हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

धुले: 'दंगा' नहीं, राज्य द्वारा मुसलमानों का एक और निर्मम कत्लेआम

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/28/2013 09:50:00 PM



महाराष्ट्र के धुले में पुलिस द्वारा 6 मुसलमानों की हत्या और मुस्लिम संपत्ति की लूटपाट-आगजनी को हमेशा की तरह दंगा बता दिया गया और प्रचारित किया गया कि पुलिस ने दखल देकर एक बड़ी सांप्रदायिक तबाही को होने से बचा लिया. लेकिन हकीकत कुछ और ही थी, जिसे डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू) की फैक्ट फाइंडिंग टीम की इस आरंभिक रिपोर्ट से जाना जा सकता है. इस टीम के सदस्य थे: अजरम, प्रतीक, रुबीना, श्रिया, उमर (सभी DSU, JNU) और कुंदन (DSU, DU). 

धुले 7 और 8 जनवरी को सुर्खियों में आया, जिनमें कहा गया कि होटल के बिल के भुगतान को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झगड़े के बाद इस इलाके में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठा. झगड़े पर कार्रवाई करते हुए पुलिस को ‘कानून व्यवस्था दोबारा कायम करने के लिए फायरिंग का सहारा लेना पड़ा’ क्योंकि हालात ‘काबू से बाहर’ जा रहे थे. हालांकि बाद की रिपोर्टों से कुछ दूसरी ही तस्वीर सामने आई. मामले की और आगे पड़ताल करने और यह देखने के लिए कि पुलिस की फायरिंग के पहले और उसके बाद क्या हुआ था, DSU की एक 6 सदस्यीय टीम ने 19 और 20 जनवरी को धुले का दौरा किया. इसमें JNU और DU के छात्र शामिल थे. स्थानीय लोगों से बात करने के बाद यह साफ हो गया कि इस घटना को ‘सांप्रदायिक दंगा’ नहीं कहा जा सकता है. स्थानीय लोगों से हुई हमारी बातचीत से यह साफ जाहिर होता है कि यह भारतीय राज्य द्वारा मुसलमानों का एक और कत्लेआम था जो राजस्थान और उत्तर प्रदेश में हुए हाल मंध ऐसे ही कत्लेआमों से काफी मिलता-जुलता है. यह घटना दिखाती है कि राज्य मशीनरी पूरी तरह सांप्रदायिक है, जिसने साथ में मुस्लिम समुदाय के व्यवस्थित उत्पीड़न पर टिके एक परजीवी वर्ग को मजबूत किया है. धुले में स्थानीय लोगों ने हमें बताया कि कैसे पिछले कुछ बरसों में एक माफिया वर्ग उभरा है, जिसका केरोसिन जैसी जरूरी चीजों पर एकाधिकार है और यह शराब और नशीली चीजों की दुकानें चलाता है. उनका नजदीकी रिश्ता पुलिस और प्रशासन से है, जिसने मुस्लिमों पर हमले में अग्रणी भूमिका निभाई है. अधिकतर संसाधनों पर काबिज इन प्रभावशाली तबकों में, जिनसे मिल कर कथित सिविल सोसाइटी बनता है, यह भावना है कि पुलिस की कार्रवाई ‘प्रशंसनीय’ थी. 6 जनवरी को हुई घटना को एक तरतीब में रखने के साथ साथ हमने इस घटना को उस प्रक्रिया के संदर्भ में भी समझने की कोशिश की है, जो मुसलमानों को पूरी तरह हाशिए पर धकेल देने की वजह बनी है.

अंधाधुंध फायरिंग की गई या चुन चुन कर गोली मारी गई? पुलिस उस झगड़े के बहाने अपनी गोलीबारी को जायज ठहरा रही है, जो एक रेस्टोरेंट बिल के भुगतान की वजह से हुआ था. यही बात कॉरपोरेट मीडिया भी बता रहा है. लेकिन स्थानीय लोगों से बातचीत के क्रम में यह साफ हो गया कि पुलिस फायरिंग को झगड़े से किसी भी तरह नहीं जोड़ा जा सकता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि झगड़ा इतना मामूली था कि इसे 10 मिनटों में काबू में किया जा सकता था. लेकिन पुलिस, जो गर्व से यह कहती है कि वो पहले हिंदू है, मानो पिछले कुछ वर्षों से मुसलमानों को निशाना बनाने के मौके की तलाश में थी. खास कर 2008 में इलाके में हुए दंगों के बाद से. स्थानीय लोगों ने इसका उल्लेख किया कि कैसे 2008 के दंगों के बाद महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटिल ने धुले में सरेआम यह एलान किया था कि मुसलमानों के पत्थर का जवाब हिंदुओं को गोली से देना चाहिए. तब से ही पुलिस सबक सिखाने की खुलेआम धमकियां दे रही थी. 6 जनवरी को, झगड़े के बहाने पुलिस ने 10 मिनटों के भीतर ही फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस द्वारा 200 राउंड से ज्यादा गोलियां चलाई गईं. जिन स्थानीय लोगों से हमने बात की, उन सबने ही पुलिस फायरिंग के एकतरफापन के बारे में बताया. जहां तक मुसलमानों द्वारा पथराव करने की बात है, जिसके बारे में पुलिस और मीडिया का एक हिस्सा बोल रहा है, यह पथराव तभी शुरू हुआ जब हिंदू भीड़ ने पुलिस की मदद से और उसके उकसाने पर घरों को जलाना शुरू किया. बड़ी संख्या में एसिड बमों और दस्ती बमों का इस्तेमाल दिखाता है कि यकीनन इन हमलों के लिए पहले से तैयारी की गई थी.

ज्यादातर कमर से ऊपर गोलियां मारी गई थीं, इसलिए कि पुलिस ने हत्या करने के लिए गोलियां चलाईं. शहर का मुख्य बाजार होने के नाते मच्छी बाजार और माधवपुरा भीड़ भरे इलाके हैं. मारे गए सभी 6 मुसलमान या तो दिहाड़ी मजदूर थे या छोटे कारोबारी थे, जो सामान खरीदने या काम के सिलसिले में बाजार गए थे. रिजवान (22) को उनके अब्बा ने अपनी कपड़ों की दुकान के लिए कैरी बैग खरीदने के लिए बाजार भेजा था. उनकी पीठ और पैर में गोली लगी और जख्मों से 8 जनवरी को उनकी मौत हो गई. रिजवान ने 7 जनवरी को अपने परिवार से बात की और उन्हें बताया कि पुलिस ने उन्हें तब गोली मारी जब वे एक घर में छुपने की कोशिश कर रहे थे. इमरान अली(24) एक गैराज में काम करते थे और उन्हें सीने में तब गोली लगी जब वे सामान खरीदने बाजार गए हुए थे. आसिम(22) का परिवार अंडों का एक छोटा सा कारोबार चलाता था और वे अंडे ला रहे थे जब उन्हें दो गोलियां लगीं- सीने और पेट में. युनूस(22) को गले में गोली लगी और 9 जनवरी को उनकी मौत हो गई. आसिफ(30) भी अपनी छोटी सी दुकान के सिलसिले में वहां गए थे जब उनकी बगल में गोली लगी. मरने वालों में सबसे कम उम्र का सऊद था, जिसकी उम्र 17 साल थी और वो 12वीं कक्षा का छात्र था. उसके दिल के पास गोली लगी.

लूटने और जलाने की खुली छूट थी. पुलिस ने मुसलमानों की संपत्ति की लूट और आगजनी कराई. स्थानीय लोगों ने बताया कि कैसे हिंदू भीड़ का एक हिस्सा पुलिस जीप पर सवार होकर इलाके में दाखिल हुआ. जब अनेक मुसलमान अपने घरों से भाग गए, तो पुलिस उनके जाने की दिशा में फायरिंग करती रही, और इस बीच सांप्रदायिक फासीवादी गुंडे लूटपाट और आगजनी करते रहे. शेख आजाद ने हमें बताया कि जब पुलिस मुसलमानों पर गोलियां बरसा रही थी तो कैसे दंगाई भगवा झंडे लहराते हुए नाच रहे थे. उनके दो मंजिला मकान को, जिसके ग्राउंड फ्लोर पर चिकेन शॉप थी, लूटने के बाद पूरी तरह तहस-नहस कर दिया गया. एक स्थानीय मांस विक्रेता जमील को 10 लाख मूल्य का नुकसान हुआ. गुजरात की तर्ज पर घरों में गैस सिलेंडरों से धमाके किए गए जिससे पूरी छतें गिर गईं. इलाके के एक और निवासी युसुफ 2008 के दंगों से पहले चमड़े के छोटे-मोटे कारोबारी हुआ करते थे. 2008 दंगों के बाद वे तबाह होकर फेरीवाले बन गए थे और अब उन्हें फिर से 20 लाख मूल्य का नुकसान उठाना पड़ा. मशकूर खान को 4.50 लाख का नुकसान उठाना पड़ा. उनका घर और दुकान दोनों जला दिए गए. भीड़ और पुलिस ने मिल कर 14 मुस्लिम घरों को जलाया. पुलिस ने दमकल को भी पहुंचने की इजाजत नहीं दी. शहर के दमकल को पुलिस और सांप्रदायिक गुंडों ने मिल कर रोक दिया. देर रात में घरों की आग बुझाने की पहली कोशिश हुई जब मालेगांव (55 किमी), जलगांव (90 किमी) और शेरपुर (50 किमी) से दमकल धुले पहुंचे. एक स्थानीय निवासी मदीना बी ने, जिनको हुआ नुकसान भी लाखों में है, बताया कि कैसे अगले दिन तक अनेक घरों से निकलता धुआं देखा जा सकता था. सिर्फ यही नहीं, पुलिस ने यह भी सुनिश्चित किया कि स्थानीय लोग जलते हुए घरों में आग न बुझा सकें. अंसारी मुसद्दिक ने बताया कि कैसे जब उन्होंने बगल के जलते हुए घर पर पानी फेंकने की कोशिश की तो उनकी खिड़की से पत्थर और गोलियां मारी गईं. उन्होंने खिड़की के सामने की दीवार पर गोलियों के निशान हमें दिखाए.

जख्मी लोगों की बड़ी संख्या भी पुलिसिया जुल्म की कहानी कहती है. 90 फीसदी से अधिक जख्मी लोगों को गोलियां कमर से ऊपर लगी हैं. जख्मी लोगों ने बताया कि उनमें से अधिकतर अपनी जिंदगी बचाने के लिए भाग रहे थे, छुपने की कोशिश कर रहे थे या अपने बच्चों को बचाने के लिए निकले थे जब उन्हें गोली मारी गई. 16 साल के अब्दुल कासिम एक दिहाड़ी मजदूर हैं जिनकी दाहिनी बांह गोली से जख्मी हो गई है. वे काम से लौट कर साइकिल खड़ी कर रहे थे कि पुलिसकर्मियों का एक समूह एक घर से बाहर निकला, जिसे उन्होंने तहस-नहस कर दिया था, और कासिम को गोली मार दी. 23 साल के अरशद को तीन गोलियां लगी हैं- एक उनकी पसलियों में, दूसरी बगल में और तीसरी हाथ में. यह चमत्कार ही है कि वे बच गए हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें पीछे से गोली मारी गई. सायरा बानो को तब गोली लगी जब अपने बच्चों को घर में लाने के लिए वो बाहर निकली थीं. पुलिस का आतंक इस कदर है कि भारी दर्द के बावजूद वे अस्पताल जाने के लिए अगले दिन तक निकल नहीं सकीं. बगल की एक कॉलोनी रमजानबाबा नगर में, जहां कर्फ्यू तक नहीं लगाया गया था, एक घरेलू नौकरानी सायराबी को गोली मारी गई. कर्फ्यू के दौरान अनेक औरतों को पुलिस ने पीटा. घटना के दूसरे दिन शम्सुन्निसा नाम की एक बुजुर्ग औरत, जो अपने घर से बाहर एक छोटी सी दुकान चलाती हैं, पुलिस को अपना दुकान तोड़ने से रोकने के लिए बाहर निकलीं तो उन्हें पीटा गया. उनका दाहिना हाथ टूट गया है और उनकी जांघ और कूल्हे पर चोट लगी है. एक दूसरी महिला तबरुन्निसा आग बुझाने के लिए बाहर निकलीं तो उन्हें पुलिस ने पीटा. दोनों घटनाएं 7 जनवरी को हुईं, जब इलाके में कर्फ्यू लागू था. कर्फ्यू का इस्तेमाल पुलिस ने पूरी तरह से लोगों पर आतंक कायम करने के लिए किया. वे घरों में घुसे, लोगों को पीटा, गाड़ियां तोड़ीं, खिड़कियों को तोड़ा, मुसलमानों की बकरियां, नकदी और जेवर चुराए. स्थानीय लोगों के पास पुलिस की इन करतूतों के काफी सबूत है, जिनमें वे वीडियो फुटेज भी शामिल हैं जो उन्होंने DSU की टीम को सौंपे. टीम ने उन दो आदमियों में से एक से भी बात की, जिनके पांव काटने पड़े. खालिद अंसारी(20) काम से लौट रहे थे जब वे पुलिस की फायरिंग सुनकर भागने लगे. उनके दाहिने पांव में एक गोली लगी जिसने उनके बाएं पांव को भी जख्मी कर दिया. उनका दाहिना पांव काटना पड़ा, जबकि दूसरा पांव बुरी तरह टूट गया है. सरकार द्वारा उनके लिए तीन लाख के मुआवजे की घोषणा एक क्रूर मजाक है. लेकिन तब भी, यह उन्हें मिलने नहीं जा रहा है क्योंकि पुलिस ने अनेक दूसरे लोगों के साथ, जो मर गए या जख्मी हैं, उनके खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया है. मुआवजा हासिल करने से पहले उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करनी पड़ेगी.

राज्य मशीनरी और ‘सिविल’ सोसाइटी पुलिस का बचाव करने और घटना को छुपाने के लिए फौरन हरकत में आई. पुलिस ने चालाकी से उन लोगों के खिलाफ मामले दर्ज कर दिए जो खुद पुलिस के जुल्म का निशाना बने थे. नतीजे में जो लोग केस दर्ज कराने गए उनको यह कह कर लौटा दिया गया कि वे केस दर्ज नहीं करा सकते क्योंकि उनके खिलाफ पहले से ही मामला दर्ज है. कुछ लोगों को एक थाने से दूसरे थाने दौड़ाया जाता रहा और एफआईआर दर्ज न करने के हर तरह के बहाने बनाए गए. अनेक लोग तो इतने डरे हुए हैं कि वे शिकायत दर्ज कराने थाने तक जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे, कि कहीं पुलिस उन्हें न उठा ले. कुछ लोग तो व्यवस्था से उम्मीद खो बैठे हैं कि उन्हें शिकायत दर्ज करने की फिक्र तक नहीं है. मिसाल के लिए, सऊद के अब्बा ने कहा कि इस व्यवस्था से कुछ नहीं होने वाला. उन्होंने उस रवैए की मिसाल दी, जो उनके परिवार को तब भुगतनी पड़ी जब वे नगरपालिका से अपने बेटे का मृत्यु प्रमाणपत्र बनाने की कोशिश कर रहे थे. धुले नगरपरिषद ने उनके भाई को सिविल अस्पताल से इसकी रिपोर्ट लाने को कहा कि सऊद सचमुच में मर गए हैं. वे पुलिस फायरिंग की वजह से उनको मृतक बताने से कतरा रहे हैं, बावजूद इसके कि उनका पोस्टमार्टम सिविल अस्पताल में हुआ और कब्रिस्तान के रिकॉर्ड भी गोलियों के जख्मों से उनकी मौत को दिखाते हैं. पुलिस और स्थानीय प्रशासन लोगों के आर्थिक नुकसान को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. पंचनामा दाखिल करते हुए नुकसान हुए फ्रिज की कीमत 700 रु. और टीवी 100 रु. जैसी चीजें दर्ज की गईं हैं. कुछ मामलों में पंचनामा तैयार करने के बाद भी पुलिस ने उन लोगों के दस्तखत नहीं लिए जिनको नुकसान उठाना पड़ा. एक और मिसाल, जो राज्य मशीनरी के पूरी तरह सांप्रदायिकीकरण को सामने लाती है, वो सिविल अस्पताल में लोगों के साथ होने वाले रवैए के प्रति डर है. मुसलमान निजी अस्पतालों में जाने को तरजीह देते हैं, क्योंकि वे सिविल अस्पतालों के स्टाफ और शिवसेना गुंडों से आतंकित हैं. यह खौफ इतना गहरा है कि लोगों का कहना है कि वे सरकारी अस्पताल में जाने के बजाए मर जाना पसंद करेंगे. एक दूसरे आदमी ने कहा कि उसे डर है कि अगर वो सिविल अस्पताल गया तो शायद वो जिंदा न लौट सके.

धुले में मुसलमानों का निर्मम कत्लेआम मुसलमानों पर हो रहे जुल्म का एक और काला अध्याय है और यह भारतीय राज्य के हिंदू बहुसंख्यकवादी चरित्र को फिर से सामने लाता है. महाराष्ट्र में ‘धर्मनिरपेक्ष’ होने का दावा करनेवाले कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार है, जबकि भाजपा-शिवसेना मुख्य विपक्षी हैं. लेकिन जैसा कि लोगों ने बताया कि चाहे कोई भी सत्ता में रहे, शिवसेना-आरएसएस-वीएचपी-बजरंग दल के गुंडों को भरपूर संरक्षण और सरपरस्ती हासिल होती है. ये हत्यारे गिरोह शासक वर्ग द्वारा पाले-पोसे गए हैं और सांप्रदायिक गुंडों की भूमिका अदा करते हैं. सभी पार्टियां सक्रिय रूप से विभिन्न माफियाओं का बचाव करती हैं जो संपत्तिशाली मारवाड़ी और गुजराती कारोबारियों के साथ मिल कर बेहद उत्पीड़क तबका बन गए हैं. यह मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेल कर ही मुमकिन हुआ है. शहर की मुस्लिम और हिंदू आबादी वाले मुहल्लों के बीच फर्क इतना साफ है कि इसे कोई भी आसानी से देख सकता है. मुस्लिम घेट्टो जैसे घिरे हुए और भीड़ भरे इलाकों में रहते हैं जहां बिजली और पानी की कमी रहती है, तो शहर के दूसरे इलाके इसकी तुलना में समृद्ध हैं. इस कत्लेआम की जिम्मेदारी अब तक किसी अधिकारी ने नहीं ली है, यह अकेला तथ्य ही दिखाता है मिलीभगत और बेदाग बच निकलने की सुरक्षा पूरी राज्य मशीनरी की तरकीबें हैं, जिनके जरिए वो इस व्यवस्थित उत्पीड़न को कायम रखती है. रहस्यमय तरीके से कलक्टर, डिप्टी कलक्टर और एसपी 6 जनवरी को ‘अनुपस्थित’ थे, जबकि डीएसपी फायरिंग शुरू होने के आधे घंटे के बाद इलाके में पहुंचे और आधिकारिक रूप से इसका खंडन किया कि उन्होंने फायरिंग के आदेश दिए थे. लेकिन भारी गोलीबारी को देखते हुए यह जाहिर है कि बिना किसी वरिष्ठ अधिकारी के यह मुमकिन नहीं हो सकता है.

