में ठीक-ठाक हैं। हाई स्कूल जाता है। मैट्रिक पास हो गया तो परिवार का पहला व्यक्ति होगा जो जाति-प्रमाणपत्र के लाभ की कोशिश करेगा। असर्फी ने अपनी गाढी कमाई और उधार-पैंचे के सहारे कुछ जमीन खरीद ली थी। अपने हल-बैल का इंतजाम कर लिया था। बटाई पर भी कुछ खेती-बाड़ी कर लेते थे। करीब आठ-दस साल पहले उनका एक बैल मर गया। वे भयानक सदमे का शिकार हो गए। काम-धंधा, बात-चीत, कहीं आना-जानाः सब छोड़ दिया था उन्होंने। भाइयों ने मिल-जुल कर इलाज करवाया। खर्च की चिंता नहीं की। स्थिति थोड़ी बेहतर हुई लेकिन असर्फी अब पहले की तरह नहीं रहे। सुस्त हो गए हैं। सुना है असर्फी की पत्नी बहुत सुशील स्वभाव की हैं। बच्चों के बड़े होने के बाद उन्होंने बाहर-भीतर करना शुरू कर दिया है। असर्फी जब से बेमत हुए हैं तब से घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी वे ही संभाल रही हैं।

पूंजीवाद के अंतर्विरोध और मौजूदा संकट

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/14/2013 10:54:00 AM

अरुण फरेरा एक लेखक, कलाकार और कार्यकर्ता हैं, जो झूठे आरोपों के तहत कई वर्षों तक जेल में रहने के बाद कुछ महीनों पहले छूट कर आए हैं. यहां उन्होंने पूंजीवादी संकट, इसके खिलाफ दुनिया में जनता के संघर्षों और भारत में क्रांतिकारी मार्क्सवाद की संभावनाओं और चुनौतियों का संक्षेप में आकलन किया है.

हाल ही में लालच को लेकर दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया में लेखों की एक शृंखला प्रकाशित हुई। सप्ताह में दो दिन छपने वाले इन लेखों की परिणति आखिरकार दिसंबर, 2012 के मुंबई के साहित्योत्सव में हुई। इस तरह की विषय- वस्तु (थीम) के चुनाव की तार्किकता का कारण आयोजकों ने रजत गुप्ता और विजय माल्या जैसे बड़े पूंजीपतियों का 'लालच' बताया (जिनका उल्लेख पतित हुए देवदूत के रूप में किया गया न कि गंभीर पाप के तौर पर!)। लालच के प्रति ये घृणा विडंबना ही थी क्योंकि यह एक ऐसे समाचारपत्र से आ रही थी जो कि 1990 के बाद के आर्थिक सुधारों का कट्टर समर्थक रहा है और जो भारत के शासक वर्गों के हितों का पुरजोर समर्थन करता है।

2008 में जब सबप्राइम मॉर्गेज यानी (आवासीय ऋण) की समस्या पैदा हुई थी तो उसने पूरी दुनिया को वित्तीय संकट में डाल दिया था। तब से अब तक पूंजीपति वर्ग और उस पर पलनेवाला मीडिया सरलीकृत कारणों जैसे कि 'लालच का अतिरेक' की बात करता है। अर्थव्यवस्था और वैश्विक अर्थव्यवस्था में दिलचस्पी रखने वाला हर कोई गंभीर छात्र जानता है कि पूंजीवाद शोषण और मांग (इसे लालच पढ़ा जाए) के दो पक्षों पर टिका है। गोकि कीन्स स्कूल के मतावलंबी सिर्फ अमेरिका के सेंट्रल बैंक को ही कोसते हैं कि यह मुख्य वित्तीय संस्थानों और बैंकों को सही ढंग से नियमित नहीं कर पाया। इस स्कूल का मानना है कि इस तरह की मुद्रा नीति की वजह से ही लगातार गुब्बारा अर्थव्यवस्थाओं के पैदा होने का चक्र चलता है जिसका परिणाम रह-रह कर होने वाले दिवालियापन में होता है। सदी की शुरुआत में डॉट कॉम गुब्बारे के फूटने के बाद आवासीय ऋण का गुब्बारा भी ऐसे ही फूटा। लेकिन अत्यंत जोखिम भरे आवासीय ऋणों के व्यापक वित्तीयकरण और सट्टे से यह संकट सिर्फ आवासीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा और अंतत: इससे वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था का पूरा ढांचा ही चरमरा गया। यद्यपि यह विश्लेषण एक हद तक सही है पर यह पूंजीवाद की आंतरिक कार्यप्रणाली और इसके अंतर्निहित अंतरविरोधों का सही मूल्यांकन नहीं करता। यह नवउदारवाद को कटघरे में खड़ा करना है, पूंजीवाद को नहीं।

