हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आनंद तेलतुंबड़े का चंडीगढ़ में पूरा भाषण, आलोचना और जवाब

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/24/2013 02:00:00 AM



आप इस वीडियो को देखिए. पिछले कई दिनों से चंडीगढ़ सम्मेलन के आयोजकों की तरफ से इसी वीडियो को लेकर दावे किए जा रहे थे. मेहरबानी करके इसे पूरा देखें. और अगर आप खोज सकें तो खोजें कि कहां आनंद तेलतुंबड़े ने अपनी बातें वापस ली हैं, कहां उन्होंने उससे कुछ अलग कहा है, जो वे पिछले लगभग दो दशकों से लिखते-कहते आए हैं. कहां उनकी बातों में तालमेल की कमी और असंगति लग रही है. अगर आप बता सकें तो जरूर बताएं. चूंकि वीडियो में सारी बातें आ गई हैं, इसलिए हाशिया को अलग से इस पर टिप्पणी करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है.

लेकिन कुछ दूसरी बातों पर कुछ टिप्पणी किए जाने की जरूरत है. अभिनव सिन्हा ने एक पोस्ट में और फिर टिप्पणियों के एक लंबे सिलसिले में बार बार यह कहा है कि हाशिया ने एक मुहिम चला रखी है और यहां साजिश रची जा रही है. हाशिया पर इस मामले पर यह सिर्फ दूसरी पोस्ट है. क्या सिर्फ एक अकेली पोस्ट को  मुहिम और साजिश मानना जायज है? हां, हाशिया ने दूसरे पक्ष या पक्षों को प्रस्तुत नहीं किया, इसलिए नहीं किया क्योंकि दूसरे पक्ष एक दूसरी वेबसाइट पर पहले से ही आ रहे थे और हाशिया को उन सबको कट-पेस्ट करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. लेकिन हाशिया ने उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया और अपनी अब तक की अकेली पोस्ट में इस बहस की शुरुआती और एक मुख्य पोस्ट का लिंक भी जोड़ा था, ताकि पाठक वहां तक पहुंच सकें और दूसरे पक्ष को जान सकें. वैसे हाशिया हर मामले में इसे जरूरी नहीं समझता कि वह दोनों पक्षों को पेश करे. हाशिया की रुचि इसमें है भी नहीं, खास कर किसी ऐसे मामले में तो और भी नहीं, जब एक पक्ष की सारी और पूरी बातें पहले से ही कहीं और प्रकाशित हो रही हों. इनका एक लिंक दे दिया जाना ही काफी होगा, जैसा कि इस मामले में भी किया गया.

हाशिया का मानना है कि बाबासाहेब अंबेडकर और जाति विरोधी संघर्षों के बाकी नायकों को देखने के नजरिए में फर्क असल में भारतीय समाज और दुनिया की व्यवस्थाओं को देखने और उन्हें बदलने के संघर्ष में फर्क से पैदा होता है. यह फर्क इससे भी आता है कि आप मार्क्सवाद को कैसे लेते हैं, उसे अपने व्यवहार में कैसे उतारते हैं. तेलतुंबड़े इस समाज को जिस तरह से देखते हैं और उसे बदलने की चाहत रखते हैं, दरअसल उनकी वही जमीन उन्हें डॉ. अंबेडकर, फुले और दूसरे नायकों के योगदानों को अहमियत देने और उनके विजन को क्रांतिकारी संघर्षों से जोड़ने की जरूरत बताती है (‘अंबेडकरवाद’ और मार्क्सवाद में समन्वय की बड़बोली बातों और तेलतुंबड़े की इस बात में एक मजबूत और साफ फर्क है, इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए). हाशिया मनमाने तरीके से, जान बूझ कर और जबरदस्ती अपनी स्थापनाएं, विचार और नतीजे दूसरों के सिर पर, यहां तेलतुंबड़े के ऊपर, थोपने की निंदा करता है.

