हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

चाँद क्यों चाहता था कि धरती रुक जाए?

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2013 11:29:00 AM

तरुण भटनागर की एक कहानी आई थी, चांद चाहता था कि धरती रुक जाए. हंस के सितंबर, 2012 अंक में प्रकाशित इस कहानी में बस्तर के आदिवासी समाज का जैसा चित्रण किया गया था, उसे बहुत आपत्तिजनक, जनविरोधी और साम्राज्यवाद परस्त माना गया. सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौर में, आदिवासियों के जनसंहारों के दौर में यह कहानी सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से हमलावर, फासीवादी और दमनकारी भारतीय राज्य के पक्ष में खड़ी होती है. अनिल अनलहातु ने इस कहानी की आलोचना करते हुए यह लेख हाशिया को बहुत-बहुत पहले भेजा था, लेकिन इसका पोस्ट किया जाना टलता आया. देरी के लिए अफसोस जाहिर करते हुए, यह लेख.


“The only way of expressing emotion in the form of art is by finding an “objective correlative”; in other words a set of objects, a situation, a chain of events which shall be the formula of that particular emotion, such that when the external facts, which must terminate in sensory experiences are given the emotion is immediately evoked.”
– T.S. Eliot  in  “Hamlet and His Problems”.

कहानी का शीर्षक ही “चाँद चाहता था कि धरती रुक जाए” एक भयंकर विध्वंस एवं सर्वनाश की ओर ईशारा करती है. क्या चाँद को यह नहीं पता कि धरती की गति ही धरती पर पड़ रहे सूर्य के जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को संतुलित किए हुए है, वरना धरती कब की सूरज के आग्नेय गोले में जलकर भस्म हो गयी होती. तो फिर चाँद क्यों चाहता है कि धरती रुक जाए? उत्तर कहानी देती है–‘चाँद आज ढलना नहीं चाहता. वह चाहता है कि धरती रुक जाए और वह वहीं टंगा-टंगा इस मांसल मादकता का भोग ( चक्षुभोग ) करता रहे.’

प्रश्न उठ खड़ा होता है कि आखिर कहानीकार को चाँद ऐसा ही यानी कामुक एवं भोगी ही  क्यूँ दिखा? उसे चाँद का मुंह टेढ़ा क्यों नहीं दिखा? जबकी “आंगा देव को पता था कि ‘भविष्य में उदास आँखों, पतले-सांवले चेहरे वाला एक कवि होगा और उसे लिखनी होगी एक कविता ‘अँधेरे में’’. या फिर उसे चाँद एक जली हुई रोटी का टुकड़ा क्यों नहीं नजर आया? तो इस परिघटना को समझने के लिए हमें T.S.ELIOT  के OBJECTIVE  CORRELATIVE  या रामचंद्र शुक्ल के विभावना व्यापार का सहारा लेना पड़ेगा. यथार्थवाद (कृत्रिम हो तब भी) के निरूपण की एक विशेषता है भाव का विभाव (वस्तु) में रूपांतरण. जैसे पूस की रात में हल्कू को ‘आकाश में तारे भी ठिठुरते हुए से जान पड़ते थे.’ ग.मा. मुक्तिबोध को भी चाँद का मुंह टेढ़ा ही दिखा. किन्तु जिस जिलाधिकारी के स्वागत में बस्तर के माड़ियाओं के सरकारी घोटुल में संसार के गहनतम अन्धेरे में ‘मादक और पागलपन की हद तक उत्तेजित कर देनेवाला अर्धनग्न नृत्य चल रहा हो. “जहां छाती हिला देने वाली मांदर की बेलौस थाप और थर्राती भोंगे की आवाज़ पर सुध-बुध खो चुके जवान जिस्म मशीन होकर लगातार नाचते जाते हैं, अंतहीन और उत्तेजक. चारों ओर पसीने, धुंएँ और शराब की गंध फैलती...”’ तो जाहिरन अपने भावों का प्रक्षेपण वह बाह्य जगत में भी उसी रूप में करेगा और चाँद भी उसे इसीलिए कामोदीप्त नज़र आता है.