दूसरी ओर मार्क्सवाद उत्पादन के सामाजिक चरित्र और संपत्ति के निजी क्षेत्र द्वारा हथियाये जाने के अंतरविरोध को ही बीमार पूंजीवाद सबसे अहम और खतरनाक द्वंद्व मानता है। ज्यादा से ज्यादा धन की होड़ के लालच में पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग के श्रम से पैदा हुए अतिरिक्त मूल्य पर, उनकी मजदूरी को दबा कर कब्जा करता है। नतीजतन मजदूरों की क्रय क्षमता कम होती जाती है जिससे सामाजिक उपभोग में गिरावट आ जाती है। इसके बाद से अति उत्पादन का संकट बारबार पैदा होता जाता है। पर्याप्त मांग के न होने से जब मुनाफा कम होने लगता है तो पूंजीपति निवेश में कटौती करता है और मजदूरों की छंटनी करना शुरू करता है। इस कदम से संकट कम नहीं होता बल्कि और बढ़ जाता है। पूंजीवाद के जन्म से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था ऐसे संकट से बार-बार और चक्राकार रूबरू होती रही है। मौजूदा संकट भी इसी की एक कड़ी है। सबप्राइम मॉर्गेज के संकट में भी अमेरिका (और दुनिया भर) में वेतन या मजदूरी को जिस तरह से बारबार कम किया गया उसके कारण आवासीय ऋण की अदायगी असंभव हो गई। ऐसे में बकायेदार यानी डिफॉल्टर्स की तादाद बढ़ती गई। वित्तीय क्षेत्र के विस्तार और उत्पादन क्षेत्र के ठहराव ने सोने पर सुहागे का काम किया। आखिरकार 2008 में विश्व अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

वित्तीय पूंजी के भरभराकर गिरने की हकीकत के साथ अब अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद के सामने मुद्दा था कि वह इसे कैसे संभाले और फैलने से कैसे रोके। अपने शुरुआती दिनों में उसने मान लिया था कि यूरोप को बचाया जा सकता है। परंतु ब्रिटेन में नॉर्दर्न रॉक बैंक के तुरंत ढहने के साथ ही यह भी गलत साबित हो गया। पिछले कुछ सालों में यूरोपीय संघ (ईयू) इस संकट से बहुत गहरे प्रभावित रहा है। तब इसने इस संकट से पूरे यूरोपीय आर्थिक ब्लॉक को ढहने से रोकने के लिए ग्रीस, इटली और पुर्तगाल में व्यापक पैमाने पर राजनीतिक और ढांचागत सुधार किए।

भारत ने अपनी तथाकथित उभरती हुई आर्थिक ताकत की हैसियत के साथ, मान लिया था कि वह अपने को इस संकट से अलग करने में समर्थ है। परंतु पिछले कुछ वर्षों के आकलन ने इसको भी गलत साबित कर दिया। आठ जनवरी 2008 को बंबई स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक जो 20,873 अंक की ऊंचाई पर था वह 20 नवंबर 2008 को 8541 अंक तक गिर गया। वास्तव में, भारत के शासक वर्ग ने दलाल बुर्जुआ और सामंत वर्ग तथाकथित आजादी के पिछले 65 वर्षों के दौरान, साम्राज्यवाद के हितों के मुताबिक अर्थव्यवस्था को विकसित किया है। सोवियत संघ के ढहने के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर स्पष्ट और उत्तरोतर शिफ्ट हुआ है। इस नव उपनिवेशीय चालित अर्थव्यवस्था, विशेषकर 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद, ने भारत को विश्व साम्राज्यवाद के साथ बहुत अधिक एकीकृत कर लिया और उसे विकास के लिए विदेशी निवेश और व्यापार पर आश्रित बना दिया। यही कारण है कि घरेलू अर्थव्यवस्था अपने आप को विश्व संकट से नहीं बचा पाई। वर्ष 2010 में भारत में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 42 प्रतिशत तक गिर गया, जो संकट के पहले के आंकड़े से भी कम है; और वर्ष 2012 की पहली छमाही में उन्होंने इसे 42.8 प्रतिशत से 10.4 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया। विदेशी निवेश में कमी का भारत की विकास दर में तुरंत रुकावट के रूप में असर पड़ा, जिसमें 2003 से 2008 के बीच नौ प्रतिशत तक की गति आई थी। इस स्थिति से निपटने के लिए शासक वर्गों ने पूर्व में लगाई गई पाबंदियों में और ढील देनी शुरू कर दी। और तो और अब तो मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को व्यापक स्तर पर मंजूरी दे दी गई और खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेश निवेश को पूरी दृढता से लागू किया गया।

भारत के दलाल बुर्जुआ ने इसका इस्तेमाल दक्षिण एशिया के अपने परंपरागत पास-पड़ोस से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए किया और अफ्रीका जैसे दूसरे महाद्वीपों में रास्ता बनाया। वर्ष 2011-12 के दौरान अफ्रीका में कुल भारतीय सहायता और निवेश 150 करोड़ रुपए हो गया, जो कि वर्ष 1997-98 में महज दस करोड़ था। इसी तरह भारत और अफ्रीका के बीच व्यापार वर्ष 2000 में तीन अरब डॉलर से बढ़कर 2011 में करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। बीते दशक में भारत-अमेरिका परमाणु सौदे के मामले में भारत के दलाल बुर्जुआ ने अपने साम्राज्यवादी आकाओं से अधिक रियायतें लेने की कोशिश की थी। कभी-कभी तो अधिकतम रियायतें हासिल करने के लिए इस बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादी आकाओं की प्रतिस्पर्धा का फायदा उठाने की भी कोशिश की है। रक्षा सौदे इसके कुछ उदाहरण हैं। अमेरिकी लड़ाकू विमानों को फ्रांसीसी राफेल के लिए ठुकरा दिया गया। यह दस अरब डॉलर का सौदा था। एक और मामले में अमेरिकी दावेदारी को रूस के पक्ष में ठुकरा दिया गया। 35 अरब डॉलर का यह सौदा भारत के पांचवीं पीढ़ी के विमान को विकसित करने के लिए था। ऐसा करने के बाद भी भारत में ये शासक वर्ग भारत में नव उपनिवेशीय शोषण का मुख्य वाहक बना हुआ है।

