हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जनतंत्र को लगातार सही-सही परिभाषित करना ज़रूरी है: असद जैदी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/20/2013 03:39:00 PM

जब आपको गुजरात की, कश्मीर की, मध्य भारत के आदिवासियों की, उत्तर-पूर्व के लोगों की चीख़ सुनायी नहीं देती; जब आपको यह नहीं खटकता कि देश की जेलें ऐसे क़ैदियों से भरी जा रही हैं, जो मासूम हैं, पर मुसलमान हैं या आदिवासी हैं; तो आपको अपने बारे में कुछ शक होना चाहिए।


हिंदी के प्रसिद्ध कवि और विचारक असद ज़ैदी से संज्ञा उपाध्याय की बातचीत. यह बातचीत पत्रिका कथन में प्रकाशित हुई है और इसे हाशिया के लिए उपलब्ध कराने के लिए साथी धीरेश सैनी का आभार.

संज्ञा उपाध्याय: असद जी, आज व्यक्ति से लेकर विश्व तक की प्रत्येक समस्या का एक राजनीतिक आयाम अवश्य होता है और वह उस समस्या के दूसरे सभी आयामों को नियंत्रित करता है। इसे देखते हुए लोगों की राजनीतिक समझ बढ़नी चाहिए और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनमें राजनीतिक हस्तक्षेप करने की क्षमता विकसित होनी चाहिए। लेकिन बिलकुल उलटी बात देखने में आ रही है। ज्यादातर लोग अराजनीतिक हैं और इसी कारण कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं कर पाते हैं। इससे समस्याएँ हल होने के बजाय और ज्यादा गंभीर, और ज्यादा विकट होती जाती हैं। एक तरफ लोगों की राजनीतिक चेतना के विकास की ज़रूरत और संभावना है, जबकि दूसरी तरफ उनकी राजनीतिक चेतना कम और कुंद होती नजर आती है। इस विरोधाभास के बारे में आप क्या सोचते हैं?

असद ज़ैदी: देखिए, संज्ञा जी, पूँजीवादी जनतंत्र की यही विडंबना है। पूँजीवादी शासक वर्ग पहले एक क्रांति या परिवर्तनकारी लहर पर सवार होकर सत्ता में आता है और फिर कुछ ही समय में प्रतिक्रांति की तैयारी करने लगता है। पूँजीवाद का इतिहास इन दग़ाबाज़ियों और प्रतिक्रांतियों से भरा पड़ा है। सरमाया इसकी इजाज़त नहीं देता कि अवाम जनतंत्र का विस्तार करें, बल्कि वह उसकी सीमा बाँधने और इस सीमा को लगातार संकुचित करते रहना चाहता है। दुनिया में हर जगह उसने यही किया है। मार्क्स ने बार-बार यह बात रेखांकित की है। यूरोप में 1848 की प्रतिक्रांतियाँ यही बताती हैं।

संज्ञा उपाध्याय: ये प्रतिक्रांतियाँ शुरू कैसे होती हैं?

असद ज़ैदी: पूँजी पहले उन संस्थानों पर अपना क़ब्ज़ा मज़बूत करती है, जो जनतांत्रिक परिवर्तन के कारण अस्तित्व में आये हैं और जिनसे जनतंत्र की दिनचर्या बनती है। ये संस्थान हैं- संसद, संविधान और क़ानून, मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही, चुनाव और मताधिकार, न्यायिक बराबरी, नागरिक अधिकार आदि। दूसरी तरफ़ आम जनता भी अपनी आज़ादी और उन अधिकारों की रक्षा के लिए कटिबद्ध रहती है, जिन्हें उसने क़ुर्बानी देकर हासिल किया होता है। कालांतर में प्रभुत्वशाली पूँजीवादी तबक़े मध्यवर्ग की मदद से इन्हीं संस्थानों को योजनाबद्ध तरीक़े से कमज़ोर करने में लग जाते हैं। वे व्यवस्था के प्रति आम निराशा और वितृष्णा पैदा करने, अवाम के बीच राजनीति मात्र से नफ़रत का भाव पैदा करने, कल्याणकारी नीतियों को समाप्त करने और राजनीतिक व्यवस्था के अपराधीकरण में लग जाते हैं। जनतंत्र की सारवस्तु नष्ट कर दी जाती है। बस, एक खोखला ढाँचा बचा रह जाता है, जिस पर पूँजी के कारकुन तैनात रहते हैं। अंत में सिर्फ एक चीज़ रह जाती है-वोट, जिसे आप चाहे ओबामा को दें या बुश को, ब्लेअर को दें या कैमरन को, मनमोहन सिंह को दें या अटल बिहारी वाजपेयी को, ज़रदारी को दें या नवाज़ शरीफ़ को।

संज्ञा उपाध्याय: मतलब, वोट या चुनावों से सरकारें तो बदल जाती हैं, व्यवस्था नहीं बदलती।

असद ज़ैदी: हाँ, क्योंकि अवाम तो जनतंत्र को अपने हक़ में बदलना चाहते हैं, लेकिन वे उसे एक स्वाधीन, दासताहीन, सुरक्षित समाज और कल्याणकारी भविष्य के निर्माण के औज़ार में न बदल सकें, इसके लिए सरमायेदार तबक़ा विभाजनकारी हथकंडे अपनाता है। वह सांप्रदायिकीकरण, गुंडाराज, दुष्प्रचार, राजकीय आतंक, भ्रष्टाचार, अंध राष्ट्रवाद, सैन्यीकरण, युद्ध, तानाशाही, फ़ासीवाद वग़ैरह सारी जन-विरोधी चीज़ों का रास्ता खोल देता है। मोटे तौर पर पूँजीवाद का यही इतिहास रहा है। इनमें से एक भी चीज़ ऐसी नहीं है, जिसे आज़ाद हिंदुस्तान की जनता ने इन सड़सठ वर्षों में न देखा हो, और आज मुल्क के किसी न किसी हिस्से में हरदम न झेल रही हो। लगातार होने वाले जनसंहार, हर तरह का दमन, उत्पीड़न, शोषण, भूख, बीमारी और कुपोषण, बेरोज़गारी, विस्थापन, विषमता और अन्याय से "संसार के विशालतम जनतंत्र" का पूरा जिस्म दाग़दार है।

संज्ञा उपाध्याय: और ज़्यादातर लोगों को इसका कोई विकल्प भी नज़र नहीं आता...