यह अभिनव के बचकाने ‘मार्क्सवादी’ अहंकार की ही एक और मिसाल है कि बार बार उन्होंने हाशिया को यह वीडियो पोस्ट करने की चुनौती दी. हाशिया  पर यह वीडियो पोस्ट किया जा रहा है और ऐसे मौके पर हाशिया की मंशा एकाध सुझाव देने की है. पहला तो यह कि आप ऐसी हिंदी में न बोलें, जिसको समझने के लिए उसका फिर से
हिंदी में अनुवाद करने की जरूरत पड़े. और दूसरी यह, कि चुनौतियां देने से पहले सोच लें कि आप जिस कंटेंट के बूते चुनौती दे रहे हैं, वो पुख्ता हो. यह वीडियो आपके दावों की पुष्टि नहीं करता. तीसरी बात, आनंद ने सही कहा है कि आपके पूरे गिरोह से ब्राह्मणवादी जातीय नफरत की बू आती है. यह बात हाशिया की पिछली पोस्ट में अनिता भारती के कमेंट्स पर आपकी खुद की टिप्पणियों से सही साबित होती है. बेहतर होगा कि आप यह बेवकूफी भरी हरकतें बंद कर दें. आप महान ‘मार्क्सवादी’ होंगे, ‘क्रांतिकारी’ भी होंगे, ‘दार्शनिक’ और ‘कार्यकर्ता’ और ‘विचारक’ भी हो सकते हैं, लेकिन ऐसी घटिया और बेहूदगी भरी टिप्पणियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी.

और अंत में: अगर आप इसे मुहिम मान रहे हैं, तो हाशिया को इससे भी कोई गुरेज नहीं है.

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  1. 11 टिप्पणियां: Responses to “ आनंद तेलतुंबड़े का चंडीगढ़ में पूरा भाषण, आलोचना और जवाब ”

  2. By Anonymous on March 25, 2013 at 7:27 PM

    अभिनव सिन्‍हा का पक्ष
    *********************************
    रेयाजुल हक़ के 'हाशिया' ब्‍लॉग ने हमारे खि़लाफ अपनी कुत्‍साप्रचार और गाली-गलौच की मुहिम जारी रखी है। बहस को आगे बढ़ाने से उनका डर इसी बात से दिखलायी पड़ रहा है कि वे हमारी टिप्‍पणियों को अपने ब्‍लॉग पर ब्‍लॉक कर रहे हैं। उन्‍होंने अपनी नयी पोस्‍ट में हम पर फिर से गालियों की बौछार कर दी है। उन्‍होंने हमारी नीतियों को स्‍वीकार करते हुए आनन्‍द तेलतुंबड़े और हमारे बीच की बहस के वीडियो के लिंक को डाल तो दिया है (क्‍योंकि ऐसा न करने से उनकी भद पिटती) लेकिन उस वीडियो बहस की अंतर्वस्‍तु पर कुछ भी कहने की बजाय हमारे बारे में ऊल-जुलूल बकना शुरू कर दिया है। यह दावा कर दिया है कि तेलतुंबड़े जी के बारे में हमारा दावा गलत है और वीडियो भी यही साबित करता है। लेकिन कहीं भी उन्‍होंने तेलतुंबड़े के किसी वक्‍तव्‍य को या हमारे किसी बयान को उद्धृत नहीं किया है, बस हमारे गलत होने का फैसला सुना दिया है। हमने निम्‍न टिप्‍पणी उसके नीचे ब्‍लॉग पर डालने का प्रयास किया, लेकिन हमारी पोस्‍ट्स को ब्‍लॉक कर दिया गया है, इसलिए हम नीचे वह पूरी पोस्‍ट डाल रहे हैं:

    रेयाजुल हक़ बिना वजह इतना तिलमिला रहे हैं। शैली और भाषा पर वे ही लोग अटकते हैं, जिनके पास जवाब देने के लिए कुछ नहीं होता।
    आपने स्‍पष्‍ट ही कर दिया है कि आप दोनों पक्षों की बात को रखना ज़रूरी नहीं समझते हैं, क्‍योंकि एक दूसरे ब्‍लॉग पर हमारा पक्ष प्रकट हो रहा है। शायद आपने ठीक से उस ब्‍लॉग को पढ़ा नहीं है। उस पर सिर्फ हमारा पक्ष नहीं है, दोनों पक्ष हैं। आपने अपने ब्‍लॉग पर रिपब्लिकन पैंथर्स का जो बयान छापा है, वह 'हस्‍तक्षेप' पर भी मौजूद है, और साथ ही हमारा जवाब भी छापा गया है।
    तीसरी बात, आपने वीडियो अपलोड करके बहुत अच्‍छा किया है। लेकिन आपने वीडियो में आनन्‍द तेलतुंबड़े के वक्‍तव्‍य, उसकी आलोचना और फिर उनके द्वारा रखे गये दूसरे वक्‍तव्‍य के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। वीडियो का जि़क्र किये बिना बस तोहमतें लगा दी हैं। हमें लगता है कि बेहतर होता कि आप वीडियो की अन्‍तर्वस्‍तु के बारे में कुछ बोलते। आगे हम इस पूरी बहस का ट्रांस्क्रिप्‍ट प्रकाशित करेंगे, ताकि जो लोग पूरा वीडियो देखने का धैर्य नहीं रखते हैं, वे वीडियो के साथ-साथ तेलतुंबड़े जी का पूरा भाषण और उसका जवाब और फिर तेलतुंबड़े जी का दूसरा वक्‍तव्‍य खुद देख सकें।
    आपने बस लिख दिया है कि यह वीडियो हमारे दावों की पुष्टि नहीं करता। तो इन प्रश्‍नों का उत्‍तर दें:
    1- आनन्‍द तेलतुंबड़े अपने पहले भाषण में हमें जातिवादी, ब्राह्मणवादी आदि करार देते हुए कहते हैं कि हमें पता होना चाहिए कि अंबेडकर का दर्शन जॉन डेवी के दर्शन से करीबी रखता था और डेवी एक वैज्ञानिक पद्धति देते हैं, जिससे मार्क्‍सवाद का कोई अंतरविरोध नहीं है। वे डेवी की इस पद्धति का बचाव करते हैं और उसे प्रगतिशील बताते हैं। बाद में जब डेवी की पद्धति, उसके वर्ग दृष्टिकोण और राजनीति की आलोचना हमारी तरफ से पेश की जाती है तो तेलतुंबड़े क्‍या कहते हैं? वे कहते हैं कि वे डेवी की विचारधारा को नहीं मानते; इससे पहले वे खुद मान चुके थे कि अंबेडकर का पूरा बौद्धिक जीवन (जैसा कि अंबेडकर ने ही कहा था) डेवी के प्रति ऋणी था। वे कहते हैं कि उन्‍हें गलत समझ लिया गया कि वे डेवी का बचाव कर रहे हैं, जबकि आप पहले वक्‍तव्‍य में स्‍पष्‍ट रूप में डेवी का बचाव करते हुए तेलतुंबड़े का देख सकते हैं।
    2- पहले वक्‍तव्‍य में तेलतुंबड़े बोलते हैं कि हमारा मुख्‍य पेपर जातिवादी है। लेकिन अपनी आलोचना के बाद दूसरे वक्‍तव्‍य में वे बोलते हैं कि इसकी अधिकांश चीज़ों से वे सहमत हैं। और ज्‍यादा लंबी बात न रखते हुए, अधिकांश मुद्दों पर सहमति जतायी। और बाद में जाकर उन्‍होंने एक बयान जारी कर दिया कि वे तो चंडीगढ़ की संगोष्‍ठी के संयोजकों को जबर्दस्‍त डांट लगाकर आये हैं। मुझे लगता कि अहंकार इसे कहते हैं, अपने तर्कों को पूरे ज़ोर के साथ रखने को नहीं, क्‍योंकि उस परिभाषा से तो आप घमण्‍डी कहलायेंगे। To be contd...

  3. By Anonymous on March 25, 2013 at 7:28 PM

    Contd...
    3- आपको यह बताना चाहिए कि हमने कौन-सी बात तेलतुंबड़े जी पर थोप दी है। एक हिन्‍दी दैनिक ने उनके एक कथन को सन्‍दर्भ से काटकर प्रकाशित कर दिया (''अम्‍बेडकर के सारे प्रयोग एक महान विफलता में समाप्‍त हुए'')। हमने न तो यह कथन कहीं खुद भेजा और न ही प्रकाशित किया। इसका आरोप हम पर नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन यह तो सच है कि तेलतुंबड़े जी ने एक दूसरे परिप्रेक्ष्‍य में यह बात बोली थी। लेकिन उन्‍होंने इस विफलता का कारण अम्‍बेडकर के विचारों को नहीं बताया था। उनका मानना था कि अम्‍बेडकर एक वैज्ञानिक मेथड का अनुसरण करते हुए प्रयोग कर रहे थे, और उनका असफल होना एक वैज्ञानिक पद्धति की आत्‍मशुद्धि का अंग माना जाना चाहिए। हमने अपने जवाब में कहा कि अम्‍बेडकर के प्रयोगों की विफलता-सफलता के मूल को उनकी डेवीवादी पद्धति में नहीं बल्कि उनकी वर्ग पक्षधरता, विश्‍व दृष्टिकोण और दर्शन में ढूंढा जाना चाहिए, न कि उनकी पद्धति का वेलोराइज़ेशन किया जाना चाहिए। हमने स्‍पष्‍ट किया कि यही डेवी के दर्शन का मूल है, जो राज्‍य, राजनीति और दर्शन को वर्गेतर मानता है। यहीं से राज्‍य के 'अफर्मेटिव एक्‍शन' का सिद्धांत पैदा होता है। हमने जो जवाब दिया उसमें हमने डेवी/अम्‍बेडकर के पूरे दर्शन और राजनीति की आलोचना रखी, जिस पर बाद में तेलतुंबड़े जी ने खुद कहा कि वे सहमत हैं, और वे डेवी का बचाव नहीं कर रहे हैं, जबकि पहले वक्‍तव्‍य में, आप स्‍वयं वीडियो में देख सकते हैं, कि वे डेवी की पद्धति का बचाव कर रहे थे। बाद में उन्‍होंने अपनी तमाम शुरुआती बातों को बिल्‍कुल बदल दिया है।
    4- रेयाजुल हक को वीडियो से कथनों को उद्धृत करते हुए अपने दावों को पुष्‍ट करना चाहिए। हमने ऊपर स्‍पष्‍ट रूप में रखा है कि दोनों वक्‍तव्‍यों में तेलतुंबड़े की पोजीशन बिल्‍कुल बदल गयी है। अगर हम यह गलत कह रहे हैं, तो आप भी वीडियो से कोट करें। वीडियो पोस्‍ट करने की चुनौती को स्‍वीकारने से आपकी बात सही सिद्ध नहीं हो जाती रेयाजुल हक। आपको वीडियो की अन्‍तर्वस्‍तु के बारे में कुछ कहना चाहिए, कि हमने कहां पर अपनी बात बदली, हमने क्या आलोचना रखी जो कि गलत है, क्‍या तेलतुंबड़े जी ने अपनी बातें बदली हैं ?
    लेकिन रेयाजुल हक कुछ भी ठोस कहने की बजाय, गाली-गलौच पर उतर आये हैं। हम फिर से उनसे आग्रह करेंगे कि इतना तिलमिलायें नहीं। बहस के बुनियादी एथिक का पालन करें। हमारी आपत्ति इस बात पर नहीं है कि वे कठोर भाषा इस्‍तेमाल करते हैं। हम स्‍वयं कठोर और खरी भाषा के पक्षधर हैं। लेकिन लोगों को कुछ नाम पुकार देने से आपका तर्क कहीं पुष्‍ट नहीं होता, रेयाजुल जी। आप हमारी टिप्‍पणियों के बेहूदा, बेवकूफी भरा होने के बारे में काफी कुछ बोल चुके हैं। लेकिन बेवकूफी और बेहूदगी की मिसाल तो आपने इस पोस्‍ट में पेश की है। आपको अपशब्‍द और ऊल-जुलूल बात करने की बजाय पूरी बहस के वास्‍तविक मुद्दों पर अपनी बात रखनी चाहिए।
    आप अगर वीडियो की अन्‍तर्वस्‍तु से तेलतुंबड़े जी के पहले भाषण और दूसरे भाषण की ठोस बातों को उद्धृत करके, हमारी आलोचना को उद्धृत करके अपने तर्कों को पुष्‍ट करें तो बेहतर होगा। हमने ऊपर कुछ ठोस उदाहरण दिये हैं कि तेलतुंबड़े जी ने कहां और कैसे यू-टर्न मारा है। आप भी यह प्रदर्शित कर सकते हैं, डर किस बात का है। सिर्फ दावे न करें, उन्‍हें प्रमाणों से पुष्‍ट करें। और अगर आप ईमानदार हैं तो अपनी टिप्‍पणियों के साथ दोनों पक्षों को छापें, जैसा कि 'हस्‍तक्षेप' ने किया है। केवल एक पक्ष को छापकर आप स्‍वयं ही अपने इरादों को उघाड़कर सामने रख रहे हैं। हमारे बारे में आपने पहले ही निर्णय पास कर रखा है, और अब उसे सीधी या टेढ़ी उंगली से किसी भी तरह से सिद्ध करने पर आमादा हैं। इसे बहस नहीं कहा जा सकता है। इसे ट्रायल कहा जा सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि ट्रायल न चलायें और दोनों पक्षों को प्रकाशित करें, और अपने पक्ष को तो आप रखेंगे ही। आपको कोई नाम देने में हमारी कोई दिलचस्‍पी नहीं है। हम बहस को रचनात्‍मक तरीके से आगे बढ़ाने के पक्षधर हैं। अगर आप भी ऐसा ही चाहते हैं, तो नाम पुकारना बंद करें। ठोस तर्कों और ठोस बातों का ठोस जवाब दें। भाषा और शैली के जटिल होने के आरोप की आड़ में छिपने की कोशिश न करें। वह भी स्‍पष्‍ट कर दें कि आपकी क्‍या समझ में नहीं आया, उसका अनुवाद करने की ज़हमत आपको नहीं उठानी पड़ेगी, हम आपको अनुवाद करके भेज देंगे।

  4. By Anonymous on March 25, 2013 at 7:32 PM

    आनन्‍द तेलतुंबड़े ने कहां-कहां अपनी बातों को बदला
    *********************************

    रेयाजुल हक़ ने कहा कि आनन्‍द तेलतुंबड़े ने बहस में अपनी बात नहीं बदली। तो आइये देखते हैं कि आनन्‍द जी ने अपने पहले और दूसरे वक्‍तव्‍य में क्‍या कहा। बहस के वीडियो में 7:48 मिनट से लेकर 9:34 मिनट के बीच तेलतुंबड़े जी ने कहा कि अम्‍बेडकर की विचारधारा की जड़ जॉन डेवी की विचारधारा थी, जो कि प्रगतिशील व्‍यवहारवाद है। इस विचारधारा को तेलतुंबड़े जी विज्ञान की पद्धति से जोड़ते हुए कहते हैं कि यह वही पद्धति है जिसका पालन वैज्ञानिक प्रयोगशाला में करते हैं और इस रूप में यह विज्ञान से ज्‍यादा दूर नहीं है। यानी कि डेवी का व्‍यवहारवाद एक वैज्ञानिक पद्धति है जो हर विचार को व्‍यवहार की कसौटी पर रखती है और उसके जरिये विचार को समृद्ध करती है। आप देख सकते हैं कि ऊपरी तौर पर डेवी के विचारों को न मानने की बात करते हुए तेलतुंबड़े उसके पक्ष में दलीलें पेश कर रहे हैं। लेकिन जब डेवी की विचारधारा की एक विस्‍तृत आलोचना और अम्‍बेडकर की विचारधारा की भी एक विस्‍तृत आलोचना पेश की गयी तो तेलतुंबड़े जी क्‍या बोलते हैं? वीडियो में 1:50:24 सेकेंड पर वे कहते हैं कि उन्‍होंने डेवी की विचारधारा का समर्थन नहीं किया और उसकी जो आलोचना मेरे द्वारा पेश की गयी है उससे वे सहमत हैं। 1:51:39 पर वह कहते हैं कि अभिनव ने जो कुछ कहा उससे मैं सहमत हूं।

    एक अन्‍य अन्‍तरविरोध देखें। 53:37 पर तेलतुंबड़े जी कहते हैं कि जो आधार पेपर हमारे द्वारा पेश किया गया है उससे जातिवाद की बू आ रही है। 40:50 पर भी उन्‍होंने पेपर पर जातिवादी होने का आरोप लगाया। इसके बाद अपने दूसरे वक्‍तव्‍य में वे 1:51:40 पर वे कहते हैं कि मैं यहां कही गयी बातों से सहमत हूं। अपने पहले वक्‍तव्‍य में 34:00 पर वे कहते हैं कि हमारे मुख्‍य पेपर में मार्क्‍सवाद को एक जड़सूत्र की तरह इस्‍तेमाल किया गया है। 32:15 पर वे कहते हैं कि पेपर ने सिर्फ चीज़ों की व्‍याख्‍या की है, लेकिन जाति समस्‍या का समाधान कैसे करना है इसके बारे में कुछ नहीं बताया है। लेकिन 1:50:58 से 1:53:58 के बीच में वे अपने इन सभी आरोपों से मुकर गये और कहा कि संगोष्‍ठी में जो कुछ कहा गया है उससे वे ज्‍यादातर सहमत हैं, संगोष्‍ठी के लोगों ने भी कहा कि मार्क्‍सवादी एक जड़सूत्र नहीं है, और मैं भी यही कह रहा हूं, और ये तो अच्‍छी बात है कि हम दोनों यही कह रहे हैं। आगे वह कहते हैं कि मैं खुश हूं कि अभिनव की बात से एक बहस शुरू हुई, और अभिनव के भाषण में बहुत सी अच्‍छी बातें थीं, जिससे मैं सहमत हूं। 1:52:40 पर तेलतुंबड़े जी कहते हैं कि उनका मानना है कि वे (यानी के मैं और संगोष्‍ठी के आयोजक) मार्क्‍सवाद को जड़सूत्र नहीं मानते, मतलब वे डॉग्‍मैटिस्‍ट नहीं हैं। जबकि उन्‍होंने अपने पहले वक्‍तव्‍य में यही कहा था, जिसका सन्‍दर्भ हम ऊपर दे चुके हैं।

    तीसरा अन्‍तरविरोध देखें। अपने पहले वक्‍तव्‍य की शुरुआत में 5:22 पर तेलतुंबड़े बोलते हैं कि चूंकि मार्क्‍सवादियों ने मार्क्‍सवाद को एक डॉग्‍मा बना दिया है, इसलिए वह अपने आपको मार्क्‍सवादी नहीं कहते, हालांकि मार्क्‍सवाद को वे एक ऐसी पद्धति के तौर पर देखते हैं जिससे कि समकालीन दुनिया की व्‍याख्‍या की जाय। लेकिन जब हमारे द्वारा आलोचना में यह कहा गया कि मार्क्‍सवादी क्‍या करते हैं और क्‍या नहीं, इसके आधार पर आप अपने आपको मार्क्‍सवादी या गैर-मार्क्‍सवादी नहीं बोलते हैं। आप अपने आपको मार्क्‍सवादी इसलिए बोलते हैं कि आपका मार्क्‍सवादी अप्रोच और मेथड में विश्‍वास होता है। तो अन्‍त में, अपने दूसरे वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने अपनी बात पूरी तरह से बदल दी। 1:52:00 पर वे कहते हैं कि उन्‍होंने यह नहीं कहा कि वे मार्क्‍सवादी नहीं हैं। वह अपने आपको मार्क्‍सवादी ही कहते हैं। अपने पहले वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने हमारे पेपर को जातिवादी, ब्राह्मणवादी, कठमुल्‍लावादी, और न जाने क्‍या-क्‍या करार दिया लेकिन हमारे द्वारा आलोचना के बाद 1:53:24 पर तेलतुंबड़े अपनी पूरी बात बदल देते हैं और कहते हैं कि यहां काफी-कुछ जो कहा गया है, वह सही है। क्‍या यह बात बदलना नहीं है?
    To be contd...

  5. By Anonymous on March 25, 2013 at 7:33 PM

    contd ...

    उल्‍टे रिपब्लिकन पैंथर्स के पांच लोगों ने जो बयान जारी किया है, उसमें आनन्‍द तेलतुंबड़े की बात को तोड़ा-मरोड़ा गया है। तेलतुंबड़े जी ने वीडियो में 8:00 से 11:00 के बीच कहा कि अम्‍बेडकर जाति को समझने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन वे उसमें असफल रहे। उन्‍होंने कभी मार्क्‍स के समान को ‘ग्रैंड थियरी’ नहीं दी। उन्‍होंने यह कहीं नहीं कहा था कि मार्क्‍स की ‘ग्रैंड थियरी’ असफल हो गयी, और इसलिए मार्क्‍स की असफलता अम्‍बेडकर की असफलता से बड़ी है। लेकिन रिपब्लिकन पैंथर्स के पांच लोगों ने अपने सैद्धांतिक गुरू की इज्‍जत बचाने के चक्‍कर में कुछ ज्‍यादा ही दुम हिला दी है। उन्‍होंने अपने बयान में (जो कि हस्‍तक्षेप में प्रकाशित हो चुका है) में कहा है कि तेलतुंबड़े ने कहा कि मार्क्‍स की असफलता अम्‍बेडकर की असफलता से बड़ी है। ऐसा तेलतुंबड़े जी ने कहीं नहीं कहा था। हमने जिस प्रकार वीडियो के अलग-अलग लोकेशन को सन्‍दर्भित करते हुए बात की है, वैसे ही पलाश विश्‍वास, रेयाजुल हक़ और रिपब्लिकन पैंथर्स के लोगों को भी करनी चाहिए।
    वह करीब 2 घंटे का वीडियो है, इसलिए यह काम तो थोड़ा लम्‍बा होगा। लेकिन अगर आप अपने तर्कों को पुष्‍ट करने के लिए ठोस प्रमाण देना चाहते हैं तो आपको थोड़ी तकलीफ तो उठानी ही पड़ेगी।

    हमने ऊपर आनन्‍द तेलतुंबड़े द्वारा बात बदलने के जो उदाहरण दिये हैं, वे तो सिर्फ कुछ ही उदाहरण हैं। अगर आप अन्‍य ऐसे उदाहरणों को देखना चाहते हैं, तो 2 घंटे के पूरे वीडियो को ठीक से देखें, आपको पता चल जायेगा। और विशेष तौर पर आनन्‍द तेलतुंबड़े के पहले और दूसरे वक्‍तव्‍य को देखकर तुलनात्‍मक अध्‍ययन करें, तब तो आनन्‍द तेलतुंबड़े का यू-टर्न एकदम स्‍पष्‍ट तौर पर दिखलायी देता है। पता नहीं पलाश विश्‍वास, रेयाजुल हक़ और रिपब्लिकन पैंथर्स के वे पांच लोग यह दावा कैसे कर रहे हैं कि आनन्‍द तेलतुंबड़े ने अपनी बात नहीं बदली। अब हमने ऊपर वीडियो में समय का सन्‍दर्भ दे दिया है कि उन्‍होंने किस-किस बिन्‍दु पर बात बदली है, आप स्‍वयं देख लें।

  6. By Anonymous on March 25, 2013 at 9:09 PM

    अब यह साफ होता जा रहा है कि मार्क्सवाद का चोला ओढ़े यह पूरा समूह ही आरएसएस के एजेंट के तौर पर वामपंथियों के बीच घुसा है और आरएसएस से निर्देशित हर वह कुकर्म करने को तैयार है जिससे हिंदूवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था मजबूत हो। बहुत समय के बाद इस देश के मुख्य वामपंथी दलों ने सामाजिक हकीकत को स्वीकार करते हुए वंचित जातियों के बीच बहुत मजबूत तरीके से काम करना शुरू किया है और उनका समर्थन जुटाने में ईमानदारी से लगे हैं। क्रांति की राह वहां से निकलेगी।