मार्क्सवाद समाज की महज व्याख्या भर से ही संतुष्ट नहीं होता, बल्कि ये इसके बदलाव के साथ सरोकार रखता है। और मजदूर वर्ग के नेतृत्व में वर्ग संघर्ष की धार को पैनी करके ही इसे हासिल किया जा सकता है। मौजूदा वित्तीय संकट और इससे पैदा हुए जनसंघर्ष, दोनों ही पूंजीवाद के मार्क्स वादी विश्लेषण को सही ठहराते हैं। अंतरराष्ट्रीय पटल पर पिछले दशक में योरोपीय देशों के मितव्ययिता उपायों के खिलाफ श्रमिक वर्ग के संघर्ष छाए रहे हैं। इससे पहले भी ग्रीस, इटली और फ्रांस में मजदूरों का काफी उग्र और राजनीतिक संघर्ष हुआ था। यहां तक की 'ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट मूवमेंट' की शृंखलाओं से संयुक्त राज्य अमेरिका भी अछूता नहीं रहा और उसके कई शहरों में फैल गया। वर्ष 2011 के विसकॉन्सिन विरोध प्रदर्शन ने वित्तीय संकट से निपटने के लिए अमेरिकी चुनावी विकल्पों के खोखलेपन पर सवाल उठाया था। हालांकि यह 'ऑक्युपाई मूवमेंट' पूंजीवाद में सुधारों के लाभ तक सीमित था, बजाय कि इसे उखाड़ फेंकने के।

इस संकट के दौरान पूंजी और श्रम के बीच का अंतर्विरोध तेज हुआ है, इसलिए भी विश्व पूंजीवाद के अन्य अंतर्विरोध तीखे हुए हैं। साम्राज्यवाद और उत्पीडि़त राष्ट्रों के बीच अंतर्विरोध को अमेरिकी कब्जे के खिलाफ अफगानी प्रतिरोध साम्राज्यवाद और उत्पीडि़त राष्ट्रों के बीच अंतर्विरोध का प्रतीक है। खर्चों में बढ़ोतरी और प्रतिरोध के बावजूद अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए अपने आपको अफगान झंझट से छुड़ाना मुश्किल हो गया है। इसी तरह अरब वर्ल्ड में आंदोलनों ने साम्राज्यवादी कवच में दरार को उजागर कर दिया है। अमेरिका उनको या तो अपने साथ कर लेना चाहता था या उनके गुस्से को वहां के स्थानीय शासकों, जिन्हें वह 'नापंसद' करता था, के खिलाफ भड़का देना चाहता था, जैसे कि लीबिया और सीरिया के साथ किया। परंतु, क्रांतिकारी बदलाव के लिए होने वाले आंदोलनों के अभाव में सच्चे लोकतंत्र से अरब देशों की जनता वंचित रही। मिस्र में पहले मुबारक और अब मोरसी की सत्ता के खिलाफ जनता के इन निरंतर विरोध प्रदर्शनों ने सच्चे जनतंत्र के प्रति लोगों की दृढ़ता को ही प्रदर्शित किया है।

तथाकथित भारतीय आजादी के पिछले 65 वर्षों में भारत में मार्क्सवाद दो विपरीत धाराओं का गवाह रहा है। एक संसदीय वामपंथ है, जिसका नेतृत्व मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और अन्य संसदीय दल जैसे रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी), फॉरवर्ड ब्लॉक आदि करते हैं। संसद में पहले यह प्रभावी ताकत थी, लेकिन बाद में इनका प्रभाव कुछ राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा तक ही सिमट कर रह गया। अब बंगाल में वाम मोर्चो सरकार की हार के साथ ही इनका पतन और भी स्पष्ट हो गया है। इसे कुछ लोग भारत में मार्क्सवाद की असफलता के तौर पर उछाल रहे हैं। दूसरी क्रांतिकारी मार्क्सवादी धारा है। यह तेलंगाना और तेभागा संघर्षों के दौरान चिंगारी के रूप में उभरी और बाद में नक्सलबाड़ी के बाद मजबूत हुई। घोर राजकीय दमन और आघातों के बावजूद यह क्रांतिकारी धारा धीरे-धीरे मुकम्मल 'नव जनवादी' विपक्ष में तब्दील हुई है, जिसमें सशस्त्र वर्ग संघर्ष उसका मुख्य अंग है। यह गरीबों में गरीब की तबके का प्रतिनिधित्व करता है, जो शासक वर्ग के विकास मॉडल को सीधे तौर पर चुनौती देता है। इस धारा का मुख्य रूप से प्रतिनिधित्व सीपीआई (माओवादी) करती है (जिसे शासक वर्ग ने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है), और देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत सारे क्रांतिकारी समूह स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं।

