हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामला: कुछ तकलीफदेह सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/27/2013 12:00:00 PM


नव-उदारवाद हर चीज को बाजार में बेचे जाने लायक उत्पाद मानता है और यह उपभोक्तावादी जज्बे वाले, आपस में होड़ में लगे व्यक्तियों को महत्व देता है. ताकतवरों के लिए औरतें उनकी तृप्ति के लिए उपभोग की वस्तु हैं. व्यापक बहुसंख्या के लिए, नव-उदारवाद द्वारा प्रोत्साहित की जा रही होड़ की भावना उनमें असुरक्षा पैदा कर रही है और इसके नतीजे में शक्तिहीनता की एक जबर्दस्त भावना उनमें भर रही है. एक औरत का बलात्कार शक्तिहीनता की इस भावना पर विजय का प्रतीक है. दिल्ली में युवा फिजियोथेरेपी इंटर्न के हमलावर और बलात्कारियों को इस रोशनी में जरूर देखा जाना चाहिए. उनको कानून के मुताबिक सजा जरूर होनी चाहिए, लेकिन इसी के साथ यह भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि इससे बीमारी का इलाज नहीं होगा. आनंद तेलतुंबड़े का विश्लेषण. ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित. अनुवाद: रेयाज उल हक

दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को एक 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी इंटर्न पर क्रूर हमले और सामूहिक बलात्कार ने देश भर में क्रुद्ध प्रतिक्रिया को जन्म दिया और इसने महिलाओं के खिलाफ आम तौर पर बढ़ते यौन हमले और खास तौर पर बलात्कारों के मुद्दे को प्रमुखता दिलाई. इसने आम तौर पर संवेदनहीन प्रशासन को कुछ असाधारण कदम उठाने पर बाध्य किया जैसे कि महिला को हवाई जहाज से सिंगापुर भेजा गया और फास्ट ट्रेक अदालत में उत्पीड़कों पर मामला चल रहा है. बदकिस्मती से पीड़िता को बचाया नहीं जा सका. अब जब वो जा चुकी है और मुद्दा टीवी पर्दों से गायब हो चुका है, तो इस पर धैर्य के साथ सोचा जा सकता है और कुछ सवाल उठाए जा सकते हैं जो उग्र विरोधों की लहर में दबे रह गए थे. मिसाल के लिए, वे दलित जो अपनी बेटियों के बलात्कार और हत्या की पीड़ा को अकेले ही भुगतते हैं, बलात्कार के लिए चिंता पर अचानक फूटे इस गुस्से से परेशान हुए, मानो देश में बलात्कार कोई असाधारण घटना हो. उन्होंने अपना गुस्सा अपने ब्लॉगों और ई-मेल समूहों के जरिए निकाला और पूछा कि खैरलांजी के ग्रामीणों द्वारा पूरे उत्सव के साथ किए गए सुरेखा और प्रियंका भोतमांगे के बलात्कार और हत्या पर क्यों इन मोमबत्ती जलाने वालों ने आंसू का एक कतरा भी नहीं बहाया. तब इन टीवी द्वारा प्रेरित आंदोलनकारियों का चरित्र असल में क्या है? क्या वे सचमुच सामाजिक बुराइयों को दूर करने का मकसद पूरा कर रहे हैं या उन्हें हल्का बना रहे हैं? मिसाल के लिए इन विरोध प्रदर्शनों ने स्त्रियों के सम्मान के लिए क्या किया?

सिर्फ निर्भया क्यों?

बलात्कार हमारे माहौल का हिस्सा हैं. उनकी वास्तविक घटनाओं का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही सामने आ पाता है. इसकी वजह उनके साथ जुड़ा हुआ सामाजिक कलंक है. ज्यादातर ऐसी घटनाओं को पीड़िता और उसके परिवार वाले ही दबा देते हैं. कमोबेश पूरी दुनिया में ऐसा होता है. मिसाल के लिए अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (1995) मानता है कि यौन हिंसा और बलात्कार, खास तौर से, सबसे कम रिपोर्ट किया जाने वाला अपराध है. इस तरह, सिर्फ कुछ घटनाएं ही पुलिस रिकॉर्ड में आ पाती हैं और उनकी गिनती होती है. और तब भी, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा इस गिनती के आधार पर, भारत में बलात्कार हरेक 22 मिनट पर एक की दर से होते हैं. 2011 में कुल रिपोर्ट किए गए बलात्कार के मामले 24,206 थे. 1971 में 2487 से, जब एनसीआरबी ने बलात्कार के मामलों को दर्ज करना शुरू किया था, इसमें 873 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है! इस मापदंड पर तर्कसंगत रूप से संदेह हो सकता है क्योंकि देश में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, खास तौर से 1991 में हुए मुक्त बाजार सुधारों के नतीजे में लोगों के रवैए, मूल्यों, मान्यताओं और व्यवहारों में बदलाव आए हैं. लेकिन अगर कोई हालिया अवधि पर गौर करे, यानी 1991 से अब तक की अवधि पर, तो बलात्कार की घटनाओं में तेजी से वृद्धि दिखाई देगी. 1991 में 10,410 मामलों से 2011 में यह आंकड़ा 24,206 पर पहुंच गया. यह 230 फीसदी की वृद्धि है. दिल्ली भारत में बलात्कारों की राजधानी रही है, जहां यह क्रूर बलात्कार हुआ था. उक्त दो वर्षों के लिए दिल्ली के आंकड़े क्रमश: 214 और 572 हैं, यानी दो दशकों में 267 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है. इससे पहले इनमें से किसी भी घटना ने जरा सी भी सार्वजनिक प्रतिक्रिया पैदा नहीं की थी. सवाल उठता है कि सिर्फ इस घटना ने ऐसा जनाक्रोश क्यों पैदा किया?

पीड़ित लड़की पर की गई क्रूरताएं इसकी वजह बताई जा सकती हैं. लेकिन क्रूरता तो बलात्कार का एक अभिन्न हिस्सा है और ज्यादातर बलात्कारों से लगभग समान मात्रा में क्रूरता जुड़ी होती है. ज्यादातर मामलों में अपराध के सबूत मिटाने के लिए पीड़िता की हत्या कर दी जाती है. अगर हम ऐसे ज्यादा मामलों के बारे में नहीं जानते तो ऐसा इसलिए नहीं है कि वे कम क्रूर थे, बल्कि सिर्फ इसलिए क्योंकि मीडिया में कभी वे सुर्खी नहीं बने. अगर किसी को लगता है कि बढ़ रहे बलात्कार के मामलों के खिलाफ लोगों का गुस्सा स्वाभाविक रूप से बढ़ते हुए उस समय उस बिंदु पर पहुंच गया था, तब भी यह सवाल बचा रह जाता है कि तब क्यों उसके बाद हुए बलात्कारों को (और उनकी संख्या बहुत बड़ी है) सामान्य घटना के रूप में नजरअंदाज कर दिया गया. यह तथ्य कायम है कि हाल के वक्त में लोगों के भड़के गुस्से की तरह, इस मामले को असाधारण बनाने में मीडिया की एक बड़ी भूमिका थी.

जाति से उभरता अलगाव

जबकि मीडिया की बड़ी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, खबरों पर लोगों की प्रतिक्रिया भेदभावपरक है. जैसे कि अगर हम दलित महिला के बलात्कार के मामले को लेते हैं. मीडिया ने बहुत दिन पहले भी नहीं और दिल्ली से बहुत दूर भी नहीं, पड़ोस के हरियाणा में दलित महिलाओं के बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के बारे में बताया. मीडिया ने अकेले एक महीने में 19 बलात्कारों की चिंतित कर देने वाली परिघटना पर ध्यान दिया और उसने कुछ मात्रा में बहस-मुबाहिसों को जन्म दिया. लेकिन यह खुद दलितों को छोड़ कर जनता की प्रतिक्रिया को उभारने में नाकाम रहा. मीडिया पर दलितों के खिलाफ भेदभाव बरतने का आरोप लगाया जा सकता है, लेकिन इसकी व्याख्या इसके कारोबारी हितों के संदर्भ में की जा सकती है. बुनियादी तौर पर आज मीडिया एक कारोबार है और कारोबारी तर्क दलितों के खबरों के पक्ष में नहीं होगा क्योंकि वे न तो पाठकवर्ग/दर्शकवर्ग का निर्माण करते हैं और न ही व्यापक समाज को आकर्षित करने के लिए उनमें सनसनी के लिहाज से कोई मूल्य होता है. हालांकि दलितों की परेशानियों के प्रति समाज की उदासीनता साफ तौर पर इसके उस जातीय पूर्वाग्रहों से जोड़ी जा सकती है, जो दलितों के खिलाफ अब भी कायम हैं. पूरी दुनिया में बहुत कम दर्ज किए जाने वाले अपराध के रूप में बलात्कार भारत में और भी कम दर्ज किया जाता है और दलितों के मामले में तो काफी कम दर्ज किया जाता है, क्योंकि उनमें बदले के डर की वजह से प्रभुत्वशाली जातियों से आनेवाले उत्पीड़कों से दुश्मनी मोल लेने का साहस नहीं होगा, और अगर वे ऐसा करने का साहस जुटा भी लें तो पुलिस उन्हें ऐसा करने से रोक देगी. इसके बावजूद, व्यापक समाज के मुकाबले दलित औरतों के बलात्कार की घटनाओं की दर में तेज वृद्धि दिख रही है.

दलितों का उत्पीड़न 1991 से लगातार बढ़ रहा है और मौजूदा समय में हरेक डेढ़ मिनट में एक घटना (2011 में 33,719) हो रही है, लेकिन वो कभी भी लोगों की प्रतिक्रिया पैदा कर पाने में सक्षम नहीं रही हैं. यहां तक कि जज्झर जैसे उत्पीड़न में जिसमें पांच दलितों को दिन दहाड़े सवर्ण हिंदू भीड़ द्वारा पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पीट-पीट कर मार डाला गया था, या गोहाना में जहां योजना बना कर और पुलिस की निगरानी में दलितों के 60 घर लूटे और जलाए गए थे, ऐसा नहीं हुआ. फिर परमकुडी जैसा मामला जहां अकारण ही पुलिस ने दलित भीड़ पर फायरिंग की और इसके बाद पीट-पीट कर छह दलित नौजवानों को मार डाला. या फिर धर्मापुरी को याद करें जहां दलितों के 268 घरों को लूट कर जला दिया गया, और खैरलांजी को जहां एक परिवार के चार सदस्यों को यातनाएं दे-दे कर मार डाला गया और उनमें से दो महिलाओं-मां और बेटी की निर्मम हत्या के पहले उनके साथ संभवत: सामूहिक बलात्कार किया गया. ये सारी घटनाएं बड़े पैमाने पर लोगों में गुस्से को पैदा कर पाने में नाकाम रहीं. क्या वे दिल्ली बलात्कार मामले से किसी मायने में कम भयावह थीं? मिसाल के लिए, खैरलांजी के मामले में, महाराष्ट्र और इसके बाहर महीने भर चले दलितों के स्वत:स्फूर्त विरोधों के बावजूद तथाकथित प्रगतिशील तक उनमें शामिल नहीं हुए. इसलिए दिल्ली बलात्कार मामले के खिलाफ संपन्न तबके के इस गुस्से से दलितों का खुद को अलग महसूस करना स्वाभाविक था. इस अलगाव को समझ पाने का कोई उपाय नहीं था क्योंकि महिला की पहचान को छुपाए रखा गया, जब तक कि 7 जनवरी को ब्रिटेन के डेली मिरर में लड़की के पिता ने इसे उजागर नहीं किया, जिसमें लड़की की जातीय पहचान दी गई थी. ऐसी भी अफवाहें थीं कि कम से कम एक बलात्कारी दलित था. जातीय पहचान के बारे में ऐसी सूचनाओं के साथ पूरे घटनाक्रम को अचानक एक संदर्भ मिल गया. कैसी शर्म की बात है कि ऐसे क्रूर अपराधों के वक्त भी हम अपनी जातीय पहचानों से ऊपर नहीं उठ सकते.

समस्या पर नियंत्रण

ये विरोध प्रदर्शन बलात्कारों की भारी घटनाओं और हाल के वर्षों में इनके बढ़ने को लेकर समाज के भीतर आत्मविश्लेषण को जन्म दे सकते थे, लेकिन इनमें आक्रामक रूप से तुरत-फुरत समाधान पेश किए गए. इसके तहत डराने वाली सजा के रूप में बलात्कारियों के रासायनिक बधियाकरण या फांसी की सजा का प्रस्ताव था, जो दक्षिणपंथी राजनीति को मजबूत कर रहा था. इसमें कोई संदेह नहीं है कि बलात्कार के मामलों में दोषी साबित ठहराए जाने (कन्विक्शन) की बेहद कम दर को देखते हुए इंसाफ मुहैया करने वाली व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किए जाने की जरूरत है, लेकिन यह अंदाजा लगाना कि फांसी और अंगों को काटने जैसी कठोर सजाएं अपराधियों को ऐसे अपराध करने से रोकेंगी, पूरी तरह सतही है. अगर ऐसा हुआ होता, तो एक नाबालिग के बलात्कार के लिए धनंजय चटर्जी को दी गई फांसी ने बलात्कार के मामलों में, कम से कम पश्चिम बंगाल में, कमी लाई होती. तथ्य ये है कि असल में बलात्कार बढ़े हैं. इंसाफ मुहैया कराने वाली व्यवस्था की तरफ से संदेश यह जाना चाहिए कि अपराध पर निश्चित रूप से सजा मिलेगी, जो कि खुद ही अपराधी को अपराध करने से रोकेगी. आज अपराधी इसको लेकर आश्वस्त महसूस करते हैं कि वे सजा से बच सकते हैं चाहे वो जिस भी मात्रा में हो. कानूनसम्मत अमानवीय सजाएं निचले तबके के लिए सिर्फ और अधिक नाइंसाफी ही लाएंगी, जबकि ऊपरी तबका दोषी ठहराए जाने से हर हाल में बचता रहेगा.

बलात्कार पूरी दुनिया में व्याप्त पितृसत्ता की विचारधारा के साथ अंतरंगता के साथ जुड़े हुए हैं, जिसे निश्चित तौर पर उजागर करना जरूरी है. और ये पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियां विभिन्न समाजों की सांस्कृतिक विशिष्टताओं में थोड़े-बहुत फर्क के साथ संगीन हो जाती हैं. मिसाल के लिए भारत में परिवार के भीतर यौन उत्पीड़न व्याप्त हैं, क्योंकि यहां तक कहा जाता है कि देवता भी ऐसा करते हैं. असल में, अब भी प्रचलित देवदासी परंपरा बलात्कार को पवित्रता का जामा पहनाती है. दलित महिलाओं के साथ सजा के डर के बिना बलात्कार होते हैं, मानो दलित तो अपमानित किए जाने के लिए ही हैं. नई दुल्हनों को सामंतों को पेश किए जाने का रिवाज अब भी कुछ निश्चित इलाकों में चल रहा है. अगर प्रभावशाली संस्कृति में बलात्कार को ऐसी मौन स्वीकृति है, अगर यह औरतों को मर्दों के मातहत मानती है, और अगर न्यायिक व्यवस्था को पैसे के बूते मोड़ा जा सकता है, तो बलात्कार होते रहेंगे और बेधड़क होते रहेंगे. इसके बावजूद हाल के वर्षों में बलात्कार की घटनाओं के बढ़ने का रूझान क्या दिखाता है, जब भारत को एक आधुनिक हो रहा देश माना जा रहा है? क्या नव-उदारवादी विचारधारा इसके लिए जिम्मेदार है? नव-उदारवाद हर चीज को बाजार में बेचे जाने लायक उत्पाद मानता है और यह उपभोक्तावादी जज्बे वाले, आपस में होड़ में लगे व्यक्तियों को महत्व देता है. ताकतवरों के लिए औरतें उनकी तृप्ति के लिए उपभोग की वस्तु हैं. व्यापक बहुसंख्या के लिए, नव-उदारवाद द्वारा प्रोत्साहित की जा रही होड़ की भावना उनमें असुरक्षा पैदा कर रही है और इसके नतीजे में शक्तिहीनता की एक जबर्दस्त भावना उनमें भर रही है. एक औरत का बलात्कार शक्तिहीनता की इस भावना पर विजय का प्रतीक है. दिल्ली में युवा फिजियोथेरेपी इंटर्न के हमलावर और बलात्कारियों को इस रोशनी में जरूर देखा जाना चाहिए. उनको कानून के मुताबिक सजा जरूर होनी चाहिए, लेकिन इसी के साथ यह भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि इससे बीमारी का इलाज नहीं होगा.

वर्धा हिंदी विवि में अध्यापक के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न के आरोप

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/27/2013 02:10:00 AM

हालांकि यह रिपोर्ट ज्यादा तथ्यपूर्ण ढंग से और अधिक व्यवस्थित/औपचारिक तरीके से भी लिखी जा सकती थी, और ऐसा होता तो ज्यादा बेहतर होता, लेकिन इसके बावजूद अपने मौजूदा रूप में भी इस रिपोर्ट का प्रकाशित होना जरूरी है. यह वर्धा स्थित इस विवि के भीतर छात्र विरोधी, तानाशाह, गैर लोकतांत्रिक, स्त्री विरोधी, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक प्रशासन के चेहरे को एक बार फिर उजागर करती है. यह कैंपस के और उसके बाहर व्यापक समाज के जनवादी और प्रगतिशील ताकतों की जिम्मेदारी है कि पीड़िता के लिए इंसाफ को सुनिश्चित किया जाए और विवि प्रशासन में ऐसे आमूल बदलाव किए जाएं कि वहां छात्रों और व्यापक जनता के हित में एक जनवादी, लैंगिक न्यायपरस्त, सामाजिक न्याय पर आधारित अकादमिक माहौल कायम हो सके. प्रस्तुत है ई-मेल के जरिए प्राप्त हुई यह रिपोर्ट.
 
हमेशा विवादों में रहनेवाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में आजकल एक अध्यापक द्वारा एक छात्रा के यौन-उत्पीड़न का मामला दबे मुंह चर्चा में है। साहित्य विभाग के एक युवा असिस्टेंट प्रोफेसर ने स्त्री अध्ययन विभाग की एक छात्रा को पढ़ाने के बहाने अपने घर बुलाकर उसके साथ कई बार शारीरिक छेड़छाड़ की और चुप रहने की धमकी भी दी। यहीं नहीं इस अध्यापक ने अपने प्रभावों का इस्तेमाल करके उस लड़की को एम.ए. कोर्स में फेल भी करा दिया। यह अध्यापक इसी विश्वविद्यालय में साहित्य विभाग का पूर्व छात्र रहा है और छात्र जीवन से ही अपनी लंपटई और कुकर्मों के लिए बदनाम है। सूत्रों की मानें तो इसके पहले भी यह कई लड़कियों के साथ ऐसे कुकृत्य कर चुका है। यह अध्यापक आए दिन लड़कों के हॉस्टल जाकर उनके साथ शराब-सिगरेट पीता हुआ पाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह आदमी अपने विभाग में स्त्री-विमर्श का टॉपिक पढ़ाता है। 


भुक्तभोगी लड़की द्वारा शिकायत करने के बाद महिला सेल में अभी इसकी जांच चल रही है। लेकिन पूरे कैंपस को पता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति, जो अपने स्त्री-विरोधी और दलित-विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने लगातार पड़ते बाहरी दबाव के बाद महिला सेल को यह निर्देश दिया है कि इस मामले को रफा-दफा कर दिया जाए। महिला सेल की चल रही ढुलमुल जांच-प्रकिया को देखते हुए यह बात सच लग रही है। कैंपस में सबको यह पता है आरोपी अध्यापक कुलपति के सामने जाकर अपनी गलती स्वीकार कर चुका है और पैर पकड़कर माफी भी मांग ली है। लड़की अल्पसंख्यक समुदाय की है और गरीब परिवार से है जबकि आरोपी ब्राह्मण वर्ग से है और इसका श्वसुर इस यूनिवर्सिटी में कर्मचारी रह चुका है। वह भी इस केस को खत्म करवाने के काम में जुटा हुआ है। कुछ लोग पैसे के लेन-देन की बात भी कह रहे हैं। बाकी इस वक्त विश्वविद्यालय के अधिकांश ब्राह्मण प्राध्यापक, कर्मचारी और छात्र आरोपी अध्यापक के समर्थन में खड़े हैं। कुछ प्रगतिशील छात्र-छात्राओं ने लड़की के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है। लेकिन कुलपति या महिला सेल पर उसका कोई असर नहीं है। महिला सेल की अध्यक्षा साहित्य विभाग की हैं और गर्ल्स हॉस्टल की वार्डेन भी हैं। वार्डेन साहिबा केवल लड़कियों को परेशान करने और उनको सताने के लिए जानी जाती हैं। इस कैंपस में लड़कियां पहले से ही सुरक्षित नहीं हैं और इस घटना के बाद उनमें और डर व्याप्त है । आरोपी अध्यापक के खिलाफ जांच जारी है लेकिन वह अभी भी कक्षाएँ ले रहा है, जो कि गैर-कानूनी है।इस बीच वह जांच कमेटी के कुछ सदस्यों के घर जाकर चाय-नाश्ता भी कर चुका है।

इस घटना से आम छात्र-छात्राओं में काफी आक्रोश है। कैम्पस के बाहर भी माहौल गरम है। लेकिन इस विश्वविद्यालय में केवल एक ही कानून चलता है और वह है कुलपति विभूति नारायण राय का और उनकी कृपा आरोपी अध्यापक पर है। सो मामला अब तक ठंडे बस्ते में है।

2010 दिसंबर में भी साहित्य विभाग के एक बूढ़े प्रोफेसर, जो विभागाध्यक्ष और डीन भी था, उसने एक युवा महिला कर्मचारी को अपने घर बुलाकर उसके साथ रेप करने की असफल कोशिश की थी। चूंकि वो प्रोफेसर कुलपति का पुराना दोस्त और 'वर्तमान साहित्य' में इनके साथ संपादक मण्डल में था, रोज शाम को कुलपति के साथ दारू पीता है, मॉर्निंग वाक करता है। सो वह बच गया। कुलपति ने पीड़ित लड़की को झांसा दिया की वह चुप हो जाएगी तो उसको परमानेंट नौकरी दे देंगे। वो डरकर चुप हो गई, फिर उसको ही नौकरी से निकाल दिया गया। इसके अलावा भी यहाँ यौन उत्पीड़न के कई किस्से हैं, लेकिन कोतवाल साहब के आतंक के चलते किसी की हिम्मत नहीं कि कोई शिकायत करे या आवाज़ उठाए। जो बोलेगा वो मारा जाएगा।

हैदराबाद धमाके: रिहाई मंच के सात सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/25/2013 07:37:00 PM

अफजल की फांसी पर उठे सवालों को दबाने के लिए तो नहीं हुआ हैदराबाद
धमाका इंडियन मुजाहिदीन का नाम उछालकर सांप्रदायिक हिंदू वोट बैंक की फिराक में कांग्रेस शिंदे के भगवा आतंकवाद पर दिए बयान पर स्थिति स्पष्ट करें मुलायम


लखनऊ, 25 फरवरी 2013

रिहाई मंच ने हैदराबाद धमाकों में पूछताछ के नाम पर मुस्लिम युवकों की अवैध गिरफ्तारियों और उपीड़न को यूपीए सरकार की मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिक हिंदु वोटों के लिये की जा रही राजनीतिक कवायद करार दिया है। संगठन ने शिंदे को नया हिंदू हृदय सम्राट घोषित करते हुए कहा कि शिंदे का यह कहना कि हैदराबाद में हुए विस्फोट अफजल गुरु और कसाब की फांसी की प्रतिक्रिया थी से संदेह पैदा होता है कि इस घटना के पीछे स्वयं सरकार का हाथ है जो धमाकों से अफजल की फांसी पर उठे सवालों को दबाना और खुद को भाजपा से ज्यादा हिंदुत्ववादी साबित करना चाहती है। मंच ने केंद्र में यूपीए सरकार को समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव से भी शिंदे के भगवा आतंकवाद सम्बंधी दिये गये बयान से पीछे हटने पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

हैदराबाद धमाकों के बाद मुस्लिम युवकों के उत्पीड़न पर लखनऊ स्थित कार्यालय पर आयोजित बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के महासचिव पूर्व पुलिस महानीरीक्षक एस. आर. दारापुरी ने कहा कि हैदराबाद धमाकों के ठीक पहले जिस तरह शिंदे हिन्दुत्वादी संगठनों की आतंकवाद में संलिप्तता के अपने बयान से पीछे हटे और भाजपा नेताओं के साथ बैठक की उससे संदेह होता है कि ये धमाके भाजपा और संघ परिवार को खुश करने के लिये गृह मंत्री और उनके मंत्रालय के अधीन खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा करवाया गया और मुस्लिम समुदाय से जोड़कर इंडियन मुजाहिदीन इत्यिादि का नाम लिया जाने लगा ताकि हिंदुत्ववादी संगठन शक के दायरे से बाहर हो जाएं। आतंकवाद के आरोपों में घिरे संघ परिवार को क्लीन चिट देने की यूपीए सरकार की इस रणनीति की तस्दीक इससे भी हो जाती है कि घटना के ठीक बाद हिंदुत्वादी संगठनों ने हैदराबाद बंद का आह्वान किया तो दूसरी तरफ भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी को पाकिस्तान से आतंकी संगठनों के धमकी भरे कथित फोन भी आने लगे ताकि भाजपा और संघ की भूमिका पर शक न किया जाए।

रिहाई मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मो शुऐब ने कहा कि इससे साफ हो जाता है कि इंडियन मुजाहिदीन गृह मंत्रालय का ही कागजी संगठन है जिसका नाम उछाल कर सरकार बार-बार अपने राजनीतिक संकट हल करती है। उन्होंने शक जाहिर किया कि जिस तरह भटकल और आजमगढ़ के कुछ युवकों का नाम उछाला जा रहा है, जिन्हें संगठन मानता है कि खुफिया एजेंसियों के पास ही हैं, को बाटला हाऊस की तरह किसी फर्जी मुठभेड़ में मार कर हैदराबाद विस्फोट की गुत्थी सुलझा लेने का दावा किया जाए।

रिहाई मंच ने हैदराबाद विस्फोटों की जांच को गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों द्वारा भटकाने का आरोप लगाते हुये शिंदे से 7 सवाल पूछे हैं।

1- धमाकों के ठीक बाद दिल्ली स्पेशल सेल द्वारा चार कथित आईएम सदस्यों की कथित इंट्रोगेशन रिपोर्ट मीडिया को क्यों और कैसे लीक कर दी गयी। क्या ऐसा कर के जांच को एक खास दिशा में मोड़ने की कोशिश की गयी?

2- हिंदुत्ववादी संगठनों को जांच के दायरे से क्यों बाहर रखा गया। जबकि हैदराबाद समेत देश के कई हिस्सों में हुये आतंकी विस्फोटों में उसकी भूमिका उजागर हुई है?

3- क्या ऐसा गृह मंत्री द्वारा भाजपा और संघ परिवार के दबाव में किया जा रहा है? या गृह मंत्री स्वेक्षा से संघ परिवार के कथन- सभी मुसलमान आतंकी नहीं होते लेकिन सभी आतंकी मुसलमान होते हैं- को मानते हुए सिर्फ मुसलमानों को आरोपी बना रहे हैं?

4- कथित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन को इस घटना में संलिप्त बताने का आधार विस्फोट का मोडस ऑपरेंडी- आईईडी, डेटोनेटर, जिलेटिन की छड़ो का इस्तेमाल बताया जा रहा है। जबकि जिन आतंकी विस्फोटों में हिंदुत्ववादी संगठनों की संलिप्तता उजागर हुई है उनमें भी इन्हीं विस्फोटक तत्वों का इस्तेमाल हुआ है। ऐसे में जांच एजेंसियों द्वारा केवल मोडस ऑपरेंडी के तर्क के से सिर्फ कथित मुस्लिम संगठनों को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराने को जांच एजेंसियों के साम्प्रदायिक जेहनियत का नजीर क्यों न माना जाए?

5- मक्का मस्जिद धमाकों में कोर्ट से बरी और राज्य सरकार द्वारा मुआवजा और आतंकवाद में संलिप्त न होने का प्रमाणपत्र पाए मुस्लिम युवकों को जांच एजेंसियों द्वारा क्यों पूछताछ के नाम पर उठाया जा रहा है? क्या केंद्र सरकार इन मुस्लिम युवकों को निर्दोष बताने वाली अदालत के फैसले से सहमती नहीं रखती?

6- अगर सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे तब जांच एजेंसियों द्वारा एक दाढ़ी वाले व्यक्ति को साइकिल बम रखने का फुटेज प्राप्त होने का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?

7- नवम्बर 21, 2002 को हैदराबाद में हुए कथित आतंकी विस्फोट के नाम पर 22 नवम्बर को उप्पल, हैदराबाद के मो आजम को और 23 नवम्बर को करीमनगर के अब्दुल अजीज नाम के युवक को उनके घरों से उठा कर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया। वहीं 12 अक्टूबर 2005 को हैदराबाद के एसटीएफ आफिस में हुए कथित हमले के आरोप में यजदानी नामक हैदराबादी युवक को 2006 में दिल्ली में फर्जी मुठभेड़ में पुलिस ने हत्या कर दी। सरकार इन फर्जी मुठभेड़ों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे?


राजीव यादव, शाहनवाज आलम
09452800752, 09415254919

अस्मिता की राजनीति असली संघर्षों से ध्यान बंटाती हैं: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/23/2013 02:26:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े आइआइटी खड़गपुर में प्रबंधन के प्रोफेसर हैं. उन्होंने भारत में जाति, वर्ग, राजनीतिक अर्थशास्त्र और लोकतांत्रिक राजनीति पर क़रीब दो दर्जन किताबें लिखी हैं. उन्हें देश और दुनिया में मौलिक प्रस्थापनाओं के लिए जाना जाता है और काफी सम्मान के साथ पढ़ा-सुना जाता है. वे इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के महत्वपूर्ण लेखक हैं. परसिस्टेंस ऑफ़ कास्ट, ऑन इम्पेरियलिज्म एंड कास्ट और ग्लोबलाइजेसन एंड दलित उनकी कुछ चर्चित किताबें हैं. तेलतुंबड़े के व्यक्तित्व में सिद्धांत और लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़ाव का एक अद्भुत सामंजस्य है. वे राजनीतिक अर्थशास्त्र की अनदेखी करने वाले अस्मिता की राजनीति की आलोचना करते हैं. अंग्रेजी और मराठी पाठकों के लिए वे जाने-पहचाने नाम हैं. समयांतर के नियमित स्तंभकार और पत्रकार भूपेन सिंह ने भारत में जाति और मार्क्सवाद से जुड़े सवालों पर बातचीत की. यह साक्षात्कार समयांतर के फरवरी, 2013 के विशेषांक में प्रकाशित हुआ है और साभार यहां पोस्ट किया जा रहा है.


जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक कारणों को आप कैसे देखते हैं?

भारतीय जाति व्यवस्था की गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कई विद्वानों ने की है लेकिन उनके बीच इस सिलसिले में कोई एक राय नहीं है. एक तरह का श्रेणीक्रम या स्तरीकरण हर प्राचीन समाज में रहा है, इसके आधार पर कुछ लोग भारतीय जाति व्यवस्था की विशिष्टता को नकारने की कोशिश करते हैं,लेकिन इसे उनकी अज्ञानता या जान-बूझकर बनाई गई मान्यता के तौर पर नकारा जाना चाहिए. जाति व्यवस्था की विशिष्टता इसके निरंतर अस्तित्व में बने रहने से जुड़ी है. इतिहास के एक दौर में बाक़ी समाज इस तरह के श्रेणीक्रम से ख़ुद को मुक्त करने में कामयाब हो पाए लेकिन जाति व्यवस्था का अब भी कोई समाधान नहीं निकल पाया है. लोगों को न तो इस बात का पता है कि यह बेहूदा व्यवस्था कैसे अस्तित्व में आयी और न ही वे यह जानते हैं कि कैसे इसका ख़ात्मा किया जा सकता है.

इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि मेरे पास इस सवाल का कोई सीधा ज़वाब है. लेकिन मैं यह ज़रूर समझता हूं कि इस सवाल का ज़वाब भारत की विशिष्ट स्थितियों में ही तलाशा जाना चाहिए. इस तरह के सरलीकरण बिल्कुल भी ठीक नहीं कि कुछ आर्य यहां आए और उन्होंने इस विशाल महाद्वीप पर अपने विचार थोप दिए.

मैं भारत की प्राकृतिक परिस्थितियों की विशिष्टता को समझने की कोशिश करता हूं.यहां की समतल ज़मीन, बारिश की प्रचुरता, धूप और उपजाऊ मिट्टी इत्यादि ने घुमंतु जातियों के लिए बिना किसी ढांचागत बदलाव से गुजरे खेती करने की स्थितियां मुहैया कराई. दूसरी जगहों, पर दास प्रथा जैसी स्थितियों का उदय हुआ क्योंकि वहां की प्राकृतिक स्थितियों में अच्छी खेती के किए बेहतर हालात नहीं थे. जिस विशाल भूंखंड और बड़ी संख्या में दासों के अस्तित्व को वहां ज़रूरी बना दिया, निश्चित समय में काम पूरा करने के लिए ऐसा करना ज़रूरी था.

अतिरिक्त उत्पादन के विवाद से बचने के लिए उन्होंने कुछ विभाजन भी स्वीकार किए. यह प्रारम्भिक विभाजन, वक़्त बीतने के साथ राजशाही के उभार और जटिल जाति व्यवस्था के रूप में सामने आए. राजशाही के भौगोलिक विस्तार के लिए होने वाली भयानक लड़ाइयों के माध्यम से बाहरी जनजातियों की अधीनता ही बाद में अस्पृश्यता के रूप में सामने आई होगी.

जाति के समूल नाश के लिए आप गांधी, अंबेडकर और मार्क्सवाद की भूमिका को कैसे देखते हैं?

जाति और समुदायों को लेकर गांधी की चिंता मुख्य तौर पर उनके बीच सामाजिक सामन्जस्य बनाने से जुड़ी थी, उभरते हुए पूंजीपति वर्ग के विकास के लिए इस तरह के भारत का निर्माण करना ज़रूरी था. गांधी उसी वर्ग के एक प्रतिनिधि भी थे. वैसे गांधी जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ थे भी नहीं. उन्होंने एक तरह से जाति धर्म का महिमामंडन ही किया, उनका कहना था कि लोग जाति से जुड़े कामों को हीन या श्रेष्ठ मानने के बजाय अपने जाति के कर्तव्य को निभाते रहें. इस बात पर ज़ोर देने के लिए उन्होंने जातीय तौर पर भंगी के लिए निर्धारित काम करने ख़ुद ही शुरू कर दिए. उनके काम करने का तरीक़ा असली अंतर्विरोधों की अनदेखी करने वाला था, इसके लिए वे बहुत ही लचर तर्क देते हैं. जैसे, श्रमिक और पूंजी के अंतर्विरोध के लिए वे ट्रस्टीशिप,हिंदू-मुस्लिम अंतर्विरोध के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव और अछूतों के महिमामंडन के लिए हरिजन जैसे शगूफे छोड़ते हैं. उन्होंने इनमें से किसी भी अंतर्विरोध को सुलझाने की कोशिश नहीं की.

जैसा कि हम सब जानते हैं, अंबेडकर जाति के समूल नाश (एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट) के नारे के साथ विशेष तौर पर सामने आए. वे पहले स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने समझा कि जाति के जिंदा रहते हुए भारत का कोई भविष्य नहीं हो सकता. लेकिन जाति संबंधी उनका विश्लेषण भी उनकी वैचारिक सीमाओं से बाहर नहीं निकल पाता. वे जाति की जड़ हिंदू धर्मशास्त्रों में देखते हैं. जिसकी वजह से वे धर्मांतरण को एक समाधान के तौर पर देखते हैं. यह पहले से विद्यमान धार्मिक समुदाय में विलय करने की एक ‘सामुदायिक रणनीति’ (कम्युनिटेरिन स्ट्रेटजी) में प्रतिविंबित हुआ. इस बात को उन्होंने 1936 में अपने कार्यकर्ताओं को ऐसे ही समझाया. अफसोस कि आगे चलकर उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकारा जिसका भारत में कोई सामाजिक अस्तित्व ही नहीं था. हम देखते हैं कि धर्मांतरण के उनके इस उपाय ने काम नहीं किया और जाति हमें आज भी पहले से ज़्यादा जटिलता के साथ मुंह चिड़ा रही है.

मार्क्स ने मानवीय दुनिया की हर बुराई द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के वैज्ञानिक तरीक़े से ख़त्म करने की कोशिश की. उनके मुताबिक़ यह दृष्टिकोण इतिहास के सभी बदलाओं को दर्ज करता है. जाति से संबंधित संदर्भ उनके पत्रकारीय लेखन और एसियाटिक मोड ऑफ़ प्रोडक्शन (एएमपी) के सैद्धांतीकरण में देखने को मिलते हैं. मार्क्स ने जातियों को एक सामंती व्यवस्था के तौर पर देखा और उनका मानना था कि पूंजीवादी विकास के हमले से इसका नाश हो जाएगा. मार्क्स को ग़लत साबित करने की कोशिश करने वाले कई लोग सोचते हैं कि जाति व्यवस्था के संदर्भ में वे पूरी तरह अप्रासंगिक हैं. मैं समझता हूं कि यह फतवा ग़लत है. पूंजीवादी विकास ने जाति के कर्मकांड वाले पहलू को ज़रूर प्रभावित किया और जिन जातियों को हम आज देखते हैं वे शासक वर्गों की साजिश का नतीज़ा हैं जिन्हें उन्होंने आधुनिक संस्थाओं के माध्यम से नया जीवनदान दिया.

मार्क्स को बेस और सुपर स्ट्रक्चर से संबंधित उनके रूपक की वजह से ज़्यादा ग़लत तरीक़े से समझा गया, जिसे ख़ास तौर पर भारतीय मार्क्सवादियों ने ऐसा अटल सत्य(डॉग्मा) बना दिया जिसने अंबेडकर के संघर्ष समेत बाक़ी सभी गैर आर्थिक संघर्षों की अनदेखी की. इसने इस भूभाग के सर्वहारा के बीच बहुत गहरी और स्थाई दरार पैदा कर दी,यह सचमुच में बहुत दुखदायी है. मैं समझता हूं कि जाति के एक विभाजक श्रेणी होने की वजह से यह आमूल सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष का आधार नहीं बन सकती, इसलिए इसका समूल नाश किया जाना ज़रूरी है. इस बात को ध्यान में रखते हुए एक दूसरी श्रेणी की तरफ़ देखने की ज़रूरत हैं जो निश्चित तौर पर वर्ग है. मैं मार्क्सवादी विश्लेषण को अंबेडकर के जाति विहीन समाज के सपने को पूरा करने के लिए एक ज़रूरी हथियार के तौर पर देखता हूं.

