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बीच सफ़हे की लड़ाई

प्यासी है नील: मिस्र के क्रांतिकारी शायर अहमद फवाद नज्म की कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/13/2013 06:32:00 PM






अल-फोगामी के नाम से मशहूर इन्कलाबी शायर अहमद फवाद नज्म का इस 3 दिसंबर को इंतकाल हुआ. अरबी भाषा के इस मिस्री शायर को अवामी और इन्कलाबी शायर माना जाता रहा है. नज्म को अपने राजनीतिक नजरिए के कारण कई बार जेल जाना पड़ा. वे मिस्र के राष्ट्रपतियों गमाल अब्दुल नासिर, अनवर सादात और होस्नी मुबारक के तीखे आलोचक थे. कविताएं लिखने के अलावा वे गाते भी थे और संगीतकार शेख इमाम के साथ मिलकर उन्होंने अनेक यादगार संगीत प्रस्तुतियां दीं. पेश है उनकी कुछ चुनी हुई कविताएं. ये हिंदी अनुवाद अरबी से अंग्रेजी में वाला किसे द्वारा किए गए अनुवाद पर आधारित हैं. हिंदी अनुवाद: रेयाज उल हक

कौन हैं वे और हम कौन हैं?


कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
दौलत और ताकत वाले
और हम गरीब और महरूम
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
अंदाजा लगाओ कि कौन किसका हुक्मरान है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
हम वे हैं जो बनाते हैं हर चीज, हम मजदूर
हम अल-सुन्ना हैं, हम हैं अल फर्द
हम ऊंचे और चौड़े
हमारी सेहत से फलती हैं जमीन
और हमारे पसीने से मैदानों में भरती है हरियाली
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसकी सेवा कर रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
हवेलियां और कारें उनकी
और चुनी हुई औरतें
हवस से भरे हुए जानवर
उनका पेशा है अपनी अंतड़ियां भरना
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको खा रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
हम ही तो जंग हैं, उसका पत्थर और उसकी आग
हम वो फौज हैं जो जमीन को आजाद कराती है
हम शहीद हैं
चाहे हारें या जीतें
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको मार रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
वे महज संगीत के पीछे की तस्वीरें हैं
वे सियासत के लोग
कुदरती तौर से खाली दिमाग
लेकिन सजावटी रंगीन तस्वीरें
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको धोखा दे रहा है?

कौन हैं वे और हम कौन हैं?
वे हैं शहजादे और सुल्तान
वे पहनते हैं सबसे ताजा फैशन
मगर हम रहते हैं एक कमरे में सात
वे खाते हैं गोश्त और मुर्ग
और हम महज फलियां और कुछ नहीं
वे घूमते हैं निजी हवाई जहाजों में
और हम ठुंस कर चलते हैं बसों में
उनकी जिंदगी सुंदर और सजीली
वे एक नस्ल हैं और हम दूसरी
जरा सोचो, और अंदाजा लगाओ...
कौन किसको हराएगा?

प्यासी है नील


प्यासी है नील
ओ लड़कियों, नील प्यासी है
मुहब्बत के लिए, माजी की यादों में डूबी हुई
किनारों पर
न रोशनी है
न हवा का एक भी झोंका
न ही नी
और न जूही

ओ शाहिंदा, सुनाओ अपनी दास्तान
ओ अम्मा, अपनी उदास आवाज में
ओ अम्मा, खेतों की तरह हरी आंखों के साथ
जिनमें कुलांचे भरते हैं जंगी घोड़े
अल कानातर जेल कैसी है?
कैसे हैं कैदी?
जेल में तुम्हारे कॉमरेड कैसे हैं?

ओ चरागाह की रोशनियों
ओ मिस्र, तुम कैदियों से भरे हुए हो
और तुम्हारी पोशाकें हैं
जेल की कोठरियां

और तुम्हारे फैले हुए खेत
सिकुड़ कर फंदे में कस लेते हैं किसानों को
चिमनियों का धुआं
मजदूरों के रंग का है

कोड़े मारने वालों की चोटों में फंसी हुई
ओ नील की नन्हीं लड़की
इस दौर में कोई अंतरा नहीं है
लेकिन लाखों हैं बहादुर
जो अपने हर कदम पर सोचते हैं
बचते हैं कानून की मुठभेड़ से
लेकिन जब वक्त आता है
अजदहे की पीठ पर सवार
सारी रुकावटों को तोड़ डालते हैं वे
और गिरा देते हैं सारी जेलें.
---
शाहिंदा: एक नासिरवादी कार्यकर्ता हैं, जिनके पति की 1966 में जमींदारों ने हत्या कर दी थी क्योंकि वे कृषि सुधारों की हिमायत कर रहे थे.
अल कानातिर जेल: काहिरा की एक जेल
अंतारा: अरबी नज्दी हीरो और शायर

