हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जुझारू जनसंघर्षों की परंपरा में एक जुझारू कविता 'अंधेरे में'

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/26/2013 06:55:00 PM



मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में के पचास साल पूरे होने पर इस कविता और मुक्तिबोध के बारे में बहस एक बार फिर तेज हुई है. नए संदर्भों और हालात में कवि और कविता को देखने का आग्रह बढ़ा है. कवि, कार्यकर्ता और भोर के प्रधान संपादक रंजीत वर्मा का यह लेख इसी सिलसिले की एक कड़ी है.

मुक्तिबोध की कविता ’अंधेरे में’ एक गुरिल्ला कविता है। इस कविता ने पहली बार हिंदी कविता को लड़ने की भाषा दी। यह संघर्ष की कविता है और साथ ही कविता के संघर्ष का भी यह एक नायाब उदाहरण है। ’अंधेरे में’ कविता पचास साल की हो गई लेकिन इसके विचार में वही तेजी है और उतनी ही फुर्ती से यह कविता आज भी हमले के वक्त अपना पोजीशन ले लेती है। कभी यह स्वप्न में चली जाती है तो कभी कविता ’गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि सा’ होकर अंडरग्राउंड हो जाती है तो कभी बरगद के ’तल खोह अंधेरे’ में किसी पागल के गान में जगह बनाती है तो कभी भागती है दम छोड़, घूम जाती है कई मोड़, जबकि ’फंसाव घिराव तनाव है सब ओर’ और चहुं ओर ‘किसी जनक्रांति के दमन निमित्त यह मार्शल लॉ’ जैसी स्थिति है, ‘जमाने की जीभ निकल पड़ी है’ और जहां कोई पीछा कर रहा होता है लगातार। इस कविता के लिखे जाने के चार साल बाद लोगों को नक्सलबाड़ी में बसंत का वज्रनाद सुनाई दिया, बयालिस साल बाद 2005 में लोगों ने देखा कि किस तरह नक्सलियों के सफाए के नाम पर सलवा जुड़ूम जैसा निंदनीय कार्यक्रम चलाया गया जिसमें संघर्ष कर रहे आदिवासियों के खिलाफ उनके ही भाई बंधुओं को लामबंद कर खड़ा कर दिया गया. लेकिन जब लगा कि इस कार्यक्रम को सर्वोच्च न्यायालय में सरकार संवैधानिक कार्रवाई नहीं ठहरा पाएगी, और आगे चलकर यही हुआ भी, तो  उसे थोड़ा नेपथ्य में डालते हुए 2009 में यानी ’अंधेरे में’ लिखे जाने के छियालिस साल बाद सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन ग्रीन हंट जैसी हत्यारी कार्रवाई शुरू की और जो आज भी न सिर्फ बदस्तूर जारी है बल्कि अब इसने अपना विस्तार भी कर लिया है। और अब यह शहरी बुद्धिजीवियों के घरों के दरवाजे खटखटाने लगी है और आधी रात एक आवाज किसी को भी गूंजती सुनायी दे सकती है-‘स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता, क्रॉस एक्जामिन हिम थॉरोली।’ और यह थॉरोली जांच दिमाग की कैसे की जाती है इसका भी ब्योरा दिया है मुक्तिबोध ने:

मस्तक-यंत्र में कौन विचारों की कौन-उर्जा
कौन-सी सिरा में कौन-सी धकधक,
कौन-सी रग में कौन-सी फुरफुरी,
कहां है पश्यत कैमरा जिसमें
तथ्यों के जीवन दृश्य उतरते,
कहां कहां सच्चे सपनों के आशय
कहां कहां क्षोभक-स्फोटक सामान!
भीतर कहीं पर गड़े हुए गहरे
तलघर अंदर
छिपे हुए प्रिन्टिंग प्रेस को खोजो।
जहां कि चुपचाप ख्यालों के परचे
छपते रहते हैं, बांटे जाते।
इस संस्था के सेक्रेटरी को खोज निकालो।

इन सबके बावजूद न तो आंदोलन की धार को कुंद किया जा सका है और न तो इस कविता के अंदर जो प्रेरकशक्ति है उसका विध्वंस किया जा सका है जबकि इस बीच उदारीकरण ने इस देश में एक तरह से मानो कारनामा ही कर दिया। उसने कर्ज में डूबा एक ऐसा खुशहाल मध्यवर्ग इस देश में पैदा कर दिया जिसके लिए कविता या क्रांति या संघर्ष या निम्न वर्ग या उसकी परेशानियां या जद्दोजहद कोई मायने नहीं रखतीं। वह अपनी खुशियों और एकाकीपन में इस तरह डूब गया कि वह अपने निकट के इतिहास से भी खुद को दूर कर लिया। हालांकि यह सब अचानक नहीं हुआ बल्कि वह अपने चरित्र में पहले से ही ऐसा था बस अनुकूल समय आने भर की बात थी जो उदारीकरण के आने के बाद उसे मिल गया और वह हद से बाहर निकल गया। मुक्तिबोध ने इसे अपने समय में ही पहचान लिया था। उन्होंने रात के अंधियारे में जिस जुलूस को देखा था उसमें मध्यवर्ग के ही पत्रकार, कवि, नेता, विद्वान आदि उद्योगपतियों और कुख्यात गुंडों के साथ शामिल थे। इस जुलूस को उन्होंने किसी मृत दल की शोभा यात्रा कहा क्योंकि इनकी जमीर मर चुकी थी और इन्होंने ’स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया’ था। यह कविता की ताकत है कि जब से यह कविता सामने आई है ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरा होगा जब इस कविता को हिंदी में कहीं न कहीं किसी न किसी ने उद्धृत नहीं किया होगा या मन ही मन याद नहीं किया होगा या किसी दूसरे को नहीं सुनाया होगा। हो सकता है यह कहना सही हो कि कविता क्रांति नहीं कर सकती लेकिन यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि क्रांति के बीजों को कविता सुरक्षित रखती है।

मुक्तिबोध को इस बात का पूर्वानुमान था, जैसा कि अक्सर कहा भी जाता है कि कोई सशस्त्र आंदोलन जल्द ही विस्फोट के साथ सामने आने वाला है। हो सकता है उनकी बात सही हो क्योंकि 1967 में हुआ नक्सलबाड़ी आंदोलन ने अपनी विरासत में यह रूप धारण किया था। और एक सजग कवि होने के कारण जाहिर है कि मुक्तिबोध भी इस पूरी विरासत से अच्छी तरह वाकिफ थे। ‘अंधेरे में’ वे लिखते हैं:

गेरुआ मौसम उड़ते हैं अंगार
जंगल जल रहे जिन्दगी के अब
जिनके कि ज्वलंत-प्रकाषित भीषण
फूलों से बहती वेदना नदियां
जिनके कि जल में
सचेत होकर सैकड़ों सदियां, ज्वलंत अपने
बिम्ब फेंकती।

ये पंक्तियां यूं ही नहीं आ गयी हैं बल्कि इसके पीछे विद्रोह की सदियों पुरानी लंबी परंपरा है जिसे वे अपनी इन पंक्तियों में अभिव्यक्त कर रहे हैं। ये तमाम विद्रोह विभिन्न नामों से जाने जाते हैं इसके बावजूद वे एक कड़ी बनाते हैं। इस पूरी कड़ी को जोड़कर देखना बहुत जरूरी है।

अगर हम छत्तीसगढ़ के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि वहां विद्रोह की लंबी परंपरा रही है। मुक्तिबोध वहीं के थे अतः जाहिर है कि वे इन सबसे पूरी तरह अवगत थे। अमूमन देखा यह गया है कि पूरे देश में जनांदोलनों की शुरुआत कार्नवालिस एक्ट के तहत स्थायी बंदोबस्ती प्रथा लागू किये जाने के फलस्वरूप हुई जिससे छोटे किसानों, बंटाईदारों को जो अमूमन पिछड़ी जाति के हुआ करते थे, भीषण उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा लेकिन छत्तीसगढ़ में समानता को लेकर प्रतिरोध के स्वर को 17वीं शताब्दी में ही सुना जाने लगा था जो कार्नवालिस एक्ट के आने के बाद धीरे धीरे उग्र रूप लेने लगा था। सतनामी पंथ, कबीर पंथ और रैदासी परंपरा के लोगों ने पूरे छत्तीसगढ़ में लोगों के बीच अपनी जड़ें जमा ली थीं। ये समानता की बात करते थे और इनका स्वर प्रतिरोध का था। छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास की पहचान इन सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों के द्वारा सवाल उठाए जाने की प्रक्रिया से बहुत अच्छे से की जा सकती है। 19वीं शताब्दी में जब मालगुजारी बंदोबस्ती का कानून अंग्रेजों ने छत्तीसगढ़ में लागू किया तो सनातनी लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया और बंटाईदारों और छोटे किसानों को बड़ी संख्या में गोलबंद किया, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भूमकाल विद्रोह था। 1910 में यह बस्तर के 84 परगना में से 46 परगना में फैल गया था। आधुनिक काल में छत्तीसगढ़ में इसे आदिवासियों का पहला बड़ा सशस्त्र विद्रोह कहा जा सकता है। यह मुख्यतः इसलिए शुरू हुआ क्योंकि अंग्रेज सरकार ने पहली बार ‘सुरक्षित जंगल’ की घोषणा की और ठेकेदारों को अनुमति दी कि जंगलों से लकड़ी काट कर पटरी बिछाने के लिए उसे रेलवे को मुहैया करें। यही वक्त है जब जंगलों का सरकारी स्तर पर सफाया शुरू हुआ और आदिवासी विस्थापित होने लगे। विद्रोह की विकटता को देख कर इन्हीं दिनों सरकार ने कई जनजातीय समुदायों को कानून बनाकर जाति के आधार पर जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया ताकि पुलिस के लिए उन्हें कहीं से भी और बिना किसी कारण के ही उठा लेना और जेल में ठूंस देना या यहां तक कि उनकी हत्या कर देना अदालत और दुनिया के समक्ष जायज ठहराया जा सके। ये वही जनजातियां थीं जिन्होंने जंगल के अंदर भीषण लड़ाइयां लड़ी थीं। ठेकेदारों के लिए मुश्किल था बिना सेना की मदद के जंगलों से लकड़ी काट ले जाना। यह कानून एक बड़ा हथियार साबित हुआ। अब पुलिस या सेना के लिए यह बहुत आसान था पूरे आंदोलन को हिंसक तरीके से नियंत्रित करना। गुरिल्ला युद्ध एकमात्र विकल्प था आंदोलनकारियों के सामने।

भूमकाल आंदोलन के पहले कम से कम नौ महत्वपूर्ण विद्रोह हो चुके थे जिनका नामोल्लेख करना यहां जरूरी है ताकि आंदोलन की उस जमीन को समझा जा सके जिसकी मिट्टी से मुक्तिबोध पैदा हुए। वे हैं- हल्बा विद्रोह (1774-79), भोपाल पतनम संघर्ष (1795), परालकोट विद्रोह (1825), तारापुर विद्रोह (1842-54), मारिया विद्रोह (1842-63), प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1856-57), कोई विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी विद्रोह (1878-82) और तब जाकर 1910 में शुरू होता है भूमकाल विद्रोह। ये सारे विद्रोह इसलिए हुए क्योंकि अंग्रेज उनपर अपनी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था थोप रहे थे जिससे उनकी अपनी संस्कृति और सामाजिक संरचना ध्वस्त होती नजर आ रही थी। और दूसरी ओर वे अपनी जान देने को तैयार थे लेकिन अपनी जीवनशैली को छोड़ने को कतई तैयार नहीं थे। इस तरह कहा जा सकता है कि ये सारे आंदोलन और खासकर भूमकाल आंदोलन जो पिछले सभी आंदोलनों के मुकाबले काफी उग्र था मूलतः सत्ता द्वारा मचाई जा रही लूट, शोषण और दमन के खिलाफ था।

क्या ऐसा लग नहीं रहा कि एकदम थोड़े अंतर के साथ आज भी यही सब हो रहा है? आज जंगल की लकड़ी ही नहीं बल्कि खनिज संपदा पर भी उनकी निगाह है। इस बार ठेकेदार की जगह कॉर्पोरेट घराने इस लूट में शामिल हैं जिनके हाथ में सरकार ने पट्टा थमा दिया है। साथ ही वे इस लूट को अंजाम दे सकें इसलिए उनकी मदद को भारत सरकार ने जबरदस्त तरीके से सेना को उनका रास्ता साफ करने को लगा दिया है। फिर भी राह उनके लिए पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गयी है। भारी विरोध है, आंदोलन है, सत्ता की हिंसा के जवाब में हिंसा भी है लेकिन इसके बावजूद यह पहले से ज्यादा संगठित भी है। और न सिर्फ संगठित हैं बल्कि पहली बार विद्रोह की इस लंबी परंपरा में विचारधारा दिखाई देने लगी। इस बार उन्हें नियंत्रित करने के लिए अपराधी ठहराने वाले सिर्फ उसी पुराने कानून से काम नहीं चल सकता था अतः एक नया और बेहद दमनकारी कानून लाया गया और वह था 2005 में बना जन सुरक्षा अधिनियम कानून। इस कानून के साथ सरकार भारतीय जनमानस में यह बात बिठा देने में भी सफल हो गई है कि माओवादी होना एक संगीन जुर्म है। माओवादी होने की सरकारी व्याख्या के अनुसार वे सभी माओवादी हैं जो इस लूट में सरकार की दमनात्मक कार्रवाइयों का विरोध व्यावहारिक स्तर पर भले न करें लेकिन सैद्धांतिक तौर पर करते हों और वे आदिवासी जो अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए सीधे संघर्ष में हैं उनसे किसी भी प्रकार की थोड़ी भी सहानुभूति रखते हों।

जाहिर है यह सहानुभूति रखने वाला और सैद्धांतिक बहस चलाने वाला वर्ग मध्यवर्ग है और अपनी इस परिभाषा के द्वारा सरकार ने इसी मध्यवर्ग को कसने की कोशिश की है क्योंकि सरकार नहीं चाहती कि मध्यवर्ग या शहरी बुद्धिजीवी सैद्धांतिक तौर पर ही सही लेकिन उनके समर्थन में उतरे।

तब और अब की जो यह दो स्थितियां हैं इन्हीं के बीच ‘अंधेरे में’ कविता है। किसी दीवार की तरह नहीं बल्कि पुल की तरह। एक सिरा इसका अतीत से जुड़ता है जबकि दूसरा भविष्य से। इस कविता से होकर गुजरे बिना न पिछले लगभग तीन सौ साल के संघर्ष के इतिहास की त्रासदी को समझा जा सकता है और न सत्ता द्वारा चलाए जा रहे दमनात्मक कार्रवाई को ही जो आज भी बदस्तूर जारी है। चांद का मुंह टेढ़ा है कविता संग्रह की भूमिका में अपने समय के महत्वपूर्ण कवि शमशेर बहादुर सिंह ‘अंधेरे में’ कविता के बारे में लिखते हैं, ‘‘यह कविता आधुनिक जन-इतिहास का, स्वतंत्रता-पूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है। इसमें अजब और अद्भुत रूप से व्यक्ति और जन का एकीकरण है। देश की धरती, हवा, आकाश, देश की सचमुच मुक्ति, आकांक्षी नस-नस इसमें फड़क रही है।’’ ‘स्वतंत्रता-पूर्व और पश्चात’ कहने का मतलब कि शमशेर बहादुर सिंह ने 1947 को केंद्र बिंदु माना यानी वे भी ’अंधेरे में’ या मुक्तिबोध की अन्य कविताओं में सिर्फ अतीत देख रहे थे। वे आने वाली घटना से इस कविता को न जोड़ पा रहे थे और न उस वैचारिक लड़ाई से जो आने वाले दिनों में बेहद तीक्ष्ण रूप धारण करने जा रही थी। जब मुक्तिबोध कहते है, ‘मैं आततायी-सत्ता के सम्मुख’ तो उनके ऐसा कहते ही शोषण और दमन के खिलाफ संघर्ष का वह रूप दिखाई देने लगता है जो स्वतंत्रता संग्राम से एक स्तर पर जुड़ तो जरूर रहा था लेकिन दूसरे स्तर पर वह आजादी का जो मतलब लिए हुए था वह गांधी और नेहरू से इतर था। ’अंधेरे में’ कविता में गांधी को देखकर कवि के मुख से अचानक निकल पड़ता है: ’इस तरह पंगु!!’ और तभी कवि को हतप्रभ करते मानो गांधी खुद कह उठते हैं- ‘हम हैं गुजर गए जमाने के चेहरे/आगे तू बढ़ जा।’ इस पॉलिटिक्स को समझे बिना बेहद मुश्किल है ’अंधेरे में’ कविता को समझना।

हिंदी की जो भी बड़ी प्रतिभाएं उस समय थीं उन सभी ने ‘अंधेरे में’ कविता को अपने अपने तरीके से समझने की कोशिष की लेकिन लगभग सभी ने कविता को समझने के जो बने बनाये साहित्यिक उपकरण या मापदंड जो स्वभाविक रूप से उनके पास उपलब्ध थे उन्होंने उसी का सहारा लिया चाहे वह नामवर सिंह हों या रामविलास शर्मा। किसी ने भी सैकड़ों साल से बन रहे उस वातावरण को समझने की कोशिश नहीं की जिसका इस कविता को रचने में महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने भी इस कविता को समझने के लिए खुद को बदलने की जरूरत नहीं समझी। जब आप किसी भी चीज के रचे जाने की उस पूरी परिस्थिति से अनभिज्ञ रहेंगे तो जाहिर है कि उसमें आपको रहस्यवाद दिखाई देगा जैसा कि रामविलास शर्मा को दिखाई दिया। नामवर सिंह की अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक कविता के नए प्रतिमान के परिशिष्ट में ‘अंधेरे में’ पर दो आलेख हैं। ’अंधेरे में: पुनश्च’ नामक दूसरे लेख में जिसे नामवर सिंह ने बाद में 1974 में पुस्तक के दूसरे संस्करण के वक्त जोड़ा ताकि ’अंधेरे में’ कविता को लेकर हिंदी साहित्य में जो धुंध फैली हुई है उसे साफ किया जा सके और यह काम उन्होंने बखूबी किया भी। रामविलास शर्मा की इस कविता को लेकर दी गई तमाम स्थापनाओं का जमकर और तार्किकपूर्ण तरीके से इसी लेख में उन्होंने खंडन किया है और इस कविता को लेकर डॉ. शर्मा की समझ पर चुटकी भी खूब ली है। दूसरे टिप्पणीकारों की भी उन्होंने अच्छी खबर ली है और जहां वे गलत थे ठीक वहीं उन्होंने अंगुली रखी है। लेकिन दुख की बात यह है कि वे खुद भी इस कविता की तह तक पहुंचने में बहुत सफल नहीं रहे हालांकि साहित्यिक मापदंड के सहारे जितनी अच्छी व्याख्या की जा सकती थी उन्होंने की है पर उस जमीन को परखने से चूक गए जिसकी कोख से यह कविता किसी विस्फोट की तरह प्रस्फुटित होती है।

’अंधेरे में’ कविता मुक्तिबोध की अंतिम कविता है। इसमें उनके विकास का विराट फलक सामने आता है। कविता यहां अपने अंतिम सौंदर्य के साथ मौजूद है। यह कविता एक छलांग है मुक्तिबोध के जीवन में। ’अंधेरे में’ का ’मैं’ जो है वह मुक्तिबोध की पहले की रचनाओं में आए ’मैं’ से भिन्न है। ‘अंधेरे में: पुनश्च’ में नामवर सिंह कहते हैं, ’इस मैं का निरंतर प्रयास है कि इस भिन्न वर्ग से एकात्म कर ले और इस प्रकार मुक्ति की प्राप्ति करे।’ नामवर सिंह यहां जिसे ’भिन्न वर्ग’ समझ रहे हैं ’मैं’ उससे अलग नहीं है क्योंकि वह उसी वर्ग से आता है। दरअसल यह चेतनाधर्मी वर्ग है जो बदलाव की चाहत लिए सैकड़ों साल से संघर्षरत है। ’अंधेरे में’ का ’मैं’, ’वह’ और ’अभिव्यक्ति’ इसलिए कई जगह एकाकार से होते नजर आते हैं और जहां ऐसा होता है वहां वर्ग संघर्ष की तेज ध्वनि सुनाई देने लगती है। और इनका अलग होना भी रणनीति का एक हिस्सा है। ऐसा मुक्तिबोध तभी करते हैं जब ’मैं’ पर खतरा मंडराता नजर आता है, जब उन्हें लगता है कि ’मैं’ आततायियों के गिरफ्त में आने वाला है तो मुक्तिबोध ’मैं’, ’वह’ और ’अभिव्यक्ति’ तीनों को अलग-अलग कर देते हैं ताकि उनकी पहचान छिपायी जा सके और सत्ता द्वारा चलाये जा रहे इस कठोर दमनात्मक कार्रवाई के समय उन्हें भूमिगत कर उनकी आत्मरक्षा की जा सके।

मुक्तिबोध, नागार्जुन और त्रिलोचन हिंदी के ये तीन ऐसे कवि हैं जो भले ही कई दूसरे कवियों की तरह आते थे मध्यवर्ग से लेकिन जिन्होंने खुद को वर्गच्युत कर सर्वहारा वर्ग की जमात में शामिल कर लिया था, लेकिन यहां भी एक अंतर है। नागार्जुन और त्रिलोचन जहां किसी फक्कड़ की तरह वहां थे वहीं मुक्तिबोध सर्वहारा वर्ग में एक योद्धा की तरह थे, वे उनकी ही आवाज थे कविता में। इस तरह का चौथा उदाहरण हिंदी साहित्य में हो सकता है न मिले शायद इसलिए इस तरह के वर्ग-परिवर्तन को लक्षित कर कभी सोचा नहीं गया। यहां तक कि नामवर सिंह भी नहीं सोच पाए और लगातार मध्यवर्ग को ग्लैमर प्रदान करते रहे। मुक्तिबोध जब कहते हैं- ’किसी की खोज है उनको/किसी नेतृत्व की’ तो नामवर सिंह तुरंत कह उठते हैं- ‘परंपरा से बुद्धिजीवी वर्ग के लोग ही यह नेतृत्व प्रदान करते आए हैं।’ मुक्तिबोध जब कहते हैं- ‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये लोग’ या जब वे कहते हैं- ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास’ तो नामवर सिंह जवाब देते हुए कहते हैं- ’निस्संदेह कुछ लोग ऐसे हैं जो एकदम क्रीतदास नहीं हैं’ फिर आगे कहते हैं- ’अपने वर्ग की स्वाभाविक मध्यवर्गीय कमजोरियां इनमें भी हैं किंतु इन्हें अपनी कमजोरियों का पूरा एहसास है। इनमें आत्मसमीक्षा इतनी तीव्र है कि ये वर्तमान व्यवस्था के बने रहने के लिए अपने-आपको जिम्मेदार ठहराते हैं और इस प्रकार एक गहरे अपराध-बोध से पीड़ित रहते हैं। इसलिए ये उस व्यवस्था को तोड़ने के लिए स्वयं भी टूटने को तैयार दिखते हैं।’ 

नामवर सिंह का यह जो जवाब है या जो व्याख्या है क्या सही है? अगर कोई व्यक्ति मध्यवर्ग में होने की वजह से सचमुच अपराध-बोध से ग्रस्त है तो वह खुद को मध्यवर्ग से डीक्लास कर सर्वहारा वर्ग के बीच जाने की कोशिश करेगा न कि मष्यवर्ग में रहते हुए ही टूट जाने की हद तक जाकर व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा होगा। यह कोरी भावुकतापूर्ण सोच है क्योंकि एक मध्यवर्गीय जिंदगी इतनी जगह नहीं देती। इसी लेख में आगे मजदूर की वर्गचेतना का हवाला देते हुए वे मध्यवर्ग की वर्ग-चेतना का विश्लेषण करते हुए कहते हैं ‘इसी प्रकार मध्यवर्गीय व्यक्ति की वर्गचेतना केवल इतने ही तक सीमित नहीं है कि वह अपने-आपको मध्यवर्ग का सदस्य मानकर उस वर्ग के तात्कालिक हितों के लिए संघर्ष करे; बल्कि उसकी सच्ची वर्गचेतना इस बात मे है कि वह मजदूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंततः अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके लिए पूंजीवाद के विनाश में मजदूर वर्ग का साथ दे।’ क्या यह संभव है कि कोई अपने वर्ग में रहे और उस वर्ग की चिंता भी करे और साथ ही दूसरे वर्ग से भी खुद को जोड़ ले और फिर उस वर्ग के हित में ही अपने वर्ग का हित देखने लगे। दो वर्गों के हित एक कैसे हो सकते हैं इस पर नामवर सिंह ने प्रकाश नहीं डाला है। उन्होंने यह भी कहने की जरूरत नहीं महसूस की कि जिस मध्यवर्ग को वे सर्वहारा वर्ग की तरह एक वर्ग मान रहे हैं उसका आधार क्या है जबकि पहले के कई चिंतकों, विचारकों जैसे कि बर्ट्रेंड रसेल ने ही कहा था कि मध्यवर्ग कोई वर्ग नहीं है और इस वर्ग के लोगों की तुलना रेल का इंतजार कर रहे प्लेटफॉर्म पर खड़े लोगों से की थी। मौका हाथ आते ही ये उच्चवर्ग की ओर छलांग लगाते देर नहीं करते। इनके अंदर कोई वर्ग-चेतना नहीं होती। ये अपने वर्ग से उच्चवर्ग की ओर भागने के फिराक में लगे लोग हैं। इसलिए एक बड़ा समुदाय होते हुए भी मध्यवर्ग कोई वर्ग नहीं बनाता। वह अलगाव में रहता है और आपसी स्वार्थ की टकराहट में जीता है।

नामवर सिंह मार्क्स का हवाला देते कहते हैं, ’वर्ग-चेतना के लोप से ही मजदूर वर्ग ’अलगाव’ का अनुभव करता है’ और फिर सर्वहारा वर्ग के लिए दिए गए मार्क्स की इस स्थापना को वे मध्यवर्ग पर भी लागू कर देते हैं और इतना ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग के हित से मध्यवर्ग के हित को जोड़ भी देते हैं और वह भी पहले से मौजूद बिना किसी समाज-विज्ञान के सिद्धांत के और वे खुद भी कोई सिद्धांत प्रतिपादित नहीं करते हैं। उन्हें यहां भी मार्क्स को याद करना चाहिए था। आर लैंडर को दिए अपने साक्षात्कार में मैजिनी को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में मार्क्स कहते हैं ’वह मध्य वर्ग के गणतंत्र की पुरानी धारणा का ही प्रतिनिधित्व करता है। हम मध्यवर्ग से कोई मेल मिलाप नहीं करना चाहते हैं। अब वह आधुनिक आंदोलनों से उसी तरह पिछड़ गया है जैसे जर्मनी के वे अध्यापक, जो अब भी यूरोप में भावी सांस्कृतिक लोकतंत्रवाद के मसीहा माने जाते हैं। 1948 में यह एक सच्चाई थी, जब जर्मनी का मध्यवर्ग (इंग्लैंड में प्रचलित अर्थ में) पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। लेकिन अब वे जर्मन अध्यापक पूरी तरह प्रतिक्रियावादियों के साथ हैं और सर्वहारा वर्ग उन्हें पूरी तरह भूल चुका है।’’ (देखें संकट के बावजूद़, चयन, सम्पादन एवं अनुवाद मैनेजर पाण्डेय) यह साक्षात्कार मार्क्स ने 1871 में दिया था। प्राव्दा के 3 मई 1918 के अंक में एक लेख की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है, ‘रूसी सर्वहारा क्रांति का पहला और अग्रणी ’आंतरिक शत्रु’ का गठन निम्न मध्यवर्ग द्वारा किया गया।’ तो यह है मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की ऐतिहासिक भूमिका और इसी मध्य वर्ग को नामवर सिंह मुक्तिबोध के कंधे ‘अंधेरे में’ शायद हिंदी की पहली कविता है जो मध्यवर्ग की कहीं से हिमायत नहीं करती बल्कि बेहद कड़े शब्दों में उसकी भर्त्सना करती है।

मध्यवर्ग के अवसरवाद और समझौतापरस्त चरित्र की शिनाख्त करती यह कविता आगे बढ़ती है और ऐसी लड़ाई में उसकी किसी भी प्रकार की सकारात्मक भूमिका को सिरे से तब तक खारिज करती है जब तक कि वह खुद को वैचारिक रूप से डीक्लास करके सर्वहारा वर्ग में शामिल न कर ले। लेकिन नामवर सिंह इस कविता में पता नहीं कैसे यह पड़ताल कर लेते हैं कि मुक्तिबोध को मध्यवर्ग में ही संभावना दिखाई पड़ती है। वे ‘अंधेरे में: पुनश्च’ लेख में लिखते हैं, ‘किंतु इन सबके बावजूद इसी वर्ग में मुक्तिबोध को संभावना के बीज दिखाई पड़ते हैं और मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व का यही वह पहलू है जो उन्हें खूंखार सिनिक, संशयवादी होने से बचा लेता है।’ विडंबनापूर्ण स्थिति तो यह है कि वे ‘मैं’ को राजनैतिक चेतना से लैस होकर गतिविधियों में उतरा देख तो लेते हैं लेकिन पता नही उसमें कौन-सा मध्यवर्गीय चरित्र ढूंढ़ लेते हैं कि तत्काल कह उठते हैं, ‘मध्यवर्ग का सबसे संवेदनशील और जाग्रत व्यक्ति’। अब उनकी इस मासूमियत पर कौन न फिदा हो। आखिर देखिए तो सही कि उन्होंने किस तरह मध्यवर्ग की महत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने की कोशिश की है जबकि मुक्तिबोध ने किसी प्रत्यक्षदर्शी गवाह की तरह विस्तार से उस जुलूस का वर्णन किया है जिसमें तमाम मध्यवर्गीय पेशे से जुड़े लोग रात के अंधेरे में अपराधियों और लुटेरों के साथ मिलीभगत किए जुलूस में शरीक हैं। फिर भी नामवर सिंह मासूम कोशिश करते नजर आते हैं और वे सिर्फ कोशिश भर ही नहीं करते बल्कि मौका ताड़ कर यह भी साथ-साथ कड़े शब्दों में चेता जाते हैं कि हिंदी कविता में मध्यवर्ग की महत्ता को नकारने का मतलब कविता में खूंखार ढंग से सिनिकल हो जाना है, संशयवादी हो जाना है।

यह स्थापना नामवर सिंह ने 1974 में अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ’कविता के नए प्रतिमान’ के दूसरे संस्करण में रखी और उसके बाद की हिंदी कविता को आप सरसरी निगाह से देख जाइए। आप समझ जाएंगे कि इस स्थापना ने हिंदी कविता का कितना नुकसान किया है। मध्यवर्गीय सोच और चिताओं से त्रस्त, मध्यवर्गीय सुख और सुविधाओं को तलाशती और उनके न मिलने पर असुरक्षा, हताशा और संषय में नाक तक डूबी कविताओं की जैसे बाढ़-सी आ गई। ये लोग ही कवि भी कहलाए और जो इस उपभोक्तावादी चिंताओं से बाहर इस पूरी स्थिति को बदल डालने का हौसला लिए कविताओं में संघर्षरत थे उनकी न सिर्फ राजनैतिक चेतना बल्कि उनकी कविता को भी नकारने की शुरुआत यहीं से होती है। यहां तक कि हिंदी साहित्य में नक्सलबाड़ी धारा का जो प्रभाव था उसे भी नकारा जाने लगा। ऐसी भयानक स्थिति खड़ी हो गई कि किसी भी प्रकार की वैचारिक लड़ाई हिंदी कविता से गायब हो गई। यहां तक कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव से निकल कर जो कवि आए थे उनमें से भी कई ने इस भयानक स्थिति के दबाव में अपने स्वर बदल लिए और जिन्होंने नहीं बदले उन्होंने या तो आत्महत्या कर ली या गहरी हताशा में चले गए। देखते ही देखते हिंदी कविता का जुझारूपन खत्म हो गया और आज चालीस साल बाद इसका चेहरा लगभग भीख मांगते कटोरे या जुगाड़ में लगे किसी आदमी की तरह हो गया है।

नामवर सिंह ने एक काम जरूर अच्छा किया कि रामविलास शर्मा का जबरदस्त खंडन किया और हिंदी कविता को रहस्यवाद या अस्तित्ववाद के अंधेरे से बचा लिया लेकिन उसे मध्यवर्गीय मानसिकता के महामकड़जाल में फंसा दिया। ताज्जुब होता है कि आखिर वे आलोचकगण क्या कर रहे थे जो नामवर सिंह के साथ या कुछ बाद में आलोचना के क्षेत्र में आए थे और आगे चलकर बड़े आलोचक भी कहलाए। उन्हें ही यह काम करना था ठीक उसी तरह जैसे नामवर सिंह ने किया रामविलास शर्मा के साथ। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसे हिंदी कविता के साथ सबसे बड़ा किया गया छल ही माना जाना चाहिए। हिंदी में राजनीतिक चेतना वाली यह पहली सर्वहारा कविता है जो इतनी ताकतवर है और चालाकी देखिए इसे ही मध्यवर्ग का स्तुतिगान करने वाली किसी लचर कविता में बदल दिया।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ जुझारू जनसंघर्षों की परंपरा में एक जुझारू कविता 'अंधेरे में' ”

  2. By Ranjit Verma on January 6, 2014 at 1:20 PM

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    दरअसल देखा जाए तो इस लेख को दो हिस्सों में नहीं बल्कि तीन हिस्सों में तोड़ कर देखने की जरूरत है क्योंकि कविता की यही मांग है और समय की भी। एक तो कविता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि। ऐसा इसलिए कि कविता के लिखे जाने में जितना चेतन मन सक्रिय होता है उतना ही अवचेतन मन भी। और इनके निर्माण में वहां की मिट्टी, आबोहवा की अपनी एक भूमिका होती है जिसे वहां की ऐतिहासिकता पैदा करती है। यह सब इतना गड्डमड्ड होता है कि गणित की तरह इसे सीधे सीधे नहीं समझा जा सकता। सच तो यह है कि खुद कवि भी इसे बाज दफा नहीं समझ पाते। इसलिए ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी कवि ने अपनी कविता की सबसे सटीक व्याख्या की हो। मुक्तिबोध जिस तरह कामायनी की व्याख्या कर गए खुद जयशंकर प्रसाद भी नहीं कर सकते थे। की भी नहीं। कोई नहीं करता। हो सकता है मुक्तिबोध कुछ संकेत छोड़ गए हों अपने गद्य में लेकिन उनकी कविता पर बात करते हुए यह जरूरी नहीं रह जाता कि हम उनके समीक्षा औजारों से ही काम चलायें। वे कारगर नहीं होंगे। दूसरा, वह काल जब यह कविता लिखी गयी यानी पांचवें दशक के उत्तरार्ध से लेकर छठे दशक के पूर्वार्ध तक। और तीसरे, कविता लिखे जाने के बाद का समय जिसमें हम कविता का पाठ करते हैं।

    दूसरा समय कविता का वर्तमान है और वह अपने इतिहास के प्रवाह से बाहर नहीं है। हर समय की अपनी भी कुछ विशिष्टता होती है इसकी भी होगी लेकिन उनकी जड़ें भी वहीं होती हैं-अपने इतिहास में। यह सच ही कहा गया है कि इतिहास को जाने बिना आप अपने समय को भी नहीं समझ सकते। ‘अंधेरे में’ कविता के संदर्भ में यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यहां संघर्ष की निरंतरता है। आजादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि आदिवासियों से सत्ता की टकराहट जंगल के सफाये को लेकर ही हुई थी और आज भी उन्हीं संसाधनों की अंधाधुंध लूट की वजह से यह टकराहट अपने चरम पर है। अंतर सिर्फ इतना है कि पहले यह जहां सिर्फ अस्तित्व की लड़ाई से जुड़ा था वहीं इसमें आज वर्ग संघर्ष की चेतना भी आ गयी है। इसलिए यह जरूरी था कि हम उन संघर्षों पर एक सरसरी निगाह डाल लें। मैं समझता हूं कि इससे कविता समझने में आसानी होती है। संघर्ष, सत्ता के दमन और उससे टकराहट की गूंज कविता की हर पंक्ति में सुनी जा सकती है। अगर ऐसा है तो हम उसे कहां के संघर्ष से जोड़ कर देखें? छत्तीसगढ़ से सिर्फ इसलिए न जोड़ें क्योंकि मुक्तिबोध वहीं के थे? आप विश्वयुद्ध पर कविता लिखकर भी हो सकता है किसी स्थानीय कवि से ऊपर न उठ सकें और अपने बगल के जीवन पर लिखी आपकी कोई कविता हो सकता है कि विश्व कविता में स्थान पा ले। विषय से कविता के विश्वजनीन या स्थानीय होने का कोई रिश्ता नहीं। इसे मेरी सुविधा न मानें और न मुक्तिबोध के लिए ही यह कोई सुविधाजनक स्थिति रही होगी। यह मेरी सोद्देश्यपूर्ण व्याख्या हो सकती है-जैसा कि आप कह रहे हैं अभिषेक जी-क्योंकि मैं यही जानता हूं। निरुद्देश्यपूर्ण व्याख्या कैसे की जाती है मुझे नहीं मालूम। मुझे यह भी नहीं मालूम कि ऐसी भी कोई व्याख्या होती है।

  3. By Ranjit Verma on January 6, 2014 at 1:21 PM

    <2>

    दूसरे सवाल के जवाब में मुझे यही कहना है कि नामवर सिंह से मैंनें ऐसी कोई उम्मीद नहीं की है। हां, मैंने परवर्ती आलोचकों से जरूर यह उम्मीद की है कि उन्होंने नामवर सिंह को उसी तरह खारिज क्यों नही किया जिस तरह नामवर सिंह ने रामविलास शर्मा को खारिज किया था। मध्यवर्गीय नायकत्व को गरिमा प्रदान करती जो उनकी स्थापनाएं हैं वह उस वक्त के मध्यवर्ग के राजनीतिक उफान से बुरी तरह प्रभावित हैं। ’74 के जेपी आंदोलन का जिक्र भी मैंने इसीलिए अपने लेख में किया है।

    तीसरे सवाल का काफी कुछ जवाब पहले सवाल के जवाब में आ गया है इसलिए उसे दोहराने की जरूरत नहीं। जहां तक कविता को जमीन से काट देने का सवाल है तो मैं इतना ही कहूंगा कि यह आरोप निराधार है। ‘अंधेरे में’ कविता की जड़ें वहीं उसी जमीन में धंसी हैं लेकिन उसकी टहनियां हमारे समय को छू रही हैं। मैंने यही बताने की कोशिश की है। और यह भी बताने की कोशिश की है कि जड़ का जो आखिरी सिरा है वह इतिहास को छू रहा है। इस तरह कहा जा सकता है कि ‘अंधेरे मे’ कविता एक ऐसा पेड़ है जिसे इतिहास सिंचित कर रहा है जबकि सांस लेने की हवा उसे हमारे समय से मिल रही है और कविता लिखे जाने का जो समय है वह वो मिट्टी है जो इस पेड़ को थामे हुए है।

    रामजी राय ने जो सवाल उठाए हैं वे उनके नहीं हैं बल्कि ‘बहुतेरे लोग’ के हैं जैसा कि उन्होंने कहा। इसलिए मैंने इसका जवाब देना उस वक्त जरूरी नहीं समझा था। क्योंकि ‘बहुतेरे लोग’ का मतलब साफ नहीं था। फिर बाद में जब उन्होंने खुलासा किया है कि वे उत्तरमार्क्सवादी लोग हैं, तब भी मैं इसका जवाब क्यों दूं? यह सवाल रामजी राय के सामने है और वे खुद काफी सक्षम हैं उनको जवाब देने के लिए। उन्हें कुछ पूछना ही था तो अपने स्टैंड से पूछते। फिर भी कुछ सवाल बच जाते हैं जिसका जवाब तो मुझे देना ही होगा। जिस पंक्ति में रामजी राय को गड़बड़ी दिखाई दे रही है वह है, ‘दरअसल यह चेतनाधर्मी वर्ग है जो बदलाव की चाहत लिए सैकड़ों साल से संघर्षरत है।’ दरअसल वह अस्तित्व को बचाए रखने की चेतना थी, अपने सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक अस्तित्व को बचाए रखने की चेतना। फिर जैसा कि लेख में मैंने लिखा है कि विचारधारा इसमें बाद में जुड़ती है। लड़ाई वही है लेकिन अब यह वैचारिक रूप से लैस जनता की लड़ाई हो जाती है। विडंबना देखिए कि यह काम या कहा जाना चाहिए कि यह बदलाव यानी अस्तित्व की लड़ाई से क्रांतिकारी लड़ाई की ओर उनका आना तब हो रहा था जब पढ़े लिखे शहरी मध्यवर्ग के बीच स्त्री विमर्श, दलित विमर्श की चर्चा जोरों पर थी, जो विखंडनवाद था जिसे उत्तर आधुनिकतावादी सिद्धांतकार रच रहे थे ताकि संगठित होती ताकत को छिन्न भिन्न किया जा सके। अब दुर्भाग्य देखिए कि इसके जवाब में उत्तर मार्क्सवादी सिद्धांतकार सर्वहारा की नई परिभाषा गढ़ने हुए सामने आए और यह कहने से भी नहीं हिचके कि सर्वहारा अब क्रांतिकारी नहीं रहा। क्या यह समझना अब किसी के लिए मुश्किल रह गया है कि ये जो उत्तर मार्क्सवादी लोग हैं वे मार्क्सवादी नहीं हैं और चाहे जो हों। हो सकता है वे उत्तर आधुनिकतावादी लोग ही हों। बहरहाल, यहां यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि भारत में स्त्री और दलित विमर्शों के साथ आदिवासी का नाम तब तक नहीं लिया जाता रहा जब तक कि आदिवासी उन्हें एक खतरनाक क्रांतिकारी दस्ता के रूप में दिखाई देना शुरू नहीं हुआ। यह भी एक विडंबना ही है कि एक ओर उत्तरवादी सिद्धांतकार लोग हैं जो इनके वैचारिक होने को खारिज करते हैं और दूसरी ओर सत्ता की बंदूक है जो इनके होने को ही मिटाने पर तुली है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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