अस्मिता की राजनीति को लेकर आपके क्या विचार हैं, ख़ास तौर पर भारतीय संदर्भ में आप इसे कैसे देखते हैं?

एक सामाजिक प्राणी होने के कारण इंसान जन्म लेते ही कई तरह की अस्मिताओं को धारण करना शुरू कर देता है जो उसके साथ लंबे अंतराल तक बनी रहती हैं. इन अस्मिताओं के कई राजनीतिक महत्व होते हैं इसलिए यह स्वाभाविक लग सकता है कि ख़ास अस्मिता से जुड़े लोग उनका इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए करते हैं. लेकिन मेरी राय में सभी तरह की अस्मिताओं की राजनीति विभाजनकारी, न्याय और मुक्ति के असली मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली हैं. मेरी नज़र में सार्वभौमिक जैसी माने जाने वाली राष्ट्रीय अस्मिता भी इसका अपवाद नहीं है.

इस पर बहस हो सकती है कि मुक्ति का मुख्य मुद्दा क्या है लेकिन यदि कोई तथ्यात्मकता के साथ मानवीय स्थितियों का विश्लेषण करे तो, मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई ज़्यादा विवाद हो सकता है. मानव समाज में बुराई की मुख्य जड़ को व्यक्ति के संग्रह की प्रवृत्ति में देखा जा सकता है और अस्मिताएं इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक माध्यम का काम करती हैं. इसलिए अस्मिताओं पर लड़ाई को केंद्रित करना असली बीमारी से मुंह मोड़कर सिर्फ़ लक्षणों का इलाज़ करने की तरह है. सिर्फ़ तर्क के लिहाज़ से अगर कोई गहरे तौर पर सचेतन हो तो कुछ अस्मिताएं इतिहास के किसी ख़ास दौर में रणनीतिक तौर पर राजनीति का आधार हो सकती हैं. उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ राष्ट्रीयताओं के आंदोलन इसका उदाहरण हैं. लेकिन कुछ अस्मिताएं मूलत: बिल्कुल भी काम की नहीं हैं, मैं समझता हूं जातिगत अस्मिता इनमें से एक हैं.

कुछ लोग महिषासुर के मिथक और मैकाले का महिमामंडन करते हुए एक ख़ास तरह की अस्मितागत राजनीति कर रहे हैं, क्या आप समझते हैं कि राजनीतिक अर्थशास्त्र की अनदेखी और इस तरह के प्रतीकों का इस्तेमाल कर जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ कोई लड़ाई लड़ी जा सकती है?


नहीं. मैं नहीं समझता कि महिषासुर के मिथक या मैकाले का महिमामंडन कर जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ कोई प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सकती है. जो लोग इस तरह की कोशिश करते हैं वे इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि जाति सिर्फ़ एक मिथक है जिसका मुक़ाबला प्रतिमिथक के आधार पर ही किया जा सकता है. ऐसा करने वाले लोग जाति व्यवस्था की विरूपता की अनदेखी करते हैं.इस तरह की स्थापनाएं सनसनी पैदा करने के साथ ही मीडिया और लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं. उन्हें काफ़ी पब्लिसिटी मिलती है.

कुछ वक़्त पहले मैंने सुना कि अंग्रेजी देवी और थॉमस बैबिंगटन मैकॉले को दलितों की मुक्ति का प्रतीक बनाने की कोशिश की जा रही है. इस तरह की विचित्र स्थापनाएं भी काफ़ी सनसनी पैदा करती हैं इसलिए इन्हें मीडिया में काफ़ी जगह मिली. ऐसी बातें पूरी तरह शासक वर्गों के हितों का पोषण करती हैं और उत्पीड़ितों का ध्यान उनके असली दोषियों से हटाती है. यह अमूर्त चीज़ों को निशाना बनाती हैं इसलिए बिना किसी चीज़ को दांव पर लगाये इस तरह के नारे उछालकर मज़ा लेने वाले मध्यवर्ग के बड़े हिस्से को अपील करती हैं.

समय-समय पर इस तरह के मिथक गढ़े जाते हैं और उन्हें जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ने वाले सांस्कृतिक हथियार के तौर पर पेश किया जाता है. लेकिन यह सिर्फ़ सत्ता में जड़ जमाये वर्गों और जातियों की व्यवस्थागत करतूतों और उनके उपकरण, भारतीय राज्य से दलितों का ध्यान हटाने का काम करते हैं.

कुछ लोग दावा करते हैं कि मार्क्सवाद जाति के मुद्दे को नहीं सुलझा सकता है.आप क्यो सोचते हैं?
 

एक ‘विज्ञान’ के तौर पर मार्क्सवाद जाति के मुद्दे को ज़रूर सुलझा सकता है और इसे ऐसा करना भी चाहिए. यह बाक़ी तमाम बुराइयों का भी ख़ात्मा कर सकता है लेकिन ध्यान देने की बात है कि इसे बरतने वालों ने जिस तरह से इसे कट्टरपंथ या डॉग्मा में बदल दिया है, उससे बाहर निकलना पड़ेगा.

मार्क्सवाद कहें या चाहे जो भी नाम इसे दें, मेरे हिसाब से यह प्राकृतिक विज्ञानों की तरह ही समाज का एक विज्ञान है, और इसे कोशिश करनी चाहिए कि यह नए सबूतों के बल पर लगातार ख़ुद को सही करता रहे. मार्क्सवाद कोई मार्क्स और एंगेल्स की तरफ़ से कहे गए विचारों की कब्र में पड़ी लाश नहीं है. दुनिया में हो रहे बदलाओं, ख़ास तौर पर विज्ञान और तकनीकी तरक्की के बाद, मार्क्स की बहुत सारी स्थापनाओं में सुधार की ज़रूरत है. अफसोस की बात यह है कि बहुत सारे मार्क्सवाद समर्थकों ने इसे आज लगभग धर्म जैसा बना दिया है. जाति के मुद्दे पर काम करते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण ज़रूर उपयोगी है लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि यह भारतीय समाज का वर्गीय विश्लेषण सही तौर पर करे और उसमें जातियों को लोगों के ‘जीवित संसार’ की तरह शामिल करे.

लेकिन शुरुआती कम्युनिस्टों ने अपनी ब्राह्मणवादी संस्कृति के मुताबिक़ भारतीय समाज को समझने के लिए रूसी मॉडल की नकल की और वर्गों के सवाल को वर्ग और जाति की मूर्खतापूर्ण बहस में उलझा दिया.

यह मार्क्सवाद नहीं है. उन्होंने लेनिन के वर्ग की परिभाषा को नहीं, उनके ढांचे को भारत के वर्ग विश्लेषण के लिए अपनाया. अगर वे उनकी परिभाषा को समझते तो भारत के वर्ग विश्लेषण में जाति, जो कि यहां का एक लाइफ़ वर्ल्ड रहा है, जो बेस से सुपरस्ट्रक्चर तक लोगों के जीवन को निर्देशित करता दिखाई देता है, को सम्मलित करते. न कि उसको किनारे रखकर वर्ग और जाति के वेवकूफी भरे द्वैत का निर्माण करते. इस तरह भारत का वर्ग संघर्ष जाति के विरुद्ध का भी संघर्ष बनता. तब यहां पर जाति से मुक्ति के आंदोलन की ज़रूरत ही न होती. सारे सर्वहारा का (आधुनिक श्रमिक वर्ग और यहां का उत्पीड़ित ऑर्गनिक सर्वहारा) का यह एकीकृत आंदोलन बनता. यहां के कम्युनिस्टों की यह अक्षम्य भूल रही है कि वे भारत की क्रांति के लिए जाति और वर्ग संघर्ष को नहीं जोड़ पाए.

आप दलित पूंजीवाद और उसके विचारकों के बारे में क्या सोचते हैं?
 

यह बिल्कुल बकवास है. यह कुछ लोगों का दिमागी फितूर है, वे इसके माध्यम से मीडिया में सनसनी और जनता के बीच अस्मितागत भ्रम फैलाते हैं. मैं सोचता हूं कि मामला सिर्फ़ इतना ही नहीं है बल्कि यह विश्व पूंजीवाद के हितों को साधने वाली सोची-समझी रणनीति है. मीडिया इसमें निहित सनसनी और नव उदारवादी पोषक होने की वजह से इसे अहमियत देता है. दलित मध्यवर्गों को इसमें काफ़ी मज़ा आता है क्योंकि वे इसे अपनी अस्मिता के उत्थान के तौर पर देखते हैं बाक़ी बची दलित जनता एक भ्रम में उनके पीछे चलती रहती है, वैसे भी इस झूठी चेतना की वजह से वे कई सालों से ऐसा ही करते रहे हैं. भारतीय राज्य अतिउत्साह में रेड कार्पेट बिछाकर इसके झंडाबरदारों का स्वागत करता है. जिससे दलितों के असली ज्वलंत सवालों पर असर पड़ता है क्योंकि भारतीय राज्य इन नवधनाढ्यों को वरीयता देता है और इन तथाकथित दलित उद्यमियों को सार्जनिक ख़रीद और ठेकों में छूट देता है.

देखिए, कुछ व्यक्ति हमेशा अमीर रहे हैं, यहां तक कि कुछ दलित उद्यमी भी रहे हैं. उद्यमिता की आधिकारिक परिभाषा के मुताबिक़ उद्यमी वह है जो स्वरोजगार को अपनाता है. इस हिसाब से सड़क किनारे जूते सिलने वाले मोची भी उद्यमी है.

सरकार की तरफ़ से 1990, 1998 और 2005 में किये गए आर्थिक सर्वेक्षण बताते हैं कि वैश्वीकरण के दौर में दलित उद्यमिता के अनुपात में गिरावट आई है, यह आंकड़े दलित पूंजीपतियों के झूठ और दुष्प्रचार की पोल खोल देते हैं. इसमें कुछ भी बुरा नहीं है कि दलित अपनी तरक्की के लिए पूंजीवादी व्यवसाय अपनाएं. लेकिन जब नब्बे फीसदी दलित मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीने की जद्दोजहद कर रहे हों, ऐसे हालात में दलितों को पूंजीपति बन जाना चाहिए या वैश्वीकरण ने दलितों का उद्धार किया है जैसे बेवकूफ़ाना तर्क देने से बड़ा अपराध ग़रीब दलितों के ख़िलाफ़ और कुछ नहीं हो सकता.

ये सब बातें मैं पूरे दावे और अधिकार के साथ कह रहा हूं. मैंने देश के सबसे बढ़िया माने जाने वाले संस्थान से तकनीक और प्रबंधन की औपचारिक पढ़ाई की है. प्रैक्टिस्नर के तौर पर मैं एक होल्डिंग कंपनी के सीईओ का पद संभाल चुका हूं इसलिए मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं कि आधुनिक बिजनेस और उद्यमिता क्या है. देश के जाने-माने संस्थान में अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन का प्रोफेसर होने और गरीब लोगों के पक्ष में काम करने वाले एक भरोसेमंद ऐक्टिविस्ट और सिद्धांतकार होने के नाते मेरा पक्ष बिल्कुल साफ़ है. मैं न तो किसी टुच्चे व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होकर कोई जुमला उछाल रहा हूं और न ही फर्जी बौद्धिकों की तरह अधकचरी सैद्धांतिक लफ्फाजी कर रहा हूं.

दलित राजनीति के कुछ झंडाबरदार उपनिवेशवाद को सही ठहराते हैं, ख़ास तौर पर वे मैकाले की शिक्षा व्यवस्था की तारीफ़ करते हैं. वे अंग्रेजी भाषा और संस्कृति को ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ एक हथियार के तौर पर देखते हैं. आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
 

शायद मैंने इस मुद्दे पर अपनी बात पहले कह दी है. इसमें कोई शक नहीं है कि जाति विरोधी संघर्ष में सांस्कृतिक पहलू बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन यह राजनीतिक अर्थशास्त्र की कीमत पर नही होना चाहिए. सांस्कृतिक तर्क अगर भौतिक सच्चाई से नहीं जुड़ा है तो यह बहुत ही फिसलन भरा रास्ता हो सकता है. यह लोगों के अस्मितागत अहंकार की संतुष्टि कर सकता है लेकिन अंतिम तौर यह उनके हितों के ख़िलाफ़ ही जाएगा.

आप भारतीय राज्य की जाति आधारित आरक्षण नीति को कैसे देखते हैं? क्या यह जाति के उन्मूलन में मददगार है या सिर्फ़ शासक वर्ग के लिए सेफ्टी वॉल्व का काम करती है?
 

बाबासाहेब अंबेड़कर के लिए आरक्षण निश्चित तौर पर एक भवंरजाल रहा होगा. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जाति का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया जाए. लेकिन उन्हें इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दलितों को सक्षम भी बनाना था. दलितों के सशक्तिकरण का काम अनिवार्य रूप से जाति की अस्मिता के आधार पर ही किया जा सकता था. इस तरह देखा जाए तो जाति के समूल नाश और उसकी स्वीकारोक्ति के बीच एक अंतर्विरोध निहित है. वह दीर्घकालिक और अल्पकालिक उद्देश्यों के बीच का अंतरर्विरोध है. जहां एक मकसद था जाति का समूल नाश वहीं दूसरा मकसद यह सुनिश्चित करना था कि मौज़ूदा समाज में दलित रह पाएं इसलिए उन्होंने उनके जीवन और सशक्तीकरण के लिए आरक्षण को ज़रूरी समझा. मैं समझता हूं कि इस दुविधा का कोई आसान हल नहीं था जब तक कि वाम ताक़तें अपनी ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह करते हुए, जाति विरोधी संघर्ष को अपना ज़रूरी हिस्सा मानने वाला एक क्रांतिकारी वर्ग युद्ध न छेड़ देतीं. वामपंथी पार्टियां अपनी ब्राह्मणवादी प्रवृत्तियों की वजह से ऐसा करने में बुरी तरह नाकाम हो गईं. तब भी वहां इस बात के लिए जगह थी कि असली मक़सद की प्राप्ति के लिए आरक्षण जैसे किसी सपोर्ट सिस्टम को रचनात्मक तौर पर अपनाया जाए ताकि जाति के समूल नाश के लिए इसे एक पूरक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके.

इसमें कोई शक नहीं कि सामाजिक व्यवहार को ध्यान में रखते हुए दलितों के लिए आरक्षण ज़रूरी था. लेकिन ऐसा करते हुए यह ज़रूर समझना चाहिए कि किसकी अक्षमता को आरक्षण जैसी दवाई की ज़रूरत है. यह भारतीय समाज की अक्षमता थी, ना कि दलितों की.

इसलिए वह समाज की ज़िम्मेदारी रहती कि वह अपने इस अक्षमता को जल्द से जल्द नष्ट करे ताकि आरक्षण की ज़रूरत ना रहे. अगर ऐसा हुआ होता तो जाति के ख़ात्मे का ज़िम्मा पूरे समाज को जाता, ऐसा होना भी चाहिए था. समाज ने अपने इस अपराध को स्वीकार कर लिया होता और अपनी इस बुराई से मुक्ति पाने के लिए तुरंत संघर्ष छेड़ दिया होता. तब दलित लड़के-लड़कियों को किसी मनोवैज्ञानिक दबाव और सामाजिक प्रताड़ना को सहना ना पड़ता. इस तरह अपवाद के तौर पर अपनाई गई आरक्षण की नीति अपने आप ख़त्म हो जाती, जैसा कि इसको होना भी चाहिए.

आरक्षण में जाति के आधार से बचा तो नहीं जा सकता था लेकिन परिवार को इसका फायदा लेने वाली इकाई बनाया जा सकता था. इस तरह उस कमज़ोरी से बचा जा सकता था जिसके तहत संपूर्ण जाति आरक्षण की कीमत चुकाती लेकिन उसका फायदा व्यक्ति विशेष को होता. इस तरह जो परिवार आरक्षण प्राप्त करता है धीरे-धीरे उसे भविष्य में आरक्षण पाने से रोका जा सकता था और उपजातियों के उभार (डायनामिक्स) से बचा जा सकता था जो उस नीति से पैदा हो रही थी. मौजूदा आरक्षण के तहत लगातार कम से कम परिवार आरक्षण का फायदा ले सकते हैं. जाति के अलावा कोई और आधार न होने की वजह से लोगों को जाति के संदर्भ में ही चीजों को देखने के लिए उकसाया जा सकता है. इस बात को अंबेडकर के जाति उल्मूलन के सपने का निषेध करने वाली दलित उपजातियों की आपसी लड़ाई में देखा जा सकता है.

वर्तमान नीति पिछड़ेपन पर ज़ोर देती हुई दलितों के पिछड़ेपन को आधार बनाती है. इस तरह यह भानुमती का ऐसा पिटारा खोल देती है जिसमें बाक़ी सभी जातियां भी पिछड़ेपन का दावा करते हुए आरक्षण की मांग करने लगती हैं. इस नीति को दलितों का बेवजह पक्ष लेने वाली माना जाता है, यह उन्हें पूरे समाज की शिकायत का केंद्र बनाती है. परिणामस्वरूप एक द्वंद्व की स्थिति बनी रहती है, दलित पूरी  भावुकता के साथ आरक्षण के विशेषाधिकार को बनाए रखने वाली नीति को जारी रखना चाहते हैं और इस तरह जाति व्यवस्था की उम्र को और बढ़ा देते हैं. आरक्षण के पीछे दूसरा तर्क प्रतिनिधित्यामक तर्क है, यह भी स्वाभावित तौर पर सबको अपील करता है कि जब तक कोई लाभकारी वर्ग में पहुंचने के लिए तैयार न हो तब तक यह व्यवस्था ज़रूरी है. लेकिन कोई अच्छी तरह से इसकी पड़ताल करे तो पता चलेगा कि इस तर्क ने काम नहीं किया. इसलिए मैं कहूंगा कि सीमाओं के बावजूद आरक्षण की नीति जाति के समूल नाश के लक्ष्य का रास्ता तलाश सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शायद शासक वर्ग ऐसा ही चाहता था. अगर ऐसा होता तो आरक्षण के संबंध में जिन बुराइयों से हम जूझते हैं उनका ख़ात्मा हो गया होता. आपके सवाल पर वापस लौटते हुए मैं कहना चाहता हूं कि आरक्षण की वर्तमान नीति ने दलितों का भला करने के बजाय शासक वर्ग के ही हितों की पूर्ति की  है. आज के हालात को देखते हुए कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण ने आरक्षण को निरर्थक बना दिया है. सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियां 1997 की अपनी बेहतरीन स्थिति से लगातार कम हो रही हैं. इसका साफ़ मतलब है कि आरक्षण एक तरह से तभी ख़त्म हो गया था. लेकिन आम दलितों के बीच निहित स्वार्थी तत्व उन्हें यह सब नहीं जानने देते. शायद वे ख़ुद भी इसे नहीं समझते या इसे समझने की इच्छा नहीं रखते. यह वास्तव में अफसोसजनक है.

आपकी राय में जाति का नाश करने के लिए सबसे तार्किक रास्ता क्या हो सकता है?
 

