हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

उठाए जा रहे अभिव्यक्ति के खतरे

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/19/2013 12:23:00 AM

ब्राह्मणवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ लगातार लिखने-बोलने वाले चिंतक-आलोचक कंवल की गिरफ्तारी ने एक बार फिर देश पर काबिज फासिस्ट शासक वर्ग के ब्राह्मणवादी चेहरे को उजागर किया है-उदारवाद, जनतंत्र, लोकतंत्र आदि के बहरे कर देनेवाले और बढ़ते जा रहे शोर के बीच लेखकों-संस्कृतिकर्मियों-गायकों-पत्रकारों-छात्रों और कलाकारों को मिल रही धमकियां और उनकी गिरफ्तारियां यह भी दिखाती हैं कि मुक्तिबोध का सपना जिंदा है-फासीवादी राजसत्ता के खिलाफ अभिव्यक्ति के खतरे उठाए जा रहे हैं. और यही बात सबसे ज्यादा भरोसा दिलाती है. 

पेश है, कंवल भारती की गिरफ्तारी के खिलाफ आलोचक वीरेंद्र यादव का लेख, शुक्रवार से.

फेसबुक पर टिप्पणी लिखने के कारण विगत सप्ताह चर्चित दलित लेखक कँवल भारती की गिरफ्तारी ने जहाँ सत्ता मद में डूबे राजनेताओं के अहंकार को बेपर्दा किया है वहीं सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को भी उजागर किया है. पिछले वर्ष शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे संबंधी टिप्पणी के कारण मुम्बई में दो छात्राओं की गिरफ्तारी के बाद  फेसबुक टिप्पणी के चलते राजनेताओं की शह पर पुलिसिया कारवाई की यह दूसरी बड़ी घटना है. गनीमत यह है कि दोनों ही घटनाओं में न्यायिक हस्तक्षेप ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की है. उ.प्र. के रामपुर जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने फेसबुक पर टिप्पणी लिखे जाने को अपराध न मानते हुए कँवल भारती को तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया. लेकिन हैरत और चिंता की बात यह है कि उ.प्र. सरकार के जिस बड़बोले काबीना मंत्री के समर्थकों के रोष का शिकार कँवल भारती हुए हैं वे अब पुलिस पर दबाव बनाकर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में गिरफ्तार किये जाने की मांग कर रहे हैं.

दरअसल इस पूरे मसले की शुरुआत नोएडा की निलंबित आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के पक्ष में बनते जन दबाव का परिणाम है. कँवल भारती ने 4 अगस्त को फेसबुक पर यह टिप्पणी लिखी कि “आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल इन दोनों ही मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गयी है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आज़म खां और मुलायम सिंह (यू.पी. के ये चारों मुख्य मंत्री) इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोक लें, लेकिन जो हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं, (क्योंकि जनता से पूरी तरह कट गये हैं) वह यह है कि जनता में इनकी थू-थू हो रही है, और लोकतंत्र के लिए जनता इन्हें नाकारा समझ रही है. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गये हैं. ये अपने पतन की पट कथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गये इन लोगों को समझाने का मतलब है भैस के आगे बीन बजाना.''

इसके पूर्व 2 अगस्त की टिप्पणी में उन्होंने लिखा था कि  “आपका "आज तक" कैसे सबसे तेज है? आपको तो यह ही नहीं पता कि रामपुर में सालों पुराना मदरसा बुलडोजर चलवा कर गिरा दिया गया और संचालक को विरोध करने पर जेल भेज दिया गया जो अभी भी जेल में ही है. अखिलेश की सरकार ने रामपुर में तो किसी भी अधिकारी को सस्पेंड नहीं किया. वह इसलिए कि रामपुर में आज़म खां का राज चलता है, अखिलेश का नहीं. उनको रोकने की मजाल तो खुदा में भी नहीं है”.

