हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

धधकते बस्तर में ‘नीरो’ की बंसी

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/15/2013 11:12:00 AM

बस्तर ही नहीं, देश के आदिवासी इलाकों में ऑपरेशन ग्रीन हंट को शुरू हुए चार साल हो गए. और भारतीय राज्य यह युद्ध सिर्फ अपने अर्धसैनिक बलों, पुलिस, सेना, वायु सेना और ड्रोनों के जरिए ही नहीं लड़ रहा. खबरें, फिल्में, दमनकारी कानून, अदालतें, थाने और अब साहित्य का एक हिस्सा भी वंचित और उत्पीड़ित जनता के खिलाफ इस साम्राज्यवादी-ब्राह्मणवादी युद्ध में भारतीय राजसत्ता के साथ खड़ा है. पिछले साल (2012) हंस के सितंबर अंक में प्रकाशित तरुण भटनागर की कहानी चांद चाहता था कि धरती रुक जाए इस युद्ध का एक साहित्यिक चेहरा है. हाशिया पर आप अनिल अनलहातु द्वारा इस कहानी की आलोचना पहले पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए जाने माने लेखक वीरेंद्र यादव द्वारा लिखी यह आलोचना, जो हंस के नवंबर, 2012 अंक में प्रकाशित हुई थी.

‘‘वे नग्न थे, बेघर और कई बार भूखे भी, पर वे नाचते थे, गाते थे। भला वह चीज कैसे छूट जाए जो नग्नता और भूख से भी ज्यादा अहम हो? वे बस इतना ही कहना चाहते थे कि उन्हें नहीं चाहिए तुम्हारा भरपेट खाना और कपड़े या यहीं कि जिसे तुम घर कहते हो या मानते हो...वे सब रात को मदमस्त नाचना चाहते हैं...”

‘हंस’ के सितंबर 2012 अंक में प्रकाशित अपनी कहानी ‘चांद चाहता था कि धरती रुक जाए‘ में तरूण भटनागर बस्तर के आदिवासियों के संघर्ष का उपरोक्त सरलीकरण करते हुए उसी भूमिका में हैं, जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य सरकार का पर्यटन विभाग। जिस प्रकार वहां पर्यटन विभाग बस्तर के आदिवासी जीवन को घोटुल का पर्याय मानता है उसी तरह कहानीकार बस्तर के समूचे संघर्ष को घोटुल बचाने और नष्ट करने की कोशिशों तक सीमित कर देता है। यूं तो बाहरी दुनिया सैलानी दृष्टि के चलते बस्तर और घोटुल एक-दूसरे के पर्याय लंबे समय से रहे हैं, लेकिन जब बस्तर सहित समूचे दंडकारण्य में जल, जंगल और जमीन को छीनने व बचाने का संघर्ष छिड़ा हो तब ‘नाच बनाम भूख‘ की यह कथा-प्रस्तुति सचमुच स्तब्धकारी है।

वैसे इसमें नया कुछ भी नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रचारक और समर्थक पत्रकार व बुद्धिजीवी आदिवासियों के समूचे संघर्ष को ‘बस्तर की संस्कृति बनाम बाहरी व्यक्ति‘ का विमर्श बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं। भाजपा के बलबीर पुंज सरीखों के लेख और कांग्रेस के महेंद्र कर्मा सरीखों के वक्तव्य इसके प्रमाण हैं। नया बस इतना है कि अब तक जो कार्य सरकारी प्रचार तंत्र और भाड़े के पत्रकारों द्वारा किया जाता था, अब वह साहित्यिक रचनाओं द्वारा भी किए जाने की शुरुआत हो चुकी है। अब तक शिकायत यह थी कि हिंदी का रचनाकार जोखिम इलाके में जाने से बचता है, लेकिन अब हैरत इस बात पर है कि जोखिम के इलाके का रहवासी होने की सनद पेशकर वह किस प्रकार जोखिम का छद्म घटाटोप गढ़ता है।