आज जातियां मुख्य तौर पर एक तरफ़ तो सांस्कृतिक अवशेष के तौर पर काम करती हैं वहीं दूसरी तरफ़ ये गरीबों का शोषण करने वाली शासक वर्गों की व्यवस्था है. जातियों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए कई रणनीतियां हो सकती हैं.

एक प्रभावी और ढांचागत तरीक़ा तो यह हो सकता है कि लोगों को उत्पादन व्यवस्था से जोड़ा जाए, सहकारी मॉडल इसके लिए मददगार हो सकता है, जिससे लोगों के भौतिक हित एक-दूसरे से जुड़ जाएंगे. स्टेट्स एंड मायनॉरिटीज में अंबेडकर की तरफ़ से प्रस्तावित सहकारी खेती इसका एक अच्छा उदाहरण हो सकती है. मिथकों, सड़ी-गली परंपराओं और धार्मिक कर्मकांडों के ख़िलाफ़ लगातार लोगों को शिक्षित करने की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए. वामपंथ और दलित मिलकर लोगों के ठोस भौतिक मुद्दों को ध्यान में रखते हुए जाति रहित आंदोलन के निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

ये कुछ तरीक़े हैं जो निश्चित तौर जाति को कमज़ोर करेंगे. इस सबके बावज़ूद कुछ लोग इन सबकी अनदेखी करते हुए जातीय शोषण कर सकते हैं. उनके साथ कड़ाई से निपटने की ज़रूरत है. इसका इलाज है शॉक ट्रीटमेंट. आंदोलन को इतना मज़बूत होना चाहिए कि वह ऐसे लोगों की शारीरिक तौर पिटाई कर पाठ पढ़ा सके. यह एक भावुक जवाब नहीं है, यह ठोस वैज्ञानिक आधारों पर टिका है जिसे मैं किसी के सामने भी व्याख्यायित कर सकता हूं. यह वैज्ञानिकता पर टिके कुछ तरीक़े हैं जिन्हें मैं जाति विरोधी रणनीति के तौर पर सुझा सकता हूं.

मनीऑडर पर टिकी अर्थव्यवस्था और राणा बाबा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/23/2013 03:39:00 AM

राकेश कुमार सिंह की हाल में प्रकाशित किताब बम संकर टन गनेस  का एक अध्याय. आगे भी इस किताब के अध्याय हाशिया पर मिलेंगे और शायद एक समीक्षा भी.

असोरा पर लकड़ी का एक बड़ा बाकस। बराबर में एक चौकी । चौकी  पर लुंगी और गंजी में एक तीस-बत्तीस बरस की काया। सामने प्लास्टिक का एक डिब्बा और फैले अंग्रेजी दवाइयों के कुछ पत्ते। अगल-बगल खड़े कुछ औरत-मर्द। लाख धकेलने के बाद भी स्मृति इसके पीछे नहीं जा पाती। यही राणा बाबा थे। मेरे पहले केमिस्ट। बाकस ही उनका गोदाम था। बाकस ही उनका शो रूम। अल्लसुबह से देर रात तक। चार में टंगी लालटेन की रौशनी में राणा बाबा लोगों को दवाइयां दिया करते थे। ऊंच-नीच और जात-धर्म का कोई फेर नहीं था। सुरदेव बाबा गांव में न हुए तो एमरजेंसी में उन्हें कभी-कभार सूई भी लगानी पड़ती थी। 

उन दिनों रेणू के पूर्णियां में फारबिसगंज मोड़ के पास आश्रमनुमा एक विद्यालय हुआ करता था। जिसकी न नाम-पट्टी थी, और न लेटर हेड और मोहर। सरकारी अध्यापकी से रिटायरमेंट के बाद स्वर्गीय सच्चिदानंद बाबु घर पर ही अपने शिष्यों के सगे-संबंधियों को पढाते थे। बच्चे उनके घर पर ही बने कुछ कमरों में रहते थे। बदले में अठारह किलो चावल, चार किलो दाल और पच्चीस रुपए या फिर सवा सौ रुपए देने होते थे। गरीब और मेधावी विद्यार्थियों के लिए इसमें भी रियायत थी। मेरे चचेरा भाई सुधांशु और मैं छठी कक्षा तक आश्रमवासी ही रहे। हमारे घर वालों ने बाद वाला विकल्प चुना था।

छुट्टियों की किल्लत रहती थी। सबसे लंबी होती थी गर्मी की। पंद्रह दिनों की। ‘एतियाना’  या ‘स्टेट ट्रांस्पोर्ट’ की बस से हम मुजफ्फरपुर आते थे। तब सुबोध भैया वहीं ‘घाट’  के ट्रांस्पोर्ट में नौकरी करते थे और डेरा पर रहते थे। हम रात को उनके पास रुकते थे। अगले दिन घाट के बस से ही अपने गांव तरियानी छपरा पहुंचते थे। उन दिनों दो-तीन लंबी-लंबी बसें गांव जाया करती थी। एक का नाम ‘जानकी एक्सप्रेस’ था। बाद में मिनी बसें चलने लगी और अब तो मिनी से भी मिनी बसें जाती हैं।

घर पर इया, माई और चाचियां हमारा इंतजार कर रही होती थीं। संयुक्त परिवार था। कुल छह चाचियां थीं। भाई-बहनों की संख्या लगभग दो दर्जन थी। सबसे बड़े सुबोध भइया और नीलम दिदिया अब बाबा-नाना और दाई-नानी बन चुके हैं।

सबके पास खिलाने के लिए कुछ खास होता था उस दिन। माई पेड़ा खिलाती थी। चाचियों की ओर से दही, खोआ, लड़ू, बगैरह मिलत थे। पर मुझे सबसे प्यारा लगता था इया के साथ डलिया में चाउर ले के भंसारी जाना। घिऊ, नून और मरीच वाला भुजा इया के साथ ही चला गया।

शेषा फुआ से ले कर रूप बाबा, कृपाल बाबा, रामा बाबा, अंदामा बाली दाई, बिंदा बाबा, सपाटु वाली दाई, बच्चा बाबा, पिपरा वाली दाई, जमदार साहब, शिवजी बाबा, रामदेव बाबा और कोठा फुआ तक : सबके आंगन में जाता था। आज भी बाबा-दाइयों का चरण स्पर्श करके एक अजीब से सुख और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है। हमउम्र चाचाओं और फुआओं के साथ घंटों खेला करता था। नेपाल वाली दाई के दुरा पर नारियल तेल के दो डिब्बों के बीच रस्सी लगा कर लाउड स्पीकर और हेलो-हेलो खेला करता था।

राणा बाबा के पिता बिंदा बाबा बड़े मेहनती थे। गंजी कभी उनके बदन पर नहीं देखा। हमेशा कंधे पर अंगौछे के साथ रहती थी। खेत पथार कम ही थे। परिवार में हर तरह का संकट व्याप्त रहता था। चुन्नू और मुन्नू बाबा उनके छोटे भाई हैं। आगे चल कर दोनों दवा दुकानदारी में राणा बाबा के साथ जुड़ गए। राणा बाबा ने अब्दुल अजीज बीड़ी की एजेंसी भी ले ली थी। गांव-जवार के छोटे-छोटे फेरी वाले उनसे ही बीड़ी ले जाया करते थे। करीब 25-26 साल पहले राणा बाबा ने गांव के बाजार पर एक दुकान बनवा ली। दवा के साथ-साथ अन्य छोटी-मोटी जरूरत की चीजें उनके दुकान पर मिलने लगी थी।

हमारे छोटे, सुशांत चाचा की अच्छी उठ-बैठ थी राणा बाबा के साथ। दोनों एकतुरिया थे। नौजवानी में अपने संगतियों के साथ मिल कर उन्होंने गांव में एक पुस्तकालय की स्थापना की थी। काफी रचनात्मक काम हुई थे तब। ग्रामीण राजनीति में भी उनकी दखल थी। उनके लिए राजनीति का अर्थ पुस्तकालय के लिए कुछ सुविधा जुटा लेना होता था। पर अब पुस्तकालय के नाम पर जमीन भर रह गया है। सुनते हैं बाद में कुछ विवाद हुआ। लोगों ने अलमारियों, किताबों और अन्य संपत्तियों का बंदरबांट कर लिया। अब महावीर पुस्तकालय का नाम लेकर जैसे-तैसे दुर्गा पूजा का आयोजना हो जाता है।

मेहनत और आत्मीयता के अद्भुत मिसाल थे राणा बाबा। कुछेक अपवादों को छोड़ कर गांव की अर्थव्यवस्था कलकत्ता, गोहाटी, डिमापुर और पासीघाट से आए मनीऑडर पर टिकी थी। अब ये मनीऑडर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा से भी आते हैं। तब ‘संपन्नता’ का मतलब दाल, भात तरकारी था। ‘खानदानी’ परिवारों में भी पैसे की किल्लत रहती थी। विपन्न तो थे ही विपन्न। राणा बाबा ने कभी भी पैसे न होने पर किसी को दवा देने से इंकार नहीं किया। जातियों के बंधन को जिस हद तक अनजाने में तोड़ा जा सकता था, राणा बाबा का उद्यम उसमें सफल रहा। वे कोई समाज सुधारक या प्रबुद्ध विचारक नहीं थे। पर उनका काम सेवा से कम नहीं था। गांव में कभी-कभी खुलने वाले एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और दूर-दूर तक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के बीच राणा बाबा की दूकान छपरा, बेलहियां, डुमारा, सरपट्टी, हंसौर, कुंडल, मारड़, विशंभरपुर, ननौरा गिद्धा, फुलवरिया आदि आस-पड़ोस के गांव के लोगों के लिए एक बरदान था।

करीब दस-बारह साल पहले राणा बाबा ने बाजार पर थोड़ी जमीन ले ली। कुछ और दुकानें बनवाई। खुद दवा दुकान ही चलाते रहे। उनका बेटा धनंजय उनकी मदद करने लगा। मुन्नु बाबा के लिए किराने की दुकान शुरू की। चुन्नु बाबा को पंचायत सेवक की नौकरी मिल गयी थी। बदहाली के बाद खुशहाली का एक टुकड़ा उनके घर भी आया था। दो साल पहले, सर्दियों की एक शाम बाजार पर बीस-पच्चीस लोगों का झुंड आया। राणा सिंह की पहचान तस्दीक कर लेने के बाद उन पर ताबरतोड़ गोलियां बरसा दी। राणा बाबा वहीं ढेर हो गए। जमीन पर आलू की फेरी लगाने वाले अमरूल को भी निशाना बनाया गया। लंबी इलाज के बाद अमरूल बच गया। ये नहीं मालूम कि उसका शरीर अब कितना कारगर रह गया है।

हैदराबाद विस्फोटों में खुफिया एजेंसियों की भूमिका की भी हो जांच: रिहाई मंच

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/22/2013 08:18:00 PM

शिंदे बताएं कि हैदराबाद विस्फोट में हिन्दुत्ववादी संगठन जांच के दायरे में क्यों नहीं

लखनऊ/आजमगढ़ 22 फरवरी 2013

रिहाई मंच ने हैदराबाद में हुए विस्फोटों की जांच को गृह मंत्रालय द्वारा गलत दिशा में भटकाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस घटना में केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका को भी शक के दायरे में लाया जाए। संगठन ने सरकार और खुफिया एजेंसियों को इस मामले आजमगढ़ को बदनाम करने से बाज आने की चेतावनी दी।

रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा कि एक तरफ तो गृहमंत्री हैदराबाद में इस घटना के पीछे किसी भी आतंकी संगठन का नाम नहीं लेते। लेकिन गृहमंत्रालय के अधीन काम करने वाली खुफिया एजेंसियां मीडिया माध्यमों द्वारा घटना के पीछे इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर जैसे तमाम नामों को उछाल कर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ माहौल बना रही हैं। यहां तक कि बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को आतंकवाद के नाम पर कत्ल करने और फसाने के लिए बदनाम हो चुकी दिल्ली स्पेशल सेल ने इस घटना के बाद आईबीएन 7 चैनल को इरफान लांडजे समेत चार कथित इंडियन मुजाहिदीन के सदस्यों की इंट्रोगेशन रिपोर्ट लीक कर दी। जिसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि हैदराबाद विस्फोटों के पीछे इसी कथित संगठन का हाथ है। जबकि लांडजे की फर्जी गिरफ्तारी के मामले में दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक ने नोटिस भेजा है। जाहिर है इस कहानी को जारी करने के पीछे मकसद पूरी घटना की जांच के दायरे से हिन्दुत्ववादी संगठनों को बचाना है, जिन्होंने इससे पहले भी हैदराबाद में दो बार विस्फोट किए हैं।

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि जब देश हैदराबाद धमाकों से दहला हो और सरकार आतंकवादियों से निपटने की राजनीतिक इच्छाशक्ति इतनी कमजोर हो कि गृहमंत्री शिन्दे मालेगांव, मक्का मस्जिद, समझौता जैसे आतंकी घटनाओं में लिप्त हिन्दुत्ववादी संगठनों का नाम लेने के बाद भाजपा और संघ के दबाव में पीछे हट जातें हों उस वक्त दिल्ली स्पेशल सेल द्वारा कथित इंन्ट्रोगेशन रिपोर्ट को लीक करना देश को अस्थिर करने का एक कांग्रेसी प्रयास है। ऐसे में इस इन्ट्रोगेशन रिपोर्ट को लीक करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हुए जांच करवाई जाए कि किस के इशारे पर यह रिपोर्ट लीक की गई। क्योंकि इस रिपोर्ट लीक कांड में पुलिस और आतंकी संगठनों का गठजोड़ सामने आ जाएगा। जैसा कि मालेगांव में हुए विस्फोटों के मामले में सुरक्षा एजेंसियों और हिन्दुत्ववादी संगठनों का गठजोड़ सामने आ चुका है।

आजमंगढ़ रिहाई मंच के संयोजक मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि जिस तरह से मीडिया माध्यमों द्वारा खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां के सूत्रों के हवाले से हैदराबाद विस्फोटों के मामले आजमगढ़ को जोड़ा जा रहा है, उससे इस घटना के पीछे की कांग्रेस की राजनीतिक मंशा समझी जा सकती है कि वह आजमगढ़ का नाम लेकर इस घटना के पीछे खुफिया एजेंसियों और हिन्दुत्ववादी संगठनों पर उठने वाले सवालों को दबाना चाहती है। उन्होंने कहा कि अगर 2014 के चुनावी लाभ के लिए आजमगढ़ को बदनाम करने की कोशिश नहीं रुकी तो कांग्रेस के इस राजनीतिक अपराध का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

क्या आपके बमरोधी बेसमेंट में अटैच बाथरूम है? : अरुंधति रॉय

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/21/2013 01:19:00 AM


अफजल गुरु की फांसी के निहितार्थों और भारत की युद्धोन्मादी सांप्रदायिक राजनीति पर अरुंधति रॉय. मूल अंग्रेजी: आउटलुक. अनुवाद: रेयाज उल हक.

2001 के संसद हमले के मुख्य आरोपी मोहम्मद अफजल गुरु की खुफिया और अचानक दी गई फांसी के क्या नतीजे क्या होने जा रहे हैं? क्या कोई जानता है? सेंट्रल जेल जेल नं. 3, तिहाड़, नई दिल्ली के सुपरिंटेंडेंट द्वारा ‘मिसेज तबस्सुम, पत्नी श्री अफजल गुरु’ को भेजे गए मेमो में, जिसमें संवेदनहीन नौकरशाहाना तरीके से हरेक नाम को अपमानजनक तरीके से लिखा गया है, लिखा है:

‘श्री मो. अफजल गुरु, पुत्र- हबीबिल्लाह की माफी की याचिका को भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दिया गया है. इसलिए मो. अफजल, पुत्र-हबीबिल्लाह को 09/02/2013 को सुबह आठ बजे सेंट्रल जेल नं. 3 में फांसी देना तय किया गया है.


आपको सूचना देने और आगे की जरूरी कार्रवाई के लिए भेजा गया.’

मेमो भेजने का वक्त जानबूझ कर ऐसा रखा गया कि वह तबस्सुम को फांसी के बाद ही मिले, और इस तरह उन्हें उनके आखिरी कानूनी मौके – यानी क्षमा याचिका के खारिज किए जाने को चुनौती देने के अधिकार -  से महरूम कर दिया गया. अफजल और  उनके परिवार, दोनों को अलग-अलग ये अधिकार हासिल था. दोनों को ही इस अधिकार का उपयोग करने से रोक दिया गया. यहां तक कि कानून में अनिवार्य होने के बावजूद तबस्सुम को भेजे गए मेमों में राष्ट्रपति द्वारा क्षमा याचिका खारिज किए जाने की कोई वजह नहीं बताई गई. अगर कोई वजह नहीं बताई गई है, तो आप किस आधार पर अपील करेंगे? भारत में फांसी की सजा प्राप्त सभी कैदियों को यह आखिरी मौका दिया जाता रहा है.

चूंकि फांसी दिए जाने से पहले तबस्सुम को अपने पति से मिलने की इजाजत नहीं दी गई, चूंकि उनके बेटे को अपने पिता से सलाह के आखिरी दो बोल सुनने की इजाजात नहीं दी गई, चूंकि उन्हें दफनाने के लिए अफजल का शरीर नहीं दिया गया, और चूंकि कोई जनाजा नहीं हुआ, तो जेल मैनुअल के मुताबिक ‘आगे की जरूरी कार्रवाई’ क्या है? गुस्सा? अपार, अपूरणीय दुख? बिना किसी सवाल के, जो हुआ उसे कबूल कर लिया जाना? संपूर्ण अखंडता?

फांसी के बाद एक अपार जश्न मनाया गया. संसद हमले में मारे गए लोगों की गमजदा बीवियां टीवी पर दिखाई गईं, अपनी उत्तेजित मूंछों के साथ ऑल इंडिया एंटी-टेररिस्ट फ्रंट के अध्यक्ष एम.एस. बिट्टा थे उनकी छोटी सी उदास कंपनी के सीईओ की भूमिका अदा कर रहे थे. क्या कोई उन्हें बताएगा कि जिस इंसान ने उनके पतियों को मारा वो भी उसी वक्त, उसी जगह पर मारा गया था? और जिन लोगों ने हमले की योजना बनाई उनको कभी सजा नहीं होगी, क्योंकि हम अब तक नहीं जानते कि वे कौन हैं.

इस बीच कश्मीर पर एक बार फिर कर्फ्यू लागू है. एक बार फिर इसके लोगों को बाड़े में जानवरों की तरह बंद कर दिया गया है. एक बार फिर उन्होंने कर्फ्यू को मानने से इन्कार कर दिया है. तीन दिनों में तीन लोग मारे जा चुके थे और पंद्रह गंभीर रूप से जख्मी थे. अखबार बंद करा दिए गए हैं, लेकिन जो भी इंटरनेट पर छानबीन करना जानता है, वो पाएगा कि नौजवान कश्मीरियों का गुस्सा उतना अवज्ञाकारी और साफ जाहिर नहीं है, जितना यह 2008, 2009 और 2010 की गर्मियों के जन उभार के दौरान था – यहां तक कि उन मौकों पर 180 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इस बार गुस्सा सर्द और तीखा है. निर्मम. क्या ऐसी कोई वजह है कि इसे ऐसा नहीं होना चाहिए था?