घोटुल के बंद होने से जितने माड़िया दुखी नहीं हैं उससे ज्यादा दुखी कहानीकार प्रतीत होता है. कहानी में बस्तर का जिलाधिकारी सरकारी घोटुल बनाने के लिए उद्धत है. घोटुल से यह नॉस्टेल्जिया कैसा? यह कौन सी प्रवृति है जो आदिवासियों को घोटुल के उन्हीं आदिम अंधेरों में बंद रखना चाहती है. क्या यह नव साम्राज्यवादी नव उपनिवेशवादी दृष्टि नहीं है जहां मनुष्य एक माल या वस्तु में बदल चुका है और बाज़ार की शक्तियाँ उसका मूल्य निर्धारण करती हैं. जैसा राजेन्द्र जी ने प्रश्न उठाया है, ‘क्या उन्हें शेर, चीतों की तरह उनके स्वाभाविक जीवन और परिवेश में सुरक्षित एवं संरक्षित रखकर दूर से ही पर्यटकों को इन अभयारण्यों में उनके दर्शन कराने का तमाशा बनाए रखना बहुत मानवीय है ?’

तरुण भटनागर जी राजेन्द्र जी के इस प्रश्न के जवाब में पुनः “मानवविज्ञान में ‘नेशनल पार्क प्रिंसिपल’ ‘जैसी एक चीज रही है’ कहकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है. दरअसल यह वित्तीय पूंजी (FINANCE CAPITAL) के अंतर्गत संचालित नव बाजारवादी प्रवृत्ति है जिसने शहरी मध्य वर्ग से उसका मनुष्यत्व छिनकर उसे बाजार का एक उत्पाद बना दिया है. अपनी परम्परा एवं संस्कृति की जड़ों से कटा हुआ यह वर्ग पूरी तरह से जिसे धूमिल के शब्दों में ‘जीभ और जांघ के चालु भूगोल’ के सहारे जीता है. यह वही प्रवृत्ति है जो अंडमान के जारवा जनजाति के आदिम, प्रकृत एवं नग्न– नृत्य को फॉरेन डिग्निटरिज एवं देशी कंग्रेजों (काले अंग्रेज) के सामने इंडिजिनस डेलिकेसी (Indigenous Delicacy) के रूप में परोसती हुई कृतकृत्य होती है. The Jarwa tribe have lived in peace in the Andamans Islands for thousands of years.  Now tour companies run safaris through their jungle everyday and wealthy tourists pay police to make the women-usually naked –dance for their amusement. This footage, filmed by a tourist, shows  Jarawa women being told to dance by an off-camera police officer. (Source http://www.guardian.co.uk)

यह www.reporteronlive.com पर उपलब्ध है. इसे देखकर बताएं, सारे पाठकों से यहाँ एक प्रश्न है कि क्या आपको भी जारवाओं का यह नग्न नृत्य पागलपन की हद तक मदमस्त कर देनेवाला लगता है? मुझे तो यह हज़ार वर्षों की पीड़ा का सामूहिक विलाप लगता है. क्या शकीरा के गाने में आपको गहरे रुदन का भाव नहीं अभिलक्षित होता है. मेरा तो मानना ही यही है कि गाना एवं नाचना वस्तुतः कथार्सिस है. किन्तु यहाँ कहानीकार को इस पीड़ा में भी कामोत्तेजना के दर्शन होते हैं ‘आग की लौ में चमचमा जाती काली मजबूत देहें, देहों की सटीक खुबसूरत लाइनें, गोलाइयाँ...’ यह वही आनंदातिरेक का भाव है जो उस संस्कृत कथा के जम्बुक को होता है जो जंगल (क्या बस्तर?) में एक हृष्ट-पुष्ट, सुगठित, सुललित हिरण को देखकर सोचता है– ‘कथं एतत सुललितं मांसोहम भक्ष्यामि?’ (इसका हिरण का स्वादिष्ट मांस कैसे खाऊँगा). यहाँ कहानी में भी ‘ऐसी फड़फड़ाती देहों’  की जबर्दस्त बुभुक्षा ‘जो कहीं और देखने को नहीं मिलीं फिर. मिट्टी और अँधेरे की देह. सूत दर सूत तराशी गई देह, जिसका ज़रा सा भी मांस इधर से उधर होकर दैवीय(मांसल गोलाइयों एवं गहराइयों ) रेखाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता...जिसे बाद में दुनिया घूमते हुए बहुत सी जगह उन्हें तलाशता रहा, रिओ-डि-जेनेइरो के समुद्री किनारों से लेकर यूरोप के मादक स्ट्रिपटीज तक.’  दरअसल यह एक व्याध का क्षोभ है, बहेलिये का गुस्सा है, एक शिकारी का जंगल के नष्ट होने एवं शिकार की उपलब्धता के घट जाने का विलाप है. यह राम शरण शर्माओं का ‘लखनपालों’  की विलुप्ति का दैहिक दुःख है. यह दुःख है खाए, पीए, अघाए लोगों का वायुत्सर्ग के लिए खुली जगहों के अभाव होते जाने का दुःख क्योंकि तब शीत – ताप नियंत्रित कक्षों की दुर्गन्ध-रक्षा फिर कैसे होगी. घोटुल बना रहे ताकि वे सभ्य बने रह सकें  उसी तरह जिस तरह हरेक शहर के बाहर एक वेश्यालय होता है ताकि शहर की पतिव्रताओं का सतीत्व सुरक्षित रह सके.

