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बीच सफ़हे की लड़ाई

हंस संगोष्ठी: ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ का बाकी सच

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/06/2013 12:07:00 PM


आप देखिये कि राजेंद्र यादव से शुरू हुई लोकतंत्र की जो शोभायात्रा जनसत्ता संपादक और अपूर्वानंद तक आते आते बुलडोज़र में बदल गयी, वह किन किन आवाजों को कुचलती हुई आगे बढ़ी और उसका खामियाजा किन किन तबकों को उठाना पड़ रहा है. आप अंदाज़ा लगाइए कि जन संघर्षों की राजनीति से कटा हुआ लोकतंत्र और संवाद किन ताकतों की हिमायत में खड़ा होता है और  किनको मज़बूत करता है. जाहिद खान की ये टिप्पणी बहुत साफ़ उजागर करती है कि राजेंद्र यादव, ओम थानवी और अपूर्वानंद और उनके संगी साथी जिस लोकतंत्र, संवाद, बहस और तमाम अच्छी लगने वाली बातों का जाप कर रहे हैं, वो किनकी हिमायत में कर रहे हैं और उसका जनता के जनवादी और लोकतान्त्रिक अधिकारों से कितना लेना देना है. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति और संवाद का यह दमघोंटू शोर जनता की लोकतान्त्रिक आवाज़ों और अधिकारों की हत्या कर देने के लिए ही तो नहीं उठाया जा रहा है. 
 
31 जुलाई, प्रेमचंद जयंती के अवसर पर मेरी नई किताब ‘संघ का हिन्दुस्तान’ का लोकार्पण देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में संपन्न हुआ। किताब का लोकार्पण हंसाक्षर ट्रस्ट के वार्षिक आयोजन में हो, इस अरमान से लेखक शिवपुरी (मध्य प्रदेश) से दिल्ली पहुंचा था। किताब के लोकार्पण के बारे में मेरी राजेन्द्र जी से बात भी हुई थी। पर उन्होंने मुझे कोई पक्का आश्वासन नहीं दिया था। हां, अलबत्ता उन्होंने यह जरूर कहा कि आप आ जाईए, देखते हैं। किताब का विषय और मुझे देखकर शायद राजेन्द्र जी पिघल जाएं, यह सोचकर मैंने दिल्ली के लिए रवानगी डाली। लेकिन फिर भी एक शंका और संकोच मन में रहा। लिहाजा लेखक ने वरिष्ठ साहित्यकार और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट से इस बारे में संपर्क किया और उनसे गुजारिश की कि वे किताब के लोकार्पण के लिए राजेन्द्र जी से कहें। पंकज जी ने संजय सहाय से मेरा परिचय कराया और कहा ‘‘संजय जी, जाहिद जी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं और ये चाहते हैं कि इनकी किताब का लोकार्पण इस कार्यक्रम में हो, आप राजेन्द्र जी से इनकी सिफारिश करिए।’’

पंकज जी कि बात पर तुरंत अमल करते हुए सहाय साहब मुझे राजेन्द्र जी के पास ले गए। जहां उन्होंने पंकज जी का हवाला देते हुए अपनी बात पूरी की। लेकिन जब इस किताब का कवरपेज और शीर्षक राजेन्द्र जी ने देखा, तो उस पर उनकी त्वरित टिप्पणी थी, ‘‘नहीं हो सकता, मंच पर गोविंदाचार्य रहेंगे !’’ राजेन्द्र जी के इस टके से जवाब के बाद, इसके आगे कुछ कहने की न मेरी हिम्मत हुई और न सहाय साहब की। आपको यह बात याद दिलानी लाजिमी होगी कि इस साल हंस की सालाना संगोष्ठी का विषय ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ था। जिसमें जानी-मानी लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती राय और वरिष्ठ कवि वरवरा राव को शामिल होना था। यही वजह थी कि इस आयोजन में, मैं अपनी किताब को लोकार्पण करवाना चाहता था। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजेन्द्र जी ने पहला प्रतिबंध मेरी किताब के लोकार्पण पर ही लगा दिया। महज इस बिना पर कि मंच पर केएन गोविंदाचार्य रहेंगे। वे गोविंदाचार्य जिन्हें बीजेपी ने अपनी पार्टी से निकाल जरूर दिया हो, लेकिन आज भी उनकी विचारधारा में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। आज भी वे हर मंच से संघ की विचारधारा से अपनी संबद्धता जाहिर करते हैं और उनके आनुषंगिक संगठनों में भी उन्हें जाने से कोई गुरेज नहीं। हाल ही में ग्वालियर में हुए एक कार्यक्रम में तो गोविदांचार्य ने इन्द्रेश कुमार के साथ भी मंच साझा किया। वे इन्द्रेश कुमार जिन पर मालेगांव और दीगर बम विस्फोटों की साजिश में शामिल होने की बात हमारी जांच एजंसियों ने कई बार कही है।