पहली धारा का पतन मार्क्सवादी सिद्धांतों पर टिके नहीं रहने के कारण हुआ। सच्चाई यह है कि जिन राज्यों में इस वाममोर्चे ने शासन किया वहां इसने बहुत ही प्रतिक्रियावादी तत्वों के साथ गठजोड़ किया, जो कि दलाल बुर्जुआ और सामंती शासक वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। साथ ही अन्य संसदीय दलों की तरह जन विरोधी नीतियों में संलिप्त रहा। नंदीग्राम और सिंगूर के विस्थापन विरोधी संघर्ष और बाद में राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और दमन इसकी साफ तस्वीर पेश करता है। संसद में वाममोर्चा खुद को राष्ट्र की संप्रभुता और धर्मनिरेपक्षता के रक्षक के तौर पर पेश करता है, लेकिन संभावित चुनावी गठजोड़ों की खातिर अपने स्टेंड के साथ आसानी से समझौता कर लेता है। वे कश्मीर और पूर्वोत्तर की उत्पीडि़त राष्ट्रीयताओं तथा दक्षिण एशिया के देशों के बरअक्स भारतीय बुर्जुआ की अंधराष्ट्रवाद तथा विस्तारवाद की भूमिका को समझने में भी असफल रहे हैं। विचाराधारत्मक तौर पर यह संशोधनवादी प्रवृत्ति मार्क्सवाद के लिए मुख्य खतरा बनी हुई है। भारत में क्रांतिकारी मार्क्सवाद की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि वह इस संशोधनवाद का विचारधारत्मक और साथ ही व्यवहार में कितने प्रभावी तरीके से करता है। क्रांतिकारी मार्क्सवाद की दूसरी चुनौती गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) का विकास है। कभी खुले और कभी छिपे तौर पर इनका साम्राज्यवाद के साथ जुड़ाव रहता है, ये सामाजिक और राजनीतिक विरोध के हर क्षेत्र पर छाए रहते हैं और राज्य के हर प्रतिरोध से तालमेल बैठा लेते हैं। बहुत सारे पूर्व मार्क्सवादी, प्रगतिशील और ग्रास रुट एक्टिविस्ट राजनीतिक सक्रियता के बेहतर आमदनी वाले सुरक्षित पर आकर्षक जाल में लगातार फंसते जा रहे हैं।

क्रांतिकारी धारा का विकास उसके भारतीय वर्ग समाज का सही विश्लेषण और क्रांति की स्पष्ट रणनीति से माना जा सकता है। छत्तीसगढ़ और झारखंड के सबसे पिछड़े इलाकों में प्राथमिक तौर पर केंद्रित करने का चुनाव, दरअसल शहरों को घेरने की रणनीति से प्रेरित है, ताकि क्रांतिकारी ताकतों के भ्रूण केंद्र के रूप में आधार क्षेत्रों को तेजी से बढ़ाया जा सके। हालांकि जबरदस्त दमन ने उन्हें सशस्त्र संघर्ष के अपने इलाके में सीमित कर दिया है, जहां वे भारतीय शासक वर्ग के लिए अजेय ताकत बने हुए हैं। उनके नेताओं और शहर में बसे कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और मार दिए जाने के कारण क्रांतिकारी आंदोलन को बड़ा नुकसान पहुंचा है। इस सघन दमन के कारण मजदूर वर्ग और शहरी आंदोलनों और राजनीतिक प्रचार पर उनके असर को सीमित कर दिया गया है। हालांकि इस धारा के पास राजनीतिक क्षमता है कि वह भारतीय जनमानस के व्यापक गुस्से को भारत में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए दिशा दे सके। 

सोवियत संघ और चीन के समाजवादी आधारों को धक्का लगने के बाद, अब यह दावा किया जा रहा है कि वेनेजुएला मार्क्सवादी विकास के नव वाम मॉडल को दिखा रहा है। इसे '21वीं सदी के समाजवाद' के तौर पर पेश किया जा रहा है। अक्टूबर 2012 में हुगो शावेज की चौथी चुनावी जीत के बाद से इस तरह के व्यक्तव्यों की बाढ़ सी आ गई। वर्तमान शावेज सरकार 1990 के दशक के उत्तरार्ध में वाम झुकाव वाले दक्षिण अमेरिकी सरकारों जैसे ब्राजील, उरुगुवे, बोलिविया, इक्वाडोर और निकारागुआ की लहर में सत्ता में आई थी, जिसे 'पिंक टाइड' के नाम से भी जाता है। लातिन अमेरिका पारंपरिक रूप अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिछलग्गू माना जाता है और वहां अमेरिका विरोधी उग्र जन आंदोलन होते रहते हैं। तथापि, संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्चस्व का धीरे-धीरे कमजोर पडऩा, लातिन अमेरिका में चीन का प्रमुख भागीदार के रूप प्रवेश और पेट्रो डॉलर का उभार इस क्षेत्र में अमेरिका विरोधी 'राष्ट्रवादी' सरकारों के उत्थान का कारण है। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था में चीन अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। (समयांतर, फरवरी, 2013 से साभार)