यह अकारण नहीं है कि तरुण भटनागर ने अपनी कहानी में ‘आदिवासी बनाम बाहरी व्यक्ति‘ का जो विमर्श रचा है ‘उसमें बाहरी व्यक्ति न तो जंगलात का अमला है, न कार्पोरेट घराने, न ठेकेदार और न दमनकारी पुलिस और सैन्य तंत्र। बाहरी व्यक्ति आदिवासियों को अपने दमन के विरुद्ध एकजुट करने वाले उनके वे समर्थक, शुभचिंतक व संघर्षों के साथी हैं जिन्हें नक्सल व माओवादी करार देकर खलनायक की छवि में ढाला जाता है। बस्तर सहित समूचे दंडकारण्य में माओवादी आंदोलन व संगठन की उपस्थिति एक सर्वविदित तथ्य है, लेकिन उन्हें ‘आदिवासियों के स्वर्ग में सेंध लगाने वाला’ बताकर प्रस्तुत करना सरकारी दुष्प्रचार को बल देना है। विचारणीय यह भी है कि आदिवासियों के बीच माओवादियों की जड़ें जमीं क्यों? कैसा था बस्तर का घोटुलमय स्वप्निल संसार वहाँ माओवाद के पैठ के पहले? ये सारी स्थितियाँ अब पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में उपलब्ध हैं। अरुंधति राय और गौतम नवलखा सरीखे आदिवासियों के हमदर्दों के आंखों देखे वृत्तांत पर जिन्हें न भी भरोसा हो तो उन्हें सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक ‘रेड सन’, यान मिर्डल की ‘रेड स्टार ओवर इंडिया’ और राहुल पंडिता की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘हेलो बस्तर’के पृष्ठों से जरूर गुजरना चाहिए। इन्हें इसलिए भी पढना चाहिए कि ये तरुण भटनागर की कहानी की तरह ‘ट्राइबल टूरिज़्म’के ब्रोशर न होकर विकास के नाम पर ‘जल, जंगल, जमीन’ की लूट और आदिवासियों के उस उत्पीड़न का पता देते हैं जो माओवाद का जड़ जमाने का मूल कारण है। ये पुस्तकें बस्तर के हिंसक संघर्षों के उन दो छोरों का खुलासा करती हैं जिनका एक छोर आदिवासियों के बस में है तो दूसरा कार्पोरेट घरानों की लूटतंत्र के पक्ष में। तरुण भटनागर की कहानी लाल झण्डे की प्रतिरोधी हिंसा का विमर्श तो रचती है, लेकिन कार्पोरेट समर्थक राज्य की हिंसा का दृश्य ओझल कर देती है, क्यों? इसलिए कि प्रतिरोधी हिंसा को ‘पथभ्रमित, लक्ष्यहीन और अन्यायपूर्ण’ करार दिया जा सके!

कहानीकार खुद को बस्तर की माटी का बताते हुए वहाँ उन्नीस साल का होने तक का वास्ता देकर बस्तर की स्थितियों का प्रत्यक्षदर्शी होने के नाते उसने घोटुल में ‘सुधबुध खो चुके जवान जिस्म’,  ‘कामोत्तेजक नृत्य’ और ‘फड़फड़ती देहें’ तो देखीं लेकिन जंगल की उस लूट और बेदखली को नहीं देखा जिसका प्रतिरोध किए बिना न आदिवासियों का जीवन बचता न संस्कृति। आखिर ऐसा  क्यों है कि आदिवासियों के जिस शोषण को बाकी सब ‘बाहरी वृत्तान्तकारों ने देखा वह ‘भोगे हुए यथार्थ’ की  दुहाई देने वाले माटी के लाल कहानीकार ने नहीं? बेशक यह कहानीकार की अपनी चयन दृष्टि है कि वह कहानी की विषय वस्तु में क्या छोड़े और क्या शामिल करे। लेकिन कठिनाई तब पैदा होती है जब वह पूंजी और पूंजी विरोधी दर्शन से आदिवासियों के विलगाव और अजनबियत की सैद्धांतिकी रचते हुए उनके ‘शोषण और गरीबी’ को लाल झण्डे वालों की निर्मिति मान लेता है और उनके ‘दाल, रोटी और झोपड़ी’के संघर्ष को पूँजी का षड्यंत्र।

तरुण भटनागर की दलील है कि ‘बस्तर  में आज ही तेंदु पत्ता, इमली, महुआ ज्यादा बड़ा मुद्दा है बनिस्पत जमीन के।’ लेकिन उनकी कहानी संघर्ष के इन मुद्दों का भी पता नहीं देती, क्यों?शायद इसलिए कि इन संघर्षों में भी आदिवासियों का साथ देने के लिए वे ‘बाहरी’आदमी ही थे जिनका कोई सकारात्मक उल्लेख कहानीकार की अपनी राजनीति के लिए वर्जित है। राहुल पंडिता ने अपनी पुस्तक ‘हेलो बस्तर’में इन परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि,  “...इन जंगलो से मध्यप्रदेश सरकार को अस्सी के दशक तक प्रति वर्ष 250 करोड़ का राजस्व प्राप्त होता था...लेकिन आदिवासियों को उन दिनों 100 तेंदु पत्ता का बंडल बनाने पर सिर्फ 5 पैसे मिलते थे और 120 बांसों के बोझ को तैयार करने की उनकी मजदूरी मात्र एक रुपया थी। अक्सर आदिवासी भूखे पेट काम करने पर विवश होता था। जिस जंगल में वह काम करता था वहाँ साँप, बिच्छुओं, भालुओं, तेंदुओं और अन्य जंगली जानवरों की भरमार थी...एक किलो नमक के बदले उसे एक किलो सूखे मेवे या आठ किलो ज्वार देना पड़ता था। जिस इमली की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में व्यापारी 400 रुपए वसूलता था उसे ही खरीदने के लिए वह आदिवासी को एक रुपए से भी काम कीमत चुकता था। उद्योगपति और व्यापारी जंगल की जमीन को सस्ते दामों पर सरकार से खरीदकर भूमिहीन आदिवासियों को नाम मात्र ही मजदूरी देकर खेती करवाते थे। अक्सर जंगल में जलावन के लिए लकड़ी इकट्ठा करते आदिवासियों को डरा-धमकाकर उसे अपने घर की स्त्रियों  को वन विभाग के अमले के पास भेजने के लिए मजबूर किया जाता था...”  शोषण के इस अंतहीन सिलसिले के ही परिणाम स्वरूप वे परिस्थितियाँ बनी जिससे बस्तर के जंगलों में माओवादियों के पैर जमें। और नब्बे के दशक में उदारवादी नीतियों एवं मुक्त व्यापार के चलते जल, जंगल, जमीन, खदान और वन संपदा की लूट का जो सिलसिला शुरू हुआ उसी के चलते हिंसक संघर्ष भी तेज हुए, जिसके चलते आदिवासियों की जीवन स्थितियाँ और संस्कृति-दोनों ही खतरे में पड़ी। लेकिन इन सारी वस्तुपरक स्थितियों की अनदेखी करके कहानीकार ‘घोटुल के बंद होने के सच’ के बहाने शोषण और संघर्ष की समूची विभीषिका को खारिज कर देता है।

दरअसल, तरुण भटनागर की समस्या यह है कि वे ‘अपनी उन्नीस साल की स्मृतियों और यथार्थ के विपरीत कुछ नहीं लिख सकते।’  जबकि उन उन्नीस सालों के बाद बस्तर में जाने कितने तूफान आए गए। जिस घोटुल को वे पिंजड़े में बंद तोते की मानिंद आदिवासियों की जान बताकर पेश करते हैं, उसके बारे में आदिवासियों के बीच संघर्षरत रहकर जिन अनुराधा गांधी ने सेरेब्रल मलेरिया की शिकार होकर अपनी जान गंवा दी, उनकी राय ध्यान देने योग्य है। उन्हीं के शब्दों ‘‘…क्षेत्र की लड़कियों में घोटुल प्रथा समाप्त करने के लिए सम्पर्क किया क्योंकि उन्हें यह तकलीफदेह लगता था कि रुचि न होने पर भी उन्हें हर रात घोटुल में नृत्य करने को विवश किया जाता था। इस मुद्दे पर बैठकें और रैलियां भी हुईं और कई गांवों में घोटुल बंद किए गए या इतना तो हुआ ही कि लड़कियों के जबरन शामिल होने पर रोक लगी...लेकिन कुछ बुजुर्गों के दबाव में कहीं-कहीं यह फिर से शुरु हो गया।’’

घोटुल का सच यह भी था कि आदिवासियों के बीच यौन खुलेपन का लाभ उठाकर बाहरी ठेकेदार, व्यापारी, पुलिसकर्मी और वन विभाग के कार्मिक भी मौके-बेमौके युवतियों का दैहिक शोषण कर उन्हें उनके भाग्य के भरोसे छोड़ देते थे. क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन ने इस शोषण पर रोक लगाने के लिए जहां घोटुल प्रथा पर रोक लगाने की पहलकदमी की, वहीं उनके अधनंगेपन को भी ढंकने का अभियान शुरू किया। जिस घोटुल प्रथा की समाप्ति के अभियान पर कहानीकार ने अपना समूचा विमर्श केन्द्रित किया है, वह वस्तुतः उस क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन का निर्णय था, जिसकी सदस्य संख्या आज एक लाख है। इस संगठन ने घोटुल के बिगड़ते स्वरूप पर ही प्रश्न चिन्ह नहीं लगाये बल्कि बाल-विवाह पर भी रोक लगाने की शुरुआत की और विधवा विवाह को भी आदिवासी समाज में प्रोत्साहित किया। इस क्रांतिकारी संगठन ने जहां भू-संपत्ति में महिलाओं की भागीदारी का समर्थन किया वहीं आदिवासी समाज की महिला विरोधी रुढ़ियों का भी विरोध किया। इनमें एक रुढ़ि मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों को गांव के बाहर रखने की परम्परा थी, जिस पर रोक लगाई।

सच तो यह है कि माओवादियों ने समूचे दंडकारण्य में आदिवासियों के जीवनयापन की एक ऐसी वैकल्पिक जीवन पद्धति विकसित करने का प्रयत्न किया जिसमें संस्कृति से लेकर शिक्षा, चिकित्सा और जनतांत्रिक अधिकार तक शामिल थे। जब माओवादियों को आदिवासी विरोधी सिद्ध करने के लिए उन्हें ‘स्कूल को ध्वस्त करने वाला’ बताया जाता है तो इस सच पर पर्दा डाल दिया जाता है कि ये वही स्कूल है जहां सेना और पुलिस ने अपनी बैरकें बना रखी हैं। जिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने माओवादियों के प्रभाव क्षेत्रों में भ्रमण किया है, उन्होंने अपने वृतांतों में आदिवासियों के बीच संस्कृति,शिक्षा, और चिकित्सा संबंधी वैकल्पिक प्रयासों की विस्तृत चर्चा की है। इन प्रयासों के अंतर्गत जन चिकित्सालय, पुस्तकालय, रात्रि पाठशाला, प्राइमरी स्कूल व अध्यापकों के लिए निर्मित की गई झोंपड़ियों के बारे में तरुण भटनागर को जरूर जानकारी रखनी चाहिए थी क्योंकि ये घोटुल से कम जरूरी नहीं हैं ।

दो राय नहीं कि कॉर्पोरेट घरानों के सफरमैना के रूप में की जाने वाली राज्य की हिंसा और आदिवासियों को बचाने के लिए की जाने वाली नक्सली हिंसा के बीच बस्तर सहित समूचा दंडकारण्य युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गया है और भोले, निरीह आदिवासी इसके सर्वाधिक शिकार हैं, विशेषकर तक जब सलवा जुडुम जैसे सरकारी अभियान के अंतर्गत लगभग सात सौ गांवों को नक्सलियों से सुरक्षा देने के नाम पर कॉर्पोरेट घरानों के लिए खाली करा लिया गया हो। छत्तीसगढ़ सरकार ने इन गांवों के पचास-पचपन हजार आदिवासियों को अपने कैम्पों में शरण देने का दावा तो किया लेकिन बाकी आदिवासी किस दुर्दशा की भेंट चढ़ गए, इसका अता पता किसी का आज तक नहीं। समूचे सलवा जुडुम अभियान के दौरान आदिवासियों की सारी सांस्कृतिक व्यवस्थाएं, परंपराएं व तीज त्यौहार बंद हो गए। अब न तो उनके ग्रामों में मेला होता है न हाट बाजार। उस समूचे दौर में भयवश जाने कितने ही गांवों में शादी-ब्याह तक के उत्सव नहीं हुए। सलवा जुडुम के सदस्य और सुरक्षाकर्मी समय-समय पर इन गाँवों में नक्सली उन्मूलन के नाम पर जाते थे और मासूम ग्रामीणों की हत्या तक कर देते थे। आदिवासी बालिकाओं और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार व बलात्कार इस दौर की सामान्य बात रही है। समूचे क्षेत्र में आदिवासी मलेरिया सरीखी गंभीर बीमारियों के शिकार हो कर जान गंवा रहे हैं। न उनके इलाज की कोई व्यवस्था है न कोई मूलभूत सुविधा। लोग जंगल के कंदमूल और फल खाकर किसी तरह अपने जीवन को बचाए हुए है। वे डबरे के गंदे पानी को पीने व इस्तेमाल करने को अभिशप्त हैं, असमय बीमारियों का शिकार हो के वे असमय अपनी जान गंवा रहे हैं। यही कारण है कि आदिवासियों की संख्या में लगातार गिरावट हो रही है। दुर्भाग्य पूर्ण यह भी है कि जब इन हालातों से त्रस्त होकर कोई सजग आदिवासी अपनी पीड़ा व रोग व्यक्त करता है तो उसे देशद्रोह के अपराध में जेल के सीखचों के भीतर कैद कर लिया जाता है। सोनी सोरी व लिंगा कोडप्पी सरीखे जाने कितने ही ऐसे निरपराध आदिवासियों को सत्ता के दमन का शिकार इसलिए होना पड़ा कि वे उनकी मुखबिरी नहीं करते थे। इन आदिवासियों का अपराध यहीं है कि वे न तो सत्ता के साथ दलाली करना चाहते हैं और न नक्सलियों के साथ बंदूक उठाना।

इन्हीं परिस्थितियों के चलते देश की सर्वोच्च अदालत ने सलवा जुडुम के इस समूचे सरकारी अभियान को गैर जनतांत्रिक और आदिवासी विरोधी करार देते हुए इस पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया। क्या ही अच्छा होता यदि आदिवासियों की इस दारुण यातना को भी कहानीकार ने अपनी विषय-वस्तु में शामिल किया होता। लेकिन वह इसे अपने कथ्य में शामिल करता भी तो कैसे! ये तो भूख,उत्पीड़न और बेदखली के मुद्दे थे जो उसकी ‘स्मृतियों और यथार्थ’ से बेदखल थे। स्वाभाविक ही था कि संस्कृति के दुर्ग में कैद होकर सत्ता के चश्मे से उसे बस्तर के अदृश्य व विरान नाचघर ही दीखते, उसके वे हाड़-मांस के रहवासी नहीं जो राजद्रोह के आरोप में छत्तीसगढ़ की जेलों में या तो बंद हैं या राज्य की हिंसा से बचने के लिए कहीं लुके-छिपे हैं। यह एक-दो नहीं, सैकड़ों-हजारों सोनी सोरी,लिंग कोडप्पी,सोमडु और कोण कुजंम की कथा है,जो कथा-वस्तु बनने से आज भी वंचित है।

यह वास्तव में विडंबनात्मक है कि जब बस्तर की माटी में पला-बढ़ा कथाकार ‘भारत भवन’के  बुर्ज से आदिवासियों के ‘कामोत्तेजक नृत्य’को न देख पाने से संतप्त हो तब कोई ‘बाहरी’ हिमांशु कुमार बस्तर के आर्तनाद को ‘दंतेवाड़ा वाणी’ के माध्यम से बहरे कानों को सुनाने के लिए रोज-ब-रोज उद्यत हो। गांधीवादी मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लगभग दो दशक पूर्व बस्तर के दंतेवाड़ा के बासवगुड़ा ग्राम को अपनी कार्यस्थली तब बनाया था जब बस्तर का भद्र समाज सत्ता के गलियारों में अपनी ठौर तलाश रहा था। आदिवासियों के बीच काम करने के लिए उन्होंने ‘वनवासी चेतना आश्रम’ की स्थापना की और उनकी भाषा गोंडी सीखी। आदिवासियों को उनके अधिकारों की जानकारी दी और उन्हें जनतांत्रिक चेतना से लैस किया। गाँव-गाँव घूमकर उन्होंने अलग-थलग खड़े आदिवासियों को जनतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होने की प्रेरणा दी, भ्रष्ट अफसरशाही के विरुद्ध अभियान छेड़ा और सलवा जुडुम के यातना चक्र का विरोध किया। लेकिन उनकी त्रासदी यह थी कि जहां नक्सल उन पर भरोसा नहीं करते थे, वहीं सरकारी तंत्र उन्हें नक्सल समर्थक मानता था। अंततः परिणाम यह हुआ कि उनका आश्रम सरकार द्वारा उजाड़ दिया गया और उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के लिए विवश कर दिया गया। आज भी अपने संपर्को के माध्यम से सरकारी दमन और उत्पीड़न के शिकार आदिवासियों की यातना कथा को जिस तरह से वे लगातार उद्घाटित कर रहे हैं, वह बेमिसाल है। कुछ ही समय पूर्व जब सलवा जुडुम अभियान अपने चरम पर था तब हिमांशु कुमार ने यह रहस्योद्घाटन कर सबको चौंका दिया था कि किस तरह सलवा जुडुम के कारकूनों ने इतिहासकार रामचन्द्र गुहा को नक्सलवादी कहकर गिरफ्तार करने की तैयारी उस समय कर ली थी जब वे पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक दल के साथ आदिवासियों के हालात जानने दंतेवाड़ा के कुछ गांवों में गए थे। विनायक सेन को नक्सल समर्थक करार देकर देशद्रोही सिद्ध करने की सरकारी मुहिम अब जगजाहिर है।

आखिर ऐसा क्यों है कि विनायक सेन, गौतम नवलखा, अरुंधति राय, रामचन्द्र गुहा और हिमांशु कुमार सरीखे ‘बाहरी लोग’ कार्पोरेट लूट से उत्पन्न जिस आदिवासी विस्थापन और उजाड़ से अवसन्न और आक्रोशित हैं, वह कहानीकार तरुण भटनागर के लिए मात्र एक ‘गैर-मार्क्सवादी दुष्कर्म’ है? और कोबाड गांधी सरीखे सुख-सुविधा में पले-बढ़े ‘बाहरी लोग’ अपने उस मार्क्सवाद का क्या करें,  जो उन्हें बस्तर के बीहड़ जंगलों में घातक रूप से आकर्षित कर तिहाड़ जेल के सींखचों के भीतर कैद कर देता है? और वह कौन सा दुर्निवार आकर्षण था जो अभिजातवर्गीय अनुराधा को मुंबई विश्वविधालय के अध्यापन से विरत कर बस्तर में घातक मलेरिया से ग्रस्त होकर जान तक गंवानी पड़ी? दरअसल ये आदिवासियों के उत्पीड़न व दुर्दशा के वे हालात थे जिनसे विचलित होकर पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह तक ने कहा कि इन हालात में मैं भी नक्सलवादी हो जाता। जब देश का योजना आयोग तक नक्सलवाद को असंतुलित विकास और आर्थिक वंचना का परिणाम मानता हो तब एक कहानीकार का इसे ‘घोटुल’ समस्या बना देना सचमुच हैरतअंगेज है। तरुण भटनागर का कहना है कि “मैं अपने आप को कहीं किसी दल में फिट नहीं पाता, मेरी असहमतियां मुझे अकेला बनाती हैं.” सच यह है कि वे किस दल में और किसके साथ हैं, यह उनकी कहानी स्वतः बताती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि वे सत्ताधारी पक्ष में कार्पोरेट घरानों के साथ हैं।

संस्कृति अक्सर छद्म आवरण धारण करती है। इस बार वह घोटुल रुदन के नाम पर कार्पोरेट घरानों के पक्ष में तरुण भटनागर की कहानी के रूप में अवतरित हुई है। काश, यह कहानी बस्तर के कथाकार द्वारा लिखी गई होती, भारत भवन के सी.ई.ओ. द्वारा नहीं!

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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