20 वर्षों से भी अधिक समय से, कश्मीरी एक फौजी कब्जे को भुगत रहे हैं. जिन दसियों हजार लोगों ने अपनी जानें गवाईं, वे जेलों में, यातना शिविरों में और असली और फर्जी ‘मुठभेड़ों’ में मारे गए. अफजल गुरु की फांसी को जो बात इन सबसे अलग बनाती है, वो यह है कि इस फांसी ने उन नौजवानों को, जिन्हें कभी भी लोकतंत्र का सीधा अनुभव नहीं रहा है, सबसे आगे की कुर्सियों पर बैठ कर भारतीय लोकतंत्र को पूरी महिमा के साथ काम करते हुए देखने का मौका मुहैया कराया है. उन्होंने पहियों को घूमते हुए देखा है, उन्होंने एक इंसान को, एक कश्मीरी को फांसी देने के लिए इसके सारे पुराने संस्थानों, सरकार, पुलिस, अदालतों, राजनीतिक दलों और हां, मीडिया को एकजुट होते हुए देखा है, जिसके बारे में उऩका मानना है कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं हासिल हुई थी. और उनके यह मानने की खासी वजहें हैं.

निचली अदालत में सुनवाई के सबसे अहम हिस्से में अफजल का पक्ष पेश करने वाला लगभग कोई नहीं था. अदालत द्वारा नियुक्त वकील कभी उनसे जेल में नहीं मिला, और असल में उसने अपने खुद के मुवक्किल के खिलाफ इल्जाम लगाने वाले सबूत पेश किए. (सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार किया और फिर फैसला किया कि यह ठीक है.) संक्षेप में, किसी भी तरह से तर्कसंगत संदेहों के परे जाकर उनका अपराध साबित नहीं हुआ. उन्होंने देखा कि सरकार ने उन्हें फांसी की सजा का इंतजार कर रहे लोगों में से चुन कर, बेवक्त फांसी दे दी. यह नया सर्द, तीखा गुस्सा किस दिशा में जाएगा और कौन सी शक्ल अख्तियार करेगा? क्या यह उन्हें वह मुक्ति (आजादी) दिलाएगा, जिसकी उन्हें इतनी चाहत है और जिसके लिए उन्होंने एक पूरी पीढ़ी कुरबान कर दी है. या इसका अंजाम तबाही से भरी हुई हिंसा का एक और सिलसिले में, कुचल दिए जाने और फौजी बूटों द्वारा थोपी गई ‘सामान्य हालात’ वाली जिंदगी में होगा?

हममें से जो भी इलाके में रहते हैं, वे जानते हैं 2014 एक ऐतिहासिक साल होने जा रहा है. पाकिस्तान, भारत और जम्मू और कश्मीर में चुनाव होंगे. हम जानते हैं कि जब अमेरिका अफगानिस्तान से अपने फौजियों को निकाल लेगा तो पहले से ही गंभीर रूप से अस्थिर पाकिस्तान की अव्यवस्था कश्मीर तक फैल जाएगी, जैसा कि पहले हो चुका है. जिस तरह से अफजल को फांसी दी गई है, उससे भारत सरकार ने इस अस्थिरता की प्रक्रिया को बढ़ाने का फैसला किया है, असल में उसने इसकी दावत दी है. (जैसा कि इसने पहले भी, 1987 में कश्मीर चुनावों में धांधली करके किया था.) घाटी में लगातार तीन सालों तक चले जनांदोलन के 2010 में खत्म होने के बाद सरकार ने ‘सामान्य हालात’ का अपना वर्जन लागू करने की काफी कोशिश की है (खुशहाल सैलानी, वोट डाल रहे कश्मीरी). सवाल है कि क्यों यह अपनी ही कोशिशों को पलटना चाहती है? जिस तरह अफजल गुरु को फांसी दी गई, उसके कानूनी, नैतिक और उसके अमानवीय पहलुओं को परे कर दें और इसे एक महज राजनीतिक, कार्यनीतिक रूप में देखें तो यह एक खतरनाक और गैरजिम्मेदार काम है. लेकिन यह किया गया है. साफ साफ और जान बूझ कर. क्यों?

मैंने ‘गैरजिम्मेदार’ शब्द सोच-समझ कर ही इस्तेमाल किया है. पिछले कुछ समय में जो हुआ है, उस पर नजर डालते हैं.

2001 में, संसद पर हमलों के हफ्ते भर के भीतर (अफजल गुरु की गिरफ्तारी के कुछ दिनों के बाद) सरकार ने पाकिस्तान से अपने राजदूत को बुला लिया और अपनी पांच लाख फौज सरहद पर भेज दी. ऐसा किस आधार पर किया गया? जनता को सिर्फ यही बताया गया कि दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की हिरासत में अफजल गुरु ने पाकिस्तान स्थित एक चरमपंथी समूह जैश-ए-मुहम्मद का सदस्य होना कबूल किया है. सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को कानून की नजर में अमान्य करार दिया. लेकिन कानून की नजर में जो अमान्य है वो क्या जंग में मान्य हो जाता है?

मामले के अपने अंतिम फैसले में, ‘सामूहिक अंतरात्मा की संतुष्टि’ वाले अब मशहूर हो गए बयान और किसी सबूत के न होने के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इसका ‘कोई सबूत नहीं था कि मोहम्मद अफजल गुरु का संबंध किसी आतंकवादी समूह या संगठन से है.’ तो फिर कौन सी बाद उस फौजी चढ़ाई, फौजियों के जान के उस नुकसान, जनता के पैसे को पानी के तरह बहाए जाने और परमाणु युद्ध के वास्तविक जोखिम को जायज ठहराती है? (विदेशी दूतावासों द्वारा यात्रा सुझाव जारी किया जाना और अपने कर्मचारियों को वापस बुलाया जाना याद है?) संसद हमले और अफजल गुरु की गिरफ्तारी के पहले क्या कोई खुफिया सूचना आई थी, जिसके बारे में हमें नहीं बताया गया? अगर ऐसा था, तो हमले को होने कैसे दिया गया? और अगर खुफिया सूचना सटीक थी, और इतनी सटीक थी कि उससे ऐसी खतरनाक फौजी तैनाती को जायज ठहराया जा सकता था, तो क्या भारत, पाकिस्तान और कश्मीर की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वह क्या थी? अफजल गुरु का अपराध साबित करने के लिए वह सबूत अदालत में क्यों नहीं पेश किया गया?

संसद पर हमले के मामले की सारी अंतहीन बहसों में से इस मुद्दे पर, जो कि सबसे अहम मुद्दा है, वामपंथी, दक्षिणपंथी, हिंदुत्वपंथी, धर्मनिरपेक्षतावादी, राष्ट्रवादी, देशद्रोही, सनकी, आलोचक - सभी हल्कों में मुर्दा खामोशी है. क्यों?

हो सकता है कि हमले के पीछे जैश-ए-मुहम्मद का दिमाग हो. भारतीय मीडिया के जाने-माने ‘आतंकवाद’ विशेषज्ञ प्रवीण स्वामी ने, जिनके भारतीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों में ऐसे सूत्र हैं कि जलन होती है, हाल ही में एक पूर्व आईएसआई प्रमुख ले. जन. जावेद अशरफ काजी के 2003 के एक बयान का और एक पाकिस्तानी विद्वान मुहम्मद आमिर राणा की 2004 की एक किताब का हवाला दिया है, जिसमें संसद हमले में जैश-ए-मुहम्मद को जिम्मेदार ठहराया गया है. (एक ऐसे संगठन के मुखिया के बयान की सच्चाई पर यकीन करना दिल को छू गया, जिसका काम भारत को अस्थिर करना है.) लेकिन तब भी यह नहीं बताता कि 2001 में जब फौजी तैनाती हो रही थी, तो कौन से सबूत पास में थे.

चलिए बहस की खातिर मान लेते हैं कि जैश-ए-मुहम्मद ने हमला कराया था. हो सकता है कि आईएसआई भी इसमें शामिल हो. हमें यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान सरकार कश्मीर में छुपी हुई गतिविधियां करने से पाक-साफ है. (जैसे कि भारत सरकार बलूचिस्तान और पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में करता है. याद करें कि भारतीय सेना ने 1970 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी को और 1980 के दशक में लिट्टे सहित छह विभिन्न श्रीलंकाई तमिल चरमपंथी समूहों को प्रशिक्षण दिया था.)

यह एक गंदा नजारा है. पाकिस्तान से जंग से क्या हासिल होने वाला था और अभी इससे क्या हासिल होगा? (जानों के भारी नुकसान के अलावा. और हथियारों के कुछ डीलरों के बैंक खातों के फूलते जाने के अलावा.) भारतीय युद्धोन्मादी लगातार यह सुझाव देते हैं कि ‘समस्या को जड़ से खत्म करने’ का अकेला तरीका ‘सख्ती से पीछा करते हुए’ पाकिस्तान में स्थित ‘आतंकवादी शिविरों’ को ‘खत्म करना’ है. सचमुच? यह देखना दिलचस्प होगा कि हमारे टीवी के पर्दों पर दिखने वाले कितने आक्रामक रणनीतिक विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों के हित रक्षा और हथियार उद्योग में हैं. उन्हें तो युद्ध की जरूरत तक नही है. उन्हें एक युद्ध-जैसी स्थिति की जरूरत है, जिसमें फौजी खर्च का ग्राफ ऊपर चढ़ता रहे. सख्ती से पीछा करने का खयाल बेवकूफी भरा है और जितना लगता है उससे कहीं अधिक दयनीय है. वे किन पर बम गिराएंगे? कुछ व्यक्तियों पर? उनके बैरकों और भोजन की आपूर्ति पर? या उनकी विचारधारा पर? देखिए कि अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा ‘सख्ती से पीछा किया जाना’ किस अंजाम को पहुंचा है. और देखिए कि कैसे पांच लाख फौजियों का ‘सुरक्षा जाल’ कश्मीर की निहत्थी, नागरिक आबादी को काबू में नहीं कर पाया है. और भारत सरहद पार करके एक ऐसे देश पर बम गिराने जा रहा है जिसके पास परमाणु बम है और जो अव्यवस्था में धंसता जा रहा है. भारत में युद्ध चाहनेवाले पेशेवरों को पाकिस्तान के बिखराव को देख कर काफी तसल्ली मिलती है. जिसे भी इतिहास और भूगोल की थोड़ी बहुत, कामचलाऊ भी जानकारी होगी, वो जान सकता है कि पाकिस्तान का टूटना  (उन्मादी, नकारवादी, धार्मिक हिमायतियों के गैंगलैंड के रूप में बिखर जाना) किसी के लिए भी खुशी मनाने की वजह नहीं है.

अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी मौजूदगी और आतंक के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी मातहत के रूप में पाकिस्तान की भूमिका ने इस इलाके को सबसे ज्यादा खबरों में बने रहने वाला क्षेत्र बना दिया है. वहां जो खतरनाक चीजें हो रही हैं, कम से कम बाकी की दुनिया उनके बारे में जानती है. लेकिन उस खतरनाक तूफान के बारे में बहुत कम जाना-समझा जाता है और उससे भी कम पढ़ा जाता है, जो दुनिया की पसंदीदा नई महाशक्ति की दुनिया में तेजी अख्तियार कर रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से मुश्किलों में है. आर्थिक उदारीकरण ने नए-नए बने मध्य वर्ग में जो आक्रामक, लालची महत्वाकांक्षा पैदा की है वो तेजी से उतनी ही आक्रामक हताशा में बदल रही है. जिस हवाई जहाज में वे बैठे थे, वो उड़ान भरने के फौरन बाद बंद हो गया है. खुशी का दौरा आतंक में बदल रहा है.

आम चुनाव 2014 में होने वाले हैं. एक्जिट पोल के बिना भी मैं आपको बता सकती हूं कि नतीजे क्या रहेंगे. हालांकि हो सकता है कि यह खुली आंखों से न दिखे, हमारे पास एक बार फिर कांग्रेस-भाजपा गठबंधन होगा. (दोनों में से हरेक दल के दामन पर अल्पसंख्यक समुदायों के हजारों लोगों के जनसंहारों के दाग हैं.) सीपीआई (एम) बाहर से समर्थन देगी, हालांकि उससे यह मांगा नहीं जाएगा. ओह, और यह एक मजबूत राज्य होगा. (फांसी के मोर्चे पर, फंदे तैयार हैं. क्या अगली बारी पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के लिए फांसी का इंतजार कर रहे बलवंत सिंह रजोआना की होगी? उनकी फांसी पंजाब में खालिस्तानी भावनाओं को भड़का देगी और अकाली दल को फायदा पहुंचाएगी. यह कांग्रेसी राजनीति का वही पुराना तरीका है.)

लेकिन पुराने तरीके की वह राजनीति कुछ मुश्किलों में है. पिछले कुछ उथल-पुथल भरे महीनों में, केवल मुख्य राजनीतिक दलों की छवि को ही नहीं, बल्कि खुद राजनीति को, राजनीति के विचार को जैसा कि हम इसे जानते हैं, धक्का लगा है. फिर और फिर से, चाहे वो भ्रष्टाचार हो, कीमतों का बढ़ना हो या बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा हो, नया मध्य वर्ग बैरिकेडों पर है. उन पर पानी की बौछारें छोड़ी जा सकती हैं या लाठी चलाई जा सकती है, लेकिन गोली चला कर उनको हजारों की संख्या में मारा नहीं जा सकता, जिस तरह गरीबों को मारा जा सकता है, जिस तरह दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों, कश्मीरियों, नागाओं और मणिपुरियों को मारा जा सकता है - और मारा जाता रहा है. पुराने राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर पूरी तबाही नहीं लानी है, तो इस आक्रामकता को आगे बढ़ कर खत्म करना है, इसकी दिशा बदलनी है. वे जानते हैं कि राजनीति पहले जो हुआ करती थी, उसे वापस वही बनाने के लिए उनका मिल कर काम करना जरूरी है. तब एक सांप्रदायिक आग से बेहतर रास्ता क्या हो सकता है? (वरना और किस तरीके से एक धर्मनिरपेक्ष एक धर्मनिरपेक्ष बना रह सकता है और एक सांप्रदायिक एक सांप्रदायिक?) मुमकिन है कि एक छोटा सा युद्ध भी हो, ताकि हम फिर से नूराकुश्ती का खेल खेल सकें.

तब उस आजमाए हुए और भरोसेमंद पुराने राजनीतिक फुटबाल कश्मीर को उछालने से बेहतर समाधान और क्या हो सकता है? अफजल गुरु की फांसी, इसकी बेशर्मी और इसका वक्त, दोनों जानबूझ कर चुने गए हैं. इसने कश्मीर की सड़कों पर राजनीति और गुस्से को ला दिया है.

भारत इनको हमेशा की तरह क्रूर ताकत और जहरबुझी, मैकियावेलियाई चालबाजियों के साथ इसे काबू में कर लेने की उम्मीद करता है, जिन्हें लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने के लिए बनाया गया है. कश्मीर में युद्ध को दुनिया के सामने एक सबको समेटने वाले, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और उग्र इस्लामवादियों के बीच लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है. तब हमें इस तथ्य का क्या करना चाहिए कि कश्मीर के तथाकथित ग्रांड मुफ्ती (जो एक पूरा कठपुतली पद है) मुफ्ती बशीरुद्दीन असल में एक सरकार द्वारा नियुक्त मुफ्ती हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा नफरत से भरे हुए भाषण दिए और एक के बाद एक फतवे जारी किए और जो मौजूदा कश्मीर को एक डरावना, अखंड वहाबी समाज बनाने का इरादा रखते हैं? फेसबुक के बच्चे गिरफ्तार किए जा सकते हैं, लेकिन वे कभी नहीं. हम इस तथ्य का क्या करें कि जब सऊदी अरब (अमेरिका का मजबूत दोस्त) कश्मीरी मदरसों में पैसे झोंकता है तो भारत सरकार दूसरी तरफ देख रही होती है? सीआईए ने अफगानिस्तान में उन सारे वर्षों में जो किया, यह उससे अलग कैसे है? उन करतूतों ने ही ओसामा बिन लादेन, अल कायदा और तालिबान को जन्म दिया. उन करतूतों ने ही अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया. अब यह किस तरह के बुरे सपनों को जगाएगा?

समस्या यह है कि हो सकता है कि अब पुराने राजनीतिक फुटबॉल को काबू में करना पूरी तरह आसान नहीं रहे. और यह रेडियोएक्टिव भी है. हो सकता है कि यह महज एक इत्तेफाक न हो कि कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान ने ‘सामने आते परदृश्य’ से पैदा होने वाले खतरों के खिलाफ अपनी रक्षा की खातिर छोटी दूरी का जमीन से जमीन पर वार कर सकने वाले परमाणु मिसाइल का परीक्षण किया है. दो हफ्तों पहले, कश्मीर पुलिस ने परमाणु युद्ध में ‘बचाव की तरकीबें’ प्रकाशित की हैं. इसमें शौचालय-युक्त बमरोधी बेसमेंट बनाने के साथ साथ, जो इतना बड़ा हो कि पूरा परिवार इसके भीतर दो हफ्तों तक रह सके, कहा गया है: ‘एक परमाणु हमले के दौरान, गाड़ीचालकों को जल्दी ही पलट जाने वाली अपनी गाड़ियों के नीचे कुचलने से बचने के लिए उनसे निकल कर धमाके की तरफ छलांग लगानी चाहिए.’ और ‘उन्हें शुरुआती मतिभ्रम के लिए तैयार रहना चाहिए, जब धमाके की तरंगें गिरेंगी और अनेक महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताओं को हटा देंगी.’
 

मुमकिन है कि महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताएं पहले से ही गिर चुकी हों. शायद हम सबको अपनी जल्दी ही पलट जाने वाली गाड़ियों से कूद जाना चाहिए.

(अनुवादकीय नोट: नीचे से पांचवें पैराग्राफ की आखिरी पंक्ति में जहां ‘नूराकुश्ती’ का इस्तेमाल किया गया है, वहां अरुंधति ने Hawks & Doves का इस्तेमाल किया है. ये एक अंग्रेजी कॉमिक्स के अपराध से लड़ने वाले सुपरहीरो हैं. हालांकि इन दोनों का चरित्र अलग-अलग है, हॉक गरममिजाज और सख्त है तो डोव नरममिजाज है, लेकिन अपराध से दोनों मिल कर लड़ते हैं. यहां इनको क्रमश: भाजपा और कांग्रेस के साथ जोड़ कर दिखाया गया है. हिंदी में ऐसे पात्रों का अभी ध्यान नहीं आने की वजह से इसे 'नूराकुश्ती' में समेटने की कोशिश की गई है, फिर भी इसे इस टिप्पणी के साथ ही पढ़ा जाए.)

20-21 फरवरी की अखिल भारतीय आम हड़ताल को सफल करें

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/19/2013 01:49:00 AM



डकैत, उमरा और विद्रोही: पहली किस्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/19/2013 01:18:00 AM

हावर्ड ज़िन की चर्चित किताब 'अ पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स’ के 11 वें अध्याय 'रॉबर बैरन्स ऐंड रेबेल्स' का हिंदी अनुवाद. इसके अनुवादक हैं लाल्टू. अध्याय लंबा है, इसलिए हम इसे क्रमश: पोस्ट कर रहे हैं. पहली किस्त.