असद ज़ैदी: हाँ, क्योंकि आज हिंदुस्तान में समाचार और प्रचार का तंत्र ही नहीं, पूरी सार्वजनिक बुद्धिही आपराधिक पूँजी के हाथ में है और यह अवाम को अराजनीतिक बनाने का मुख्य औज़ार है। मीडिया पर पूँजी का दोहरा स्वामित्व है-एक तो समाचार पत्र और टेलीविज़न की अर्थव्यवस्था पर विज्ञापन के ज़रिये नियंत्रण और दूसरे, इन माध्यमों पर पूँजीपतियों का सीधा स्वामित्व और नियंत्रण। पूँजी के इन कारख़ानों में ख़बरें जिस तरह बनती हैं, चर्चा और विचार के विषय जिस तरह तय किये जाते हैं, जिस तरह की मैन पावर संपादकों, संवाददाताओं, कॉलम लेखकों, एंकरों, संयोजकों के रूप में भरती और तैनात की जाती है, फिर जिन तरकीबों से वे पेशेवर बुद्धिजीवी वर्ग की मदद से ‘‘नये भारत’’ की तस्वीर बनाते हैं और ‘‘नया ज्ञान’’ हम तक पहुँचाते हैं, इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये लोग पाठक और दर्शक को निष्क्रिय, हताश और अराजनीतिक उपभोक्ता में बदलते हैं-उपभोक्ताओं की ऐसी भीड़ में, जिसकी सामान्य जनतांत्रिक चेतना मर चुकी हो, जिसका जनतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं पर से विश्वास उठ चुका हो, जो खुद अपनी ताक़त में विश्वास खो चुकी हो, और जो यह मानने को तैयार हो कि अब या तो सुप्रीम कोर्ट या भगवान या कोई चमत्कारी पुरुष या फ़ौजी शासन या फ़ासीवाद ही इस देश को बचा सकता है। इस माहौल को बनाने में मीडिया का योगदान सबसे ज़्यादा है। मीडिया जनसंहार के दोषी एक विश्व प्रसिद्ध मानवद्रोही हत्यारे को विकास पुरुष, एक संदिग्ध एन.जी.ओ. ऑपरेटर को आम आदमी का उद्धारक, कुछ सस्ते ठगों को राष्ट्रीय महत्त्व के संत-राजनेताओं में बदलकर विकल्पकी तरह खड़े कर देता है। इस तरह देखें, तो विकल्प का निर्माण भी सत्ताधारियों के ही हाथ में है।

संज्ञा उपाध्याय: भारत के लोगों में राजनीतिक चेतना का जैसा उभार और प्रसार स्वाधीनता आंदोलन के समय हुआ था, वैसा इतिहास में न उसके पहले देखा गया, न उसके बाद। बल्कि स्वाधीनता के बाद तो लगता है कि वह चेतना उत्तरोत्तर क्षीण ही होती गयी है। जनतंत्र में तो जनता की राजनीतिक चेतना बढ़नी चाहिए, लेकिन भारतीय जनतंत्र में वह कम होती गयी और ज्यादातर लोग अराजनीतिक होते गये। इसके पीछे क्या कारण रहे होंगे?

असद ज़ैदी: बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में राजनीतिक चेतना का उभार और प्रसार सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया के पैमाने पर हुआ था-जापान से लेकर मैक्सिको तक। चीन और हिंदुस्तान में भी यह उभार आया। इनमें से ज़्यादातर उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन थे, तो कुछ आंदोलन राजसत्ता के आधार को आमूलचूल बदल देने वाले क्रांतिकारी आंदोलन थे। इन आंदोलनों के आपसी रिश्ते आम तौर पर दोस्ताना थे, लेकिन एक बड़ा फ़र्क उस वक़्त भी था। तमाम समाजवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों ने उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों को, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को खुला समर्थन दिया और उनकी प्रेरणा का स्रोत बने। लेकिन कई राष्ट्रीय आंदोलन-ख़ासकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेतागण- समाजवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों को लेकर हमेशा दुविधा में रहे। मसलन, कांग्रेस के नेतृत्व का दक्षिणपंथी धड़ा, खुद महात्मा गांधी, बोल्शेविज़्म और साम्यवाद से उतनी ही नफ़रत करते थे, जितनी कि भारत के तत्कालीन शासक अंग्रेज़। इस मामले पर दोनों में एकता थी। ये लोग बोल्शेविज्म का डर दिखाकर अंग्रेज़ों से सौदेबाज़ी भी किया करते थे।

संज्ञा उपाध्याय: कांग्रेस पर हावी दक्षिणपंथी नेतृत्व ने तो पहले ही तय कर लिया था कि अगर आज़ादी का मतलब समाजवाद है, तो उन्हें आज़ादी नहीं चाहिए...

असद ज़ैदी: देखिए, सच्चाई यह है कि अपनी स्थापना के वर्ष से ही कांग्रेस औपनिवेशिक ढाँचे में सुधार और पूँजीवादी समाज-रचना की प्रतिज्ञा से बँधी हुई थी, और इससे कभी डिगी नहीं। कांग्रेस ने कभी नहीं चाहा कि अवाम के हाथ में बहुत ज़्यादा ताक़त आ जाये। पहले वह अंग्रेज़ी अभिभावकत्व में डोमिनियन स्टेटसचाहती थी, बाद में जब इंन्कलाबियों के और अवाम के दबाव में पूर्ण स्वाधीनता ही एकमात्र विकल्प रह गया, तो यह पार्टी अपने पक्ष में सत्ता पर एकाधिकार की कोशिश में लग गयी। कांग्रेस की नीतियाँ और सत्ता पर अपने एकाधिकार की कोशिशें ही भारत के विभाजन, इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन और बर्बर जनसंहार का सबसे बड़ा कारण बनीं, न कि मुस्लिम लीग की ज़िद। यह भी कहा जा सकता है कि 1947 की आज़ादी पुराने हिंदुस्तान की जनता की विदेशी साम्राज्य पर विजय की प्रतीक है। पर इसी के साथ यह समानता, न्याय और शोषण-मुक्त समाज के सपनों पर देसी सरमायादारों और सामंतों की सांप्रदायिक और अवाम-दुश्मन राजनीति की जीत की भी निशानी है। यह भारत और पाकिस्तान दोनों की जनता के लिए भयानक रक्तपात और विस्थापन की प्रतीक भी है। एक तरह से यह पूरे उपमहाद्वीप के नर-नारियों के राजनीतिक जागरण के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी लामबंदी की याददिहानी भी है। आज़ादी मिलते ही शासकों का पहला लक्ष्य था लोगों की बढ़ी हुई अपेक्षाओं पर लगाम लगाना और आंदोलनकारियों से कहना कि यह राजनीतिक प्रतिरोध का नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का समय है। विभाजन के मुजरिम दोनों तरफ़ राष्ट्र-निर्माता बन गये।

संज्ञा उपाध्याय: लेकिन आज़ादी की लड़ाई जिस राष्ट्रवाद के आधार पर लड़ी गयी थी, वह तो देश को तोड़ने वाला नहीं, बल्कि जोड़ने वाला था?

असद ज़ैदी: देखिए, हम सब की यह आदत है कि पहले तो हम अतीत की हर अच्छी और ज़रूरी चीज़ को बिल्कुल समस्याहीन गौरवगाथा में बदल देते हैं, फिर उसी के मिथक और नॉस्टेल्जिया में जीने लगते हैं। उसके अंतर्विरोधों को भूल जाते हैं। राष्ट्रवाद किसी एक ही तरह की चीज़ का नाम नहीं है, और अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग राष्ट्रवादों की भूमिका एक जैसी नहीं होती। अंधराष्ट्रवाद, सांप्रदायिक राष्ट्रवाद, पुनरुत्थानवाद, हिंदू राष्ट्र, द्विराष्ट्रीय सिद्धांत-ये सब भी राष्ट्रवाद ही का दावा करते हैं। हिंदुस्तान में जिस दौर की बात आप कर रही हैं, उस दौर में भी कोई एक तरह का राष्ट्रवाद नहीं था। भगत सिंह का क्रांतिकारी राष्ट्रवाद गांधीवादी विचारधारा की उपशाखा नहीं, बल्कि वह भिन्न प्रेरणाओं, भिन्न लक्ष्यों और भिन्न सपनों वाला राष्ट्रवाद था। हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कल्पनाओं का राष्ट्र कुछ और था, साम्यवादियों और वाम क्रांतिकारियों का कुछ और; आंबेडकर और दलित जातियों का अपना राष्ट्रवाद था, जो गोलमेज़ सम्मेलन में तीसरा पक्ष था; मुस्लिम लीग का मुस्लिम राष्ट्रवाद था; और फिर कांग्रेस का ढुलमुल लेकिन महत्त्वाकांक्षी सत्ता-केंद्रित राष्ट्रवाद। अगर आप ग़ौर करें, तो पायेंगी कि कांग्रेस हमेशा से ही, आज़ादी की लड़ाई के दौर में भी, अराजनीतिकीकरण की मुख्य एजेंसी थी। अराजनीति शुरू से गांधीवादी राजनीति का मुख्य पाया रही है।

संज्ञा उपाध्याय: भारत को विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र कहा जाता है, लेकिन भारत की जनता का उससे केवल वोट देने तक का या हद से हद अपने अधिकारों के लिए आंदोलन और संघर्ष करने तक का ही संबंध है। सत्ता के विकेंद्रीकरण की बातें तो बहुत हुई हैं, लेकिन वास्तव में सत्ता का केंद्रीकरण होता रहा है, जिससे नीतियाँ बनाने और उन्हें लागू करने में लोगों की कोई वास्तविक भूमिका और भागीदारी नहीं हो पाती है। उनके द्वारा चुने गये जन-प्रतिनिधि सत्ता में आने के बाद उनकी बात नहीं सुनते, बल्कि उनके आंदोलनों और संघर्षों का दमन ही अधिक करते हैं। इससे पैदा होने वाली हताशा ही क्या लोगों के अराजनीतिक होते जाने का कारण नहीं है?

असद ज़ैदी: कोई वजह है कि 1989 के आसपास से-यानी सोवियत संघ और समाजवादी खेमे के विघटन के बाद से ही, और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद से तो निश्चय ही-भारत को विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र कुछ ज्यादा ही ज़ोर-शोर से कहा जाने लगा है। मेरी राय में स्वतंत्र विदेश नीति और गुटनिरपेक्ष आंदोलन को दफ़़न कर देने, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सामने घुटने टेक देने और अर्थव्यवस्था के बर्बरतापूर्ण जनद्रोही पुनर्गठन के इनाम में अमरीका और यूरोप की शक्तियों ने भारत को इस ख़िताब से नवाज़ना शुरू किया है। गोया एक नयी ग़ुलामी सहर्ष अपनाकर हम फिर से "जगत गुरु" होने जा रहे हैं! भारत की जनता इतनी अधिकारहीन पहले कभी न थी-ख़ासकर आदिवासी और मुसलमान जन, भूमिहीन लोग, और दलित जन का बहुलांश। पब्लिक सेक्टर की कमर तोड़ दी गयी है। पिछले दशकों का वह जुझारू मज़दूर आंदोलन कहाँ गया? कहाँ हैं अब वे गर्वीले, आत्मविश्वास से भरे मज़दूर? सफेदपोश उद्यमों में भी ट्रेड-यूनियनिज्म की मजबूत परंपरा थी--बैंक कर्मचारियों के बीच, पब्लिक सेक्टर में अफसरों और कर्मचारियों के बीच, शिक्षकों में भी। उनकी कुछ ताकत ही नहीं रह गयी है। निजीकरण, कांट्रैक्ट सिस्टम, छँटनी और दमनकारी कानूनसाजी के माध्यम से नये भारत के विधाताओं ने सबसे निबट लिया है। इन परिस्थितियों में सत्ता के विकेंद्रीकरण का अर्थ भी राज्य और जनपद के स्तर पर दलालों की एक फ़ौज खड़ी करना ही है। मूल रूप से तो हम एक दमनकारी पुलिस राज और सैन्यीकृत राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ते जा रहे हैं। जनतांत्रिक संस्थाओं पर जनतंत्र के शत्रुओं का क़ब्ज़ा होता गया है। ये वे शत्रु हैं, जो जनतंत्र को ढाने के लिए जनतंत्र की प्रक्रियाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसा कि जर्मनी के वाइमर युग में हिटलर के नात्सी दस्तों ने किया था। बस एक फ्यूहरर की कमी थी, जो अब नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय मंच पर आगमन से पूरी हुआ चाहती है। हर तरफ़ से पूँजी का आक्रमण है। हताशा की हालत तो है। हताशा एक सच्चाई है। लिहाज़ा हमें इसी से बात शुरू करनी पड़ेगी। बात इसी से पैदा होगी। आज की परिस्थितियों में आशावादी उपदेश पलायनवाद को ही बढ़ावा देते हैं। यह पलायनवाद की चोर गली है। मुझे कुछ साहित्य के क्षेत्र का अनुभव है, इसीलिए यह बात कहता हूँ।

संज्ञा उपाध्याय: भारतीय जनतंत्र के बारे में कहा जा रहा है कि वह पूरी तरह धनतंत्र और अपराधतंत्र में बदल गया है। भ्रष्टाचार इस पूरी परिस्थिति का सूचक शब्द बन गया है, इसलिए वह सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आता है। इसीलिए जब अण्णा हजारे जैसा कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन छेड़ता है, तो बहुत-से लोग यह जानते हुए भी कि इससे कुछ नहीं होगा, उसके अराजनीतिक आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि वहाँ तो अराजनीति की राजनीति हो रही थी। ऐसे आंदोलनों की विफलता से लोगों की निराशा और बढ़ती है, वे और ज़्यादा अराजनीतिक होते हैं। इस समस्या का समाधान कैसे हो सकता है?

