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बीच सफ़हे की लड़ाई

तो उदय प्रकाश हिंदी के लेखक नहीं हैं!

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/17/2013 07:07:00 PM


कथाकार और कवि उदय प्रकाश के बारे में आलोचक वीरेन्द्र यादव की टिप्पणी. शुक्रवार से साभार.

यह सचमुच विस्मयकारी है कि जब समूची दुनिया में अमेरिका की राजनीतिक चौधराहट और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद सवालों के घेरे में है तो हिंदी का एक लेखक गर्वोक्ति के साथ यह घोषणा कर रहा है कि वह ‘पहला ऐसा हिंदी लेखक बना है, जिसके जीवन काल में ही कोई रचना अमेरिका में प्रकाशित हो सकी है।’ पिछले दिनों हिंदी के ‘आत्मनिर्वासित’ लेखक उदय प्रकाश ने अपनी कहानी ‘पीली छतरी वाली लड़की’ के अमेरिका में प्रकाशन से खुद को ‘सम्मानित’ महसूस करते हुए आह्लाद के साथ अपनी यह खुशी फेसबुक पर दर्ज की। वैसे कुछ वर्षों पूर्व भी वे इसी कहानी को लेकर यह दावा कर चुके हैं कि पश्चिमी दुनिया में कुर्रतुलैन हैदर के उपन्यास ‘आग का दरिया’ की स्वीकृति के बाद ‘पीली छतरी वाली लड़की’ ने वहां नई ऊंचाइयों को छुआ है।’ जब इस कहानी को अनूदित करने के लिए अमेरिकी संस्था ‘पेन’ द्वारा अनुवादक को ‘ट्रांस्लेशन फंड ग्रांट’ मिली थी तो समाचार इस तरह  छपा था कि जैसे उदय प्रकाश को ही ‘पेन’ अवार्ड मिल गया हो। इस बीच अंग्रेजी की एक साप्ताहिक पत्रिका ने उदय प्रकाश के साक्षात्कार के बीच उनके महत्व को रेखांकित करते हुए यह भी छापा है कि यह सम्मान उस अमेरिकी साहित्य संसार की ओर से दिया गया है, जहां पुस्तकों की नियति सलमान रुश्दी सरीखी हस्तियां तय करती हैं। यहां मंतव्य इन दावों को प्रश्नांकित करने का न होकर उस हीन ग्रंथि को समझने का है, जो अपने देश,समाज,संस्कृति और साहित्य की श्रेष्ठता व मूल्य निर्धारण पश्चिमी मानदंडों और स्वीकृति के ही आधार पर तय करती है। विशेषकर तब जब उदय प्रकाश हिंदी के ऐसे समादृत और समर्थ लेखक हों, जिन्हें किसी देशी-विदेशी सम्मान का मुखापेक्षी होने की कोई विवशता नहीं है।

अमेरिका और पश्चिमी दुनिया में मान्यता पाने की लेखकीय ललक की इस चर्चा के दौरान याद आते हैं गजानन माधव मुक्तिबोध, जिन्होंने आज से 55 वर्ष पूर्व अपनी कहानी ‘क्लाड ईथरली’ को इसी मुद्दे पर केंद्रित करते हुए लिखा था कि ‘...आजकल के लेखक और कवि अमेरिकी, ब्रिटिश तथा पश्चिम यूरोपीय साहित्य तथा विचारधाराओं में गोते लगाते हैं और वहां से अपनी आत्मा को शिक्षा और संस्कृति प्रदान करते हैं !...क्या हमने इण्डोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुम्बा के काव्य से?...तो मतलब यह है कि अगर उनकी संस्कृति हमारी संस्कृति है, उनकी आत्मा हमारी आत्मा और उनका संकट हमारा संकट है, तो हमारे यहां भी साम्राज्यवादी, युद्धवादी लोग क्यों नहीं हो सकते ! मुख़्तसर किस्सा यह है कि हिंदुस्तान भी अमेरिका ही है।’   महत्वपूर्ण यह भी है कि मुक्तिबोध ने यह तब कहा था, जब न तो उत्तर औपनिवेशक विमर्श चर्चा के केंद्र में था और न ही आज की ‘ओरिएंटलिज्म’ की बहस थी। यह वास्तव में विडंबनात्मक है कि जिन मुक्तिबोध को उदय प्रकाश अपनी चेतना में रचा-बसा मानते हैं और जिन्हें अपनी कहानी ‘मोहन दास’ में नैतिक उपस्थिति के रूप में दर्ज करते हैं, अपनी सोच और जीवन में उन्हीं के विरुद्ध खड़े दिखते हैं। आखिर क्यों?