कँवल भारती रामपुर के ही हैं जहाँ आज़म खां की मर्जी सर्वोपरि है. दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले के समानान्तर रामपुर में मदरसा गिराने के सच को उजागर करना ही कँवल भारती की गिरफ्तारी और उत्पीड़न के मूल में है. फेसबुक की प्रकृति और खुलेपन को देखते हुए कँवल भारती की टिप्पणी में अपने जनतांत्रिक मत की अभिव्यक्ति ही की गयी  है. सैकड़ों लोगों ने इस टिप्पणी को ‘लाईक’ और शेयर भी किया है .उ.प्र. में आरक्षण और दुर्गा शक्ति नागपाल के मसले पर सरकार को अख़बारों और फेसबुक की सैकड़ों टिप्पणीयाँ के माध्यम से पहले ही प्रश्नांकित किया जा चुका है. इसलिए कँवल भारती पर कारवाई के मूल में रामपुर की स्थानीय राजनीति और आज़म खां के समर्थकों का सत्ता मद ही है. यह अनायास नहीं है कि कँवल भारती के विरुद्ध पुलिस में प्राथमिकी आज़म खां के स्थानीय मीडिया प्रभारी द्वारा ही दर्ज कराई गयी है. उल्लेखनीय यह भी है कि भारतीय दंड संहिता की जिन धारा 153 व 295 ए के अंतर्गत कँवल भारती के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है ये वही धाराएँ हैं, जिनके अंतर्गत वरुण गांधी के विरुद्ध सांप्रदायिक विद्वेष फ़ैलाने का मामला दर्ज किया गया था. जबकि कँवल भारती की फेसबुक टिप्पणियों में किसी धर्म और सम्प्रदाय का न तो कोई उल्लेख है और न कोई उत्तेजक कथन. निश्चित रूप से  गिरफ्तारी की यह पुलिसिया कारवाई राजनीतिक दबंगों की प्रशासन से आपराधिक सांठ गाँठ का ही नमूना है. यह वास्तव में चिंता की बात है कि राजनीतिक दबंगई का सहारा लेकर उत्तर प्रदेश ही नही देश के अन्य हिस्सों में भी प्रतिरोध की जनतांत्रिक आवाजों का दमन किया जा रहा है. भय का ऐसा वातावरण बनाने के दुष्प्रयास जारी हैं ताकि लिखने पढने वालों का जोखिम के इलाके में हस्तक्षेप दूभर हो जाये.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस समूचे घटनाक्रम में कँवल भारती के रूप में एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष और वाम चेतना से लैस अम्बेदकरवादी बुद्धिजीवी की घेरेबंदी की गयी है जिसकी दलित विमर्श में एक हस्तक्षेपकारी भूमिका रही है. संकीर्ण राजनीतिक नजरिये से दूर कँवल भारती ने ‘कांशीराम के दो चेहरे’ सरीखी पुस्तक तब लिखी थी जब मायावती का शासन था और वे स्वयं राजकीय सेवा में थे. अपनी एक दर्ज़न से अधिक पुस्तकों में उन्होंने वर्णाश्रमी ब्राह्मणवाद का क्रिटीक रचते हुए एक समतावादी समाज का विकल्प प्रस्तावित किया है. उन्होंने अपने लेखन में दलित अतिवाद का भी विरोध किया है. यही कारण है कि समूचा बुद्धिजीवी समाज आज उनके पक्ष में एकजुट है. सोशल मीडिया पर भी उनके पक्ष में व्यापक एकजुटता देखने को मिल रही है. मानवाधिकार कार्यकताओं ने भी इस मसले पर मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप की मांग की है.

यह आश्वस्तकारी है कि देश के तीनों बड़े लेखक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच सहित स्वतंत्र लेखकों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों ने भी इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर हमला मानते हुए अपना रोष और प्रतिरोध दर्ज कराया है और प्रदेश सरकार से कँवल भारती पर से तुरंत मुकदमा हटाने और माफी मांगने की मांग की है. एक अहंकारी मंत्री के समर्थकों के चलते कँवल भारती की गिरफ्तारी का यह प्रकरण दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन की घटना के बाद उ.प्र. सरकार की जनतांत्रिक छवि पर बडा कलंक है. उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रदेश सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करते हुए अपनी दिनोंदिन गिरती शाख को और अधिक गिरने से बचायेगी.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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