असद ज़ैदी: पूँजी के अपने बृहत्तर लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब राज्य और उसकी संस्थाएँ काफी नहीं हैं; उसे अनिवार्यतः अपराधियों की और अपराधतंत्र की मदद चाहिए। यह काम जराइमपेशा छुटभैयों की सामर्थ्य और महत्त्वाकांक्षा से परे है। पूँजी को बड़े आपराधिक तंत्र को खड़ा करने, विकसित करने, हर तरफ फैला देने की दरकार है। पुलिस और सरकारी मशीनरी अपनी हद के भीतर ही काम कर सकती है। भले ही वह हदें तोड़ती रहती है, पर वहाँ भी हद है। आपराधिक तंत्र का काम उस हद के बाद शुरू होता है। सबसे पहले इसका लक्ष्य होता है नागरिकों के प्रतिरोध को तोड़ना और ऐसी दशा ले आना कि ज़्यादातर लोग नियति की तरह इसकी उपस्थिति को स्वीकार कर लें। ये काम हमेशा डरा-धमकाकर या आतंक फैलाकर ही नहीं किये जाते, बल्कि एक सामाजिक मैकेनिज़्म भी तैयार किया जाता है, जो इसके लिए दीर्घकालिक सहमति का माहौल बनाता है।

संज्ञा उपाध्याय: सामाजिक मैकेनिज़्म कैसा?

असद ज़ैदी: देखिए, पूँजी को राज्य की सभी शाखाओं और संस्थाओं में कार्यरत कारकुनों का भी इस आपराधिक तंत्र से तालमेल सुनिश्चित करना है। यह काम आजादी के फौरन बाद संभव न था। वह छूटा हुआ ऐतिहासिक काम अब हो रहा है -- भारतीय राज्य की आँखों के सामने, सरकार की जानकारी में हो रहा है। दो समांतर तंत्रों--अपराध की मशीनरी और राज्य की मशीनरी -- के बीच तालमेल बिना रिश्वत और भ्रष्टाचार के संभव ही नहीं। भ्रष्टाचार इस नये सिस्टम के लिए ऊर्जा का बुनियादी स्रोत है। इसके बगैर यह कारख़ाना ठप हो जायेगा। जब पानी सर के ऊपर से गुज़रने लगता है, और शहर का मध्यवर्ग भी बिलबिलाने लगता है, तो देवदूत की तरह अण्णा या रामदेव टाइप के उद्धारक प्रकट होते हैं। उनकी ख़ातिरदारी में तन-मन-धन से सबसे आगे कौन प्रकट होते हैं? कॉलोनाइज़र और बड़े बिल्डर लोग, कॉरपोरेट सी.ई.ओ., कॉरपोरेट एन.जी.ओ., व्यापारी मंडल और सबके पुराने सखा संघ परिवारी। तो विकल्प देने का काम भी उन्हीं का हुआ, जिनके कारण विकल्प की ज़रूरत पैदा हुई। मीर तक़ी मीर याद आते हैं -- ‘‘मीर क्या सादे हैं, बीमार हुए जिसके सबब / उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं।’’

संज्ञा उपाध्याय: मगर सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान क्या है?

असद ज़ैदी: इसमें दो बातें हैं। एक तो यह कि आज का पूँजीवाद जनतंत्र की परिभाषा को बदलना चाहता है। दूसरे, वह जनतंत्र की संस्थाओं और प्रक्रियाओं में लोगों का जो विश्वास है, उसे ख़त्म करना चाहता है। इसलिए पहली ज़रूरत यह है कि हम जनतंत्र को लगातार सही-सही परिभाषित करते रहें और जनता को बताते रहें कि वास्तविक जनतंत्र क्या है, मौजूदा व्यवस्था जनतांत्रिक क्यों नहीं है, और उसे कैसे जनतांत्रिक बनाया जा सकता है। यह काम वामपंथी दलों और जनवादी संगठनों का है। इसके लिए उन्हें अपनी बुनियादी राजनीति को, जिसे वे भूल गये लगते हैं, फिर से याद करना चाहिए और कोई बड़ा तथा व्यापक आंदोलन चलाना चाहिए। मीडिया पर आधारित और मध्यवर्ग तक सीमित राजनीति के दायरे में बंद रहने के बजाय उन्हें ज़मीनी आंदोलन चलाने चाहिएँ। जो ज़मीनी आंदोलन जनता की वास्तविक समस्याओं के कारण पैदा हुए हैं और पहले से चल रहे हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए, उनमें हिस्सा लेना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि वे हमारे नेतृत्व में चलेंगे, तभी हम उनसे जुड़ेंगे। अगर वे आपको अपना नेतृत्व नहीं करने देते, तब भी आपका फ़र्ज बनता है कि उन समस्याओं पर अपनी राय सामने रखें, उनके बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करें और उन आंदोलनों से दूर-दूर नहीं, बल्कि उनके साथ खड़े नज़र आयें। इसी तरह जनतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं में लोगों का विश्वास बहाल किया जा सकता है।

संज्ञा उपाध्याय: जनता में राजनीतिक चेतना जगाने का काम वामपंथी दलों का है और यह काम ज़रूरी होने के साथ-साथ संभव भी है, क्योंकि वामपंथी दलों की तमाम कमियों और कमज़ोरियों के बावजूद लोग अब भी परिवर्तन की उम्मीद उनसे ही करते हैं। मगर ऐसा लगता है, मानो वे स्वयं ही अपनी राजनीति भूल गये हों। पहले जब यह माना जाता था कि उनकी राजनीतिक दिशा रूस या चीन से तय होती है, तब उनकी कमियों और कमजोरियों के लिए रूस और चीन को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता था। मगर अब, जबकि वे अपनी राजनीति करने के लिए स्वतंत्र हैं, लोगों में राजनीतिक चेतना जगाने का काम क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

असद ज़ैदी: लगता है, मुख्य वामपंथी दलों ने खुद को उन मूल्यों से और दर्शन से भी अपने को मुक्त कर लिया है, जिनके कारण वे समाजवादी व्यवस्थाओं की तरफ़ झुके थे। वामपंथी दल कमोबेश खुद अपने ही इतिहास को, अपने अतीत को, अपनी स्मृति को भूलते जा रहे हैं और आधुनिक भारत के इतिहास के बुर्जुआ-लिबरल संस्करण को ही अपनाने पर तुल गये हैं। अपने संघर्षों, अपनी कुर्बानियों और अपने शहीदों को याद करना उन्होंने छोड़-सा दिया है। अपनी इतिहास-चेतना को निरस्त करके बुर्जुआ मिथकों के सहारे कोई कितनी दूर जा सकता है? आज के वाम पक्ष की बहुत-सी प्रमुख हस्तियाँ हरदम गांधी, पटेल, नेहरू की दुहाई देती नज़र आती हैं। राजनीतिक और विचारधारात्मक रूप से अब कई वामपंथी पार्टियाँ सोशल डेमोक्रेसी से भी पीछे जाकर टोनी ब्लेअर टाइप की न्यू लेबरनीतियों की तरफ रुख़ कर रही हैं। यह विनाश का रास्ता है। ये दल भद्रलोक को मोबिलाइज़ करने के प्रयास में हैं, जो कभी बड़ी तादाद में इनके साथ नहीं आयेगा। लेकिन आज के मीडिया युग में शायद राजनीतिक विज़िबिलिटी की यह शर्त बन गयी है कि शहरी मध्यवर्गीय कांस्टीटुएंसी से प्रणय निवेदन करते रहें।

संज्ञा उपाध्याय: यानी समाज के आधारभूत वर्गों और उनके बीच के संघर्षों को भुलाकर अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए वे शहरी मध्यवर्ग को रिझा रहे हैं?

