हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

'भीम कहता है कि एक सच्ची जनवादी क्रांति चाहिए'

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/14/2013 12:56:00 AM


बाबासाहेब अंबेडकर को आज बहुत तरह से याद किया जाएगा. अलग-अलग तरह के लोग अलग अलग तरह से याद करेंगे. कुछ लोग उनके प्रतीक का इस्तेमाल करके भारतीय संविधान, संसद और लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मकबूलियत दिलाने की कोशिश में हाथ बंटाएंगे. लेकिन कुछ दूसरी तरह के लोग, क्रांतिकारी जनता, बाबासाहेब को अलग तरह से याद करेंगे. वह अपनी क्रांतिकारी आकांक्षाओं को जमीन पर साकार करने की अपनी लड़ाई में उनको अपने एक नायक के रूप में याद करेगी और आगे की लड़ाइयों के एक जुझारू और जीवंत मार्गदर्शक के रूप में देखेगी. इसमें जोखिम है. ऐसा जोखिम कि आप जेल जा सकते हैं, फर्जी मुठभेड़ में मारे जा सकते हैं. आतंकवादी और उग्रवादी कह दिए जा सकते हैं. सुधीर ढवले और कबीर कला मंच के साथियों के साथ जो हो रहा है, उसे याद कीजिए. लेकिन उनके वर्तमान को कैद करके उनके भविष्य को कैद नहीं किया जा सकता. भविष्य उनके पक्ष में है और जाहिर है यह एक ऐसा भविष्य है जो बाबासाहेब का भी सपना था. एक बात तो साफ है कि भारतीय राज्य ने बाबासाहेब के जिस प्रतीक को गढ़ने की कोशिश की थी, वह उतना कामयाब नहीं रहा. जनता अपने लिए अपने बाबासाहेब का निर्माण कर रही है, उन्हें फिर से जान-समझ-देख रही है. दिन ब दिन नए सिरे से अपना रही है. इसे खारिज किया जाना और इसका मखौल उड़ाया जाना सिर्फ मौजूदा अर्धसामंती, अर्ध-औपनिवेशिक ब्राह्मणवादी राज्य को मजबूत ही करेगा.

इस मौके पर कबीर कला मंच के साथियो द्वारा गाया गया यह मराठी गीत पेश है, जिसका एक ढीला-ढीला अनुवाद भी साथ में दिया जा रहा है, ताकि बात समझ में आए. लेकिन इससे पहले बाबासाहेब अंबेडकर का एक इंटरव्यू, जो उन्होंने 1953 में बीबीसी को दिया था.



समाज को बदलना जरूरी

13 जून 1953 को बीबीसी के साथ इंटरव्यू में बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था-

सामाजिक परिस्थिति बदलना और जातिव्यवस्था को समाप्त करना बहुत जरूरी है. इन दोनों बातों को शांति के रास्ते समाप्त करने में देर लगेगी. उसके लिए किसी न किसी को जी जान से प्रयास करना चाहिए.
सवाल: क्या आज तक किसी ने इस तरह का प्रयास नहीं किया है?
जवाब:
आज तक सामाजिक बदलाव के संदर्भ में और जातिभेद समाप्त करने के बारे में चाहे जितनी बेमतलब की बातें हुई हों, किंतु उस पर किसी ने अमल नहीं किया. इस तरह का परिवर्तन सिर्फ आंदोलन और ठोस कार्य के आधार पर ही संभव है. इसके लिए ठोस कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं की ही सबसे ज्यादा जरूरत है.

सवाल: यदि भारत में जनतंत्र बरकरार नहीं रह सका तो उसका विकल्प क्या है?
जवाब: भारत में एक खास तरह का साम्यवाद उठ खड़ा होगा. चुनाव के बारे में कौन सही सोच रखता है. लोगों को भोजन, कपड़ा चाहिए. उनकी जरूरतें पूरी होनी चाहिए. हमारे लोगों के पास जमीन-जायदाद नहीं है. हर साल बारिश के अभाव में अकाल पड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में हमारे लोगों को क्या करना चाहिए? मुझे ऐसा लगता है कि वर्तमान कांग्रेस सरकार इस सवाल को हल करने योग्य नहीं है. यह स्थिति शायद जल्दी ही खत्म हो जाएगी, क्योंकि मेरी जनता इसके लिए बेताब है.
(साप्ताहिक 'जनता' के 27 जून, 1953 अंक में प्रकाशित) एल. जी. मेश्राम 'विमलकीर्ति' द्वारा संपादित और बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा... के खंड 5 में संकलित (पृ.149)

'भीम कहता है कि एक सच्ची जनवादी क्रांति चाहिए'

 



भीम बाबा के नाम पर
ये कैसा बाजार भरा है
भीम घायल है रे
सुनो रे कहां जा रहा है ये कारवां
बहना रे, सुनो रे राजा
भीम की मां के बेटे को सुनो रे

जय भीम-जय भीम कहते हुए
अपना गला फाड़ लेने वाले
जांच कराएं अपने खून की
और देखें कि कितना भीम है उनके भीतर

जय भीम के समता के रथ को
किसने पीछे धकेल दिया
किसने उसे नष्ट कर दिया?
भीम पुकारता है
कि जय भीम-जय भीम कहकर किसने उस पर हमला किया
किसने किया उस पर घात 
किसने किया ऐसा?
यह तुम्हारी जिम्मेदारी है
कि ऐसे गद्दार, दुश्मन की जीभ तुम खींच लो
और जय भीम बोलने से पहले तुम अपने खून की जांच करो

ये संविधान जातीय जुल्मों को रोकने में नाकाम है
मैं तुम्हें बताता हूं
इस संविधान को जलाकर नया मार्ग दिखलाऊंगा
इस कांग्रेस को तो मेरे भीम ने जलता हुआ मकान समझा है...माना है
और उसे अपने दुश्मनों में गिना है
लेकिन सत्ता की मलाई कौन-कौन खा रहा है?
देखो संसद के सूअरबाड़े में वे कैसे गर्व से घूमते हैं
इस संसद को जलाकर नया रास्ता दिखाओ

समता का यह सूरज लाखों हाथों तक नहीं पहुंचा है
जो हल चलाने वाला है जमीन उसको नहीं मिली है
छूआछूत और जातिवाद खत्म हुआ ही नहीं है
आज भी दलितों की बस्तियां जल रही हैं
मारपीट और बलात्कार हो रहे हैं
ऐसा क्यों हो रहा है रोज?
इस महाजुल्म को आंखों से कैसे देखें?

भीम के स्वप्नों को देखो कैसे तोड़-मरोड़ दिया है
इस समय तुम्हारा रक्त क्यों नहीं जलता
और हिंसा और अहिंसा का विवाद क्यों नहीं मिटता
इस तरह मुर्दे जैसा जीने से पहले इस शरीर को त्याग क्यों नहीं देते
यह शरीर छोड़ दो नहीं तो दुश्मन से लड़ो
उसे मिटाओ
यदि दुश्मन को नहीं मिटा सकते
तो जय भीम-जय भीम नहीं बोलना चाहिए तुम्हें
नहीं बोलना चाहिए, अगर शहीदों के खून का लिहाज नहीं रखते तुम
शहीदों के सपने को
लाल आंखो में जलाओ और नए युग का भीम फिर से बनाओ

देखो ऐसे नए युग का भीम हमसे क्या कह रहा है
वह कहता है कि मजदूर एक हों
भीम एकजुट होने का नारा देता है
भीम जाति खत्म करने की चिन्गारी देता है
भीम स्त्री मुक्ति का नारा देता है
भीम सामंतवाद को खत्म करने का नारा देता है
भीम साम्राज्यवाद के खात्मे को कहता है
भीम नई मुक्ति का संदेश देता है
भीम कहता है कि एक सच्ची जनवादी क्रांति चाहिए
हमें बराबरी का हक चाहिए.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ 'भीम कहता है कि एक सच्ची जनवादी क्रांति चाहिए' ”

  2. By तुषार राज रस्तोगी on April 16, 2013 at 9:22 PM

    वाह !

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें