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बीच सफ़हे की लड़ाई

अथ मार्शा-स्टीफन प्रेमकथा: शुभम श्री की कविता

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/19/2013 11:16:00 PM

शुभम श्री की नई कविता. शुभम फिलहाल जेएनयू से हिंदी साहित्य का अध्ययन कर रही हैं. अपने समय और समाज को लेकर सजग, चिंतित और सचेत युवा और संभावनाशील लेखकों/कवियों में एक नाम शुभम का भी है.

अथ मार्शा-स्टीफन प्रेमकथा


वर्षों गुलमोहर तोड़ता रहा स्टीफन
रक्ताभ शिखाओं पर कदमताल करता
प्रार्थना करती रही मार्शा जोड़ा फूल की
डलिया भर गुलमोहर थे
कहां था उसका जोड़ा फूल ?
पर उस बरस जो गुलमोहर फूला
जगा स्टीफन का कवि हृदय
गालों पर खिले गुलमोहर
हथेली में कुम्हलाया जोड़ा फूल
मार्शा ने वसंत का रूप धरा
थरथराने लगी हवाएं
कांपने लगा स्टीफन
...
नाचते नाचते ताल टूट जाती है
बीड़ी में भी राख ही राख
रांची जाएगी बस !
उसे ढोल उठाने भी नहीं ले जाएगा कोई
भार से झुके शरीफों का रस टपकता है
कोए तालू से चिपकते हैं
मिठास नहीं रुचती
कच्चे अमरूद की खोज में भटक रहा है स्टीफन
...
कास का जंगल रांची नहीं जाता
जाती है बस
टका लगता है
इसू को अढ़हुल गछना सफल हुआ
उन्हें सामान ढोने वाला चाहिए !
...
बस की सीट गुद गुद करती है
नशा लगता है, नींद भी
नहीं, मार्शा ही बैठेगी सीट पर
स्टीफन खड़ा रहेगा
रह रहकर महुआ किलकता है
बेहोशी टूटती नहीं
खिड़की के पास मार्शा
उसके बगल में स्टीफन
खड़ा पसिंजर देह पर लदता है न इसलिए
उल्टी करने में भी दिक्कत नहीं होगी
मार्शा का मन घूमेगा तो
वो जेब में इमली का बिया रख लेगा
नहीं नहीं,
ये वाला सपना नहीं
वही उल्टी करेगा खिड़की से
मार्शा की देह से सटकर
तब भी पीठ नहीं सहलाएगी ?
उंह, सपने में भी लाज लगती है
...
सरदार कुड़कुड़ाता है
छूटते ही हंसी-ठट्ठा
नंबरी छिनाल है सब
मार्शा को रह रहकर पेट में करेंट लगता है
झालमुढ़ी खाया नहीं जाता
स्टीफन ठोंगा ले लेता है
इतनी मिर्ची में ही बस !
चः चः
बस निश्चल खड़ी है
स्टीफन का दिल दहलता है
मार्शा की आंख
...
लेडिस भीतर
जेंस छत पर
यह कैसा नियम ?
स्ठीफन जेंस है कि लेडिस
मार्शा दुविधा में है
सरदार ही जाने
...
ढोल कस कर पकड़ने पर भी डर लगता है
जरकिंग से पेट दुखाता है
लगता है ढोल समेट खड्डे में गिर पड़ेगा
छत तप रही है
स्टीफन के पिघलते हुए हृदय में
सीट पर बैठने की इच्छा कसकती है
पहले धीरे धीरे, फिर तेज
...
अनजान रास्तों पर
सिर्फ पेड़ पहचान में आते हैं
आदमी एक भी नहीं
ठसाठस भरी बस में
स्टूल पर मार्शा नहीं
घर नजर आता है स्टीफन को
ताड़ के पंखे की फर-फर हवा
उसके पसीने की गंध जाने कैसी तो लगती है ।
...
बस की फर्श फर बैठा हवा खाता स्टीफन
उसकी नाक पर लाली है, मार्शा के गालों पर
लड़कियों के दल का अट्टहास
मधुर है
छत की मार से
