हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हम हरियाली की तरह बार-बार उगे हैं

Posted by चन्द्रिका on 6/12/2013 02:50:00 PM

रेयाज़ उल हक़


जब राज्य...अपराधी-राजनीतिज्ञों और व्यापारियों के गिरोह का रक्षक और समर्थक हो जाए. जब यह सब आकस्मिक घटना न होकर एक सोची समझी नीति और पूर्वाग्रह के तहत हो रहा हो. तब जनता के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता इसके सिवाय कि वह इस प्रकार के राज्य को उखाड़ फेंकने की बातें करे. ऐसी असामान्य परिस्थितियों में हिंसा अपरिहार्य और न्यायसंगत है.
-आनंद तेलतुंबड़े

सारी हस्तियों का मानना था कि गोलियां; लोकतंत्र, भाषण की स्वतंत्रता, शांति और उन सभी प्यारी-प्यारी चीजों पर चलाई गई थीं, जिनका नाम लेने का अवसर वो कभी हाथ से नहीं जाने देते थे. हत्यारे की तलाश जारी थी.
-ओरहान पामुक

शीर्षक के वाक्य को अली सरदार जाफरी ने मौलाना रूमी की शायरी से लेकर अपनी नज़्म ‘मेरा सफर’ में दर्ज किया था. यह हरियाली सिर्फ घास और पौधों पर लागू नही होती, संघर्ष के जीवन में यह हर वक्त की बुदबुदाहट होती है. उम्मीद इस पंक्ति का बुनियादी अहसास है.

हम जिस राज्य में रहते हैं, उसकी विचारधारा हमें यकीन दिलाने की कोशिश करती है कि भविष्य खत्म हो चुका है और सारी उम्मीदें सूदखोर के पैसों, मासिक किस्तों और सट्टा बाजार में गिरवी रखी जा चुकी हैं. उनके लिए उम्मीद कुछ पलों की खुशी भर है जिसकी अवधि किसी फाइव स्टार मॉल में की गई शॉपिंग के अनुपात में घटती-बढ़ती है. इसने उम्मीद को गिनी जा सकने वाली निर्जीव संख्याओं में बदल दिया है, जिसे आप कैश ऑन डिलीवरी के जरिए घर बैठे भी हासिल कर सकते हैं- इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले पैकेज में गिफ्ट वाउचरों के साथ. और यहीं, इस विचारधारा का भविष्यहीन, नाउम्मीदी से भरा खोखलापन जाहिर हो जाता है. इसके हिमायती और पैरोकार लोग इसे बचाने की कोशिशें करते हैं. इन कोशिशों में वे लोगों के कत्ल और हत्याओं को पहाड़े की तरह गिनते हैं.

लेकिन उम्मीदों की इस आभासी दुनिया से परे उम्मीदों की एक सच्ची दुनिया भी है. देहातों, शहरों, कस्बों, जंगलों और पहाड़ों में फैली हुई उस विशाल आबादी की दुनिया, जहां मूल्यों और विश्वासों की एक अलग ही व्यवस्था है. हालांकि इतिहास से लेकर अब तक उनकी उम्मीदों पर हमलों की कम कोशिशें नहीं हुई हैं लेकिन जनता का यह हिस्सा जानता है कि उसे अपनी उम्मीदों की हिफाजत कैसे करनी है. उम्मीद: वे जानते हैं कि स्वर्ग की सारी कल्पनाएं इसी उम्मीद को जिंदा और महफूज रखने के खयाल से बुनी गई हैं. दुनिया भर का लेखन, दुनिया भर के गीत, फिल्में, कहानियां, कविताएं, नाटक, किताबें, मजाक, चुटकुले...उम्मीदों को बचाए रखने की इंसानी जद्दोजहद का हिस्सा हैं.