आखिरी दिन शाम को DSU की टीम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया, जिसमें आए पत्रकारों का रवैया पूरी तरह दुश्मनी से भरा हुआ था. इसमें मुख्यत: स्थानीय मीडिया से जुड़े पत्रकार आए थे जिनका मजबूत झुकाव शिवसेना की तरफ था. प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद दैनिक भास्कर के एक पत्रकार ने एक गहरी टिप्पणी की. उनके मुताबिक, हमारे द्वारा इन तथ्यों को धुले से बाहर ले जाने से धुले की छवि दागदार होगी, जिससे शहर के विकास की संभावनाओं पर असर पड़ेगा. उस व्यवस्था के बारे में बताने के लिए इससे बेहतर कोई टिप्पणी नहीं होगी, जिसकी बुनियाद उत्पीड़ित जनता को हाशिए पर धकेले जाने पर टिकी हुई है- मुसलमान इस उत्पीड़ित जनता का बड़ा हिस्सा हैं - और जो इस उत्पीड़ित जनता को खामोश करते हुए ही खुद को बरकरार रखती है. खामोशी न सिर्फ हाशियाकरण की इस लंबी प्रक्रिया के बारे में बल्कि इसके बदनुमा चेहरों के बारे में भी. और इस प्रक्रिया को छुपाने के लिए राज्य के सभी हिस्से सामने आए, जैसा कि 6 जनवरी का कत्लेआम और उसके बाद की घटनाएं उजागर करती हैं. और इसीलिए इस सांप्रदायिक फासीवादी राज्य को ऊपर से नीचे तक बदल कर ही इस व्यवस्थिक उत्पीड़न को खत्म किया जा सकता है.

बौद्धिक अतिवाद या ब्राह्मणवाद का जनतंत्र विरोधी चेहरा

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/28/2013 09:15:00 PM

सफ़दर इमाम कादरी
 
शीर्ष समाजशास्त्री प्रोफेसर आशीष नंदी का जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच से दिया गया बयान सम्पूर्ण देश में बहस का मुद्दा बन गया है। उन्होंने देश में भ्रष्टाचार की जड़ तलाश करते हुए यह निष्कर्ष निकल कि पिछडे और दलित समुदाय आदि के लोग ज्यादा भ्रष्ट हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां साफ सुथरी राजव्यवस्था इस कारन विद्यमान है क्योंकि पिछले 100 वर्षों में वहां पिछड़े तथा दलित वर्ग के लोग सत्ता से दूर रखे जा सके।

प्रोफेसर आशीष नंदी इतने प्रबुद्ध विचारक हैं कि यह नहीं कहा जा सकता कि उनका बयान जुबान की फिसलन है या किसी तरंग में आ कर उन्होंने ये शब्द कहे। अपनी तथाकथित माफ़ी में उन्होंने जो सफाई दी तथा उनके सहयोगियों ने प्रेस सम्मलेन में जिस प्रकार मजबूती के साथ उनका साथ दिया, इस से देश के बौद्धिक समाज का ब्राह्मणवादी चेहरा और अधिक उजागर हो रहा है। सजे धजे ड्राइंग रूम में अंग्रेजी भाषा में पढ़कर तथा अंग्रेजी भाषा में लिख कर एक वैश्विक समाज के निर्माण का दिखावा असल में संभ्रांत बुद्धिवाद को चालाकी से स्थापित करते हुए समाज के कमज़ोर वर्ग के संघर्षों पैर कुठाराघात करना है।

अभी कल की बात है कि गृह मंत्री ने भारत में आतंकवाद को एक धार्मिक समूह या राजनीतिक -सांस्कृतिक समूह से जोड़ कर दिखने की कोशिश की थी। बटला हाउस कांड के कारकों को पहचानने में भी एक धार्मिक समूह का नाम उछला था। अमेरिका के जुड़वां स्तंभों पैर आतंकी हमलों को भी विश्व स्तर पर मुस्लिम समुदाय से जोरने में देर नहीं लगी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांघी की हत्या के बाद सिख समाज को भी लक्ष्य किया गया। इसी कड़ी में आशीष नंदी के बयान को समझने की ज़रुरत है।

जाति व्यवस्था की मनुवादी जकड़न से भारतीय राजनीति अभी निकल भी नहीं सकी है लेकिन नए -नए तरीकों से बौद्धिक और राजनीतिक खिलाड़ियों के दिल का चोर रह-रह कर बहार आ ही जाता है। लम्बे राजनितिक-सामाजिक संघर्षों के बाद हज़ार कुर्बानियों के साथ हमें जो आज़ादी मिली उसके फलस्वरूप कमज़ोर तबकों की हकमारी के बदले न्याय और थोरे अवसरों में आरक्षण प्राप्त हुआ। सृष्टि की रचना के साथ जो बे-इंसाफी और शोषण का दौर शुरू हुआ था, आज़ादी के थोड़े वर्षों में उसका एक प्रतिशत भी निवारण सम्भव नहीं हो सका। इसके बावजूद संवैधानिक अधिकार और आरक्षण ब्राह्मणवादी शक्तियों की आँखों में शहतीर बना हुआ है।

डॉ राम मनोहर लोहिया ने राजनितिक स्तर पर भारत के पिछड़े और दलित समाज को एकजुट करने में सफलता पाते हुए कांग्रेस तथा अन्य राजनितिक दलों के संभ्रांत तथा ब्राह्मणवादी चरित्र को बेनकाब किया था। उत्तर भारत के कुछ राज्यों में मुख्यमंत्री तथा कुछ शक्तिशाली राजनेता यदि दलित तथा पिछड़े वर्ग से आने क्या लगे, एक बौद्धिक तबका ये समझने लगा कि उस समाज का उत्थान हो गया। क्या बाबा साहेब आम्बेडकर की बौद्धिक शक्ति से यह निष्कर्ष निकल जा सकता है कि सभी दलितों को इच्छित श्रेष्ठ बौद्धिक शक्ति हासिल हो गई है? क्या भारत का बौद्धिक समाज इस तर्क को स्वीकार कर सकता है? शायद, हरगिज़ नहीं।

क्या प्रोफेसर आशीष नंदी जैसे महान बौद्धिक व्यक्ति को नहीं मालूम कि ज्ञान, बुद्धि, कार्य-क्षमता, अच्छाई-बुराई, कर्मठता या निकम्मेपन आदि गुण तथा अवगुण व्यक्तिगत होते हैं? इनसे समाज, वर्ग अथवा नस्ल का क्या रिश्ता? मशहूर सूक्ति है- औलिया के घर में शैतान। अगर ये कोई समझता है कि भ्रष्टाचार या आतंकवादी बुद्धि किसी एक वर्ग, जाति या धर्म और समुदाय से पहचाना जा सकता है तो वह जनतंत्र की अवधारणाओं में स्पष्ट आस्था नहीं रखता।

हमारे देश में जनतंत्र ज़रूर कायम है लेकिन संविधान के प्रावधानों की आत्मा को देश का प्रभु वर्ग दिल से नहीं मानता। इसलिए शोषणविहीन -समतामूलक समाज की स्थापना अभी भी असम्भव लगता है। थोड़े विधायक, कुछ सांसद, चंद मंत्री या एक-दो मुख्यमंत्री, कुछ ऊँचे मकान या दो-चार-दस चमचमाती गाड़ियाँ यदि दलित या पिछड़े समुदाय के पास आ गईं तो क्यों प्रभु वर्ग के पेट में मरोड़ होने लगता है? संभ्रांत तबका इसे उस समाज के उत्थान से जोड़कर देखे और संवैधानिक अधिकारों का फलाफल माने तो किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि इसे प्रभु वर्ग अपना प्रतिद्वंदी समझता है। दिक्क़त यह है कि ब्राह्मणवादी शक्तियों को हजारों साल से दूसरों को बढ़ता हुआ या बराबरी पर महसूस करने या देखने की आदत ही नहीं रही।

प्रोफेसर आशीष नंदी का वक्तव्य हमारे समाज में मौजूद ब्राह्मणवाद का स्वाभाविक उद्गार है। इतने बौद्धिक व्यक्ति को कैसे माना जाये कि वो डी-क्लास नहीं है। गौर करने की बात यह है कि ऐसी साजिशी और मारक टिप्पणियां उन समुदायों के विरुद्ध की जाती हैं जो अक्सर अपने अस्तित्व का संघर्ष कर रही होती हैं। भारत में दलित और पिछड़ा वर्ग ही नहीं, अल्पसंख्यक और महिला समाज के बारे में अनेक षड्यंत्रकारी मत व्यक्त किए जाते हैं। इनके निहितार्थ को समझना ज़रूरी है। एक समूह को सार्वजनिक तौर पर लांछित कर दिया जाए तह बाकी समाज में उसके बारे में गलतफहमियां फैला कर समर्थक भूमिका से तटस्थ कर देना ही प्रभु वर्ग की जीत है। कमज़ोर तबका आगे बढ़ने के बजाय लोगों को सफाई देने में अपना समय और शक्ति बर्बाद करता है।
पिछले दो दशकों में जबसे दलित तथा पिछड़े समुदाय के मुट्ठी भर लोग राजसत्ता में अपना हक लेने में कामयाब हुए हैं। इसीलिए अनेक स्तरों पर तरह-तरह की साजिशें चल रहीं हैं। कृत्रिम मुद्दों पर बहुत जोर है लेकिन वृहत सामाजिक मुद्दों को सार्वजनिक एजेंडा से हटाया जा रहा है। तू डाल -डाल, मैं पात -पात का खेल चल रहा है। कमज़ोर तबकों की हकमारी की कुछ बानगियाँ देखिये जिनपर संभ्रांत लोग बारे खामोश बैठे हैं :

1. मंडल कमीशन की सिफारिशों को अप्रभावी बनाने के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान। आजतक उसमें अत्यंत पिछड़े वर्ग के लिए कोई कोटा नहीं बना।

2. निजी क्षेत्रों में आरक्षण के लिए आजतक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। अर्थात वहां संभ्रांत तबके को शत प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है।

3. न्यायपालिका में निम्न स्तर पर तो कुछ प्रदेशों में आरक्षण मिलता है लेकिन उच्चतर न्यायपालिका ने आज तक आरक्षण की व्यस्था से खुद को निरपेक्ष रखा है।

4. अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का अस्तित्व इसलिए नहीं है कि न्यायपालिका का जनतांत्रिक रूप आकर लेने लगेगा तथा 500 परिवारों की मुट्ठी में क़ैद देश की न्यायिक व्यवस्था का चरित्र बदलने लगेगा।

5. महिला आरक्षण में जातीय आरक्षण क्यों नहीं होना चाहिए? सामान्य आरक्षण में जब जाति आधार है तो महिलाओं के लिए किसी दूसरे आधार को सिर्फ इसलिए बनाना चाहिए की महिलाओं के रस्ते संभ्रांत तबका थोड़ी सेंधमारी कर सके।

6. बिहार के प्रमुख पत्रकार-समाजकर्मी श्री प्रभात कुमार शांडिल्य ने एक समय में बिहार के सजायाफ्ता लोगों की सूची प्रकाशित की थी जहाँ सभी दलित और वंचित समुदाय के लोग थे। उन्होंने व्यंग्य के साथ शीर्षक बनाया था- फांसी में सौ प्रतिशत आरक्षण। यह सच्चाई भी संभ्रांत तबके को जग नहीं पाई.

7. सच्चर समिति ने अल्पसंख्यक समाज तथा पिछड़े अल्पसंख्यक वर्ग की स्थिति को अति दयनीय सिद्ध किया था। सरकार की ओर से कुछ पैसों के बाँट देने के अलावा क्या हुआ?

8. देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनितिक पार्टी भाजपा से एक भी पिछड़ा-अल्पसंख्यक संसद नहीं है।

9. बिहार सरकार में एक भी पिछड़ा अल्पसंख्यक मंत्री नहीं।

लेकिन इस हकमारी के खिलाफ सार्वजनिक मंच पर कभी भी प्रभु वर्ग में कोई चिंता नहीं दिखाई देती। कमजोरों के साथ जितनी बे-इंसाफी हो, इस पर प्रभु वर्ग को आंसू नहीं बहाना है। तब समता मूलक समाज कैसे कायम होगा? आशीष नंदी कोई अपनी बात नहीं कह रहे हैं बल्कि वह ब्राह्मणवाद के षड्यंत्रकारी आक्रोश का एक बौद्धिक प्रतिरूपण हैं। उन्हें गंभीरता से इसलिए भी लेना चाहिए क्योंकि वह समाजशास्त्र के शिक्षक, शोधार्थी तथा एक बौद्धिक के रूप में नहीं बल्कि ब्राह्मणवाद की एक असहिष्णु तथा अनुदार पीढ़ी के प्रवक्ता के तौर पर सामने आये हैं। उनके विचारों का समाजशास्त्रीय आधार होता तो ज्यादा चिंता की बात नहीं थी। लेकिन दुखद यह है कि ज्ञान-बुद्धि तथा उम्र के चरम पर पहुँच कर वे वंशभेदी और जनतंत्र विरोधी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं जो भारत के भविष्य के लिए खतरनाक है। समाज को ऐसे चिंतकों से होशियार रहना चाहिए।

घरेलू कवियों से समझदार होने की अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/27/2013 09:51:00 PM

दशकों के आधार पर कविताओं और कवियों की पहचान का चलन शुरू करना एक तरह से अज्ञेय द्वारा नई कविता-प्रयोगवादी कविता जैसी पहचानों का एक ‘उदारीकृत’ पुनरुत्थान है. उदारीकृत इसलिए, क्योंकि वैश्वीकरण के दौर में साम्राज्यवाद नई और प्रयोगशील रचनाधर्मिता से भी नफरत करता है और इसलिए उसकी सांस्कृतिक चेतना को एक राजनीति-निरपेक्ष (या राजनीतिक रूप से ‘सेक्युलर’) वर्गीकरण चाहिए. विचारधाराओं के अंत, इतिहास के अंत और साम्यवाद के पतन के बाद तो बस तारीखें ही रह जानी थीं, इतिहास नहीं. इसलिए वादों के संदर्भ में कवियों और कविताओं की पहचान भी मुमकिन नहीं रही क्योंकि उससे विचारधारात्मक बू आती है इसलिए अब हिंदी पर दशकीय चेतना के आरोपण का दौर है. लेकिन मजेदार बात तो ये है कि दशक जाकर भी नहीं जाते और इस तरह नब्बे का दशक करीब डेढ-दो दशकों तक पसर जाता है (यह बीमारी हॉब्सबॉम दे गए, जिन्होंने लंबी उन्नीसवीं सदी की परिकल्पना की थी). इसके पीछे की राजनीति के बारे में विस्तार से कवि और सांस्कृतिक कार्यकर्ता रंजीत वर्मा.


जिन स्थापनाओं को उन्होंने समझा था कि उन्हें वे एक विस्फोट की तरह रख रहे हैं वह बच्चों की पटाखेबाजी से ज्यादा साबित नहीं हुईं। जितनी मुद्राएं वे बना सकते थे उन्होंने बनायीं लेकिन सभी क्लाइमेक्स पर पहुंचने से पहले हास्यास्पद दिखने लगीं। बातों में इतनी ज्यादा विसंगतियां, इतने ज्यादा अंतरविरोध कि लगे जैसे कि कोई जुए में सब कुछ हार जाने के बाद अर्धबेहोशी में बड़बड़ा रहा हो। वे बताने निकले थे कि कितने काबिल हैं वे लेकिन अपनी नाकाबिलियत की पोल खोल बैठे। आठवें दशक के बाद की कविता पर वागर्थ, दिसंबर 2012 के अंक में छपे किसी भी लेख को आप देखें आपके मन में ऐसे ही ख्याल आऐंगे। लेकिन उन लेखों पर चर्चा करने से पहले जरूरी है कि ’लॉन्ग नाइन्टीज’ शब्दावली पर बात कर ली जाए क्योंकि यही मूल मंत्र है इस पूरे ढकोसले से भरे आयोजन का और विचारें कि आखिर इसका मकसद क्या है? लॉन्ग पर हम बाद में बात करेंगे। पहले हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि ये नाइन्टीज क्यों कह रहे हैं, एटीज क्यों नहीं कह रहे हैं क्योंकि हिंदी में ये ’अस्सी के बाद की कविता’ कह रहे हैं। यह नाइन्थ डिकेड जरूर है, लेकिन नाइन्टीज नहीं है यह। नाइन्टीज का मतलब नब्बे का दशक हुआ यानी कि शताब्दी का अंतिम दशक लेकिन अस्सी का हरगिज नहीं। क्या ये मूर्खता में ऐसा कह रहे हैं या इसके पीछे इनकी अपनी कोई सोच काम कर रही है।
 

क्या ये नाइन्टीज इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसकी शुरुआत सोवियत संघ के पतन के साथ हुई और ये यह बताना चाह रहे हैं कि अब आगे का समय कविता में साम्यवादियों का नहीं है। इसी वक्त बाजारवाद की तेज हवा भी चलनी शुरू हुई जिसकी चर्चा तो वे करते हैं लेकिन इसके भयानक आंधी का रूप ले लेने की बात वे नहीं करते जो अब तक ढाई लाख किसानों को लील चुका है और दूसरी ओर जिसने आदिवासियों का जीना मुहाल कर रखा है। क्योंकि अगर वे इसकी बात करेंगे तो उनके संघर्ष की भी बात करनी होगी जिसे माओवाद के नाम से जाना जाता है और जिसे नक्सलबाड़ी आन्दोलन की निरंतरता के रूप में देखा जाता है, जिसने पोस्को, वेदान्ता, जिंदल जैसी कॉरपोरेट ताकतों, जिन्हें भारत सरकार का संरक्षण भी प्राप्त है, द्वारा की जा रही प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर काफी हद तक अंकुश लगा रखा है।

चलिए अब हम इस नाइन्टीज को लॉन्ग के साथ पढ़ते हुए इसे समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर वे कहना क्या चाह रहे हैं। पहले ही पन्ने पर लिखा हुआ पढ़ने को मिलता है - ’लॉन्ग नाइन्टीज’ को मात्र एक ‘साहित्यिक कालखंड’ के रूप में न देखा जाए वरन एक खास किस्म के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रवृत्तियों के बीज समय के रूप में देखा जाए, तो लॉन्ग नाइन्टीज आज भी सतत सक्रिय है। ‘लॉन्ग नइन्टीज’ तब तक खत्म नहीं होगा जब तक कोई बड़ा प्रतिरोध का आंदोलन बाजार की दमनकारी आक्रामकता एवं उसकी ‘दलाल सत्ता’ को छिन्न भिन्न कर कोई परिवर्तनकारी समय न रच दे।’’ यह उक्ति बद्रीनारायण के लेख से लेकर पत्रिका के पहले पन्ने पर चस्पां किया गया है। यानी कि इस वाक्य को वागर्थ के संपादक ने भी इस अंक के लिए बीज विचार के रूप में स्वीकार किया है। अगर संपादक ने ऐसा नहीं किया होता तो मैं इस पर विचार करने की जरूरत नहीं महसूस करता क्योंकि किसी फाउन्डेशन की गोद में बैठे बद्रीनारायण को मैं इस काबिल नहीं समझता कि उन्हें गम्भीरता से लिया जाए और जवाब दिया जाए। बहरहाल उनसे पूछा जाना चाहिए कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों से निरपेक्ष कोई ‘साहित्यिक कालखंड’ भी होता है क्या? यहां तक कि अकवितावाद भी आजादी से मोहभंग और पूरे देश में व्याप्त बेरोजगारी और बदहाली से पैदा हुआ था। फिर भला कोई अस्सी के बाद की कविता को मात्र ‘‘साहित्यिक कालखंड’’ के रूप में कैसे देख सकता है? नहीं देख सकता है लेकिन यहां ‘‘खास किस्म के’’ पदावली का जो इस्तेमाल किया गया है उसका क्या मतलब है इसे कहीं भी बताने या समझाने की कोशिश नहीं की गयी है। और जब वही स्पष्ट नहीं है तो कैसे मान लिया जाए कि उसकी निरंतरता आज भी बरकरार है और तब तक बरकरार रहेगी जब तक कि ‘‘कोई बड़ा प्रतिरोध का आंदोलन बाजार की दमनकारी आक्रामकता एवं उसकी ’दलाल सत्ता’ को छिन्न भिन्न कर कोई परिवर्तनकारी समय न रच दे।’’ इस पूरे अंक में जितने भी लेख हैं उन्हें पढ़ कर कोई यह पता नहीं लगा सकता है कि यह प्रतिरोध कौन लोग करेंगे, कब करेंगे (या कर रहे हैं तो वे लोग कौन हैं, कहां कर रहे हैं और किस तरह कर रहे हैं) और इनकी कविता उनसे कैसे जुड़ती है? यह भी उन्होंने या किसी ने बताने की कोशिश नहीं की है कि दलाल सत्ता को उद्धरण चिह्न के अन्दर क्यों रखा गया है। क्या इसका मतलब यह नहीं निकलता कि वे वर्तमान में मौजूद सत्ता के तमाम रूपों के खिलाफ नहीं हैं बल्कि सिर्फ उस सत्ता के खिलाफ हैं जो दलाल है। यानी कि वे यह कहना चाह रहे हैं कि सभी सत्ताएं दलाल नहीं हैं। अगर ऐसा है तो उन्हें बताना चाहिए था कि कहां है दलाल सत्ता और कहां नहीं है। और जबकि उन्होंने ऐसा नहीं किया है तो इसे क्यों नहीं सत्ता की दलाली मानी जाए।

दरअसल देखा जाए तो इस तरह की विसंगतियां तमाम लेखों में देखने को मिलेंगी लेकिन सभी पर अलग अलग विचार करना इस एक लेख में तो संभव नहीं है और देखा जाए तो इसकी जरूरत भी नहीं है क्योंकि वे सभी अंदर से इतने पोपले हैं कि सामने पूरी तरह खड़ा होने के पहले ही भरभरा कर गिर पड़ते है। यही कारण है कि हिन्दी में इसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया है। फिर भी मेरी यह कोशिश रहेगी कि इनका जवाब दूं ताकि साहित्य में सार्थक बहस के लिए माहौल बन सके। संपादकीय को आधार लेख के तौर पर मैं ले रहा हूं और इसी पर बात करुंगा पर प्रसंगवश दूसरे लेखों का हवाला भी हो सकता है आ जाए। संपादकीय की पहली पंक्ति है – ‘‘यहां 1980 के बाद उभरे हिन्दी कवियों और उनकी कविता की मुख्य प्रवृत्तियों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है-लेकिन हिन्दी कविता की परम्परा के भीतर ही, और उसकी अगली कड़ी के रूप में ही इस कविता को देखने की यह विनम्र चेष्टा है।’’ इसका मतलब हुआ कि परम्परा के बाहर भी कविताएं लिखी जा रही हैं। वे लोग कौन हैं जो परम्परा के बाहर की कविताएं लिख रहे हैं और इन बाहर की कविताओं की कोई परम्परा है भी या नहीं और उसकी पहचान वे कैसे कर रहे हैं? यह सब उन्हें विस्तार से बताना चाहिए था। ठीक है वे उस पर बात नहीं करना चाहते हैं तो न करें लेकिन इतना तो उन्हें अवश्य कहना चाहिए था कि वे जिन कविताओं पर बात करने जा रहे हैं वे किस परम्परा से आती हैं। यह इसलिए जरूरी है बताना क्योंकि उस परम्परा का चयन उन्होंने किया है और वे खुद को भी उस पता नहीं कौन सी परम्परा का कवि मान रहे हैं तो उन्हे बताना तो चाहिए था कि वह है क्या। यहां अद्वैतवाद है तो द्वैतवाद भी है, कबीर का निर्गुण है तो तुलसी का सगुण भी है, आधुनिक युग में प्रगतिशीलों की एक सशक्त धारा है तो कलावादी भी पछाड़ खाते चल रहे हैं। एक द्वंद्वात्मकता हर समय दिखायी देती है लेकिन इस द्वन्द्वात्मकता पर आवरण चढ़ाने के लिए अजीब विसंगति और धुंधलके का सहारा लिया गया है।

कहा गया कि कविताओं का ‘‘दशकवार विभाजन गलत है’’ लेकिन दूसरी ही पंक्ति में महादशक की परिकल्पना कर डाली गयी। इतना ही नहीं बल्कि आठवें दशक के भूत को भी खड़ा किया गया और एक नकली युद्ध की रूपरेखा भी खींची गयी। दरअसल यह प्रपंच वे इसलिए रच रहे हैं ताकि आठवें दशक के भुला दिए गए कवि (यहां मैं आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, गोरख पाण्डेय का नाम नहीं ले रहा क्योंकि वे दशक के नहीं बल्कि परिवर्तनकामी चेतना से लैस मार्क्सवादी विचारधारा के कवि हैं) और नौवें दशक वाले ये लोग जिन पर समय ने धूल की मोटी परत डाल दी है, को किसी तरह कविता के केंद्र में लाया जा सके। आठवें दशक और नौवें दशक के आठ गुण और अवगुण को मदन कश्यप ने अपने लेख में चिह्नित किया है जो गौर करने लायक है। आठवें दशक के बारे वे क्रम संख्या एक में कहते हैं, ’’एकता का आधार नक्सलवाद विरोध (नकारात्मक)’’ फिर क्रम संख्या सात में लिखते हैं ‘‘राजनीतिक सजगता बहुत अधिक।’’ यहां नकारात्मक या सकारात्मक उन्होंने कुछ नहीं लिखा है। अगर कुछ नहीं लिखा है तो इसका मतलब सकारात्मक हुआ। वे बताएं कि नक्सलवाद विरोध अगर नकारात्मक है तो राजनीतिक सजगता सकारात्मक कैसे है। आठवें दशक की शुरुआत ही होती है ’’गोली दागो पोस्टर’’ और ’’जनता का आदमी’’ जैसी वैचारिक रूप से लैस कविता से। नक्सलवाद एक विचारधारा है और विचारधारा के विरोध का नाम आठवां दशक है जिसे मदन कश्यप राजनैतिक सजगता का दशक कह रहे हैं जबकि यह विरोध नक्सलवादी विचार को नकारने तक ही सीमित था। उन्होंने कविता में कोई समानान्तर राजनीतिक लाइन नहीं खड़ी की थी। फिर इसे राजनीतिक सजगता वे क्यों कह रहे हैं?

यह सर्वविदित है कि दशक की अवधारणा राजनीतिक विचारधारा के निषेध पर टिकी है जबकि विचारधारा दशकों में न कैद होती है और न उसकी मोहताज होती है। बल्कि इसके उलट वह समय को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सदैव संघर्षशील रहती है। इस काम के लिए उसे राजनीति की जरूरत पड़ती है, इतिहास की जरूरत पड़ती है और साहित्य की भी जरूरत पड़ती है जिसमें कविता भी आती है। दशकों को कविता की क्या जरूरत? वह क्यों राजनीतिक कविता को अपने अंदर समाहित करेगा। वे कविताएं नक्सलवाद की कविताएं हैं और जो उन कविताओं के विरोध में खड़ी हैं उन्हें भी कुछ नाम दिया जाना था तो उनके आकाओं ने उसे ’आठवें दशक की कविता’ का नाम दिया फिर उसी तर्ज पर नौवें दशक को भी खड़ा किया और दशकों के कवि की एक नयी परम्परा की शुरुआत की। विडंबना देखिए कि वे आज भी बेचैन हैं दशकों के कवि कहलाने के लिए जबकि आम जनता के खिलाफ उन्हीं की सरकारों ने युद्ध का एलान कर रखा है। आप समझ सकते है कि वे किनके साथ हैं।

एकांत श्रीवास्तव ने संपादकीय में हिन्दी साहित्य की परम्परा की दुहायी दी है और खुद को दशक का कवि बता रहे हैं तो क्या वे बतायेंगे कि कबीर, तुलसी, नागार्जुन, त्रीलोचन, केदार, निराला या मुक्तिबोध किन दशकों के कवि थे। और अगर वे किसी दशक के कवि नहीं थे तो फिर ये नौवें दशक का कवि बन कर किस परम्परा के होने का दंभ भर रहे हैं। दरअसल नौवें दशक की बात जो लोग कर रहे हैं उनमें से अधिकांश को उनके बचपन के दिनों में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार का झुनझुना थमा दिया गया था जिसे वे आज भी छोड़ नहीं पा रहे हैं जबकि इनमें से अधिकांश ने लिखना छोड़ दिया है। एकांत ने सत्रह कवियों के नाम गिनाए हैं और फिर खुद कहा है कि इनमें से सिर्फ आधा दर्जन लोग ही आज सक्रिय हैं। आश्चर्य है कि जब वे खुद इस बात को मान रहे हैं और सच भी यही है कि इनमें से कई ने पिछले दस साल से भी ज्यादा समय से कोई कविता लिखी ही नहीं है तो उनका नाम उन्होंने क्यों गिनाया जबकि कई ऐसे लोग जो लगातार अच्छा लिख रहे हैं उनकी कोई चर्चा उन्होंने नहीं की। मैं यहां उनके नाम नहीं लूंगा नहीं तो वे लड़ाई को छोटी कर देंगे और इसे कुछ नामों के बरअक्स कुछ नामों का खेल बना देंगे। अगर उन्हें शौक है कि वे वैसे ही लोगों को लिए फिरें जो नौवें दशक को अपने सीने से ठीक उसी तरह चिपकाए हुए हैं जैसे बंदरिया अपने बच्चे को मर जाने के बाद भी कलेजे से लगाये रहती है तो भला कोई क्या कर सकता है। इनका डर दरअसल यह है कि बाद की पीढ़ियां कविता में तेजी से चली आ रही हैं और इसके साथ ही नौवां दशक तेजी से पीछे छूटता जा रहा है जैसे कोई भी दशक छूटता है और इस गुजर चुके नौवे दशक के साथ कहीं वे भी गुजरे जमाने की चीज न हो जाएं। इसलिए ये लॉन्ग नाइन्टीज की बात कर रहे हैं ताकि लोगों को लगे कि आज भी उन्हीं का युग चल रहा है। मदन कश्यप ने नौवें दशक का गुण बताया है साम्राज्यवाद का विरोध लेकिन देखिए इनका सम्राज्यवादी रवैया ये अपने आगे और पीछे के दशकों को भी निगलने की तैयारी कर चुके हैं।

ये ग्राम संवेदना की बात करते हैं, ‘ग्राम वासिनी भारत माता’ की दुहायी देते हैं लेकिन इनमें से एक भी कवि ने अपनी कविता में किसानों के दर्द को दर्ज नहीं किया जबकि सन नब्बे से अभी तक ढाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ये दंभ भरते हुए कहते है कि ‘समर गाथा’ सुनने के लिए अब किसी के कान अधीर नहीं थे’’ और खुद इनके पांच सौ के एक संस्करण सालों नहीं बिकते और जो बिकते हैं वह भी सरकारी खरीद की वजह से। ये 80 के बाद की कविता पर विचार करने बैठे हैं और सवाल 85 से 2012 के बीच की कविता को लेकर करते हैं और जवाब देने वाले अधिकांश 1990 से बात शुरू करते हैं क्योंकि उसी वक्त सोवियत संघ का विघटन हुआ था। दस साल ये यूं ही गटक जाते हैं क्योंकि इनका मकसद कम्युनिस्ट विचारधारा पर हमला करना था और इसके लिए इस घटना से बेहतर उदाहरण उनके पास कुछ और हो नहीं सकता था। मदन कश्यप अस्सी के दशक के नक्सलवादी विरोधियों को तो चिह्नित कर लेते हैं और उसे नकारात्मक भी बताते हैं लेकिन नब्बे के दशक में आए उन्हीं के गोत्र के लोगों को पहचानने की जगह वे खुद उन्हीं के साथ अपना नाम जोड़वाने के लिए जोड़तोड़ करते नजर आते हैं। क्या अस्सी के दशक की नकारात्मकता नब्बे के दशक में आते आते सकारात्मक हो गयी? और अगर हो गयी तो कैसे इसका जवाब उन्हें देना चाहिए।

पत्रिका ने जो आठ सवाल पूछे हैं उनमें पहला ही सवाल है कि ‘‘1990 के दशक में रूस के विघटन का हिन्दी कवियों और कविता पर क्या प्रभाव पड़ा?’’ विडंबना देखिए कि यह सवाल वे तब कर रहे हैं जब पूरे लैटिन अमेरिका में कम्युनिस्ट एक के बाद एक लगातार जीत हासिल कर रहे हैं, नेपाल में सैकड़ों साल से चले आ रहे राजतंत्र को वहां के माओवादियों ने लंबे संघर्ष के बाद उखाड़ फेंका है और यहां अपने देश में भी माओवादियों की सरगर्मियां इतिहास रच रही हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि कविता की ओर आती एक बार फिर उसकी धमक देख कर ही कब्र से दशक की अवधारणा का शव निकाल कर उसकी शिनाख्त का बहाना बनाकर वे बहस खड़ी कर रहे हैं? यह उनके लिए प्रतिकूल समय है और ऐसे प्रतिकूल समय में अपनी ओर ध्यान दिलाने का इससे अच्छा तरीका उनके पास कुछ और हो भी नहीं सकता था।

संपादकीय में दावा करते हुए कहा गया है कि ‘‘इस कविता ने स्नेहसिक्त भाषा में मनुष्य जीवन के विभिन्न संबंधों यथा-पिता, मां, भाई, बहन, बच्चे, पानी, दोस्त, प्रिया को भी व्यापक धरातल पर व्यक्त किया। कविता की वापसी घर की तरफ हुई।’’ याद कीजिये इन्हीं चीजों को चिह्नित कर अशोक वाजपेयी ने 1978 में कविता की वापसी की बात कही थी। ये उन्हीं के वंशज हैं। और देखिए इन्हीं चीजों को देख कर बाबा नागार्जुन ने अपनी कविता में क्या लिखा था - ‘‘क्रांति पास है, कांति दूर है, बुद्धू तुझको क्या दिखता है? आओ तुझको सैर कराऊं, घर में घुस कर क्या लिखता है?’’ दरअसल जिसे वे घर की ओर वापसी कह रहे हैं वह भाग कर घर में जा छुपने का मामला है। उन्हें पता है कि सरकार जनता के खिलाफ सेना उतार चुकी है और इनका अवसरवाद इन्हें सरकार के खिलाफ बोलने नहीं देता, इनका अवसरवाद इनके न्याय और अन्याय की समझ को कुंद कर चुका है। और यह घर भी क्या है? एक दशक है जो नब्बे का है और जो खंडहर का रूप ले चुका है जिसमें जहां-तहां बन आये कोटरों में धंसे छुपे ये बचपन के दिनों में थमा दिये गये अपने अपने झुनझुने लिए बैठे हैं। इनकी आवाज में नया झुनझुना पाने का रुदन है। विमल कुमार अपने लेख में एक जगह लिखते हैं -‘‘दरअसल हिन्दी कविता की उड़ान भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार तक की है। आठवें दशक के कई कवियों की उड़ान यहीं तक है।’’ अजीबोगरीब तरीके से दोनों पंक्तियां गलत हैं चाहे इन्हें एक साथ पढ़ा जाए या अलग अलग। क्योंकि हिन्दी के तमाम कवि इस उड़ान में शामिल नहीं हैं। यह सिर्फ सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े कवियों का यथार्थ हो सकता है। और अगर यह बात उन कुछ कवियों के लिए कही जा रही है जिन्हें वे आठवें दशक का बताते हैं तब भी यह गलत है क्योंकि यह बात सिर्फ अरुण कमल पर लागू होती है। हां कुछ सालों बाद जब नौवें दशक के कवियों का नम्बर साहित्य अकादमी पाने का आएगा तब यह बात उन पर पूरी तरह फिट बैठेगी क्योंकि ये आए ही हैं भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार की नाव पर चढ़े और व्याकुल दिख रहे हैं साहित्य अकादमी का घाट लगने को।

कश्मीर पर तो राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए- अरुंधति रॉय

Posted by चन्द्रिका on 1/26/2013 02:22:00 PM

(पीयूडीआर ने जम्मू-कश्मीर में सैनिकों द्वारा उत्पीड़न पर ‘इम्प्यूटिनी फॉर एलिजिड परपेट्रेटर्स एंड क्वेस्ट फॉर जस्टिस इन जम्मू एंड कश्मीर’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 214 घटनाओं के हवाले से स्थिति की भयावहता स्पष्ट की गई है। रिपोर्ट के आख़िरी पन्नों में परिशिष्ट के रूप में कुछ दस्तावेजों को भी स्कैन कर लगाया गया है। कश्मीर की राजनीतिक स्थितियों पर अरुंधति लिखती रही हैं, पीयूडीआर की इस रिपोर्ट के मौके पर उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में जो भाषण दिया, पेश है उसका हिंदी तर्जुमा दिलीप खान द्वारा)

