हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हेम की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने की अपील

Posted by चन्द्रिका on 8/26/2013 02:16:00 AM


मशीन नौजवानों पर मुकदमे थोपती है: वह उन्हें कैद करती है, यातनाएं देती है, मार डालती है. ये नौजवान इसके नाकारेपन के जीते जागते सबूत हैं...निकम्मी मशीन हर उस चीज से नफरत करती है, जो फलफूल रही है और हरकत कर रही है. यह सिर्फ जेलों और कब्रिस्तानों की तादाद ही बढ़ाने के काबिल है. यह और कुछ नहीं बल्कि कैदियों और लाशों, जासूसों और पुलिस, भिखारियों और जलावतनों को ही पैदा कर सकती है. नौजवान होना एक जुर्म है. हर सुबह हकीकत  इसकी पुष्टि करती है, और इतिहास भी जो हर सुबह नए सिरे से जन्म लेता है. इसलिए हकीकत और इतिहास दोनों पर पाबंदी है.            -एदुआर्दो गालेआनो


           साथी हेम जुल्म और नाइंसाफियों के इस इतिहास से वाकिफ हैं और इस हकीकत को बदलने के सपने देखते हैं, इसलिए आज वे जेल में हैं. शुक्रवार को महाराष्ट्र पुलिस ने उन्हें महाराष्ट्र के गढ़चिरोली से तब गिरफ्तार कर लिया, जब वे प्रख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता प्रकाश आम्टे के अस्पताल में अपने हाथ का इलाज कराने के मकसद से वहां जा रहे थे. पुलिस, मीडिया और दक्षिणपंथी गिरोहों के एक हिस्से ने फौरन यह प्रचार करना शुरू किया कि वे एक ‘जानेमाने नक्सली कूरियर’ हैं. यह भारतीय राज्य की झूठ फैलाने वाली दमनकारी मशीन का नया कारनामा है, जो लगातार जनता की हिमायत में लिखने, बोलने और काम करने वाले छात्रों, नौजवानों और कार्यकर्ताओं पर हमले कर रही है, उन्हें गिरफ्तार कर रही है, उन पर झूठे मुकदमे थोप रही है और दूसरे अनेक तरीकों से परेशान कर रही है. हेम इसके सबसे हालिया शिकार हैं. हम साथी हेम की गिरफ्तारी की तीखे शब्दों में निंदा करते हैं और उनके बारे में फैलाए जा रहे झूठे प्रचार का खंडन करते हैं.
सच यह है कि जेएनयू से पिछले सेमेस्टर तक चीनी भाषा से बी.ए. कर रहे हेम एक उत्साही संस्कृतिकर्मी और छात्र कार्यकर्ता हैं. उनके गाए हुए गीतों में दलितों, आदिवासियों, मुस्लिमों और मजदूरों की जिंदगी के बदतरीन हालात और उनके बहादुराना संघर्षों के किस्से हुआ करते हैं. वे बहुत अच्छी डफली बजाते हैं और नाटकों में अभिनय करते रहे हैं. जेएनयू आने से पहले वे उत्तराखंड में, जहां के वे रहने वाले हैं, उनकी पहचान राज्य के अग्रणी जनपक्षधर संस्कृतिकर्मियों में से एक की हुआ करती थी. पिछले तीन सालों से वे जेएनयू के रिवोल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट के एक सक्रिय कार्यकर्ता थे और उन्होंने हमें गांवों, कस्बों और शहरों में उत्पीड़ित जनता द्वारा गाए जा रहे अनेक ऐसे गीत सिखाए, जिनमें इंसाफ और बराबरी की बुनियाद पर एक नए समाज के सपनों की गूंज है. साथ ही उन गीतों में मौजूदा शासक वर्ग के जनविरोधी, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक विरोधी चरित्र को भी उजागर किया जाता है. ये गीत साम्राज्यवाद, सामंतवाद और ब्राह्मणवाद के गठजोड़ को दिखाते हैं: चोर चीटर बैठे हैं भाई, होशियार-खबरदार, लड़ना है भाई ये तो लंबी लड़ाई है तथा दूसरे ऐसे ही दर्जनों गीत जनता के संघर्षों को आवाज देते हैं और उत्पीड़नकारी शासक वर्ग की असलियत को जनता के सामने उजागर करते हैं. हमें इसमें कोई भ्रम नहीं है कि कॉमरेड हेम अपने इन गीतों और जनता की जुझारू संस्कृति में अपने योगदान के कारण ही राज्य द्वारा निशाना बनाए गए हैं.
यह राज्य उन सभी आवाजों को कुचल देना चाहता है, जो लोकतंत्र और विकास के इसके बहरे कर देने वाले शोर से ऊपर उठ कर जनता तक पहुंचती हैं और बताती हैं कि उनको जो कुछ बताया-सुनाया जा रहा है वह झूठ का पुलिंदा है. यह उन सारी निगाहों को जेल की अंधेरी कोठरियों में कैद कर देना चाहता है, जो गहराई तक धंसे हुए इसके बदसूरत चेहरे को देखने की कोशिश करती हैं और अवाम की निगाहें बन जाती हैं. यह राज्य उन सारे दिमागों को अपने खरीदे हुए गुलामों में बदल देना चाहता है, जो जुल्म और नाइंसाफी के इस जाल को काट कर एक नई दुनिया का सपना देखने की काबिलियत रखते हैं. इससे इन्कार करने पर उनके सपनों पर पाबंदी लगा दी जाती है. पिछले दिनों में हमने देखा कि किस तरह महाराष्ट्र में सक्रिय राजनीतिक-सांस्कृतिक संगठन कबीर कला मंच के साथियों को कैद किया गया, विद्रोही पत्रिका के संपादक सुधीर ढवले, कलाकार अरुण फरेरा, जन गायक जीतन मरांडी और उत्पल बास्के को गिरफ्तार किया गया, लेखक-चिंतक कंवल भारती गिरफ्तार किए गए, सीमा आजाद और विश्वविजय को ढाई वर्षों तक जेल में रख गया, स्वीडेन के पत्रकार यान मिर्डल के भारत आने पर पाबंदी लगा दी गई और अमेरिकी पत्रकार डेविड बार्सामियन को भारत में उतरने नहीं दिया गया. इन कदमों से भारत का खौफजदा निजाम इस गलतफहमी में है कि वह जनता की हिमायत में उठने वाली आवाजों को खामोश कर सकता है. लेकिन एक निजाम तभी खौफजदा होता है जब जनता उसकी बुनियादें पहले ही खोखली कर चुकी होती है. संघर्षरत जनता के गीत, उसकी कविताएं, उसके नाटक इस निजाम की खोखली बुनियाद वाले किले की दीवारों पर दस्तक दे रहे हैं. चाहे तो वह अपने कान बंद कर सकता है, ये गीत कभी बंद नहीं होंगे. 
हम अपने प्यारे साथी हेम की फौरन बिना शर्त रिहाई की मांग करते हैं और यह भी मांग करते हैं कि उनके ऊपर लगाए गए फर्जी केसों को रद्द किया जाए.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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