हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

ब्लैक हिल्स से बस्तर तक: दमन, प्रतिरोध और सैंडविच सिद्धांतकार

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/20/2013 01:21:00 PM

सुष्मिता

आपने अमरीका के ब्लैक हिल्स के दमन और प्रतिरोध की गाथा जरूर सुनी होगी। यह अमरीका के दक्षिणी डकोटा में पहाड़ियों की एक श्रृंखला़ है जहां सोना मिलने की चर्चा हुई थी। करीब 150 साल पहले ब्लैक हिल्स में सोने के खदानों पर कब्जे के लिए मुनाफाखोर बाहरी लोगों ने एक बड़ा हमला किया था। वहां के मूल निवासियों (रेड इंडियंस) को उनकी जमीन से बेदखल करने के लिए किया गया यह हमला जनसंहारों, समझौतों और हमलों के जरिए उन्हें बेदखल करने का क्लासिक उदाहरण बन गया। लेकिन साथ ही यह प्रतिरोध की मिसाल बनकर इतिहास की गाथाओं में भी अमर हो गया। आज जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए लड़ने वाले तमाम आदिवासियों के लिए यह एक सबक है। आज करीब डेढ़ सदी के बाद लगभग वही खेल हमारे देश के हृदयस्थल छतीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा में खेला जा रहा है। हालांकि जनता के प्रतिरोध ने सरकार के पूरे खेल को ही बिगाड़ दिया है और उसकी सारी गणनाओं और गुणा-भाग को नकारा बना दिया है।

देश की जनता के खिलाफ शासक वर्गों द्वारा छेड़े गए युद्ध ऑपरेशन ग्रीन हंट के लगभग तीन साल पूरे हो गए हैं। इन तीन सालों में इस युद्ध ने दमन के नए-नए स्वरूपों को आख्तियार किया है। हालांकि दमन के इन भिन्न रूपों ने विभिन्न तरह के प्रतिरोधों को भी जन्म दिया है। ऑपरेशन ग्रीन हंट के शुरुआती दौर में शासक वर्ग जहां विभिन्न तरह के विजिलांते गैंगों यानी हत्यारे गिरोहों पर निर्भर था, वहीं आज जनसंहार के जरिए आतंक कायम करने का स्वरूप प्रधान हो गया है। नियमित कॉम्बिंग ऑपरेशन, इलाकों की घेरेबंदी, तलाशी, जनसंहार और जनता में आतंक बनाए रखने के लिए उनकों उत्पीड़ित करने जैसे तरीकों का इस्तेमाल काफी आम है। एक तरफ गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे हवाई हमलों के जरिए माओवादियों को नेस्तनाबूद कर देने के लिए बेचैन हैं वहीं हिंदू फासीवादी ताकतें सेना भेजकर सबकुछ कुचल देने की ख्वाहिश रखती हैं। संसदीय वामपंथी पार्टियों का गठजोड़ जनता में सुधार तेज करने पर जोर देता है। शासक वर्ग इस युद्ध को एक मुकाम पर जल्दी ले जाने के लिए बेचैन है। ऐसे में यह सवाल बनता है कि उन इलाकों में माओवादियों की उपस्थिति के चालीस साल बाद आज अचानक क्या हो गया है? आखिर खनिज संपदा को निकाल लेने में सरकार को इतनी जल्दबाजी क्यों है? इन सारे सवालों के जवाब भारत के राजनीतिक-आर्थिक सवालों और शासक वर्गों के संकट से जुड़े हुए हैं।