हावर्ड ज़िन की पुस्तक के प्रारंभिक अध्यायों के अनुवाद 1987 से 1995 के दरमियान पहल, साँचा, पल प्रतिपल, साक्षात्कार और पश्यंती पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। करीब पंद्रह वर्षों से 11 वें अध्याय के अनुवाद का पहला ड्राफ्ट तैयार पड़ा था। अब पूरा कर पाया हूँ। भारत की समकालीन परिस्थितियों और नव-पूँजीवाद के संदर्भ में उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में अमेरिकी पूँजीवाद और उसके विरोध में जन-संघर्ष का यह पाठ महत्त्वपूर्ण है।- लाल्टू

सन 1877 में देश की बाकी जनता को ऐसे संकेत दिए गए:- कालों को वापस अपनी जगह लौटा दिया जाएगा, गोरे मजदूरों की हड़तालें सही नहीं जाएँगी; उत्तर-दक्षिण के औद्योगिक व राजनैतिक रूप से संपन्न वर्ग देश को अपने हाथों में लेंगे और वे मानव इतिहास में आर्थिक वृद्धि की सबसे बड़ी यात्रा आयोजित करेंगे। इसके लिए काले, गोरे, चीनी श्रमिकों, यूरोपी आप्रवासियों और स्त्री श्रमिकों की मदद ली जाएगी और उनका शोषण भी किया जाएगा और लोगों को नस्ल, लिंग, राष्ट्रीय मूल और सामाजिक वर्ग के आधार पर अलग अलग कीमत चुकाई जाएगी, ताकि अत्याचार की अलग अलग तहें बनाई जा सकें – धन पहाड़ बनाए रखने की यह एक धूर्त चाल थी।

गृहयुद्ध के समय से (1861-65) से 1900 तक भाप और बिजली ने इंसानी नसों की जगह ले ली थी। लकड़ी की जगह लोहे ने और लोहे की जगह इस्पात ने (बेसेमर रासायनिक प्रक्रिया के ईजाद होने से पहले लोहे की इस्पात में ढलाई की दर प्रति दिन 3 से 5 टन थी, अब यही मात्रा 15 मिनटों में ढाली जा सकती थी)। मशीनों से इस्पाती औजार चलाए जा रहे थे। तेल के उपयोग से मशीनें लचीली रखी जातीं और घर, सड़कों, मिलों, में रोशनी भी जलती। लोग और सामान रेलगाड़ियों से जाते, जो वाष्पचालित थीं और इस्पात की लाइनों पर चलतीं। 1900 तक 1,93,000 मील लंबी लाइनें बिछ गई थीं। टेलीफोन, टाइपराटर और जोड़-घटाव की मशीनों से व्यापार की गति बढ़ी।

मशीनों से खेतीबाड़ी भी बदली। गृहयुद्ध के पहले एक एकड़ ज़मीन पर गेहूँ पैदा करने के लिए 61 घंटों की मेहनत लगती थी। सन 1900 तक यही काम 3 घंटे 19 मिनट में पूरा होने लगा। बर्फ के निर्माण से लंबी दूरी तक खाने का सामान ले जाना संभव हुआ और बंद लिफाफों या डिब्बों में मांस का व्यापार शुरु हुआ।


सूती मिलों के करघे भाप से चलते। सिलाई की मशीनें भाप से चलीं। भाप कोयले से बनी। कोयले के लिए अब न्यूमेटिक ड्रिल द्वारा अधिक गहराई तक ज़मीन खोदी गई। 1860 में खदानों से 1 करोड़ 40 लाख टन कोयला निकाला गया था; 1884 तक यही बढ़कर 10 करोड़ टन हो गया। अधिक कोयले से अधिक इस्पात बना। चूंकि कोयले की भट्ठियों में लोहे से इस्पात बनाया गया। 1800 तक दस लाख टन इस्पात बन रहा था; 1910 तक ढाई करोड़ टन। अब भाप की जगह बिजली ने लेनी शुरु कर दी थी। बिजली की तार के लिए तांबे की जरुरत थी। 1800 में यह 30,000 टन की मात्रा में तैयार किया गया; 1910 तक 500,000 टन की मात्रा में।

यह सब कर पाने के लिए नई प्रक्रियाओं और नई मशीनों के मेधावी खोजदानों, नई व्यापार संस्थाओं के कुशल व्यवस्थापकों और प्रशासकों, ज़मीन और खनिज से भरपूर देश और अस्वास्थ्यकर, खतरनाक और पीठतोड़ू काम करने के लिए बड़ी तादाद में इंसानों की ज़रूरत थी। यूरोप और चीन से आ रहे आप्रवासियों से नया मजदूर वर्ग बनना था। नई मशीनें खरीदने और रेल के नए किराए दे पाने में अक्षम किसानों को शहर में आ बसना पड़ा। 1860 से 1914 तक न्यूयार्क शहर की जनसंख्या 850,000 से बढ़कर 40 लाख, शिकागो की 110,000 से 20 लाख और फिलाडेल्फिया की 650,000 से बढ़कर 15 लाख हो गई।

बिजली के यंत्र आविष्कार करने वाले थामस एडीसन जैसे कुछेक आविष्कारक खुद ही व्यवसायों के व्यस्थापक बन गए। गुस्टावस स्विफ्ट सरीखे अन्य व्यापारियों ने दूसरों के आविष्कार इकट्ठे किए। उसने बर्फ से ठंडी की जाने वाली रेलगाड़ी को बर्फ से ही ठंडे रखे गोदाम के साथ जोड़कर डिब्बों में मांस पैक करने वाली पहली राष्ट्र्व्यापी कंपनी सन 1885 में बनाई। इस के निर्माता जेम्स ड्यूक ने सिगरेट की पन्नी मोड़ने वाली पहली मशीन बनाई, जो काग़ज मोड़कर, उनपर गोंद लगाकर और तंबाकू के छोटे टुकड़े डालकर प्रतिदिन 1 लाख सिगरेट बना सकती थी। 1890 में उसने चार सबसे बड़े सिगरेट निर्माताओं को मिलाकर अमेरिकन तंबाकू कंपनी बनाई।

हालांकि कुछेक लखपतियों ने गरीबी से शुरुआत की, अधिकांश ऐसे न थे। 1870 के बाद के दशक की 303 सूती मिलों, रेल-रोड और इस्पात उद्योग के अधिकारियों की मूल-पृष्ठभूमि पर अध्ययन से पाया गया कि इनमें से 90 प्रतिशत मध्य या उच्च-वर्ग परिवारों से आए थे। होराशियो ऐल्जर की “रैग्स टू रिचेस (चीथड़ों से संपन्नता तक)” की कहानियाँ कुछ ही लोगों के लिए सच और अधिकतर किंवदंतियाँ मात्र थीं, ऐसी किंवदंतियाँ जो लोगों पर नियंत्रण के लिए काम आती थीं।

धन इकट्ठा करने के अधिकतर तरीके सरकार और अदालतों के सहयोग से बनाए और कानूनन सही तरीके थे। कभी-कभार इस मिलीभगत की कीमत चुकानी पड़ती थी। थामस एडीसन ने न्यू जर्सी राज्य के हर राजनीतिज्ञ को अपने पक्ष में कानून बनाने के एवज में एक हजार डालर देने का वादा किया। डैनिएल ड्रू और जे गूल्ड ने न्यूयार्क राज्य विधान सभा सदस्यों पर ईरी रेलरोड (कंपनी) में निवेशित उनके 80 लाख डालर के “गीले स्टाक” (ऐसे स्टाक जो सही कीमत न दर्शाते हों) को कानूनन वैध ठहराने के एवज में 10 लाख डालर रिश्वत पर खर्च किए।

यूनियन पैसिफिक (संघीय प्रशांत) और सेंट्रल पैसिफिक (मध्य-प्रशांत) रेल कंपनियों को मिलाकर, खून-पसीने, राजनीति और लूट से पहली महादेशव्यापी रेल कंपनी बनी। सेंट्रल पैसिफिक पश्चिमी समुद्रतट से शुरु होकर पूर्व की ओर चली थी; इसने 90 लाख एकड़ की मुफ्त ज़मीन और 2 करोड़ 40 लाख डालर के बांड पाने के लिए वाशिंगटन में (सरकार में अधिकारियों को – अनु. ) 2 लाख डालर की रिश्वत दी और 3 करोड़ 60 लाख डालरों के अतिरिक्त भुगतान के साथ एक निर्माण (कंस्ट्रक्शन) कंपनी को 7 करोड़ 90 लाख डालर दिए, जो कि दरअसल इसकी अपनी ही कंपनी थी। तीन हजार आयरिश और दस हजार चीनियों ने चार साल तक प्रति दिन एक या दो डालर के मेहनताने पर निर्माण का काम किया।
 

यूनियन पैसिफिक ने नेब्रास्का राज्य से शुरुआत की और यह पश्चिम की ओर बढ़ी। इसे 1 करोड़ 20 लाख एकड़ मुफ्त ज़मीन और 2 करोड़ 70 लाख डालर के बांड दिए गए। इसने क्रेडिट मोबिलायर नामक कंपनी बनाई और उसे निर्माण-कार्य के लिए 9 करोड़ 40 लाख डालर दिए, जबकि असल खर्च केवल 4 करोड़ 40 लाख डालर का ही था। जाँच रुकवाने के लिए सस्ते दरों में कांग्रेस सदस्यों को प्रतिभूतियां बेची गईं। कुदाल निर्माता और क्रेडिट मोबिलियर के निर्देशक मैसाचुसेट्स राज्य के कांग्रेस सदस्य ओम्स एम्स के सुझाव पर ऐसा किया गया। उसने कहा, “इसमें कोई कठिनाई नहीं आती कि लोग अपनी संपत्ति को बचाने का ध्यान रखें।” यूनियन पैसिफिक ने बीस हजार श्रमिकों का उपयोग किया- ये पुराने फौजी और आयरिश आप्रवासी थे, जिन्होंने प्रतिदिन 5 मील लंबी लाइनें बिछाईं और जो गर्मी, ठंडक और अपनी ज़मीन पर हो रहे हमले का विरोध कर रहे इंडियनों के साथ लड़ने से सैंकड़ों की संख्या में मारे गए।

बीच में आने वाले शहरों से भर्त्तूकी (सबसिडी) पाने के लिए दोंनों रेल-कंपनियों ने अधिक लंबी और टेढ़ी-मेढ़ी दिशाओं में लाइनें बिछाईं। 1869 में गाजे बाजे और भाषणों के बीच दोनों टेढ़ी लाइनें यूटा राज्य में आ मिलीं।

रेल-कंपनियों द्वारा अंधाधुध लूट की वजह से बैंक प्रबंधकों ने उन पर अधिक नियंत्रण रखा चूँकि उन्हें चोरी से नहीं, बल्कि कानूनी तरीकों से अधिक मुनाफा कमाना था, जिससे वे लंबे समय तक टिक सकें। 1890 के बाद के दशक में देश की अधिकतर रेलवे कंपनियाँ छह बड़ी संस्थाओं में शामिल थीं। इनमें से चार पूरी तरह या कुछ हद तक मार्गन व्यापार-घराने के हाथ थीं, और बाकी दो कून, लोएब और सहयोगी बैंक मालिकों के पास थीं।

जे.पी.मार्गन एक बैंक मालिक का बेटा था। गृह-युद्ध के पहले उसने अच्छी कमीशन पर रेल-कंपनियों के स्टाक बेचने शुरू किए। गृहयुद्ध के दौरान एक सैनिक अस्त्रागार से उसने साढ़े तीन डालर प्रति की दर से पाँच हजार राइफिलें खरीदीं और उन्हे 22 डालर प्रति की दर से एक जनरल को बेच दिया। ये राइफिलें खराब थीं और उनको चलानेवालों के अँगूठे उड़ जाते थे। कांग्रेस की एक कमेटी ने एक दुर्बोध्य रिपोर्ट में इसे छोटे अक्षरों में रेखांकित किया। पर एक संघीय न्यायाधीश ने इस सौदे को मान्य कानूनी सौदा घोषित किया।

मार्गन ने खुद के बदले किसी और को 300 डालर देकर गृहयुद्ध में भेजकर अनिवार्य सैनिक सेवा से छुट्टी पा ली थी। ऐसा ही जॉन डी राकेफेलर, ऐंड्रू कार्नेगी, फिलिप आर्मर, जे गूल्ड और जेम्स मेलन ने किया था। मेलन के पिता ने उसे लिखा था, “अपनी जान पर खतरा मोले या स्वास्थ्य की हानि किए बिना भी एक व्यक्ति देशभक्त हो सकता है। ऐसी बेशुमार ज़िंदगियां हैं, जिनकी कीमत तुम्हारे जीवन से कम है।”

ड्रेक्सल, मार्गन और सहयोगियों की कंपनी को ही संयुक्त राज्य सरकार द्वारा 26 करोड़ डालर बाज़ार मे निकालने के लिए ठेका दिया गया था। सरकार इन बांड्स को सीधे भी बेच सकती थी, पर उसने इन बैंक मालिकों को 50 करोड़ डालर कमीशन देने का निर्णय लिया।

2 जनवरी,1889 को गुस्तावस मायर्स ने लिखा:


… ड्रेक्सल, मार्गन और सहयोगी, ब्राउन बंधु और सहयोगी, और किडर, पीबाडी और सहयोगी इन तीन कंपनियों ने “निजी व गोपनीय” लिखा हुआ एक सर्कुलर जारी किआ। इस सर्कुलर को प्रेस में या लोगों तक पहुँचाने से रोकने को अत्यंत सवधानी बरती गई थी,.. यह डर क्यों? इसलिए कि उस सर्कुलर में … रेलकंपनियों के महाधनाढ्य मालिकों को मार्गन के घर, 219 मैडीसन एवीन्यू (न्यूयार्क शहर) पर, इकट्ठे होने को आमंत्रित किया गया था, जहाँ उन दिनों की भाषा में, एक लौह-वसन धारी जुट तैयार होना था… ऐसा गठबंधन जो कुछ और रेलकंपनियों की स्पर्धा को मिटा दे और आपस की समझ से उन हितों को इकट्ठा कर ऐसा समझौता लागू करे, जिससे संयुक्त राज्य की जनता का खून पहले से भी कहीं अधिक बहाया जा सके।

आर्थिक कुशलता की इस उत्तेजक कहानी की मानवीय कीमत थी। उस साल, 1889 के अंतर-राज्य व्यापार आयोग के आंकड़ों में में 22000 रेलरोड श्रमिकों को मृत या घायल दिखलाया गया था।

1895 में संयुक्त राज्य के स्वर्ण-मुद्रा संचय में कमी आई, जब कि न्यूयार्क शहर के छब्बीस बैंकों के संदूकों में 12 करोड़ 90 लाख डालर का सोना था। जे पी मार्गन व सहयोगी, आगस्ट बेलमांट व सहयोगी, राष्ट्रीय सिटी बैंक, और दूसरों की प्रधानगी में सरकार को बांड्स के विनिमय में सोना देने का प्रस्ताव आया। राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड ने इसो मान लिया। बैंक मालिकों ने तुरंत 1 करोड़ 80 लाख डालर के मुनाफे में फिर से बांड बेच दिए।

एक सांवादिक ने लिखा: “अगर गोमांस खरीदना हो तो कसाईखाने जाना पड़ता है… अगर मिस्टर क्लीवलैंड ज्यादा सोना चाहते हैं, तो उन्हें बड़े बैंक-मालिकों के पास जाना होगा।”

अपना मुनाफा कमाते हुए, मार्गन ने राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था में तर्कसंगति और सुव्यवस्था लाई। उसने व्यवस्था को स्थाई रखा। उसने कहा: “हम ऐसे आर्थिक झटके नहीं चाहते, जिससे एक दिन एक बात हो और दूसरे दिन कुछ और।” उसने रेलकंपनियों को एक दूसरे से, फिर उन सब को बैंकों से और बैंकों को बीमा कंपनियों से जोड़ा। 1990 तक 100,000 मील रेलरोड पर उसका नियंत्रण था, जो कि देश की संपूर्ण लाइनों का आधा था।

मार्गन गुट के आधिपत्य में तीन बीमा कंपनियों के खातों में 1 अरब डालर की राशि थी। उनके पास साधारण लोगों द्वारा बीमा पालिसी के लिए दिए गए धन में 5 करोड़ डालर की राशि प्रति वर्ष निवेश के लिए उपलब्ध थी। अदर पीपुल्स मनी (दूसरे लोगों का पैसा) शीर्षक पुस्तक में लुईस ब्रैंडाइस (सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश बनने से पहले) ने लिखा: “वे लोगों पर उनके ही पैसों से नियंत्रण रखते हैं।”

जारी

निजामुद्दीन

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/18/2013 12:41:00 AM

देवी प्रसाद मिश्र

पतली सी गली में गाय और उसकी बगल से एक औरत एक दूसरे
को लगभग छूते हुए गुजर जा रहे हैं और दोनों ही के पेट में बच्चा
है और दोनों ही थके हुए हैं और दोनों में से किसी को घर पहुंचने
की जल्दी नहीं है और इन दोनों के बीच से एक आदमी निकल
रहा है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पुलिस का आदमी है
और लोगों पर निगाह रखने का काम करता है और इन तीनों के
बगल से पतंगों को लेकर तेजी के साथ एक लड़का निकला और
फिर बुर्के में एक औरत सामने से आती हुई दिखी जिसके पास
ये सहूलियत तो है ही कि वह जिस तरह से चाहे रो ले या कितने
भी वाहियात तरीके से हंस ले। गली में बहादुर शाह जफर को
गिरफ्तार किये जाने की खबर नयी जैसी ही है और उतनी ही नयी
है बम धमाके के मामले में एक आदमी की गिरफ्तारी की खबर।
कोने के रेस्तरां में एक आदमी एक मेज पर कोहनी रख कर बैठा
है जिसका आमलेट उसके सामने पड़ा है। ठंडा और खत्म। इसका
पता हो सकता है कम को हो कि एक सुरंग खोदी गयी है जिससे
होकर लोग गुजरात से निजामुद्दीन आया जाया करते हैं। यह सुरंग
अंदर ही अंदर खोने और होने की तरह रही है। कई अफवाहें रही
हैं निजामुद्दीन के बारे में।

(2)
गली से निकला तो एक
पेड़ मिल गया और गिन कर
बता सकूं तो इक्कीस चिडि़यां
थोड़ा और बढ़ा
तो पता लगा सत्रह बच्चे मिले

और एक पेड़ के बाद इक्कीस और पेड़

यह उस रास्ते का हाल है जिसे मैं हिन्दी साहित्य की तरह बियाबान
वगैरह कहता रहा था

फिर जो लड़की मिली वह तो
तीसरी या चैथी परम्परा सरीखी थी। दुबली सी।

पता ये लगा कि वह जीनत थी
जो मेरठ युनिवर्सिटी से बीए करने के बाद
इंदिरा गांधी ओपन युनिवर्सिटी से
अंग्रेजीजी में एमए करना चाहती थी

मतलब कि जिस लड़की ने कभी
1857 में अंग्रेजों को बाहर करने की मुहिम चलायी थी

वही

(3)
रहीम के मकबरे में टहलते हुए ये लगता है कि रहीम अब मिले कि तब। वो नहीं मिलते हैं और एक कवि के दूसरे कवि से मिलने का हादसा फिलहाल तो टल जाता है। मकबरे में घूमते हुए कबूतरों के फड़फड़ाने की आवाजें गूंज रही हैं और इस तरह की आवाजें कि भइये पानी रखना! मकबरे में मैं घूम रहा हूं। वहां कोई आने वाला है कि मैं किसी के चले जाने की गूंज में टहल रहा हूं। कि जैसे हिन्दी के बियाबान में अपनी ही कब्र के चारों तरफ। एक फोन आ रहा है - हो सकता है इस बात का कि जो कयामत हिन्दी कविता को तबाह कर देगी वह आ रही है और सराय काले खां तक वह पहुंच भी गयी है।


