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बीच सफ़हे की लड़ाई

'साँवला रंग' और कवि के मन का 'हरापन'

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/27/2013 05:49:00 PM


श्रम का नया सौंदर्यशास्त्र

रणेन्द्र के कविता संग्रह थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ पर भावना बेदी की टिप्पणी। रणेन्द्र का पहला उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता चर्चित रहा था और 2014 की शुरुआत में उनका दूसरा उपन्यास गायब होता देश प्रकाशित होने वाला है।

सहज संगति की चाह
पूरी हो कामना अनंतिम इसलिए
थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ
  ...
हरियाली से गुजरता
हरा होना चाहता हूँ

थोड़ा सा स्त्री होने की इच्छा ने मानो कवि के घर की देहरी पर दस्तक दी है, ये दस्तक एक जटिल और गहरा बोध है। जीवन को उसकी संपूर्णता में जानने का, उसे जीने का।

कवि की सर्जना का हरापन स्वयं उसके द्वारा ही निर्मित (कल्पनीय) नहीं है। उस हरेपन में हरे का अधिकांश रंग हर उस स्त्री के श्रम से आता है; जो खेतों, पगडंडियों, पहाड़ों, जंगलो और सूदूर बीहड़ों में जीवन को सबसे अधिक संभव बना रही है। अवसाद के इन बीहड़ों में जीवन हर रोज़ अपनी अंतिम साँसे लेता जरूर है, पर संघर्ष से उपजी जीजीविषा को हरा नहीं पाता। श्रम की उष्मा से उजाला फैलाने वाली ये आदिवासी युवतियाँ संभाव्य संसार की सर्जना करती रहती हैं। उनकी सर्जना से उगा यह हरा रंग ही कवि की स्मृति में बस गया है और चेतना से रिसकर अब कविता में बोलने लगा है।
कविता का यह बोलना कुछ ऐसे ही है जैसे घर के सदस्यों का आपस में बातचीत करना। इस प्रसंग में मराठी कवि वाहरू सोनवणे का कविता के विषय में कहा एक व्यक्तिगत अनुभव याद आता है, “एक गांव में एक झोपड़ी के आगे 15-20 लोग इकट्ठे होकर बैठे हुए थे। उनमें कुछ बूढ़ी औरतें भी थी। वे कविता क्या है, समझते ही नहीं थे। कविताओं के बारे में उनकी समझ क्या है मैंने यह जानना जरूरी समझा। मैंने अपनी कविताओं की डायरी निकाली और भिलोरी कविताएँ पढ़ने लगा। मेरी कविताएँ सुनने के बाद उन आदिवासी खेत मजदूरों ने वाह-वाह नहीं की, हँसने लगे और आखिर में बहुत गंभीर होकर कहने लगे, “सही है भाई! सच है। ये कविता नहीं यह तो हमारा जीवन ही है, जिसे तुमन जस का तस उतार कर रख दिया है।''

कवि रणेन्द्र की ये कविताएँ भी सजधज कर बहुमूल्य पोशाक पहने वाह!वाह! की गड़गड़ाहट के बीच कवि समाज और आलोचकगणों में उच्च पद पर आसीन होने की चाहत नहीं रखतीं। वह तो उन मजदूरों, किसानों और नौजवानों की संगीसाथी बनना चाहती हैं जो क्रांतिकारी गीत गाते हुए हजारों के हुजूम में राजपथ की सड़कों तक पहुंच चुके हैं। वे विकास के उस तथाकथित सच पर हमला करना चाहती हैं जो आँखों पर पट्टी बांधे चल रहा है। इसलिए वह सलवा जुडूम के दानवी शासकों को देख नहीं पाता। वे रंग की उस राजनीति पर हमला करना चाहती हैं जिसके चलते सांवले और जामुनी रंग को सुंदरता के प्रतिमानों से खारिज किया जाता रहा है।

‘थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ‘ संग्रह की अधिकतर कविताएँ सौन्दर्य और श्रम में एक सुन्दर संबंध बनाती दिखती हैं। इस सौन्दर्य के दो रूप हैं एक तरफ है मज़दूर योद्धा का सौन्दर्य। इस संदर्भ में कविता की कुछ पंक्तियो देखिए-

पूस माह में भी
तर-तर छूट रहा पसीना
फटी गंजी, घुटने लुंगी...
छिलन-चोट के लाल निशान
तमणे से चमचमा रहे
बूघन कमाण्डो के सीने पर ...
देगा वह बलिदान
न बिगुल/न तिरंगा/न कोई चक्र/न सम्मान!
हमारा वीर बहादुर/जनरल-मार्शल/बूधन जवान।“

