हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

प्रेमचंद जयंती के सिलसिले में नाटक कर रहे छात्रों को गिरफ्तार कर यातनाएं दी गईं

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/21/2013 10:39:00 AM

 
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संगठन भगतसिंह छात्र मोर्चा और सांस्कृतिक संगठन मशाल सांस्कृतिक मंच का बयान. घटना की निंदा करते हुए जेएनयू के रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट का बयान भी देखें

मशाल सांस्कृतिक मंच एवं भगतसिंह छात्र मोर्चा के द्वारा आगामी प्रेमचंद जयंती ( 31 जुलाई ) के उपलक्ष्य में गीत, नुक्कड़ नाटक और सभा का आयोजन किया गया. जिसके तहत विभिन्न जगहों पर रिहर्सल किया जा रहा है. उसी कड़ी में दिनांक 15 जुलाई 2013 को बिहार के वैशाली जिले के लालगंज क्षेत्र में कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया.

उसके बाद दिनांक 16 जुलाई 2013 को 2 बजे से मजदूर किसान सभा के नेतृत्व में पूर्वी चम्पारन जिले के मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत एवं नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, तभी वहाँ पर सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, एसटीएफ एवं स्थानीय पुलिस से भरी चार गाड़ी आ पहुंची और चारों तरफ से हम लोगों को घेर लिया गया.

उन्होंने हथियारों के साथ पोजीशन ले ली, हमारे कार्यक्रम को रोक दिया गया, गाली-गलौज करने लगे. देवकुलिया चौक को दिन भर के लिए नाकेबंदी कर दी गयी और सभी गाड़ियों की तलाशी ली जाने लगी. हम लोगों से पूछताछ करने लगे कि तुम लोग कौन हो? यहां क्या करने आये हो? किसने बुलाया है? क्या उद्देश्य है? और कहा कि तुम लोग माओवादी हो. हम लोगों ने बताया कि हम मशाल सांस्कृतिक मंच बीएचयू से हैं, 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब बीएचयू के छात्र हैं. आईडी कार्ड भी दिखाए, उसके बाद हमारे बैगों की तलाशी ली गयी. कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया.

थाने पर गिरफ्तार करके ले जाए गए लोगों में मजदूर किसान सभा के सम्राट अशोक, हरेन्द्र तिवारी, अवतार सिंह कुशवाहा, पत्रकार संजय कुमार (तलाश पत्रिका), मशाल सांस्कृतिक मंच के जन गायक युद्धेश "बेमिशाल", रितेश विद्यार्थी, संतोष, नमो नारायण, रोहित, शैलेश कुमार और महिला विकास मंच की ममता देवी आदि लोग थे.

थाने में एएसपी संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, एसटीएफ़, सीआरपीएफ़ की कोबरा बटालियन द्वारा हमसे पूछताछ की गई कि पैसे कहां से मिलते हैं? यहां क्या करने आये थे? किसने बुलाया था ? हमारे साथ घंटों पूछताछ की गई, गाली-गलौज की गई और डंडे लात-घूंसे से मारा -पीटा गया, टॉर्चर किया गया तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा.

वहां से रात 8 बजे चार गाड़ी कोबरा बटालियन के साथ मुफस्सिल थाने में ले जाकर हम लोगों से सेलफोन, बैग एवं सारे सामानों को जब्त कर लिया गया और फिर मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया, रात में खाना -पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रीन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी. रात भर विभिन्न जगहों से बिहार के विभिन्न अधिकारीयों के पास फोन जाने पर अगले दिन दिनांक 17 जुलाई को 3 बजे एप्लिकेसन लिखवाकर कि (जांच -पड़ताल में कोई भी अवैध सामग्री बरामद नहीं हुई, सही सलामत थाने से छोड़ा जा रहा है) छोड़ा गया.

उत्तरी बिहार के पूरे ईलाके वैशाली, पूर्वी चम्पारन, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर को सीआरपीएफ, पुलिस गरीब, पिछड़ों को उग्रवादी, माओवादी कह कर उठा ले जाती है. वहां की जनता में भय का माहौल है और जनता सीआरपीएफ, पुलिसिया दमन से त्रस्त है, वहां पर कोई भी छोटा-बड़ा इस तरह का कार्यक्रम नहीं करने दिया जाता है. सीआरपीएफ के सामने पुलिस की कुछ भी नहीं चलती है. सब कुछ सीआरपीएफ के निर्देश पर थाने की मदद से होता है.


मोतिहारी (बिहार) में बीसीएम और मशाल के कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों की गिरफ्तारी और यातना का विरोध करें

रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट, जेएनयू

कहानियां इस भरोसे को लोगों के बीच बांटने का एक तरीका हैं कि इंसाफ करीब है. और ऐसे एक भरोसे के लिए बच्चे, औरतें, और मर्द एक हैरतअंगेज बहादुरी के साथ लड़ेंगे. इसीलिए तानाशाह किस्से सुनाने से डरते हैं: सारी कहानियां किसी न किसी तरह उनके पतन की कहानियां हैं. -जॉन बर्जर

इंसाफ और मुक्ति की जनता की आवाजों को दबाने की फासीवादी कार्रवाइयों के तहत फासीवादी भारतीय राज्य ने 16 जुलाई को बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्र संगठन भगतसिंह छात्र मोर्चा और मशाल सांस्कृतिक मंच के साथियों को गिरफ्तार किया और उन्हें यातनाएं दीं. रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट (आरसीएफ) उत्पीड़ित जनता के सांस्कृतिक प्रतिरोध के फासीवादी दमन की कड़े शब्दों में निंदा करता है. इन संगठनों के छात्र-कार्यकर्ता प्रेमचंद जयंती के मौके पर बिहार के दौरे पर थे, जिस दौरान वे जनता के बीच राजनीतिक चेतना और संघर्ष के गीत, नुक्कड़ नाटक और जनसभाएं आयोजित कर रहे थे. मोतिहारी के पहले उन्होंने 15 जुलाई को वैशाली के लालगंज इलाके में अपने कार्यक्रम पेश किए थे. 16 जुलाई को दोपहर 2 बजे वे मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत और नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, कि सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, एसटीएफ और स्थानीय पुलिस की चार गाड़ियां आईं और उन्हें घेर लिया. दोनों संगठनों द्वारा जारी किए गए बयान के मुताबिक, हथियारबंद राजकीय बलों ने:
हथियारों के साथ पोजीशन ले ली, हमारे कार्यक्रम को रोक दिया गया, गाली-गलौज करने लगे. देवकुलिया चौक की दिन भर के लिए नाकेबंदी कर दी गयी और सभी गाड़ियों की तलाशी ली जाने लगी. हम लोगों से पूछताछ करने लगे कि तुम लोग कौन हो? यहां क्या करने आए हो? किसने बुलाया है? क्या उद्देश्य है? और कहा कि तुम लोग माओवादी हो. हमलोगों ने बताया कि हम मशाल सांस्कृतिक मंच, बीएचयू से हैं, हमने 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब बीएचयू के छात्र हैं. आई.डी. कार्ड भी दिखाए, उसके बाद हमारे बैगों की तलाशी ली गई. कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया.

हथियारबंद बलों ने कम से कम 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें इन दोनों संगठनों के लोग भी शामिल थे. उनके बयान के मुताबिक, थाने में पुलिस और सीआरपीएफ ने गिरफ्तार किए गए लोगों को यातनाएं दीं:
थाने में एएसपी संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, एसटीएफ़, सीआरपीएफ़ की कोबरा बटालियन ने हमसे पूछताछ की: पैसे कहां से मिलते हैं? यहां क्या करने आये थे? किसने बुलाया था? हमारे साथ घंटों पूछताछ, गाली-गलौज और डंडे लात-घूंसे से मारा-पीटा गया, टार्चर किया गया, तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा....हमलोगों के सेलफोन, बैग एवं सारे सामान को जब्त कर लिया गया और फिर मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया, रात में खाना -पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रिन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी.

उत्पीड़ित जनता पर साम्राज्यवादी-ब्राह्मणवादी शासक वर्ग का उत्पीड़न और दमन ज्यों ज्यों तेज हो रहा है, जनता के जनवादी अधिकारों और उसके संसाधनों पर हमले बढ़ रहे हैं, त्यों त्यों जनता का जुझारू संघर्ष भी मजबूत हो रहा. इसकी संगत में जनता प्रतिरोध की क्रांतिकारी सांस्कृति भी विकसित कर रही है. संस्कृति मौजूदा शासक वर्ग द्वारा अपने उत्पीड़न और शोषण को बनाए रखने का एक अहम औजार है और जनता इस औजार को अपनी क्रांतिकारी संस्कृति के जरिए भोथरा कर रही है. इसलिए शासक वर्ग लगातार जनता के संस्कृतिकर्मियों और लेखकों, कवियों, पत्रकारों और कलाकारों पर दमन को तेज कर रहा है. उसका फरमान है कि जो भी कहा, लिखा और गाया जाए, जो भी सृजित किया जाए, वह शासक वर्ग की हिमायत में हो. इस फरमान को नकार देने वालों पर राजकीय जुल्म का सिलसिला चल रहा है. हमने देखा है कि किस तरह सुधीर ढवले, जीतन मरांडी, अरुण फरेरा, कबीर कला मंच के कलाकारों आदि की गिरफ्तारियां हुई हैं और हो रही हैं.

लेकिन जहां जुल्म है, वहां इंसाफ की लड़ाई भी है और उसकी उम्मीदें भी. और जहां उम्मीदें हैं, वहां गीत हैं, कविताएं हैं, नाटक हैं, कहानियां हैं. शासक वर्ग चाहे जितना भी दमन कर ले, चाहे जितनी भी आवाजों को दबाने की कोशिश करे, जनता के संघर्ष बढ़ते रहेंगे और उसकी आवाजें ऊंची और ऊंची होती रहेंगी.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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