(4)
हेलो... ठीक है... हम दोनों निजामुद्दीन में गालिब की कब्र के पास की चाय की दुकान में चले चलेंगे। वहां आसपास शोर तो बहुत होता है और बच्चे ऐसा कोहराम मचा रहे होते हैं कि पूछिये मत - लगता है कि मरदूदों को खुश होने से कोई नहीं रोक सकता। भूख तक नहीं। लेकिन अब और कहां मिला भी जाय - शहर में एक ढंग की जगह मिलेगी भी तो उससे पचास गज की दूरी पर एक औरत के उलटी करने की गोंगों सुनाई न पड़ जायेगी इसकी क्या गारंटी।
 

अब आप से क्या छिपाना
मार्क्सवाद से मैं भी निजात पा लेना चाहता हूं

बस, आप मिलिए और

शिनाख्त के लिए बता दूं कि चाय की दुकान में
मैं लाल रंग की पतंग लेकर मिलूंगा जो
इस रंग से मेरा आखिरी नाता होगा

उसके बाद मैं उसे उड़ा दूंगा। हमेशा के लिए।
जाहिर है आसमान में।

लेकिन आपको मैं पहले ही आगाह किये देता हूं
कि आपको मुझे ढंग से समझाना होगा
केवल एक वक्त का दाल चावल खाकर
मैं आपका होने से रहा

(5)
इंतजार में बैठे बैठे बहुत तेज जमुहाई आयी मन में
क्यों कोहराम मचा है दिन का कचरा रात गंवायी कहां
बहुरिया गुम है बालम बल्लम दिखता नोंक दिखायी
जिन्दा रह कर क्या कर पाए मरने पर क्यों तोप चलायी
कौन इलाका बदले अपना कव्वाली में कजरी गायी पूंजी
इतना गूंजी है कि जो भी थी आवाज गंवायी आओ
खुसरो इस झोपड़ में जो चूता है सेज सजायी गालिब
यहीं कहीं होते हैं लोग नहीं तो बकरी आयी

(6)
अब इसका क्या किया जाय कि शायरों की कब्रों पर बकरियां काफी घूमा करती हैं फिर वो नजीर की कब्र हो या एक वक्त में गालिब की ही। असद जैदी ने अपने शरारती अंदाज में जब यह ठहाके लगाते हुए कहा तो मैंने उनसे ये नहीं कहा कि इस बात को हिन्दी कविता के तौर पर कह देने में तो कोई हर्ज नहीं। यों भी मैं यह थोड़े ही कह रहा था कि हिन्दी कविता में बाजाबिता नजीर अकबराबादी को शामिल किया जाय गोकि इस मांग पत्र की कोई न कोई कार्बन कॉपी मेरे पास होती जरूर है और वह मेरे मरने के बाद मेरी किसी जेब में मिलेगी फिर आप मुझे गाड़ें, जलाएं या फिर चीलों के हवाले कर दें। मतलब कि आप गाडेंगे तो वहां बकरियां आया करेंगीं, जलायेंगे तो मुझे गंगा के नाले के हवाले होना पड़ेगा। लेकिन आप तक यह बात किस अफवाह की तरह पहुंची कि चील माने हिन्दी के कई आलोचक जो सबसे ज्यादा सत्ता के शव पर मंडराते हैं। लब्बो-लुआब ये कि मैं चीलों से तो बच जाऊंगा।
 

मैं कमहैसियत।

(7)
पता नहीं यह किस्सा गालिब ने कभी सुनाया भी या कि कभी नहीं सुनाया कि एक आदमी सत्ता का गुलाम हो जाया करता था और उसको इसका नुकसान यह हुआ कि उसका फायदा कम होता ही नहीं था।

(8)
गालिब ने और क्या कहा था या क्या नहीं कहा था ये सोचते न सोचते मैं जा रहा था कि निजामुद्दीन की एक इंतिहापसंद गली में ये जूता मिला। किसी जैदी का ये जूता है। अमां वही जैदी जिसने एक जूता बुश पर फेंका था। दूसरा बच गया और यहां निजामुद्दीन में पड़ा मिला। अब आपने यह कह कर मेरे मन में फांक डाल दी कि हो सकता है यह जूता जैन अल आबिदीन का हो जो खुदा खैर करे मोहम्मद साहब के पड़पोते होते थे और जैद कहलाते थे। लेकिन देख ये रहा हूं कि ये तिलिस्म गहराता जा रहा है कि किसका ये जूता है क्योंकि जूता तो ये असदउल्ला गालिब का भी हो सकता है जो गौर तो आपने भी किया होगा कि अक्सर एक ही जूता पहने मिलते थे और दूसरा उन्होंने कमजर्फों की जानिब फेंका होता था और जिनकी कब्र जहां ये जूता मिला वहां से एक फर्लांग भी न होगी। लेकिन यह भी तो हो सकता है यह जूता निजामुद्दीन नाम के हजरत का हो जो अल्ला खैर करे कम मुतमव्विज तो कतई न थे। ये भी कहा जाता है कि वो भी अपना एक जूता किसी हाकिम की जानिब फेंके होते थे। और अफवाह तो ये तक है कि एक बार तो उन्होंने ये कारनामा अलाउद्दीन खलजी जैसे हुक्मरान के साथ कर दिखाया। अब अगर आखिरी बात तक पहुंच सकूं तो वो ये है कि एक जूता लेकर मैं निजामुद्दीन से घर लौट रहा हूं। और इस वक्त तो दिमाग में यही फितूर चल रहा है कि सारे आलिम फाजिल एक ही पैर में जूता पहनते हैं। दूसरा वो हुक्मरानों की जानिब फेंकते हैं।

(9)
जो मेरा हुक्मरान हो वो मेरा कौन हुआ
मैं किसी हिज्र की सी फिक्र में हुआ सा हूं
वो लियाकत जो मेरे काम बहुत न आयी
मुझको भी इल्म कहां मैं किसी दवा सा हूं
जो मुझे दोस्त करे और मेरी मुश्किल हो
मैं किसी ऐसे फलसफे पे क्यों फिदा सा हूं
ये तेरा साथ मेरे साथ में क्या क्या करता
मैं तेरे साथ में किस बात पे पहुंचा सा हूं
मैं निजामुद्दीन रहूं और करूं जिक्रे खैर मैं
भी क्यों होश में बेहोश या हवा सा हूं

(10)
ये मेरे होश में क्यों इतनी गड़बड़ी सी है
ये मेरे जोश में क्यों इतनी हड़बड़ी सी
है ये किसी से जो कहूं तो भी कहना
बाकी ये मेरी फिक्र किस उजाड़ की
घड़ी सी है ये कहीं से जो उठायी तो
कहीं रक्खी सी ये कोई बात थी जो यूं
ही क्यों पड़ी सी है मेरे लिखने पे मेरे
यार तेरा क्या लिखना वो कोई जिद है
जो हमसे कहीं बड़ी सी है ये जो बदली
नहीं दुनिया तो मैं बदला बदला वो मेरी
शक्ल किस सियाह में मढ़ी सी है मेरे
होने का हुनर और मेरा ये होना क्योंकि
छोटी हो बहर नज्म तो बड़ी सी है लाल
है वो कि खुदाया हुआ दलाल भी है
शक्ल हो अक्ल हो कि हाल में पढ़ी सी
है मैं निजामुद्दीन हुआ और हुआ और
हुआ वो कोई हद नहीं अनहद की जो
कड़ी सी है

(11)
तू मुझे देखता है क्या कि मैं कुछ बम सा हूं
तू मुझे देखता है क्यों कि मैं कुछ कम सा
हूं मैं कहीं हूं तो कभी हूं तो कोई भी होकर
इतना बहता है पसीना तो मैं कुछ नम सा हूं
वो जो है इत्मिनान और सुकूं और तराश मैं
हूं क्यों इतना अचानक कि मैं कुछ धम सा
हूं मुझको वो फिक्र नहीं क्योंकि मेरा जिक्र
नहीं इतना पीकर भी कहूं क्योंकि मैं कुछ
खम सा हूं अब तो ये वक्त है कि वक्त
कुछ बचा भी नहीं मैं अकेला ही सोचता
हूं कि मैं कुछ हम सा हूं मैं भी देखा किया
दरगाह में बैठे बैठे मैं किसी कोने में उखड़ा
हुआ बे-दम सा हूं

(12)
ये मेरी हसरत का वाकया है तुम्हारी हसरत भी जान लूं मैं
किसी सड़क पर अगर मिलो तो ये सूखी रोटी ही बांट लूं
मैं ये किस तरफ से निकल पड़े हो बहुत खुशी तो कभी
नहीं थी जो देखा ऊपर तो देखा नीचे कि कैसे रहते कि
छत नहीं थी अभी किसी से कहूं तो क्या कि कहां से मैंने
शुरू किया था जो हाथ लिखता है वो हाथ मैंने किसी को
यूं ही क्यूं दे दिया था ये किस्सा इतना है जितना जानो ये
मेरे हिस्से की रोशनी है ये मेरी चादर है तेरी चादर बहुत
पसीने में खूं सनी है

(13)
वो तुमने किस तरह देखा मैंने तो यूं देखा
तुमने क्या देखा जहां मैंने बदायूं देखा तुम
तो न्यूयार्क या इस्तानबुल या पिक्काडिली
मैंने इलाहाबाद न देखा तो क्यों हर सू देखा
मैं जो दाखिल हुआ उस माल में बेगाना सा
मैंने यक बोझ के नीचे फंसा सा कूं देखा
तुमने भी देख लिया मेरा अकेला पड़ना मैंने
जो खुद को हटाया तो मैंने हूं देखा जिस
तरह खत्म हुआ जश्न तो फिर शक भी हो
तुमने जो दांत दिखाया तो मैंने खूं देखा मैंने
जो देख लिया तो जो मेरा हाल हुआ मैं भी
कहता हूं निजामुद्दीन मैंने यूं देखा मैं भी
क्यों हद में नहीं और ये मेरा बेहद क्यों मैंने
इश्क न देखा जो मैंने तूं देखा

(14)
सबकी तरफ से लिखने का अंजाम देख लो
ये काम कितना बढ़ गया ये काम देख लो
कितना ही कहा कह गये तो कितना कम
कहा कहने को हुआ नाम तो ये नाम देख लो
बाजार में भी बैठ गये और कहा जी जो लग
गये वो दाम जरा दाम देख लो सबकी तरफ
से बोलने का रोजगार ये हमको जो देखो देख
कर नाकाम देख लो मकसद है कोई और
तो फिर सोचना फिजूल जो सुबह सी दिख
जाये तो ये शाम देख लो अब मार्क्स हो कि
माल हो कि कर सको बहस अब लालगढ़
को देख लो, आवाम देख लो जो गिर गयी
मस्जिद तो अब आराम बहुत हो अब रह
रहे हैं राम तो बदनाम देख लो

(15)
मुशायरा रात भर चलता रहा। लोगों का ये हाल था कि जैसे मय्यत में होकर लौटे हों। एक जबान जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि बीस पचास साल से ज्यादा नहीं बचने वाली उसमें इतना कोहराम था कि पूछिये मत। मतलब कि कोहराम ऐसा था कि अगर जबान नहीं भी बची रही तो कोहराम बचा रहेगा। ऐसी आम राय थी। मुशायरे के खत्म होते न होते पानी बरसने लगा और एक कराह की तरह अल्ला हू अकबर गूंजा जो टूटे दरवाजों, फटे कपड़ों, कांपती तसबीह, संकरी गलियों के बीच से होता मुंडेरों के ऊपर से मुर्गों के पंखों और एक लड़की के सात दिनों से झूलते दुपट्टे को छूता निकल गया। जिस लड़की के दुपट्टे का जिक्र है वह पिछले पांच दिनों से बुखार में पड़ी है और छत पर आ नहीं सकी है और आना भी नहीं चाहती है और दिन भर रोती रहती है और मर जाना चाहती है और फिरोजाबाद की चूड़ी की फैक्टरी से निकाल दी गयी है और ताई के यहां से लौट आयी है और मामू के यहां मुरादाबाद जाना नहीं चाहती और न ही कतर और कुछ बताती नहीं कि क्या। कि क्या कुछ। कि क्या नहीं। मरी यही कहती है कि मर जाने दो। कि भाई उड़ा उड़ा रहता है। कि पता नहीं क्या चाहता है। कि इस बीच कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है। तीन चार पुलिस वाले शायरों को ये गाली देते हुए गली से निकले कि कलाम को ये छोटा नहीं कर सकते थे क्या। जल्दी निपट जाते। एक पुलिस वाला फुटपाथ पर पड़े एक आदमी के पास खड़ा हो गया है और ये जानने की कोशिश कर रहा है कि आदमी सो रहा है या मर रहा है।

(16)
लौटते हुए
गुजरते हुए बगल से दरगाह के
मैंने बहुत सारी मनौतियां
मांगीं। कि।
कि मेरा राजनीतिक एकांत आंदोलन में बदल जाये।
मेरा दुःख अम्बानी की विपत्ति में।
मुंतजर अल जैदी को अपना दूसरा जूता मिल जाये।
बुश के घर की छत उड़ जाये।
वित्त मंत्री एक भूखे आदमी का
वृत्तांत बताते हुए रोने लग जाय
मेरा बेटा घड़ा बनाना सीख जाये।
एक कवि का अकेलापन हिन्दी की शर्म में बदल जाये।
 

मैंने मन्नतें मांगी कि
नये को ब्राह्मण की रसोई में घुस आये
कुकुर की तरह दुरदुराया न जाये और
हिन्दी में अलग थलग पड़ी विपत्ति की
एक कहानी और एक कविता
सारे विशेषांकों पर भारी पड़ जाये
 

गरीबी की रेखा के नीचे रहता हर आदमी
रेखा के नीचे नीचे नीचे
चलता चलता चलता
निजामुद्दीन पहुंच जाये जहां गांव को
गुड़गांव में न बदला जाये बेशक
आजमगढ़ को लालगढ़ में बदल दिया जाये मतलब कि
शहरों को फिर से बसाया जाय
 

और
 

और सोचा जाय
और सोचा जाय
और सोचा जाय
 

और सोचा जाय लेकिन फेनान की तरह
और रहा जाय लेकिन किसान की तरह
और गूंजा जाय लेकिन बियाबान की तरह
 

अब घर लौटा जाय
निजामुद्दीन के साथ।
फरीद के साथ। नींद के साथ।
बियाबान में गूंजती हारमोनियम की
आवाजों जैसी नागरिकता की पुकारों के साथ।
गुहारों के साथ।
 

घर लौटा जाय
और घर छोड़ा जाय
जिसके लिए मैंने मनौती मांगी है कि
वह आदिवास में बदल जाये और मेरा बेटा
संथालों के मेले में खो जाये।

(पहली बार तद्भव में प्रकाशित)

अफजल को फांसी: कुछ कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/17/2013 06:24:00 PM

सूरज के लिए

वरवर राव

ओ दुश्मन
एक खुशनुमा सुबह की उनींदी घड़ियों में
उन हाथों को पीछे बांधने के बाद,
जो सूरज के लिए लड़े थे
उन आंखों पर पट्टियां बांधने के बाद
जिन्होंने सूरज की राह देखी थी
उस गले में फंदा डालने के बाद
जिसने सूरज की बात की थी
जब तुम पीछे मुड़े
तो तुम्हें मिला खून की तरह लाल आसमान
जिसकी सुर्ख गोद में
अभी अभी किसी की आंखें खुली थीं.

तुम्हारी आंखें

बनोज्योत्सना लाहिड़ी


अपनी सारी नफरत, गुस्से, हिकारत और खौफ के बावजूद
कितने बेबस थे वे

तुम्हारी शांत आंखों के आगे
मीडिया की चकाचौंध और पुलिस के रिकॉर्डों के बावजूद
सुकून से महरूम वे दसियों लाख लोग


तुम चुपचाप देखते रहे
सारे शोरशराबे से मजबूत थी तुम्हारी यह चुप्पी
उन्होंने पहनाया तुम्हारे चेहरे पर एक काला नकाब
लेकिन अफजल, क्या खुद उनके आंखों पर नहीं बंधी थी पट्टियां?

और इसलिए मैं पीछे हट रही हूं
क्योंकि हम उन शांत आंखों में देखने के काबिल नहीं हो पाएंगे कभी
जो काले नकाब के पीछे से देखे जा रही हैं हमारी तरफ
कब्र के भीतर से भी...

अफजल, मैंने तैयार की तुम्हारे लिए कब्र
मैंने लगाया तुम्हारे लिए फंदा
मैंने लिखीं बेदाग झूठ से भरी वे कहानियां
रातों को जाग-जाग कर

लेकिन देखो
मेरी सारी कोशिशों के बावजूद
कितने छेद रह गए
कहानियों में, नकाब में, कब्र में
उन कोशिशों में, जो लोकतंत्र को गढ़ने के लिए की गईं
उन सारे छेदों में से
तुम झांक रहे हो
अपनी शांत आंखों से
चुपचाप

और मैं भाग रही हूं
बेचैन और पागल.

हमारे शहीद हमारे परचम हैं

रेयाज

हम अपने शहीदों को
अपना परचम बना लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं
तुम समझते हो कि शहीदों को उनकी कब्रों में कैद किया जा सकता है
इसलिए बिठा देते हो तुम वहां पहरे
हम जानते हैं कि शहीदों को कहां रखना है

तुमने छीन लिया वो जिस्म
जिसे एक दिन बेजान होना था,
वो सांसें, जो एक दिन सर्द पड़ जानी थीं
तुम्हारे फंदे ने रोक दी खून की वो रफ्तार
जिसे ठहर जाना था एक दिन वैसे भी

लेकिन उसका चेहरा
हमारे परचमों की शक्ल में
हमारे गांवों और कस्बों में
हमारी सड़कों और बस्तियों में लहरा रहा है
तुम दफना सकोगे उसे
कैसे दफना सकोगे उसे, मेरे लोकतंत्र

अपने शहीदों को हम
अपने कदमों की रफ्तार देते है
अपनी सांसों में पूरी करते हैं उनकी अधूरी जिंदगियां
वो देखते हैं हमारी आंखों से अपने सपने
हमारे संघर्ष पूरी करते हैं वो दास्तानें
जो हमारे शहीदों से शुरू हुई थीं

हमारी कतारों में शामिल हैं हमारे शहीद
और हमारी रूहों में भरी हुई है उनकी महक
हमारी मिट्टी में भरा है उनका इस्पात

हमारा परचम हमारे शहीदों का चेहरा है
जो हमारे कंधों के ऊपर से
देख रहे हैं अपने लोगों को
आगे बढ़ते हुए

फसलें उग रही हैं
नहरों में पानी बह रहा है
भट्ठियां जल रही हैं
चूल्हों पर खदबदा रहा है भात का पानी
रोटियां सिंक रही हैं तवों पर
दड़बों में मुर्गियां फड़फड़ा रही हैं
नीम पर उड़ान भरती है गौरैया
चाक घूमता है, निहाई आवाज करती है
धूल उड़ती है सड़कों पर

और हमारे शहीद
हमारे परचमों में धड़कते हुए
हमारे पास होते हैं

तुम छीन लोगे उन परचमों को
लेकिन उन पत्तियों को कैसे मिटाओगे
जो पेड़ों पर लगी हैं
उन फसलों को जो खेतों में हमारे पसीने की औलादें हैं
वो पानी कैसे खत्म करोगे, जो नहरों में गाता फिरता है
वो आग जो चूल्हों और भट्टियों में तप रही है
वो धूल जो सड़कों पर उड़ती है हवा के झोंके के साथ

हम जानते हैं
कि अपने शहीदों को कैसे रखना है अपने पास
अपनी विजय तक, और उसे बाद भी.