दूसरा सौन्दर्य है बैंजनी, गंदुमी और जामुनी रंग की आदिवासी युवतियों का जो बाज़ार में बिकते सौन्दर्य वर्धक औजारों पर निर्भर नहीं है। उन्हे उस धूप से बचना नहीं पड़ता जिसमें शहरी गौरापन कुम्लाने लगता है। बलिक उनका जामुनी रंग धूप में ही पक कर जवान हुआ है इसलिए वह एक स्वाभिमान है, उनकी अपनी पहचान है। इस गर्वीले रंग ने निश्चय ही कवि की दीठ को बाँध दिया है।
‘जामुनी रंग‘ और ‘सांवरी‘ कविताओं की ये पंक्तियाँ देखिए-

‘‘दुपहर निकौनी कर
जीमनें बैठी
आदिवासी युवतियाँ...
रूप पर पसीने की लड़ियाँ
पारदर्शी मोतियों की
गहने की कड़ियां
     पर सच है
सब पर भारी था
हाय! वह जामुनी रंग‘‘

“तुम्हारी निगाहों से
नाक की तीखी कोर से
पसीने का बूँद से
बिखरता
नमक का एक कण
शत-शत अमृत कलशों पर
भारी है
हे साँवरी!''

एक तरफ घर के बाहर धूप में पकता सौन्दर्य है तो दूसरी तरफ घर के भीतर चुल्हे की आँच में आकार लेता सौन्दर्य है। कवि के अनुभव ने इस अनुपम सौन्दर्य को अपनी कविता में बहुत सहजता से पिरोया है।

‘‘चूल्हे की आँच में
दमदम दमकते नक बेसर पर
श्रम बूंदों के अमोल मोती,
बलि-बलि जाएँ जिन पर
सौ-सौ पूनो के चाँद
हे चान्दो! साँवर गुईयाँ!!‘‘

रणेन्द्र की इन कविताओं में ग्रामीण स्त्रियों का यह सौन्दर्य चाहे वो साँवर गुईयाँ विगत यौवना हो, बूधन बिरिजिया हो, बीड़ी का कश भरती स्त्री हो, धनरोपनी करती माँ या पन्नाद्याय हो ये सभी स्त्रियाँ अपने शाशवत सवालों का हल ढूँढ़ने घर से निकलती है। वे शाशवत सवाल किसी ईश्वर को पा लेने के नहीं अपने घर-गृहस्थी में, अपने समाज में जीवन को सम्मान से जीने के, उसे हर मुश्किल में संभव बनाने के हैं। हर घर में उजाला लाने के लिए हर घर से निकली इन स्त्रियों को कोई सिद्धार्थ सा नहीं कहता, ये प्रायः पुरुषशासित समाज में उपेक्षित रहती हैं। रणेन्द्र की कविताओं में इन स्त्रियों के श्रम को सौन्दर्य से जोड़ा गया है। कवि को ये स्त्रियाँ सुंदर प्रतीत होती हैं, क्योंकि ये सर्जना करती हैं। धूप-हवा और बतास सहती तुफानों के आगे दीवार की तरह डटने वाली ये आदिवासी स्त्रियाँ, रचती हैं सैकड़ों गीत और करती हैं प्रकृति से प्रेम और प्रकृति भी उपहार स्वरूप देती है उन्हें माटी की गंध और जंगलों का साँवलापन।
ये जामुनी रंग एक मेहनतकश रंग है ये सत्ता और शक्ति प्राप्त गोरे रंग की तरह विज्ञापन की कैद में रहना नहीं चाहता। ये खुद का शासक है। ये प्रकृति में उन्मुक्त विचरण चाहता है। ये ऐसा सौन्दर्य नहीं है जिसके लिए प्रचलित उपमा दी जाए “इसको भगवान (ग्लोबल देवता) ने फुरसत में बनाया है।” बल्कि इसे तो श्रम करते सर्वहारा ने गढ़ा है। कवि के शब्दों में -

“आत्मा के चकमक पत्थर से
सुलगाती है आग
ब्रह्मा को बाँयी और खिसका
खुद सृष्टा होती है स्त्री”

सर्जनधर्मी जामुनी रंग को रणेन्द्र के काव्य संग्रह “थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ“ के माध्यम से एक जन पहचान मिली है एक नया सौन्दर्य शास्त्र गढ़ा गया है। रंग की राजनीति के वर्चस्व पर हमला बोला है।

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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