हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कॉमरेड: शुभम श्री की नई कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2013 03:31:00 PM

शुभम श्री की नई कविताएं.


कॉमरेड

(1)
पूरी शाम समोसों पर टूटे लोग
दबाए पकौड़े, ब्रेड रोल
गटकी चाय पर चाय
और तुमने किया मेस की घंटी का इंतजार
अट्ठाइस की उम्र में आईना देखती
सूजी हुई आंखें
कुछ सफेद बाल, बीमार पिता और रिश्ते
स्टूडियो की तस्वीर के लिए मां का पागलपन
घर
एक बंद दरवाजा
---
हमारी आंखों में
तुम हंसी हो
एक तनी हुई मुट्ठी
एक जोशीला नारा
एक पोस्टर बदरंग दीवार पर
एक सिलाई उधड़ा कुर्ता
चप्पल के खुले हुए फीते की कील
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम
भी हो तुम चुपके से
---
यूं ही गुजरती है ज़िंदगी
पोलित ब्यूरो का सपना
महिला मोर्चे का काम
सेमिनारों में मेनिफेस्टो बेचते
या लाठियां खाते सड़कों पर
रिमांड में कभी कभी
अखबारों में छपते
पर जो तकिया गीला रह जाता है कमरे में
बदबू भरा
उसे कहां दर्ज करें कॉमरेड?

(2)
टेप से नापकर 20 सेंटीमीटर का पोल और उसका शरीर
बराबर हैं
तिस पर एक झलंगी शर्ट 90 के शुरुआती दिनों की
और जींस पुरातत्व विभाग का तोहफ़ा
पैंचे की सिगरेट के आखिरी कश के बाद भी
पराठे का जुगाड़ नहीं
तो ठहाके ही सही
सेकेंड डिवीजन एम.ए, होलटाइमर
मानसिक रोगी हुआ करता था
पिछले महीने तक
दिवंगत पिता से विरासत में पार्टी की सदस्यता लेकर
निफिक्र खिलखिलाता
ये कॉमरेड
दुनिया की खबर है इसे
सिवाय इसके कि
रात बाढ़ आ गई है घर में
पंद्रह दिनों से बैलेंस जीरो है !

भाकपा (माले)

पापा का मर्डर
चाचा लापता
ड्राइंग बेरंग
निकर बड़ी
नंबर कम
डांट ज्यादा
पेंसिल छोटी
अंगूठा बड़ा
---
इससे पहले कि ग्रेनाइट चुभ जाए
गोलू ने लगाई रेनॉल्ड्स की ठेपी पेंसिल के पीछे
सो पेंसिल भी गिरी कहीं बैग के छेद से
अब जो जोर-जोर से रो रहा है गोलुआ
इसको अपना पेंसिल दे दें?

मोजे में रबर

वन क्लास के गोलू सेकेंड ने
क्लास की मॉनीटर से
सुबह सुबह अकेले में
शर्माते हुए
प्रस्ताव रखा-
अपनी चोटी का रबर दोगी खोल कर?
‘सर मारेंगे’
‘दे दो ना
सर लड़की को नहीं मारेंगे
मेरा मोजा ससर रहा है !’

मेरा बॉयफ्रेंड

(छठी कक्षा के नैतिक शिक्षा पाट्यक्रम के लिए प्रस्तावित निबंध)

मेरा बॉयफ्रेंड एक दोपाया लड़का इंसान है
उसके दो हाथ, दो पैर और एक पूंछ है
(नोट- पूंछ सिर्फ मुझे दिखती है)
मेरे बॉयफ्रेंड का नाम हनी है
घर में बबलू और किताब-कॉपी पर उमाशंकर
उसका नाम बेबी, शोना और डार्लिंग भी है
मैं अपने बॉयफ्रेंड को बाबू बोलती हूं
बाबू भी मुझे बाबू बोलता है
बाबू के बालों में डैंड्रफ है
बाबू चप चप खाता है
घट घट पानी पीता है
चिढ़ाने पर 440 वोल्ट के झटके मारता है
उसकी बांहों में दो आधे कटे नीबू बने हैं
जिसमें उंगली भोंकने पर वो चीखता है
मेरा बाबू रोता भी है
हिटिक हिटिक कर
और आंखें बंद कर के हंसता है
उसे नमकीन खाना भौत पसंद है
वो सोते वक्त नाक मुंह दोनों से खर्राटे लेता है
मैं एक अच्छी गर्लफ्रेंड हूं
मैं उसके मुंह में घुस रही मक्खियां भगा देती हूं
मैंने उसके पेट पर मच्छर भी मारा है
मुझे उसे देख कर हमेशा हंसी आती है
उसके गाल बहुत अच्छे हैं
खींचने पर 5 सेंटीमीटर फैल जाते हैं
उसने मुझे एक बिल्लू नाम का टेडी दिया है
हम दुनिया के बेस्ट कपल हैं
हमारी एनिवर्सरी 15 मई को होती है
आप हमें विश करना
*मेरा बॉयफ्रेंड से ये शिक्षा मिलती है कि
बॉयफ्रेंड के पेट पर मच्छर मारना चाहिए
और उसके मुंह से मक्खी भगानी चाहिए ।