मुझे अदालत में अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया गया: अफजल गुरु

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/15/2013 04:00:00 PM


अफज़ल गुरु को हुई फांसी के बाद अब तक उठी तमाम बहसों में उसके द्वारा अपने वकील सुशील कुमार को लिखी गई चिट्ठी का जि़क्र बार-बार आया है। यह चिट्ठी अब एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है, क्‍योंकि इसमें एक आत्‍मसमर्पित आतंकवादी समूची राज्‍य व्‍यवस्‍था पर कुछ सवाल खड़े करता है, उसके काम करने के तरीकों को उजागर करता है और आखिरकार यह स्‍वीकार करता है कि उसकी नियति दरअसल अपने परिवार को बचाने की उसकी सदिच्‍छा का परिणाम थी। यह चिट्ठी अक्‍टूबर 2006 में दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा रखी गई एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सार्वजनिक की गई थी जिसके आधार पर मैंने साप्‍ताहिक पत्रिका 'सहारा समय' के आखिरी अंक (8 अक्‍टूबर 2006) में एक स्‍टोरी भी की थी। अफज़ल के मामले पर खर्च किए गए लाखों शब्‍दों पर यह इकलौती चिट्ठी भारी पड़ती है। विडंबना यह है कि अक्‍टूबर 2006 से लेकर अब फांसी दिए जाने के बीच सात साल के दौरान हालांकि यह चिट्ठी मीडिया में तकरीबन दबी ही रही, आज भले इसकी चर्चा हो रही हो लेकिन उसका शायद कोई मोल नहीं है। साथ में उस वक्‍त की कुछ तस्‍वीरें भी हैं। -अभिषेक श्रीवास्‍तव, जनपथ
 

माननीय श्री सुशील कुमार,
नमस्कार

मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं और अहसानमंद महसूस करता हूं कि आपने मेरे मुकदमे को अपने हाथ में लेकर मेरा बचाव करने का फैसला लिया। इस मुकदमे की शुरुआत से ही मेरी उपेक्षा की गई है और कभी भी मुझे मीडिया या न्यायालय के समक्ष सचाई उजागर करने का मौका नहीं दिया गया। तीन अर्जियों के बावजूद अदालत ने मुझे वकील मुहैया नहीं करवाया। उच्च न्यायालय में एक मानवाधिकार अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अफज़ल की इच्छा फांसी से लटकने की बजाय नशीला इंजेक्शन लेने की है। यह बात सरासर गलत है। मैंने अपने वकील को कभी ऐसा कुछ नहीं बताया था। चूंकि वह वकील मेरे या मेरे परिवार का चुनाव नहीं था, बल्कि मेरी असहायता और एक उपयुक्त वकील तक पहुंच न हो पाने का नतीजा था। उच्च सुरक्षा वाली जेल में कैद किए जाने और उस मानवाधिकार अधिवक्ता से कोई संवाद न होने की स्थिति में मैं उसे बदल नहीं सका या उच्च न्यायालय के सामने अपनी मृत्यु इच्छा संबंधी आपत्तियों को दर्ज नहीं करा सका चूंकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही यह बात मुझे पता चली।

संसद पर हमले वाले मामले में मुझे कश्मीर की स्पेशल टास्क फोर्स ने गिरफ्तार किया था। यहां दिल्ली में निर्धारित न्यायालय ने विशेष पुलिस के उस बयान के आधार पर मुझे फांसी की सजा सुनाई जो एसटीएफ के साथ मिलकर काम करती है और जिस पर मीडिया का खासा प्रभाव था जिसके समक्ष मुझे विशेष पुलिस एसीपी राजबीर सिंह के दबाव और खौफ के चलते अपराध कबूल करवाया गया। इस खौफ और दबाव की पुष्टि न्यायालय के समक्ष 'आज तक' के साक्षात्कर्ता शम्स ताहिर ने भी की।

जब मुझे श्रीनगर बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया तो मुझे एसटीएफ के मुख्यालय ले जाया गया। यहां से एसटीएफ और विशेष पुलिस मुझे दिल्ली ले आई। श्रीनगर के पारमपोरा पुलिस स्टेशन पर मुझसे मेरी सभी चीजें छीन ली गईं, मेरी पिटाई की गई और मुझे धमकी दी गई कि यदि मैंने किसी के भी सामने सचाई बयान की तो मेरी पत्नी और परिवार के लिए नतीजे बुरे होंगे। यहां तक कि मेरे छोटे भाई हिलाल अहमद गुरु को भी बगैर किसी वारंट इत्यादि के गिरफ्तार कर लिया गया और 2-3 महीनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया। यह बात सबसे पहले मुझे राजबीर सिंह ने बताई थी। विशेष पुलिस ने मुझसे कहा कि यदि मैं उनके मुताबिक बयान देता हूं तो मेरे परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और यह झूठा आश्वासन भी दिया कि वे मेरे मुकदमे को कमजोर कर देंगे जिससे कुछ दिनों बाद मैं रिहा हो जाऊंगा।


मेरी प्राथमिकता मेरे परिवार को सुरक्षित रखने की थी क्योंकि पिछले सात साल से मैं देख रहा हूं कि किस तरह एसटीएफ के लोग कश्मीरियों की हत्या कर रहे हैं, उन्होंने युवाओं को गायब किया है और उसके बाद पुलिस हिरासत में उन्हें मार डाला है। इन तमाम प्रताड़नाओं और हिरासत में मौतों का मैं एक जीता-जागता प्रत्यक्षदर्शी हूं और खुद एसटीएफ के खौफ और प्रताड़ना का शिकार हूं। चूंकि, मैं पहले जेकेएलएफ का आतंकवादी था और मैंने आत्मसमर्पण कर दिया था, मुझे विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों जैसे सेना, बीएसएफ और एसटीएफ ने मिलकर उत्पीड़ित, प्रताड़ित और खौफज़दा किया है। लेकिन, चूंकि एसटीएफ असंगठित बल है और राज्य सरकार द्वारा संरक्षित लुटेरों का एक गुट है, वे कश्मीर के किसी भी घर और किसी भी परिवार में किसी भी वक्त घुस जाते हैं। अगर एसटीएफ ने किसी को भी उठा लिया और उसके परिवार को इसकी जानकारी मिल जाती है, तो फिर परिजन सिर्फ लाश की ही उम्मीद रखते हैं और उसका इंतजार करते हैं। लेकिन अमूमन वे यह कभी नहीं जान पाते कि अपहृत व्यक्ति का ठिकाना क्या है। छह हजार जवान लड़के इस तरीके से गायब हो चुके हैं।

इन्हीं परिस्थितियों और भयपूर्ण वातावरण में मेरे जैसे लोग एसटीएफ के हाथों कोई भी गंदा खेल खेलने को तैयार हो जाते हैं जिससे कम से कम जान बची रहे। जो लोग पैसे खिलाने की क्षमता रखते हैं, उन्हें मेरी तरह बुरे काम करने को मजबूर नहीं किया जाता चूंकि मैं पैसे देने में अक्षम रहा था। यहां तक कि पारमपोरा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी अकबर ने तो मुझसे 5 हजार रुपए फिरौती की मांग की थी। यह बात संसद पर हमले से बहुत पहले की है। उसने मुझे धमकी दी थी कि फिरौती की रकम न मिलने पर वह मुझे नकली दवाएं और चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लेगा। मैं 2000 में सोपोर में इनका व्यापार करता था। वह भी यहां निर्धारित न्यायालय के समक्ष पेश हुआ था और उसने मेरे खिलाफ बयान दिया था। संसद पर हमले से बहुत पहले से वह मुझे जानता था। अदालत के कक्ष में उसने मुझे कश्मीरी में बताया कि मेरा परिवार सही सलामत है। दरअसल, यह एक छुपी हुई धमकी थी जिसे अदालत समझ नहीं पाई थी, नहीं तो मैंने जरूर अदालत के समक्ष उससे सवाल पूछा होता जब उसने अपना बयान दर्ज कराते वक्त यह बात मुझे बताई थी। पूरे मुकदमे के दौरान मैं मूक और असहाय दर्शक बना रहा जबकि सभी गवाह, पुलिस और यहां तक कि जज भी मिलकर मेरे खिलाफ एक हो गए थे। मैं अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित और असमंजस में रहा। अब मैंने अपने परिवार को बचा लिया है, भले ही यह झूठ बोलने के लिए मुझे मौत दी जा रही है तो क्या!

1997-98 में मैंने दवाइयों और चिकित्सीय उपकरणों का एक व्यापार कमीशन के आधार पर चालू किया, चूंकि एक आत्मसमर्पित आतंकवादी होने के नाते मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। आत्मसमर्पित आतंकवादियों को नौकरियां नहीं मिलतीं। उन्हें या तो एसटीएफ के साथ विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के तौर पर काम करना होता है या सुरक्षा बलों और पुलिस के संरक्षण में लुटेरों की मंडली में शामिल होना होता है। रोज ही ये विशेष पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के हाथों मारे जाते थे। ऐसी स्थिति में मैंने अपना कमीशन आधारित व्यापार शुरू किया जिससे महीने में 4-5 हजार की कमाई हो जाती थी। चूंकि, एसपीओ अक्सर उन आत्मसमर्पित आतंकवादियों को प्रताड़ित करते हैं जो एसटीएफ के साथ काम नहीं करते, लिहाजा 1998 से 2000 के बीच मुझे अमूमन 300 से 500 रुपए स्थानीय एसपीओ को देने पड़ते जिससे मैं अपना काम-धंधा जारी रख सकता था। नहीं तो ये एसपीओ मुझे सुरक्षा एजेंसियों के सामने ले जाते। एक एसपीओ ने तो मुझे एक दिन बताया भी था कि उसे अपने अधिकारियों को पैसे देने पड़ते हैं। मैंने मेहनत से काम किया और मेरा व्यापार चमक गया। एक दिन सुबह 10 बजे मैं दो महीने पहले ही अपने नए खरीदे स्कूटर से जा रहा था। मुझे एसटीएफ के लोगों ने घेर लिया और एक बुलेटप्रूफ जिप्सी में पलहल्लन शिविर ले गए। वहां डीएसपी विनय गुप्ता ने मुझे प्रताड़ित किया, बिजली के झटके दिए, ठंडे पानी में डाला, पेट्रोल और मिर्च का इस्तेमाल भी किया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास हथियार हैं। शाम को उनके एक इंस्पेक्टर फारुक ने मुझे कहा कि यदि मैं उन्हें 10 लाख रुपए दे देता हूं तो मुझे छोड़ दिया जाएगा अन्यथा वे मुझे जान से मार देंगे। इसके बाद वे मुझे हमहामा एसटीएफ शिविर में ले गए जहां डीएसपी दरविंदर सिंह ने भी मुझे प्रताड़ित किया। उन्हीं के एक इंस्पेक्टर शैंटी सिंह ने नंगा करके मुझे तीन घंटों तक मुझे बिजली के झटके दिए और उसी दौरान जबर्दस्ती पानी भी पिलाया।

आखिरकार मैं उन्हें दस लाख रुपए देने को तैयार हो गया जिसके लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के गहने बेचने पड़े। इसके बावजूद केवल 80 हजार का ही इंतजाम हो पाया। इसके बाद वे मेरा स्कूटर ले गए जो मैंने 2-3 महीने पहले ही 24 हजार रुपए में खरीदा था। एक लाख रुपए पाने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा लेकिन अब मैं पूरी तरह टूट चुका था। उसी हमहामा एसटीएफ शिविर में तारिक नाम का एक और शिकार था उसने मुझे सलाह दी थी कि मैं हमेशा एसटीएफ का सहयोग करूं, नहीं तो वे मुझे प्रताड़ित करेंगे और सामान्य जिंदगी नहीं जीने देंगे। यह मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। मैंने वैसे ही जीने का फैसला कर लिया जैसे मुझे तारिक ने बताया था। 1990 से 1996 तक मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और विभिन्न कोचिंग सेन्टरों और घरों पर जाकर ट्यूशन पढ़ाता था। यह जानकारी बड़गाम के एसएसपी अशफ़ाक हुसैन के साले अल्ताफ़ हुसैन को थी, चूंकि इसी ने मेरे परिवार और हमहामा के डीएसपी दरविंदर सिंह के बीच दलाल की भूमिका निभाई थी। अल्ताफ़ ने मुझे कहा कि मैं उसके दो बच्चों को पढ़ाऊं चूंकि आतंकवादियों के खौफ़ की वजह से वे ट्यूशन पढ़ने नहीं जा पाते। इनमें एक दसवीं में था, दूसरा बारहवीं में। इस तरह अल्ताफ से मेरी नजदीकियां बढ़ीं। एक दिन अल्ताफ मुझे डीएसपी दरविंदर सिंह के पास ले गया और बताया कि मुझे उनके लिए एक छोटा सा काम करना पड़ेगा।

काम यह था कि एक आदमी को दिल्ली ले जाना था और उसे वहां एक किराए का घर दिलवाना था, चूंकि मैं दिल्ली को बेहतर तरीके से जानता था। मैं उस व्यक्ति को नहीं जानता था, लेकिन मुझे संदेह था कि वह कश्मीरी नहीं है क्योंकि वह कश्मीरी नहीं बोलता था। लेकिन मैं असहाय था और मुझे दरविंदर का काम करना ही था। मैं उसे दिल्ली ले गया। एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह एक कार खरीदना चाहता है। मैं उसे करोलबाग लेकर गया। उसने कार खरीदी। दिल्ली में वह तमाम लोगों से मिलता था और हम दोनों को दरविंदर सिंह के फोन कॉल आते रहते थे। एक दिन मोहम्मद ने मुझे बताया कि अगर मैं कश्मीर जाना चाहूं तो जा सकता हूं। उसने मुझे पैंतीस हजार रुपए भी दिए और कहा कि यह मेरे लिए एक उपहार है।

छह या आठ दिन पहले मैंने इंदिरा विहार में अपने परिवार के लिए एक किराए का कमरा ले लिया था। चूंकि मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब दिल्ली में ही रहूंगा क्योंकि मैं अपने इस जीवन से संतुष्ट नहीं था। मैंने किराए के मकान की चाबियां अपनी मकान मालकिन को थमा दीं और उसे बताया कि मैं ईद के बाद 14 दिसंबर को लौटूंगा क्योंकि संसद पर हमले के बाद वहां काफी तनाव था। मैंने श्रीनगर में तारिक से संपर्क किया। शाम को उसने मुझसे पूछा कि मैं कब वापस आया। मैंने बताया कि मुझे आए हुए सिर्फ एक घंटा हुआ है। अगली सुबह जब मैं सोपोर जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था, श्रीनगर पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गई। तारिक वहां एसटीएफ के साथ मौजूद था। उन्होंने मेरी जेब से 35000 रुपए निकाल लिए, मेरी पिटाई की और सीधे मुझे एसटीएफ मुख्यालय ले गए। वहां से मुझे दिल्ली लाया गया। मेरी आंखों को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यहां मैंने खुद को विशेष पुलिस के उत्पीड़न कक्ष में पाया।

विशेष सेल की हिरासत में मैंने उन्हें मोहम्मद इत्यादि के बारे में सब कुछ बताया लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि मैं, शौकत, उसकी पत्नी नवजोत (अफशां) और गिलानी ही संसद पर हमले के पीछे हैं। उन्होंने मेरे परिवार को लेकर मुझे धमकाया और उनमें से एक इंस्पेक्टर ने बताया कि मेरा छोटा भाई हिलाल अहमद गुरु भी एसटीएफ की हिरासत में हैं और यदि मैंने उनका सहयोग नहीं किया तो वे मेरे दूसरे परिजनों को भी उठवा लेंगे। इसके बाद उन्होंने मेरे ऊपर दबाव डाला कि मैं शौकत, उसकी पत्नी और गिलानी को दोषी ठहराऊं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उन्हें बताया कि यह असंभव है। फिर उन्होंने मुझे कहा कि मुझे गिलानी के निर्दोष होने के बारे में चुप रहना है। कुछ दिनों बाद मुझे मीडिया के सामने पेश किया गया। वहां एनडीटीवी, आज तक, जी न्यूज, सहारा टीवी आदि थे। एसीपी राजबीर सिंह भी वहां थे। जब एक साक्षात्कर्ता ने मुझे बताया कि संसद पर हमले में गिलानी की क्या भूमिका है, तो मैंने भी ऐसे ही कह दिया कि गिलानी निर्दोष हैं, ठीक इसी वक्त एसीपी राजबीर सिंह अपनी घूमती हुई कुर्सी से उठे, मेरे ऊपर चिल्लाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे पहले ही हिदायत दी गई थी कि मीडिया के सामने गिलानी के बारे में कुछ नहीं बोलना है। राजबीर के व्यवहार ने मेरी असहायता को प्रदर्शित कर दिया और कम से कम मीडिया के लोग यह जान गए कि अफजल जो भी बयान दे रहा है वह दबाव और खौफ में दे रहा है। इसके बाद राजबीर सिंह ने टीवी के लोगों से अनुरोध किया कि गिलानी वाला सवाल दिखाया न जाए।

शाम के वक्त राजबीर सिंह ने मुझसे पूछा कि क्या मैं परिवार से बात करना चाहता हूं। मैंने हां में जवाब दिया। फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। फोन करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि यदि मैं अपनी पत्नी और परिवार को जिंदा देखना चाहता हूं तो हर कदम पर उनका सहयोग करूं। वे मुझे दिल्ली में तमाम जगहों पर ले गए। वहां उन्होंने मुझे वे जगह दिखाईं जहां से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। वे मुझे कश्मीर ले गए और हम वहां से बगैर कुछ किए वापस आ गए। उन्होंने मुझसे कम से कम 200-300 कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए।

मुझे निर्धारित कोर्ट में अपनी कहानी सुनाने का मौका ही नहीं दिया गया। जज ने मुझे बताया कि मुकदमे के अंत में मुझे बोलने का पूरा मौका दिया जाएगा, लेकिन आखिरकार न तो उन्होंने मेरे बयानों को दर्ज किया और न ही अदालत ने दर्ज किए गए बयान मुझे मुहैया कराए। यदि ध्यान से रिकॉर्ड किए गए फोन नंबरों को देखा जाता तो अदालत यह जान जाती कि वे एसटीएफ के फोन नंबर थे।

अब मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय मेरी असहाय स्थिति और उस सचाई को समझ सकेगा जिससे मैं गुजरा हूं। एसटीएफ ने अपने और कुछ अन्य अज्ञात लोगों द्वारा निर्मित और निर्देशित इस आपराधिक गतिविधि में मुझे बलि का बकरा बना दिया। इस पूरे खेल में विशेष पुलिस निश्चित तौर पर एक हिस्सा है चूंकि हर वक्त उन्होंने मेरे ऊपर चुप रहने का दबाव डाला। मुझे भरोसा है कि मेरी इस चुप्पी को सुना जाएगा और मुझे न्याय मिलेगा।

मैं एक बार फिर आपको दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने मेरा बचाव किया।

सत्यमेव जयते।

मोहम्मद अफज़ल
पुत्र हबीबुल्ला गुरु
वार्ड न. 6 (उच्च सुरक्षा वार्ड)
जेल न. 1, तिहाड़
नई दिल्ली-110064

अंग्रेज़ी में यह पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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