राजनीतिक-आर्थिक संकट और युद्ध

1947 में सत्ता हस्तांतरण के समय अंग्रेजों ने यहां के जमींदार और बड़े पूंजीपतियों के हाथ में सौंप दी। इसमें अंग्रेजों ने भारत में साम्राज्यवादी हित भी बरकरार रखे। इसके मद्देनजर जो आर्थिक नीति अपनायी गयी वह नेहरू-महलानोबिस मॉडल के नाम से मशहूर है। दरअसल इसने देश के विकास की मुख्य संरचनात्मक बाधा कृषि संबंधों में बगैर कोई बदलाव किए यहां के जमींदारों और पूंजीपतियों के हित में आर्थिक नीतियां बनायीं। इसकी वजह से अधिकतर जनता बेहद निर्धनता की जिंदगी गुजारती रही। कृषि संबंधों में अर्धसामंती संबंध बरकरार रहने से गरीब जनता की क्रय क्षमता को बढ़ाना संभव नहीं हुआ। कृषि विकास में मौजूद संरचनात्मक बाधा से उपजे अंतर्विरोधों की वजह से 1960 के दशक के मध्य तक यह मॉडल पूरी तरह धराशायी हो गया। दुनिया के स्तर पर भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद आयी तेज उछाल जमीन पर औंधे मुंह आ गिरी थी। कीन्सीय अर्थशास्त्र का जादू भी अब बेकार हो गया था। इन सबने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाला। 1960 के दशक के अंत तक कारखानों में बड़े पैमाने पर छंटनी और मजदूरों के संघर्ष की घटना आम हो गयी। मुद्रास्फीति में भी लगातार वृद्धि हो रही थी। तमाम उद्योग अपनी क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रहे थे। इसके बावजूद उत्पादित माल को बेच पाना संभव नहीं हो रहा था। यह संकट लगातार गहराता गया। इसने मजदूरों और किसानों के गहन संघर्षों को जन्म दिया। नक्सलबाड़ी आंदोलन भी इसी पृष्ठभूमि में खड़ा हुआ आंदोलन था। शासक वर्ग का संकट निरंतर बढ़ता गया और जन संघर्ष लगातार तीखे होते गए। ऐसे में 1970 का दशक दमन और प्रतिरोध का दशक हो गया। शासक वर्गों के संकट को ध्यान में रखते हुए तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश की औपचारिक संसद को भी रद्द करते हुए 26 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी। बड़े पैमाने पर दमन और हत्या का अभियान चलाया गया। डीआईआर और मीसा जैसे दमनकारी कानूनों के तहत तमाम हड़तालों और आंदोलनों को प्रतिबंधित कर दिया गया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गयीं। आपातकाल का असली लक्ष्य हमें जेआरडी टाटा के इस बयान से पता चलता है जो उन्होंने बंबई में एक पत्रकार को बातचीत के दौरान दिया था। उनका कहना था, ‘चीजें काफी आगे निकल गयी हैं। हम यहां जिन हड़तालों, बहिष्कारों और प्रदर्शनों के दौर से गुजर रहे हैं आप उनका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। इन वजहों से मैं उन दिनों अपने कार्यालय से बाहर गलियों में भी नहीं टहल सकता था। संसदीय व्यवस्था हमारी जरूरतों से मेल नहीं खाती है।’ इस तरह बड़ी पूंजी के हित में शासक वर्ग ने संसदीय व्यवस्था को खारिज कर दिया और इस दौरान बड़ी पूंजी के हित में काफी नयी नीतियां बनायी गयीं और उन्हें काफी रियायतें प्रदान की गयीं। सबसे पहले निर्यात आधारित 15 इंजीनियरिंग उद्योगों को अपनी लाइसेंस की क्षमता से 25 फीसदी अधिक क्षमता के स्वतः विस्तार की अनुमति दे दी गयी। 25 अक्तूबर, 1975 को मंझोले आकार के 21 उद्योगों को लाइसेंस से रियायत दे दी गयी। विदेशी कंपनियों और बड़े एकाधिकारी घरानों को 30 महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपने लाइसेंस से असीमित विस्तार की छूट दे दी गयी। सीमेंट, इस्पात और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं पर सरकारी नियंत्रण को काफी ढीला कर दिया गया। कॉरपोरेट कर और व्यक्तिगत आय पर कर में काफी अधिक छूट दी गयी। उच्च तकनीक और उच्च निर्यात उद्योगों में विदेशी कंपनियों को क्रमशः 51 फीसदी और 74 फीसदी मालिकाने की अनुमति दी गयी। तीखे दमन और हत्या के जरिए प्रतिरोधों को कुचलकर मुनाफाखोर कंपनियों के लिए एक माकूल माहौल बनाया गया।

इन रियायतों और मजदूर वर्ग पर बर्बर दमन की बदौलत फिर थोड़े समय के लिए संकट टल गया लेकिन तब भी 1981 में भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के पास हाथ फैलाना पड़ा। इस कर्जे के एवज में भारत सरकार ने कई सार्वजनिक उपक्रमों में निजी कंपनियों को हिस्सेदारी बांटी। इसके बाद भी संकट का कोई हल नहीं निकला और 1991 में अर्थव्यवस्था बुरी तरह संकट ग्रस्त हो गयी। सरकार के पास अपने आयातों का भुगतान करने के लिए भी विदेशी मुद्रा नहीं रह गया था। ऐसे में भारत सरकार ने आइएमएफ की तमाम शर्तों को स्वीकार करते हुए कर्जा लिया। आइएमएफ ने कर्जे के एवज में भारत सरकार को स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट प्रोग्राम लागू करने के लिए बाध्य किया। इस कार्यक्रम का मकसद बाजार के हित में पूरी अर्थव्यवस्था को रिस्ट्रक्चर करना था। पूरी अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय निगमों और कंपनियों के लिए खोल दिया गया। इसकी शर्तों के अनुरूप राजकोषीय घाटा कम करने के नाम पर तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को घाटे में दिखाकर निजी हाथों में नीलामी की प्रक्रिया शुरू की गयी। सार्वजनिक खर्चों में लगातार कटौती की गयी। भारतीय बाजार की क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए बड़े पैमाने पर बाहरी कंपनियां आयीं। एक तरफ उन्होंने कर्ज दिया तो दूसरी तरफ बाजार पर कब्जा कर लिया। विश्व बैंक और आइएमएफ द्वारा निर्देशित इन नीतियों ने थोड़े समय के लिए राहत दी और इनसे अर्थव्यवस्था में एक हद तक उछाल आयी। लेकिन 21वीं सदी के पहले दशक में यह गुब्बारा फूटने लगा और शासक वर्ग फिर 1991 के आर्थिक संकट की तरह ही एक नये संकट में घिरने लगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 1991 के दौर का भूत इस कदर परेशान करने लगा कि उन्होंने 2012 के सितंबर में पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य को मुक्त करने और खुदरा बाजार में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत देने के पक्ष में बात करते हुए कहा, ‘अगर हमने अब भी कुछ नहीं किया तब विदेशी निवेशकों के साथ-साथ घरेलू फर्म भी हमारी अर्थव्यवस्था में निवेश करने से कतराने लगेंगे। पिछली बार 1991 में हम ऐसे ही संकट में फंस गए थे। उस समय हमें कोई छोटी राशि भी उधार देने के लिए तैयार नहीं था। हमें अपनी अर्थव्यवस्था में विश्वास खत्म होने से पहले ही गतिशील हो जाना चाहिए।’

दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने फिर से भुगतान संतुलन का संकट पैदा हो गया है। इसने न केवल तथाकथित विकास के वर्तमान दौर बल्कि पूरे शासक वर्ग को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। अर्थशास्त्र में पढ़ाया जाता है कि मुक्त अर्थव्यवस्था में प्रतिकूल भुगतान संतुलन खुद ही एक साम्य यानी संतुलन की स्थिति में आ जाती है। यह बताता है कि प्रतिकूल भुगतान संतुलन की वजह से आयात महंगा हो जाता है और देश का निर्यात सस्ता हो जाता है। इससे आयात की मांग में कमी होती है और इसी समय सस्ता होने की वजह से निर्यात के लिए मांग बढ़ जाती है। इस तरह अर्थव्यवस्था में आयात-निर्यात में फिर एक संतुलन की स्थिति के आने से भुगतान संतुलन में एक संतुलन की स्थिति बनती है। लेकिन भारत में आज यह सिद्धांत कोई काम नहीं कर रहा। महंगे आयात के दौर में भी आयात के लिए मांग में कोई कमी नहीं हो रही है। इस तरह भुगतान संतुलन के मोर्चे पर काफी बुरी स्थिति बन गयी है। इसकी बड़ी वजह भारत में असमानता का काफी बढ़ना है। हाल के दिनों में भारत में एक ऐसे वर्ग का विकास हुआ है जिसकी आय पर मंदी और संकट का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन बहुमत जनता की बदहाली की वजह से बाजार का विस्तार संभव नहीं हो पाया है।

भारत सरकार का वस्तुओं का व्यापार घाटा (आयात-निर्यात का अंतर) 2000-2001 में 2.6 फीसदी से बढ़कर 2012-2013 में 10.9 फीसदी हो गया है। पहले सरकार का यह घाटा अदृश्य खाते (सेवा, विदेशों में भारतीयों की आय, विदेशों में भारतीय निवेश पर प्राप्त आय और भारत में विदेशी निवेश पर अदायगी) के जरिए पूरा होता था। इस व्यापारिक खाते और अदृश्य खाते के जोड़ को ही चालू खाता कहा जाता है। भारत सरकार का व्यापारिक खाता घाटा अदृश्य खाते पर आमदनी से काफी अधिक रहा है। इसलिए हमेशा ही चालू खाते पर घाटे की स्थिति रही है। 2003 के बाद चालू खाते पर घाटे की स्थिति ज्यादा ही बुरी हो गयी है। 2004-05 में अदृश्य खाता जहां 92.6 फीसदी व्यापारिक घाटे को पूरा करता था वहीं 2012-2013 में यह महज 52.9 फीसदी ही पूरा कर पा रहा है। 2011-2012 के पहले और 1947 के बाद सबसे अधिक चालू खाता घाटा और जीडीपी का अनुपात 1957-1958 (3.1 फीसदी) और 1990-1991 (3 फीसदी) में था। 2011-2012 में यह 4.2 फीसदी पर पहुंच गया और 2012-2013 में इसके 5 फीसदी पर पहुंचने का अनुमान है। आरबीआई लगातार तीन तिमाही में 2.5 फीसदी से अधिक चालू खाता घाटा और जीडीपी के अनुपात को अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं मानता है। 2012-2013 में चालू खाता घाटा की राशि 94.2 अरब डॉलर के आंकड़े को छू गयी है। वर्तमान में इस घाटे को विदेशी निवेश और विदेशी कर्जों से प्राप्त धन से पूरा किया जाता रहा है।