अब यहाँ एक और प्रश्न उड़ खड़ा होता है कि इस कहानी को तरुण भटनागर ने ही क्यों लिखी? और तरुण भटनागर ने यही कहानी क्यों लिखी? तो भइया पहले यह बताएँ कि कहानी लिखता कौन है? क्या लेखक लिखता है? या कि कहानी खुद ही लिखती है? या वह समय लिखता है. जी हाँ, लेखक लिखता था, कहानी ही लिखती थी या फिर वह समय लिखता था जिसमें कहानी लिखी जाती थी. किन्तु इक्किसवीं सदी के शुरू होते न होते जब वित्तीय पूंजीवाद अपने बाजारवादी नव उपनिवेशवाद के साथ पूरे उफान पर आया तो इन तमामों का काम-तमाम हो गया. अब न लेखक लिखता है, न कहानी लिखती है और न ही समय लिखता है. ‘एंड ऑफ़ ऑथर’ को इन्हीं अर्थों में समझा जा सकता है. अतः अब कहानियाँ बाज़ार और इसको नियंत्रित करने वाली सत्ता लिखती है.

इस नव औपनिवेशिक साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजीवादी व्यवस्था ने बाज़ार और सत्ता को इतना सूक्ष्म बना दिया है कि वह पदार्थ की चौथी अवस्था (ठोस, तरल एवं गैस के बाद की अवस्था) प्लाज्मा अवस्था (जहां किसी भी पदार्थ के परमाणु तक धन एवं ऋण आयन में टूट जाते हैं और इस प्रकार पदार्थ धन एवं ऋण आयनों का समुच्चय बन जाता है) के रूप में  हमारे शरीर, मन एवं आत्मा (अगर कहीं है तो) तक पर आधिपत्य जमा लिया है और यही वह जगह है जहां लेखक की स्वायत्तता, स्वतंत्रता या कहें उसका लेखकीय आकाश (space ) ख़त्म हो जता है और सत्ता उसके भीतर से भाषा के रूप में अभिव्यक्त होने लगती है. लेखक तब बाज़ार और सत्ता की जरूरतों के मुताबिक़ साहित्यिक माल तैयार करने लगता है. यहाँ गौरतलब यह भी है यह सब इतने सूक्ष्म स्तर से होता है कि लेखक को इसका भान भी नहीं होता और वह लगातार इस मुगालते में रहता है कि वह स्वायत्त एवं स्वतन्त्र होकर खुद को ही अभिव्यक्त कर रहा है जबकी तथ्य यह होता है कि वह आत्म की अभिव्यक्ति के बजाए बाज़ार एवं सत्ता को ही अभिव्यक्त कर रहा होता है. उपरोक्त पंक्तियों की जमीन पर खड़े होकर जब हम इस रचनाकार की आँखों में झांकते हैं तो हमें वह नज़र दिख पड़ती है जिसकी रोशनी (या ‘अँधेरे में’ शायद) में इस कहानी के अँधेरे को देखा और लिखा गया और इसीलिए ‘माड़िया जबान में अँधेरे के लिए असंख्य शब्द है’ और रोशनी ‘पाप के साथ लुकती–छिपती दुनिया को भरमाती है जबकी अन्धेरा रास्ता दिखाता है.’ 

किसी भी कहानी को कहने की दो प्रविधियां होती हैं, ‘दृश्यात्मक एवं परिदृश्यात्मक’. दृश्यात्मक प्रविधि वह है जब कहानी में कहानीकार खुद शामिल रहता है, उसके सुख-दुःख को भोगता उसका एक हिस्सा और पात्र होता है और इस तरह वह कहानी के समय एवं आकाश से परिचित एवं उपस्थित होता है. वह उसका जरूरी संरचनात्मक घटक होता हुआ उसकी यथार्थ की निर्मिति में सहायक होता है. यहाँ आत्म की अभिव्यक्ति द्वारा ही आत्म की मुक्ति होती है. इस परिप्रेक्ष्य में इस कहानी को देखें तो क्या आप बता सकते हैं कि अगर इस कहानी को घोटुल की देखभाल करने वाले बुजुर्ग व्यक्ति ने लिखा होता तो क्या उसने भी घोटुल के अर्द्धनग्न नृत्य को उसी निगाह से देखा होता जैसे कहानीकार ने देखा है. क्या वह भी ‘आग की लौ में चमचमा जाती काली मजबूत देहें, देहों की सटीक खूबसूरत लाइनें, गोलाइयाँ’ देखता? क्या उसे भी यही लगता कि ‘चाँद चाहता है कि धरती रुक जाए और वह वहीं टंगा-टंगा इस मांसल मादकता का भोग करता रहे’? उत्तर है – नहीं,  यह तरुण भटनागर जी भी मानेंगे. क्योंकि तब वह बुजुर्ग व्यक्ति अपने समाज की पीड़ा और दुःख को भोगता हुआ उसका हिस्सा होता. वह तब ‘लखनपाल’ का दूध से भरे दुद्धुओं को चुसने वाला रा.श. जोशी नहीं हो सकता. रा.श. जोशी बनने के लिए उसे कहानी से बहिर्गमन करना पड़ता है ताकि (कहानी की ज़मीन से) दूर खड़ा होकर कहानी के परिदृश्य पर नज़रें गड़ाए इस मांसल मादकता को भोग सकें. कहानी के बाहर होते ही लेखक दिग्दर्शक की भूमिका में आ जाता है और तब वह यथार्थ का भोक्ता न होकर यथार्थ का चितेरा हो जाता है और यथार्थ के दुःख, संत्रास और पीड़ा से अलग (indifferent) होकर जीवन को कैमरे की आँख से देखते हुए कृत्रिम व बनावटी संसार रचता है. यहाँ उसे (लेखक को) यह सुविधा होती है कि जीवन को कैमरे के किस कोण से फिल्माया जाए ताकि जिन्दगी की बदसूरती एवं दुःख-दारुन्य छिप जाएं और ‘फड़फड़ाती हुई देहें, सूत दर सूत तराशी गईं अनावृत्त देहों की रेखाएं’ दिखा सकें. तरुण भटनागर इस कहानी को कहने के लिए इसी परिदृश्यात्मक प्रविधि का इस्तेमाल करते हैं. इसके उलट ज्ञानरंजन की तमाम कहानियाँ दृश्यात्मक प्रविधि में लिखी गयी हैं-चाहे वह ‘घंटा’ हो या ‘पिता’, ‘यात्रा’, ‘बहिर्गमन’ या ‘अमरुद का पेड़’ हो क्योंकि जाने अनजाने इन कहानियों में ज्ञानरंजन खुद एक पात्र के रूप में उपस्थित रहे हैं और यही कारण है कि जैसा कि वे खुद लिखते हैं कि इन कहानियों के प्रकाशन से उनके परिचित एवं संबंधी असुविधा में पड़ जाते थे, और लोग उनकी कहानियों को उनके जीवन से जोड़कर देखते थे. यद्यपि ज्ञानरंजन ने इन्हें अपनी निजी जिन्दगी से जोड़ने से इन्कार करने की कोशिश की है लेकिन सत्य यह है कि उनकी कहानियाँ इतनी जीवंत, महत्त्वपूर्ण एवं यथार्थपरक बन ही इसीलिए पाईं हैं कि कहानीकार ने इन कहानियों के त्रास को भोगा है, वह इसके हर दृश्य में मौजूद रहे हैं. यानी वह कहानी के भीतर उपस्थित हैं. इसलिए उनकी भाषा सीधी (straight) होती है प्राय: अभिधा शैली में लिखी हुई. जबकी परिदृश्यात्मक प्रविधि में लेखक भाषा के सुपर स्ट्रक्चर (Super structure) का जिसमें तमाम तरह के झूठ-फरेब, मिथ्याचरण एवं अमानवीयता को