वामपंथ ने जेंडर के सवाल को पूरी तरह छोड़ दिया: उमा चक्रबर्ती

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/10/2013 01:24:00 AM


दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर उमा चक्रबर्ती इतिहासकार हैं, वामपंथी हैं और नारीवादी हैं। रिकास्टिंग वुमन, रिराइटिंग हिस्ट्री, जेंडरिंग कास्ट आदि किताबों में उन्होंने जाति, लिंग के सवालों की गहराई से पड़ताल की। उन्होंने जाति और जेंडर के सवाल पर मौलिक काम किया है और तमाम मोर्चों पर एक एक्टिविस्ट की तरह सक्रिय रही हैं। समयांतर के लिए पूंजीवाद के संकट और वामपंथ के संकट पर भाषा सिंह के साथ उन से हुई बातचीत के अंश.

भारतीय संदर्भ में पूंजीवाद किस तरह राज्य के साथ खड़ा है?

जिस दौर में हम बात कर रहे हैं, उस समय राज्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साजिशपूर्ण गठजोड़ में है। यह गठजोड़ देश के प्राकृतिक संसाधनों का बेशर्म दोहन करने के लिए है। इसके लिए सारे नियम कायदे कानून को ताक पर रखकर काम हो रहा है। यह किस तरह का पूंजीवाद है, इसकी व्याख्या अलग से हो सकती है, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह बिल्कुल साफ है कि राज्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे पूर्ण गठबंधन में है। इसके साथ-साथ राज्य की भूमिका और काम-काज कम हो गए हैं। नागरिकों के कल्याण की अवधारणा को कूड़ेदान में फेंक दिया गया है। सामाजिक सुरक्षा या चिकित्सा सुरक्षा मुहैया कराने की बातें तो पता नहीं कहां बिला गई हैं। राज्य की पितृसत्तामक देखरेख की जो अवधारणा (जो हम नारीवादी मानते थे) थी वह खत्म कर दी गई है। भारत की जनता आज इन ताकतों के सामने, जो उनका दोहन करना चाहती हैं, हताश परिस्थियों से टकरा कर अपने को जिंदा रखने की जद्दोजेहद में लगी हुई है। मिसाल के तौर पर किसानों की आत्महत्या देखिए...। यह राज्य और उसकी नीतियां हैं जो किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रही हैं और कहीं किसी को कोई परेशानी नहीं, कोई चर्चा नहीं। राज्य केवल सेना औऱ पुलिस तक सिमट कर रह गया।

लोकतंत्र, चुनाव और जनता के विकास के तमाम नारे भी तो हैं...

सरकार के जितने भी मंत्रालय हैं सबका एक ही एजेंडा है। उनका एजेंडा सीधा सा है कि पूंजी देश के अंदर आए, संसाधनों का दोहन करे। विशेषकर हमलावर पूंजी (प्रेडटॉरी कैपिटल)। इससे बड़े पैमाने पर लोग विस्थापित हो रहे हैं। जमीन-जंगल से उन्हें जबरन बाहर धकेला जा रहा है। इसकी चहूंतरफा मार औरतों पर पड़ रही है। बहुत बड़े पैमाने पर उनका जीवन तबाह हो रहा है।

पोस्को, वेदांता, कुडनकुलम, जैतापुर, कोयले के खनन...हर जगह प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट दिखाई दे रही है। हमलावर पूंजी को लूट का लाइसेंस कौन देता है?
यह हमलावर पूंजी तब तक नहीं आ सकती है, जब तक राज्य के साथ उसका गठजोड़ न हो। यह हमलावर पूंजी चाहती है कि भारतीय राज्य अपने लोगों की पुलिसिंग करें। इस शर्त के साथ ही वे निवेश करते हैं कि भारतीय राज्य अपनी जनता पर पुलिसियां डंडा चलाएं, उन्हें काबू में रखे। इस तरह से यह पूंजीवाद का सबसे क्रूरतम स्वरूप है, जो हम देख रहे हैं। यह पूंजीवाद अपने लोगों को, जो गरीबों में भी सबसे गरीब हैं-आदिवासी उन्हें विस्थापित कर रहा है, उनके पास जिंदा रहने के जो भी संसाधन हैं, उनसे वंचित कर रहा है। गरीबों को खुले में मरने के लिए छोड़ रहा है। यह पूंजीवाद का क्रूरतम स्वरूप है।

इस स्थिति की मार्क्सवादी व्याख्या कैसे होगी?

मैं इस स्थिति को उन व्याख्याओं के जरिए समझने की दिशा में नहीं जाऊंगी कि इसकी मार्क्सवादी व्याख्या क्या होगी या फिर मार्क्स ने क्या कहा या किसी अन्य ने। मेरा मानना है कि इन परिस्थितियों को मौजूदा संदर्भ में समझना जरूरी है। इसकी विवेचना आज की जमीनी हकीकत के अनुसार करनी होगी। सोनी सोरी की पीड़ा-यातना को देखिए। आज सोनी सोरी है क्योंकि वह छत्तीसगढ़ में है। इसे इसी तरह से ही समझा जा सकता है। उसकी स्थिति को छत्तीसगढ़ से बाहर निकाल कर नहीं समझा जा सकता। वह एक क्लासिक केस है, जिससे यह समझा जा सकता है जब राज्य अपने लोगों के खिलाफ उतरता है, जहां विवादित परिस्थितियां हैं वहां आम नागरिक का क्या हश्र होता है। 

इन तमाम दमनों के खिलाफ आंदोलन भी तो हैं, कहीं छोटे तो कही बड़े...