आज भारत का कुल बाहरी कर्ज मार्च, 2009 में 225.5 अरब डॉलर से बढ़कर दिसंबर, 2012 में 376.3 अरब डॉलर हो गया है। इसके अलावा विदेशी निवेश पर भी सरकार को देनदारी चुकानी होती है। इस तरह भारत की कुल विदेशी देनदारी (विदेशी कर्ज और विदेशी निवेश) मार्च, 2009 में 409 अरब डॉलर से बढ़कर दिसंबर, 2012 में 723.9 अरब डॉलर हो गया है। एक अध्ययन बताता है कि भारत के कुल राष्ट्रीय आय के प्रतिशत के रुप में विदेशी निवेश और कर्जों पर भारत सरकार की देनदारी  ब्रिटिश राज के अधीन प्रतिशत के रुप में भारत से वार्षिक पूंजी की निकासी के लगभग बराबर था। इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने भुगतान संतुलन को अनुकूल बनाए रखना काफी मुश्किल हो गया है। इस खतरे को पाटने के लिए भारत सरकार के सामने अब और कोई रास्ता नहीं है। विदेशी एवं देशी बड़े पूजीपतियों को रियायतों के जरिए विदेशी पूंजी को आमंत्रित करने और अर्थव्यवस्था को बचाए रखने की तमाम कोशिश बेकार साबित हो गयी है। विदेशी निवेश को लाने के नाम पर सरकार ने जुलाई में टेलीकॉम और कुछ अन्य क्षेत्रों में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत दे दी है। हालांकि इससे भी कितना फायदा होगा यह कहना मुश्किल है। आज तमाम अधिकारियों एवं सरकारी विशेषज्ञों के चेहरे पर 1991 की तरह एक दुसरे संकट की चिंता साफ झलक रही है। इस संकट की मूल वजह है बहुमत जनता की गरीबी की वजह से उसकी क्रय क्षमता का नहीं बढ़ना। कृषि विकास की संस्थागत बाधाओं को दूर किए बगैर इसे हासिल कर पाना भी मुश्किल है। भारतीय शासक वर्ग ने इसे पूरा किए बगैर ही पूंजी को छूट देकर और जनता पर दमन के जरिए जितनी भी कोशिशें कीं, उनसे तात्कालिक राहत तो जरूर मिली, लेकिन उसने संकट से कोई निजात नहीं दिलाया। ऐसे मंे भारत सरकार के पास एक आसान रास्ता है तमाम प्राकृतिक संपदा को विदेशी कंपनियों के हाथों में बेच देना। 2003-04 से शुरू हुए इस संकट को पाटने के लिए भारत सरकार ने इसी रास्ते का चयन किया और तमाम जंगलों-पहाड़ों को बहुराष्ट्रीय निगमों और बड़े पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया। हालांकि जनता के प्रतिरोध ने सरकार की इस योजना को नाकाम कर दिया है। ऐसे में जेआरडी टाटा के शब्दों में बड़ी पूंजी और साम्राज्यवादी ताकतों को एक फासीवादी राज्य की जरूरत है। भारत सरकार उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही एक समन्वित युद्ध की जल्दबाजी में है। अब अर्थव्यवस्था से और अधिक अतिरिक्त मुनाफा यानी सरप्लस वसूलने की तमाम सामान्य कोशिशें बेकार साबित हो चुकी हैं। कर्जों और विदेशी निवेशों के जरिए अर्थव्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश भी अब विफल हो गयी है। इस तरह अर्थव्यव्स्था का यह पूरा मॉडल ही खतरे में है। अब ऐसे में इस पूरे तंत्र को बचाए रखने के लिए देश के संसाधनों को बेचना ही एकमात्र रास्ता रह गया है। इसके लिए शासक वर्गों को एक मिलिटरी स्टेट या फिर फासीवादी स्टेट जैसे राजनीतिक तंत्र की जरूरत है। यह युद्ध भी शासक वर्ग की इन जरूरतों का ही हिस्सा है।

आखिर यह कैसा युद्ध है?

सबसे पहले वाजपेयी सरकार के शासनकाल में यह बात स्थापित करने की कोशिश की गयी कि देश की खनिज संपदा पर नक्सलवादी जमे हुए हैं। इसके बाद से ही एक योजनाबद्ध दमन की शुरुआत हुई। इसके संचालन के लिए वाजपेयी सरकार ने 2003 में एक यूनिफाइड कमांड बनायी। यह यूनिफाइड कमांड मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान ज्वाइंट ऑपरेशनल कमांड में बदल गयी। 2006 से ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताना शुरू किया। इसके बाद ठोस रूप से गृहमंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में एक समन्वित युद्ध की शुरुआत हुई। गृहमंत्री ने माओवादियों के सफाये के लिए पहले सौ दिनों का एक कैलेंडर बनाया। फिर इसे एक साल और फिर तीन साल कर दिया गया। माओवादियों और आम जनता की तरफ से तीव्र प्रतिरोध ने तत्कालीन गृहमंत्री की समूची योजना पर पानी फेर दिया। 2009 आते-आते यह तीखा दमन पूरी तरह एक युद्ध में तब्दील हो गया। इसमें सीमा पर इस्तेमाल होने वाले तमाम विध्वंसक हथियार, हवाई निगरानी, ड्रोन आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। ऐसे में इस युद्ध के चरित्र और लक्ष्य को समझना काफी जरूरी है।

देश के आर्थिक हालात से स्पष्ट है कि यह युद्ध साम्राज्यवाद और बड़ी पूंजी की रक्षा और उनके हित में छेड़ा गया है। इसका मूल मकसद देश के प्राकृतिक संसाधनों पर इन मुनाफाखोर ताकतों को कब्जा दिलाना और जनता के तमाम प्रतिरोधों को कुचलकर शासक वर्गों के लिए एक उपयुक्त माहौल उपलब्ध कराना है। ताकि इस संकट का तमाम बोझ आम जनता के सिर पर डाल दिया जाये। इस युद्ध की योजना से लेकर क्रियान्वयन और तकनीक भी साम्राज्यवादी ताकतें उपलब्ध करवा रही हैं। यह युद्ध महज माओवादियों के खिलाफ नहीं है बल्कि उन तमाम लोगों के खिलाफ है जो साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ खड़े हैं।