बावजूद इसके कि आर्थिक विकास दर से जनता का कत्लेआम किया जा रहा है, जनता की उम्मीदें कायम हैं. यह उम्मीद ही है, जो जनता को अपराजेय बनाती है. 1857 में जो जनता कुचल दी गई थी (उसने ब्रिटिश साम्राज्य को तब तक की सबसे बड़ी पराजय से परिचित कराया था और उसकी सबसे महत्वपूर्ण औपनिवेशिक राजधानी पर कब्जा कर लिया था. नेतृत्वकारी ताकतों की कमजोरी ने जनता को इस विजय के निर्णायक प्रभावों से वंचित कर दिया, ब्रिटिश राज के पलट कर किए गए हमले में कई हजार लोग मारे गए), जिसके जंगलों और पहाड़ों को ढाई सदियों से शिकारगाहों में तब्दील कर दिया गया है. आदिवासी जहां पैदा हुए उस जमीन और संसाधनों का वे अपने गुजर बसर के लिए इस्तेमाल करते थे. इसके लिए उन्हें किसी से इजाजत लेने या खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी. औपनिवेशिक शासन ने पहली बार इन इलाकों और संसाधनों को अपने कब्जे में करने की कोशिश की. आदिवासियों ने इन कोशिशों का मुंहतोड़ जवाब दिया और ब्रिटिश कभी कामयाब नहीं हो पाए. उनकी विरासत को अपनें कंधों पर उठाए भारतीय शासक वर्ग उनकी कोशिशों को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन आदिवासी जनता ने भी अपनी संघर्षों की विरासत को छोड़ा नहीं है. 1947 से लेकर आज तक, लगातार फासीवादी हमलों में जिस जनता का कत्लेआम किया गया (हैदराबाद रियासत को भारतीय राज्य में मिलाने के नाम पर बीस हजार से अधिक मुसलमानों का कत्ल भारतीय राज्य की सेना ने किया, दोषियों और सजा के बारे में भूल जाइए, कभी इस अपराध को कबूल तक नहीं किया गया, यह इस लोकतंत्र के स्थापित होने से भी पहले की एक मिसाल है. उसके बाद की मिसालें भी आप कमोबेश जानते हैं) उस जनता ने हार नहीं मानी है. वह 20 रुपए रोज से कम पर गुजर करती है, उसका एक बड़ा हिस्सा भुखमरी का शिकार है (करीब 20 करोड़ लोग, भोजन के अतिरिक्त भंडार वाले देश में भोजन की असुरक्षा के बीच जीते हैं. योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट भारत को एक स्थायी भुखमरी वाले देश के रूप में चिह्नित करती है. लेकिन अगर आप यहां रोज 20 रुपए खर्च कर सकते हैं तो आप गरीब नहीं माने जाएंगे. इतने में आप फुटपाथ पर तीन रोटियां और एक साधारण सी सब्जी खा सकते हैं) बीमारियों और बदतरीन जीवन स्थितियों ने उसे तोड़ रखा है (भारत दुनिया का सबसे निजीकृत स्वास्थ्य सेवाओं वाला देश है, जहां की आबादी के खर्चों में दूसरा सबसे बड़ा खर्च उसके इलाज पर होता है. लेकिन तब भी इलाज मिल जाएगा और खर्च करने पर भी आप अच्छा और भरोसेमंद इलाज पा सकेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. मलेरिया, टीबी और दूसरी ऐसी अनगिनत बीमारियां यहां अब भी महामारियों की तरह मौजूद हैं, जिनका अस्तित्व दुनिया के दूसरे हिस्सों में खत्म माना जा चुका है). लेकिन उसने अपनी उम्मीदों को बीमार नहीं होने दिया है.

तब इस बात का क्या मतलब है कि निराशा में हाथ मलते हुए पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, पुराने कार्यकर्ता और अनेक दूसरे लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि दुनिया दिन ब दिन नाउम्मीदी से भरती जा रही है. तब इस तथ्य को हम कैसे देखते हैं कि अकेले भारत में पिछले 20 वर्षों में ढाई लाख से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है.

तथ्य कभी कभी निराश कर सकते हैं लेकिन मिसालें उम्मीदों से भरी हुई हैं. मई के इस आखिरी हफ्ते में, जब गर्मी तेज होती जा रही है और बारिश का मौसम शुरू होने में महीने भर की देर है, किसानों ने धान के बीजों की साफ-सफाई शुरू कर दी है. सब्सिडी वाले खाद और बीजों से महरूम कर दिए जाने के बावजूद, सिंचाई के सस्ते और सार्वजनिक साधनों को गैरभरोसेमंद बना दिए जाने के बावजूद और अपनी जमीन पर खेती करने की उनकी अब तक पूरी न हो पाई हसरतों के बावजूद, वे पहली बारिश पड़ते ही खेतों में बीज डालेंगे. उसी विदर्भ में, जिसका पर्याय पिछले कुछ वर्षों से किसानों की खुदकुशियां बन गई हैं, कपास की फसलें हर साल उगाई जा रही हैं. क्या इनमें कहीं निराशा के बीज दिखते हैं? कहीं कोई नाउम्मीदी? बीजापुर के वे आदिवासी भी जिनका कत्ल राज्य की सेनाओं (और कभी कभी सलवा जुडूम) द्वारा पिछले माह और उससे पहले पिछले बरस और उससे भी पहले के कई बरसों में किए जाते रहे, वे फिर से अपने जीवन में उम्मीदों के बीज बोने के लिए जमा हो रहे हैं.

अगर ऐसा है, तो शायद इस निराशा का रिश्ता जीने और सोचने के तौर तरीके से नहीं है और न ही यह जीवन के मूल्यों से जुड़ी हुई है. इसका संबंध उस रिश्ते से है जो जीने और सोचने के हर तौर तरीके को तय करता है. पारिवारिक रिश्ते नहीं- वे तो उस व्यापक रिश्ते के दयनीय शिकार भर हैं. वह रिश्ता जो जीने, खाने, काम करने, रहने, पढ़ने, लिखने और उत्पादन करने के दौरान बनता है. सामाजिक और राजनीतिक रिश्ता. सत्ता का रिश्ता. उसे व्यवस्था कहा जाता है, हालांकि हम अपने अनुभवों से जानते हैं कि शब्दों से उनकी सारी उम्मीदें छीन कर किस कदर उन्हें बेजान कर दिया गया है. आबादी के बड़े हिस्से के लिए वे उल्टे मतलब देने लगी हैं. यह व्यवस्था है, जिसने जीवन को अव्यवस्थित कर दिया है. जो लोगों में निराशा भरती है, उन्हें नाउम्मीदी की तरफ धकेलती है. इस निराशा की जड़ें नॉर्थ और साउथ ब्लॉकों में घूमने वाले वर्ल्ड बैंक के अधिकारियों और अंबानियों-टाटाओं के एजेंटों की अटैचियों तक में फैली हुई हैं. संसद की कार्यवाहियों में दायर हैं इस निराशा की वजहें. इसीलिए उम्मीद की हर कोशिश संसद, टाटाओं-अंबानियों और वर्ल्ड बैंक के खिलाफ गुस्से और नफरत से ही शुरू होती है.

आप जहां भी जाएं, इस व्यवस्था के जड़ हो चुके, सड़ रहे हिस्सों से रू ब रू होंगे. शादियों में बजने वाले फूहड़ गीतों से लेकर संसद की फूहड़ कार्रवाइयों तक एक हिंसक नाउम्मीदी, ठहराव और निराशा पसरी हुई है. चीजों की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं. सब्सिडियों को हमेशा के लिए बंद किया जा रहा है. रोजगार खत्म किए जा रहे हैं और बेरोजगारी की दर हर साल बढ़ रही है (2012 में यह 9.3 प्रतिशत थी, इस साल 9.4 फीसदी है जबकि आबादी 1.37 फीसदी की रफ्तार से ही बढ़ रही है. यह साफ है कि आबादी के बढ़ने का बेरोजगारी से कोई सीधा संबंध नहीं है). अगर आप अगले साल भी मौजूदा जीवन स्तर को, जो पहले से ही बेहद दयनीय है, बनाए रखना चाहते हैं तो आपको अपनी आमदनी की दर को शायद अनिल अंबानी के मुनाफे की दर से ऊपर ले जाना होगा. राज्य युद्ध स्तर पर यह तय कर रहा है कि रियायतें खत्म की जाएं, कि जमीनें छीन ली जाएं और बड़े बांधों के जरिए लोगों विस्थापित किया जाए, कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को मंजूरी देकर किसानों और फेरीवालों को तबाह कर दिया जाए. शिक्षा को बड़ी कंपनियों और कारोबारियों के हाथों बंधक बना कर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, मुस्लिमों और दूसरे वंचित तबकों के जनवादी अधिकारों को खारिज कर दिया जाए. और यह सब राज्य की दखलंदाजी को कम करने के नाम पर किया जा रहा है. शब्दों ने अपने मतलब उलट लिए हैं.

ऐसा लग सकता है कि शब्दों ने अपने मतलब उलट लिए हैं. जैसे कि लोकतंत्र का मतलब फासीवाद हो गया है. विकास का मतलब तबाही और विस्थापन. सशक्तीकरण लोगों से उनके अधिकार और संसाधनों को छीने जाने की ही दूसरा नाम है. सम्मान, अपमान का एक बेहद घिनौना रूप है. राष्ट्रीय सुरक्षा जनता को असुरक्षित बनाने का राजकीय अभियान है और विकास तथा तरक्की जनता के खिलाफ एक और युद्ध को दिए गए अच्छे लगने वाले संबोधन हैं. शांति अभियान नाम उस हत्यारे फासीवादी गिरोह को दिया जाता है, जिस पर एस्सार और टाटा जैसी कंपनियों के लिए आदिवासियों से जमीनें छीनने की जिम्मेदारी है. इस गिरोह के हत्यारे अभियानों में 644 तबाह गांवों, तीन लाख से अधिक उजड़े हुए आदिवासियों, हत्याओं और बलात्कारों के सैकड़ों मामलों को मिला कर जो दर बनती है, उसे राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि की प्रस्तावित दर कहा जाता है. जब तक अदालत इस अभियान को रोकने के आदेश जारी करती, जनता का हथियारबंद संघर्ष इस अभियान को धूल में मिला चुका था. अदालती व्यवस्था के जनविरोधी होने का अंदाजा इस कदर लगाया जा सकता है कि अपराधों को दर्ज करते हुए भी वो इन अपराधों के लिए उसके कर्ताधर्ताओं के खिलाफ एक केस तक दर्ज नहीं करा सकी. फिर भी शब्दों के अर्थों की उलट दी गई दुनिया में जनता की कार्रवाई आतंकवाद कहलाई और अदालती फैसला इंसाफ कहलाया. जिसे इंसाफ की जरूरत है और जिसका इंसाफ पर एकाधिकार रखने का दावा है, उनके बीच का फासला युगों में ही मापा जा सकता है. यह फासला किसी तरक्की या पिछड़ेपन से जुड़ा हुआ नहीं है. इसका अर्थ मूल्यों और मकसद के उस दो अलग-अलग निजामों से है, जिसका ये दोनों प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन जनता इस फासले को मिटा रही है. वह इंसाफ और अदालतों में फर्क नहीं करती. उसने अपना इंसाफ हासिल करने के लिए अपनी अदालतों का सिलसिला शुरू किया है. जनता की इन अदालतों को हिंसक और बर्बर कह कर उन्हें अपमानित किया जाता है. लेकिन क्या इंसाफ अहिंसक हो सकता है?

इंसाफ एक हिंसक संभावना है, क्योंकि यह अनिश्चित भविष्य के अनिश्चित नतीजों पर निर्भर नहीं करता. यह एक ठोस मांग है, एक ठोस उम्मीद जिसे पीड़ित छू सके, देख सके, महसूस कर सके. इसकी बुनियादी शर्त है कार्रवाई और वह भी सामूहिक कार्रवाई. क्योंकि समूह या समुदाय ही इस इंसाफ के गवाह बनते हैं और उसे भविष्य के लिए दर्ज करते हैं.

लेकिन समुदाय की सक्रियता कैसी होगी अगर वह भूख और बीमारियों के अपार विस्तार में रोटियों और इलाज के लिए तरसते हुए दम तोड़ते अपने परिजनों को देखने को मजबूर होता है? जब उससे सिंचाई के बिना सूखती फसलों और छीनी जा रही जमीन के आगे हाथ बांधे खड़े रहने की अपेक्षा की जाती है? जब उससे कहा जाता है कि वो सूदखोरों और जमीन के मालिकों के, कारखानेदारों के, पुलिस और फौज के बंधुआ मजदूरों की तरह जीने और सोचने के तरीके को अपना ले? जब मेहनत से कमाई गई थोड़ी सी रकम को उसे ब्याज, पुलिस के हफ्ते, डॉक्टरों की फीस और पुजारियों की रस्मों के नाम पर लुटा देना पड़े? या फिर दलितों की जली हुई बस्तियों में इंसाफ का चेहरा कैसा होगा? (धर्मापुरी में पिछले साल नवंबर में दलितों के 160 घर जला दिए गए. हरियाणा और देश के दूसरे हिस्सों में लगभग रोज ही ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं). गिरफ्तार किए जा रहे, जेलों में बंद और हिरासत में मारे जा रहे मुसलमान युवकों के लिए इंसाफ का चेहरा कैसा होगा? जनसंहारों में मारे जा रहे अल्पसंख्यकों के लिए? क्या अपमान और गुलामी से गुजरे हजारों सालों के लिए इंसाफ का मतलब थोड़ा सा और अपमान होगा? थोड़ी सी और गुलामी? और बलात्कार की शिकार हुई एक महिला के लिए और उस बच्चे के लिए जिसकी उंगलियां चार बरस की उम्र में काट की जाएं? बासागुड़ा के पिताओं के लिए जिनके बच्चे धरती की सतह से इस तरह मिटा दिए गए मानो उनका जन्म लेना ही अपराध था? या फिर कश्मीर की वादियों के लिए? उत्तर-पूर्व के गांवों के लिए? नहीं. यह हिंसक होगा ही. पुरानी पीड़ाएं जब आंखों में उतरती हैं तो मध्यवर्गीय नैतिकताएं दरकिनार हो जाती हैं.

इस देश के आदिवासी पिछले ढाई सौ बरसों से इसी इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं. नारायणपटना में पोस्को के खिलाफ, झारखंड में गांवों को उजाड़े जाने के खिलाफ, महाराष्ट्र के दलित उत्पीड़न के खिलाफ, कुडनकुलम के निवासी परमाणु रिएक्टर के खिलाफ, कश्मीर और मणिपुर, असम, नागालैंड के लोग अपनी आजादी के लिए.

देश और दुनिया भर में हर जगह लोग इस सवाल से रू ब रू हैं...कि क्या उम्मीद हमेशा के लिए खत्म कर दी जाएगी? कि क्या बिना उम्मीद के भविष्य की कल्पना की जा सकती है? कि खुद भविष्य कैसा होगा? वे हिंसा या अहिंसा के मुद्दे को अपने रास्ते में नहीं आने देते, क्योंकि यह उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है. उनका सवाल सीधा है: क्या एक ऐसा भविष्य मुमकिन है जिसमें जिंदगी बराबरी, इज्जत और इंसाफ के साथ जी जा सके? उनका सबकुछ इसके जवाब पर निर्भर करता है और इसके रास्ते में आने वाली हर रुकावट को वे पूरी निर्ममता से खारिज कर देते हैं.

उनका सवाल जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सरल. और उतना ही सच्चा, ठोस. वे एक नई दुनिया बना रहे हैं. वे पुरानी शासन व्यवस्थाओं को तबाह कर रहे हैं. भयानक दमन और घोर अभावों में जीते हुए भी वे अपनी इस दुनिया का ताना-बाना खुद खड़ा कर रहे हैं- वे जमीनें बांट रहे हैं, वे बीज बो रहे हैं, मिलकर खेतों को जोत रहे हैं, नहरें बना रहे हैं, तालाबों की खुदाई कर रहे हैं. उनकी अपनी सरकार है, सरकार के अपने विभाग हैं, अदालतें हैं, हिफाजत के लिए समितियां हैं, दस्ते हैं, सेना है. उनके अपने सांस्कृतिक संगठन हैं, गीत हैं, नाटक हैं, पत्रिकाएं हैं. वे अपने जालिमों को उनकी गंध और धमक से पहचानते हैं. वे जानते हैं कि उस पर कब और कहां और कैसे हमला करना है. उनका हमला अचूक है और इंसाफ सुनिश्चित. वे शब्दों को उनके असली मायने लौटा रहे हैं. मुखौटों वाली दुनिया के लिए उनके खुरदरे और सख्त हाथ असली चेहरे गढ़ रहे हैं.

लेकिन मुखौटों वाली दुनिया चीख उठती है कि ‘वे लोकतंत्र पर हमला कर रहे हैं,’ मगर वे ऐसी किसी चीज पर हमला कैसे कर सकते हैं जो है ही नहीं. लोकतंत्र का मतलब चुनावी अभियान, वोट, चुनावी पार्टियां, संस्थान और इमारतें भर नहीं हैं. लोकतंत्र फैसलों के निर्माण को उत्पीड़ित जनता की इच्छा और उसके हितों के मातहत ले आने की राजनीतिक कार्रवाई है. व्यापक जनता की बदहाली, विस्थापन, भुखमरी, जनसंहार और दूसरी सारी समस्याएं अप्रत्याशित और अनचाही नहीं है. वे मौजूदा व्यवस्था की योजनाबद्ध नीतियों के ऐसे नतीजे हैं, जिनके बारे में शुरुआती दिनों से ही चेतावनी दी जाती रही है. इसलिए अगर व्यापक जनता इस व्यवस्था को लोकतंत्र मानने से इन्कार करती है और उसके मुंह पर उसी की शैली में पलटवार करती है तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है. वह जानती है कि मौजूदा लोकतंत्र मुट्ठी भर ऊपरी तबके और प्रभुत्वशाली जातियों की तानाशाही है. जनता को हक है कि वह इस तानाशाही को चकनाचूर कर दे और लोकतंत्र को उसका असली रूप लौटा दे.

इन तानाशाहियों को छुपाने के लिए पारदर्शिता और सुशासन के मुखौटे इस्तेमाल में लाए जाते हैं. लेकिन मुखौटे चेहरों को छुपा सकते हैं, चरित्र को नहीं. आप इस तानाशाही को हर जगह महसूस कर सकते हैं-सूखती हुई नदियों से लेकर परती पड़ी जमीन के टुकड़ों तक और फर्जी मुठभेड़ों से लेकर भरी हुई जेलों तक, अपनी बारीक और भ्रम में डाल देनेवाली तानाशाहियां छुपे हुए रूप में काम करती हैं. ताकत, एकाधिकार और मुनाफा- दुनिया की सारी तानाशाहियों के स्रोत हैं.

इसीलिए, जनता जब इन तानाशाहियों के हजार हाथों में से एक को कुचलती है तो सत्ता और उसके हिमायतियों के गलियारों से शोर उठता है: ‘क्या लोकतंत्र में हिंसा जायज है?’ ‘ये बर्बर और असभ्य लोग अहिंसक लोगों पर हमले कर रहे हैं.’

इसीलिए, अब जब कुछ लोग ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकार को वे जंगल में सेना भेजने पर राजी कर लेंगे और कुछ दूसरे लोग कोसते हुए कह रहे हैं ऐसे हमले करके संघर्षरत आदिवासी जंगल में सेना और दमन को न्योता दे रहे हैं, बस्तर के आदिवासी इन ऐलानों और मन ही मन लगाए गए हिसाबों से परे, अपने पर थोप दिए गए ढाई सौ वर्षों पुराने युद्ध के अगले कदम की तैयारी कर रहे हैं. वे जानते हैं कि उनकी लड़ाई महज सरकारों से नहीं, साम्राज्यों से है. वे यह भी जानते हैं कि जिस वक्त साम्राज्यों ने उनके जीने के तरीकों को गैरकानूनी बना दिया है, तो इस कानून को ध्वस्त करके ही वे अपने जीने के तरीकों को बनाए रख सकते हैं और उसका आगे विकास कर सकते हैं.

एक छोटी सी मिसाल: 2009 में जब लालगढ़ में आदिवासियों के संगठित संघर्ष के दौरान सीआरपीएफ को इलाके के अपने कैंप खाली करने थे तो स्थानीय लोगों ने इस प्रस्ताव को सिरे से ही खारिज कर दिया कि उन कैंपों को स्कूल या अस्पताल में बदल दिया जाए. उनका कहना था कि ‘ब्रिटिश’ लोगों से जुड़ी किसी भी चीज का वे अपने जीवन में इस्तेमाल नहीं करेंगे.

ब्रिटिश! वे 2009 में सीआरपीएफ की बात कर रहे थे. उन्होंने शब्दों को उनके पांवों पर खड़ा कर दिया था. और अब वे दुनिया को उसके पैरों पर खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए उनमें कोई भ्रम नहीं है. वे जानते हैं कि अगर इन्हें नइंसाफियों और शोषण के सिलसिले को उलट देना है तो उन्हें राजनीतिक ताकत के सवाल को हल करना होगा. उन्हें अपने संघर्ष और एकजुटता से, न कि समझौतों के जरिए, यह ताकत हासिल करनी होगी. बिना इसके दूसरी सारी कोशिशें और उपलब्धियां नाकाम बना दी जाएंगी. वे इस बात को जानते हैं कि राज्य शासक वर्ग के हाथों में जनता के उत्पीड़न का औजार है और अगर उन्हें उत्पीड़ित जनता को इस उत्पीड़न से मुक्त करना है तो इस शासक वर्ग को बेदखल करना होगा. उन्हें इसको लेकर भी कोई भ्रम नहीं है कि इस कार्रवाई का दमनकारी होना उसी अनुपात में लाजिमी है जिस अनुपात में मौजूदा शासक वर्ग दमनकारी है. फर्क बस यह होगा कि जनता की तरफ से दमन का निशाना प्रतिक्रियावादी ताकतें और ऊपर के कुछ फीसदी प्रभुत्वशाली लोग होंगे.

इसलिए जनता अपनी हिंसा और हथियारों की जिम्मेदारी इस या उस सरकार पर नहीं डालती. वह राज्य की ऐतिहासिक उत्पत्ति और भूमिका को सामने रखती है. वह इसकी तरफ इशारा करती है कि राज्य दमनकारी होता ही है. अगर उस राज्य पर अधिकार करना है तो उसके दमन से लड़ने में सक्षम होना जरूरी है. इसीलिए ऐसे वर्ग संघर्ष की कल्पना करना नामुमकिन है, जिसमें जनता ताकत का इस्तेमाल नहीं करे.

लेकिन मध्यवर्ग हिंसा को ऐसे देखता है मानो यह कोई दूर की पराई चीज हो. मानो इसका हमारे समाज और इसकी सत्ता संरचना से कोई रिश्ता ही न हो. मानो किसी दूसरे ग्रह के निवासियों ने हमारी दो अंकों की वृद्धि दर से जलते हुए हमें शाप दे दिया हो (जो अब मुंह के बल नीचे आ रही है). सदियों से जाति की अमानवीय व्यवस्था के रूप में चली आ रही आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक हिंसा को भूल जाने का अभिनय करता है. वह स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ निरंतर हो रही हिंसा को भी भूल जाता है. वह भूल जाता है कि हिंसा को उत्पीड़ित जनता के संघर्षों ने नहीं, बल्कि उत्पीड़कों की व्यवस्था ने पैदा किया है. वह पूछता है कि आखिर एक ऐसे देश में लोगों के हाथ में रॉकेट लॉंचर और बारूदी सुरंगों का क्या काम जहां सब्सिडियां तक घर बैठे बैंक खाते में जमा करा दी जाती हों और तेंडुलकर के शतकों को गिनना लगभग नामुमकिन सा हो चला हो. क्या यह बहुत पुरानी बात है जब खुद इसी मध्यवर्ग ने भ्रष्टाचार और बलात्कारों के खिलाफ एक शांतिपूर्ण विरोध करते हुए दिखा नहीं दिया था कि शांति अभी भी इस देश के मूल्यों के बाजार से बाहर नहीं हुई है?

भारत का मध्यवर्ग- आबादी का 20 फीसदी हिस्सा- अभी गुलाबी सपनों पर सवार तबका है. वैश्वीकरण ने इस तबके के लिए अनपेक्षित फायदों और सुविधाओं के दरवाजे खोले हैं. लेकिन इसने कीमत भी भरपूर वसूली है: अनिश्चितता और असुरक्षित भविष्य इस तबके के सबसे बड़े दु:स्वप्न हैं. इनका यह डर इंडिया गेट पर प्रदर्शनों में उजागर होता है, जहां अब देश की 75-80 फीसदी आबादी को प्रदर्शन की इजाजत नहीं है. इस तबके की मजबूरियां इसे उत्पीड़ित जनता के संघर्षों के साथ ले आती हैं, लेकिन वह इसमें भी अपनी महानता बोध के साथ ही आता है. वह मांगों और दलीलों की एक फेहरिश्त पेश करता है, जिसे संघर्षों को मानना ही होगा. वह इस तरह व्यवहार करता है कि मानो उसने हिमायत करके कोई एहसान कर दिया हो और अब इस एहसान का बदला चुकाने की बारी संघर्ष कर रही उत्पीड़ित जनता की है.

लेकिन उत्पीड़ित जनता के हित दूसरे हैं और मकसद भी. वह इस फेहरिश्त को मान नहीं सकती. इसलिए मध्यवर्ग उसकी हर जुझारू उपलब्धि पर कई कदम पीछे हटते हुए अपना सीना पीटता है: अब सरकार का दमन और बढ़ जाएगा. अब सेना और वायुसेना उतारे जाएंगे. ये लोग जानबूझकर दमन को बुलावा दे रहे हैं.

मानो सेना और राज्य के दूसरे सशस्त्र बलों का अस्तित्व ही जनता के दमन के लिए नही हो. मानो राज्य की ताकत जनता के प्रतिरोध का दमन करने के लिए ही नहीं बनी हो. मानो जनता की कार्रवाइयों के बिना राज्य उत्पीड़न और नाइंसाफियों से मुंह मोड़ लेगा. जमीनी सच्चाइयों को समझे बिना ऐसी बातें करने पर राज्य की दलीलें ही मजबूत होती हैं. जनता इस शोर-शराबे से प्रभावित नहीं होती. उसे पता है कि राज्य का होना भर ही दमनकारी है. वह राज्य पर कब्जा करके ही दमन के इस सिलसिले को उलट सकती है और इससे निजात पा सकती है, चुप बैठे रह कर नहीं. उसे पता है कि मौजूदा व्यवस्था सलवा जुडूम की नाइंसाफियों का इंसाफ नहीं कर सकती थी. वह सिर्फ 2002 के गुजरात और 1984 के दिल्ली की ही नहीं ऐसे ही कई वर्षों और महीनों की पीड़ित रही है, वह लगातार इस राज्य के दमन को देखती और सहती है. उसे पता है कि दमन और उत्पीड़न दुखद लगने वाले शब्द भर नहीं हैं. कि वे कितने ठोस हैं और उनकी ताकत क्या है. इसलिए वह कुछेक कानूनों और अदालती फैसलों का इंतजार नहीं करती, क्योंकि इस राज्य द्वारा बनाए गए अनगिनत कानूनों के बावजूद दलितों और आदिवासियों के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाएं खत्म नहीं हुई हैं, बल्कि वे बढ़ती जा रही हैं. अपने अनुभव से उसने देखा है कि जब जब जनता अपनी पूरी ताकत से जुल्म से लड़ी है, जालिमों को हार माननी पड़ी है.

और इसीलिए उम्मीद और इंसाफ हिंसक संभावनाएं हैं और इन्हें टाला नहीं जा सकता. और इसीलिए मौजूदा व्यवस्था उम्मीद और इंसाफ से डरती है. वह दुनिया के सबसे बड़े सैन्य बल के जरिए, ताकतवर मीडिया और रीढ़विहीन साहित्य के जरिए इस उम्मीद को कुचलना चाहती है. लेकिन खेतों, खलिहानों, घाटियों, गांवों और जंगलों में उम्मीद की फसल उग रही है.

इसी जून महीने में जब धूप सबसे तेज होती है और मिट्टी में जरा भी नमी नहीं होती, किसान खेतों को जोत कर छोड़ देते हैं. इससे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली पतवारों की जड़ें मिट्टी में ऊपर आ जाती हैं और झुलसा देने वाली धूप उनको बीजों समेत सुखा डालती है.

यह पतवारों के खिलाफ किसानों का दीर्घकालीन युद्ध है. वे जानते हैं कि दुश्मन पर कब हमला करना है और कब नहीं. यह मानने की कोई वजह नहीं है कि चेरुकुरी राजकुमार आजाद की इस बात का कि ‘दुश्मन पर हम तब हमला करेंगे जब हम चाहेंगे, तब नहीं जब वो चाहेगा’ किसानों के इस तौर-तरीके से कोई रिश्ता नहीं है.

बस कुछ वक्त बाद ही, अभी सूखी और सपाट दिख रही धरती पर फसलों का सिलसिला एक बार फिर शुरू होगा. जिन फसलों को पतवारों ने तबाह करना चाहा, मौसमों ने जिनसे मुंह मोड़ लिए, जिन पर कीड़ों और जानवरों का खतरा हमेशा मंडराता रहा, उन्हीं के बीज धरती को एक बार फिर हरियाली से भर देंगे.

इस बार उनके रास्ते में जो आएगा, उसे पतवारों के अंजाम को याद रखना चाहिए.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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