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बीच सफ़हे की लड़ाई

नक्सलवादियों की लड़ाई जल, जंगल और ज़मीन की सामूहिक लड़ाई है: राजेन्द्र यादव

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/06/2013 09:31:00 PM


हंस के जुलाई 2013 में प्रकाशित इस बातचीत में हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने सलवा जुडूम के कर्ता धर्ता महेंद्र कर्मा पर हमले के संदर्भ में माओवादी आंदोलन से जुड़े विभिन्न सवालों के जवाब दिए हैं. पढ़िए पूरी बातचीत.

पिछले दिनों छतीसगढ़ में कांग्रेस के सरकारी नेताओं के एक दल पर नक्सलवादियों के नेतृत्व में जनता के एक बड़े हुजूम ने हमला कर दिया। तीस लोग मारे गए। सचमुच यह एक उत्तेजक खबर थी। घर पर कथाकार विवेक मिश्र आये हुए थे। उनसे इस विषय पर चर्चा होने लगी, तो सोचा क्यों ना इस चर्चा को सबके साथ बाँटा जाए।

विवेक मिश्र के सवाल और राजेन्द्र यादव के जवाब


हाल ही में कांग्रेस नेताओं के एक दल पर हुए नक्सली हमले ने पूरे देश को चौंका दिया। इसे नक्सलियों की सरकार से छिड़ी सीधी लड़ाई और लोकतन्त्र पर हुआ हमला माना जा रहा है। आप इसे कैसे देखते है?

मूलत: यह हमला कांग्रेस की लीडरशिप पर है, सबसे प्रमुख टार्गेट था- कर्मा क्योंकि उसने सलमा जुडूम बनाया था। एक और बात दिखाई देती है, छत्तीसगढ़ सरकार ने इस दल का रूट बदलवाया था; बदले हुए रूट की जानकारी वहाँ से निकली है? इसके पीछे बीजेपी सरकार की योजना हो सकती है। मारे गए लोगों में तीस लोग बताए जाते हैं, जिनमें पाँच-छह कांग्रेस के बड़े नेता हैं। इसमें कुछ सुरक्षा गार्ड भी जरूर हताहत हुए होंगे। सूची देख कर लगता है कि नक्सलियों को इसकी पूरी जानकारी थी कि कौन-कौन लोग हैं और कुल मिला के उनकी संख्या क्या है। आपको याद होगा, पाकिस्तान के प्रेसिडेंट जनरल जिया उल हक के साथ आम की पेटियां रखी गयी थीं। उसी विस्फोट में जिया उल हक और दूसरे लोगों की मृत्य हुई। इनमे अमेरिकी राजदूत भी था। ज़रूर इस योजना की जानकारी विरोधियों को थी।

क्या इससे सलमा जुडूम का समर्थन बढ़ेगा?

नहीं, सलमा जुडूम को कभी आदिवासियों, या गैर आदिवासियों का समर्थन नहीं मिला, कर्मा और विश्वरंजन इसके मेन इंजीनियर थे।

जिस नक्सल आंदोलन को एक समय बदलाव और क्रान्ति की शुरुआत के रूप में देखा जाता था और जिसे कई स्तरों पर सामाजिक, राजनैतिक ही नहीं बल्कि बुद्धिजीवियों का वैचारिक और नैतिक समर्थन भी प्राप्त था। आज इनके बीच एक दूरी दिखाई देती है। आज ऐसा लगता है जैसे यह आंदोलन न होकर एक अराजक और हिंसक विद्रोह है। नक्सलवाद हिंसा का पर्याय समझा जाने लगा है।


विडम्बना यह है कि हम यहाँ दिल्ली में एक एयरकंडीशन कमरे में बैठ के उनके बारे में बात कर रहे हैं, जिनसे हमारा सीधा संबंध नहीं रहा। आज वहाँ के हालात की ज़मीनी जानकारी हमें नहीं है, इसलिए हमारे लिए यह बौद्धिक और वैचारिक विमर्श है। मैं ऐसा मानता हूँ कि बुद्धिजीवियों का जो वैचारिक समर्थन है, वह बना रहेगा। क्योंकि वह समर्थन अन्याय के ख़िलाफ़, दमन के ख़िलाफ़ उठती आवाज़ का है। हिंसा कभी एक तरफ़ा नहीं होती, कई झूठी मुठभेड़ें होती हैं, बेगुनाह मारे जाते हैं, उनका क्या? जब अन्याय होगा और कहीं सुनवाई नहीं होगी तो लोग बंदूक उठाएंगे।

इसे अराजक कहना सही नहीं। उनकी हिंसा में एक अनुशासन है। अगर अनुशासन नहीं होता तो वे इतना बढ़ नहीं सकते थे। अरुंधति रॉय, गौतम नौलखा बहुत अंदर तक उनके साथ गए हैं और कई दिनों उनके बीच रहे हैं, उन्होंने उनके बीच जिस प्रकार के अनुशासन की प्रशंसा की है, उसके बिना शायद इतने बड़े क़दम उठाए ही नहीं जा सकते।

एक किसी बहुत पुराने कवि की पँक्तियाँ हैं-
अवश्य हिंसा अतिनिंध कर्म है
पर कर्तव्य प्रधान है यही
ग्रह पूरित हो न सर्पादि से
वसुधा में पनपे न पातकी

 

नक्सलियों की हिंसा सबको दिखती है और अनेक बार बहसों और आपसी विमर्शों का कारण बनती है, मगर उस हिंसा के बारे में कोई नहीं बोलता, जिसमें लाखों लोगों को जीवन की मूलभूत जरूरतों, सुरक्षा और संरक्षण से वंचित कर दिया जाता है। सरकार और बड़े कॉरपोरेट संस्थानों द्वारा की जाने वाली हत्याएं क्यों हमारा ध्यान नहीं खींचतीं? उन पर बात क्यों नहीं होती? सोना, चाँदी, यूरेनियम इत्यादि के लिए करोड़ों-अरबों का जो लेन-देन होता है, जिससे आदिवासियों का किसी तरह से भी कोई लेना-देना नहीं होता, उसमें उनके हित के लिए क्या रखा जाता है? आज जंगल भी उनके लिए सुरक्षित नहीं हैं, उन्हें भी थोक के भाव बेचा जा रहा है। वे अपनी ही ज़मीन से बेदखल किए जा रहे हैं। ऐसे में वे या तो भूखे मरने को विवश होते हैं, या पलायन करते हैं। अगर वे लोग इस चतुर्दिक आक्रमण के विरोध में बंदूक उठा लेते हैं, तो ग़लत कहाँ हैं? ये सही है कि उनका यह विद्रोह अराजक असंतुष्टों का प्रत्याक्रमण नहीं है। उनके पीछे बाक़ायदे समाज और राजनीति को बदलने का दर्शन लेकर आने वाले तेजस्वी और मेधावी विद्यार्थी हैं, जो अपनी जान की परवाह न करते हुए, शहरी सुख-सुविधाएं छोड़कर, इनके बीच रहते हैं। वे उनकी ही तरह रहते-खाते हैं और राजनैतिक रूप से उन्हें प्रशिक्षित करते हैं। इसलिए मेरा ख्याल है कि इस तरह के विस्फोटक आक्रमणों को लेकर कोई नतीजा निकालना एक तरह की जल्दबाज़ी ही होगी। युद्ध के मोर्चों पर जो हजारों लोग मार दिए जाते हैं क्या वे जानते हैं कि सामने वाला दुश्मन क्यों है! दोनों पक्ष अपनी अपनी तरह हत्याएँ करते हैं। विदर्भ और आंध्रप्रदेश आदि में जो ढाई-तीन लाख किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं। क्या वे हत्याएँ नहीं हैं? हत्या करना और आत्महत्या की मजबूरी पैदा करना क्या मूलतः एक ही बात नहीं है? इन हत्याएँ पर सत्ता को इसी तरह का धक्का क्यों नहीं लगता?

राज्य एवं केन्द्र सरकारों की आदिवासियों के विकास के लिए कई योजनाएं हैं। उनका हमेशा यह दावा होता है कि वह आदिवासियों की समस्याओं से निपटने के लिए निरन्तर प्रयास कर रही है ?
 

सरकारी योजनाएं जिस तरह चलती हैं, जिनमें लाखों-करोड़ों कुछ जेबों में पहुँचाए जाते हैं, उससे आज हम सभी परिचित हैं। इसमें यह कहना कि सरकार करना चाहती है, कर रही है, यह सब आँखों में धूल झोंकना है। अब तो इन बिचौलियों के इतने स्वार्थ हो गए हैं कि वे सरकार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से आने वाले लाखों-करोड़ों के धनप्रवाह को क्यूँ छोड़ेंगे? अगर सरकार सचमुच ही इस धन को उन कामों में लगाना चाहती है, जिसके लिए वह आवंटित हुआ है, तो बिचौलियों की क्या जरूरत है? वे चाहते हैं यह स्थिति बनी रहे।

वामपंथी दलों में राजनैतिक और बैद्धिक स्तर पर पहले इस विषय पर जैसी एक जुटता और जोश दिखता था, वैसा अब नहीं, एक बिखराव सा है।
 

मुझे लगता है इस विषय पर वामपंथियों में बिखराव तब आया जब उन्होंने संसदीय प्रणाली को चुना। उनके अनेक दिग्गज नेता सांसद रहे। चाहे इन्द्रजीत गुप्ता हों या सोमनाथ चटर्जी। फिर भी हम देखते हैं कि संसदीय चुनावों में भाग लेने वाली सारी पार्टियों में वाम दल सबसे अलग थे। एक-दो व्यक्तिगत उदाहरण छोड़ दें, तो आज भी भ्रष्टाचार के कोई भी आरोप उनपर पर नहीं हैं। आज प्रधान मन्त्री बनने के लिए मोदी, राहुल नीतीश इत्यादि के बीच जो घमासान मची है, ऐसे समय में हमे याद रखना चाहिए कि ज्योति बसु ने बाक़ायदे प्रधान मन्त्री बनने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।

नक्सलवादियों पर भी समय-समय पर व्यापारियों से वसूली और लूट के आरोप लगते रहे हैं, कहा जाता है कि आज वे स्कूलों, अस्पतालों और पूजा स्थलों पर भी हमले करने से नहीं चूकते।
 

आज नक्सलवादियों पर जो लूट या वसूली के आरोप हैं। उनके पीछे की सच्चाई को जाने बिना, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना शायद जल्दबाज़ी होगी। यह सही है कि इतने बड़े संगठनों को चलाने के लिए साधनों की जरूरत तो पड़ती है… और जब नक्सलवादियों पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वे मंदिरों, पंचायत घरों, स्कूलों और अस्पतालों पर हमले करते हैं, तो उस समय यह क्यों नहीं देखा जाता कि ये स्कूल, अस्पताल, किस तरह पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के स्थायी अड्डे बना दिए जाते हैं। सरकार के लिए यह भले ही लॉ एण्ड ऑर्डर का प्रश्न हो, नक्सलियों के लिए निश्चय ही यह अधिकारों और सिद्धान्तों की लड़ाई है। लड़ाई कैसी भी हो इसमें मारे तो मासूम और निरीह भी जाते हैं। सीमा पर जब कोई सिपाही किसी सामने वाले को मारता है तो उससे उसकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होती, पर यहाँ सरकारी बल जब दुश्मन पर हमला करते हैं, तो जीते हुए गाँवों और जंगलों में जैसा तांडव मचाते हैं, वह हम जानते हैं। स्त्रियों का बलात्कार करना, बच्चों को क़त्ल करना, साधारण लोगों को तरह-तरह की यातनाएं देना- ये सब जीते हुए सुरक्षा बलों के सर्वमान्य अधिकार हैं, जबकि दूसरी ओर नक्सलवादी जिन क्षेत्रों पर क़ब्जा करते हैं, वहाँ विकास, शिक्षा, संगठन उनकी प्राथमिकता होती है।

आज लिखने-पढ़ने और वर्तमान समय में खड़े होकर भविष्य के लिए अपना विचार बनाने वाला युवा एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ उसके सामने कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है, राजनैतिक पार्टियाँ रोज़ मुखौटे बदल रही हैं, वामपंथ के बड़े-बड़े पैरोकारों का नक्सलवाद से मोह भंग हो रहा है, ऐसे में आने वाली पीढ़ी किस के पक्ष में खड़ी हो?
 

दिक्कत ये है कि इनमें से कोई भी इस ज़मीनी लड़ाई का हिस्सा नहीं रहा है, न इससे गहराई से जुड़ा है। आज हमारी ज्यादतर जानकारियाँ सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संचालित अख़बारों, टीवी चैनलों जैसे माध्यमों से आती है। हम इसी मीडिया की सूचनाओं या बहसों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं। हो सकता है हमारे बीच ऐसे भी कुछ मित्र हों, जो कभी इन पार्टियों से सीधे जुड़े थे, मगर किन्ही कारणों से उनका मोह भंग हुआ, और आज हमारे बीच, वे ही जब छाती ठोककर कहते हों कि हाँ यह बात इसी तरह हुई थी, मैंने इसे देखा था, इसलिए मैं कह सकता हूँ। पर जब वह यह सब कहते हैं, तो यह नहीं बताते कि उनका विचारधारा से पूर्ण जुड़ाव कब टूटा और आज की उनकी राय, टूटने की उस कड़वाहट से प्रेरित तो नहीं है।

इस समय में जो संवाद स्थापित कर सकते थे, वे या तो ख़ुद को इस समस्या से अलग कर चुके हैं, या इस विषय पर राजनीति कर रहे हैं, तब क्या संभावनाएं शेष रह जाती हैं?
 

वस्तुत: सरकारी तन्त्र में सुख की साँस लेने वालों और रात-दिन जंगलों, पहाड़ों में भटकने वाले लोगों में बहुत दूरी है, दोनो पक्षों के बीच कोई संवाद नहीं है। इसलिए सरकार उसे ताक़त के बलपर कुचल देना चाहती है और जवाब में वे गुरिल्ला युद्ध की तरह मौके तलाश कर वार करते हैं। यह संवाद जानबूझ कर समाप्त किया गया है क्योंकि पहले ऐसे मौके भी आए जब सरकार और माओवादियों के प्रतिनिधि, किसी एक जगह बैठकर, समस्याएं सुलझाने के लिए इकट्ठे हुए और सरकार ने यह सोचकर कि दुश्मन के इतने महत्वपूर्ण प्रतिनिधि एक साथ कहाँ मिलेंगे सारे विद्रोही नेताओं को दबोच लिया। सरकार की नीयत को इसी से समझा जा सकता है, ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं। अविश्वास के इस वातावरण में कोई क्यूँ संवाद करना चाहेगा? यदि संवाद करना है, तो वह दिल्ली मुम्बई के भव्य कक्षों में नहीं होगा, सरकारी नुमाइंदों को उनके जंगलों में जाना पड़ेगा, ताकि उनके साथ धोखा न किया जा सके। तभी शायद यह पता लग सकेगा कि सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए कितनी गंभीर है। अगर सरकार यह समझती है कि हेलीकॉपटर से पैरा मिलिटरी फोर्स और पुलिस भेजकर इसे दबाया देगी, तो कहना होगा कि उसने दुनिया के किसी भी विद्रोह से कुछ नहीं सीखा। सुविचारित और सुसंगठित क्रान्तिकारी उभार इन दमन के हथकड़ों से कभी भी समाप्त नहीं किए जा सकते। इस तरह बस उन्हें थोड़े समय के लिए स्थगित किया जा सकता है। आप ख़ुद चम्बल क्षेत्र के अंदरूनी भागों से परिचित हैं। वहाँ रोज़-रोज़ सुनाई देने वाले बागियों को भी आपने निकट से देखा है, जो अपने छोटे-बड़े दल बनाकर वर्षों प्रशासन से लोहा लेते रहते हैं। इनमें सबसे ज्वलंत उदाहरण मान सिंह और फूलन देवी का है। व्यक्तिगत अन्याय का दंश इन्हें बीहड़ों में उतरता है, जब वे देखते हैं कि न्याय कहीं नहीं है, तो बन्दूक उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। अगर इन बागियों को भी वैचारिक, सैद्धान्तिक और राजनैतिक प्रशिक्षण मिला होता तो निश्चय ही ये भी एक नक्सलवाद का रूप प्रस्तुत कर रहे होते। फ़र्क सिर्फ़ यह है कि इनकी लड़ाई अकेली अपनी लड़ाई है और नक्सलवादियों की लड़ाई जल, जंगल और ज़मीन की सामूहिक लड़ाई है।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ नक्सलवादियों की लड़ाई जल, जंगल और ज़मीन की सामूहिक लड़ाई है: राजेन्द्र यादव ”

  2. By Anonymous on July 7, 2013 at 3:24 PM

    Yadav ji's viewpoint is strait forward and sharp.


  3. By महेन्द्र श्रीवास्तव on July 7, 2013 at 7:29 PM

    सार्थक प्रस्तुति

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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