असद ज़ैदी: जी, और चिंता की बात यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा’, ‘राष्ट्रहितऔर आंतरिक सुरक्षाआदि के नाम पर बड़े वाम दल राज्य की असंवैधानिक, आपराधिक और बर्बर कार्रवाइयों पर या तो बिलकुल चुप रहते हैं, या मौन समर्थन देने लगते हैं। कुछ मामलों में तो वे आगे बढ़कर सरकार से और ज्यादा सुरक्षा बलों की तैनाती करने, सख़्ती बरतने और दमन करने की अपील करने लगते हैं। विराट से विराटतर होते जाते सुरक्षातंत्र, खुफ़िया एजेंसियों के जाल और बढ़ते सैन्यीकरण पर अंकुश लगाने का माँग तो दूर, इन चीज़ों पर खुली चर्चा तक नहीं होती। फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में की जाने वाली हत्याओं पर वे सावधान चुप्पी लगाये रहते हैं। जब केंद्रीय जाँच ब्यूरो या न्यायपालिका द्वारा गठित जाँच दल ही पुलिस या राज्य की किसी एजेंसी के कुकर्म का परदा फ़ाश कर देते हैं, तब जाकर वामदल कुछ कहने का साहस कर पाते हैं। गोया पीड़ितों की आवाज़ उन्हें सुनायी नहीं देती। खुद अपने स्रोतों से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल करने की उनमें हिम्मत नहीं! सही और ग़लत का तब तक कोई मानी नहीं, जब तक राज्य या उसका कोई हिस्सा ही ऐसा न मान ले! अगर वाम नेतृत्व व्यवस्था के इतने आतंक और ऐसी ताबेदारी में रहेगा, तो कभी उसे चुनौती न दे पायेगा। वह विरोध करना ही भूल जायेगा। जब आपको गुजरात की, कश्मीर की, मध्य भारत के आदिवासियों की, उत्तर-पूर्व के लोगों की चीख़ सुनायी नहीं देती; जब आपको यह नहीं खटकता कि देश की जेलें ऐसे क़ैदियों से भरी जा रही हैं, जो मासूम हैं, पर मुसलमान हैं या आदिवासी हैं; तो आपको अपने बारे में कुछ शक होना चाहिए।

संज्ञा उपाध्याय: लेकिन सवाल फिर वही है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाये?

असद ज़ैदी: देखिए, पिछले दो दशकों में अनेक जन-आंदोलन हुए -- राष्ट्रीय स्तर के भी, इलाक़ाई भी, और किसी एक मुद्दे तक सीमित आंदोलन भी। ये ज़मीनी आंदोलन हैं। बुनियादी अधिकारों के सवाल उठाते हुए, विस्थापन से लड़ते हुए, विकास की दिशा पर सवाल उठाते हुए, जीने के हक़ और न्याय की माँग करते हुए। इनमें अधिकांश में न तो वाम का नेतृत्व था और न कोई ख़ास योगदान। यह ग़ैर-मौजूदगी न सिर्फ जन-आंदोलनों को अराजनीतिक दिशा में मोड़ती है, बल्कि खुद वाम के भीतर अराजनीतिकीकरण को बढ़ाती है। यह प्रक्रिया तभी रुक पायेगी, जब वाम अपनी वाम अस्मिता और अपने आंदोलनकारी चरित्र को रिकवर करेगा।

संज्ञा उपाध्याय: आज लोगों में यह धारणा घर कर गयी लगती है कि सभी भ्रष्ट हैं, सभी स्वार्थी हैं, सभी चोर हैं। इसके चलते तमाम राजनीतिक दलों, संस्थाओं, नेताओं, कार्यकर्ताओं और सरकारें बनाकर शासन करने वालों पर से उनका विश्वास हट गया है। इससे जो शून्य पैदा हुआ है, उसे एक तरफ बाज़ार भर रहा है, दूसरी तरफ़ मीडिया और मनोरंजन उद्योग, तीसरी तरफ़ धर्म के नाम पर चलने वाला व्यापार, चौथी तरफ तरह-तरह के एन.जी.ओ. और पाँचवीं तरफ स्वयं को सिविल सोसाइटी कहने वाले लोग। लेकिन ये सब मिलकर जनता को और ज्यादा अराजनीतिक बना रहे हैं। ज़ाहिर है कि इससे देशी-विदेशी पूँजीपतियों को लाभ होता है, इससे स्थानीय तथा भूमंडलीय पूँजीवाद मज़बूत और टिकाऊ बनता है। इसी कारण इन तमाम गतिविधियों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। इस दुष्चक्र के बीच राजनीतिक चेतना के विकास और प्रसार का काम कैसे किया जा सकता है?

असद ज़ैदी: आपने हालात को बड़ी अच्छी तरह मुख़्तसर में बयान कर दिया है। मैं यह बात दोहराना चाहता हूँ कि शासक वर्ग -- यानी सरमायेदार तबक़ा -- अब जनतंत्र की परिभाषा बदलना चाहता है। वह जनतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के प्रति लोगों में हताशा और विश्वासहीनता पैदा करने और उसे दोगुना-चैगुना करने में दिलचस्पी रखता है। वह दरअसल राजनीतिक तंत्र और समाज-व्यवस्था का फ़ासीवादी पुनर्गठन करना चाहता है। अब तक, यानी बीस साल पहले तक, उसे यह संभव नहीं लगता था, पर अब यह पूरी तरह संभव लगता है। सरमायेदारों, दलालों और अपराधियों का क़ब्ज़ा हर जगह बढ़ गया है। यह सिलसिला वैसे तो इमरजेंसी के समय से ही शुरू हो गया था, पर चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और अंतरराष्ट्रीय पूँजी के चहेते मनमोहन सिंह के शासन काल में परिपक्व होते हुए और रफ़्तार पकड़ते हुए यह अब एक क्रिटिकल मासअर्जित कर चुका है। नयी लफ़ंगी पूँजी भारतीय जनतंत्र का नृशंस पुनर्गठन कर रही है और पुराने और नये मीडिया घराने उसका साथ दे रहे हैं। अख़बार, टेलीविज़न और सिनेमा के माध्यम से जनतांत्रिक तहज़ीब के विरुद्ध आक्रामक अभियान काफ़ी समय से जारी है। कुल मिलाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि राजनीति भले लोगों की जगह नहीं है, कि यह ख़तरनाक धंधा है, कि आप कुछ नहीं कर सकते। यह प्रचार इसलिए सफल है कि यह लोगों के निजी अनुभव और व्यवस्था के भीतर उनकी तकलीफ़ों को छेड़ता है। लेकिन फिर वह उनकी भावनाओं को हमेशा एक प्रतिक्रियावादी, ग़ैर-जनतांत्रिक दिशा में मोड़ने की कोशिश करता रहता है।

संज्ञा उपाध्याय: कई लोग सोचते हैं कि ऐसे अराजनीतिक वातावरण में राजनीतिक चेतना के विकास और प्रसार की ज़िम्मेदारी साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वालों पर आ पड़ी है और इस ज़िम्मेदारी को निभाना उनका नैतिक कर्तव्य हो गया है। लेकिन इस क्षेत्र पर एक तरफ़ कलावाद, दूसरी तरफ बाज़ारवाद, तीसरी तरफ़ अवसरवाद और हर तरफ़ साहित्यकारों, कलाकारों तथा संस्कृतिकर्मियों को बड़े-बड़े पद, पुरस्कार, विदेश यात्राओं के अवसर आदि देकर अराजनीतिक या सभी तरह की राजनीति का विरोधी और स्थापित सत्ता का सहयोगी बनाने का कारोबार चलता नज़र आता है। ऐसी स्थिति में आप इस क्षेत्र से क्या उम्मीद रखते हैं या इसमें किस प्रकार के परिवर्तन की ज़रूरत महसूस करते हैं?

असद ज़ैदी: देखिए, जिम्मेदार संस्कृतिकर्मी हर हाल में अपना काम करेगा, और नुकसान भी उठायेगा। लेकिन क्या लेखक और कलाकार अपने कलाकर्म के बूते पूरे राजनीतिक शून्य और सामाजिक शून्य को भर सकते हैं? मोटे तौर पर संस्कृति का क्षेत्र भी सरमाये के पैदा किये नये दबावों से आज़ाद नहीं है। प्रतिगामिता वहाँ भी सक्रिय है। अब जिसे मैं पूँजीवादी अपराधतंत्र कहता हूँ, वहाँ भी बाज़ाब्ता शामिल हो गया है। वह अब साहित्य में भी कुछ पैसे फेंकने और कुछ ग्लैमर आयातित करने को उद्यत है। जगह-जगह लिटफेस्ट’ (साहित्योत्सव) होने लगे हैं। लोग मासूम भूखे पशुओं की तरह, कीट-पतंगों की तरह वहाँ इकट्ठे हो भी जाते हैं। इन आयोजनों को उसी तरह की आपराधिक पूँजी का सहयोग और समर्थन प्राप्त है, जिसका ज़िक्र हम कर चुके हैं। प्रलोभनकारी हस्तक्षेप की पुरानी विधियों का ज़िक्र आपने कर ही दिया है। पर उम्मीद का एक इलाक़ा है, जहाँ कलाकार की स्वायत्तता और उसकी प्रतिबद्धता उसके हाथ में होती है -- व्यक्तिगत नैतिकता का इलाक़ा। चूँकि साहित्य और अनेक कलाओं में रचना का काम मूलतः और प्रथमतः निजी स्तर पर होता है, इसलिए कलाकर्म में प्रतिक्रिवादी पूँजी का दख़ल लेखक या कलाकार की दहलीज़ से आगे, बिना उसकी अनुमति के कभी नहीं हो सकता।

संज्ञा उपाध्याय: हिंदी साहित्य में देखें, तो एक ख़ामोश नारा हर तरफ़ गूँजता प्रतीत होता है -- ‘‘दक्षिण न वाम, हमें तो अपने काम से काम!’’ यह एक आम प्रवृत्ति है, जो कलावाद और बाज़ारवाद की पूरी शह पाकर साहित्य में सक्रिय लोगों को अराजनीतिक और अवसरवादी बना रही है। ऐसी स्थिति में नैतिकता और प्रतिबद्धता की बात करने वालों को या तो मूर्ख और पिछड़ा हुआ माना जाता है, या किसी निजी स्वार्थ से प्रेरित कोई गुप्त राजनीतिक एजेंडा लेकर आने वाला। इस प्रवृत्ति के चलते ज़्यादातर साहित्यकारों के बीच सद्भाव और संगठित होने की इच्छा की जगह आपसी ईर्ष्याएँ, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धाएँ, आपसी शत्रुताएँ आदि इतनी बढ़ गयी हैं कि वे एक-दूसरे से कटकर अकेले और अलग- थलग पड़ गये हैं। शायद यही कारण है कि आज साहित्य में कोई आंदोलन नहीं है और लेखक संगठनों की हालत ख़राब है। इस स्थिति से निकलने या इसको बदलने के लिए क्या किया जा सकता है?

असद ज़ैदी: और तो क्या कहूँ, बस, ‘कलावादपर दो-एक बातें आपके सामने रख दूँ। हिंदी जगत में आजकल कुछ जगहों से कलावादका धुआँ-सा उठता दिखायी देता है। कला कहीं पार चली गयी लगती है। सारी ताक़त, पैसे और रसूख़ के बावजूद इसके स्वघोषित प्रवक्ताओं की हालत दयनीय है। ग़ालिब के शेर को अगर थोड़ा बदलकर पढ़ें, तो ‘‘इश्क़ मुझको नहीं हसरत ही सही/मेरी हसरत तेरी शोहरत ही सही’’ जैसी बात है। (ग़ालिब के यहाँ मूल शब्द 'वहशत था।) तो वहशतनहीं, ‘हसरतही है -- अगर इनमें वहशत होती, तो कुछ कला भी होती। पर एक कलमा है, जिसे पढ़ते रहिए, तो आरजू शायद बर आये! यह हर तरह की मीडियॉक्रिटी और यथास्थितिवाद को छिपाने वाला परदा बनकर रह गया है। रघुवीर सहाय ने सिर्फ दो पंक्तियाँ लिखकर इस विमर्श का नैतिक इलाज कर दिया था। लेकिन उनको गुज़रे अब लगभग चौथाई सदी हो चली है और नव-उदारवाद के हिंसक दौर में पुराने बेशर्म कैसे अपनी बेशर्मी पर क़ाबू रखें! इन लोगों के यहाँ कलाकार का अंतःसंघर्ष नहीं, नीलामघरों का शोर है। पूछने की बात है, कैसी कला और किसका कलावाद? यों तो कलावाद के भी अनेक प्रकार हैं।

संज्ञा उपाध्याय: जी हाँ, जब कला के लिए कलाका नारा शुरू-शुरू में यूरोप में दिया गया था, एक सही नारा था...

