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राष्ट्रीय मुक्ति और संस्कृति: अमिल्कर कबराल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/13/2013 06:32:00 PM


पश्चिमी अफ्रीकी देश गिनी बिसाऊ के मुक्ति आंदोलन के नेता अमिल्कर कबराल का जन्म 12 सितंबर 1924 को बफाता नामक कस्बे में हुआ था। 1945 में उन्होंने कृषि विज्ञान की शिक्षा के लिए लिस्बन स्थित संस्थान में प्रवेश किया और 1952 में वहां से डिग्री हासिल की। उन दिनों अंगोला, मोजांबीक और गिनी बिसाऊ में पुर्तगाल का शासन था। छात्र जीवन के दौरान कबराल ने पुर्तगाल में जनतांत्रिक शक्तियों के साथ संपर्क किया और वहां के जनतांत्रिक आंदोलन में भूमिगत रूप से सक्रिय रहे। 1953 में स्वदेश लौटने पर राजधनी बिसाऊ में उन्हें कृषि इंजीनियर की नौकरी मिली। यहां भी उनकी राजनीतिक गतिविध्यिां जारी रहीं और 1955 में उन्हें सरकार विरोधी होने का आरोप लगाकर नौकरी से निकाल दिया गया और देश छोड़ने का भी हुक्म हुआ। 1955-56 में अंगोला में उन्हें एक नौकरी मिली जहां अंगोला के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता अगोस्तिनो नेतो से मुलाकात हुई। कबराल ने अंगोला की मुक्ति के लिए बने संगठन एमपीएलए की स्थापना में नेतो की मदद की। सितंबर 1956 में कबराल ने गिनी बिसाऊ और केप वेर्दे की आजादी के लिए पीएआईजीसी नामक संगठन की स्थापना की और 1960 से सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत कर दी। 20 जनवरी 1973 को पुर्तगाल द्वारा नियुक्त भाड़े के सैनिकों ने कबराल की हत्या की।
 

अब तक राजनीतिक और सैनिक दृष्टि से कबराल ने अपने संगठन को इतना शक्तिशाली बना दिया था कि पुर्तगाली शासकों के लिए अध्कि समय तक गिनी में टिके रहना संभव नहीं था। सितंबर 1973 में गिनी बिसाऊ को पूर्ण आजादी मिल गई।
 

अमिल्कर कबराल ने साहित्य और संस्कृति से संबंधित प्रश्नों पर बहुत विस्तार से लिखा है और राजनीतिज्ञ के साथ-साथ एक संस्कृतिकर्मी के रूप में भी उनको सारी दुनिया में सम्मान प्राप्त है। कबराल का कहना है कि कोई भी जनता जो विदेशी प्रभुत्व से अपने को मुक्त कराती है सांस्कृतिक दृष्टि से भी तभी स्वतंत्रता पा सकती है जब उत्पीड़क देश तथा अन्य देशों की संस्कृति के सकारात्मक तत्वों को बिना किसी हिचक और ग्रंथि के अपना कर वह अपनी संस्कृति के उन्नत मार्ग पर बढ़ने के लिए तैयार हो। अगर साम्राज्यवादी शासन के लिए यह जरूरी है कि वह सांस्कृतिक उत्पीड़न करे तो राष्ट्रीय मुक्ति के लिए भी जरूरी है कि वह मुक्ति आंदोलन को एक सांस्कृतिक कर्म समझे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन संघर्ष कर रही जनता की संस्कृति की संगठित राजनीतिक अभिव्यक्ति है।
 

अमिल्कर कबराल ने 20 फरवरी 1970 को न्यूयार्क में संस्कृति और मुक्ति आंदोलन के अंतर्संबंधों पर एक व्याख्यान दिया था जिसका संक्षिप्त रूप ‘राष्ट्रीय मुक्ति और संस्कृति’ शीर्षक के अंतर्गत यहां प्रस्तुत है।– आनंद स्वरूप वर्मा, अनुवादक एवं संपादक, समकालीन तीसरी दुनिया