बहरहाल राजेन्द्र जी का बदला रुख देखकर मैं अपना सा मुंह लेकर वापिस आ गया। खैर, बाद में मालूम चला कि कार्यक्रम में केएन गोविंदाचार्य की भागीदारी का सुनकर संगोष्ठी के अहम वक्ता जानी-मानी लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय और कवि, सामाजिक कार्यकर्ता वरवरा राव दोनो ने ही कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया है। यह खबर सुनकर मेरे बचे-खुचे अरमान भी हवा हो गए। अब कार्यक्रम में किताब के लोकार्पण की मेरी पूरी तमन्ना ही खत्म हो गई। चंूकि शिवपुरी से मैं पूरी तैयारी से अपनी किताब का लोकार्पण कराने दिल्ली पहुंचा था, लिहाजा राजेन्द्र जी के रवैये से मुझे काफी दुख हुआ और मैंने फैसला किया कि प्रतिरोधस्वरूप इस किताब का लोकार्पण ऐवान-ए-गालिब के खुले प्रांगड़ में ही हो। मेरे इस फैसले की अमलदारी में पूरी मदद की उन पंकज बिष्ट ने, जो हमेशा नौजवानों को अपनी पत्रिका और दीगर मंचों से लगातार प्रोत्साहित करते रहते हैं। पंकज जी के प्रयासों से तुरंत हिंदी साहित्य के चोटी के पन्द्रह-बीस साहित्यकार इकट्ठे हुए और उन्होंने खुशी-खुशी मेरी किताब का लोकार्पण किया और मुझे बधाई दी।

हंस की संगोष्ठी के बाद जैसी कि उम्मीद थी, फिर वाद-विवाद की झड़ी लग गई। संगोष्ठी की रुपरेखा, राजेन्द्र जी के फैसले के समर्थन में कई लोग सामने आए हैं। ‘लोकतंत्र’ और ‘संवाद’ जैसे बड़े-बड़े शब्दों का सहारा लेकर अरुंधति राय और वरवरा राव के कार्यक्रम में न आने के फैसले की जमकर मुखालफत की जा रही है और वह इस बिना पर कि ‘अपने वैचारिक दुराग्रहों और संकीर्णता की वजह से इन दोंनो लेखकों ने कार्यक्रम में शिरकत नहीं की। अच्छा होता कि यह दोनों कार्यक्रम में आते और अपने विचार रखते।’ यहां तक कि कई लेखों और फेसबुकी टिप्पणियों में इन दोंनो के फैसले को बढ़ती ‘संकीर्णता’ का नया और ‘चिंताजनक’ उदाहरण माना है। जिन लोगों को मेरा प्रकरण मालूम नहीं, हो सकता है कि उनमें से कुछ लोग इन सब बातों से अपना इत्तेफाक जतलाएं। लिहाजा मैरे लिए जरूरी हो गया कि मैं अपने साथ हुए वाकए को भी सब को बतलाऊं। जिससे बाकी का सच लोगों के सामने आए। दूसरों पर हजार तोहमतें लगाने वाले भी सबके सामने बेनकाब हों। दोस्तो अब आप फैसला करें कि ‘संकीर्णता’ का नया और ‘चिंताजनक’ उदाहरण किसने पेश किया ? अरुंधती राय और वरवरा राव ने या फिर आदरणीय राजेन्द्र यादव जी और उनके नए-नए बने ‘समर्थकों’ ने !

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ हंस संगोष्ठी: ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ का बाकी सच ”

  2. By अविनाश on August 6, 2013 at 12:42 PM

    मुझे हस्‍तक्षेप करते हुए अजीब लग रहा है, क्‍योंकि लोग छूटते ही मुझे भी संघी कह देंगे। फिर भी बात तो बात है - कह कर रहूंगा। जो लोग राजेंद्र यादव को जानते हैं, उनकी हर बात में चुटकी लेने वाले अंदाज को भी जानते होंगे। यहां जाहिद की जो टिप्‍पणी है, वह मुझे एक घटना की याद दिलाती है। मैं एक आयोजन का संयोजक था। आयोजन चल रहा था, उसी वक्‍त एक लड़का आया। उसके हाथ में दो-तीन पन्‍ने थे। उनमें उसकी कविताएं थीं। वह चाहता था कि मैं उन पन्‍नों को पढ़ कर उसकी स्‍तरीयता तय करूं और आयोजन में उसे भी शामिल करूं। मैंने कहा कि इस बार तो सब कुछ पहले से तय है, अगली बार जरूर आप हमारे मंच पर होंगे। उसकी मायूसी जरूर द्रवित करने वाली थी, पर मैं आयोजन के अनुशासन से बंधा हुआ था। ऐने मौके पर किसी भी कार्यक्रम में जोड़-घटाव बड़ा मुश्किल हो जाता है। जाहिद मेरे मित्र हैं और हमने भोपाल में कुछ बेहतर वक्‍त साथ-साथ बिताये हैं। पर अपने जिस दुख के साथ उन्‍होंने राजेंद्र यादव की मानसिकता को टार्गेट करने की कोशिश की है, वह सही नहीं है। पहले तो पंकज विष्‍ट ने उन्‍हें संजय सहाय के हवाले करके उनका मजाक बनाया, फिर रही-सही कसर राजेंद्र यादव ने पूरी कर दी। मुझे इस पूरे वाकये में संजय सहाय की ईमानदारी पर खुशी हो रही है कि उन्‍होंने जाहिद भाई के लिए राजेंद्र यादव से बात करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं दिखायी।

  3. By महेन्द्र श्रीवास्तव on August 6, 2013 at 10:38 PM

    बढिया, बहुत सुंदर

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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