मैं ये कहना चाह रही हूं कि कश्मीर में सैनिकों द्वारा जो उत्पीड़न हो रहे हैं वो किसी सैनिक का निजी विचलन नहीं है बल्कि ये सांस्थानिक योजना है। .....अल्जीरिया जब फ्रांस का उपनिवेश था तो उस समय एक फ्रांसीसी सैनिक ने कहा कि ये मेरा काम है कि मैं अल्जीरिया में मानवाधिकार को तोड़ूं, यहां के लोगों को धमकाकर रखूं, लोगों को यातनाएं दूं। मुझे ऐसी ही पाठ पढ़ाई गई है! इसलिए मानवाधिकार हनन का मसला किसी का निजी मामला भर नहीं है, ये सांस्थानिक है और ऐसी स्थिति में इस तथ्य पर नज़र दौड़ाइए कि कैसे भारतीय सेना ये कहती है कि कश्मीर में वे सेना द्वारा हुए मानवाधिकार हनन की जांच खुद अपनी संस्था के मार्फ़त करवाएगी! इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए?
.....कश्मीर की हालत बेहद ख़स्ता है और इस लिहाज से पीयूडीआर ने जो काम किया है उसकी हमें ज़रूरत है। कश्मीर के बारे में लोगों के पास अब सूचनाएं आने लगी हैं। इसलिए कई दफ़ा सुधिजन ये कहने लग जाते हैं, अरे यार, क्या होगा इन आंकड़ों और बातों का, क्या फ़ायदा होने जा रहा? लेकिन ऐसे मुश्किल हालात में काम करने वालों को लगातार काम करते रहना चाहिए क्योंकि इन कामों के पुलिंदों में असर छुपा होता है। 
मुझे नर्मदा घाटी की एक बात याद आ रही है: एक गांव में आदिवासी लोग अपने खेत में रोपनी कर रहे थे। वो गांव डूब क्षेत्र में आने वाला था, तो मैंने पूछा कि जब फ़सल डूबनी ही है तो वो क्यों रोपनी कर रहे हैं? गांव वालों ने जवाब दिया कि वो जानते हैं कि फ़सल डूब जाएगी, लेकिन वे और कर क्या सकते हैं। फ़सल रोपना उनका काम है और वो ऐसा करेंगे। इसलिए डुबोने वालों को अपना काम करने दीजिए, आप अपना काम करते रहिए। 
बहरहाल, ये रिपोर्ट महज इन आंकड़ों की सूची और घटनाओं का संग्रहण नहीं है कि कितने लोग कश्मीर में मारे गए और कितनों को यातनाएं मिलीं, बल्कि ये हमारे सामने कहीं ज़्यादा गंभीर सवाल उछालती है। ये हमें बताती है कि वास्तव में सैन्य कब्जेदारी का नतीजा किस रूप में सामने आ रहा है। सैन्य अत्याचार की इन घटनाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसा नहीं है कि एक सेना का जवान आया और यातना बरसा गया, एक सेना का जवान आया और ख़ून बहा गया, वास्तव में ये सांस्थानिक मसला है। ये घटनाएं भटकाव या अपवाद को रेखांकित नहीं करतीं। उनको उन्हीं खातिर तैयार किया गया है और वे जो वहां कर रहे हैं वही उनका कर्तव्य है!
मैं कई बार कश्मीर गई हूं और मैंने देखा है वहां के लोगों की आंखों में क्या है? आफ़्सपा जैसे क़ानून के साए में जी रहे कश्मीर में अत्याचार के कैसे-कैसे वारदात अंजाम दिए जाते हैं ये इधर के लोगों की कल्पना से परे हैं। कश्मीर के (तकरीबन) किसी भी घर में चले जाइए वहां दस्तावेज़ों से भरा प्लास्टिक का थैला आपको मिल जाएगा। लोग आपको बताएंगे,- मैंने यहां एफआईआर किया, वहां अर्जी डाली, फिर ऊपर गया, अदालतों के चक्कर काटे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसी निराशा हर घर में पसरी मिलेगी। दस्तावेज़ों के पुलिंदों के बावज़ूद कुछ नहीं हो रहा! पूरी अवाम के साथ ये किस तरह का बरताव है?
...सवाल ये है कि हम इस रिपोर्ट का क्या करें, हमें कश्मीर के बारे में क्या करना चाहिए? चलिए एक सामान्य उदार भारतीय के लिए इसके मायने ढूंढते हैं। आप देखिए न, अन्ना हज़ारे के साथ और दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध में हुए आंदोलन में डूबते-उतराते लोग कहां खड़े हैं? कौन बोल रहा है कश्मीर पर? उनके पोजिशन और मुद्दे साफ़ हैं। कश्मीर से उनको क्या लेना-देना? लेकिन एक उदार राजनीति के व्यक्ति को भी इस मुद्दे पर साथ होना चाहिए। मैं तो कहूंगी कि राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए कि कश्मीर के मुद्दे उनके लिए क्यों महत्वपूर्ण है! मैं कारण बताती हूं। आज़ादी के 60 साल बाद तक पुलिस, भारतीय सेना, सीआरपीएफ़ और बीएसफ़ ने नागालैंड, मणिपुर और कश्मीर में कब्जेदारी की बदौलत जिस तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है और इस दौरान उन्होंने जो भूमिका निभाई है, उसने सांस्थानिक रूप ले लिया। राष्ट्रवादियों को बस मैं ये बताना चाहती हूं कि रक्षा बलों ने जो कसरत उन इलाकों में की है वे अब भारत की “मुख्यभूमि’ में उनका इस्तेमाल करने लग गई हैं। छत्तीसगढ़ में यही कार्रवाई हो रही है और धीरे-धीरे इसकी परास बढ़ती जा रही है.....
....रक्षा बलों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं पर तो सवाल भी नहीं उठते। बड़ी आबादी यातना देने वालों की पांत के साथ खुद को नत्थी पाती है, इस महसूसियत में एक तरह का वर्चस्व का पुट शामिल होता है, इसलिए ये मज़ा देता है। मुझे संसद भवन पर हुए हमले के तुरंत बाद हुए एक टीवी शो की याद आ रही है जो शायद सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित हुआ था, उसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कह रहे थे,  “हां, ये सच है कि अफ़जल गुरू को मैंने यातनाएं दी है, मैंने उसकी गुदा में पेट्रोल डाला है, मैंने उसको बेतरह पीटा है, लेकिन अफसोस उसने कुछ नहीं कबूला।” उस चर्चा में कई राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार और पत्रकार भी थे, शायद राजदीप सरदेसाई शो को एंकर कर रहे थे, लेकिन किसी ने पुलिस अधिकारी की आपकबूली पर एक वाक्य नहीं बोला। पुलिस अधिकारी ने दावा ठोका कि उसने राष्ट्रहित में ऐसा किया है।....इसलिए मेरा ये मानना है कि ये रिपोर्ट ऐसे कॉरपोरेट मीडिया के लिए नहीं है और न ही उन लोगों के लिए है जिन्हें ऐसी यातनाओं को देखने-सुनते में मज़ा हासिल होता है। 
ये उन लोगों के लिए है जो वाकई इन यातनाओं को संदर्भ सहित जानने-समझने की चाह रखते हैं, जो ये समझना चाहते हैं कि बीते छह दशकों में कश्मीर में वाकई हुआ क्या है? बड़ी आबादी की राजनीति को खारिज करने से उपजे सवाल को लेकर कई लोग असहज और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ये ढोंग नहीं है, राजनीति है। मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि आज यदि एक कश्मीरी पंडित 200 लोगों का संदर्भ देकर एक किताब लिखता है तो लोग उसको हाथों-हाथ लेते हैं, कश्मीर का एक भयावह चेहरा लोगों के सामने नमूदार होने लगता है। लेकिन आज ही अगर आप हज़ारों पेज के दस्तावेज़ के साथ उसी कश्मीर पर सैंकड़ों पेज का किताब लिखेंगे तो लोग तवज्जो तक नहीं देंगे। यही राजनीति है। राजनीति यही है कि बहुसंख्य आबादी को क्या रास आ रहा है और लोग किस मुद्दे के साथ तादात्मय बना पा रहे हैं। लेकिन ऐसे काम लगातार होते रहना चाहिए, कश्मीर पर ये बढ़िया रिपोर्ट है, जिसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

‘भारतीय विचारधारा’: मिथक से यथार्थ की ओर

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/23/2013 03:08:00 PM

सुभाष गाताडे

अपनी किताब‘ द जर्मन आइडिओलोजी’ (रचनाकाल 1845-46) मार्क्स एवं एंगेल्स इतिहास की अपने भौतिकवादी व्याख्या का निरूपण करते है। किताब की शुरूआत 19 वीं सदी के शुरूआत में जर्मनी के दार्शनिक जगत पर हावी हेगेल की आदर्शवादी परम्परा एवं उसके प्रस्तोताओं की तीखी आलोचना से होती है जिसमें यह दोनों युवा इन्कलाबी चेतना एवं अमूर्त विचारों पर फोकस करनेवाले और सामाजिक यथार्थ के उससे निःसृत होने की उनकी समझदारी पर जोरदार हमला बोलते हैं। इस ऐतिहासिक रचना से नामसादृश्य रखनेवाली पेरी एण्डरसन (थ्री एसेज़, 2012) की किताब ‘द इण्डियन आइडिओलोजी’ का फ़लक भले ही दर्शन नहीं है, मगर अपने वक्त़ के अग्रणी विचारकों द्वारा भारतीय राज्य एवं समाज की विवेचना की आलोचना के मामले में वह उतनी ही निर्मम दिखती है।

आज की तारीख में भारतीय राज्य एक स्थिर राजनीतिक जनतंत्र, एक सद्भावपूर्ण क्षेत्रीय एकता और एक सुसंगत धार्मिक पक्षपातविहीनता के मूल्यों को स्थापित करने का दावा करता है। उपनिवेशवादी गुलामी से लगभग एक ही समय मुक्त तीसरी दुनिया के तमाम अन्य मुल्कों की तुलना में – जहाँ अधिनायकवादी ताकतों ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं एवं संस्थाओं को मज़बूत नहीं होने नहीं दिया है – विगत साठ साल से अधिक समय से यहां जारी संसदीय जनतंत्र के प्रयोग को लेकर वह आत्ममुग्ध भी दिखता है। इतना ही नहीं अक्सर यह भी देखने में आता है कि भारतीय समाज की विभिन्न गैरबराबरियों, जाति-जेण्डर-नस्ल आदि पर आधारित तमाम सोपानक्रमों के विभिन्न आलोचक भी भारतीय राज्य की  इस आत्मप्रस्तुति/आत्मप्रशंसा से सहमत हुए दिखते हैं। मगर यह बेचैन करने वाला सवाल नहीं पूछा जाता कि भारतीय राज्य के तमाम दावों एवं वास्तविक हकीकत के बीच कितना तारतम्य है ? अगर दावों एवं हकीकत के बीच अन्तराल दिखता है तो उसे हम परिस्थिति की नियति कह सकते हैं या उसकी जड़ें शासकों के आचरण में ढूंढ सकते हैं।

दरअसल भारत को अपनी इकहरी नज़र के तहत हिन्दू राष्ट्र बनाने को आमादा विचारकों/कार्यकर्ताओं की चिन्तनप्रणाली/कार्यपद्धति विगत दो दशकों से अधिक समय से लिबरल/उदारवादी एवं वाम विचारकों की चिन्ता एवं आलोचना का विषय रही है। विडम्बना यही कही जाएगी कि साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता, अधिनायकवाद बनाम जनतंत्र जैसे द्धिविध/बायनरी रूप में प्रस्तुत इस बहस में खुद लिबरल विचारकों की सीमाएँ, उनके द्वारा धर्मनिरपेक्षता/जनतंत्र/एकता आदि मसले को गैरआलोचनात्मक ढंग से देखने का मसला कभी भी एजेण्डा पर नहीं आ सका है। लन्दन रिव्यू आफ बुक्स में 2012 की गर्मियों में प्रकाशित पेरी एण्डरसन द्वारा लिखे भारत सम्बन्धी आलेखों का प्रस्तुत संकलन न केवल भारतीय संघ की वास्तविकता को पैनी नज़र से देखता है बल्कि उसे लेकर स्थापित विभिन्न ‘सच्चाइयों’ को प्रश्नांकित करता है और साथ साथ ही हमारे वक्त के तमाम अग्रणी विचारकों के रूख पर भी सवाल खड़े करता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि (बकौल सुश्री अरून्धति राय) ‘पेरी एण्डरसन के तर्क उन तमाम विद्धानों एवं विचारकों को बेचैन कर देंगे जिन्होंने भारतीय गणतंत्र के हालात को लेकर महिमामण्डित करनेवाली सहमति कायम की है।’ पेरी एण्डरसन के मुताबिक भारतीय गणतंत्र की तमाम बीमारियों की जड़ें, ऐतिहासिक तौर पर, गहरी हैं। उनके मुताबिक भारत का आज़ादी का आन्दोलन जिस तरह लड़ा गया, जिसकी परिणति एक बंटे हुए उपमहाद्वीप में कांग्रेस के हाथों सत्ता हस्तांतरण मे हुई, उस पूरे इतिहास को नए सिरे से देखने-परखने की ज़रूरत है। इस किताब की प्रस्तावना में पेरी एण्डरसन पूछते हैं ‘‘गहराई में जाकर देखें तो भारत में जनतंत्र का सामाजिक आधार/एंकरेज कितना है और उसमें जाति की कितनी भूमिका है ? ..भारतीय संघ में धर्म का कितना स्थान है – जो घोषित तौर पर सेक्युलर है, मगर अन्तर्वस्तु में कितना है ? और अन्त में, राष्ट्र की एकता के जन्मचिन्ह क्या हैं और उसकी कितनी कीमत अदा करनी पड़ी है ?’’किताब में समूचा ज़ोर लिबरल/उदारवादी, सेक्युलर चिन्तकों पर है तथा इसमें वाम की चर्चा नहीं की गयी है। लेखक के मुताबिक एक ताकत के तौर पर वाम की ‘सापेक्ष राजनीतिक कमजोरी’ ने भारतीय विचारधारा की पकड़ को और मजबूत बनाया है।

लेखक के मुताबिक वाम की कमजोरी के कारणों की गहराई में जाकर पड़ताल ज़रूरी है, मगर उसका मानना है कि इसकी प्रमुख वजह ‘आज़ादी के आन्दोलन के साथ राष्ट्र के धर्म के साथ एकीकरण में निहित है।’ आयर्लण्ड, जहाँ लेखक पैदा हुआ, उसकी चर्चा करते हुए वह यह भी जोड़ते हैं कि जहाँ-जहाँ पर ऐसा एकीकरण हुआ, वहाँ पर वाम के लिए ज़मीन हमेशा शुरू से प्रतिकूल रही है। प्रस्तावना के अन्त में वह यह सलाह भी देते हैं कि वाम को चाहिए कि वह अपने दौर को श्रद्धाभाव से देखने के बजाय अम्बेडकर एवं पेरियार की तर्ज़ पर अधिक आलोचनात्मक ढंग से देखे।

00

अपने प्रथम अध्याय ‘इण्डिपेण्डस’ की शुरूआत लेखक जवाहरलाल नेहरू की बहुचर्चित किताब ‘डिस्कवरी आफ इण्डिया’ के उद्धरण से करते हैं जिसमें भारत के भावी प्रधानमंत्री आज़ादी के कुछ समय पहले ‘भारत की संस्कृति एवम सभ्यता की पाँच-छह हज़ार वर्षों से अधिक समय चली आ रही निरन्तरता’ को लेकर अपनी मुग्धता बयान करते हुए इस उपमहाद्वीप की प्राचीनता के अनोखेपन का जिक्र करते हैं, जो ‘सभ्यता की सुबह से ही भारत के विचार में व्याप्त एकता के सपने’ में प्रतिबिम्बित होती है। फिर अमर्त्य सेन, मेघनाद देसाई, रामचन्द्र गुहा, सुनिल खिलनानी, प्रताप भानु मेहता जैसे शीर्षस्थ विद्वानों की भारत सम्बन्धी गम्भीर रचनाओं का ज़िक्र करते हुए लेखक बताते हैं कि किस तरह भारत को समझने के लिए अनिवार्य इनकी रचनाएँ भी ‘राज्य के अपने प्रति शब्दाडम्बर (rhetoric) को सांझा करती हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन में जिस तरह ‘भारत के प्रकृति द्वारा निर्मित एक अविभाजित धरती’ (बकौल महात्मा गाँधी) जहां ‘दुनिया के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग राष्ट्रीयता की भावना प्रगट होती थी’ जैसी बातों का बोलबाला था उसी सिलसिले के आज भी जारी होने की बात को रेखांकित करते हुए किताब एक महत्वपूर्ण तथ्य की तरफ इशारा करती है। दरअसल यह उपमहाद्वीप जिसे आज हम इस रूप में जानते हैं वह पूर्वआधुनिक समय में कभी भी एक राजनीतिक या सांस्कृतिक इकाई के रूप में अस्तित्व में नहीं था, ब्रिटिशों के आगमन ने ही पहली दफा इसे एक प्रशासकीय और विचारधारात्मक हकीकत में तब्दील किया।

अगर हम अतीत के पन्नों को पलटें तो इतिहास के लम्बे कालखण्ड में उसका भूभाग मध्यम आकार के राज्यों का हिस्सा था। भारत के इतिहास में नज़र आने वाले तीन बड़े साम्राज्यों – मौर्य, गुप्त या मुगल साम्राज्यों – का दायरा कभी भी नेहरू द्वारा ‘डिस्कवरी आफ इण्डिया’ में वर्णित भूभाग तक फैला नहीं था। जिस ‘भारत के विचार’ की बातें आज़ादी के आन्दोलन के अग्रणियों ने की, वह ‘सारतः एक यूरोपीय विचार’ था। किसी भी देशज भाषा में ऐसा शब्द वजूद में नहीं दिखता। यह अकारण नहीं था कि इस उपमहाद्वीप का बंटा हुआ समाज एवं अलग अलग राज्यों में विभक्त भूभाग पर नियंत्राण करना बर्तानवी शासकों के लिए बहुत कठिन साबित नहीं हुआ। निश्चित ही पुलिस एवं फौज से बनी दमनात्मक मशीनरी के अलावा ब्रिटिश राज के आधुनिकीकरण की ताकत कानूनी किताबों के निर्माण या रेल एवं यातायात के साधनों को विकसित करने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने एक देशज अभिजात तबके के निर्माण के भी बीज डाले जो मेकॉले की भाषा में ‘रंग एवं वर्ण में भारतीय था, मगर रुचियों, मतों, बौद्धिकता एवं नैतिकता के मामले में ब्रिटिश’ था। ‘भारत का विचार (आयडिया आफ इण्डिया) उनका था। मगर जैसे जैसे वह नौकरशाही नियम का हिस्सा बना, फिर प्रजा अपने शासकों के खिलाफ उठ खड़ी हो सकती थी और साम्राज्य का प्रभामण्डल राष्ट्र के करिश्मे में तिरोहित होनेवाला था।’ (पेज 15)

इस अध्याय का शेष भाग गाँधी द्वारा आज़ादी के आन्दोलन की अगुआई, जातिप्रथा से लेकर मशीनरी आदि ज्वलन्त मसलों पर उनके विचार, अहिंसा की रणनीति का उनके द्वारा इस्तेमाल तथा ब्रिटिश राज के दिनों में सम्पन्न चुनावों में अलग अलग सूबों में कायम कांग्रेस सरकारों के दमनात्मक स्वरूप आदि पर केन्द्रित है। जहाँ 1857 के महासमर के बाद पहली दफा एक व्यापक जनान्दोलन खड़ा करने में गाँधी की भूमिका, कांग्रेस को एक लोकप्रिय राजनीतिक ताकत बनाने की उनकी कोशिशों की इसमें चर्चा है, वहीं वह इस बात का विशेष उल्लेख करती है कि चन्द अपवादों को छोड़ दें तो किस तरह बीसवीं सदी के राष्ट्रीय आन्दोलनों में उभरे तमाम नेताओं में से बहुत कम धार्मिक नेता थे और इस कतार में गाँधी बिल्कुल अलग ठहरते हैं। उनके लिए ‘राजनीति की तुलना में धर्म की अधिक अहमियत थी’ (पेज 19) अपने बुनियादी विश्वासों को लेकर ‘हिन्द स्वराज्य’ किताब में वह लिखते हैं कि ‘मशीनरी अधिक पाप की खान है’ , ‘रेलवे ने ब्युबानिक प्लेग को फैलाने में मदद पहुँचाई है’, और ‘अकाल की वारम्वारिता को बढ़ाया है’ ‘अस्पताल ऐसे स्थान हैं, जो पाप को बढ़ावा देते हैं;’ आदि (पेज 21)