उदय प्रकाश पश्चिम की मान्यता के प्रति आग्रहशील ही नहीं हैं बल्कि वे हिंदी के प्रति अब हिकारत का भाव भी रखने लगे हैं। वे स्वयं को हिंदी का लेखक कहलाना पसंद नहीं करते क्योंकि वे अब हिंदी को ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन मानने लगे हैं। उनका कहना है कि उन्हें हिंदी सीखने में उतनी ही मशक्कत करनी पड़ी जितनी कि अंग्रेजी सीखने में क्योंकि उनकी अपनी बोली छत्तीसगढ़ी और बघेली है! वे कनाडा के लेखक थामस हाईवे से अधिक अपनापा महसूस करते हैं क्योंकि क्री आदिवासी समुदाय का होने के कारण जिस तरह थामस अंग्रेजी के भाषाई उत्पीड़न के शिकार हैं, उसी तरह उदय प्रकाश उस हिंदी खड़ी बोली उत्पीड़न के जो अंग्रेजों के समय में रेल और फोर्ट विलियम कालेज के साथ परवान चढ़ी। दरअसल उदय प्रकाश का हिंदी समाज और भाषा से यह कल्पित बेगानापन उनकी उस आत्म-उत्पीड़न ग्रंथि का परिणाम है, जो स्वयं को सदैव उत्पीड़ित छवि में ढालना चाहता है। उनकी यह स्वनिर्मित उत्पीड़ित छवि कितनी हास्यास्पद है इसकी बानगी उनके इस कथन से आंकी जा सकती है, ‘मुझे हिंदी कविता की रिजर्व बोगी से उसी तरह निकाल बाहर किया गया था, जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में गांधी को गोरों के लिए आरक्षित बोगी से अंग्रेजों ने बाहर निकाल दिया था।’

अभी पिछले सप्ताह अंग्रेजी साप्ताहिक तहलका (13 जुलाई) ने उदय प्रकाश पर लिखते हुए उचित ही यह सवाल उठाया है कि ‘जिस लेखक को मिनोसाटा, रोटरडम से लेकर बर्लिन तक भाषण देने के लिए बुलाया जाता हो और जिसे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर साहित्य अकादमी सहित राष्ट्रीय मान्यताएं मिल चुकी हों, वह सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी होने का दावा कैसे कर सकता है?’ दरअसल उदय प्रकाश सत्तातंत्र के विरुद्ध समय-समय पर जिस तरह के बयान देते रहे हैं, उससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। विशेषकर तब जब जिस साहित्य अकादमी को वे दलालों, समझौता-परस्तों व अवसरवादियों का अड्डा और जिसके पुरस्कारों व फेलोशिप को लेन-देन की संस्कृति करार दे चुके हों, उसी के पुरस्कार को वे स्वयं स्वीकार ही नहीं करते बल्कि उसे प्राप्त करके वे ‘राज्य के नागरिक के रूप में अपेक्षाकृत सुरक्षित’ महसूस करने के साथ-साथ इसे साहित्य अकादमी का नया प्रस्थानबिंदु भी मानने लगे हों। सच तो यह है कि हिंदी की जिस सत्ता संरचना से वे स्वयं को बहिष्कृत घोषित करते रहते हैं, उसी से वे अपनी प्राण वायु ग्रहण करते रहे हैं। यह अनायास नहीं है कि वे उन अशोक वाजपेयी को ‘युग पुरुष’ करार देते हैं, जो उन्हें पुरस्कृत करने वाली साहित्य अकादमी पुरस्कार समिति की ज्यूरी में थे। उन्हें यह गौरव भी प्राप्त है कि उनके कविता संग्रह ‘एक भाषा हुआ करती है’ के ब्लर्ब के लेखक अशोक वाजपेयी ही हैं। ‘द्विजदेव सम्मान’ और ‘कृष्णबलदेव सम्मान’ भी उन्हें अशोक वाजपेयी के सौजन्य से ही मिला है। और भी बहुत से देशी-विदेशी सम्मान उनकी झोली में हैं ही। दो राय नहीं कि वे इस सब के सुयोग्य पात्र भी हैं लेकिन फिर वह कौन सा कुलीनतावादी शक्तिकेंद्र है, जिससे वे निरंतर युद्ध की मुद्रा में हैं? जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अपनी शिरकत को वे लेखकीय गरिमा प्रदान करने वाला मानते ही हैं।