असद ज़ैदी: इसीलिए मैं कहता हूँ कि कलावाद अपने-आप में कोई बुरी चीज़ नहीं है और किसी सच्चे कलाकार के लिए कभी कोई समस्या नहीं रही। कलावाद उन्नीसवीं सदी में कलाकारों द्वारा पूँजीवादी उपयोगितावाद और औद्योगिक संस्कृति की विध्वंसकारी भूमिका के प्रगतिशील प्रतिरोध का ही एक रूप था। वह उस समय के उपभोक्तावाद और नवधनाढ्य वर्ग के अश्लील भौतिकतावाद के बहिष्कार का आंदोलन था। यह कला भवन के अंदर घुसने के बजाय कला भवन से बाहर निकलकर संभव हो सका था। ये ऐसी मूलगामी प्रेरणाएँ हैं, जो आज भी विभिन्न सांस्कृतिक आंदोलनों और कलाकारों की सामाजिक प्रतिबद्धताओं तथा प्रतिज्ञाओं को रौशन करती हैं, उनके लिए प्राणवायु का काम करती हैं। सच्चे कलाकार के पास कलावाद एक जलते हुए अंगारे की तरह होता है; एक ढोंगी सिद्धांतकार के हाथ में बस ठंडी राख होती है, जिसे प्रेरणाविहीन और आरामपसंद कवि और कलाकार अपने चेहरे पर मलकर समझते हैं कि उन्होंने अपनी मंज़िल पा ली। कलावाद किसी पद्धति विशेष का नाम नहीं है, न उसकी आड़ में कोई निषेध-सूची जारी की जा सकती है। जैसे कि राजनीति की बात न कीजिए, समाज की ज्यादा फ़िक्र न कीजिए, मार्क्सवाद को ख़याल में न लाइए, ज़ोर से न बोलिए, वग़ैरह!

संज्ञा उपाध्याय: लेकिन सच्चे कलावाद और झूठे कलावाद में फ़र्क करना भी तो एक समस्या है?

असद ज़ैदी: अगर समस्या है, तो केवल यही कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद शीतयुद्धीय पूँजीवाद के दौर में, यानी हमारे यहाँ आज़ादी के बाद के दौर से, पूँजीवाद के प्रवक्ता वर्ग ने या संस्कृति में मध्यस्थता करने वाले वर्ग ने इसे अपनी रणनीति का केंद्रीय औज़ार बना लिया। ऐसा इसलिए हो सका कि प्रगतिशील और वाम हलक़ों ने  -- ख़ासकर हिन्दी में -- उन्हें ऐसा करने दिया; इस अपहरण पर स्वीकृति की मुहर लगा दी। इससे कुछ पुरानी समस्या यह भी है कि सोवियत संघ में स्तालिन काल के वैचारिक द्वंद्वों में एक कला कला के लिएबनाम कला समाज के लिएभी था, जिसमें राज्य ने इस खोखले विभाजन को न केवल वैधता दी, बल्कि पक्षपातपूर्ण तरीक़े से बेजा हस्तक्षेप भी किया। स्तालिन और ज़्दानोव काल की सांस्कृतिक नौकरशाही ने एक अनावश्यक विभाजन पैदा करके ख़तरनाकऔर गैर-ख़तरनाककला के बीच और फलतः सुरक्षित और असुरक्षित कला के बीच एक स्पष्ट लकीर खींच दी। बहुत से लेखकों-कलाकारों और फ़िल्मकारों को यह सोचना पड़ता था कि अपनी अंतःप्रेरणा और संवेग के मुताबिक़ काम करना कहीं महँगा तो नहीं पड़ जायेगा। कहीं वे अपने समाज में समाजवादी राज्य-व्यवस्था द्वारा अवांछित और अन्यतो क़रार नहीं दे दिये जायेंगे? अति-राजनीतिकीकरण और दंडप्रेमी सांस्कृतिक पहरेदारी अंततः अवाम और कलाकार वर्ग के बड़े हिस्से को अराजनीतिकीकरण और यथास्थितिवाद की तरफ धकेलती है, क्योंकि इसी में उन्हें सुरक्षा दिखती है। यही चीज़ राज्य को भी सांस्कृतिक रूढ़िवाद और अनुष्ठान-प्रेम की ओर धकेलती है। कालांतर में राजसत्ता की हद्दे-नजर में बेहतर कला की जगह सुरक्षित कला ही रह जाती है। एक प्रकार का परफ़ेक्ट रूपवाद। लगभग वैसा ही, जैसा सामंतों और प्रतिक्रियावादी बुर्जुआजी को भी चाहिए होता है।

संज्ञा उपाध्याय: हमारे यहाँ क्या स्थिति है? ख़ास तौर से हिंदी साहित्य में?

असद ज़ैदी: हमारे यहाँ तो इस प्रवृत्ति ने वाम में घुसे कुछ हिंदी पुरोहितों और वाम-विरोधी पुरोहितों के बीच एक शांतिपूर्ण श्रम-विभाजन का रूप ले लिया -- कि आप कला यानी कला कला के लिएकी बात करें और हम समाज यानी कला समाज के लिएकी बात करेंगे। यह भला कोई विभाजन हुआ! यह मॉडल तो द्विराष्ट्रीय सिद्धांत के मॉडल से मिलता है। यह कैसा पैक्ट था? इस संधि को माना किसने? निराला ने? मुक्तिबोध ने? रघुवीर सहाय ने? विनोद कुमार शुक्ल ने? मंगलेश डबराल ने? मुझे मालूम है कि बेसूद बहसों पर लाखों पन्ने रँगे गये हैं और यह इन लोगों के -- ख़ास कर हिंदी शिक्षक वर्ग और हिंदी उद्योग के -- हित में है कि ऐसे ही पन्ने रँगे जाते रहें। यह सुलह और श्रम-विभाजन कैसे संभव हुए? ये इसलिए संभव हो पाये कि दोनों पक्षों के नेतृत्व में जाति, धर्म और भाषा के सवालों पर अद्भुत वैचारिक साम्य और भाईचारा था। मसलन, ‘हिंदी जातिकी अवधारणा, उर्दू को अन्यकी तरह परिभाषित करना, दिल में जाति मुँह पर वर्ग, फिर वर्ग-प्रतिरोध की जगह राष्ट्र-निर्माण’, प्रच्छन्न सांप्रदायिकताएँ, जनतंत्र की जगह बहुमतवाद, स्त्री-स्वातंत्रय की जगह गृहलक्ष्मीवाद या कि गृहशोभावाद। ये सब कमोबेश सहमति के क्षेत्र रहे। प्रतिस्पर्धा के लिए एक-दो बातें रह गयीं -- रूप बनाम वस्तु, ‘कलावादबनाम जनवाद’, सामाजिक मुक्ति बनाम व्यक्ति- स्वातंत्र्य, अमरीका बनाम रूस। यह प्रतिस्पर्धा भी एक तरह की जातीय कुश्ती ही है, क्योंकि यह एक सुलह, उपरोक्त श्रम-विभाजन, के तहत ही संपन्न होती है। इसमें उल्लंघन कहाँ है? मुझे तो हिंदी के कथित कलावादियों के काम में कहीं कोई ट्रांसग्रेशन नज़र नहीं आता। ज़रा ग़ौर से देखें, तो वर्ण-व्यवस्था और सामंती परंपरा का पैथॉस ही दिखायी देगा। और सच तो यह है कि कथित प्रगतिशील ख़ेमे के स्वनामधन्य आचार्यों और उनकी सरपरस्ती में लिखते फ़रमाबरदार लेखकों के काम में भी प्रगतिशीलता एक रस्म अदायगी भर है। वहाँ भी सर्वानुमति की खोज और पेशेवराना महत्त्वाकांक्षा ही है। ये कहीं भी किसी से भी जाकर सुलह कर लेते हैं।

संज्ञा उपाध्याय: हिंदी में कुछ लोग शान से स्वयं को कलावादी कहते हैं...