छद्म नैतिकता की चमकाऊ, चमकीली एवं लच्छेदार भाषा के अलंकरण तले छिपा लेता जाता है. शायद इसीलिए आचार्य केशव दास की (“भुषण बिनु न सोभहीं कविता, वनिता, मित’) कविता यानी भाषा को अलंकरण की आवश्यकता महसूस होती है. जबकी कबीर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है. लेकिन यहाँ तरुण भटनागर जी भाषा की अधिसंरचना (super structure) का प्रयोग करते हैं क्योंकि उन्हें जंगल के त्रास को, दुःख दर्द को भोगा नहीं हैं, आदिम तरीके प्रसव झेलती प्रसूताओं की चीखें नहीं सुनी हैं, जहां शिशु एवं प्रसुताओं की मृत्यु-दर विश्व में सर्वाधिक है. किन्तु...नहीं, उन्हें तो जंगल बड़ा रूमानी लगता है– ‘जहां वर्जनाएं नहीं हैं, वहां कुछ भी नहीं टूटता. जहां प्यार बेतरह समुद्री ज्वार होकर फैलता रहता है, जंगल की मादकता और भड़कता प्यार महासागर का प्यार है, जहां तटरेखा नहीं बन पाई है.’ जहाँ दायरा विहीन बिस्तर है, उनकी साँसों और छाती से चिपककर धड़कने वाला बिस्तर.’ यह बस्तर नहीं गोया पूरा बिस्तर है. जहां सेरेब्रल मलेरिया नहीं है! एन्सेफ़ेलाइटीस नहीं है! कुपोषण नहीं है? गरीबी नहीं है?? ‘कैसा तो अजीब शब्द है गरीब’. जी हाँ!  यही सुविधा देती है परिदृश्यात्मक प्रविधि कहानी कहने की. जहां गंगा की मौजों पर लरजते सुसज्जित बजरे पर नौका भ्रमण का लुत्फ़ लेते हुए तटवर्ती दृश्यों का निरीक्षण किया जाए एवं उनपर परिदृश्यात्मक रिमार्क्स भी कसा जाए. तो तरुण भटनागर जी ने जैसा मैंने पहले भी कहा है, इस परिदृश्यात्मक (Panaromic) प्रविधि का इस्तेमाल करते हुए यह अद्भुत कृत्रिम कथा रच डाली है, जहां विचारों के बने–बनाए खांचे में एक काल्पनिक कथा गढ़कर फिट कर दी जाती है. यहाँ कहानीकार के लिए जीवन महत्वपूर्ण नहीं है वरन वह सन्देश या विचार जिसे वह कहानी के जरिए सत्ता एवं बाज़ार के दबाव में सर्कुलेट करना चाहता है, महत्वपूर्ण हो उठता है. जैसे बाज़ार अपने उत्पाद बेचने के लिए कविता की लयात्मकता का इस्तेमाल करते हुए विज्ञापनों में जिंगल्स बनाता है, उसी तरह बाज़ार (जिसके व्यापक अर्थों में किराना से लेकर कार्पोरेट घराने तक आते हैं) अपने विचार को कहानी के प्रोडक्ट के रूप में बेचता है. परिदृश्यात्मक कहानियाँ इसी कृत्रिम यथार्थवाद की विकृत उपज होती हैं. जहां विचार एक पहेली है, ‘जहाँ नर्क कुछ नहीं होता. और ‘विचार’ ? विचार एक पहेली. कितनी अजूबी और बेठौरी आवाज़ है ‘विचार’ . विचार एक उलझा हुआ डर .विचार, कितना तो अबूछ,बूछ सके तो बूछ.’ कृत्रिम अवस्थितियों के जरिये यथार्थ रचने की यह तड़प कितनी खतरनाक एवं मानवता विरोधी हो सकती है यह तो उपरोक्त पंक्तियाँ बताती ही हैं, इसे कहानी की निम्न पंक्तियाँ और स्पष्टता से उद्घाटित करती हैं, ‘वे कहना चाहते थे, कि जो रोज़ गाता हो, रोज़ पिटा हो, रोज़ नाचता हो, वह एकदम से नहीं छोड़ सकता नाचना रोज़, गाना रोज, वे नग्न थे, बेघर और कई–कई बार भूखे भी...पर वे नाचते थे,गाते थे. भला वह चीज कैसे छूट जाए जो नग्नता एवं भूख से ज्यादा अहम हो. वे बस इतना ही कहना चाहते थे, कि उन्हें नहीं चाहिए तुम्हारा भरपेट खाना और कपड़े या यही कि जिसे तुम घर कहते या मानते हो. वे बस रात को मदमस्त नाचना चाहते थे.’

कई-कई बार भूखे रहकर भी नाचने की इस इच्छा की कल्पना करना कोई हँसी-खेल नहीं है. कल्पना की ऐसी ऊँची उड़ान कोई विरला ही भर सकता है. जिसकी तोंद भरी हो और मैं फिर कहूँगा कि खाए, पीए, अघाए सज्जनों के मनोमस्तिष्क में ही ऐसी अद्भुत कल्पना उदित हो सकती है. यह वही सोच है जो बाड़े में बंद जानवरों को पावरोटी के टुकड़े फेंकती और अंडमान के प्रिमिटिव ट्राईब जारवा, ओंगी और सेंटिनल को ब्रेड के टुकड़ों के लालच में उनके बच्चों के साथ नंगे नचवाती है.

यह कहानी जैसा कि मैंने पहले बताया है समसामयिक बाज़ार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा लिखी गई है. बस्तर के अबूझमाड़ के जंगलों में पला-बढ़ा वह बच्चा अब बस्तर का सबसे बड़ा अधिकारी हो गया है. वह बस्तर में पला-बढ़ा अवश्य है लेकिन एक बाहरी की तरह क्योंकि न तो वह जन्मना माड़िया है, न सोच से, न विचार (जिसे उलझा हुआ डर मानता है) से. कहानी के अंत में वह कहता है कि ‘वह अधिकारी बहुत पहले से षड्यंत्रों का शिकार रहा. एक ताकतवर दगाबाजी...एक जालसाज समाज, एक फरेबी समय, एक छल, हर कदम.’ एक फंदा जो जंगल में ही नहीं समाज में हर कहीं बाज़ार और उसकी नियामक सत्ताओं द्वारा बिछ रहा है. यह सब जानते और समझते हुए भी रचनाकार (बड़ी गौरतलब बात है कि) “वह इस षड्यंत्र (सत्ता और बाज़ार के) को समझना ही नहीं चाहता.’ अर्थात सत्ता और बाजार की शक्तियों ने उसे अभिन्न बना लिया है और वह अघोषित रूप से उनका प्रवक्ता बन चुका है.

पुनश्चः  कहानी पर लिखने के बाद जब मैंने लेखक और राजेन्द्र यादव के बीच के पत्राचार को पुनः पढ़ा तो लेखक के विचारों में विरोधाभास एवं कन्फ्युजन प्रतीत हुआ. मैं उनके पत्र के अंश एवं कहानी की पंक्तियां बगैर अपनी टिप्पणी के नीचे दे रहा हूँ. ‘मेरी तेरी उसकी बात’ के पृष्ठ संख्या 3 पर तरुण भटनागर जी लिखते हैं- ‘मैंने अपनी स्मृतियों, अनुभवों, और जो प्रत्यक्ष था, उसे बाद में एथिनोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी और समाजशास्त्र के चश्मे से भी देखने की कोशिश की, तो मुझे समानताएं और सुसंगतताएँ मिलीं.’  इसी तरह मेरी तेरी उसकी बात’ के पृष्ठ संख्या 8 पर लिखते हैं– ‘जनजातीय समाज में एक लंबा समय बिताने और उनके सच को प्रत्यक्ष देखने और भोगने के बाद और मानव विज्ञान के निष्कर्षों से उनके तादात्म्य के बाद.’  जहां इन पंक्तियों में लेखक ने मानव विज्ञान के ज्ञान को जनजातीय जीवन को समझने में मददगार माना है वहीं कहानी के पृष्ठ संख्या 45 पर वह लिखता है, ‘एक ताकतवर दगाबाजी,जब उसने देश के नामचीन विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलाजी प्रभाग में दाखिला लिया. एक सलीके से कहा गया धोखा, कि अगर मानव को जानना है, तो मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) पढ़ो.’

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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