कहीं कहीं लेखक ऐसे वक्तव्य देते हैं जिनसे सहमत होना मुश्किल दिखता है, मसलन उनके मुताबिक ‘कांग्रेस अभिजातों की बुनियादी राजनीति खालिस सेक्युलर थी। पार्टी पर गाँधी के नियंत्रण ने न केवल उसे लोकप्रिय आधार प्रदान किया, जो उसके पास नहीं था, मगर साथ ही साथ उसने – मिथक, धर्मशास्त्र आदि के रूप में धर्म के तत्वों का भी जोरदार प्रवेश सम्भव बनाया।’ (पेज 22) ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक गाँधी के आगमन के पूर्व कांग्रेस राजनीति में हावी लोकमान्य तिलक आदि की राजनीति के प्रति उतने परिचित नहीं दिखते। याद रहे कि तिलक को यह ‘श्रेय’ जाता है कि उन्होंने लोगों को लामबन्द करने के लिए सार्वजनिक गणेशोत्सव या शिवजयंती जैसे त्यौहारों का आयोजन शुरू किया, जो निश्चित ही किसी भी मायने में सेक्युलर कदम नहीं कहे जा सकते।

गाँधीजी द्वारा बार-बार हिन्दू धर्म की दुहाई देने के उदाहरणों को पेश करने के बाद लेखक यह सवाल भी उठाते हैं कि ‘इस किस्म के हिन्दू पुनरूत्थानवादी से हम ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वह मुसलमानों को भी एक साझे राष्ट्रीय संघर्ष हेतु एकताबद्ध करेगा ?’ (पेज 24) इस पहेली का समाधान एक तरह से गाँधी ने यह ढूंढा कि ‘इस्लाम के बैनर तले ही ब्रिटिश राज के खिलाफ मुसलमानों को गोलबन्द किया जाए..’ टर्की में खिलाफत की समाप्ति एक ऐसा मुद्दा था, जिसके नाम पर रूढ़िवादी मुसलमानों के बड़े हिस्से को साथ जोड़ा जा सकता था। स्पष्ट था यह ऐसा मसला था जो ‘..अधिक सेक्युलर मुसलमानों के लिए – जिनमें जिन्ना भी शामिल थे – न केवल अप्रासंगिक था, बल्कि बेहद प्रतिक्रियावादी भी था…’

(पेज 25) असहयोग आन्दोलन में चौरीचौरा की घटना में हुई हिंसा के बाद समूचे आन्दोलन को वापस लेने वाले गाँधीजी किस तरह बीस साल बाद ‘गुलामी के जोखड़ को उतार फेंकने के लिए जरूरत पड़े तो हिंसा का भी सहारा लेने की बात करते हैं’ आदि विभिन्न घटनाओं की चर्चाओं के जरिए गाँधीजी के विचारों में नज़र आनेवाली असंगतियों के मद्देनज़र लेखक गांधीजी द्वारा उसे औचित्य प्रदान किए जाने की बात को रेखांकित करते हैं। (पेज 31) असहयोग आन्दोलन एवं खिलाफत आन्दोलन - जिसमें हिन्दू  मुस्लिम दोनों ने जम कर हिस्सेदारी की थी, उस पूरे जनउभार को चौरीचौरा की घटना के बाद अचानक वापस लिए जाने के गाँधी के फैसले का लेखक के मुताबिक एक अन्य असर यह भी रहा कि ‘इसके बाद स्थूल रूप में मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया।’ मार्च 1930 में जब गांधी अपने दूसरे व्यापक जनअभियान सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरूआत दाण्डी मार्च के बहाने की तो इस बार आन्दोलन का दायरा ‘भौगोलिक तौर पर व्यापक था, लेकिन साम्प्रदायिक तौर पर संकीर्ण था – लगभग मुसलमानों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया’ (पेज 36)

आगे लेखक ‘अस्पृश्यों को’ अलग मतदातासंघ प्रदान करने के गोलमेज सम्मेलन के फैसले के बहाने जाति के प्रश्न पर गाँधी के उहापोह एवं उनकी रूढिवादी समझदारी की चर्चा करते हें। वर्णव्यवस्था की हिमायत करनेवाले (‘अगर हिन्दू समाज आज भी खड़ा है तो उसकी वजह जातिव्यवस्था की उसकी बुनियाद है। स्वराज्य की जड़ें जाति प्रथा में देखी जा सकती हैं।’ ‘मेरा स्पष्ट मानना है कि जाति प्रथा ने हिन्दू धर्म को विघटन से बचाया है) और अस्पृश्यता को ‘मानवीय गलती’ का हिस्सा माननेवाले गाँधी के लिए ब्रिटिश सरकार का यह फैसला महज राष्ट्रीय आन्दोलन को बाँटने का मसला मात्र नहीं था, बल्कि इसका अर्थ था कि जाति व्यवस्था के चलते हिन्दू धर्म के अभिशप्त होने की बात को कूबूल करना। दलितों को अलग मतदातासंघ प्रदान करने के फैसले को पलटने के लिए गांधी द्वारा लिया गया आमरण अनशन का सहारा और अम्बेडकर पर डाला गया प्रचण्ड दबाव इसकी चर्चा करते हुए लेखक बताते हैं कि किस तरह अम्बेडकर के साथ सम्पन्न पूना करार – जिसने ‘अस्पृश्यों’ के लिए चुनावों में अधिक सीटें प्रदान करने की बात की गयी, उसने दलित समुदाय को राजनीतिक स्वायत्तता से वंचित कर दिया। ‘हिन्दू जो भी कहें, हिन्दू धर्म समानता, स्वतंत्रता एवं बन्धुता के लिए खतरा है’ इस बात को जोर से रखनेवाले अम्बेडकर ने बाद में पूना करार के वक्त अपने समर्पण – जब समूचे दलित समुदाय पर वर्णसमाज के आक्रमण का खतरा मण्डरा रहा था – पर पश्चाताप प्रगट करते हुए कहा कि ‘इस अनशन में कोई उदात्तता नहीं थी। वह एक निकृष्ट एवं निन्दनीय कदम था।’

पार्टी के अन्दर वामपंथी धारा के अगुआ सुभाषचन्द्र बोस, जो पार्टी के इतिहास में अभूतपूर्व चुनाव में उसके अध्यक्ष चुने गए थे, और जिन्हें पार्टी की अन्दरूनी बगावत के जरिए गाँधी  ने पद से बेदखल कर दिया और बाद में कांग्रेस से भी बाहर जाने को मजबूर किया, उनके द्वारा पार्टी के अन्दर रहते हुए हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम करने के लिए ली गयी एक अद्भुत पहलकदमी की लेखक चर्चा करते हैं। कांग्रेस की युवा शाखा के अगुआ बोस ने बंगाल प्रांत में – जमींदारों के खिलाफ खड़ी- मुस्लिम किसानों की पार्टी के साथ गठजोड़ बनाने की हिमायत की थी। लेखक के मुताबिक जी एम बिड़ला, जो मारवाडी व्यापारी थे तथा कांग्रेस के लिए लाखों रूपए का चन्दा देते थे, उनका इस कदम के प्रति विरोध था (बंगाल की तत्कालीन परिस्थिति से परिचित लोग बता सकते हैं कि अधिकतर जमींदार हिन्दू थे) और उन्हीं की सलाह पर गांधी ने इस अन्तरसामुदायिक पहल में अडंगा लगा दिया।

भारत छोड़ो आन्दोलन के जरिए अपनी जिन्दगी के आखरी बड़े संघर्ष की अगुआई करनेवाले गाँधी ने किस तरह कभी हिटलर की प्रशंसा की थी, उसका उल्लेख करना लेखक नहीं भूलते। ‘उसके कोई दुर्गुण नहीं है। उसने शादी नहीं की है। उसका चरित्र भी पारदर्शी कहा जाता है।’(कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी, पेज 177,: 17 दिसम्बर 1941) यह आन्दोलन – जिसके लिए कांग्रेस ने कोई तैयारी नहीं की थी – उसकी समाप्ति के बाद, ब्रिटिश सरकार आज़ादी के मसले के समाधान को अधिक लटकाना चाहती थी। इस परिस्थिति में बुनियादी फर्क दूसरे विश्वयुद्ध में शामिल जापानी सेनाओं ने किस तरह डाला और दक्षिण पूर्व एवं दक्षिण एशिया में यूरोपीय उपनिवेशवाद को किस तरह जबरदस्त नुकसान पहुँचाया, इसके विवरण के साथ प्रथम अध्याय समाप्त होता है। (पेज 48)

00

दूसरा अध्याय एक तरह से नेहरू के राजनीतिक व्यक्तित्व, गाँधी के साथ उनके विशिष्ट किस्म के रिश्ते ‘जिसमें भावनात्मक बन्धनों के साथ साथ परस्पर हितों के समीकरण भी शामिल थे’ (पेज 51) तथा आज़ादी के आन्दोलन में उन्होंने निभायी भूमिका की चर्चा करता है।

एक क्षेपक के तौर पर इस बात का भी उल्लेख करना जरूरी है कि लेखक बौद्धिक क्षमता के मामले में अम्बेडकर के साथ नेहरू की तुलना करते हैं। ‘अम्बेडकर की नेहरू के साथ तुलना करना न्यायपूर्ण नहीं होगा, जो बौद्धिक क्षमता के मामले में कांग्रेस के तमाम नेताओं से बहुत आगे थे, जिसकी एक वजह यह भी कही जा सकती है कि डा अम्बेडकर ने लन्दन स्कूल आफ इकोनोमिक्स एवं कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अधिक गम्भीर अध्ययन किया था, जिन्हें पढ़ना एक तरह से एक अलग दुनिया में प्रवेश करना है। मगर हम ‘डिस्कवरी आफ इण्डिया’ को पढ़ें तो वह न केवल नेहरू की औपचारिक विद्वत्ता की कमी एवं रूमानी मिथकों के प्रति अत्यधिक लगाव को उजागर करता है बल्कि अधिक गहराई में जाकर देखें तो …आत्मप्रवंचना की क्षमता को भी प्रदर्शित करता है जिसके राजनीतिक परिणाम बेहद प्रतिकूल हुए।’ (पेज 53)

जातिव्यवस्था को लेकर नेहरू की एक किस्म की समाजशास्त्रीय दृष्टिहीनता की बात का भी किताब में उल्लेख है। डिस्कवरी आफ इण्डिया में नेहरू लिखते हैं कि ‘जातिप्रथा एक ऐसी व्यवस्था थी, जो सेवाओं एवं कार्यों पर आधारित थी। उसका मकसद एक साझे दृष्टांत (dogma) के बिना एक सर्वसमावेशी प्रणाली कायम करना था जिसमें हर समूह को स्थान मिले।’ (डिस्कवरी आफ इण्डिया, पेज 248-249) यह अकारण नहीं था कि जब गांधीजी अम्बेडकर का भयादोहन (ब्लैकमेल) कर रहे थे कि वह उनकी इस माँग माने कि ‘अस्पृश्य’ जाति प्रथा में शामिल एकनिष्ठ हिन्दू हैं तथा अलग मतदातासंघ की माँग छोड़ दें तो उस वक्त नेहरू ने अम्बेडकर के समर्थन में एक लफ्ज़ भी नहीं बोला। नेहरू के लिए वह एक ‘छोटा सा मामला’ (साइड इश्यू) था। अपने आप को नास्तिक कहलानेवाले नेहरू ने किस तरह धर्म को राष्ट्र के साथ जोड़ा था, इसकी चर्चा करते हुए किताब बताती है कि ‘हिन्दू धर्म राष्ट्रवाद का प्रतीक बना। वह वाकई एक राष्ट्रीय धर्म था, उसके तमाम गहरे भावों के साथ, नस्लीय और सांस्कृतिक, जो मौजूदा समय में हर जगह राष्ट्रवाद का आधार बनते हैं।’ इसके बरअक्स बौद्ध धर्म, जिसका जन्म भारत में हुआ, उसकी वहाँ हार हुई क्योंकि वह ‘सारतः अन्तरराष्ट्रीय’ था। ( उद्धरण, डिस्कवरी आफ इण्डिया, पेज 129)

अगर राष्ट्रीय धर्म एवं उसकी बुनियादी संस्थाओं के बारे में नेहरू का यह नज़रिया था तो अन्य धर्मों के अनुयायी जो जनम से ही राष्ट्रीय नहीं थे, उसके प्रति उनका रूख क्या था ? लेखक के मुताबिक इसकी पहली परीक्षा 1937 में सम्पन्न प्रांतीय चुनावों के बाद आयी, जब नेहरू खुद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे तथा गांधी ने एक तरह से 1934 से अपने आप को किनारे किया था। कई प्रांतों मे कांग्रेस को मिले बहुमत से गदगद नेहरू ने ऐलान किया कि अब भारत में दो ही ताकतें हैं: कांग्रेस एवं ब्रिटिश सरकार, जबकि हकीकत यही थी कि मुस्लिम-बहुल कुछ प्रांतों में सत्ता की बागडोर मुस्लिम लीग के हाथ में थी और जहां तक कांग्रेस की सदस्यता का सवाल है तो वह 97 फीसदी हिन्दू थी। ‘समूचे भारत में 90 फीसदी मुस्लिम मतदातासंघों में उसे प्रत्याशी तक नहीं मिले थे। नेहरू के अपने सूबे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने तमाम हिन्दू सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन उसे एकभी मुस्लिम सीट नहीं मिली थी’ (पेज 56) इस परिस्थिति के बावजूद नेहरू ने मुस्लिम लीग के इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि वह सरकार के साथ गठजोड करना चाहती है ताकि उसे भी प्रतिनिधित्व मिले। पचहत्तर साल बाद आज भले ही हम इस मसले पर कोई निश्चयात्मक राय न बना सकें, मगर कम से कम इस बात को रेखांकित कर सकते हैं कि आजादी के संघर्ष में कांग्रेस पार्टी की अपने एकाधिकार की समझदारी के प्रतिकूल परिणाम हुए।

प्रस्तुत अध्याय में आगे एक वक्त सेक्युलर नज़रिया रखनेवाले जिन्ना का कांग्रेस में हाशिये में जाना, कांग्रेस की समाजशास्त्रीय हकीकत के बारे में – कि वह मूलतः हिन्दू पार्टी है -उनका बढ़ता एहसास,मुस्लिम समुदाय के रूढिवादी तत्वों को साथ में लेकर चलने की कांग्रेस की कोशिशों के प्रति उनका बढ़ता विरोध और बाद में मुस्लिम राष्ट्रवाद की उनकी हिमायत की चर्चा है। बर्तानवी उपनिवेशवादियों ने किस तरह कभी हिन्दुओं से या कभी मुसलमानों से नज़दीकी दिखा कर अपने आप को केन्द्र में बना कर रखा, बँटवारे के वक्त किस तरह उनके लिए हिन्दू-बहुल कांग्रेस अधिक प्रिय हो चली, इसका विवरण भी पेश किया गया है। बँटवारे के वक्त़ हुए आबादियों की अदलाबदली एवं उससे जनित हिंसा को लेकर एक बात रेखांकित की गयी है कि भले ही पंजाब एवं पूरब के बंगाल से आबादियों की अदलाबदली हुई, मगर जितने बड़े पैमाने पर पंजाब के बंटवारे के वक्त हिंसाचार देखने को मिला, उसकी तुलना में बंगाल में बहुत कम हिंसा हुई। जहाँ लगभग 45 लाख हिन्दु एवं सिखों को पश्चिमी पंजाब से बेदखल कर दिया गया, वहीं पंजाब के पूर्वी हिस्से से 55 लाख से अधिक मुसलमान अपने घरों से बेदखल हुए।किताब में कश्मीर के भारत में एकीकरण को लेकर भी कई अनछुए तथ्यों को रेखांकित किया गया है।

गौरतलब है कि बँटवारे के वक्त चली अन्तरसामुदायिक हिंसा के वातावरण में हथियारबन्द पठानों ने पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी प्रांत से कश्मीर पर हमला बोल दिया और उनकी असंगठित टीमें श्रीनगर तक पहुंची। उनके डर से कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह ने जम्मू की तरफ पलायन किया। कश्मीर को ‘आज़ाद’ रखने की ख्वाहिश रखनेवाले राजा हरिसिंह के पास भारत में विलय के करारनामे पर दस्तखत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, मगर इसका इन्तज़ार किए बिना एक फर्ज़ी दस्तावेज पेश किया गया जिसमें महाराजा द्वारा भारत के साथ विलय पर सहमति पेश की गयी थी। यही वह फर्ज़ी दस्तावेज है जिसके आधार पर साठ साल के बाद भी भारतीय राज्य कश्मीर पर अपने नियंत्रण को जायज़ ठहराता है। (पेज 83) और जिसके आधार पर भारतीय सेनाओं ने कश्मीर पर नियंत्रण कायम करने की कार्रवाई शुरू की।

‘इसके बावजूद, यह बिल्कुल स्पष्ट था कि एक ऐसा प्रांत जो मुस्लिम-बहुल था उसे ताकत के बल पर – और जैसा कि बाद की घटनाओं ने स्पष्ट किया – फरेब के बलबूते हासिल किया गया था। यहाँ तक कि लन्दन में सत्तासीन एटली के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी की सरकार, जिसका कांग्रेस के प्रति बेहतर रूख था, उसने इस घटनाक्रम पर बेचैनी प्रगट की। प्रधानमन्त्री एटली ने इसे ‘डर्टी बिजनेस’ की संज्ञा दी। संयुक्त राष्ट्रसंघ में भी इसके चलते समस्या खड़ी हुई।’’ (पेज 84)

कश्मीर में जनमतसंग्रह को लेकर जिसका वायदा भारत सरकार ने किया था ताकि यह दिखाया जा सके कि कश्मीरी लोग अपनी स्वेच्छा से भारत से जुड़े हैं, न कि राजा की इच्छा से, उसके बारे में भी जल्दही स्थिति स्पष्ट होती गयी। कश्मीर के भारत में ‘विलय’ के कुछ समय बाद ही गृहमंत्री पटेल ने नेहरू को लिखा: ‘‘यह दिख रहा है कि नेशनल कान्फेरेन्स एवं शेख साहब (अब्दुल्ला) घाटी की जनता पर अपनी पकड़ खो रहे हैं और अलोकप्रिय हो रहे हैं …ऐसी परिस्थितियों में मैं आप से सहमत हूं कि जनमतसंग्रह अवास्तविक होगा।’’ (पेज 86 पर उद्धृत, दुर्गा दास (सम्पा.) ‘पटेलज् कारसपान्डन्स, अहमदाबाद, 1971, वाल्यूम 1,पेज 286, 317)

मुल्क के बँटवारे की बात करना जिस वक्त कांग्रेस पार्टी में कुफ्र था, और खुद मुस्लिम लीग के लिए भी अभी इस मसले को लेकर धुंधली समझदारी थी, उस वक्त (1944) में प्रकाशित डा अम्बेडकर की रचना ‘पाकिस्तान आर पार्टिशन आफ इण्डिया’ की प्रशंसा करते हुए लेखक बताता है कि इस मुद्दे पर प्रकाशित एकमात्रा गम्भीर उपरोक्त रचना, ‘जिसके सन्दर्भ रेनन से एक्टन से कार्सन तक फैले हैं, कनाडा से आयर्लण्ड से स्वित्जर्लण्ड तक बिखरे हैं, वह कांग्रेस एवं उसके नेताओं के बौद्धिक दिवालियेपन का ठोस सबूत थी।’ (पेज 89)