नाजी पार्टी के प्रमुख प्रचारक ग्योबेल्स ने जब सुना कि उसके यहां संस्कृति पर लोग बातचीत कर रहे हैं तो उसने अपनी रिवाल्वर तान ली। इससे पता चलता है कि नाजियों को, जो साम्राज्यवाद की सबसे दुखद अभिव्यक्ति थे-यह स्पष्ट था कि संस्कृति का क्या महत्व है और विदेशी प्रभुत्व का प्रतिरोध करने में इसकी कितनी बड़ी भूमिका हो सकती है। इतिहास हमें बताता है कि कुछ खास परिस्थितियों में विदेशियों के लिए जनता पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना बहुत आसान है। लेकिन इतिहास से ही हमें यह भी शिक्षा मिलती है इस प्रभुत्व के भौतिक पहलू चाहे जो भी हों इसको बरकरार तभी रखा जा सकता है जब गुलाम बनाई गयी जनता के सांस्कृतिक जीवन का स्थायी तौर पर और संगठित रूप से दमन कर दिया जाए। वास्तविकता यह है कि किसी देश की जनता पर शासन करने के लिए हथियारों से भी ज्यादा कारगर तरीका यह है कि उसके सांस्कृतिक जीवन को या तो बिल्कुल लकवाग्रस्त कर दिया जाए या समाप्त कर दिया जाए। कारण यह कि अगर देशज सांस्कृतिक जीवन शक्तिशाली रूप में मौजूद है तो विदेशी प्रभुत्व कभी भी निश्चिंत होकर अपना शासन स्थायी नहीं बना सकता। किसी भी क्षण, जो आंतरिक और बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है, सांस्कृतिक प्रतिरोध (अविनाशकारी) विदेशी प्रभुत्व का पूरी तरह मुकाबला करने के लिए नया रूप (राजनीतिक, आर्थिक, हथियारबंद) ग्रहण कर सकता है।

साम्राज्यवादी प्रभुत्व के लिए आदर्श स्थिति इस बात का चुनाव करना है कि-- या तो शासित देश की समग्र आबादी को पूरी तरह वह समाप्त कर दे ताकि सांस्कृतिक प्रतिरोध की संभावना ही खत्म हो जाए, अथवा- शासित देश की जनता की संस्कृति को नुकसान पहुंचाए बिना खुद को उन पर थोपने में उसे सफलता मिल जाए। कहने का मतलब यह कि उस देश की जनता पर स्थापित आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व एवं उस देश की जनता के सांस्कृतिक व्यक्तित्व के बीच एक सामंजस्य बैठा लिया जाए। पहली परिकल्पना में देशज आबादी के नरसंहार की बात निहित है और यह विदेशी प्रभुत्व की पूरी अवधरणा को भी व्यर्थ साबित करती है क्योंकि अगर जनता का अस्तित्व ही नहीं रहेगा तो शासन किस पर किया जाएगा। दूसरी परिकल्पना की पुष्टि अभी तक इतिहास के जरिए नहीं हो सकती है। मानव समुदाय के संदर्भ में जो व्यापक अनुभव हमारे पास हैं उनसे पता चलता है कि दूसरी संभावना भी व्यावहारिक नहीं है। यह संभव ही नही है कि आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व तथा शासित देश के लोगों के सांस्कृतिक व्यक्तित्व के बीच कोई सामंजस्य बैठाया जा सके।

इस चुनाव से बचने के लिए - जिसे ‘सांस्कृतिक प्रतिरोध की दुविधा’ कहा जा सकता है-साम्राज्यवादी औपनिवेशिक प्रभुत्व ने कुछ ऐसे सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की है जो विशुद्ध रूप से नस्लवाद पर आधारित सिद्धांत है और जिनको अगर व्यवहार में लाया जाए तो नस्ली तानाशाही के आधार पर (जिसे जनतंत्र भी कह देते हैं) देशज आबादी की स्थायी घेराबंदी करना है। मिसाल के तौर पर देशज आबादी के बारे में ‘समाहित करने’ (एसिमिलेशन) का तथाकथित सिद्धांत कुल मिलाकर संबद्ध जनता की संस्कृति को नकारने का एक उग्र उपाय ही साबित हुआ। इस सिद्धांत की जबर्दस्त विफलता से साफ पता चलता है कि इसके अंदर व्यावहारिकता का तत्व नहीं के बराबर है। आपने देखा होगा कि पुर्तगाल सहित अनेक उपनिवेशवादी शक्तियों ने इस सिद्धांत को आजमाया। पुर्तगाल के तानाशाह सालाजार ने यह कहकर कि अफ्रीका का अस्तित्व ही नहीं है कितनी बड़ी मूर्खता का परिचय दिया था। रंगभेद नीति के तथाकथित सिद्धांत के बारे में भी यही बात सच है। इसे एक नस्लवादी अल्पसंख्यक समूह ने दक्षिणी अफ्रीका की जनता के आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व के आधार पर विकसित और लागू किया और मानवता के खिलाफ बर्बर अपराध को जन्म दिया।
ये व्यावहारिक अनुभव विदेशी साम्राज्यवादी प्रभुत्व के नाटक की अच्छी जानकारी देते हैं क्योंकि शासित जनता के सांस्कृतिक यथार्थ से इनकी सीधे मुठभेड़ होती है। इससे यह भी पता चलता है कि मानव समाज में ‘सांस्कृतिक स्थिति’ और ‘आर्थिक (तथा राजनीतिक) स्थिति के बीच कितना मजबूत और अन्योनाश्रित संबंध है।

विदेशी प्रभुत्व का प्रतिरोध करने में जो तमाम कारक काम में आते हैं उनमें संस्कृति का महत्व इसलिए भी बहुत ज्यादा है क्योंकि सैद्धांतिक और वैचारिक आधार पर उस समाज की वास्तविकताओं की सशक्त अभिव्यक्ति संस्कृति में ही होती है। संस्कृति एक ही समय में जनता के इतिहास का परिणाम भी है और इतिहास की नियामक शक्ति भी। इसका मनुष्य तथा उसके परिवेश, लोगों तथा किसी समाज में रह रहे लोगों के बीच संबंधों के विकास पर जो भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है वह बहुत महत्वपूर्ण है। इस तथ्य से अनजान रहने का मतलब है विदेशी प्रभुत्व का मुकाबला करने में पीछे रहना और यही अनेक अंतर्राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की विफलता की भी कहानी है।

अब थोड़ा हम राष्ट्रीय मुक्ति की प्रकृति पर चर्चा कर लें। इस ऐतिहासिक परिघटना को हम समकालीन संदर्भों में देखेंगे अर्थात साम्राज्यवादी प्रभुत्व के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति की अवधरणा को रखेंगे। चाहे कैसा भी साम्राज्यवादी प्रभुत्व क्यों न हो इसकी एक खास विशेषता यह है कि यह उत्पादक शक्तियों की विकास प्रक्रिया को हिंसात्मक तरीके से रोकता है और इस प्रकार शासित लोगों की ऐतिहासिक प्रक्रिया को नकारता है। अब यह देखें कि किसी भी समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास का स्तर और इन शक्तियों की सामाजिक उपयोगिता की प्रणाली (स्वामित्व प्रणाली) उत्पादन के स्वरूप को तय करती है। हमारी राय में उत्पादन का स्वरूप, जिसके अंतर्विरोध कमोबेश वर्ग संघर्ष की तीव्रता के जरिए अभिव्यक्त होते हैं, किसी भी मानव समुदाय के इतिहास के प्रमुख कारक है। उत्पादक शक्तियों का स्तर ही इतिहास की वास्तविक और स्थायी चालक शक्ति है।

प्रत्येक समाज अथवा प्रत्येक जनसमूह के लिए, जिसे एक विकासमान इकाई के रूप में माना जाता है, उत्पादक शक्तियों के स्तर से ही इस बात का संकेत मिलता है कि वह समाज विकास की किस अवस्था में है। इससे इस बात का भी संकेत मिलता है कि उस समाज को निर्मित करने वाले विभिन्न समूहों या तत्वों के बीच किस तरह का भौतिक संबंध है जो वस्तुगत रूप में अथवा आत्मगत रूप में अभिव्यक्त होता है। मनुष्य और प्रकृति तथा मनुष्य और उसके परिवेश के बीच संबंधों और संबंधों के प्रकारों, व्यक्ति तथा समाज के सामूहिक अवयवों के बीच संबंधों एवं संबंधों के प्रकारों की भी जानकारी उत्पादक शक्तियों के स्तर से ही मिलती है। इनके बारे में बात करने का अर्थ है इतिहास के बारे में बात करना लेकिन इसका अर्थ संस्कृति के बारे में भी बात करना है। सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की जो भी वैचारिक अथवा आदर्शवादी विशिष्टताएं हों, संस्कृति जनता के इतिहास का एक आवश्यक तत्व है। संभवतः संस्कृति इस इतिहास का वैसा ही उत्पाद है जिस प्रकार किसी पौधे का उत्पाद है फूल। इतिहास की ही तरह अथवा यों कहें कि चूंकि यह इतिहास है इसलिए भी उत्पादन प्रणाली तथा उत्पादक शक्तियों का स्तर ही संस्कृति का भौतिक आधार है। संस्कृति अपनी जड़ों को खाद-मिट्टी रूपी उस परिवेश में गहरे जमाती है जिसमें इसका विकास हो और यह समाज की जैवीय प्रकृति को अभिव्यक्त करता है जो कमोबेश बाह्य तत्वों द्वारा प्रभावित हो सकती है। इतिहास हमें उन संघर्षों और असंतुलनों (आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक) की सीमा और प्रकृति की जानकारी देता है जो सामाजिक विकास की विशिष्टताएं हैं। संस्कृति विकास के प्रत्येक चरण में इन संघर्षों के समाधन के लिए सक्रिय उस गतिशील संश्लेषण से हमें अवगत कराता है जिसका अपने अस्तित्व और विकास की तलाश के लिए सामाजिक चेतना के जरिए निर्माण हुआ है।

किसी पौधे से निकले फूल की ही तरह संस्कृति में भी एक ऐसे पौधे के निर्माण और उर्वरण की क्षमता (अथवा दायित्व) है जो इतिहास की निरंतरता को सुनिश्चित करता है और साथ ही संबद्ध समाज के विकास की संभावना की गारंटी देता है। इस प्रकार यह समझा जाता है कि साम्राज्यवादी प्रभुत्व जब गुलाम देश की जनता के ऐतिहासिक विकास को नकारता है तो वह बुनियादी तौर से उसके सांस्कृतिक विकास को भी नकारता है। यह भी समझा जा सकता है कि क्यों साम्राज्यवादी प्रभुत्व अन्य सभी विदेशी प्रभुत्व की तरह अपनी खुद की सुरक्षा के लिए सांस्कृतिक उत्पीड़न का सहारा लेता है और शासित लेागों की संस्कृति के मूल तत्वों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पूरी तरह नष्ट कर देने का प्रयास करता है।

राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के इतिहास का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि इन संघर्षों के शुरू होने से पहले आमतौर पर संस्कृति के क्षेत्र में अभिव्यक्ति का परिमाण बढ़ जाता है और उत्पीड़क देश की संस्कृति को नकारते हुए अपनी खुद की सांस्कृतिक अस्मिता को स्थापित करने का सफल अथवा असफल प्रयास बहुत तेज हो जाता है। साम्राज्यवादी प्रभुत्व को झेलते हुए जनता की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति चाहे जो भी हो, हम देखते हैं कि संस्कृति में ही प्रतिरोध के वे बीज छिपे होते हैं जो आगे चलकर मुक्ति आंदोलन के निर्माण और विकास में सहायक होते हैं।

हमारी राय में राष्ट्रीय मुक्ति की बुनियाद जनता के उस अभिन्न अध्किार में निहित है जो अपना खुद का इतिहास होने की मांग करती है। इसलिए राष्ट्रीय मुक्ति का उद्देश्य उन अध्किारों को फिर से हासिल करना है जिन्हें साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने नष्ट कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका अर्थ है राष्ट्रीय उत्पादक शक्तियों के विकास की प्रक्रिया को मुक्ति दिलाना। यही वजह है कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन तभी और केवल तभी शुरू हो सकता है जब राष्ट्रीय उत्पादक शक्तियां पूरी तरह से हर प्रकार के विदेशी प्रभुत्व से स्वतंत्र हों। कोई भी जनता जो विदेशी प्रभुत्व से अपने को मुक्त कराती है सांस्कृतिक दृष्टि से भी तभी स्वतंत्रता पा सकती है जब उत्पीड़क देश तथा अन्य देशों की संस्कृति के सकारात्मक तत्वों को बिना किसी हिचक और ग्रंथि के अपना कर वह अपनी संस्कृति के उन्नत मार्ग पर बढ़ने के लिए तैयार हो। इस प्रक्रिया में वह विदेशी संस्कृति के सभी हानिकारक प्रभावों से अपने को मुक्त भी करती है।

इसीलिए यह कहा जा सकता है कि अगर साम्राज्यवादी शासन के लिए यह जरूरी है कि वह सांस्कृतिक उत्पीड़न करे तो राष्ट्रीय मुक्ति के लिए भी यह जरूरी है कि वह मुक्ति आंदोलन को एक सांस्कृतिक कर्म समझे।

जो बातें अभी कही गयी हैं उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन संघर्ष कर रही जनता की संस्कृति की संगठित राजनीतिक अभिव्यक्ति है। इसीलिए इस आंदोलन का नेतृत्व करने वालों के पास संघर्ष के ढांचे के अंतर्गत संस्कृति के मूल्य की तथा जन संस्कृति की साफ समझ होना बहुत जरूरी है। हमारे युग में आमतौर से यह सुनने को मिलता है कि सभी लोगों की अपनी एक संस्कृति है। यह बीते दिनों की बात है कि जब जनता पर अपना प्रभुत्व मजबूत करने के लिए संस्कृति को सुविधाप्राप्त लोगों या राष्ट्रों तक ही सीमित कर दिया गया था और जब अज्ञानतावश अथवा किसी चाल के तहत संस्कृति को एक तकनीकी स्वरूप दे दिया गया था। मसलन चमड़ी के रंग के आधार पर अथवा आंख की बनावट के आधार पर इसकी व्याख्या की जाती थी। जनता की सांस्कृतिक धरोहर के रक्षक और इसके प्रतिनिधि होने के कारण मुक्ति आंदोलन को इस तथ्य के प्रति सजग रहना चाहिए कि जिस समाज का वह प्रतिनिधित्व कर रहा है उसकी भौतिक स्थितियां चाहे जो हों, वह समाज ही संस्कृति का वाहक और उसका निर्माता है। इसके अलावा मुक्ति आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा जनवादी स्वरूप ग्रहण करना चाहिए, संस्कृति का लोकप्रिय रूप अपनाना चाहिए जो कभी भी समाज के एक या कुछ हिस्सों का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता है।

सामाजिक संरचना के समग्र विश्लेषण में, जिसे करने में प्रत्येक मुक्ति आंदोलन का अनिवार्य रूप से सक्षम होना चाहिए, समाज के प्रत्येक समूह की सांस्कृतिक विशिष्टताओं का एक महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि संस्कृति का जहां एक जनवादी स्वरूप है वहीं इसे एक समान नहीं कह सकते। इसका विकास समाज के सभी क्षेत्रों में समान रूप से नहीं होता। मुक्ति संघर्षों के प्रति प्रत्येक सामाजिक समूह का रुख उसके आर्थिक हितों से निर्देशित तो होता ही है, यह बड़े पैमाने पर उसकी संस्कृति से भी प्रभावित होता है। यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि संस्कृति के स्तर पर जो तमाम विभिन्नताएं हैं उन्हीं से मुक्ति आंदोलन के प्रति उन लोगों के व्यवहार की विभिन्नताओं का भी पता चलता है जो उसी सामाजिक-आर्थिक समूह से आते हैं।

हमारे देश की खास परिस्थितियों में संस्कृति के स्तर की विभिन्नताएं थोड़ी जटिल है। दरअसल गांव से शहर के बीच, एक जातीय समूह से दूसरे के बीच, एक आयु वर्ग से दूसरे के बीच, किसान वर्ग से लेकर मजदूर वर्ग के बीच और यहां तक कि एक ही सामाजिक समूह में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच संस्कृति का परिमाणात्मक और गुणात्मक स्तर उल्लेखनीय रूप से काफी भिन्न है। मुक्ति आंदोलन को चाहिए कि वह इन सभी बातों को ध्यान में रखकर ही अपनी रणनीति तैयार करे।

कुछ ऐसे समाजों में जहां की सामाजिक संरचना अलग ढंग की है जैसे बैलेंटे में-सांस्कृतिक स्तर का विभाजन कमोबेश समान है और जो विभिन्नताएं हैं वे कुछ व्यक्तियों के अथवा आयु वर्गों की विशिष्टताओं से जुड़ी हुई हैं। दूसरी तरफ ऐसे समाज में जहां का सामाजिक ढांचा श्रेणीबद्ध है (मसलन फुला में) सामाजिक पिरामिड के नीचे से लेकर ऊपर तक महत्वपूर्ण विभिन्नताएं देखने को मिलती हैं। सामाजिक संरचना में यह विभिन्नताएं एक बार फिर संस्कृति और अर्थव्यवस्था के बीच के घनिष्ठ संबंध को प्रदर्शित करती हैं। इसके साथ ही इनसे यह भी पता चलता है कि इन दो जातीय समूहों का मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में भिन्न-भिन्न रवैया क्यों है।

यह भी सही है कि मुक्ति आंदोलन में संस्कृति की भूमिका निर्धारित करने के प्रयास में सामाजिक और जातीय समूहों की विविधता से थोड़ी दिक्कत पैदा होती है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि मुक्ति संघर्ष की निर्णायक भूमिका के प्रति हमें आंख नहीं मूंदनी चाहिए-उस समय भी जब ऐसा लगता हो कि वर्ग संरचना विकास की भ्रूणावस्था मैं है। औपनिवेशिक प्रभुत्व के अनुभव से हमें पता चलता है कि उपनिवेशवादियों ने शोषण की प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा असरदार बनाने के प्रयास में गुलाम देशों की जनता के सांस्कृतिक जीवन का दमन करने की न केवल एक प्रणाली विकसित की बल्कि आबादी के एक हिस्से को सांस्कृतिक अलगाव में भी डाल दिया। यह काम उन्होंने या तो देशज लोगों को अपनी संस्कृति में समाहित करके किया अथवा आम जनता और देशज अभिजात्य वर्ग के बीच एक सामाजिक खाई के जरिए पूरा किया। समाज को विभाजित करने अथवा विभाजन को और असरदार बनाने की प्रक्रिया के फलस्वरूप आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खासतौर से शहरी अथवा ग्रामीण निम्न पूंजीपति वर्ग (पेटीबुर्जुआ) उपनिवेशवादियों की मानसिकता को अपनाने में लग गया और उसने खुद को अपने ही देश की जनता के मुकाबले सांस्कृतिक दृष्टि से श्रेष्ठ समझ लिया तथा अपने देशवासियों के सांस्कृतिक मूल्यों की या तो अवहेलना करने लगा या उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखने लगा। उपनिवेशवादी संस्कृति से प्रभावित बुद्धिजीवियों के एक बहुत बड़े हिस्से में यह बात देखी जाती है। ऐसे बुद्धिजीवियों की सामाजिक स्थिति को और मजबूत बनाने के लिए उपनिवेशवादियों ने इनको मिलने वाली सुविधओं में जो वृद्धि की उससे मुक्ति आंदोलन के प्रति उनके नजरिए में भी जबर्दस्त तब्दीली आई।

चाहे जो हो हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि जब राजनीतिक स्वाधीनता की संभावनाएं दिखाई दे रही हों तो बड़ी संख्या में संघर्ष की धारा में वे व्यक्ति आ सकते हैं जो अभी औपनिवेशिक संस्कृति के प्रभाव से अछूते हैं। ऐसे लोग अपनी शिक्षा, वैज्ञानिक अथवा तकनीकी ज्ञान के आधार पर मुक्ति आंदोलन में उच्च स्थान भी प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी अवस्था में सांस्कृतिक और राजनीतिक दोनों धरातलों पर सतर्कता बहुत जरूरी है। क्योंकि अन्य क्षेत्रों की ही तरह मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में भी देखें तो हर चीज जो चमक रही है, जरूरी नहीं कि वह सोना ही हो। बहुत सारे ऐसे राजनीतिक नेता-जिनको काफी ख्याति मिल चुकी हो-हो सकता है कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हों। औपनिवेशिक प्रभुत्व के अधीन इस वर्ग (परंपरागत चीफ, अभिजन, धर्मिक नेता) का राजनीतिक प्राधिकार बहुत नाममात्र का होता है और व्यापक जनसमुदाय को इस बात की जानकारी रहती है कि वास्तविक प्राधिकार औपनिवेशिक प्रशासकों के पास है। तो भी सत्ताधरी वर्ग बुनियादी तौर पर अपना सांस्कृतिक प्रभुत्व जनता पर बनाए रखता है और इसके बहुत महत्वपूर्ण राजनीतिक निहितार्थ होते हैं।

यह एक तथ्य है कि उपनिवेशवादी शासक, जो सामाजिक पिरामिड के आधार में स्थित जनता की सांस्कृतिक गतिविधियों का दमन करता है, पिरामिड के शीर्ष पर स्थित सत्ताधरी वर्ग के सम्मान और संस्कृति की रक्षा में लगा रहता है और उसको मजबूत बनाता है। वह उपनिवेशवादी कबीले के ऐसे सरदारों को प्रतिष्ठित पदों पर लाता है जो उसका समर्थन करते हैं और जिनको व्यापक जन समुदाय की भी थोड़ी-बहुत स्वीकृति मिली रहती है। कबीले के इन सरदारों को कुछ भौतिक सुविधाएं प्रदान की जाती है जैसे उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जाएगी, उनके शासन के लिए एक इलाका निर्धारित कर दिया जाएगा, धार्मिक नेताओं के साथ उनके उद्भावनापूर्ण संबंध विकसित होने में मदद की जाएगी, उनके लिए मस्जिदें आदि बनवा दी जाएंगी आदि-आदि। इसके अलावा उन्हें वे सारी आर्थिक और सामाजिक सुविधाएं भी प्राप्त होंगी जो सत्ताधारी वर्ग को सुलभ हैं। ऐसा होने के बावजूद वे समूह के रूप में अथवा व्यक्तिगत तौर पर मुक्ति आंदोलन के साथ नहीं जुड़ेंगे, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। अनेक परंपरागत और धार्मिक नेता मुक्ति संघर्ष के शुरुआती दिनों में इसमें शामिल हुए हैं और इस प्रकार उन्होंने मुक्ति आंदोलन को मजबूत करने में योगदान दिया है।

लेकिन यहां फिर सतर्कता बरतनी होती है। सामान्य तौर पर औपनिवेशिक प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए और विशिष्ट स्थिति में अपने देश के संदर्भ में जिन बातों का उल्लेख किया गया है, उस पर ध्यान दें तो हम देखेंगे कि उत्पीड़क सत्ताधारी वर्ग में कुछ उच्च अधिकारी, कुछ बुद्धिजीवी और ग्रामीण इलाकों में बसे सुविधसंपन्न लोगों के प्रतिनिधि हैं। जब हम मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में इनके सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों पर विचार करते हैं तो इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हमारे सामने आते हैं। इन विभिन्न सामाजिक समूहों के व्यवहार में उनके अपने खास वर्ग की भी भूमिका होती है। सुविधसंपन्न वर्ग मुक्ति संघर्ष में किस तरह की भूमिका निभा सकता है अथवा उसका सकारात्मक योगदान क्या हो सकता है इसके मूल्यांकन में कमी किए बगैर मुक्ति आंदोलन के संचालकों को चाहिए कि वे अपने कार्य का आधार लोक संस्कृति को बनावें। औपनिवेशिक दमन का मुकाबला सांस्कृतिक हथियार से किया जा सकता है। मुक्ति आंदोलन के पहले चरण को शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और मजदूरों की सांस्कृतिक गतिविधियों से शुरू किया जा सकता है। मुक्ति आंदोलन तथा उस जनता के बीच, जिसका यह आंदोलन प्रतिनिधित्व करता है, राजनीतिक और नैतिक एकता का अर्थ है उन तमाम सामाजिक समूहों के बीच सांस्कृतिक एकता हासिल करना जो किसी भी मुक्ति संघर्ष के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एकता एक तरफ तो परिवेशजन्य यथार्थ एवं जनता की बुनियादी समस्याओं और आकांक्षाओं के बीच पूरी तरह तादात्म्य स्थापित करके तथा दूसरी तरफ संघर्ष में शामिल विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच प्रगतिशील सांस्कृतिक पहचान के जरिए हासिल की जा सकती है।

अपने विकास के साथ मुक्ति आंदोलन को चाहिए कि वह विविध हितों के बीच समरसता पैदा करे, अंतर्विरोधों को हल करे तथा मुक्ति और प्रगति की तलाश में समान उद्देश्यों को परिभाषित करे। अगर आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इन उद्देश्यों को पूरी तरह अपने मन में बैठा लेता है और तमाम कठिनाइयों एवं कुर्बानियों के बावजूद अपने संकल्प पर अडिग रहता है तो यह बहुत बड़ी राजनैतिक और नैतिक विजय कही जाएगी। यह एक ऐसी सांस्कृतिक उपलब्धि होगी जिसका मुक्ति आंदोलन के विकास और इसके सफल होने में निर्णायक महत्व है।

उत्पीड़कों की संस्कृति और उत्पीड़न के शिकार लोगों की संस्कृति के बीच जितना ही अधिक अंतर होगा उतना ही ज्यादा इस विजय की संभावना तेज हो जाएगी। इतिहास ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी विजेता को उस देश की जनता पर शासन करना कम कठिन होता है जिस देश की जनता की संस्कृति और विजेता की संस्कृति काफी हद तक मिलती-जुलती है।

उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा अफ्रीका में जो ढेर सारी गंभीर गलतियां की गयीं उनमें से एक गलती यह थी कि उसने अफ्रीकी जनता की सांस्कृतिक शक्ति को या तो नजरअंदाज किया या उसे कम करके आंका। यह प्रवृत्ति पुर्तगाल शासित उपनिवेशों में खासतौर से देखने में मिली-यहां उपनिवेशवादी ताकतें अफ्रीकी लोगों के सांस्कृतिक मूल्यों के अस्तित्व को नकार कर ही संतुष्ट नहीं हुई बल्कि उन्होंने हर तरह की राजनैतिक गतिविधियों में भी भाग लेने से अफ्रीकियों को रोके रखा। पुर्तगाली उपनिवेशों की जनता द्वारा किये गये राजनीतिक सशस्त्र प्रतिरोध को अफ्रीका के अन्य क्षेत्रों की तरह ही साम्राज्यवादियों ने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता से कुचल दिया और उसके इस काम में कुछ देशी सत्ताधरी वर्गों ने मदद पहुंचाई। अभिजात्य वर्ग के लोगों में से उन लोगों को एकदम नष्ट कर दिया गया जो जनता के इतिहास और जनता की संस्कृति के प्रति निष्ठावान थे। पूरी की पूरी आबादी को मौत के घाट उतार दिया गया। हर तरह के अपराध और शोषण का सहारा लेकर उपनिवेशवादी साम्राज्य स्थापित किये गये लेकिन जनता के सांस्कृतिक प्रतिरोध को नष्ट नहीं किया जा सका। उपनिवेशवादियों से हाथ मिलाकर काम कर रहे कुछ सामाजिक समूहों द्वारा छल किये जाने के बावजूद अफ्रीकी संस्कृति हर तरह के तूफानों को झेलती हुई अपनी अस्मिता को बचाये रख सकी। इसने गांवों में, जंगलों में और उपनिवेशवाद के शिकार लोगों की अगली पीढ़ी के दिलों में शरण ली।

जिस प्रकार कोई बीज उन अनुकूल स्थितियों का इंतजार करता है जिसमें वह अपनी वंश परंपरा को आगे ले जाने और उसे विकसित करने के लिए अंखुए का रूप ले सके, उसी प्रकार अफ्रीकी जनता की संस्कृति राष्ट्रीय मुक्ति के लिए चल रहे संघर्ष के दौरान फिर प्रस्पफुटित हो रही है। इन संघर्षों का कोई भी स्वरूप क्यों न हो, इन्हें सफलता मिले अथवा विफलता और संघर्ष का दौर लंबा हो या कम, ये इस उपमहाद्वीप के इतिहास में स्वरूप और सारतत्व दोनों की दृष्टि से एक नये युग की शुरुआत कर रहे हैं और अफ्रीकी जनता के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तत्व का संचार कर रहे हैं। संस्कृति इतिहास की उपज है और यह प्रत्येक क्षण में समाज की तथा निजी रूप में एवं सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य की भौतिक और आत्मिक सच्चाई को अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक संस्कृति में कुछ बुनियादी एवं गौण तत्व होते हैं, इसमें शक्ति भी होती है और कमजोरी भी, इसमें खूबियां भी होती हैं और खामियां भी, इसके सकारात्मक पहलू भी होते हैं और नकारात्मक भी तथा इसमें प्रगतिशील तत्व भी होते हैं और जड़ता पैदा करने वाले तथा पीछे ले जाने वाले तत्व भी। इस दृष्टि से अगर हम देखें तो हम यह भी पाते हैं कि संस्कृति एक समाजिक यथार्थ है जो मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा से परे है। इस पर उसकी चमड़ी के रंग अथवा उसकी आंखों के आकार का कोई असर नहीं पड़ता।

जैसा कि हमने पहले कहा मुक्ति आंदोलन को चाहिए कि वे अपने क्रियाकलापों को जनता की संस्कृति की सम्यक जानकारी पर आधारित करें और उनके सांस्कृतिक तत्वों के वास्तविक महत्व को तथा प्रत्येक सामाजिक समूह के विविध सांस्कृतिक स्तरों को समझे। मुक्ति आंदोलन को इस योग्य भी होना चाहिए कि वह जनता के सांस्कृतिक मूल्यों की बुनियादी और गौण बातों को जाने, इसके सकारात्मक और नकारात्मक, प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी, शक्तिशाली और कमजोर पहलुओं को पहचाने। मुक्ति आंदोलन के नेताओं को इस बात का जितना ही ज्यादा एहसास होगा कि मुक्ति का मतलब केवल राजनीतिक आजादी हासिल करना नहीं है बल्कि उत्पादक शक्तियों को समग्र रूप से स्वतंत्र कराना है तथा लोगों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रगति का निर्माण करना है, वे उतनी ही शिद्दत के साथ मुक्ति संघर्ष के चौखटे के अंदर संस्कृति के मूल्यों को विश्लेषित करने की जरूरत महसूस करेंगे। सांस्कृतिक मूल्यों के ऐसे विश्लेषण की जरूरत उस समय और भी तीव्र हो जाती है जब औपनिवेशिक दमन का मुकाबला करने के लिए मुक्ति आंदोलन को एक सशक्त राजनीतिक संगठन के नेतृत्व में जनता को लामबंद करना पड़ता है ताकि राष्ट्रीय मुक्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष छेड़ा जा सके।

(यह पूरा भाषण अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है)

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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