उदय प्रकाश अक्सर ब्राह्मणवाद, फासीवाद और सांप्रदायिकता को उचित ही अपने निशाने पर रखते हैं। लेखक होने के कारण वे स्वयं को दलित, भाषा का आदिवासी व अल्पसंख्यक भी घोषित करते रहते हैं लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि उन्हें न तो पूर्वांचल के नरेंद्र मोदी कहे जाने वाले योगी आदित्यनाथ के हाथों सार्वजानिक रूप से सम्मान ग्रहण करने से कोई गुरेज है और न ही उस छतीसगढ़ की भाजपा सरकार के स्पीकर व मंत्री द्वारा पुरस्कृत होने से, जो आदिवासियों के दमन के कीर्तिमान बना रही है। दिलचस्प तथ्य यह है कि जहां वे एक तरफ माथे पर लाल तिलक धारण कर छतीसगढ़ की भाजपा सरकार का पुरस्कार ग्रहण करते हैं वहीं दूसरी तरफ यह आशंका भी व्यक्त करते हैं कि कहीं उन्हें ‘नक्सल’ करार देकर गिरफ्तार न कर लिया जाए। और यह कहना भी नहीं भूलते हैं कि यदि ऐसा हो गया तो कोई भी वामपंथी लेखक संगठन उनकी मदद करना तो दूर उनकी यंत्रणा को बढ़ाने का ही काम करेगा। कहना न होगा कि यह उदय प्रकाश की अपनी ‘मौलिकता’ है कि वे जिससे पुरस्कृत होते हैं, उसी से दंडित होने की काल्पनिक संकल्पना कर अपने ‘पोलिटिकली इनकरेक्ट’ आचरण के प्रति एक रक्षाकवच भी निर्मित करते रहते हैं।

दिलचस्प यह है कि उदय प्रकाश अपने बयानों, अभिव्यक्तियों और आचरण में विरुद्धों के अद्वितीय समन्वयक हैं। वे स्वयं को गैर-राजनीतिक वाम बताते हैं। मार्क्सवाद से उनका इतना मोहभंग हो चुका है कि अब वे समूची राजनीतिक प्रणाली को ही संदेह की दृष्टि से देखते हैं और मतदान तक नहीं करते लेकिन इसके साथ ही वे बर्लिन में मार्क्स-एंगेल्स के बुतों और लन्दन में मार्क्स की कब्र के सामने खड़े होकर अपना फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया में प्रचारित करने के लोभ का संवरण भी नहीं कर पाते। अज्ञेय को वे अपनी ही तरह ‘निर्वासित’ लेखक मानते हैं, इसीलिए उन्हें ‘वामपंथी’ सिद्धकर उनका पुनर्वास करने का दायित्व भी निभाते हैं। मुक्तिबोध के हवाले से वे खुद को ‘कलम का हम्माल’ भी बताते हैं लेकिन अपने लिए ‘अभिजात वैभव’ का उत्सवी अवसर सुलभ कराने के लिए समूचे परिवार की तरफ से सार्वजानिक आभार व्यक्त करने में भी कोई संकोच नहीं व्यक्त करते। उदय प्रकाश को यह महारत भी हासिल है कि जब वे दिल्ली से अपनी रिहाईश बदलकर राजधानी परिक्षेत्र के बाशिंदे बनते हैं तो यह लिखना जरूरी समझते हैं कि ‘दिल्ली में तालिबानी-फासीवादी वर्णवादियों के बीच काफ़िर की तरह था। अबु गरेब का कैदी या ग्वातेमाला के टार्चर कैम्प में रखे किसी बंदी की तरह।’

यह सचमुच सुखद है कि दिल्ली के ‘टार्चर कैम्प’ से निकलकर अब उदय प्रकाश जिस ताजी हवा में सांस ले रहे हैं, वह अंग्रेजी पत्रिकाओं में भी इन दिनों चर्चा का विषय है। ‘तहलका’ के अनुसार उदय प्रकाश को अपने ‘रूफ टॉप गार्डेन’ और अपने फ्लैट की असेंट दीवारों पर गर्व है। उनकी विदेशी कुतिया का नाम काफ्का की प्रेमिका मिलेना के नाम पर है। कहना न होगा कि अंग्रेजी की दुनिया में उदय प्रकाश एक जीवित मिथक सरीखे हैं। कभी उन्हें ‘दलित लेखक’ बताया जाता है तो कभी ‘उपन्यासकार’। प्रेमचंद व मंटो का तो उन्हें उत्तराधिकारी ही करार दिया गया है। स्वीकार करना होगा कि उदय प्रकाश हिंदी समाज की ऐसी मौलिक परिघटना हैं, जिन्होंने मुक्तिबोध के इस प्रश्न को अर्थहीन बना दिया है कि,‘पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?’

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  1. 8 टिप्पणियां: Responses to “ तो उदय प्रकाश हिंदी के लेखक नहीं हैं! ”

  2. By Anonymous on July 18, 2013 at 2:13 AM

    उदय प्रकाश ने जितने चापलूस और चमचे तैयार कर रखे हैं, उनकी फौज अब मैदान में कूद पड़ी है. इस फौज को उदय प्रकाश का ढंग से बचाव करना भी नहीं आएगा. वह तो बस हथफेंकू करतबबाजों की तरह इधर-उधर कलाबाजियां दिखाएंगे.

    कुछ ठोस पेश करो कुछ ठोस! ओपोर्चुनिस्टों! वीरेंद्र यादव की ठोस बातों पर तुम्हारे कमेंट्स टिक नहीं पाएंगे.

  3. By Shamshad Elahee "Shams" on July 19, 2013 at 3:30 AM

    बहुत ठोस तथ्यों भरा, मज़बूत वैचारिक पृष्टभूमि पर खड़ा तनतनाता हुआ आलेख...वीरेन्द्र यादव जी को साधुवाद.

  4. By Anonymous on July 19, 2013 at 6:26 AM

    [फेसबुक पर एक टीप ])Mahendra K. Singh -----एक एक बात सच लिखी है वीरेंद्र जी ने, मेरा भी अनुभव यही रहा है उदय प्रकाश से यहीं चर्चा करने के दौरान। दरअसल यह व्यक्ति बहुत बड़ा नौटंकी और जालसाज है। भाई कुछ लोग होते हैं जो विरोध की राजनीति करते हैं पर उनके विरोध के पीछे कोई न कोई राजनीतिक या दार्शनिक विचारधारा होती है जिस पर वे स्टैंड लेते हैं। जैसे वीरेंद्र जी हैं तो वामपंथी हैं, सत्ता प्रतिष्ठानों का विरोध करते हैं भले ही आप उनसे सहमत न हो पर एक स्टैंड के तहत विरोध करते हैं। ऐसे ही दलित विचारक हैं - कँवल भारती, आप उन्हें गलत कहें या सही कहें, वे अपने मुद्दे पर जीवन भर अड़े रहते हैं। बहुत लोगों की लड़ाई जातिवाद से है या किसी की नरेन्द्र मोदी से है। पर यह ब्यक्ति उदयप्रकाश तो हवा में तलवार चलाता है। पता ही नहीं किस अदृश्य ताकत से लड़ाई लड़ रहा है - जातिवाद से? तो फिर क्यों उदय प्रकाश योगी आदित्यनाथ के साथ मंच पर सिर्फ मौजूद ही नहीं थे बल्कि बल्कि उनके हाथों पुरस्कृत भी हो रहे थे. वह पूरा कार्यक्रम ही उदय प्रकाश के निमित्त था, और मज़े की बात देखिये कि उस कार्यक्रम के कार्ड और बैनर पर उदय जी का नाम कुंवर उदय प्रकाश सिंह लिखा हुआ था, जो वह सच में हैं। राजपूत जमींदार परिवार में पैदा हुए हैं और उसी शान-ओ-शौकत के साथ बचपन और जवानी बिताई है। बड़े गर्व से अपने इंटरव्यूज में घोषणा भी करते है कि उनके घर के दरवाजे पर पालतू शेर और हाथी झूमते थे। राजपूत परिवार में जन्म लेना कोई पाप नहीं है, वी पी सिंह थे, राजा थे- पर सचमुच कुछ किया पिछड़ों के लिए (भले ही वह कदम राजनीति प्रेरित रहा हो) और यह भी कि अपनी आधी से अधिक जमीने दान में दे दीं।

    खैर, उस कार्यक्रम में उदय जी ने यह भी कहा था कि उनके पाठकों में सभी धर्म और विचारधारा को मानने वाले लोग हैं. उसी कार्यक्रम में और उसके बाद भी उदय जी बहुधा बुद्धि जीवियों के अवसरवाद के नाम पर वाम विचारधारा पर प्रहार करते रहे हैं। उदय जी तो खुलेआम अपने से मिलने वाले लोगों से कहते रहें हैं कि वे अटल बिहारी वाजपयी के प्रशंसक रहे हैं और इसी वजह से उन्होंने २००४ के आमचुनाव में ड्रैक्‍युला नरेंद्र मोदी की पार्टी भाजपा को वोट दिया था. Prabhat Ranjan जी भी कई बार कह चुके हैं एक बार वे उदय जी के घर गए तो वे भीगी गमछी पहनकर हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे, और पूछने पर उन्होंने बताया था कि हाँ उन्हें एक भगवान् की जरुरत है क्योंकि वे पत्नी के सामने नहीं रो सकते। जो व्यक्ति अपनी पत्नी को अपने से कमतर मानता हो और इसलिए उसके सामने नहीं रो सकता, उस आदमी के पितृसत्तात्मक और सामंती संस्कार पर और नकली दलित प्रेम पर कोई शक नहीं होना चाहिए।

  5. By dhiraj tiwari on July 19, 2013 at 7:46 AM

    bias ..one. The all fact is interpreted in a subjective manner...

  6. By ANIL ANALHATU ANALHATU on July 21, 2013 at 10:53 AM

    विराट मुर्खताओं से भरे इस हिंदी पट्टी में स्थुलताएं हीं आकार पाती हैं .सतह पर तैरते इस बेहुदे समाज को अधकचरे और धुर्त और चालाक किस्म के हत्यारे ..मिडियाकर लेखक हि पसंद आयेंगे इसमे कोई शक नैहं. यह अकारण नहीं है कि उदय प्रकाश इनको पसंद नहीं आयेंगे.....क्योंकि इनकी दृष्टी का यह अंध बिंदु है.
    अनिल अनलहातु, धनबाद.

  7. By आनंद on July 23, 2013 at 8:25 AM

    लेखक का असली मूल्‍यांकन उसकी रचनाएँ होती हैं। उदय प्रकाश निस्‍संदेह बेजोड़ लेखक हैं, बाकी सब बातें गौण हैं। उनकी प्रतिबद्धता अपने लेखन के प्रति है, इसमें कोई शक नहीं। हाँ उन्‍हें पुरस्‍कृत होना अच्‍छा लगता है, विदेशों में रिकॉग्‍नीशन किसे पसंद नहीं है? अब उनके आने-जाने, उठने-बैठने पर आलोचना करना बिलकुल एकतरफा है। एक लेखक एक इंसान भी होता है, जिसे विदेश यात्रा में फोटो खिंचवाना पसंद है, यदि वह अफोर्ड कर पा रहा रहा है तो अच्‍छे फ़्लैट में भी रह सकता है, कुत्ते भी पाल सकता है, गाड़ी भी रख सकता है, यह बात हमारे गले क्‍यों नहीं उतरती? हम लेखक को मुक्तिबोध बनने (या उसकी तरह कंगाली में मरने)का ऐसा दबाव बनाते हैं जैसा लोग सती करने के लिए बनाया करते थे, जो जल कर नहीं मरे, समझो सच्‍ची पतिव्रता नहीं है। कुछेक बातों को छोड़कर यह लेख बिलकुल एकतरफा है।

  8. By Anonymous on July 27, 2013 at 3:15 PM

    आनंद जी से सौ फीसद सहमत
    "हम लेखक को मुक्तिबोध बनने (या उसकी तरह कंगाली में मरने)का ऐसा दबाव बनाते हैं जैसा लोग सती करने के लिए बनाया करते थे, जो जल कर नहीं मरे, समझो सच्‍ची पतिव्रता नहीं है।"
    क्या खूब कहा आपने।
    - समदर्शी

  9. By mahesh pandey on August 10, 2013 at 7:02 PM

    उदय प्रकाश जी के बारे यह पूर्वाग्रह और दुराग्रह से भरा एक निंदक का भडास ही लगा , जो उनकी लोकप्रियता से जलता हो । आदितयनाथ या भाजपा शासित राज्य से मात्र पुरुस्कार ग्रहण करने से क्या उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित है । लेखक का मुल्यांकन उसकी रचना से होनी चाहिए ना कि उनके वैयक्तिक आचरण से और वह भी अपने वैचारिकचश्मे से देखते हुए

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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