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बीच सफ़हे की लड़ाई

यह व्यवस्था दलितों को न्याय नहीं दे सकती

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/11/2013 06:13:00 PM


हाल में लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार पर उच्च न्यायालय द्वारा रणवीर सेना से जुड़े अभियुक्तों को बरी कर दिए जाने के फैसले पर पटना (बिहार) स्थित एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान के निदेशक डीएम दिवाकर की टिप्पणी. बीबीसी हिंदी डॉट कॉमसे साभार.
 
बिहार के जहानाबाद ज़िले के लक्ष्मणपुर और बाथे गांव में 58 लोग मारे गए थे, मारे जाने वालों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी थे. ऐसे मामले में सभी अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया जाना न केवल दलितों के ख़िलाफ़ है बल्कि इस न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर भी एक बड़ा धब्बा है.

न्यायलय का यह फ़ैसला दुर्भाग्यपूर्ण और शॉकिंग है. न्यायालय इस बात पर चुप है कि ये 58 लोग कैसे मारे गए और उसके अभियुक्त कौन थे.

अगर यह व्यवस्था इतनी अपंग है कि वो 58 लोगों के नरसंहार का साक्ष्य नहीं खोज पा रही है तो उसे कोई हक नहीं कि वो दलितों और ग़रीबों को इस संविधान, न्यायालय और पुलिस की दुहाई दे. आख़िरकार यह व्यवस्था किस आधार पर ग़रीबों को इस व्यवस्था पर भरोसा करने को कह सकती है.

हम गर्व करते हैं कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं लेकिन इस व्यवस्था में दलितों और ग़रीबों को न्याय नहीं मिला तो वे इस संविधान पर से विश्वास खो देंगे.

संसदीय राजनीति की इस प्रक्रिया और इसके संविधान में कहा गया है कि हम एक साथ रहेंगे, हम कोई विभेद नहीं करेंगे, समानता का अवसर होगा.

हमारा पहला मौलिक अधिकार है जीने का अधिकार. इस संसदीय संविधान के तहत यह अधिकार ही सुरक्षित नहीं है.

अगर यह संविधान ग़रीबों को उनके मौलिक अधिकार की सुरक्षा नहीं दे सकता तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए, इसकी व्याख्या होनी चाहिए.

हमारे देश के राष्ट्रपति कई बार कह चुके हैं कि अगर ग़रीब तक न्याय नहीं पहुँचेगा तो लोकतंत्र की सुरक्षा नहीं हो सकती.

अगर लोकतंत्र समाज को यह विश्वास नहीं दिलाता है कि यह न्याय व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था ग़रीबों को न्याय और सुरक्षा दे सकता है तो यह लोकतंत्र अपना नैतिक आधार खो देगा.

अगर लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा तो वो कानून अपने हाथ में लेंगे और लोग कानून अपने हाथ में लेंगे तो समाज में अवव्यवस्था फैलेगी.

कुछ लोग इसे जाँच व्यवस्था की ख़ामी मात्र बता रहे हैं. इसे ख़ामी तब माना जा सकता था जब कुछ मामले में यह व्यवस्था न्याय करती और कुछ मामलों में काम नहीं करती.

जिस तरह दलितों के नरसंहार के विभिन्न मामले में अभियुक्त बरी होते जा रहे हैं उससे पता चलता है कि यह एक साज़िश है.

जब किसी मज़दूर को पकड़ना होता है तो पुलिस के पास ढेरों मुखबिर होते हैं लेकिन जब अमीरों को पकड़ना होता है तो इनके मुखबिर न जाने कहाँ चले जाते हैं.

अगर सरकार पुलिस व्यस्था के प्रति सख़्ती नहीं बरतती तो दलितों का सरकार से भी भरोसा उठ जाएगा.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके पहले ऐसे ही एक मामले में उच्च न्यायलय के फैसले के ख़िलाफ उच्चतम न्यायालय जाने की बात कही थी. सरकार गई भी.
बेलावर, बिहार, रणवीर सेना

बिहार के बेलावर गाँव में गठित हुई रणवीर सेना के ऊपर इन नरसंहार में शामिल होने का आरोप लगता रहा है.

लेकिन यह केवल ऊपरी अदालतों तक जाने का मामला नहीं है.

अगर सरकार केवल उच्चतम न्यायालय में जाकर चुप रह जाती है और ऐसे मामलों की जाँच के लिए अपने प्रशासन और पुलिस महकमे पर दबाव नहीं बनाती तो दलित इस सरकार पर से भरोसा खो देंगे और इस सरकार के प्रति दलित का रवैया बदल जाएगा.

मेरा मानना है कि इस फ़ैसले का न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा. यह फ़ैसला देश के ग़रीबों को अपने ढंग से एकजुट होने का आधार देगा जो इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होंगे.

मैं मानता हूँ कि भारतीय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, सुरक्षा और सत्ता का स्वरूप आज भी दलित के पक्ष में न्याय देने की स्थिति में नहीं आ पाया है.

दलित आंदोलन को इसे अपने गहराई और मजबूती से इसे हल कर सकता है. यह व्यस्था इसे मदद करने की स्थिति में नहीं है. यह निर्णय इस बात का एक प्रमाण है.

रुपा झा से बातचीत पर आधारित. बीबीसी हिंदी से साभार.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ यह व्यवस्था दलितों को न्याय नहीं दे सकती ”

  2. By शुभम on October 12, 2013 at 11:45 AM

    लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह गया है अब । बेहतर है संविधान जैसी चीजों की बात न की जाए ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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