हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

रणेन्द्र का नया उपन्यास: गायब होता देश

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/16/2013 12:52:00 PM

जल्दी ही, अगले साल के शुरुआती महीनों में, रणेन्द्र का नया उपन्यास गायब होता देश आपके बीच होगा. उनके पहले उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता ने बड़े सुकून के साथ हिंदी साहित्य की दुनिया में दस्तक दी और वह जगह बना ली, जो पिछले दो-तीन दशकों में आए बहुत कम उपन्यासों को हासिल हुई है. ग्लोबल गांव के देवता की कई सारी खूबियों में एक खूबी यह थी कि उसने अपने वक्त की नब्ज पर हाथ रखा. उसमें एक तरफ आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लूट के साम्राज्यवादी अभियान को परत दर परत को उजागर किया गया था तो दूसरी तरफ लेखक पूरी मजबूती के साथ आदिवासियों के बहादुराना संघर्षों की हिमायत में खड़ा हुआ. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस पूरे मसले को कहीं अधिक गहराई और विस्तार में छूते हुए रणेन्द्र ने आदिवासियों के संसाधनों, अधिकारों, संस्कृति और स्मृति पर साम्राज्यवादी-सामंती हमलों की पड़ताल की है. लेकिन यहां आदिवासी संतप्त और त्रस्त नहीं है, वह लड़ रहा है. अपने पूरे बूते के साथ वह दुनिया की महाशक्तियों के खिलाफ युद्धरत है. और इन दो छोरों के तनाव के बीच हम नायकों, प्रतिनायकों, अ-नायकों की एक पूरी जमात को देख सकते हैं. हाशिया पर उपन्यास के अंशों के अलावा आप समय समय पर विभिन्न आलोचकों-लेखकों की टिप्पणियां भी पढ़ेंगे. सबसे पहले प्रसन्न कुमार चौधरी की टिप्पणी.

समकालीन रचनाकारों में रणेन्द्रजी मेरे अत्यन्त प्रिय रचनाकारों में हैं। उनके उपन्यास, लेख, उनकी कविता, समीक्षा मैं पूरे मनोयोग से पढ़ता रहा हूँ। उनकी रचनाओं पर कुछेक टिप्पणी करना एक बात है। उन पर गंभीरतापूर्वक कुछ लिखना अथवा उनकी समीक्षा करना बिल्कुल अलग बात है। उनके नवीनतम उपन्यास 'गायब होता देश' पर तो यह बात और भी लागू होती है।

हमारे समय की यह अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति अनेक आयामों को एक साथ समेटती चलती है, वह भी काफी कुशलता के साथ और बांधनेवाली आकर्षक भाषा के विभिन्न स्वरूपों में। इसमें जनजातीय (खासकर मुंडारी) समाज का जीवंत लोक है, उनका इतिहास,  उनका मिथक, रहन-सहन, पर्यावरण है, संघर्षों की उनकी गौरवशाली विरासत है। सभी पाठकों के लिए यहाँ जानने, सीखने-समझने की अनेक बातें हैं। वर्तमान में देशी-विदेशी पूंजी, नौकरशाही और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के त्रिकोण में इतिहास और भूगोल से सदा के लिए गुम कर दिए जाने की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अनवरत साजिशों के खिलाफ अपनी अस्मिता, अपनी संस्कृति, अपनी आजादी के लिए विभिन्न स्तरों पर लड़ी जानेवाली इन समुदायों की लड़ाई की आत्मीय गाथा है। (वैसे किशनपुर-दिल्ली-पुष्पपुर के त्रिकोण के साथ-साथ कई अन्य त्रिकोण का भी साक्षात सहज ही किया जा सकता है। किशनपुर के स्थायी कोण के साथ न्यूयॉर्क-दिल्ली-किशनपुर, मणिपुर-किशनपुर-गोवा, फूकेत-किशनपुर-दुबई...) चरका साहब और उनके संगी साथियों की अन्दरूनी दुनिया का साक्षात्कार है, वास्तुशिल्प की रोचक झांकी है, महानगरों में तेजी से फैलते रियल इस्टेट कारोबार का हिंसक यथार्थ है, पत्रकारिता का सफेद-स्याह संसार है। सोमेश्वर सर हैं, स्मृति का रहस्यलोक है, और इस रहस्यलोक में विचरने की, सोना लेकुम दिसुम के अदृश्य गर्भ-लोक में झांकने की जिद है। बोधगया का भूमि आन्दोलन है, चौहत्तर के आन्दोलन के दौरान किशन विद्रोही-कमला का प्रेमोत्कर्ष है, और है आन्दोलन-च्युत प्रेम का पराभव भी। बीच-बीच में मिथिला की झांकी है, अपने सामाजिक-आर्थिक आयाम के साथ ब्राह्मण परिवार की कलह-कथा है। किशन-अनुजा का बैंजनी मधुलोक तो पूरी कथा का मनमोहक टेम्प्लेट है ही। यह एक प्रेम कथा भी है और थ्रिलर भी। रियल एस्टेट कारोबारियों के हाथों किशन विद्रोही की हत्या-कथा का रोमांचक अन्त (बेटे की मध्यस्थता से) किशन परिवार की कलह-कथा के जरिये विद्रोही सर की जीवन-कथा में होता है। लगभग कोई पात्र एक-आयामी नहीं है, सभी पात्रों के अपने-अपने ग्रे-शेड्स हैं।

विभिन्न क्षेत्रों के रचनाकार अपनी रचनाओं के जरिये अपने-अपने क्षेत्रों में प्रचलित अनेक शब्दों, मुहावरों, आदि से हिन्दी के शब्द-कोश को समृद्ध करते रहे हैं। जाहिर है झारखंड के हिन्दी लेखकों का एक महत्वपूर्ण योगदान अनेक जनजातीय शब्दों और मुहावरों से हिन्दी के शब्द-कोश को समृद्ध करना है। इस लिहाज से भी यह उपन्यास खास महत्व रखता है।

इतने सारे आयामों को बांधकर चलनेवाली रचना हमारे समय के नामचीन साहित्यालोचकों के लिए भी चुनौती है। रणेन्द्रजी की यह रचना उनकी परीक्षा लेगी।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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