असद ज़ैदी: जी हाँ, मगर अपने कलावाद का ऐलान करने वाले ये लोग कलाबाज़ भले ही हों, कलावादी तो बिलकुल नहीं हैं। ये किसी भी तरह के गंभीर एंगेजमेंट से भागने वाले आरामतलब लोग हैं। हिंदी में श्री अशोक वाजपेयी पर कलावादी होने का पुराना इल्ज़ाम है; वही कलावादी ख़ेमेके सरदार माने जाते हैं। यह रियासत पाकर वे प्रसन्न भी रहते हैं। मैंने देखा है कि जब इन्हें कुछ अरसे तक कोई कलावादी नहीं कहता, तो ये परेशान-से हो जाते हैं। खुद ही याद दिलाने लगते हैं। अपने कॉलम में लिखते हैं कि भई, हम तो कलावादी ठहरे या ऐसा ही कुछ। गर्ज यह कि कोई दूसरा भी इन्हें कलावादी कहे, तभी तो ये आश्वस्त होंगे कि अभी टाइटिल इन्हीं के पास है, कहीं और से दावेदारी नहीं आ रही।

संज्ञा उपाध्याय: लेकिन कलावादियों का विरोध करने वाले प्रगतिशील और जनवादी लोगों में भी तो कई ऐसे लोग मिल जायेंगे, जो प्रगतिशील और जनवादी ख़ेमे के सरदार माने जाते हैं और उस ख़ेमे को अपनी रियासत समझते हैं?

असद ज़ैदी: जी, ऐसे लोग भी हैं और खूब हैं। मगर सवाल यह है कि प्रगतिशील, जनवादी या वामपंथी लेखकों के संगठनों में ऐसे लोग क्यों और कैसे आ गये? मुझे लगता है कि हमारे वामपंथी लेखक संगठनों की जो हालत है, उसका कारण हमारे वामपंथी राजनीतिक दल हैं। जो राजनीतिक स्तर पर उनके साथ हो रहा है, वही उनके सांस्कृतिक संगठनों के साथ हो रहा है। ये संगठन न जन-संगठन की तरह काम कर रहे हैं, न ही जागरूक वामपंथी हरावल दस्ते की तरह। पहले समझ यह थी कि ये वामपंथी हरावल दस्ते नहीं, जन-संगठन हैं। इनमें हर जागरूक प्रगतिशील आदमी के लिए, चाहे वह वामपंथी हो या नहीं, जगह रहनी चाहिए। उससे संवाद की जगह रहनी चाहिए। ज़ाहिर है, फ़ासिस्ट प्रवृत्ति के लोगों की जगह इनमें नहीं हो सकती, लेकिन ये जनतांत्रिक मंच हैं। मगर इस समझ के मुताबिक़ हमने काम नहीं किया। यही वजह है कि आज हम बस एक साइनबोर्ड बनकर रह गये हैं। एक दफ्तर है, लेटरहैड है, एक बुलेटिन निकलता है, कुछ रिचुअल्स हैं। जो व्यापक लेखक समाज है, जो लिख रहे हैं, जो सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग हैं, उनसे हमने पीठ मोड़ ली है। हम समझते हैं कि वे खुद आयेंगे हमारे पास। हमारे और रचनाकार समुदाय के बीच में कोई पुल नहीं रह गया है। एक दफ़्तरीपन छाया रहता है। इन संगठनों के नेता किन्हीं सरकारी दफ़्तरों के मुंशियों की तरह हैं। वे कहीं से भी लेखकों के प्रतिनिधि या नेता नहीं लगते। जो लेखकों से संवाद कर सकें, जो बहस चला सकें और जो सांस्कृतिक माहौल में हस्तक्षेप कर सकें, ऐसे लोगों को ये न तो अपने संगठनों में शामिल करते हैं, न उनकी क़द्र करते हैं।

संज्ञा उपाध्याय: तो आपके विचार से इन संगठनों को क्या करना चाहिए?

असद ज़ैदी: इन संगठनों को सांस्कृतिक चेतना के निर्माण का काम करना चाहिए। तरह-तरह के लोगों से संवाद करना चाहिए। आज जो इतने सारे लोग तरह-तरह की विधाओं में लिख रहे हैं, उन पर ध्यान देना चाहिए। उनसे संवाद करना चाहिए। हो सके, तो उनकी ट्रेड-यूनियन की तरह भी काम करना चाहिए और उनके हितों की रक्षा के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। पहले के प्रगतिशील और जनवादी लेखक संगठन ऐसा इसलिए कर पाते थे कि उनके नेताओं में एक निष्ठा थी और वे व्यापक लेखक समाज से जुड़े हुए थे। वे लेखक संगठनों तथा व्यापक सांस्कृतिक समुदाय के बीच पुल का काम करते थे।

संज्ञा उपाध्याय: उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ भी तो अलग थीं!

असद ज़ैदी: आप सही कह रही हैं। उस समय आंदोलन बहुत ज़्यादा थे। अब आप लेखकों को घसीटकर ले भी आयें, तो आपके पास उनको दिखाने के लिए क्या है? समाज की समस्याओं से आप कटे हुए हैं, तो कैसे उन लेखकों से जुड़ेंगे? लेखक संगठनों में विभिन्न प्रकार के लेखकों का आना बहुत कुछ उन संगठनों की लीडरशिप पर निर्भर करता है। एक ज़माना था, जब प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर जैसे लोग थे। उनके प्रभाव में अनेक लोग रातोंरात इधर आ गये थे। अब इस तरह की इंस्पायंरिग लीडरशिप नहीं है हमारे पास। तो नये लेखक कहाँ से आयेंगे?

संज्ञा उपाध्याय: लेकिन नये लेखक भी तो उन पुराने ज़मानों के-से लेखक नहीं रह गये हैं! 

असद ज़ैदी: इसकी वजह यह है कि अब हिंदी के लेखक समुदाय की सामाजिक परिस्थिति बदल गयी है। हमसे पहले के और हमारी पीढ़ी तक के हिंदी के लेखक ज़्यादातर निम्न-मध्यवर्ग से आते थे। प्रायः सभी को ग़रीबी, अभाव और भूख का कुछ न कुछ अनुभव होता था। लेकिन सब स्वाभिमानी होते थे। उनका अपना एक ईगो होता था, जिससे वे समझौता नहीं करते थे। आज के हिंदी लेखक का वर्ग बदल गया है। उसकी भाषा बदल गयी है। उसकी आकांक्षाएँ भी बदल गयी हैं। वामपंथी लेखक संगठनों को इन पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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