अध्याय में हैदराबाद पर भारतीय सेनाओं के नियंत्रण के बाद वहाँ भारतीय सेनाओं की मदद से हिन्दुओं द्वारा किए गए स्थानीय मुस्लिम आबादी के जनसंहार के लगभग भुला दिए गए तथ्य की भी चर्चा है। ध्यान रहे कि इस जनसंहार की जाँच के लिए भेजी गयी सरकारी टीम का अनुमान था कि इस मारकाट में कुछ सप्ताह के अन्दर ही वहाँ 27 हजार से 45 हजार तक मुसलमान मार दिए गए थे। ‘भारतीय संघ के इतिहास में यह सबसे बड़ा क़त्लेआम था, जिसके सामने पठान घुसपैठियों द्वारा श्रीनगर पर नियंत्रण कायम करने की कोशिशों के दौरान की गयी हिंसा बहुत छोटी मालूम पड़ती है…(पेज 91)

अन्त में, लेखक यह सवाल रखता है कि क्या भारत का बँटवारा अनिवार्य था ? ब्रिटिश राज के खिलाफ चले संघर्ष को लेकर उपलब्ध प्रचुर साहित्य में भी इस प्रश्न पर व्याप्त मौन की भी बात इसमें की गयी है। राष्ट्रीय आन्दोलन में एक स्थापित समझदारी यही चली आ रही है कि ब्रिटिशों की ‘बाँटो एवं राज करो’ की नीति का प्रतिफलन इस उपमहाद्वीप का बँटवारा हुआ। इसके बरअक्स लेखक का स्पष्ट मानना है कि ‘इसकी अन्तिम चालक शक्तियाँ देशज थीं, न कि सामराजी।’ राष्ट्रीय आन्दोलन की शब्दावली  एवं चित्रांकन में धर्म के प्रवेश के लिए जिन्ना को जिम्मेदार ठहराये जाने की प्रवृत्ति को प्रश्नांकित करते हुए लेखक इसका जिम्मेदार गाँधी को मानते हैं। उनके मुताबिक ‘भले ही उन्होंने इस काम को संकीर्ण भावना के साथ नहीं किया, जहां मुसलमानों को खिलाफत बचाने के लिए आगे आने को कहा वहीं हिन्दुओं को रामराज्य कायम करने की अपील की, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ साझा संघर्ष में अपने सहयोगी कौन हो सकते हैं इस सवाल को छोड़ दिया।’ (पेज 94)

00

किताब का अन्तिम अध्याय ‘रिपब्लिक’ भारतीय गणतंत्र के निर्माण एवं विकास की यात्रा चर्चा करता है और भारतीय जनतंत्र के स्थायित्व को लेकर लिबरल विचारकों द्वारा अक्सर किए जानेवाले महिमामण्डन में दबे रहनेवाले तथ्यों को रेखांकित करता है। लेखक के मुताबिक भारतीय जनतंत्र का स्थायित्व भारत की आज़ादी की स्थितियों से सबसे पहले निर्धारित हुआ, जहाँ ब्रिटिश राज को पलटा नहीं गया बल्कि कांग्रेस को सत्ता हस्तांतरित की गयी। उपनिवेशवादियों को अलविदा कहा गया, मगर औपनिवेशिक नौकरशाही तंत्र एवं सेना को भी अक्षुण्ण रखा गया। राज की विरासत सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी। प्रशासन एवं दमन के तंत्र के साथ साथ कांग्रेस ने प्रतिनिधित्व की उसकी परम्परा को भी आगे बढ़ाया।

इस सन्दर्भ में यह बात महत्वपूर्ण है कि जिस संविधान सभा ने देश को अपना संविधान दिया वह ब्रिटिशों द्वारा निर्मित इकाई थी (1946), जिसके लिए ब्रिटेन की तत्कालीन प्रजा के सात में से एक व्यक्ति को मताधिकार मिला था। निश्चित ही आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस सार्विक मताधिकार के साथ नए चुनावों का आयोजन कर सकती थी, मगर उसे इस बात का डर था कि इसका नतीजा क्या हो सकता है ? 1951-52 के पहले ऐसे चुनाव नहीं हुए। ‘इस तरह जिस निकाय ने भारतीय जनतंत्र को जन्म दिया वह उसकी अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि उस पर लादी गयी औपनिवेशिक बन्दिशों का प्रतीक थी। (पेज 106) बकौल सुनिल खिलनानी (द इण्डियन कान्स्टिटयूशन एण्ड डेमोक्रसी, देखें: इण्डियाज लिविंग कान्स्टिटयूशन, सम्पा. जोया हसन तथा अन्य) ‘सामाजिक संरचना के मामले में संविधान सभा एक बहुत संकीर्ण इकाई थी जिस पर कांग्रेस के ऊँची जाति वाले एवं ब्राहमणवादी अभिजातों का दबदबा था और उसने ऐसा संविधान बनाया जो सार्वजनिक जीवन को गठित करनेवाला नहीं बल्कि किसी क्लब हाउस के नियमों की तर्ज़ पर था..’

इस संविधान सभा द्वारा निर्मित भारतीय जनतंत्र की प्रातिनिधिक संस्थाओं की जड़ में ही किस तरह चुनावी विकृतियाँ थीं, इसकी चर्चा करते हुए लेखक इस बात पर ज़ोर देता है कि यहाँ आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने की बजाय फर्स्ट पास्ट द पोस्ट अर्थात जो जीता वही सिकंदर की तर्ज़ पर प्रतिनिधित्व दिया गया जिसके चलते 1951 से 1971 के दरमियान कभी भी वोटों का बहुमत न मिलने के बावजूद (जो कभी 45 फीसदी से आगे नहीं गया) कांग्रेस पार्टी संसद में 70 फीसदी सीटों पर कब्ज़ा कर सकी। आगे भारतीय जनतंत्र के एक अन्य अपवाद की चर्चा है, भारत में जहाँ गरीब मतदाताओं की संख्या अधिक है वहीं वोट देने में भी वह आगे ही रहते हैं, इसके बरअक्स शेष दुनिया में जैसे जैसे आय एवं साक्षरता में गिरावट आती है उसी अनुपात में वोट का प्रतिशत भी गिरता है। आखिर ऐसा क्यों है ? गरीबों, वंचितों को गुस्सा उदार जनतंत्र के खिलाफ फूट न पड़ने का कारण यहाँ की ‘सामाजिक स्तरीकरण की प्रणाली’ है, जो किसी भी किस्म की सामूहिक कार्रवाई की राह में बाधा है। भारत के इस ‘जातिबद्ध’ जनतंत्र - जो धार्मिक ताकतों में भी आबद्ध है – की चर्चा के बाद आगे यहाँ व्याप्त प्रचण्ड विविधता में कायम एकता पर किताब फोकस करती है। संविधान निर्माताओं ने सचेतन तौर पर ’संघीय’ (फेडरल) शब्द के इस्तेमाल से परहेज़ किया। आज़ादी के वक्त भारत में चौदह राज्य थे और आज इनकी संख्या 28 तक पहुँची है। ‘कभी भी इस पुनर्विभाजन के लिए मतदाताओं से सलाह मशविरा नहीं लिया गया है, न पहले और न ही बाद में, ..’। भारत के हुक्मरानों ने अपनी सुविधा से इसे अंजाम दिया, इसके बावजूद एक केन्द्रीय सरकार के अधीन इन क्षेत्रीय हुकूमतों को भारतीय संविधान की एक ‘अलग किस्म की उपलब्धि’ के तौर पर रेखांकित किया जाता है और यह समझदारी ‘भारतीय विचारधारा’ का एक अहम अंग बनी है कि यह धारणा कि देश की एकता की भारतीय राज्य द्वारा रक्षा एक किस्म का करिश्मा है। ‘निश्चित तौर पर इस किस्म के हाँकने का कोई आधार नहीं है।’ (पेज 114) किसी भी यूरोपीय उपनिवेश को आज देखें तो यही नियम दिखता है।

भारतीय राज्य द्वारा ब्रिटिशकालीन भारत को ‘एकताबद्ध’ रखने की कोशिशों ने किस तरह कश्मीरी जनता की लोकप्रिय इच्छा/पापुलर विल पर कहर बरपाया है इसकी चर्चा के बाद लेखक उत्तरपूर्व को एकीकृत रखने की नवस्वाधीन मुल्क की कोशिशों पर आता है, जहाँ की जनता का बड़ा हिस्सा आज भी इस कहर को – दमनात्मक कानूनों या बड़े हिस्सों में आज भी जारी सैन्य दमन के रूप में झेल रहा है। ध्यान रहे कि यह वह इलाका है जहाँ आज़ादी के बाद से ही हथियारबन्द संघर्षों का सिलसिला जारी है, जो भारत से आत्मनिर्णय के अधिकार की माँग करते रहे हैं। इस सन्दर्भ में नागा नेशनल कौन्सिल के प्रतिनिधिमण्डल को गाँधी द्वारा दिए गए आश्वासन को अक्सर भुला दिया जाता है। आज़ादी से एक माह पहले इस  प्रतिनिधिमण्डल से गाँधीजी ने साफ कहा था कि ‘..व्यक्तिगत तौर पर, आप सभी मेरा या भारत का हिस्सा हैं। मगर अगर आप यह कहते हैं कि नहीं, तो कोई भी आप पर दबाव नहीं डाल सकता।’’ (पेज 121)

नेहरू की महानता की चर्चा करते वक्त जिस बात का अक्सर उल्लेख किया जाता है कि वह तानाशाहों से बजबजाती गैरपश्चिमी दुनिया में एक जनतांत्रिक नेता के तौर पर शासन करते रहे, उस सन्दर्भ में लेखक इस पहलू को रेखांकित करना नहीं भूलता ‘.. नेहरू सबसे पहले एक भारतीय राष्ट्रवादी थे और जहाँ आम जनइच्छा राष्ट्र के उनके तसव्वुर/कल्पना के साथ सामंजस्य बिठाती नहीं दिखी, उन्होंने बिना पश्चात्ताप के उसको दमित किया। यहाँ सरकार की प्रणाली मतदातापत्र नहीं थी, बल्कि जैसा कि उन्होंने खुद कहा है, संगीनें थीं।’ (पेज 133) ‘1961 में उन्होंने भारत की एकता पर भाषण में या लेखन में, छवि में या प्रतीक में, सवाल उठाने को अपराध घोषित किया, जिसके लिए तीन साल की सज़ा दी जा सकती थी। नागा जनता, जिस पर उन्होंने 1963 में बमबारी शुरू की, वह अभी भी लड़ रही थी, जब उनका देहान्त हुआ। तीन साल बाद बगल की मिजो जनता भी बग़ावत में उठ खड़ी हुई।’ (पेज 135)

‘भारतीय विचारधारा’ का तीसरा अहम हिस्सा धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर लेखक आगे बताता है कि किस तरह संविधान को अपनाते वक्त़ भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य कहने से बचा गया। न उसने कानून के सामने समानता के सिद्धान्त को स्थापित किया, न समान नागरिक संहिता को लागू किया: हिन्दू एवं मुसलमान दोनों अपने पारिवारिक जीवन में अपनी आस्था से जनित परम्परा/रिवाजों के अधीन रखे गए, दैनंदिन जीवन में धार्मिक सोपानक्रमों में दखल देने से इन्कार किया गया , अस्पृश्यता पर पाबन्दी लगा दी गयी, मगर जाति को अक्षुण्ण रखा गया। गौरतलब है कि संविधाननिर्माता के तौर पर अक्सर महिमामण्डित किए जानेवाले डा अम्बेडकर खुद संविधान जैसा कि वजूद में आया उससे सन्तुष्ट नहीं थे। संविधान निर्माण के बाद उनका यह वक्तव्य मशहूर है। ‘लोग अक्सर मुझे कहते हैं कि सर, आप संविधान के निर्माता हैं। मेरा जवाब होता है, मैं किराये का टट्टू था, मुझे जो करने के लिए कहा गया, मैंने किया और अधिकतर मेरी इच्छा के खिलाफ’(पेज 139) हिन्दुओं के विवाह प्रथा में व्याप्त गैरबराबरी के खिलाफ हिन्दू कोड बिल बनाने की उनकी योजना को जब पलीता लगा, तो उसके आधार पर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर हुए डा अम्बेडकर इस बात के प्रति भी सचेत थे कि संविधान के बनने से उनके अपने लोगों की स्थिति में कोई सुधार आया है: ‘वही तानाशाही, वहीं पुराने उत्पीड़न का अस्तित्व आज भी बना हुआ है, पहले से चला आ रहा भेदभाव आज भी जारी है, और आज शायद अधिक खराब रूप में।’ (अम्बेडकर,रायटिंग्ज एण्ड स्पीचेस, वाल्यूम 14, पार्ट 2, बाम्बे 1995, पेज 1318-1322) यहाँ धर्मनिरपेक्षता को धर्म  के राज्य से अलगाव के तौर पर अपनाने एवं व्यवहार में लाने के बजाय सर्वधर्मसमभाव के तौर पर अपनाया गया। ‘..कांग्रेस के नेतृत्ववाले राज्य ने भी कभी भी मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति सुधारने के लिए गम्भीर प्रयास नहीं किए। अगर पार्टी या राज्य वाकई धर्मनिरपेक्ष होता, तो हर मामले में उसे प्राथमिकता मिलती, लेकिन यह बात उसके दिमाग में कभी नहीं आयी।’ (पेज 146)

अन्त में किताब जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता एवं एकता की यह ‘त्रिमूर्ति’ जो लेखक के मुताबिक भारतीय विचारधारा की बुनियाद है, इस पर विभिन्न अग्रणी विचारकों की समझदारी की चर्चा करती है और स्पष्टतः लिखती है कि जहाँ सामाजिक आलोचना का पक्ष इनकी रचनाओं में अहम दिखता है, वही तेवर राजनीतिक आलोचना में नज़र नहीं आता। एक उदाहरण के तौर पर वह आक्सफोर्ड कम्पैनियन टू पालिटिक्स शीर्षक से हाल में प्रकाशित एक सन्दर्भग्रंथ का उल्लेख करते हैं, जिसमें भारत जैसा कि आज अस्तित्व में है उसके बारे में इन तमाम अग्रणियों के विचारों को देखा जा सकता है। भारतीय राज्य की दमनात्मक प्रणालियों पर यह कम्पैनियन लगभग मौन है।

अपनी इस किताब का समापन करते हुए लेखक लिखते हैं कि ‘एक बार जब उपनिवेशवादविरोधी संघर्ष से किसी नवस्वाधीन राष्ट्र का निर्माण होता है, तो उसकी जागृति के लिए प्रयुक्त विमर्श उसे उन्मत्त भी कर सकता है। भारत में यह खतरा अधिक दिखता है.. आज ज़रूरत इस बात की है कि रूमानीकृत अतीत के मोह एवं वर्तमान में मौजूद उसके अवशेषों से हम मुक्त हों’।’

भारत की अवाम की बेहतरी के लिए चिन्तनरत तथा सक्रिय हर व्यक्ति के लिए पेरी एण्डरसन की यह किताब बेहद जरूरी है। ज़रूरी नहीं कि हम उसके तमाम निष्कर्षों से सहमत हों, मगर भारतीय राज्य द्वारा अपनी आत्मप्रशंसा में बनाए गए तमाम मिथकों से – जो सहजबोध का हिस्सा बने हैं – मुक्त होने के लिए यह हमें निश्चित तौर पर एक आईना प्रदान करती है। जिस तरह जर्मन आइडिओलोजी में लेखकद्वय ने अपने समकालीन चिन्तकों,लेखकों से  - जिनका जोर चेतना एवं अमूर्त विचारों पर था – ‘जिन्दगी की वास्तविक परिस्थितियों से रूबरू होने’ की अपील की थी, उसी तरह यह किताब भी भारत के यथार्थ, अतीत और वर्तमान की तमाम असहज करनेवाली सच्चाइयों का सामना करने के लिए लोगों को झकझोरती है। (समयांतर में प्रकाश्य. काफिला से साभार)

नकद हस्तांतरण लाएगा तबाही

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/22/2013 10:25:00 AM


कुछ समय पहले शुरू की गई सब्सिडियों के नकद हस्तांतरण की योजना और आधार के अनुभवों के बारे में बता रहे हैं पत्रकार प्रफुल्ल बिदवई.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग ) सरकार आधार यूनीक पहचान (यूआईडी) के आधार पर नकद हस्तांतरण की विशाल परियोजना शुरू करने जा रही है जिसका मकसद लोगों तक सार्वजनिक सेवाओं को सीधे पहुंचाना है। इस परियोजना को सरकार देश के 51 जिलों में नए साल के पहले दिन से चलाने की जल्दी में है जिसके अंर्तगत वृध्दावस्था और विधवा पेंशनों, मातृत्व लाभ और छात्रवृति जैसी 34 योजनाएं आती हैं; यह खाद्य, स्वास्थ्य सुविधाओं और ईंधन तथा खाद सब्सिडयों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (साविप्र) जैसी तमाम योजनाओं को आधार आधारित नकद हस्तांतरण (आआनह) के अधीन लाने की दिशा में एक कदम है।

साफ है कि संप्रग यह मानता है कि यह एक ऐसी अचूक गोली है जिससे गरीब-समर्थक योजनाओं का न केवल खर्च घटाने बल्कि चुनाव जीतने में भी मदद मिलेगी। 14 दिसंबर को राहुल गांधी ने कांग्रेस पदाधिकारियों से कहा था कि ''क्रांतिकारी'' परियोजना से अगले दो आम चुनावों में पार्टी की जीत उसी तरह से पक्की हो जाएगी जैसे कि 2009 में किसानों के कर्जों को माफ करने से हुई थी।

अगले ही दिन दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने ''अन्नश्री'' योजना की शुरूआत कर दी जिसके अंर्तगत दो लाख परिवारों को खाद्य सामग्री खरीदने के लिए प्रति माह 600 रु. दिए जाने हैं। और शीला दीक्षित ने तत्काल यह बकवास कर दी 600 रु. से पांच लोगों के परिवार की खाद्य संबधी जरूरतों को पूरा करने के लिए 600 रु. काफी हैं -जबकि असल में महज जिंदा रहने के लिए खाद्य पदार्थ खरीदने को इससे पांच गुने की जरूरत है। 


यूआईडी के विवादास्पद विचार में मिठास लाने और स्वीकार्य बनाने के लिए, खबर है कि संप्रग 40 करोड़ लोगों को 100 घंटे के मुफ्त टॉक आइम और 500 मुफ्त एसएमएस के साथ आधार-समर्थ स्मार्ट मोबाइल फोन उपहार में देने जा रही है जिनमें इंटरनेट की सुविधा भी होगी। इससे प्रदर्शित होता है कि मूल सुविधाएं प्रदान करने के बजाए सरकार को ज्यादा चिंता मुफ्त की चीजों को बांट कर आधार को आगे बढाने की है, सिर्फ जिन पर ही 7000 करोड रु. का अतिरिक्त खर्च आएगा।

