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बीच सफ़हे की लड़ाई

लुटेरे उद्योगपति और विद्रोही: दूसरी किस्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/12/2013 04:36:00 PM

हावर्ड ज़िन की चर्चित किताब अ पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स के 11 वें अध्याय  रॉबर बैरन्स ऐंड रेबेल्स का हिंदी अनुवाद. इसके अनुवादक हैं लाल्टू. अध्याय लंबा है, इसलिए हम इसे क्रमश: पोस्ट कर रहे हैं. पहली किस्त आप पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए दूसरी किस्त.
 
जॉन डी राकेफेलर की शुरुआत क्लीवलैंड शहर में एक पुस्तक विक्रेता के रूप में हुई। वह व्यापारी बना, उसने धन इकट्ठा किया और निर्णय लिया कि नए तेल-खनिज के उद्योग के आने से, तेल-खनिजशोधकों पर नियंत्रण रखने वाला ही पूरे उद्योग जगत पर नियंत्रण कर पाएगा। उसने 1862 में पहला तेल-खनिजशोधक खरीदा, और 1870 तक ओहायो राज्य की स्टैंडर्ड आयल कंपनी बना ली और रेल-कंपनियों के साथ गुप्त समझौते किए कि अगर वे उन्हें अपनी कीमतों पर रियायतें दें तो वह उनके जरिए तेल एक जगह से दूसरी जगह भेजेगा- इस तरह अपने प्रतियोगियों का व्यापार ही वह खा गया।

एक स्वच्छंद तेल शोधन-व्यापारी ने कहा: “अगर हम अपना व्यापार उनके हाथों बेच न दें … तो हमें कुचल दिया जाएगा … एक ही खरीदार बाज़ार में था और हमें उन्हीं की शर्तों पर सौदा करना था।” इस तरह के मेमो (निर्देश) स्टैंडर्ड आएल कंपनी के अफसरों को ज़ारी किए गए: “विल्कर्सन और सहयोगी कंपनी को सोमवार 13 तारीख को तेल की एक गाड़ी गई है … पेंच जरा और घुमाओ।” स्टैंडर्ड आयल कंपनी के लोगों ने बफलो शहर में एक प्रतियोगी तेल शोधक कंपनी के मुख्य मेकेनिक के साथ मिलीभगत से एक विस्फोट करवाकर उस कंपनी को धमाकों के झटकों से हिला कर रख दिया।

1899 तक स्टैंडर्ड आयल कंपनी ऐसी होल्डिंग कंपनी बन चुकी थी, जिसके नियंत्रण में अन्य कई कंपनियों के स्टाक आ चुके थे। पूँजी 11 करोड़ डालर की थी, मुनाफा हर साल 4 करोड़ 50 लाख डालर था और जान डी राकेफेलर की कुल संपत्ति का अनुमान 20 करोड़ डालर का था। जल्दी ही वह लोहा, तांबा, कोयला, जहाजरानी और बैंकों (चेज़ मैनहाटन बैंक) के व्यवसाय में आने वाला था। हर साल मुनाफा 8 करोड़ 10 लाख डालर तक बढ़ने वाला था और राकेफेलर परिवार की संपत्ति 2 अरब डालर तक हो जानी थी।

ऐंड्रू कार्नेगी 17 साल की उम्र में टेलीग्राफ क्लर्क था, फिर वह पेंसिलवानिया रेलरोड कंपनी के अध्यक्ष का सचिव बना। इसके बाद वह वाल स्ट्रीट (न्यूयार्क की प्रख्यात गली, जहाँ दुनिया के सबसे पुराने स्टाक एक्सचेंज में एक है) में बड़ी कमीशनों पर रेलरोड बांड बेचने लगा। जल्दी ही वह लखाधिपति हो गया। 1872 में वह लंदन गया, इस्पात बनाने की नई बेसेमर प्रक्रिया देखी और लाखाधिक डालरों के खर्च से इस्पात का कारखाना बनाने के लिए संयुक्त राज्य लौटा। कांग्रेस द्वारा अपनी सुविधा के अनुसार तय की गई ऊँची चुंगी दरों के द्वारा विदेशी स्पर्धा दूर रखी गई। 1880 तक कार्नेगी प्रतिमाह 10000 टन इस्पात उत्पन्न कर रहा था। इससे उसे प्रतिवर्ष 15 लाख डालर मुनाफा होने लगा। सन 1900 तक वह हर साल 4 करोड़ डालर कमाने लगा। इसी साल उसने एक रात्रिभोज पार्टी में अपना इस्पात कारखाना जे.पी. मार्गन को बेच देने का  समझौता किया। एक कागज़ पर उसने कीमत लिखी: 49,20,00,000 डालर।

मार्गन ने सं.रा. इस्पात कारपोरेशन बनाया, जिसमें कार्नेगी की कंपनी को दूसरों के साथ जोड़ा गया। उसने 1,30,00,00,000 डालरों के स्टाक और बांड बेचे (सभी कंपनियों की कुल कीमत से 40 करोड़ अधिक)। एकीकरण के एवज में उसने 15 करोड़ डालर की फीस ली। इतने सारे स्टाक मालिकों और बांड मालिकों को मुनाफा कैसे बांटा जा सकता था? इसके लिए यह निश्चित किया जाना जरूरी था कि कांग्रेस चुंगी दरों की वृद्धि का अनुमोदन कर विदेशी इस्पात बाज़ार में आने से रोके; स्पर्धा रोके और कीमत 28 डालर प्रति टन निश्चित रखे और 2,00,000 लोगों को हर रोज बारह घंटों तक अपना परिवार किसी तरह ज़िंदा रखने भर लायक दिहाड़ी पर काम करवाया जाए।

और कहानी बढ़ती रही - धूर्त, कुशल व्यापारी एक के बाद एक उद्योगों में अपने साम्राज्य बनाते, स्पर्धा का गला घोंटते, ऊँची कीमतें रखते, मजूरी कम देते, सरकारी भर्त्तूकी (सब्सिडी) का फायदा उठाते। ये उद्योग “कल्याणकारी राज्य-सत्ता” से लाभ लेने वाले पहले तबके में थे। सदी बदलने तक अमेरिकन टेलीफोन और टेलीग्राफ कंपनी का राष्ट्रीय टेलीफोन तंत्र पर पूरा एकाधिपत्य हो गया। कृषि मशीनरी का 85 प्रतिशत इंटरनेशनल हार्वेस्टर कंपनी बना रही थी और हर दूसरे उद्योग में संसाधन कम से कम हाथों में नियंत्रित होते गए। इन एकाधिकार व्यापार-संस्थाओं (मोनोपोली) में से कई सारों में बैंकों के हित (पूँजी) जुड़े थे और कारपोरेशन (व्यवसाय-मंडलों) अध्यक्षों का एक बहुत ताकतवर नेटवर्क बैंकों द्वारा ही संचालित था। इनमें से हरेक कई दूसरी व्यवसाय-मंडलों की बोर्ड की सभाओं में बैठता था। बीसवीं सदी की शुरुआत में तैयार की गई एक सीनेट रीपोर्ट के अनुसार अपने जीवन के शिखर काल में मार्गन अड़तालीस निगमों (कारपोरेशनों) के बोर्ड का सदस्य था। राकेफेलर सैंतीस निगमों के बोर्ड का सदस्य था।

इसी बीच संयुक्त राज्य की सरकार ठीक उसी राह पर चलती रही, जैसी कार्ल मार्क्स ने एक पूँजीवादी राज्य के लिए कल्पना की थी: शांति बनाए रखने के लिए निष्पक्षता का नाटक करते हुए धनी लोगों की मदद करना। ऐसा नहीं था कि धनी लोगों में आपस में सहमति थी। नीतियों को लेकर उनके झगड़े चलते रहते। उच्च-वर्ग के झगड़ों को शांतिपूर्ण तरीकों से निपटाना, निम्न-वर्गों के विद्रोहों पर नियंत्रण करना और व्यवस्था के दीर्घकालीन स्थायित्व की सुरक्षा के लिए उपयुक्त नीतियाँ बनाना राज्य-सत्ता का उद्देश्य था। 1877 में रदरफोर्ड हेएस के चुनाव में डेमोक्रेट और रिपब्लिक पार्टियों के बीच समझौते से दिशा तय हो गई। चाहे डेमोक्रेट जीतें या रिपब्लिकन, राष्ट्रीय नीतियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्त्तन नहीं होना था।

जब 1884 में डेमोक्रेट ग्रोवर क्लीवलैंड, प्रेसीडेंट के पद पर के लिए खड़ा हुआ, देश के लोगों का आम खयाल यह था कि वह एकाधिकार व्यवसाय संस्थाओं (मोनोपोली) और निगमों की ताकत का विरोधी था, और रीपब्लिकन पार्टी, जिनका प्रार्थी जेम्स ब्लेन था, धनी लोगों के हितों के पक्ष में थी। पर जब क्लीवलैंड ने ब्लेन को हरा दिया, जे गूल्ड ने उसे तार पर संदेश भेजा: “मेरा विश्वास है…कि देश के विशाल व्यवासायिक हित आपके हाथों में सुरक्षित होंगे।” और उसने ठीक ही सोचा था।

क्लीवलैंड के मुख्य सलाहकारों में एक विलियम ह्विटनी था, जो कि लखपति था और व्यापार-मंडलों का वकील था, जिसने स्टैंडर्ड आयल के धनाढ्य परिवार में शादी की और क्लीवलैंड ने उसे नौसेना का सेनाधिकारी (मंत्री) नियुक्त किया। उसने तुरंत कार्नेगी के कारखानों से कृत्रिम ऊँची कीमतों पर इस्पात खरीदकर “फौलादी नौसेना” बनाने का काम शुरु किया। क्लीवलैंड ने खुद उद्योगपतियों को भरोसा दिया कि उसके चुने जाने पर उन्हें घबराना नहीं चाहिए; “मेरे प्रेसीडेंट रहने की अवधि में व्यवसाय हितों में प्रशासकीय नीतियों से कोई हानि नहीं पहुंचेगी… एक पार्टी से दूसरी को कार्यकारी भार के ह्स्तांतरण से मौजूदा हालातों को कोई गंभीर झटका नहीं लगेगा।”

प्रेसीडेंट के चुनाव में असली मुद्दों को नहीं उठाया गया था; विशेष नीतियों के अपनाने से कौन से हितों को ज्यादा फायदा होगा और किनको क्षति पहुंचेगी, इसकी स्पष्ट समझ नहीं थी। आम चुनावी प्रचार का ही माहौल था, जिसमें पार्टियों में बुनियादी समानताओं को छिपाकर व्यक्तित्व, अफवाहों और तुच्छ बातों पर ही अधिक ध्यान दिया गया। उस समय के गहरे समझदार साहित्य आलोचक हेनरी ऐडम्स ने चुनाव के बारे में अपने एक मित्र को लिखा:

यहाँ हम ऐसी राजनीति में डूबे हुए हैं, जिसके रोचक स्वरूप को शब्दों में नहीं बखाना जा सकता। बड़े-बड़े मुद्दे हैं… पर मजे की बात है असली मुद्दों पर कोई बात नहीं करता। आम सहमति से वे इन विषयों को चर्चा से बाहर ही रखते हैं। इन पर बातें करनें से हम घबराते हैं। इनकी जगह प्रेस में बड़ी ही मजेदार बहस इस बात पर चल रही है कि मिस्टर क्लीवलैंड की कोई अवैध संतान है या नहीं या एक या अधिक रखैलों के साथ उनका संसर्ग था या नहीं।

सन् 1887 में जब खजाने में बहुत ज्यादा अतिरिक्त कोष था, एक अकाल के दौरान टेक्सास राज्य के किसानों को बीज खरीदने में राहत दिलवाने के लिए क्लीवलैंड ने 1 लाख डालर के आबंटन के बिल के खिलाफ ‘वीटो’ अधिकार का उपयोग किया। उसने कहा: “ऐसे मौकों पर संघीय सहायता से … सरकार की ओर से पितृत्वमूलक सहयोग की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और हमारे राष्ट्रीय चरित्र की दृढ़ता में कमी आती है।” पर उसी साल क्लीवलैंड ने अपने अतिरिक्त स्वर्ण भंडार का उपयोग कर धनी बांड-धारकों को 100 डालर प्रति बांड की नियत राशि से 28 डालर अधिक की दर पर भुगतान किए- यह कुल 4करोड़ 50 लाख डालर का उपहार था।

क्लीवलैंड प्रशासन द्वारा मुख्य सुधार कार्य को देखने पर अमरीका में सुधार के कानूनों पर से परदा उठता है। 1887 का अंतर्राज्यीय व्यापार कानून, उपभोक्ताओं के पक्ष में रेल-कंपनियों के नियंत्रण के लिए बना था। बास्टन ऐंड मेइन व अन्य रेलकंपनियों के पक्ष के वकील और जल्द ही क्लीवलैंड का एटर्नी जनरल बनने वाले, रिचर्ड ओलनी, ने अंतर्राज्यीय व्यापार आयोग के खिलाफ शिकायत कर रहे रेल कंपनी के अधिकारियों को बतलाया “रेलकंपनी के दृष्टिकोण से” आयोग को रद कर देना उचित न होगा।

उसने समझाया:

यह आयोग… रेलकंपनियों के बिल्कुल पक्ष में है या किया जा सकता है। इससे रेल कंपनियों पर सरकारी नियंत्रण की आम माँग की तुष्टि होती है, वहीं यह नियंत्रण नाममात्र को ही है… कौशल इसी में है कि आयोग का ध्वंस न कर, इसका फायदा उठाया जाए।

1887 के राष्ट्र के नाम संवाद (स्टेट आफ द यूनियन मेसेज) में ऐसी ही बात क्लीवलैंड ने खुद कही थी, साथ ही एक चेतावनी भी: “सुरक्षित,संतुलित और सोचे-समझे सुधार के लिए अब मौका दिया जा रहा है। और हममें से कोई इस बात को न भूल जाए कि कभी ऐसा हो सकता है कि लताड़े हुए और परेशान लोग… अन्यायों को तेजी से और पूरी तरह ख़त्म करने की जिद पकड़ लें।”

गृहयुद्ध के बाद के वर्षों के अपने रोचक अध्ययन द पोलीटिकोस (राजनीतिविद) में मैथ्यू जोसेफसन ने क्लीवलैंड के बाद 1889 से 1893 तक प्रेसीडेंट बने रीपब्लिकन बेंजामिन हैरिसन के बारे में लिखा है: “बेंजामिन हैरिसन अकेला ऐसा शख्स था जिसने रेलवे कारपोरेशनों में वकील और सैनिक दोनों की हैसियत से काम किया था। उसने संघीय अदालत में हड़तालियों (1877 के) के खिलाफ सजा की पैरवी की थी … और हड़ताल के दौरान उसने सैनिकों की एक कंपनी (टुकड़ों) को संगठित कर उनकी कमान भी सँभाली थी…”

हैरिसन के शासनकाल में भी सुधार की बातें हुईं। 1890 में पारित शर्मन अविश्वास कानून की परिभाषा थी “गैरकानूनी बाधाओं से व्यापार-वाणिज्य को बचाने का कानून।” इसके तहत राज्यों के बीच या विदेशों के साथ व्यापार को रोकने के लिए एक जुट होना या षड्यंत्र करना गैरकानूनी करार दिया गया। कानून निर्माता सीनेटर जान शर्मन ने एकाधिकार व्यवसाय के आलोचकों को शांत करने की ज़रूरत के बारे में इस तरह समझाया: “पुराने समय में… एकाधिकार व्यवसाय होते थे, पर आज जैसे विपुल व्यापार-दानव नहीं थे। आपको उनका सहयोग करना ही होगा, नहीं तो समाजवादी, साम्यवादी, और ध्वंसकों के लिए तैयार रहें। आज समाज में ऐसी विस्फोटक ताकते हैं जैसी पहले कभी नहीं थी…”

जब 1892 में क्लीवलैंड को फिर से प्रेसीडेंट चुना गया, यूरोप गए ऐंड्रू कार्नेगी को अपने इस्पात कारखानों के मैनेजर हेनरी क्ले फ्रिक से ख़त मिला: “प्रेसीडेंट हैरिसन के लिए मुझे बड़ा अफसोस है, पर प्रशासन में परिवर्तन से हमारे हितों को किसी प्रकार का नुकसान पहुँचने की कोई संभावना मुझे नहीं दिखती।” 1893 के आतंक और मंदी से देश में हो रहे विक्षोभ को रोकने के लिए क्लीवलैंड ने सेना का उपयोग किया। ऐसा वाशिंगटन शहर में आए बेकार लोगों की “कोक्सी की सेना” के दमन के लिए और बाद में फिर अगले साल रेल-कंपनियों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर की हड़तालों को तोड़ने के लिए किया गया।

इसी बीच, अपने गंभीर, काले कपड़ों वाले न्याय का चेहरा लिए होने के बावजूद, उच्च न्यायालय ने भी उच्च शासक-वर्गों के हित में अपनी भूमिका अदा की। जब उसके सदस्य ही प्रेसीडेंट द्वारा चुने जाते हैं और सीनेट उनको पद ग्रहण करने की अनुमति देता है, तो वे स्वच्छंद हो ही कैसे सकते हैं? जब इसके सदस्य अक्सर पहले धनी वकील रह चुके हों और करीब-करीब हमेशा ही उच्च-वर्ग से आए हों, तो और गरीबों के बीच उसकी निष्पक्ष भूमिका हो ही कैसे सकती थी? उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में न्यायालय ने अंतर्राज्यीय व्यापार पर नियंत्रण स्थापित कर राष्ट्रीय तौर पर नियंत्रित अर्थव्यवस्था की कानूनी बुनियाद खड़ी की थी, और संधि के मसौदों को पवित्रता का चरित्र देकर कॉरपोरेट पूंजीवाद का कानूनी आधार भी बना दिया था।

1895 में अदालत ने शर्मन कानून की ऐसी व्याख्या पेश की, जिससे कि इसकी कोई ताकत न रहे, इसके अनुसार चीनी के शोधन में एकाधिकार का होना निर्माण में एकाधिकार था, न कि व्यापार में, इसलिए शर्मन कानून का उपयोग कर इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता (सं.रा. बनाम ई सी नाईट कं.) अदालत ने यह भी कहा कि अन्तर्राज्यीय हड़तालों के खिलाफ शर्मन कानून का इस्तेमाल किया जा सकता है, चूँकि हड़तालों से व्यापार में बाधा पहुँचती है। ऊँची आय पर ऊँचे कर लगाने की कांग्रेस की कोशिश को भी अदालत ने गैरकानूनी घोषित किया (पोलाक बनाम फार्मर्स लोन ऐंड ट्रस्ट कंपनी)। बाद के वर्षों में अदालत ने स्टैंडर्ड आयल व अमेरिकी तंबाकू एकाधिकार व्यापारों को तोड़ना अस्वीकार कर दिया। यह तर्क दिया गया कि शर्मन ऐक्ट का इस्तेमाल व्यापार में सिर्फ "ना सिर पैर की” बाधाओं को रोकने के लिए किया जा सकता है।

न्यूयार्क के एक बैंक मालिक ने 1895 में उच्च न्यायालय को टोस्ट (दारु चढ़ाते) करते हुए कहा: “महाशयों, पेश है संयुक्त राज्य का उच्च न्यायालय -  डालर का संरक्षक, निजी संपत्ति का रक्षक, संपत्ति की लूट का दुश्मन, गणतंत्र का मुख्य खंभा।”

चौदहवें संशोधन के कानून बन जाने के कुछ ही समय बाद उच्च न्यायालय ने काले लोगों की सुरक्षा में इसकी भूमिका का खंडन करना शुरू किया और व्यापार-मंडलों की सुरक्षा के लिए इसे बढ़ाना शुरु किया। पर 1877 में उच्च न्यायालय के निर्णय से (मन बनाम इलीनाय राज्य) अनाज उठाने की मशीनों के लिए किसानों से लिए जाने वाली कीमत पर नियंत्रण करने वाले राज्य के कानूनों को स्वीकृति मिली। अनाज उठाने की मशीन की कंपनी ने पैरवी की कि वह एक ऐसी व्यक्ति है जिसकी संपत्ति उससे छीन ली गई है। इससे चौहदवें संशोधन की इस घोषणा को अमान्य किया जा रहा था, जिसमें कहा गया था, “न कोई राज्य किसी व्यक्ति से गैरकानूनी तरीके से उसकी जिंदगी, स्वतंत्रता या संपत्ति छीनेगी।” उच्च न्यायालय ने इसे नहीं माना और कहा कि अनाज उठाने वाली मशीनें महज निजी संपत्ति न थीं, बल्कि उसमें “जनहित” निहित था और इसलिए उनपर नियंत्रण किया जा सकता है।

इस निर्णय के एक साल बाद, धनी लोगों के लिए काम करते वकीलों के संगठन, अमरीकी बार (वकील) संघ ने अदालत के निर्णय को पलटने के लिए शिक्षा प्रचार शुरू किया। कई बार इसके सभापतियों ने कहा, “अगर साम्यवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ संपत्ति के हित के पक्ष में ट्रस्टों (निधियों) को औजार की तरह उपयोग किया जा सकता है, तो उनका (ट्रस्टों का) होना वांछनीय है। और: “अक्सर एकाधिकार  ज़रुरी और फायदेमंद भी होता है।”

सन् 1886 तक उन्हें सफलता मिल गई। राज्यों की विधानसभाओं ने जागरुक किसानों के दबाब पर रेल-कंपनियों द्वारा किसानों से ली जा रही दरों पर नियंत्रण के कानून पास कर दिए थे। उस साल उच्चतम न्यायालय ने कहा (वाबाश बनाम इलीनाय राज्य) कि राज्यों को ऐसा करने का अधिकार नहीं था और यह संघ की ताकत में उनका हस्तक्षेप था। इस एक साल में ही व्यापार-मंडलों पर नियंत्रण के लिए पारित 230 राज्य कानूनों को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया।

इस समय तक उच्चतम न्यायालय ने यह तर्क स्वीकार कर लिया था कि व्यापार-मंडल “व्यक्ति” थे और उनका धन चौदहवें संशोधन द्वारा उचित रुप से, संरक्षित संपत्ति थी। कहने को, यह संशोधन नीग्रो जाति के अधिकार की रक्षा के लिए पारित हुआ था, पर 1890 से 1910 तक चौदहवें संशोधन से जुड़े जो मामले उच्चतम न्यायालय में आए, उनमें उन्नीस तो नीग्रो लोगों से सबंधित थे, 288 व्यापार-मंडलों से जुड़े थे।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संविधान के व्याख्याता मात्र नहीं थे। वे विशेष पृष्ठभूमि से आए लोग थे, जिनके विशेष स्वार्थ थे। 1875 में उनमें से एक (न्यायाधीश सैमुएल मिलर) ने कहा था: “ऐसे न्यायाधीशों से बहस में उलझना व्यर्थ है जिन्होंने चालीस साल तक रेलरोड कंपनियों की और इस तरह के तमाम पूंजीवादी हितों की वकालत की हो…” 1893 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश डेविड जे ब्रूअर ने न्यूयार्क के वकील संगठन को भाषण देते हुए कहा:
 “यह एक अमिट नियम है कि समाज का धन कुछ ही लोंगों के हाथ में होगा… अधिकांश लोग उस दीर्घ आत्म-विरति और संचय को सहने को अनिच्छुक हैं, जिससे धन जुटाना संभव होता है … और इसलिए हमेशा ऐसा होता रहा है, और जब तक मानव स्वभाव को फिर से नहीं ढाला जाता, ऐसा हमेशा सच होगा कि राष्ट्र की संपत्ति कुछ ही लोगों के हाथ में होगी, और अधिकांश लोग दैनिक काम से मिले पैसों पर ही जिएंगे।

यह महज 1880 या 1890 के बाद के वर्षों की सनक ही नहीं थी – इसकी शुरुआत राष्ट्र संस्थापक पिताओं तक की थी, जिन्होंने ब्लैकस्टोन’स कामेंट्रीज़ (ब्लैकस्टोन की टिप्पणियों) के युग में कानून सीखे थे, जिसमें कहा गया था: “निजी संपत्ति के प्रति कानून का इतना सम्मान है कि इसको छीने जाने की लेशमात्र अनुमति भी कानून नहीं देता; कतई नहीं, भले ही इससे संपूर्ण समाज का आम भला होता हो।”

आधुनिक काल में नियंत्रण के लिए ताकत या कानून से भी अधिक कुछ और ज़रूरी होता है। इसके लिए यह ज़रूरी है कि शहरों और फैक्ट्रियों में खतरनाक तादाद में मौजूद विद्रोह की संभावना वाले लोगों को यह समझाना कि जो भी है, ठीक ही है। इसलिए स्कूलों, धार्मिक प्रतिष्ठानों, लोकप्रिय साहित्य में यह पढ़ाया गया है कि धनी होना श्रेष्ठ होने की निशानी है, ग़रीबी व्यक्तिगत असफलता का प्रतीक है। एक ग़रीब व्यक्ति के लिए ऊपर चढ़ने की एक ही राह है। असाधारण कोशिशों और असाधारण सौभाग्य के बल पर धनिक वर्ग में शामिल होना ही वह राह है।

गृहयुद्ध के बाद के उन दिनों में येल विश्वविद्यालय के कानून महाविद्यालय से डिग्री प्राप्त, पादरी और सर्वाधिक बिकने वाली किताबों के लेखक रसल कॉनवेल नामक एक व्यक्ति ने पाँच हजार से भी अधिक बार ‘हीरों के विस्तीर्ण क्षेत्र’ नामक एक ही भाषण देश भर के करीब करोड़ लोगों को सुनाया। उसकी वाणी यह कहती थी कि पर्याप्त कठिन काम करने पर कोई भी धनी हो सकता है – अगर ध्यान से देखा जाए, तो किसी भी जगह ‘हीरों के विस्तीर्ण क्षेत्र’ बिखरे पड़े हैं। उदाहरणत: -
मैं कहता हूं कि तुम्हें धनी होना चाहिए, और धनी होना तुम्हारी जिम्मेदारी है…. धनी होने वाले व्यक्ति समाज में पाए जाने वाले सबसे ईमानदार व्यक्ति हैं। मैं साफ-साफ कह दूं … अमरीका में सौ में से अट्ठानबे धनी व्यक्ति ईमानदार हैं। इसलिए वे धनी हैं। इसलिए उनके पास लोगों ने पैसे दिए हैं । इसलिए वे विशाल उद्योग चलाते हैं और साथ काम करने को लोगों को जुटा सकते हैं। …
… गरीबों के साथ मेरी सहानुभूति है, पर सहानुभूति के लायक गरीबों की संख्या बहुत कम है। ऐसे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखना, जिसे ईश्वर ने उसके कुकर्मों की सजा दी है, … ग़लत है … ध्यान रहे कि अमरीका में कोई ऐसा ग़रीब नहीं है जिसे अपनी कमियों के कारण ग़रीबी नहीं झेलनी पड़ रही है।

कॉनवेल टेंपल विश्वविद्यालय का संस्थापक था। राकेफेलर ने देशभर में महाविद्यालयों को दान दिया था और शिकागो विश्वविद्यालय की स्थापना में मदद की। सेंट्रल पैसिफिक (मध्य प्रशांत-रेलकंपनी) के हंटिंगटन ने दो नीग्रो महाविद्यालयों को पैसे दिए- हैंम्पटन इंस्टीचिउट और टस्केगी इंस्टीचिउट। कार्नेगी ने महाविद्यालयों और पुस्तकालयों को पैसे दिए। जॉन्स हॉपकिन्स (विश्वविद्यालय) की स्थापना एक लखपति व्यवसायी ने की थी। और लखपति कार्नेलियस वैंडरबिल्ट, एज़रा कॉर्नेल, जेम्स ड्यूक और लीलैंड स्टैन्फोर्ड ने अपने नामों से विश्वविद्यालय बनाए।

अपनी विशाल आय का हिस्सा इस तरह बाँटकर धनी लोग दानी कहलाए। इन शिक्षा संस्थाओं ने विरोध को प्रोत्साहित नहीं किया; इन्होंने अमेरिकन व्यवस्था के दलालों को प्रशिक्षित किया- शिक्षक, डाक्टर, वकील, प्रशासक, इंजीनियर, तकनीशियन, राजनीतिविद- ऐसे लोग जिन्होंने व्यवस्था पर आफत आने पर बीच-बचाव का काम करते हुए व्यवस्था को गतिमान रखा।

इसी बीच, सरकारी स्कूली शिक्षा के प्रसार से कार्यकुशल और आंशिक रूप से कुशल मज़दूरों की एक पूरी पीढ़ी ने लिखना, पढ़ना और सवाल करना सीखा। यही नए औद्योगिक युग का पढ़ा-लिखा श्रमिक वर्ग बना। यह ज़रूरी था कि ये लोग अधिकारियों के प्रति आज्ञाकारी हों। 1890 के बाद के वर्षों के बारे में अध्ययन कर रहे एक पत्रकार ने लिखा: “शिक्षक की निर्दयी सत्ता साफ दिखती है, उसकी उँगली तले पूरी तरह दबे छात्र चुपचाप और स्थिर हैं, कक्षा का आध्यात्मिक माहौल गीला और ठंडा है।”

इसके पहले 1859 में मैसाचुसेट्स राज्य के शिक्षा बोर्ड के सचिव ने लोवेल शहर के मिल मालिकों की अपने मजदूरों को शिक्षित करने की आकांक्षा को इस तरह समझाया था:
अपने श्रमिकों की मेधा के बारे में अन्य वर्गों या हितों की अपेक्षा फैक्ट्री के मालिक ज्यादा चिंतित है। अगर ये श्रमिक अच्छे पढ़े-लिखे हों और मालिक न्यायोचित ढंग से उनसे निपटें, तो विवाद और हड़ताल कभी न हों, न ही जनता की सोच को पाखंडी व्यक्ति भ्रम में उलझा सकें और न ही अस्थाई और विभाजक सोच से ही उनका नियंत्रण हो।

जोएल स्प्रिंग ने अपनी पुस्तक एजुकेशन ऐंड द राइज़ आफ द कॉरपोरेट स्टेट (शिक्षा और कॉरपोरेट-निर्भर राज्य-सत्ता) में लिखा है: "उन्नीसवीं सदी के स्कूल की कक्षा में फैक्ट्री जैसा माहौल पनपना अकारण नहीं था।"

यह हाल बीसवीं सदी में भी चलता रहा, जब विलियम बेगली की क्लासरुम मैंनेजमेंट (कक्षा प्रबंधन) शिक्षकों के प्रशिक्षण की मान्य पाठ्य-पुस्तक हो गई और इसके तीस मुद्रण आए। बेगली ने कहा: “शिक्षा के सिद्धांतों का सही अध्ययन करने वाला कक्षा की यांत्रिक रुटीन में उन शैक्षणिक ताकतों को पहचान सकता है, जो बच्चे को एक छोटे से दुष्ट से कानून और शृंखला मानने वाला प्राणी बनाते हैं, जिसमें सभ्य समाज में रहने की योग्यता है।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ लुटेरे उद्योगपति और विद्रोही: दूसरी किस्त ”

  2. By कृति on May 13, 2013 at 2:56 PM

    बहुत अच्छा प्रयास है आपका.
    कृति

  3. By http://kritisansar.noblogs.org/ on May 13, 2013 at 2:57 PM

    बहुत अच्छा प्रयास है आपका.
    कृति

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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