हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

त्रासदी, मीडिया ट्रायल और इन्साफ के सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/24/2013 02:15:00 PM

खुर्शीद अनवर की मौत से जुड़े अनेक पहलुओं पर जिस गैर जिम्मेदारी से बहसें चलाई गईं, उस लड़की के पक्ष में बोलने वालों-जिसने अपने खिलाफ अपराध की शिकायत की थी-और पूरी जांच की मांग करने वाले लेखकों, टिप्पणीकारों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ जिस तरह फेसबुक पर और उससे बाहर बदतमीजी भरी, अपमानजनक (और अनेक बार उत्पीड़न की सीमा तक जाने वाली) टिप्पणियां की गईं, वह न सिर्फ सामंती और पितृसत्तात्मक समाज के एक और अंधेरे कोने को उजागर करता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि खुद को वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील कहने वाले लोगों का एक हिस्सा इस अमानवीय, गैरजनवादी गलाजत में नाक तक डूबा हुआ है. इस पूरे मामले ने उस गैर जिम्मेदार रवैए को भी साफ साफ उजागर किया है, जिसके तहत स्त्रियों के खिलाफ पितृसत्तात्मक अपराधों के मामलों में चर्चाएं चलाई जाती हैं. हाशिया ऐसी सारी अपमानजनक टिप्पणियों, हमलों और तोहमतों की निंदा करता है और उन लोगों के साथ खड़ा है, जो यह मांग करते रहे हैं, और कर रहे हैं, कि मामले की पूरी तफसील से जांच होनी चाहिए और सच्चाई को सामने आना चाहिए. इसके साथ-साथ, मौजूदा स्थितियों में जिस तरह से उचित और संभव हो, शिकायतकर्ता लड़की के लिए इंसाफ को यकीनी बनाया जाना चाहिए.

इस मामले से जुड़े कुछ विशेष पहलुओं पर आशुतोष कुमार ने यह नोट लिखा है, जिसे हाशिया पर पोस्ट किया जा रहा है.

खुर्शीद अनवर की अस्वाभाविक मृत्यु के बाद मीडिया/सामाजिक मीडिया पर चली चर्चाओं और बहसों का जो रूप उभर कर आया है, उस से कुछ हैरतंअगेज़ सवाल उठते हैं. इन सवालों पर गौर करना हमारे दौर में न्याय की समझदारी और संभावना, न्याय के लिए किये जाने वाले संघर्ष और उसमें मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका का सटीक आकलन करने के लिए जरूरी है.

पहला सवाल: यह क्यों और कैसे मान लिया गया कि 18 दिसंबर की त्रासद घटना एक ‘आत्महत्या’ थी ?  ऐसी किसी भी घटना के बाद सहज रूप से जो पहला सवाल उठता है , वह यही होता है कि यह कोई दुर्घटना थी, अथवा ह्त्या या आत्महत्या. मौजूदा मामले में, शोक, सदमे और चिंता की व्यापक अभिव्यक्ति के बावजूद यह बुनियादी सवाल क्यों नहीं उठाया गया?  जबकि परिस्थितियाँ-व्यक्तिगत और वस्तुगत दोनों-ऐसी थीं, जो चीख-चीख कर आत्महत्या की थियरी के भोथरेपन की ओर इशारा कर रही थीं?

क्या एक ऐसे शख्स के अचानक आत्महत्या कर लेने की बात स्वाभाविक प्रतीत होती है,जो महीनों से कथित ‘मीडिया ट्रायल’ का मजबूती से, प्रभावशाली मुखरता के साथ, सामना करता आया हो? दूसरे पक्ष से जम कर बहसें की हों, उन्हें बार बार चुनौती दी हो?

जिसने किसी और के लेने के पहले खुद अपनी ओर से आरोपों के सम्बन्ध में डंके की चोट पर अपना नाम जाहिर किया हो?

जिसने अभी-अभी कथित दुष्प्रचार-कर्ताओं के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया हो?

जो बार-बार संघर्ष करने का अपना संकल्प दुहराता आया हो?

जिसने 'पीड़िता' के सामने आने और और मामले के सम्बन्ध में एफ आइ आर दर्ज किए जाने की लगातार मांग की हो?

जिसे लम्बी दुखद प्रतीक्षा के बाद अपनी निर्दोषिता साबित करने का पहला वास्तविक मौक़ा हासिल हुआ हो?

जो समझ सकता हो कि मृत्यु यह अवसर उस से अंतिम रूप से छीन सकती है?

मान भी लें कि किसी वज़ह से, गहन अवसाद के किसी तात्कालिक झोंके में, उन्होंने अपने जीवन के समापन का फैसला कर लिया तो क्या वे उसके लिए द्वारका से वसंत कुंज तक का लंबा सफर तय करने लायक समय खुद को दे सकते थे? क्या सचमुच इतना समय था उनके पास? जबकि कहा जा रहा है कि वे सुबह दस बजे अपने  दोस्त के घर से, द्वारका से, निकले और दुखद घटना का समय साढ़े दस बजे के पहले का बताया जा रहा है?

जबकि वे समझ सकते हों कि तीसरे माले की छत से गिरने पर मृत्यु सुनिश्चित नहीं है, ज़िंदगी भर की किसी भीषण शारीरिक क्षति के साथ जीवित रह जाना अधिक संभावित है?

क्या ये सारी परिस्थितियाँ चीख- चीख कर नहीं कह रहीं कि जो कुछ हुआ, वह आत्महत्या के सिवा कोई दुर्घटना या सुनियोजित ह्त्या तक हो सकती है?

तब एक बार भी यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया ?

आत्महत्या की थियरी को हवा दे कर उनके कथित मित्रो की तरफ से इस तरह के कयासों को पनपने का मौक़ा क्यों दिया गया, कि अब तक पूरी शिद्दत से लड़ते आये खुर्शीद अनवर लड़की के द्वारा आरोपों की पुष्टि होते ही खुद को अकेला और अरक्षित महसूस करने लगे?

आखिर अभी तक किसी के पास कोई आधार, कोई कारण, नहीं है, यह मान लेने का.

हो सकता है, आत्महत्या हो. लेकिन नहीं भी हो सकता है.

सवाल यह है कि इस सवाल को क्यों उठने नहीं दिया गया?

दूसरा सवाल, एकमत से कथित आत्महत्या के लिए 'मीडिया ट्रायल' को जिम्मेदार बताया जा रहा है.

लेकिन इस सिलसिले में दो जगजाहिर हकीकतों की जान बूझ कर उपेक्षा की जा रही है. एक -17 दिसम्बर के इंडिया टीवी के कार्यक्रम के पहले फेसबुक के अलावा कहीं इस प्रकरण की कोई चर्चा नहीं थी. फेसबुक पर मरहूम की सक्रियता और चर्चाकारों के खिलाफ मानहानि का उनका मुक़दमा दिखाता है कि कम से कम उसे इस हादसे का एकमात्र कारण मान लेना सहज नहीं है. तब क्या एकमात्र टीवी कार्यक्रम को मीडिया ट्रायल की संज्ञा दी जा सकती है? क्या यह संभावना नहीं हो सकती कि उन्हें सदमा मीडिया के व्यवहार से ज़्यादा अपने कथित करीबी दोस्तों द्वारा उस टीवी कार्यक्रम के तत्काल और तत्पर स्वागत से पहुंचा हो? क्या यह कोई संभावना ही नहीं है? क्या यह विचार -योग्य ही नहीं है?

अगर है, तो क्यों इसकी लगातार उपेक्षा की गयी है?

दो-  फेसबुक पर चली चर्चाएँ कभी एकतरफा नहीं थीं. रेप की कहानियां सुनाने वाले जितने थे, उनका विरोध करने वाले उनसे कई गुना ज्यादा थे. इन चर्चाओं में शुरुआत से ही 'पीडिता' का जम कर चरित्रहनन किया गया. वह भी बेहद अश्लील और हिंसक भाषा में. बार बार. सिर्फ उसे ही नहीं, जिस किसी ने उसके पक्ष में मुंह खोलने की हिम्मत की, उसे ही इस फेसबुकी हिंसा का निशाना बनाया गया.

तब 'मीडिया ट्रायल' की चर्चा चलाने वाले इस प्रसंग के इस पहलू की तरफ क्यों ध्यान नहीं दे रहे? अगर फेसबुक की भूमिका पर ही जोर दिया जा रहा है, तो पीड़िता के साथ किया गया व्यवहार उसका अनिवार्य और उतना ही तकलीफदेह हिस्सा है. इस हिस्से की सम्पूर्ण उपेक्षा को बहुत ध्यान से देखना और समझना बेहद जरूरी है. इस उपेक्षा को सिर्फ इसलिए महत्वहीन नहीं माना जा सकता कि पीड़िता एक उपेक्षित इलाके की है, गरीब है, और हमारी मित्र -परिचित नहीं है.

इन दो सवालों के जोड़ से तीसरा और सब से भारी सवाल पैदा होता है.

क्या एकतरफा 'मीडिया ट्रायल' की थियरी को एकमात्र और अंतिम सत्य के रूप में स्थापित करने के लिए ही 'आत्महत्या' की थियरी को, बिना किसी संदेह और सवाल के, प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है?

क्योंकि ये दोनों थियरियाँ एक दूसरे से जुड़ कर आसानी से भरोसा करने लायक 'खबर' बन जाती हैं. मीडिया ट्रायल की वज़ह से आत्महत्या की बात इस तरह से दिमाग में उतर जाती है कि मन में कोई सवाल ही पैदा न हो. दुर्घटना या हत्या की संभावना की ओर इशारा करने से इसमें खलल पैदा हो सकता था.

हम ये बिलकुल नहीं कह रहे कि 18 दिसम्बर का हादसा आत्महत्या हो ही नहीं सकता.

हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि ऐसा नहीं भी हो सकता है.

और यह कि इस भी का गायब हो जाना, इस संभावना का सम्पूर्ण नकार, अत्यंत आश्चर्यजनक और अस्वाभाविक बात है.

और ऐसी स्थिति में हमें अपने आप से और हर किसी से एक सवाल जरूर पूछना होगा.

किसी तात्कालिक भावनात्मक दबाव में मीडिया ट्रायल की वज़ह से आत्महत्या की थियरी को एकतरफा ढंग से, अंतिम सत्य के रूप में, प्रचारित करके क्या हम  कमजोर और उत्पीड़ित तबके के मन में उस सामाजिक मीडिया के इस्तेमाल को लेकर नए सिरे से भय और दहशत की भावना नहीं पैदा कर देंगे, जिससे पहली बार उसे आवाज की एक जगह हासिल हुई है? अभी तो जिसके पास कोई सत्ता नहीं, मीडिया नहीं, सुरक्षा नहीं, समर्थन नहीं, उसके पास सामाजिक मीडिया और उसकी आज़ादी उम्मीद की एक किरण है. इस किरण के होने भर से सत्ता तंत्रों में  भारी बेचैनी और बौखलाहट है. वे पहले से इसे बुझा देने को आतुर हैं. अगर यह शर्त लाई जाए कि जब तक अदालत में आरोप साबित न हों, तब तक उस पर चर्चा करना 'मीडिया ट्रायल' या अपराध है, तो सब से पहले और सब से ज़्यादा उत्पीड़ितों को ही इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

बेशक मीडिया ट्रायल के गम्भीर खतरे हैं. लेकिन किसी चर्चा को मीडिया ट्रायल बता कर उस पर दोषारोपण करने के पहले क्या उस चर्चा के सभी पक्षों को पर समान रूप से  ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि वह निराधार चर्चा है या उसका कोई प्राथमिक आधार मौजूद है? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि उस चर्चा के पीछे नीयत किसी अन्याय की संभावना को उजागर करने की है या उस पर पर्दा डालने की?

पिछले कई दिनों से कुछ भयभीत और कुछ भावावेशग्रस्त मित्र फेसबुक पर हमें हत्यारा घोषित करते घूम रहे हैं. हमें दिनरात अश्लील और हिंसक गालियों से नवाज रहे हैं. पीड़िता और उसके हक में कुछ भी कहने की हिम्मत करने वाले किसी भी व्यक्ति से वे ऐसा ही सलूक कर रहे हैं. हमने उन्हें जवाब नहीं दिया है, न देंगे. लेकिन हम समूची घटना की, उसके हर पहलू की, मुकम्मल जांच की मांग करते रहेंगे. यह तय है कि अदालत में दोष सिद्ध होने तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता, लेकिन यह भी तय  है कि कहीं न कहीं कोई अपराध हुआ जरूर है. अपराध की अवस्थिति इन दो पक्षों में कहीं हो हो या किसी तीसरे पक्ष में. उसका पता चलना ही चाहिए ताकि निर्दोषता स्थापित हो सके और दोष उजागर.

इससे आगे बढ़ कर हम यह मांग भी करते हैं कि इस प्रसंग में हुए समूचे मीडिया-प्रकरण की  जांच की जाए. सभी संबधित लोगों और एजेंसियों की भूमिकाओं की जांच की जाये , जिससे पता चले कि किस ने कहाँ कहाँ अपराध के इलाके में आवाजाही की है.

चूंकि झूठ का चौतरफा प्रचार चल रहा है, सिर्फ मित्रों और शुभ-चिंतकों के लिए,  हम यहाँ यह भी दर्ज करना चाहते हैं कि इस मामले में हमारी वास्तविक भूमिका क्या रही है. हमारे पास जब इसे लाया गया तब हमने ऐपवा की नेता कविता कृष्णन के साथ मशविरा किया और जो इसे ले कर आये थे, उनको दिवंगत के अपने संस्थान में आतंरिक और गोपनीय जांच के लिए ले जाने की सलाह दी.

हमने आज तक सिर्फ एक बार इस घटना के बारे में फेसबुक पर लिखा है. निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए एक छोटा सा नोट. यह नोट 18 दिसंबर को 11 बजे पोस्ट किया गया. यानी मर्मान्तक घटना के वास्तव में घटित हो चुकने के बाद, हालांकि हमें तब तक उसकी जानकारी नहीं हुई थी. कुछ ही समय बाद, फेसबुक से ही हमें हादसे की जानकारी हुई और हमने शोक और सदमे के हवाले से उसे तत्काल हाइड कर दिया और अपनी दीवार पर दर्ज कर दिया दिया कि अगर जरूरत हुई तो इसे अन्हाइड भी किया जा सकेगा. लेकिन वह सुरक्षित है, और उन लोगों के नाम भी सुरक्षित हैं, जिहोंने उसे लाइक किया, लेकिन जिनमें से कई अब हमें संगसार करने के अभियान में शरीक हो गए हैं.  कोई त्रासदी दूसरी से कमतर नहीं होती. हम बीती हुई त्रासदियों को मिटा नहीं सकते, लेकिन आने वाली त्रासदियों से बचने के लिए उनसे सीखने की कोशिश जरूर कर सकते हैं.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ त्रासदी, मीडिया ट्रायल और इन्साफ के सवाल ”

  2. By Anonymous on December 24, 2013 at 4:34 PM

    फर्जी लेख है यही नेता था उस कैम्पेन का जहाँ से परीशान होकर उन्होंने मौत का रास्ता चुना

    PRAVIN YADAV

  3. By vstoic on December 24, 2013 at 5:00 PM

    आशुतोष जी का यह हस्तक्षेप जरूरी था। बेहद संतुलित और जिम्मेदाराना वक्तव्य, जिसकी आशुतोष जी से अपेक्षा थी। जिस तरह के विष-वमन और पागलपन की नाटकीयता से ओत-प्रोत झटके मारे मारे जा रहे हैं,वैसे में किसी भी महिला के लिए यह समय बहुत ही पीड़ादायी है। 'कथित बलात्कार' की जगह अगर सचमुच में भी बलात्कार होगा तो शायद ही कोई लड़की कहीं किसी को बताने को तैयार होगी। क्योंकि, उस पर हमेशा यह नैतिक डर हावी रहेगा कि कहीं उसके द्वारा दर्ज एक प्रथिमिकी के चलते कोई आत्महत्या नहीं कर ले। इसलिए यह समय न्याय और पीड़िता के पक्ष में खड़ा होने वाला समय है। एक ज़िम्मेदार समाज का फिलहाल यही कर्तव्य है। आशुतोष जी आपने सही लिखा है- "हम बीती हुयी त्रासदियों को मिटा नहीं सकते , लेकिन आने वाली त्रासदियों से बचने के लिए उनसे सीखने की कोशिश जरूर कर सकते है।"
    इस लेख के लिए आपको साधुवाद, आप विश्वास के लायक हैं।

  4. By धीरेश सैनी on December 25, 2013 at 8:59 PM

    यह शर्मनाक है कि मीडिया ट्रायल का विरोध करने वालों ने अपने लिखे के जरिये लड़की के साथ इससे भी ज्यादा भयानक बर्ताव किया। यह भी दर्ज है कि इस लड़की से भी आगे जाकर महिलाओं के लिए बना कानूनों को निशाना बनाया गया और बेहद हिंसक और अश्लील भाषा में फारुख अब्दुल्ला के बेहूदा बयान को दोहराया गया।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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