यह सोच कि आआनह से ''खेल बदल जाएगा'' और संप्रग की लोकप्रियता तत्काल बढ़ जाएगी बुनियादी तौर पर गलत है। सर्वेक्षण से प्रदर्शित होता है कि 90 फीसदी से यादा गरीब नकद हस्तांतरण की तुलना में, जिसके दुरूपयोग की गुंजाइश रहती है, खाद्य पदार्थ साविप्र से लेना पसंद करते हैं।  जैसा कि हाल ही में इस स्तंभ में कहा गया था यूआईडी परियोजना प्रोद्योगिक, प्रशासनिक और संभार तंत्रीय समस्याओं से भरी पड़ी है। यह उंगलियों के निशानों (जो 15 फीसदी से यादा मामलों में लोगों की पहचान नहीं कर पाते हैं) और आंख की पुतली के स्केन (जो मातिया बिंद तथा आंखें की अन्य समस्याओं के चलते विश्वास योग्य नहीं रहते हैं) जैसे अविश्वसनीय चिह्नों का इस्तेमाल करती, और डाटा की सुरक्षा तथा राय की संस्थाओं द्वारा निजी जानकारी के दुरूपयोग जैसी गंभीर समस्याएं पैदा करती है।

यूआईडी परियोजना बेहद खर्चीली है (संभवतया एक लाख करोड रु. से अधिक की) और इसे ग्रेट ब्रिटेन तक छोड़ चुका है। इसमें गरीबी रेखा के नीचे की सूचियों में, जो पहले से ही 40 फीसदी गरीबों को इससे बाहर रखने के लिए बदनाम हैं, वास्तव में पात्र लाभार्थियों को बाहर रखने और अपात्रों को गलत ढंग से शामिल किए जाने जैसी गंभीर गलतियां हो सकती हैं। जिन सरकारी अधिकारियों ने गरीबी रेखा के नीचे की सूचियों को असरदार लोगों के प्रभाव में तैयार किया है वो ही यूआईडी की सूचियां भी बनाएंगे। प्रत्येक गरीब परिवार को बाहर किए जाने का अर्थ है कम से कम दो मतदाताओं से हाथ धो बैठना ।

यूआईडी को कोई वैधानिक या कानूनी आधार नहीं है। योजना को वैधानिक समर्थन देने के लिए भारतीय रार्ष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण विधेयक 2009 पर विचार करते हुए संसद की स्थाई समिति (वित्त ) ने इस परियोजना को ''दिशाहीन'' और ''स्पष्ट उद्देश्य'' से हीन कहा था। इसने यूआईडी प्रोद्योगिकी 'अपरीक्षित, अप्रमाणित, अविश्वसनीय और असुरक्षित कहा था।

यूआईडी को बैंक खातों या माइक्रो-एटीएम जैसे दस्ती साधनों, जिनके जरिए बैंकिंग करेस्पोंडेट्स (बीसी) लोगों को नकदी का भुगतान करेंगे, के साथ जोडे ज़ाने से योजना की जन्मजात अनिश्चितताएं और जोखिम और बढ़ जाएंगे। ये तमाम युक्तियां केंद्रीकृत डाटाबेसों, इंटरनेट सपंर्क तथा भरोसेमंद बिजली आपूर्ति पर निर्भर हैं। परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में तो बिजली अक्सर ही कई कई दिनों तक नहीं आती है और जब आती भी है तो आपूर्ति में उतार चढाव होते रहते है। योजना बैंकिंग करेस्पोंडेट्स को पूरी तरह से ईमानदार मान कर चलती है, जबकि वे गरीबों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त और उनके विरोधी हो सकते हैं।  ये समस्याएं उन दो जिलों में सामने आईं थी जिनमें आआनह की अग्रिम परियोजना को एक साल पहले शुरू किया गया था। झारखंड के रामगढ़ जिले में मनरेगा के अंर्तगत भुगतान आआनह के अधीन किए गए थे।  भयानक परिणाम सामने आए। जिला प्रशासन काम का बोझ ही संभाल नहीं सका। आबादी का वो अनुपात जिससे यूआईडी की संख्याएं और कल्याणकारी योजनाओं के विवरण मेल खाते हैं दो प्रतिशत से भी कम है। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का कहते हैं कि योजना को उपयोगी होने के लिए इसके अंर्तगत कम से कम 80 प्रतिशत को आना चाहिए।

सेवाओं के स्थान पर नकदी प्राप्त करने के लिए लोगों को बैंक खाते खोलने होंगे। लेकिन बैंकों शाखाएं पर्याप्त संख्या में है ही नहीं। भारत के 6 लाख से अधिक गांवों में इनकी कुल 32,000 शाखाएं हैं। रामगढ़ की अग्रणी बैंक ने आधार संबंधी काम को एक टेलीकॉम कंपनी को सौप दिया जिसने इस काम के लिए बैंकिंग करेस्पोंडेट्स को काम पर रख लिया। लेकिन इन बैंकिंग करेस्पोंडेट्स को समय से भुगतान नहीं हुआ और इससे उनकी दिलचस्पी लगभग खत्म हो गई। इस तरह से रामगढ में मनरेगा में होने वाले भुगतान के केवल 3 प्रतिशत लक्ष्य को ही प्राप्त किया है।  रामगढ के एक ब्लॉक में 8,231 ''सक्रिय'' कार्ड धारकों में से केवल 162 को ही आआनह के जरिए भुगतान हो पाया है। एक अन्य ब्लॉक मे 45 लाभार्थियों पेंशन देने के लिए जब उंगलियां के निशानों की पुष्टि करने का प्रयास किया गया, तो यह केवल 9 मामलों में सफल हो पाया। और भुगतान उनको भी आआनह के जरिए नहीं किया गया है।  इलाके के बैंकिंग करेस्पोंडेंट के अनुसार मनरेगा के आधे मजदूरों की उंगलियों के निशान मेल नहीं खाते हैं। दि हिंदू की एक खबर के अनुसार एक गरीब मजदूर ने माइक्रो-एटीएम पर अपनी उंगलियों के निशान को 15 बार मिलाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं रहा। बैंकिंग करेस्पोंडेट्स ने उस बेचारे से तीन चार दिन तक अपनी उंगलियों पर बोरो प्लस या वेसलीन मलने के बाद फिर से आने को कहा।

कहीं यह न सोच लिया जाए कि झारखंड में ऐसा राय के पिछड़ेपन और अक्षम नौकरशाही के कारण हुआ था। विफलता का एक अन्य उदाहरण राजस्थान में अलवर जिले के एक संपन्न गांव में सामने आया है-हांलांकि राजस्थान को अपेक्षाकृत एक बेहतर शासित प्रदेश माना जाता है जिसमें मनरेगा का प्रदर्शन देश में सबसे अच्छा रहा है।

एक साल पहले सरकार ने कोटकासिम गांव के 25,843 राशनकार्ड धारको को 15.25 रु..प्रति लीटर की दर से केरोसिन बेचना बंद कर दिया और इसकी जगह उनसे 49.10 प्रति लीटर की बाजार दर से पैसे वसूल किए। इस अंतर को प्रत्येक तीन महीने में उनके खाते में जमा किया जाना था। लेकिन उस क्षेत्र में बैक की शाखा औसतन तीन किलोमीटर है और कुछेक के लिए तो 10 किलोमीटर तक है। इसलिए बैंक खाता कुल परिवारों के केवल 52 प्रतिशत ही बैंक खाता खुलवा पाए। बाकी तो योजना से ही बाहर हो गए।  कुछ परिवारों को मूल्य में अंतर की पहली किस्त मिली और उसके बाद कुछ नही। ज्यादातर को पूरे साल कुछ नहीं मिला। इस बीच केरोसिन की बिक्री 84,000 लिटर से घट कर सिर्फ 5000 लिटर रह गई यानी 94 प्रतिशत कम हो गई। लोगों को सूखी टहनियों, कपास और सरसों के डंठलों या उस सब खरपतवार को जला कर काम चलाना पड़ रहा है जिससे ईंधन की जरूरत पूरी नहीं होती और प्रदूषण फैलता है।

कोटकासिम के लोग इतने दुखी और नाराज हैं कि वे चाहते हैं कि नकद सब्सिडी की योजना को पूरे राजस्थान में लागू कर दिया जाए ताकि उनकी ही तरह इसके परिणाम सब ही भुगत सकें।

इस तरह की मिसालें उन दूसरे जिलों से भी मिल सकती हैं जिनमें नकद हस्तांतरण योजना चलाई जा रही है। अभी तक आधार पहचान संख्या दो तिहाई से कम लाभार्थियों को मिल पाई है। उनमें अधिकतर उन 20 जिलों में है जिनमें यह 80 से 90 प्रतिशत है। विडंबना यह है कि सबसे बुरी हालत महाराष्ट्र के नांदूरबार जिले में है जहां सितंबर 2010 में सबसे पहला यूआईडी पंजीकृत किया गया था। वहां आधार के अंर्तगत अब भी केवल 28 प्रतिशत आबादी ही है।

सरकार इन नीची संख्याओं का इस्तेमाल लोगों में हड़बड़ी पैदा करने के लिए कर रही है कि वे जल्दी से आधार पंजीकरण केंद्रों पर पहुंचें, और दूसरी ओर यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमजोर करने और इसकी जगह नकद हस्तांतरणों को लाने, ग्रामीण बाजारों पर निजी पूंजी को थोपने की तैयारी कर रही है। आधार को किसी प्रकार से नकद हस्तांतरणों से जोड़ना गलत है क्योंकि इससे भारी बिखराव और समस्याएं पैदा होने जा रही हैं। बहुत से प्रबुध्द समाज विज्ञानियों द्वारा जारी बयान हमसे ''उस बुजुर्ग के बारे में सोचने का आग्रह करता है जो अभी तक अपनी पेंशन स्थानीय डाकघर से प्राप्त करता है, लकिन उसे यूआईडी समर्थ बैंक में खाता खुलवाने के लिए इधर उधर चक्कर काटने पडते हैं, और फिर उसे पता चल सकता है कि उसकी उंगलियों के निशान ही नहीं मिल रहे हैं, सम्पर्कता की समस्या है या बिजली नहीं है अथवा ''बिजनेस कारोसपोंडेन्ट'' छुट्टी पर है वगैरह वगैरह। उसकी पेंशन को आधार के आसरे छोड़ने का कोई मतलब नहीं है।

खाद्य सामग्री तथा जिन दूसरी चीजों की आपूर्ति साविप्र के माध्यम से की जाती है उनके लिए नकद हस्तांतरण योजना और भी गलत है। करोड़ों गरीब परिवारो के लिए साविप्र से मिलने वाला भोजन अधिक पोषक और आर्थिक रूप से सुरक्षित है; इसने पूरे अभाव के हालत को बड़ी हद तक कम किया है। हाल के अनुभव से पता चलता है कि अनेक रायों में साविप्र में सुधार हुआ है। साविप्र में और भी सुधार किए जा सकते हैं। हमें एक लक्षित साविप्र के विरूध्द एक सर्वजनीन साविप्र के साथ एक राष्ट्रीय भोजन सुरक्षा एक्ट की तत्काल जरूरत है।  भारत के ग्रामीण बाजार ज्यादातर कम विकसित हैं। यह सोचना समझदारी की बात नहीं होगी कि नकद पैसे से आपको भोजन या स्वास्थ्य की वों सुविधाएं मिल सकेंगी जो स्थानीय तौर पर मौजूद ही नहीं हैं। साविप्र को खत्म करने से खाद्य पदार्थों का प्रवाह टूट जाएगा और बहुत से लोगों को लुटेरे व्यापारियों और बिचौलियों के रहमो-करम के हवाले हो जाएंगे। इससे चोट खास तौर पर अकेली महिलाओं, अशक्तों और बुजुर्गों पर होगी जो बैंकों से पैसे निकाल कर खाद्य सामग्री खरीदने के लिए आसानी से बाजार नहीं जा सकते हैं। नकद हस्तांतरण से परिचलन में भारी मात्रा में पैसा आएगा जिससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और लोगों की य शक्ति कम होगी।

वृध्दावस्था और विधवा पेंशन, मातृत्व सहायता और छात्रवृत्ति के लिए तो नकद हस्तांतरण ठीक हो सकता है, लेकिन खाद्य सामग्री, ईंधन और अन्य आवश्यकताओं के लिए बिल्कुल भी नहीं। नकद हस्तांतरण अधिक से अधिक सार्वजनिक सेवाओं की व्यवस्था के लिए पूरक का काम कर सकते हैं। गरीबों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के स्थान पर इसको स्थापित करके संप्रग तबाही को ही न्योता देगा।

छोटे शहर की लड़कियाँ

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/19/2013 02:46:00 PM

एक दलील, एक जिद और जिरह के ताने-बाने में बुनी हुई लाल्टू की ये कविताएं एक बहस के दौरान सामने आई थीं. और बहस के रूप में ही ये हाशिया पर पेश हैं. जल्दी ही लाल्टू द्वारा किया गया हावर्ड जिन की मशहूर किताब ए पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स के एक अध्याय का अनुवाद भी हाशिया पर होगा.

स्केच (?)

एक इंसान रो रहा है
औरत है
लेटर बॉक्स पर
दोनों हाथों पर सिर टिकाए
बिलख रही है
टेढ़ी काया की निचली ओर
दिखता है स्तनों का उभार
औरत है
औरत है
दिखता है स्तनों का उभार
टेढ़ी काया की निचली ओर
बिलख रही है
दोनों हाथों पर सिर टिकाए
लेटर बॉक्स पर
औरत है
एक इंसान रो रहा है
(1992)
पश्यंती - 1995; 'डायरी में तेईस अक्तूबर' में संकलित

अर्थ खोना ज़मीन का

मेरा है सिर्फ मेरा
सोचते सोचते उसे दे दिए
उँगलियों के नाखून
रोओं में बहती नदियाँ
स्तनों की थिरकन

उसके पैर मेरी नाभि पर थे
धीरे-धीरे पसलियों से फिसले
पिंडलियों को मथा परखा
और एक दिन छलाँग लगा चुके थे

सागर महासागरों में तैर तैर
लौट लौट आते उसके पैर
मैं बिछ जाती
मेरा नाम सिर्फ ज़मीन था
मेरी सोच थी सिर्फ उसके मेरे होने की

एक दिन वह लेटा हुआ
बहुत बेखबर कि उसके बदन से है टपकता कीचड़
सिर्फ मैं देखती लगातार अपना
कीचड़ बनना अर्थ खोना ज़मीन का।
(हंस, अप्रैल, 1998)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित



डरती हूँ

जब तुम बाहर से लौटते हो
और देख लेते हो एकबार फिर घर

जब तुम अंदर से बाहर जाते हो
और खुली हवा से अधिक खुली होती तुम्हारी स्वास
अंदर बाहर के किसी सतह पर होते जब
डरती हूँ

डरती हूँ जब अकेले होते हो
जब होते हो भीड़

जब होते हो बाप
जब होते हो पति आप

सबसे अधिक डरती हूँ
जब देखती तुम्हारी आँखों में

बढ़ते हुए डर का एक हिस्सा
मेरी अपनी आँखें।
(हंस, अप्रैल 1998)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित


एक और औरत

एक और औरत हाथ में साबुन लिए उल्लास की पराकाष्ठा पर है
गद्दे वाली कुर्सी पर बैठ एक और औरत कामुक निगाहों से ताक रही है
इश्तहार से खुली छातियों वाली औरत मुझे देखती मुस्कराती है
एक औरत फोन का डायल घुमा रही है और मैं सोचता हूँ वह मेरा ही नंबर मिला रही है

माँ छः घंटों बस की यात्रा कर आई है
माँ मुझसे मिल नहीं सकती, होस्टल में रात को औरत का आना मना है।
प्रगतिशील वसुधा-64 (मार्च, 2005)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

औरत बनने से पहले एक दिन

औरत बनने से पहले
(हालांकि सत्रह की है)
बैठी है कमरे में
परीक्षा दे रही है
तनाव से उसके गाल
फूले हैं और अधिक
गर्दन की त्वचा है महकती सी

यह लड़की
एक दिन गदराई हुई होगी
कई परीक्षाओं अनचाही मुस्कानों को
अपनाते बीत चुका होगा
कैशोर्य का अंतिम पड़ाव

सड़कों पर आँखें
अनदेखा करती गुजरेंगीं
आश्वस्त निरीह गदराई

आश्वस्त? या बहुत घबराई
बहुत घबराई!
(अक्षर पर्व – 1999)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

छोटे शहर की लड़कियाँ

कितना बोलती हैं
मौका मिलते ही
फव्वारों सी फूटती हैं
घर-बाहर की
कितनी उलझनें
कहानियाँ सुनाती हैं

फिर भी नहीं बोल पातीं
मन की बातें
छोटे शहर की लड़कियाँ
भूचाल हैं
सपनों में
लावा गर्म बहता
गहरी सुरंगों वाला आस्मान है
जिसमें से झाँक झाँक
टिमटिमाते तारे
कुछ कह जाते हैं

मुस्कराती हैं
तो रंग बिरंगी साड़ियाँ कमीज़ें
सिमट आती हैं
होंठों तक

रोती हैं
तो बीच कमरे खड़े खड़े
जाने किन कोनों में दुबक जाती हैं
जहाँ उन्हें कोई नहीं पकड़ सकता

एक दिन
क्या करुँ
आप ही बतलाइए
क्या करुँ
कहती कहती
उठ पड़ेंगी
मुट्ठियाँ भींच लेंगी
बरस पड़ेंगी कमज़ोर मर्दों पर
कभी नहीं हटेंगी

फिर सड़कों पर
छोटे शहर की लड़कियाँ
भागेंगी, सरपट दौड़ेंगी
सबको शर्म में डुबोकर
खिलखिलाकर हँसेंगी
एक दिन पौ सी फटेंगी
छोटे शहर की लड़कियाँ।
(पल प्रतिपल -1989)
'एक झील थी बर्फ की' में संकलित

सखीकथा

हर रोज बतियाती सलोनी सखी
हर रोज समझाती दीवानी सखी
गीतों में मनके पिरोती सखी
सपनों में पलकें भिगोती सखी
नाचती है गाती इठलाती सखी
सुबह सुबह आग में जल जाती सखी

पानी की आग है
या तेल की है आग
झुलसी है चमड़ी
या फंदा या झाग

देखती हूँ आइने में खड़ी है सखी
सखी बन जाऊँ तो पूरी है सखी

न बतियाना समझाना, न मनके पिरोना
न गाना, इठलाना, न पलकें भिगोना

सखी मेरी सखी हाड़ मास मूर्त्त
निगल गई दुनिया
निष्ठुर और धूर्त्त।
(पश्यंती; अप्रैल-जून, 2001)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

सालों बाद मिलने पर

सालों बाद मिलने पर
वह दिखती है धरती का बोझ ढोती

स्मृति से बहन-भाई माता पिता लुप्त हो गए हैं
कभी कभी बेटी आकर साथ लेटती है
और हल्की सी याद आती है