बूबू

दूदू पिएगी बूबू
ना
बिकिट खाएगी
डॉगी देखेगी
ना
अच्छा बूबू गुड गर्ल है
निन्नी निन्नी करेगी
ना
रोना बंद कर शैतान, क्या करेगी फिर ?
मम्मा पास

बूबू-2

खिलौने सीज़ हो गए तो
पेन के ढक्कन से सीटी बजाई
डांट पड़ी
तो कॉलबेल ही सही
ड्राइंग बनाई दो चार
और कपड़े रंग डाले
अखबार देखा तो प्रधानमंत्री का श्रृंगार कर दिया
मूंछे बना दी हीरोइनों की
मन हुआ तो
जूतों के जोड़े बिखेरे
नोचा एक खिला हुआ फूल
चबाई कोंपल नई करी पत्ते की
हैंडवॉश के डब्बे में पानी डाला
पिचकारी चलाई थोड़ी देर
रसना घोला आइसक्रीम के लिए
तो शीशी गिराई चीनी की
चॉकलेट नेस्तनाबूद किए फ्रिज से
रिमोट की जासूसी की
शोर मचाया जरा हौले हौले
कूदा इधर उधर कमरे में
खेलती रही चुपचाप
पापा जाने क्या लिख रहे थे सिर झुकाए
बैठी देखती रही
फिर सो गई बूबू
सपने में रोया
पलंग से गिरी अचानक
तो बुक्का फाड़ के रोया
अभी पापा की गोद में
कैसी निश्चिंत सोयी है छोटी बूबू

उस लड़के की याद

तीन दिन की शेव में
हर लड़का हॉट लगता है
(ऐसा मेरा मानना है)
और जिम के बदले
अस्पताल में पड़ा हो हफ्ते भर
तो आंखें दार्शनिक हो जाती हैं
पीली और उदास
जलती हुई और निस्तेज
बिना नमक की हंसी और सूखी मुस्कुराहटें
चले तो थक जाए
भरी शाम शॉल ओढ़ कर शून्य में ताके
एक बार खाए, तीन बार उल्टी करे
दुबक जाए इंजेक्शन के डर से
उस लड़के के उदास चेहरे पर हाथ फेरती लड़की
मन ही मन सोचती है
मैं मर जाउं पर इसे कुछ न हो
बीमार लड़के प्रेमिकाओं पर शक करने लगते हैं
मन नहीं पढ़ पाते बीमार लड़के

सफल कवि बनने की कोशिशें

ऐसा नइ कि अपन ने कोशिश नइ की
सूर्योदय देखा मुंह फाड़े
हाथ जोड़े
जब तक रुक सका सूसू
चांद को निहारा
मच्छरों के काट खाने तक
हंसध्वनि सुना किशोरी अमोनकर का
थोड़ी देर बाद लगावेलू जब लीपीस्टिक भी सुना
कला फिल्में देखीं
कला पर हावी रहा हॉल का एसी
वार एंड पीस पढ़ा
अंतर्वासना पर शालू की जवानी भी पढ़ी
बहुत कोशिश की
मुनीरका से अमेरिका तक
कोई बात बने
अंत में लंबी गरीबी के बाद अकाउंट हरा हुआ
बिस्तर का आखिरी खटमल
मच्छरदानी का अंतिम मच्छर मारने के बाद
लेटे हुए
याद आई बूबू की
दो बूंदें पोंछते पोंछते भी चली ही गईं कानों में
तय करना मुश्किल था
रात एक बजे कविता लिखने में बिजली बर्बाद की जाए
या तकिया भिगोने में
अपन ने तकिया भिगोया
आलोचक दें न दें
अलमारी पर से निराला
और बाईं दीवार से मुक्तिबोध
रोज आशीर्वाद देते हैं
कला की चौखट पर
बीड़ी पिएं कि सुट्टा
व्हिस्की में डूब जाएं कि
पॉकेट मारी करें
सबकी जगह है ।