आज तमाम संघर्षों पर शासक वर्ग ऐसे ही दमन कर रहा है। कुडनकुलम में परमाणु रिएक्टर के खिलाफ, असम में विस्थापन के खिलाफ, उड़ीसा में पोस्को के खिलाफ संघर्ष, दिल्ली में मारुति के मजदूरों के संघर्ष सहित तमाम संघर्षों को कुचलने के लिए बर्बर दमन चलाया जा रहा है। जो भी संघर्ष समझौताविहीन तरीके से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं उन पर माओवादी होने का ठप्पा लगाकर उनको दमन का शिकार बनाया जा रहा है। दरअसल शासक वर्गों की चिंता यह है कि इन संघर्षों की बागडोर कहीं माओवादियों के हाथों में न आ जाये। शासक वर्ग जानता है कि बुरे दमन के दौर में भी आंदोलनों को नेतृत्व देने के लिए उपयुक्त संरचना और जज्बा केवल माओवादियों में ही है। इसलिए साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ तमाम संघर्षों को एकदम शुरू से ही कुचला जा रहा है। हाल ही में उत्तर-पूर्व में राष्ट्रीयताओं के संघर्षों के भी माओवादियों के हाथों में आने की चर्चा शुरू हुई है। इसका मतलब है कि उत्तर-पूर्व में भी दमन के एक नये अभियान की शुरुआत होने वाली है। शासक वर्ग द्वारा छेड़ा गया यह युद्ध प्रतिरोध की तमाम जनवादी और देशभक्त ताकतों के खिलाफ है लेकिन चूंकि माओवादी इस प्रतिरोध के सबसे अग्रिम और मुकम्मल मोर्चे पर हैं इसलिए इस युद्ध के सबसे पहले निशाने पर वे ही हैं।

दमन और प्रतिरोध

दुनिया में वर्ग समाज के अस्तित्व के साथ ही वर्गीय शोषण की शुरुआत हुई और शोषण को निरंतर जारी रखने के लिए दमन का तंत्र विकसित किया गया। इस तरह दमन का सीधा संबंध शोषण के साथ रहा है। जैसे-जैसे शोषण तेज हुआ है इसको जारी रखने के लिए दमन भी तेज हुआ है। शोषण-दमन से उपजे विक्षोभ ने प्रतिरोधों को भी जन्म दिया। प्रतिरोध का स्वरूप हमेशा दमन के स्वरूप पर ही निर्भर रहा है जबकि दमन का स्वरूप शोषण के स्वरूप पर निर्भर करता है। इस तरह शोषण, दमन और प्रतिरोध के बीच द्वंद्वात्मक संबंध रहा है। शोषण का स्वरूप जब-जब तीखा हुआ है इसको जारी रखने के लिए तीखे दमन का सहारा लिया गया है। इसकी वजह से तीखे प्रतिरोध भी पैदा हुए हैं। जब शोषण की तीव्रता काफी बढ़ जाती है तब जनता के अंदर का विक्षोभ एक ठोस शक्ल ले लेता है और दमन के तमाम औजारों को चुनौती देते हुए उठ खड़ा होता है। तमाम काल में विद्रोहों का यही स्वरूप रहा है।

इस तरह द्वंद्वात्मक तरीके से देखा जाए तो दमन ही प्रतिरोध के स्वरूप को निर्धारित करता है। आज जब साम्राज्यवादी और बड़ी पूंजीपतियों की लूट अपने चरम पर पहुंच गयी है-इसको सुचारू रूप से चलाने के लिए दमन के स्वरूप और तंत्र भी निर्धारित किए गए हैं। आज इसने एक युद्ध का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। भारत में 1947 के बाद अब तक का यह सबसे तीखा युद्ध है। सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक तमाम क्षेत्रों में आज साम्राज्यवाद के साथ ऐसा तालमेल है जो अबतक के इतिहास में नहीं देखा गया है। इस तरह इस युद्ध ने तमाम क्षेत्रों में एक संगठित स्वरूप ले लिया है।

ऐसे में भारत में जो संसदीय वामपंथी और शासक वर्गीय ताकतें माओवादियों के प्रतिरोध को ही दमन का कारण बताते हैं, वे पूरी तरह अपने धोखाधड़ी भरे और अवैज्ञानिक नजरिए को ही सामने रखता है। बल्कि ऐसा करके ये ताकतें भारत के शासक वर्गों के साथ ही इस युद्ध के पक्ष में खड़ी होती हैं और शासक वर्ग द्वारा जनता के संघर्षों को कुचल देने को जायज ठहराती हैं। आज जब शासक वर्ग दमन के सबसे उच्च स्तर यानी युद्ध की हालत में है, ऐसे में प्रतिरोध का स्वरूप भी इस दमन के स्वरूप से निर्धारित होगा, न कि हमारे अपने मन में बनाए गए आकलनों से। इतिहास में ऐसा कभी नहीं रहा कि प्रतिरोधों की वजह से दमन शुरू हुआ हो बल्कि प्रतिरोध तो हमेशा दमन की वजह से ही शुरू हुए हैं। ऐसे में प्रतिरोध को स्वरूप की बहसों में उलझाना न केवल इतिहास के अनुभवों को नकारना है बल्कि शासक वर्ग के साथ ही खड़ा होना है। जहां तक प्रतिरोध में हिंसा का सवाल है तो हिंसा तो प्रकृति में ही निहित है। मानव अस्तित्व का सवाल भी इस प्राकृतिक हिंसा के प्रतिरोध से जुड़ा हुआ है। मानव विकास का सिद्धांत हमें बताता है कि जो भी जीव प्राकृतिक हिंसा का प्रतिरोध करने में विफल रहे हैं, उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया। साम्राज्यवादी लूट और बड़े पूंजीपतियों के हित में छेड़े गए इस युद्ध का प्रतिरोध की जनवादी और देशभक्त ताकतों की गोलबंदी और उनके प्रतिरोध से ही संभव होगा। इसे प्रतिरोध के स्वरूप की बहस में उलझाना न केवल साम्राज्यवादी ताकतों के मंसूबों को सफल बनाने के बराबर होगा, बल्कि प्रतिरोध को ही नष्ट कर देने के बराबर होगा।