    अभिनव सिन्हा एक पूरी तरह भ्रमित और अहंकारी व्यक्ति है और इसका अंदाजा एक समूह के नाम पर इसके द्वारा तैयार किया गया आधार पत्र है, जिसे आप गौर से पढ़ेंगे तो इसके कन्फ्यूजन पर पेट पर पकड़ कर हंसेंगे। लेकिन कई बार साजिश भी हल्के-फुल्के तरीके से ही की जाती है।

    वंशवाद के फार्मूले पर जीने वाले इस जातिवादी और ब्राह्मणवादी गिरोह के कुकर्मों से केवल इसका कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि यह तो वामपंथी में एक घुसपैठिया गिरोह है। इसका सबसे बड़ा नुकसान मुख्य वामपंथी समूहों को होना है, दलित-पिछड़ी धारा को होना है। इसलिए इस हिंदूवादी और ब्राह्मणवादी गिरोह की करतूतों से सावधान रहने की जरूरत है। आंबेडकर के बहाने इसने जिस खेल की शुरुआत की है, वह अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि इसके मूल राजनीतिक सरोकार क्या हैं। यह गिरोह दरअसल फिर से ब्राह्मणवादी जमीन की जड़ों की वापसी की कोशिश में है और मार्क्सवाद का झंडा उठा कर मनु-स्मृति के सूत्रों पर आधारित समाज रचने का मकसद रखता है।

  7. By Anonymous on March 25, 2013 at 9:40 PM

    तर्क की बजाय गाली गलौज पर ज्‍़यादा भरोसा करना अपने आप में एक राजनीति है .. कुत्‍सा प्रचार की घृणित निम्‍नस्‍तरीय राजनीति। उपरोक्‍त टिप्‍पणी ऐसी ही राजनीति की एक बानगी है।

  8. By Anonymous on March 25, 2013 at 10:21 PM

    अभिनव द्वारा नुक्‍़तेवार उठाये गये मुदृों का तार्किक जवाब देने की बजाय आरएसएस एजेंट आदि कहना वाकई एक कुत्‍सा प्रचार की राजनीति ही है। ऐसी टिप्‍पणियां करने वाले अपनी राजनीति के निम्‍न स्‍तर का खुलासा स्वयं ही कर देते हैं।

  9. By Anonymous on March 27, 2013 at 10:48 PM

    साथियों अगर कोई बि‍ना मार्क्‍सवाद का अध्‍ययन किये बिना मार्क्‍सवाद के बारे में फतवा जारी करते हुए उसे सूअरों का दर्शन घोषि‍त करता हैं तो समझ जा सकता हैं कि वो व्‍यक्‍ति कि‍तना महान वि‍चारक है दुसरा अगर कोई उन्‍हें भगवान तुल्‍य मानता हे तो माफी मांगते हैं की हमने धार्मिक भावानों को ठेस पहुचाई।


  10. By Devendra Pratap on April 1, 2013 at 1:50 PM

    gali galauj is sangthan ki purani aadat hai. inke kutarkon men fansne ke bajay bahas ko aur vyapak banane ki jarurat hai.

  11. By Anonymous on April 1, 2013 at 3:06 PM

    @ devendra pratap
    gali galauj kis sangthan ki purani aadat hai???

  12. By Anonymous on May 9, 2013 at 1:40 PM

    लीजिये हक साहब आपकी सहमति में कुछ और लोग उतर आए हैं जिनका तर्क से कुछ लेना देना नहीं है। बहस व्यापक बनाने की अपील करने वाला मूलतः वामपंथी राजनीति का भगोड़ा है। इसके कुनबे में तमाम और भी हैं जो धीरे-धीरे आपकी मुहिम में साथ देने वाले हैं। अच्छा है आपको ऐसे लोगों की जरूरत है। लगे रहिए तर्क को ताक पर रखकर।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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