एक सवाल मैं पूछना चाहती हूं कि ऐसी तमाम जगहों पर परंपरागत वाम क्यों इतना कमजोर है। यह मेरे लिए भी सवाल है। भाकपा (सीपीआई) यहां थी, लेकिन अब वह भी नजर नहीं आती, लेकिन अब वह बाहर हो गई। मेरा यह सवाल है कि आखिर क्या वजह हैं कि आदिवासियों की जहां सबसे बड़ी लड़ाइयां चल रही हैं-छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा में वहां परंपरागत वाम दल कहां हैं।

इसके अलावा दूसरा सवाल है कि आखिर इन तीनों जगहों पर दक्षिणपंथ की क्यों सरकारें हैं। वजह यह कि वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्राकृतिक संसाधनों का दोहन सबसे सुविधाजनक शर्तों पर करना चाहती हैं और ये दक्षिणपंथी सरकारें उनकी बेहतरीन एजेंट साबित होती हैं। यहां गठजोड़ बाजार की ताकतों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और राज्य के बीच है। अगर इन इलाकों को ध्यान से देखिए तो पता चलेगा क यहां बहुत से इलाकों में आदिवासी 50 फीसदी भी नहीं रह गए हैं। ऐतिहासिक रूप से यहां घुसपैठ हुई है, बाहर से लोग आए हैं। ऐसे में रमन सिंह को वोट देकर कौन सत्ता में पहुंचा रहा है, ये आदिवासी या कोई और...ये सोचने की बात। दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियां, दक्षिणपंथी धार्मिक सत्ता स्थापित करने वाली राजनीति और इनके साथ दमनकारी राज्य। यह सबसे मारक गठबंधन है। ये पूरा गठबंधन मार्क्सवाद का कट्टर विरोधी है। इन लोगों को उठाकर फेंका जा रहा है और कोई भी इनकी तरफ से बोलने वाला नहीं है। सिविल सोसायटी क्यों कमजोर है इन इलाकों में। जब विनायक सेन का मामला हुआ था तो छत्तीसगढ़ के भीतर से लोगों को जुटाना, खड़ा करना मुश्किल था। वजह साफ है कि यहां की सिविल सोसायटी सत्ता के साथ मिल गई है, दोनों का गठबंधन है। यह सिविल सोसायटी रंगी हुई है। आज वहां सिविल सोसायटी लोगों के संघर्ष के खिलाफ है।

आपका क्या मूल्यांकन है कि वाम दल यहां क्यों कमजोर है?

यही सबसे बड़ा सवाल है कि जहां आदिवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई सबसे क्रूरतम राज्य से लड़ रहे हैं वहां वाम क्यों नहीं है। परंपरागत वाम कहां है। माकपा तो है ही नहीं भाकपा है, लेकिन निहायत कमजोर। और ऐसी स्थिति में वे सशस्त्र वाम की शरण में हैं। ऐसा क्यों है कि परंपरागत वाम वहां सबसे ज्यादा दमित लोगों को अपील नहीं कर रहे। लोगों के सामने एक विकल्प नहीं पेश कर रहे है। इस सवाल का जवाब तो परंपरागत वाम को हमें देना होगा। क्यों वे हमलावर पूंजीवाद और उसके राज्य के साथ हुए बर्बर गठजोड़ के बीच पीस रही जनता के कवच के रूप में नहीं हैं। एमएल समूह तो तब भी इसे कह रहे हैं, लेकिन परंपरागत वाम को तो इसका बोध भी नहीं है। मुझे तो नहीं लगता। कैसे इन वंचितों का प्रतिनिधित्व किया जाए, इनके हकों की लड़ाई को आवाज दी जाए, क्या ये लोग सोच भी रहे हैं इस दिशा में। जो लोगों की भावनाएं है, अपेक्षाएं हैं और जो इन पार्टियों का सेटअप है, नजरिया है उनमें कोई तालमेल नहीं है। इन पार्टियों का यह केंद्रीकृत फैसला है कि किन मुद्दों को उठाना है, किन पर आंदोलन करना है। यह ढांचा इतना रुढ़ है कि इसमें स्वत:स्फूर्त मुद्दों का समावेश करने की गुंजाइश नहीं होती...यही हो रहा है। मेरे लिए यह बहुत निराशाजनक स्थिति है।

देश भर में अलग-अलग मुद्दों पर आंदोलन चल रहे हैं लेकिन वे वाम के नेतृत्व में नहीं है, कुडनकुलम से लेकर किसानों की आत्महत्या के खिलाफ। ऐसा क्यों कि वाम पार्टियों की इनमें भूमिका नहीं है?

यह अच्छी बात है कि लोग आंदोलन कर रहे हैं। इस पूंजी के आक्रमण को लोग चुनौती दे रहे हैं। ये आंदोलन आपस में नहीं जुड़े हुए हैं, यह हमारे लिए त्रासदी है। इसलिए देखिए कि आज के दौर में सत्ता से असंतुष्ट लोगों की तादाद संतुष्ट लोगों से ज्यादा है, फिर भी सत्ता उन्हें अपने लिए कोई चुनौती नहीं मानता। क्योंकि इन तमाम आंदोलनों का व्यापक राजनीतिक चुनौतिपूर्ण नेटवर्क नहीं है। लिहाजा दक्षिणपंथी आर्थिक ताकतों-राजनीतिक ताकतों का नापाक गठजोड़ तो बहुत मजबूत है आज के दौर में, लेकिन उसके बरक्स ऐसी एकता नहीं। यह संकट वामपंथ का है।

आज मध्य वर्ग अपने आदर्शवाद को छोड़ चुका है। वह संतुष्ट है, सत्ता के साथ-आर्थिक उदारीकरण के साथ कदम ताल करता हुआ। ऐसा पहले नहीं था।

पूंजीवाद क्या संकट में लगता है आपको...?

पूंजीवाद में इस हद तक तो संकट है कि वह अपने सिस्टम के भीतर के संकटों को हल नहीं कर पा रहा है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था संकट में है। बेरोजगारी बढ़ रही है। असंतोष बढ़ रहा है। उसका उत्पादन प्रणाली पूरी वित्तीय पूंजीवाद अब पूंजीवाद का सबसे उजागर रूप है। अंदरूनी संकट बढ़ रहा है। अमेरिका में जिस तरह से हाउसिंग इस्टेट बैठ गया, वह संकट का ही हिस्सा है। यह पूंजीवाद एक स्तर के बाद खुद को खड़ा नहीं रखा पाता उसी स्वरूप में। लेकिन जहां तक इसकी लोगों में अपील की बात है, उसे पूंजीवाद ने न सिर्फ और मजबूत किया है बल्कि सुदृढ़ भी। वह आज भी लोगों को भरमाने में कामयाब है। पूरी दुनिया में इसने अपनी पूछ बढ़ाई है।
पूंजीवाद लोगों को इस मामले में भरमा रहा है कि मैं, मैं और मैं ही मायने रखता हूं। सामूहिकता का भाव खत्म है। इस तरह से उसकी मशीनरी चल रही है। नीतिगत स्तर पर भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं बनता। कोई यह सवाल नहीं उठाता कि क्यों कुडनकुलम चाहिए, क्यों जैतापुर। पोस्को से कौडिय़ों के दाम हम अल्मूनियम निकालने की इजाजत देते हैं। बाहर की इनकार की, बर्बाद तकनीक हम लेने को तैयार होते हैं, क्यों। क्योंकि हमने अपने हित उस पूंजी को बेच रखे हैं। हम दुनिया के मैला ढोने वाले हैं। सदियों से हमने दलितों से मैला ढुलवाया और आज यह अपने विदेशी आकाओं के लिए कर रहे हैं।

पूंजीवाद की ग्राहता मध्यम वर्ग में तो बढ़ी है। आर्थिक उदारीकरण ने उसे अपनी गिरफ्त में लिया है। ऐसा पहले तो नहीं था?

कई बार मुझे यह भी लगता है कि हमारे यहां लोगों, विशेषकर मध्य वर्ग में यह भाव भी बढ़ता जा रहा है कि लोगों को मरने दो। एक तबके की आबादी वैसे भी बहुत ज्यादा है, मर गए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। एक बर्बर सोच काम कर रही है। गरीबों की मृत्यु से कोई उद्धेलित नहीं होता, यह कोई मुद्दा नहीं है। हमारा समाज सबसे अधिक बर्बरतापूर्ण है, हिंसक है। यही हिंसक सोच हमारी जाति प्रथा में परिलक्षित होती है। हमने कहा कि मैं ऊंची जाति का हूं, मुझे सारे सुखों का अधिकार है बाकी लोग नीचे रहें और मैं आनंद में। यह हमारे समाज की मूल भावना रही है, बराबरी और दया भाव नहीं।

क्या हमारे समाज की ये विसंगतियां वाम समझ पा रहा है...?

नहीं। पूरी तरह नहीं। जाति और लिंग (जेंडर) का रिश्ता, उसके जटिल अंतर्संबंध हम नहीं समझते। पहले तो लेफ्ट जाति को कोई चीज ही नहीं मानता था। मेरा तो शुरू से मानना रहा है कि भारत में आप वर्ग को समझ ही नहीं सकते जब तक आप जाति को नहीं समझते। और जाति को समझने के लिए जेंडर (लिंग) को नहीं समझते। यानी हम अपने समाज नहीं समझते। हम यह सोचते हैं कि हमे इस वर्ग पर फोकस करना, इस वर्ग में काम करना है, हम इस सेक्शन में संघर्ष करेंगे तो ठीक हो जाएगा। ऐसा करने पर हम पूरे समाज के बारे में नहीं सोचते और न उनकी आपस की कडिय़ों को नहीं जोड़ते।

अंबेडकर और मार्क्स के बीच कोई रास्ता बनता दिखाई देता है आपको?

अभी तो नहीं। वाम ने दलितों और गैर दलितों के बीच कोई पुल बनाने की बात नहीं की। कभी हमने (वाम) ने भारतीय समाज को समझने के लिए जाति को एक महत्त्वपूर्ण कड़ी नहीं माना। फिर क्रांति कहां आएगी। क्रांति जाति की जकडऩों को तोडऩे में आएगी। हमें क्रांति अपने यथार्थ में ही लानी है। जो सर्वहारा को हम एक करना चाहते हैं, वह तो बंटा हुआ है। इस मामले में अंबेडकर बहुत अकलमंद थे, जब उन्होंने कहा कि यह श्रमिकों का विभाजन है श्रम का नहीं।

भारतीय वामपंथ के सामने क्या बड़ी चुनौतियां हैं?

बड़ी चुनौतियां हैं वामपंथ के सामने। हमारा समाज सबसे ज्यादा गैरबराबरी वाला है। यहां की पितृसत्ता बहुत मजबूत है औऱ जाति भी बहुत मजबूत। यहां के वामपंथ ने अगर वर्ग के सवाल को उठाया तो जाति को छोड़ दिया और जेंडर के सवाल को तो पूरी तरह से छोड़ दिया। मजदूर में मर्द मजदूरों पर जोर दिया और महिला मजदूरों के सवालों और घर में पुरुष से बराबरी के सवाल को छोड़ दिया। वाम ने सोचा कि महिला मुक्ति के सवाल वर्ग संघर्ष के साथ हल होंगे, लिहाजा उन्हें प्राथमिकता नहीं दी। कॉमरेड पुरुष और उसकी कॉमरेड पत्नी के बीच पितृसत्तात्मक तनाव को हल करने पर ध्यान नहीं दिया। न जाने कितनी बार कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर कॉमरेड पति की पिटाई पर कार्रवाई की मांग पत्नियों ने की। सीधे पूछा, मेरा कॉमरेड पति पिटाई करता है, क्या उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इस सवाल पर खामोशी तब भी थी और आज भी है। यही वजह है कम्युनिस्ट पार्टियों के शीर्ष मंच पर गिनी-चुनी महिलाएं पुरुष पाती हैं। पार्टी के भीतर पर खुला स्पेस कम है। यही वजह है कि नारीवादी आंदोलन ने अलग अपनी लड़ाई चलाई। जाति और पितृसत्ता दोनों के खिलाफ जो लड़ाई वामपंथ को चलानी चाहिए थी वह नहीं चली। यह बहुत बड़ी कमजोरी रही।

क्या यही वजह है कि सामंती कुरीतियों के खिलाफ मजबूत वाम सांस्कृतिक आंदोलन का अभाव दिखाई देता है?

रेडिकल मूवमेंट तो छोड़ दीजिए, सोशल मूवमेंट के बारे में भी कोई पहल करने को तैयार नहीं। एक दौर में इन कुरीतियों के खिलाफ मजबूत वाम सांस्कृतिक धारा मौजूद थी। आज वह भी नहीं है। कतारों से लेकर आधार क्षेत्र में वही दहेज, टीका, भेदभाव फैला हुआ है। क्या ये सारी चीजें नारीवादी आंदोलन के लिए छोड़ दी गई है। वामपंथ ने खुद को नारीवादी विमर्श से अलग कर लिया है। ऐसी असंवेदनशीलता क्यों? पितृसत्ता की छाया या और कुछ! वामपंथ कोई प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने, उसे फैलाने को लेकर भी गंभीर नहीं है। यह गंभीर चिंता का विषय है।

नारीवादी विमर्श की इसमें क्या भूमिका है?

अभी दिल्ली में सामूहिक बलात्कार कांड के खिलाफ जो आंदोलन सामने आया है उसकी सकारात्मक बात यह है कि इसके केंद्र में वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील नेतृत्व की स्वीकार्यता बनी। इसमें जिस तरह से कविता कृष्णन का नेतृत्व सामने आया है, वह भविष्य के अच्छे संकेत देता है। अगर वह पॉलित ब्यूरो तक इसके भाव को संप्रेषित करे, उसकी जगह बनाए तो शायद कुछ रद्दोबदल की शुरुआत हो। लेकिन लड़ाई अभी बहुत लंबी है। जेंडर का सवाल, जाति का सवाल, संघर्शषील जनता से सीधा जुड़ाव - आज सबसे बड़ी चुनौती है वाम के लिए। पार्टी के ढांचे क्या इतने संकुचित हैं कि वह नीचे से उठ रहे स्वत:स्फूर्त आंदोलनों को अपने में जगह नहीं दे पाते। इन्हें कैसे लचीला बनाया जा सकता है कि जनता के आंदोलनों के वे स्वत: स्फूर्त नेता कहलाए...यह भी एक बड़ी चुनौती है। नारीवाद के सवालों को, औरतों की बराबरी औऱ बैखौफ आजादी का स्वाभाविक चैम्पियन वामपंथ ही होना चाहिए। दिक्कत यह है कि इन सवालों की जगह मौजूदा वाम ढांचे में नहीं है। और है तो भी कितनी यह अभी पक्का नहीं। 

(समयांतर के फरवरी, 2013 अंक में प्रकाशित इस साक्षात्कार को हाशिया के लिए उपलब्ध कराने और इसे यहां प्रकाशित करने की इजाजत देने के लिए हम इसके संपादक पंकज बिष्ट के आभारी हैं)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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