भारत में एक अन्य धारा है जो सरकारी बलों और माओवादियों की लड़ाई के बीच में आदिवासियों को फंसा हुआ मानती है। इनका मानना है कि माओवादियों का प्रतिरोध ही आदिवासियों को दमन का शिकार बना रहा है। इस तरह आदिवासियों पर शोषण-दमन के लिए ये माओवादियों को ही मूल जिम्मेवार मानते हैं। ये असल में शासक वर्गों की लडाई का मकसद ही नहीं समझ पाते, इसलिए प्रतिरोध को भी नहीं समझ पाते। दुनिया की तमाम लड़ाइयों में ऐसे लोग रहे हैं जिनमें कुछ लोग जहां जीवन-मौत की लड़ाई में शामिल होकर अन्याय पूर्ण युद्ध का प्रतिरोध करते हैं वहीं कुछ ऐसे लोग होते हैं जो तमाशबीन की तरह इसका आनंद लेते हैं और सही-गलत का केवल फैसला देते हैं। रॉबर्ट वेल ने अपने लंबे आलेख (Is the Torch Passing? The Maoist Revolution in India) में ऐसे लोगों के बारे में ठीक ही कहा है, ‘‘उत्पीड़ित जनता का बहुमत इस लड़ाई के बीच में नहीं फंसा है बल्कि उन्होंने तो अपना निर्णय ले लिया है लेकिन समाज के ‘प्रभावी’, ‘स्पष्टभाषी’ समेत प्रगतिशील और वामपंथी लोग इसके बीच में खुद को उलझा हुआ महसूस कर रहे हैं। सैंडविचेज-जिसका नाम सामंतों के लिए अंग्रेजी में एक विशेष पदवी पर रखा गया है-संसदीय लोकतंत्र जैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक आयात की तरह है। भारतीय वामपंथियों के बारे में यह कहना ज्यादा माकूल होगा कि वे उस सर्वव्यापी सादी रोटी की तरह हैं जो हल्के या मसालेदार, शाकाहारी या मांसाहारी किसी भी सब्जी के साथ चलती है। भारत में वामपंथियों और प्रगतिशील संगठनों ने इसी तरह असीमित दृष्टिकोण और प्रस्थापना अपनायी हुई हैः संसदीय और गैरसंसदीय, माक्र्सवादी और गांधीवादी, हिंसक और अहिंसक। अगर आकलन किया जाए तो यहां अकेले कम्युनिस्ट पार्टियों की संख्या तीस है। इनमें से आधे बड़े या छोटे, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय नक्सलवादी हैं।’’

जनता की ताकत में विश्वास कमजोर होने की वजह से कई ताकतें शासक वर्गों के अंतर्विरोधों में ही अपनी जगह तलाशती हैं। इस तरह ये न केवल राजनीतिक विकल्प को कमजोर करती हैं बल्कि शोषण के पुराने तंत्र को भी टिकाये रखने में मदद करती हैं। 1970 के दशक के बाद से ही यह प्रचारित किया जाने लगा कि अब संस्थागत प्रतिरोधों का कोई मतलब नहीं रह गया। इस प्रक्रिया में जनता के संस्थागत प्रतिरोधों को खत्म करने के लिए स्वतःस्फूर्त प्रतिरोधों को खड़ा करने की कोशिश की गई। शासक वर्गों और फासीवादी ताकतों के लिहाज से यह काफी माकूल भी था क्योंकि जनता के भीतर की उथल-पुथल और गुस्से को एक संगठित या क्रांतिकारी प्रतिरोध की षक्ल देने के बजाए यह इस आक्रोष को संगठित और ठोस बदलावों (क्रांति) से दूर करते हुए उसे नाकाम बना देनेवाले सेफ्टी वाल्व के रूप में यह काम कर रहा था। इसके लिए एनजीओ काफी सटीक संस्था थे। इन स्वतःस्फूर्त प्रतिरोधों के झंडाबरदार सामराजी पैसों पर पलनेवाले ये एनजीओ अब एक्टिविस्ट बन गए। जाहिर तौर पर स्वतःस्फूर्त प्रतिरोधों के लिए जगह संस्थागत प्रतिरोध की ताकतों की समझौतावादी नीतियों ने ही उपलब्ध करवायी।

जयराम रमेश का अभियान

जब बर्बर युद्ध के जरिए भी शासक वर्ग प्रतिरोध को खत्म नहीं कर पा रहा तब वह दुनिया के प्रतिरोध विरोधी अपने अनुभवों के आधार पर अलग-अलग तरीके इस्तेमाल कर रहा है। सैनिक भाषा में इस समग्र रणनीति को कम तीव्रता वाला युद्ध कहा जाता है। यह विद्रोहों के खिलाफ अपनायी जाने वाली एक ठोस साम्राज्यवादी रणनीति है जिसमें युद्ध के सैनिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तमाम पहलुओं को शामिल किया जाता है। भारत में भी इस रणनीति का इस्तेमाल 1990 के दशक के उतरार्ध से ही शुरू हो गया। जनता के विकास के नाम पर अपनाये जाने वाले सुधार भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। यहां सरकार ने प्रतिरोध वाले इलाकों के लिए एक इंटिग्रेटेड एक्शन प्लान बनाया। इस प्लान में हमला और सुधार दोनों को साथ-साथ चलाने की बात है। यह वैसा ही सुधारवादी प्लान है जो अमरीका के ब्लैक हिल्स से रेड इंडियंस को विकास और सभ्य बनाने के नाम पर रिजर्वेशन में ले जाने के लिए अपनाया गया था और अंततः वुंडेड नी में एक जनसंहार के जरिए उन्हें खत्म कर दिया गया था। आज भारत में इसी इंटिग्रेटेड एक्शन प्लान को लागू करने के लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने दिन-रात एक कर दिया है। उन्होंने इसकी शुरुआत सारंडा से की और फिर इसे झारखंड के अन्य इलाकों, उड़ीसा और छतीसगढ़ तक विस्तार दिया। सारंडा में इसका नाम सारंडा एक्शन प्लान दिया गया। इतना ही नहीं, आदिवासियों पर जयराम रमेश का इस कदर दिल आ गया कि उन्होंने अपना नाम जयराम रमेश मुंडा रख लेने की घोषणा की। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मरने के बाद सारंडा में ही दफनाया जाना चाहिए। लेकिन उनके विकास की पोल तभी खुल जाती है जब सारंडा एक्शन प्लान की हकीकत सामने आती है। सारंडा एक्शन प्लान का खाका केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय, झारखंड सरकार, एनजीओ और विश्व बैंक के अधिकारियों के एक दल ने बनाया है। इस दल में तीन अधिकारी विश्व बैंक के थे। इसमें आदिवासियों को साइकिल, रेडियो, सोलर लैंप और फॉरेस्ट एक्ट के तहत 4 हेक्टेयर जमीन देने जैसी बातें हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे ब्लैक हिल्स के रेड इंडियंस को पूरा जंगल, शिकार और चरागाह छोड़ने के एवज में जमीन का एक छोटा टुकड़ा दिया जा रहा था।

हम जानते हैं कि जंगल पर सदियों से आदिवासियों का अधिकार रहा है। ऐसे में पूरे जंगल से उन्हें बेदखल कर उन्हें 4 हेक्टेयर जमीन देने की बात काफी हास्यास्पद है। इतना ही नहीं आदिवासियों की बर्बादी के लिए जवाबदेह माइनिंग कंपनियों और जंगल पर आदिवासियों के अधिकार के बारे में यह एक्शन प्लान कोई बात नहीं करता। मूल सवाल यहां यही बनता है कि आखिर विश्व बैंक को आदिवासियों के विकास की चिंता कब से हो गयी। दुनिया में कॉरपोरेट शार्कों और मुनाफाखोरों के लिए काम करने वाली यह संस्था अचानक भारत में आदिवासियों के विकास के बारे में कैसे चिंतित हो गयी। असली मकसद तो आदिवासियों को नमक चटाकर उनका घर-बार हड़प लेने का है। हालांकि केंद्रीय मंत्री यह मामूली सुधार भी लागू नहीं कर पाए। सारंडा एक्शन प्लान के नाम पर आवंटित राशि का एक बड़ा हिस्सा इनके अधिकारियों और एनजीओ की जेब में जा रहा है। झारखंड सरकार के अधिकारी केंद्रीय गृहमंत्री को यह भी नहीं बता पाये कि इस प्लान के नाम पर आवंटित राशि का कितना हिस्सा खर्च किया जा सका है। इसी एक्शन प्लान के क्रियान्वयन के दौरान सेल और जिंदल स्टील को सारंडा में माइनिंग लीज आवंटित किए गए। जिंदल स्टील को देने के लिए 1,270 एकड़ फॉरेस्ट लैंड को माइनिंग के लिए डाइवर्ट कर दिया गया। इस तरह जिंदल स्टील को लोहा और मैगनीज अयस्क की निकासी के लिए करीब 2,470 एकड़ जमीन आवंटित की गई। सेल को भी करीब 520 एकड़ जमीन दी गई। इस तरह सारंडा एक्शन प्लान की माइनिंग कंपनियों के साथ रिश्तों की पोल पूरी तरह खुल जाती है। सारंडा एक्शन प्लान आदिवासियों के विकास का कोई प्लान नहीं बल्कि उनके जंगलों पर कॉरपोरेट कंपनियों को कब्जा दिलाने के लिए प्रतिरोध को खत्म करने का जरिया भर है।

विकल्प को नष्ट करने की साजिश

देश में लंबे समय से समय व्याप्त आर्थिक संकट ने राजनीतिक संकट को भी जन्म दिया है। दरअसल यह संकट देश में विकास की बाधाओं और अंतर्विरोधों का ही परिणाम है। इसलिए इन अंतर्विरोधों को हल किए बगैर इसका कोई समाधान नहीं है। आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त इस संकट ने 1970 के दशक से ही राजनीतिक क्षेत्रों में अपना रंग दिखाना शुरू किया और 1990 के दशक के अंत तक यह काफी गहरा हो गया। हालत यह हो गई कि संविधान की प्रस्थापनाओं के अनुरूप कोई भी पार्टी सरकार चला पाने की हालत में नहीं है। जहां कई पार्टियां मिलकर सरकार बना रहीं हें वहीं कई पार्टियां मिलकर सांवैधानिक विपक्ष की कुर्सी संभाल रही हैं। लेकिन जो नहीं बदला है वह है साम्राज्यवाद और बड़ी पूंजी के पक्ष की नीतियां। निरंतर घोटालों की खबरों ने तो शासक वर्गों को और बेनकाब कर दिया है। देश के खुफिया विभाग द्वारा आतंकवाद के नाम पर कत्लेआम ने तो शासक वर्गों की पोल खोलकर रख दी है। इतना ही नहीं एक सरकारी अधिकारी द्वारा संसद पर सरकार द्वारा हमले कराये जाने की बात ने तो उन्हें और बेनकाब कर दिया है। ऐसे में देश में एक विकल्पहीनता की स्थिति पैदा हुई है।