हड़ताल


अवाम के खुदा के नाम पर
हड़तालियों के खुदा
फाकाकश
महरूम
इतने बरसों से

शहरों की दास्ताने गाने वालों
आओ और हमारे शहरे के बारे में गाओ
यहां हैं हम
हमेशा की तरह वादे पर कायम

कितनी प्यारी हैं नज्में और गीते
तल्ख मेहनत के दिनों में
मुहब्बत के बारे में कही गई बातें कितनी प्यारी हैं?
तंगी के इन दिनों में

हम वे हैं जो रास्ता भूल गए
और बिखर गए
एक दूसरे से
लेकिन जेलों में हम मिलेंगे
आह कॉमरेडों
रास्तों की भूलभुलैया से
जब रातों में
चांद दबा हुआ होता है
जब एक दोस्त चलते हुए अंधेरे में
टकरा जाता है
अपने किसी दोस्त से
और महज दो कदमों से शुरू हुआ सफर
जारी रहता है बरस भर

कहां हैं हम आज?
और कितने हैं हम?
कल कितने होंगे?
और कहां होंगे?
रोज हम जाते हैं एक जगह
लेकिन गिनती बढ़ती जाती है

हर रोज
हम खोलते हैं दरवाजे
और हर रोज
हम मिटाते हैं अपनी बाधाएं
हर रोज
हम खड़ी करते हैं इमारतें
हर रोज
हम हटाते हैं मलबा
हर रोज हम भर जाते हैं गीतों से
हर रोज
हम जन्म देते हैं मदाद को

हमें रहना होगा इसी तरह
जेलों के भीतर
जेलों के बाहर
कितनी प्यारी हैं नज्में और गीत
तल्ख मेहनत से भरे इन दिनों में
और कितना हैरान कर देने वाला है वो हरा तना
खंडहरों के वसंत में
हम वे हैं जो रास्ता भूल गए और
हरेक ने
मिलकर
लिखा किताब का एक एक पन्ना

नफरत के काबिल हैं
वे पीठें जो शर्मिंदगी में झुक गईं
सरकार के रहनुमा के आगे और खान के आगे
नफरत के काबिल हैं वो शब्द जो गले में रह गए
ताकि जबान की बातें जाहिर न होने पाएं
गुलामी में सराबोर
नफरत के काबिल है रोटी का हर वो टुकड़ा जो जलालत में डूबा हुआ है
नफरत करो कायरों से

ओ कॉमरेडो
तुम्हीं ने बख्शी पत्थरों को ठोस ताकत
मैं तुम्हें पुकारता हूं
डूबे हुए दिल की गहराइयों से
नीरसता और ऊब के बीच से

तुम, जो सुबह के करीब हो
इसकी रोशनी और इसकी बुलंदी के,
आवाजों को जमा करो
मसजिदों में
और सुनो
शहर की गाती हुई चीखों को जो गुमनामी से जाग उठी हैं
एक हो
एक हो
एक हो
---
मदाद: सूफियों का एक गीत

हमारे राष्ट्रपति के साथ क्या मुश्किल है?


मैं कभी खीझता नहीं, और मैं हमेशा जो कहूंगा
उसके लिए मैं जिम्मेवार हूं
कि राष्ट्रपति एक रहमदिल इंसान हैं
लगातार वे अपने अवाम के लिए काम करने में लगे रहते हैं
लगे रहते हैं उनका पैसा बटोरने में
बाहर, स्विटजरलैंड में, उसे हमारे लिए जमा करते हुए
खुफिया बैंक खातों में
हमारे भविष्य की फिक्र में बेचारा आदमी
क्या तुम उसकी रहमदिली को नहीं देख सकते?
ईमान और भलमनसाहत के साथ
वे महज तुम्हें भूखा ही तो रखते हैं, ताकि तुम अपना वजन घटा सको
उफ, कैसी जनता हो तुम! खाने की भूखी
कैसी नादानी! तुम ‘बेरोजगारी’ की बात करते हो
और कैसे हालात नाकारा बन गए हैं
यह आदमी तुम्हें बस आराम करता देखना चाहता है
आखिर आराम कब से बोझ बन गया है?
और ये रिजॉर्टों की बातें
उन्हें राजनीतिक जेलें क्यों कहा जाता है?
इतना शक्की होने की क्या जरूरत है?
वे तो चाहते हैं कि आप थोड़ा मजे करें
जहां तक ‘द चेयर’ की बात है
बिना किसी शक के
यह हमारी गलती है!!
क्या हम उन्हें एक टैफ्लॉन चेयर नहीं खरीद सकते थे?
मैं कसम खाता हूं, तुमने इस बेचारे को गलत समझा है
उसने अपनी पूरी जिंदगी गंवा दी, और किसके लिए?
यहां तक कि तुम्हारा खाना तक उसने खाया, तुम्हारी भलाई के लिए!
अपने रास्ते की हर चीज को निगलता रहा
इतने सबके बाद, हमारे राष्ट्रपति के साथ मुश्किल क्या है?

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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