औरतें

उन्हें एशिया का धैर्य लेना था
अफ्रीका की सहनशीलता
यूरोप का फैशन
अमेरिका का आडंबर
लेकिन वे दिशाहीन हो गईं
उन्होंने एशिया से प्रेम लिया
यूरोप से दर्शन
अफ्रीका से दृढ़ता ली
अमेरिका से विद्रोह
खो दी अच्छी पत्नियों की योग्यता
बुरी प्रेमिकाएं कहलाईं वे आखिरकार

जब तक भाषा देती रहेगी शब्द

साथ देगा मन
असंख्य कल्पनाएं करूंगी
अपनी क्षमता को
आखिरी बूंद तक निचोड़ कर
प्यार करूंगी तुमसे
कोई भी बंधन हो
भाषा है जब तक
पूरी आजादी है ।

प्यार

गंगा का
सूरज का
फसलों का
फूलों का
बोलियों का अपनी
और
तुम्हारा
मोह नहीं छूटेगा
जैसा भी हो जीवन
जब तक रहेगी गंध तुम्हारे सीने की जेहन में
मन नहीं टूटेगा।

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  1. 17 टिप्पणियां: Responses to “ कॉमरेड: शुभम श्री की नई कविताएं ”

  2. By Anil on October 29, 2013 at 4:09 PM

    बहुत बढ़िया कविताएं हैं. हिंदी कब तक इन कविताओं से आंखें फेरे रहेगी?

  3. By Uday Prakash on October 30, 2013 at 12:12 PM

    Breathtakingly, gripping,sensuously penetrating deep down with enviable brilliance, truthfully painstaking...ideologically indivisible from a life lived ....

    ...and playfulness with words and structuring a poem...
    Entirely new and fresh in contemporaneity....

    One can write such dozens of sentences but falling short always in appreciating these poems by Shubham Shri.

    I convey my pleasure with all imaginable sincerity ...

  4. By ranjan on October 30, 2013 at 7:55 PM

    kya baat hai! bahut din baad aisi kavita pardhi. chehere pe hansi bhi fail gayi, aur dil me kuch chubh sa bhi gaya!

  5. By शायक आलोक on October 31, 2013 at 12:14 AM

    शुभम श्री को पढना सुखद है .. बहुत बढ़िया एक्सप्रेस करती है .. या यूँ कहूँ कि जब हमारी ही बातों को शुभम अपने तरीके से कहती है तो उसका सम्प्रेषण कहीं गहरे पहुँचता है

  6. By शायक आलोक on October 31, 2013 at 12:15 AM

    शुभम श्री को पढना सुखद है .. बहुत बढ़िया एक्सप्रेस करती है .. या यूँ कहूँ कि जब हमारी ही बातों को शुभम अपने तरीके से कहती है तो उसका सम्प्रेषण कहीं गहरे पहुँचता है

  7. By Unknown on October 31, 2013 at 2:29 AM

    बहुत ताकतवर कवि हैं शुभम श्री

  8. By Ashok Pande on October 31, 2013 at 12:59 PM

    बहुत बहुत दिनों बाद कुछ बिलकुल नया ... बेहद सहज भी और ज़ोखिम ले लेने की ताब से भरपूर. बधाइयां और शुभ.

    और हाँ सबसे ज़रूरी बात. शुक्रिया.

  9. By Dee on October 31, 2013 at 10:34 PM

    Like

  10. By Dee on October 31, 2013 at 10:36 PM

    Good

  11. By Pramod Ranjan on July 14, 2016 at 1:08 AM

    बहुत सुन्दर कवितायेँ।

  12. By Pramod Ranjan on July 14, 2016 at 1:09 AM

    बहुत सुन्दर कवितायेँ।

  13. By Samba Dhakal on July 14, 2016 at 5:36 AM

    वाह खुब !

  14. By Samba Dhakal on July 14, 2016 at 5:36 AM

    वाह खुब !

  15. By Ajay Rohilla on July 14, 2016 at 7:04 AM

    बहुत खूब !

  16. By Ajay Rohilla on July 14, 2016 at 7:04 AM

    बहुत खूब !

  17. By VIPLAV on August 4, 2016 at 2:46 AM

    चलती भाषा में चलाऊ कविता.... दिल 💕 को छूकर निकल गई

  18. By Sumit on August 5, 2016 at 9:26 PM

    Aaj padha Shubham Shree. Adbhud!! Behad naya tevar. Khoobsurat. Bhavishya Hindi ka surakshit hai!! Kavita ka bhi. Badhai Shubham!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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