उसे माँ की बहनों की
स्त्रियाँ थीं वे भीं

जिनकी धरती इस धरती से न ज्यादा न कम ठोस थी
बोझ ढोती रहीं वे भी इसी तरह आजीवन

बेटी सीख रही है सही गलत उपाय बोझ से उबरने के
उसने सीख लिए हैं राज शरीर के

जैसे उसकी माँ आसानी से भूल गई है
झुर्रियाँ समय से पहले ही दिखतीं त्वचा पर

जैसे बेटी के बदन में नहीं कहीं भी रोंए
उसे देखकर लगता है एकबारगी

कि स्त्री होती है विरक्त स्वभाव से
देखोगे अँधेरे में जब कदाचित खुली आँखें

खुश दिखेगी यह सोचती कि
समंदर चाहतों का उमड़ता बेटी के नखरों में।
***

एक समूची दुनिया होती है वह

जब लेंस सचमुच ढका जाता है
खत्म हो जाती है एक दुनिया
अचानक आ गिरता है अंधकार
अब तक रौशन समां में
उतारती है चमकीले कपड़े -
उसके एकमात्र करीबी दोस्त

सँभाल कर रखती है इन दोस्तों को
कि अगली किसी रौशन महफिल में
फिर हाजिर हो सके वह
इधर से उधर जाती और वापस आती
ब्रह्मांड की नज़रें साथ उसके घूमतीं

ऐसे मौकों पर वह वह नहीं
एक समूची दुनिया होती है
तमाम अँधेरे
सीने में समेटे होती है
सावधान कदमों से सँभाले हुए भार
नियत समय में पार करती
रोशनी से भरा अंधकार।
(प्रेरणा, 2007)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

सपनों में उनके भी

नीली आँखें भूरी आँखें
अथक श्रम से सँजोईं
आँसू आँसू से संपन्न
थिरकन कंपन स्पंदन
खबरों के बीच में आती हैं
नायिकाएँ

हमारे लिए ये इसी तरह रहेंगीं
जब तक इनकी कीमत रहेगी
वे तोड़ती हैं अपने ये क्षण
जब लेंस ढका जाता है
अचानक उतर आता है अँधेरा
आईने के सामने खड़ी हो
उतारती हैं तहें रासायनिक
मन ही मन होती तब चाँद पर कि
तिरछी नज़रों और लचकते कूल्हों से
वे काबिल हैं हम सबको धोखा देने में

कभी कभी चाँद हिल जाता है
कि गर हम जान जाएँ
उनके सच
कि सब कुछ उतर जाने पर
वे होती हैं औरतें
जैसी हर औरत होती है
हर कहीं किसी दीवार से जूझती

फिलहाल वे चल पड़ी हैं
अगले छल की तैयारी में
इस बीच कुछ देर वे लेट जाएँगी
सपनों में उनके भी आएँगे दानव
काँपेगी देह उनकी भी
जब गुजरेगा रात का पहरेदार
सीटियाँ बजाता।
(प्रेरणाः 2007)

खुदरा बाजार में एफडीआई और दलित उद्यमी

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/17/2013 12:13:00 PM

कुछ चिंतक, बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार और कार्यकर्ताओं की तरफ से ऐसी दलीलें लगातार आती रहती हैं कि वैश्वीकरण दलित और दूसरी वंचित जातियों और तबकों के लिए फायदेमंद है. कि वैश्वीकरण ने वंचित तबकों के लिए तरक्की के रास्ते खोले हैं और अगर इन नीतियों को इसी तरह लागू किया जाता रहा तो इसकी मदद से उभरी दलित उद्यमिता के जरिए दलितों (और इसी तरह दूसरी वंचित जातियों) की तरक्की मुमकिन होगी और उन्हें उनकी वंचित स्थितियों से मुक्ति दिलाई जा सकेगी. वे यह बात आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं कि ठीक यही साम्राज्यवादी वैश्वीकरण देश की दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक आबादियों के लिए तबाही को तेज करनेवाले एक विनाशकारी अभियान के रूप में काम कर रहा है. इसने सांप्रदायिक कत्लेआम, लूट, लैंगिक और जातीय उत्पीड़नों तथा युद्धों को तेज किया है. लेकिन इन्हें फिलहाल जाने भी दें, अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि दलित उद्यमिता का वास्तव में वैश्वीकरण से कितना और कैसा रिश्ता है. यह भी कि दलितों का उद्यमिता से रिश्ता क्या है और आधुनिकीकरण का भारत के जातीय यथार्थ से क्या रिश्ता है, जिसके बारे में (पिछले डेढ़ सौ बरसों से अधिक समय से) उम्मीद की जा रही है कि यह भारत के जातीय दुर्गों को ध्वस्त कर देगी. उस आधुनिकता का चेहरा क्या है और जातीय दुर्गों की हालत क्या है. लेखक और कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबड़े का यह बेहतरीन आकलन. अनुवाद: रेयाज उल हक

 आरक्षण को छोड़ दें तो दलितों की राजनीतिक संस्कृति में आर्थिक मुद्दों की गिनती नहीं की जाती. अगर मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सांसद मल्टी-ब्रांड खुदरा बाजार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर वोटिंग के दौरान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का समर्थन करने के एकमात्र मकसद के साथ लोकसभा से अनुपस्थित रहते हैं और राज्यभा में इसके पक्ष में वोट करते हैं तो उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि इस मामले का एक वास्तविक आर्थिक पहलू था, बल्कि ऐसा ‘सांप्रदायिक ताकतों’ को बाहर रखने के लिए किया गया.

आर्थिक मुद्दों के प्रति दलितों की उदासीनता की जड़ें शुरुआती कम्युनिस्टों के साथ उनके विवाद तक जाती हैं, जिन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्षों समेत सभी गैर-आर्थिक संघर्षों का मजाक उड़ाने के लिए आधार और ऊपरी संरचना के मार्क्सवादी प्रतीकों को एक जड़ सिद्धांत बना दिया था. इसकी वजह से दलित आंदोलन न केवल वाम आंदोलनों से दूर हो गए बल्कि वे आम तौर से अर्थशास्त्र से भी दूर हो गए. ऐसी स्थिति में द टाइम्स ऑफ इंडिया (5 दिसंबर, 2012) में एक लेख को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ- ‘टू एंपावर दलित्स, डू अवे विथ इंडियाज एंटीक्वेटेड रीटेल ट्रेडिंग सिस्टम’. इसके लेखक चंद्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले थे. ये दोनों दलित पूंजीवाद के प्रचारक हैं और ये मल्टी-ब्रांड खुदरा बाजार में 51 फीसदी एफडीआई की इजाजत देने के सरकारी फैसले की तारीफ कर रहे थे, जिसने वाल-मार्ट और टेक्सको जैसी बड़ी वैश्विक खुदरा श्रृंखलाओं के लिए रास्ता खोल दिया है.

एफडीआई और दलित उद्यमी

प्रसाद और कांबले ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि खुदरा बाजार में एफडीआई का ‘भारत में दलित उद्यमियों के उभरते वर्ग पर’ सकारात्मक असर होगा. उनकी दलीलों का मुख्य आधार ये है कि पारंपरिक, जातिबद्ध खुदरा क्षेत्र दलित उद्यमियों के लिए अवसर मुहैया नहीं कराता है. एफडीआई आधुनिक और जाति निरपेक्ष है, इसलिए दलित उद्यमियों के लिए फायदेमंद है. इस दलील के पक्ष में लेखकों ने दो अध्ययनों को उद्धृत किया है. पहला यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया (सीएएसआई) द्वारा दलित उद्यमों पर किया गया अध्ययन है, जिसमें पाया गया है कि जितने दलित उद्यमियों का सर्वेक्षण किया गया, उन्होंने पहली बार उद्यम किए थे और उन्होंने 1991 के बाद कारोबार शुरू किया था, जब उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इससे यह मतलब निकाला गया कि नवउदारवादी सुधार आम तौर से दलितों के लिए और खास तौर से दलित उद्यमियों के लिए फायदेमंद हैं. सीएएसआई के शोधकर्ताओं ने पाया कि ‘विभिन्न प्रकार के दलित उद्यमी डेवी ड्यूटी क्रेनें बनाने, सुरंगें बनाने, पुल बनाने और मशीनें बनाने में लगे हुए थे.’ पहले के पूरक के रूप में दूसरा अध्ययन दिल्ली की आजादपुर फल और सब्जी मंडी में दलित आढ़तियों की तलाश से जुड़ा हुआ है. यह अध्ययन दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) के सदस्यों ने किया और जाहिर है कि उन्हें कोई दलित आढ़ती नहीं मिला.

प्रसाद और कांबले ने 1991 के बाद दलित उद्यमियों की परिघटना का श्रेय वैश्विक होड़ द्वारा आउटसोर्सिंग और सहायक उद्योगों को दिए गए प्रोत्साहन को दिया है. इसमें उद्यमिता का एक विस्फोट हुआ, जिसमें दलितों को भी जगह मिली. यह दलील पूरे मामले को घटाते हुए इसे स्थापित करती है कि आधुनिकता के उपकरण भारत की तेज तरक्की में मदद करेंगे और ऐसा ही एक उपकरण होने के नाते एफडीआई यकीनन दलितों को फायदा पहुंचाएगा. बेशक, दलित जनता और दलित उद्यमियों के हित समान मान लिए गए हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित लेख के लेखकों ने आगे यह भी दावा किया है कि एफडीआई द्वारा चालित संगठित खुदरा बाजार हजारों खाद्य तकनीशियनों, एमबीए, सीए के लिए रोजगार के मौके मुहैया कराएगा. इससे भी अधिक, रेफ्रीजेरेटेड खाद्य पदार्थ ले जाने वाले वैनों और रेफ्रीजेरेटरों के निर्माता भी अधिक रोजगार पैदा कर सकेंगे.

यह घोषणा नई नहीं है कि पूंजीवादी आधुनिकीकरण खुद ब खुद जाति, संप्रदाय और नस्ल जैसी सामाजिक पहचानों के महत्व को और आर्थिक नतीजों को प्रभावित करने की उनकी भूमिका को खत्म कर देगा. कोई भी इस बात पर सहज ही सहमत हो सकता है कि सामाजिक पहचान (अस्मिताएं) बाजार की होड़ को सीमित करती हैं, सांस्थानिक बदलावों को रोकती हैं, आदान-प्रदान की लागत को बढ़ाती हैं और बाजार को गैर-प्रतिस्पर्धी बनाती हैं. इस पर भी सहमत हुआ जा सकता है कि बाजार-चालित अर्थव्यवस्थाएं आरोपित सामाजिक अस्मिताओं को कमजोर करेंगी. न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून (5 अगस्त, 1852) में लिखते हुए मार्क्स ने कहा था:
भारत में रेल-व्यवस्था सचमुच में आधुनिक उद्योगों का अग्रदूत होगी...रेल व्यवस्था के नतीजे में पैदा हुआ आधुनिक उद्योग श्रम के वंशानुगत विभाजन को मिटा देगा, जिस पर भारतीय जातियां टिकी हुई हैं और जो भारतीय प्रगति और भारतीय शक्ति की निर्णायक रुकावट हैं.

भारत दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क, जो बस अमेरिका, रूस और चीन के पीछे है, और एक बड़े औद्योगिक आधार वाला देश बना, जहां अनेक वैश्विक कंपनियां हैं, लेकिन जाति व्यवस्था ध्वस्त होने के बजाए भयावह रूप से जीवित है और आघात पहुंचा रही है.

मार्क्स के गलत साबित होते देख कर खुश होनेवाले लोगों के विलापों के बावजूद पूंजीवाद ने जाति व्यवस्था को प्रभावित किया और दलितों के एक तबके को फायदा भी पहुंचाया. असल में, दलित आंदोलन के निर्माण की प्रक्रिया की जड़ें भारत में पूंजीवादी विकास में तलाशी जा सकती हैं. लेकिन यह भी सही है कि पूंजीवादी विकास ने पारंपरिक रूप से प्रभावशाली जातियों को मजबूत किया और दलितों और गैर दलितों के बीच के सत्ता-असंतुलन को सशक्त बनाया. गुणात्मक और परिमाणात्मक रूप से जातीय उत्पीड़नों में वृद्धि इस जटिल गतिकी का एक सबूत है.

बेशक वैश्वीकरण लोगों को, दलितों समेत, फायदा पहुंचाता है, लेकिन सिर्फ मुट्ठी भर लोगों को. बहुसंख्यक, जो ‘अप्रतिस्पर्धात्मक’ हैं, जीवन की असुरक्षा और अस्तित्व संबंधी अनिश्चितता को भुगतने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं. सैद्धांतिक रूप से, वैश्वीकरण के हिमायतियों का रुझान चरम व्यक्तिवाद, डार्विनवादी सामाजिक प्रतिस्पर्धा और मुक्त बाजार में आस्था की ओर होता है, जिसे वे सामाजिक गतिशीलता की सभी समस्याओं के अचूक समाधान के रूप में देखते हैं. ऐसी सारी बातें कि गरीब लोग ‘रिस कर नीचे आने’ के सिद्धांत के साथ चैन से जी रहे हैं, सैद्धांतिक रूप से आधारहीन और व्यावहारिक रूप से झूठी हैं. पिछले तीन दशकों में वैश्वीकरण ने खतरनाक स्तर की असमानता को, दुनिया के गरीबों की बेहतरी के लिए संकट को, मूल अस्मितावादी उभारों को और लोकतंत्र के विनाश को जन्म दिया है. असल में इसने धरती को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है. कुछ लोगों के हाथों में धन के चरम संकेंद्रण का जश्न केवल तभी मनाया जा सकता है जब कोई जानबूझ कर इसकी तरफ से आंखें मूंद ले कि  आपार संख्या में लोगों को हाशिए पर धकेला जा रहा है.

पद्धति के नजरिए से देखें तो, सीएएसआई का अध्ययन दोषों से भरा हुआ है और उसमें से प्रायोजित प्रचार की बू आती है. उद्यमिता दलितों की बहुसंख्यक उप जातियों (मिसाल के लिए महारों, चमारों, मालाओं और परयों) का अभिन्न हिस्सा रही है. इन उपजातियों ने अपने सामने आए हर अवसर का इस्तेमाल किया. हालांकि वे भारी संख्या में खेतों में काम करने वाले मजदूर रहे हैं, लेकिन उनके बीच बुनकर, बिसाती, दुकानदार, महाजन, ठेकेदार आदि भी होते रहे हैं. ऐसी उद्यमिता के जरिए ही दलितों के एक हिस्से ने धन जमा किया.

1990 से दशकों पहले देश के हर हिस्से में खूब धनी दलितों को आसानी से खोजा जा सकता था. असल में, ठीक इन उद्यमियों ने ही आंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन का आधार निर्मित किया था. इसलिए दलित उद्यमों या उनकी सफलता का श्रेय वैश्वीकरण को देना पूरी तरह से प्रायोजित है. अगर दलित युवक उद्यमिता की तरफ धकेले भी गए तो इसकी वजह सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगारों के मौकों की कमी आना था. 1997 में, सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार 197 लाख थे, जो सबसे ज्यादा था और इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आई और यह 2007 में 180 लाख पर आ गया. इसी के साथ आरक्षण का एक तरह से वास्तविक अंत भी हो गया. जबकि ऊंची जातियों में उद्यमिता जोखिम उठाने से जुड़ी हो सकती है, दलितों में इसका उल्टा लक्षण देखने को मिलता है- वह है अपने अस्तित्व के लिए जोखिम उठाना. ऐसे में जबकि रोजगार नहीं हैं, दलित युवक खुद अपने बूते कुछ करने की ठानते हैं और तथा-कथित उद्यमी बन जाते हैं. 1990, 1998 और 2005 के द इकोनॉमिक सेंसस इन प्रायोजित और अनौपचारिक अध्ययनों की तुलना में एक अधिक सच्ची तस्वीर पेश करते हैं, चूंकि सेंसस के पास कोई अवधारणा (हाइपोथिसिस) नहीं होती जिसको उसे साबित या खारिज करना हो. 1990, 1998 और 2005 के लिए उद्यमिता के मालिकाने संबंधी जातिवार आंकड़े उपलब्ध हैं और 2011 हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के अध्ययन की तालिका 1 में उनका सार पेश किया गया है.




2005 के लिए प्रति उद्यम औसत रोजगार 2.3 था जो इसके संकेत देता है कि ज्यादातर फर्में एक व्यक्ति का उद्यम हैं. ऐसे मामले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों में कहीं अधिक थे. दलितों के संदर्भ में, उद्यम सड़क के किनारे काम करने वाले मोची से लेकर डिक्की के सदस्य करोड़पतियों तक फैले हुए थे. जैसा कि ये आंकड़े (तालिका 1) साफ तौर से दिखाते हैं, वैश्वीकरण के दौर में उद्यमों में दलितों का मालिकाना कमोबेश समान बना रहा, जो इस दावे को झुठलाता है कि वैश्वीकरण ने दलित उद्यमिता को बढ़ावा दिया है. यहां तक कि ऊपर उद्धृत किए गए हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि डिक्की द्वारा दलित करोड़पतियों के दावे एससी/एसटी उद्यमिता के व्यापक समूह का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

जबकि सहायक उद्योगों या आउटसोर्सिंग का विकास निश्चित तौर से वैश्वीकरण के द्वारा बढ़ा है, यह मान लेना दुस्साहस है कि दलित उद्यमी प्रतिस्पर्धा में दूसरों को मात देकर आउटसोर्स की गई प्रक्रियाओं या उत्पादों में एक हिस्सा हासिल कर लेंगे. मौजूदा बुनियादी सामाजिक अवरोधों की स्थिति में, जिनसे वे पीड़ित हैं, वे ऐसा केवल तभी कर सकते हैं जब वे अपने कर्मचारियों का अति-शोषण करें और उन्हें जातीय पहचान के आधार पर बहकाएं. प्रसाद और कांबले की दलीलें अवधारणाओं का एक जाल बुनती हैं. मिसाल के लिए, वे दावा करते हैं कि दलित उद्यमी आधुनिक क्षेत्रों में सफल रहे हैं- ये कारोबारी पुल, सुरंगें, मशीनें आदि बना रहे हैं. वास्तव में दलित उद्यम पारंपरिक (ईंट-गारा) क्षेत्र में पड़ता है, जिसमें वे युगों से काम करते आ रहे हैं. आधुनिक क्षेत्र ज्ञान आधारित उद्यमों से बनता है, जिसमें दलितों का अब भी अस्तित्व नहीं है. ईंट-गारा उद्योग में दलितों की सफलता शायद इसका संकेत देती है कि गैर-दलित अब मूल्य-शृंखला में ऊपर की तरफ चले गए हैं और निचले सिरे को दलितों के लिए छोड़ दिया है. अगली बात, यह गलत समझदारी है कि आधुनिकीकरण जाति व्यवस्था को खोखला बना रही है. यह असल में सांस्कृतिक संकरण का प्रतिनिधित्व करती और परंपराओं के साथ सह-अस्तित्व में बनी हुई है. पूंजीवादी आधुनिकता जाति व्यवस्था के साथ सह-अस्तित्व में है, लेकिन वैश्वीकरण के साथ जातीय चेतना गहरा गई है. ऐसा संकरण सहज रूप में उन वैवाहिक विज्ञापनों में देखा जा सकता है जिनमें ऊंची शिक्षा पाए और अग्रणी उद्योगों में काम करनेवाले भारतीय अमेरिकी अपने लिए अपनी उप जाति की दुल्हनें तलाशते हैं.

अगर वैश्वीकरण दलित उद्यमों का ऐसा हिमायती रहा होता, तो क्यों डिक्की को अपने लिए ‘आरक्षण’ जैसी गैर बाजार रियायत (डोल) की जरूरत पड़ती?
(ईपीडब्ल्यू के 19 जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित)

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें