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बीच सफ़हे की लड़ाई

मैं लिखती हूं: समर खान की कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/08/2013 01:40:00 PM

समर खान की कविताएं.


मैं लिखती हूं

लिखती हूं मैं कविता
अंजाम के बारे में नहीं सोचती
कि इससे कितने बदलेंगे हालात
लेकिन मेरे कलम से
स्याही नहीं
उम्मीद निकलती है
कि जो होगा, बेहतर होगा।

भूख नहीं रोक सकती
मेरे लिखने की गति
न ही किसी बंदूक से डरती हूं मैं
पेट भरने के लिए
मेरे सपने ही काफी हैं
जिन्हें मैं हर रात
लिखती हूं, सोने के पहले।

सुबह रोज आती है
लेकिन रोशनी के बगैर
सफेद पन्नों पर, काले अक्षरों से लिखी गई
मेरी कविता
उसी रोशनी की तलाश है
तुम्हारी गालियों से
जिल्लत, लात और जूतों से
डरना छोड़ दिया है मैंने
मर मर के जीना छोड़ दिया है मैंने
आज मैं नहीं डरती

तुम्हें ललकारने से
अपना हक मांगने से
इस चाहत में
कि जिंदा हूं तो थोड़ा जी भी लूं
लिखती हूं मैं कविता।

कितने दिन

कितने दिन यह लूट खसोट
कितने दिन यह बेईमानी
कितने दिन ऐसे हंगामे
कितने दिन यह खींचातानी

कितने दिन मन को झुठलाना
कितने दिन खाली सपनों पर जीते जाना
कितने दिन आंखों को मूंदे, चुप्पी ताने
कितने दिन यों सारी दुनिया से बेगाने

ऐसे जीवन से कितने दिन तक
बैठोगे उम्मीद लगाए
बने हुए ऐसे असहाय?
अधिकारों के लिए लड़ाई कौन लड़ेगा
अपने जो अधिकार छिने हैं,
सारे सपने, सारी आवाजें, उम्मीदें सारी
उनको हासिल कौन करेगा
कौन हटाएगा वे परदे, आंखों पर जो यों हैं छाए
अनदेखी से हट जाएंगी, क्या बाधाएं?
समझ रहे हो, जान रहे हो,
फिर भी आखिर किसकी खातिर, चुप रहते हो?
सच कहने में
कह देने में क्यों डरते हो?

अपना जीवन, सुख में बीते
दुनिया सारी, दुख की मारी, इसी तरह ही जीती जाए?

सर्द दिलों में थोड़ी चिन्गारी, आग जरा सी
जगो, उठो, बढ़ो और बढ़ कर हाथ मिलाओ
गीले दुपट्टे में भी अंकुर आ जाते हैं
तुम तो फिर भी जिंदा शै हो, जीकर दिखलाओ
आग लगाओ, सर्द दिलों में
हाथ मिलाओ, बढ़ते जाओ.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ मैं लिखती हूं: समर खान की कविताएं ”

  2. By Asar Mohsin on March 10, 2013 at 1:41 AM

    Very, Very and Very good poems. I am becoming jealous of your vigor, energy and courage. Salute.

    Asar

  3. By Anonymous on March 10, 2013 at 1:48 AM

    Great Samar. Lovely and brave poems. From where you draw such imagination and daring voice.

    Mannu, (JNU)

  4. By Santosh Kumar on April 1, 2013 at 12:14 PM

    अपने गुस्से को ऐसे ही सहेज कर कलम से उतारियेगा . शुभकामनाओं के साथ .

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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