इस विकल्पहीनता की स्थिति में माओवादियों के संघर्ष ने जनता के सामने एक विकल्प के रुप में उभरी है। उनकी कुर्बानियों और जीवन-मौत के समझौताहीन संघर्षों ने जनता में यह बात स्थापित करने की कोशिश की है कि अब मुकम्मल बदलाव की किसी भी कोशिश का नेतृत्व नक्सलवादी की कर सकते हैं। इसके अलावा आज देश में अकेले माओवादियों के पास ही एक ठोस राजनीतिक-आर्थिक विकल्प है। माओवादियों के विकास के नए वैकल्पिक मॉडल की चर्चा भी इन दिनों बड़े स्तर पर सामने आयी है।

एक रिपोर्ट के अनुसार छतीसगढ़ में जनताना सरकार ने जो वैकल्पिक सत्ता का विकास किया है उसका मूल जोर भूमि सुधार, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा पर है। सिंचाई के लिए तालाब का निर्माण, बेघर लोगों के लिए सामूहिक श्रम से घर का निर्माण, वैज्ञानिक विधि से खेती कराना, शिक्षा के क्षेत्र में वैकल्पिक पुस्तकें व पाठ्यक्रम का निर्माण तथा स्कूलों के संचालन जैसे कुछ मुख्य कार्य जनताना सरकार कर रही है। एक रिपोर्ट बताती है कि 2011 में जनताना सरकार ने भूमि के समतलीकरण का अभियान शुरू किया। इस अभियान में 6,321 एकड़ जमीन को खेती करने के लायक बनाया गया। इस प्रक्रिया में करीब 341 तालाबों को काम के लायक बनाया गया। इसमें जहां कुछ नये तालाब बनाये गये जबकि कुछ पुराने तालाबों को ही काम के लायक बनाया गया। आम जनता की भागीदारी के बारे में यह रिपोर्ट कहती है कि अकेले दक्षिणी बस्तर में 1,20,000 लोगों ने जमीन को समतल बनाने के अभियान में हिस्सा लिया। इसमें एक तिहाई महिलाएं शामिल थीं। लगभग 1,000 सांस्कृतिकर्मियों ने काम के दौरान उनकी मदद की और रोज दो घंटे के हिसाब से काम करने वालों को तरो-ताजा बनाकर उनके उत्साह को बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। इस तरह जनता के सहयोग से आम जनता के पक्ष में विकास का एक नया मॉडल जन्म ले रहा है। जाहिर तौर पर जनता के सामने एक मुकम्मल विकल्प के रूप में दावेदारी के लिए इसे अभी बहुत कुछ करना होगा।

ऐसे में शासक वर्गों के साम्राज्यवादी, सामंतवादी और बड़ी पूंजी के हित में एक संकटग्रस्त आर्थिक मॉडल के समांतर आम जनता का एक वैकल्पिक जन मॉडल आकार ले रहा है। अपने जीवनस्तर को ऊंचा उठाने के लिए आम जनता इसमें भागीदारी कर रही है। इन परिस्थितियों में शासक वर्ग के संकटग्रस्त राजनीतिक-आर्थिक मॉडल को इस वैकल्पिक मॉडल से दीर्घकाल में एक खतरा महसूस हो रहा है। इसलिए शासक वर्ग इस नए विकल्प को भ्रूण रूप में ही कुचल देना चाहता है। एक ठोस राजनीतिक-आर्थिक विकल्प पेश करने की वजह से भी माओवादी शासक वर्गों के प्रमुख निशाने पर हैं। इस तरह शासक वर्गों का यह युद्ध इन दो तरह के राजनीतिक-आर्थिक मॉडलों के बीच युद्ध भी है।

आज जब शासक वर्ग ने देश की जनता के खिलाफ साम्राज्यवाद-सामंतवाद और बड़ी पूंजी के हित में सघन अभियान छेड़ दिया है, तमाम जनवादी और देशभक्त ताकतों का इस युद्ध के प्रतिरोध में गोलबंद होना आज के लिए जरूरी और लाजिमी बन जाता है। इतिहास गवाह है कि दमन ने और अधिक प्रतिरोध को जन्म दिया है। देश की शोषित-पीड़ित जनता इस युद्ध के खिलाफ जीवन-मौत के संघर्षों में रोज जूझ रही है। अंतिम रूप से यह संघर्ष अपनी मातृभूमि की रक्षा में है। इसलिए आज जनवादी ताकतों का भी यह दायित्व बनता है कि हर संभव तरीके से अपनी मातृभूमि के खिलाफ लुटेरी ताकतों के हित में छेड़े गये इस युद्ध का हर संभव प्रतिकार किया जाये।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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