यहां का करुणा मिश्रित उपहास
...
यह तो किसी स्वप्न में नहीं देखा था
कि हतदर्प योद्धा की तरह यात्रा करनी होगी
माथा घूमता है, जी मिचलाता है
यह तो मार्शा को होना था
उसे क्यों हुआ
जेंस बनने में कहां चूक हुई ?
मन होता है मार्शा के हाथ से पंखा फेंक दे
और
फूट फूट कर रोए उसकी गोद में
सरदार ने बहुत कस कर माराSS
...
उसने गुलमोहर का सबसे सुंदर फूल तोड़ा
सबसे सुरीली बांसुरी बजाई
सबसे अच्छा शिकार किया
सबसे तेज नाचा
फिर भी वो चली गई
भाई-बहनों का पेट मोरपंख से नहीं भरता
स्टीफन नहीं जान पाया
मार्शा जानती थी
...
बेर डूबी
कोरे घड़े की तरह डूब गया उसका दिल
छाती में दर्द होता है
आंखों में चुनचुनाहट
जाने हवा-बयार लगी कि मंतर का बान
देह में ताप है कि मन में
पंखा होंकने से मन और घूमता है
जीवन की सारी उपलब्धियां व्यर्थ हैं
उसकी जीत, उसका मान, उसकी कला
एक थरिया भात तक नहीं कमा सका
हर बार हारा है स्टीफन
...
लड़कियां चली गईं
जंगल उदास हुए, घर बंजर
एकाएक टूटा आकर्षण का तिलिस्म
दिनरात लुकाछिपी खेलता वसंत
सूखे पत्तों सा दरक गया
पहले बच्चों की चहचहाहट को पाला लगा
फिर
चेहरों पर
गरमी की अंतहीन दोपहर पसर गई
...
मन नहीं लगता
चांद का निकलना
रात की सूचना है
और सूर्योदय
मैदान जाने की वेला भर
जंगलों को नमी
और
स्टीफन के कवि-हृदय को नौकरी की तलाश है !
...
मार्शा के घर पर खपड़े लगे
लिपे हुए आंगन में
उसकी हथेलियों की छाप धुंधला गई
चिकनी दीवारों से मिट गए सदा-सुहागिन के फूल
अब वहां
सीतको साबुन का विज्ञापन है
...
स्टीफन खपड़े तोड़ देना चाहता है
चांदी की हंसुली भी
जो मार्शा की मां ने पहना है
लेकिन हर बार
कटोरे में माड़-भात खाता टुडू दिख जाता है
हड्डियों पर मांस चढ़ रहा है
स्टीफन पर बुखार
...
एक एक कर लौट रही हैं लड़कियां
माएं जड़ हैं, पिता मौन
पैसे मुर्दा पड़े हैं
सुरमी गिन रही है
सरदार ने अठारह बार
ईंट भट्टे वाले ने तीन महीने
दिल्ली में साल भर
मृत्युशोक में डूबे हैं घर, जंगल, पहाड़
...
हर पर्व में लौटता है स्टीफन
समंदर पार से पंछी लौटते है
रेल, बस, मौसम, फूल, हवा, बरसात
सब लौटते हैं
सिवाय मार्शा के
...
कोई नहीं जानता
सुना है उधर भाड़े पर बच्चा पैदा करने का काम चलता है
बिदेस सप्लाई भी
कौन जाने सादी-ब्याह ही...
कोई नहीं जानता
मार्शा का पता
स्टीफन का भाग्य।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ अथ मार्शा-स्टीफन प्रेमकथा: शुभम श्री की कविता ”

  2. By आशुतोष कुमार on March 19, 2013 at 11:47 PM

    ...हर पर्व में लौटता है स्टीफन
    समंदर पार से पंछी लौटते है
    रेल, बस, मौसम, फूल, हवा, बरसात
    सब लौटते हैं
    सिवाय मार्शा के..

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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