हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अनुपिया: बम संकर टन गनेस

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/15/2013 12:50:00 AM


राकेश कुमार सिंह की किताब बम संकर टन गनेस का एक और अंश.

डोरा से आने में चन्दर सिंह के डेरा के बाद एक टोला है। डेरे पर काम करने वाले मजदूरों का। एक भी गैर दलित परिवार नहीं है वहां। वहीं सझिलावा से लगे अपनी जमीन पर कुछेक बरस ललन बाबा ने दुकानदारी की। जिन दिनों उन्होंने दुकानदारी शुरू की थी उन दिनों उन्हें मुंशीजी की उपाधि मिल चुकी थी। शादी के बाद बच्चा बाबा ने भी कई बरस वहां आंटा चक्की चलाया। उसी टोले में सड़क की दायीं ओर पहला घर धनवीर का है और दूसरा या तीसरा अनुपिया का। अनुपिया गांव की बेटी हैं। रिश्तेदारी होती तो फुआ होती हमारी। लेकिन बहुत साफ वजहों से हमारे गांव में ऐसी रिश्तेदारियां नहीं विकसित हो पायीं। नहीं मालूम कि उनकी शादी कब, किससे और किस गांव में हुई थी। जब से होश संभाला, उन्हें छपरा में ही देख रहा हूं। एक ही जगह पर। पहले घर अपेक्षाकृत छोटा था।

अनुपिया डेरा पर खेती-बाड़ी में रोपनी-सोहनी, कटाई-पिटाई वगैरह करती थीं। बारी-झाड़ी का काम भी संभालती थीं। कई दफा, शाम के वक्त उनको डेरा पर बारी में लगी सब्जियों और अमरूद की रखवाली करते भी देखा है। छोटा कद। सामान्य चेहरा, आंख में हमेशा कांची लगी होती थी। बोलती रेघा-रेघा कर थीं। उन्हें हमेशा चिप्पी लगे मटमैले लुगे में ही देखा। उनकी दोनों तर्जनियों में ठेले पड़े थे। उनके बदन पर झुल्ला (ब्लाउज) कब देखा था, याद नहीं। हमेशा लुगा के अंचरा वाले हिस्से को मोड़कर कांख से होते हुए पीछे कमर में खोंसे। नंगे पांव।

अब भी अनुपिया खैनी खाती हैं। अंचरा के एक कोर में उनकी चुनौटी बंधी होती है। मांगने पर वे औरों को भी एक-दो जुम खैनी दे दिया करती थीं। बन लेने के लिए अनुपिया हर दूसरे या तीसरे दिन, तीसरे पहर गांव जाया करती थीं। आंगन में प्रवेश तो था, पर दोगल्ली या मुहार से बहुत आगे तक नहीं। वहीं बैठ कर अनुपिया ईया से देर तक बतियाती रहती थीं। खेती-बाड़ी की कम, घर-परिवार या टोला-पड़ोस का ज्यादा। जैसे कि लडि़का-फरिका कैसा है, हारी-बीमारी तो नहीं लगी किसी को, किसी की बेटी की शादी तो नहीं आ रही, वगैरह-वगैरह। एक तरह से कहें तो तब अनुपिया ईया के लिए डेरा और उसके आस-पास के खबरों का स्रोत हुआ करती थीं। ईया के लिए ही क्या आंगन में मेरी माई और चाचियों के लिए भी। घंटे-डेढ घंटे बातचीत के बाद अनुपिया का बन जोखा जाता। जिसे साथ लाए किसी टुकड़े में बांध कर वे सिर पर रख लेतीं। कभी-कभी बन लेकर खोराकी खरीदने सीधा शिवशंकर बाबाजी की दुकान या फिर बजार पर चली जातीं। बन में मकई, गेहूं, धान, या हद से हद केरइया या फिर खेसारी दिया जाता था। रहड़ी, मसूरी, सरसो, तोड़ी या मूंग कभी नहीं तौली गयी।

जिस दिन अनुपिया जल्दी आ जाती थीं, उस दिन माई या कोई चाची उनसे तेल मलवाती थीं। असोरा पर अरगन्नी से ओत करके औरतें साया की डोरी ढीली करके लेट जाती थीं चटाई पर। ब्लाउज के हुक तो लेटे-लेटे ही खोल लेती थीं। अनुपिया बगल में रखे मलिए से कडुआ तेल ले कर पहले अपने तरत्थियों पर दो बार रगड़तीं और उसके बाद चटाई पर लेटी औरत के बदन पर अउंसा करती थीं। तब तक अनुपिया लगी रहतीं जब कि पोर-पोर में तेल न समा जाए। कभी-कभी एक की मालिश खतम होते ही आंगन की कोई दूसरी औरत निहोरा करने लगती थीं, ‘हे अनुपिया, तनका हमरो टहरा न दिऊ।’ फिर अनुपिया कहती थीं, ‘आई न हे दुलहिन, देखू न कतेक अबेर हो गेलई। आएब न फेरू बन ला ओई दिन, त टहरा देब।’ इसके बावजूद कभी-कभी उन्हें मालिश करनी ही पड़ती थी। बदले में उन्हें कोई मजदूरी तो नहीं मिलती थी। कभी किसी ने खाना खिला दिया या फिर बीड़ी-खैनी के लिए चवन्नी-अठन्नी दे दी। बस। कभी आंगन की कोई औरत इस्तेमाल से बाहर हो चुकी साड़ी दे देती थी, जिसे बाद में अनुपिया पेओन लगा करा कर पहनती थीं।

अकेले तीन-तीन बच्चों को कैसे संभाला होगा उन्होंने! बड़े बेटे का नाम भोंमला यानी असर्फी राम है। मेहनती पर अक्षर ज्ञान से परे। इस निरक्षता का मूल उनकी जाति और गरीबी थी। अचरज होता है कि इतना ‘मानवीय’ बनने वाले अनुपिया के घिरस लोगों ने उन्हें ये क्यों नहीं बताया कि बच्चों की पढाई-लिखाई महत्त्वपूर्ण है। जबकि अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर वे हमेशा सजग रहे। छोटी सी उम्र में बच्चों को हाॅस्टलों में डालने में भी उन्हें परेशानी नहीं हुई। आगे की पढाई के लिए चाउर, दाल और आलू की मोटरी मुजफ्फरपुर पहुंचाते रहे। गैलन में दूध और हर हफ्ते कपड़े में बांध कर दही भेजना नहीं भूले। उन्हें ये क्यों नहीं समझ आया कि अनुपिया के बच्चों को भी पढना चाहिए। उल्टा अनुपिया या अनुपिया जैसों के छोटे-छोटे बच्चे चाउर-दाल का मोटा माथे पर लाद कर बस तक पहुंचाते थे। यदा-कदा आज भी ऐसी स्थिति देखने को मिल जाती है।

मेरे हिसाब से हमारे परिवार वालों के इस रुख की दो वजहें थीं। वे घनघोर व्यक्तिवादी थे। जातिवादी भी। खुद और परिवार के अलावा किसी और के बारे में सोचने का समय नहीं था उनके पास। और दूसरा, जाने-अनजाने उनके मष्तिस्क में ये बात बैठी थी कि अनुपिया जैसों के बच्चे पढ-लिख गए तो उनका काम-काज कौन करेगा। धर्मग्रन्थ और कुलपुरोहित, हंसौर के अदिकलाल मिश्र और उनके खानदान के बाबाजी लोग तो थे ही जातीय तरतमता की व्याख्या और उसके अनुरूप व्यवहार का ज्ञान देने के लिए।

असर्फी निरक्षर थे। मेरे होश संभालने तक चरवाही का प्रभार उनके छोटे भाई चिकरना यानी कैलाश राम ने संभाल लिया था। ‘प्रोमोट’ हो कर डेरा के अन्य कामों में जुट गए थे असर्फी। हरवाही, दउनी, ओसाई वगैरह जैसे खेती-बाड़ी के कामों मे उनकी अहम भूमिका होने लगी थी। तैयार अनाज, जलावन, वगैरह बैलगाड़ी पर लाद कर घर पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी बन गयी थी। वे बहलवान बन गए थे। कई मर्तबा जब वे डेरा से गांव के लिए गड़ी जोतते थे तो मैं भी उस पर सवार हो जाता था। आगे बैठता था, बिल्कुल जुए के पास। उनसे जिद करता था कि पगहा मुझे भी पकड़ाएं, मैं भी गाड़ी हांकूंगा। असर्फी प्यार से मना करते थे और मुझे इधर-उधर की बातों में उलझाए रखने की कोशिश करते थे। फिर भी मेरे न मानने पर खुली सड़क देख कर एक-आध मिनट के लिए पगहा हाथ में थमा देते थे। फिर मैं ठांव-ठांव करता बैलों की पूंछ के अगल-बगल डंडे से हल्की चोट करने लगता। 

कैलाश अनुपिया के दूसरे बेटे का नाम है। बचपन में चिकरना पुकारते थे लोग उसे। हमउम्र है कैलाश। जैसी कद-काठी बचपन में थी, अब भी वैसी ही है। चिकरना भी खींच-खांच कर नाम लिखना सीख पाया। बस। पढाई करता भी कैसे, स्कूल जाने के समय पर हमारे परिवार वालों ने चरवाही-घसवाही में उलझाए रखा था उसे। नौजवानी ने दस्तक देना शुरू ही किया था कि कैलाश बाहर कमाने जाने वाले एक समूह में शामिल हो कर पंजाब चला गया। आबो-हवा बदली। पता चला कि तरियानी छपरा और डेरे के बाहर भी एक दुनिया है। बड़ी। आजाद। अवसरों से भरी हुई। कैलाश कुछ नकद कमा कर घर लौटा। नकदी के स्वाद और महत्त्व को कैलाश अच्छी तरह समझ चुका था। आठ-आठ आने के लिए उसकी मां को लोगों की चिरौरी करनी होती थी, कैलाश को याद था। कैलाश ने डेरे के काम-काज से खुद को पूरी तरह काट लिया।

बाहर आते-जाते कैलाश ने राज मिस्त्री का काम सीख लिया। अब वो अपने घर का पहला स्किल्ड लेबर बना। काम की दिक्कत नहीं रही। शुरुआत में दिल्ली-पंजाब के कुछ चक्कर लगाए। बाद में सासाराम जाने लगा। अब भी जाता है। सासाराम में काम करते हुए कैलाश ने कुछ पैसे जोड़े। गांव में थोड़ी-बहुत जमीन ली। कम उम्र में ही कैलाश की शादी हो गई थी। पिता भी जल्दी बन गया था। बच्चे अब बड़े हो गए हैं। स्कूल जाते हैं। और खेती-बाड़ी के काम में अपनी मां का हाथ भी बंटा दिया करते हैं। कैलाश का आना-जाना लगा रहता है। वैसे गांव में भी उसके पास पर्याप्त काम रहता है। लेकिन मजदूरी कम मिलती है। कई बार उधार रह जाती है। पिछली बार कैलाश धनुकटोली और अलोरा के बीच पूल जोड़ता मिला था। बताया था कि पूरे काम का उसे ठीका मिला है। मालूम नहीं मजदूरी पूरी मिली कि नहीं।

नथुनी अनुपिया का सबसे छोटा लड़का है। असर्फी और कैलाश की अपेक्षा लंबा और चेहरे-मोहरे से सुंदर। उन दोनों से थोड़ा ज्यादा साक्षर भी। कैलाश के बाद नथुनी ने ही चरवाही संभाली थी। पर ज्यादा दिन चली नहीं। खेती-बाड़ी का काम ढलान पर था। हमारे पापा और चाचाओं में बांट-बखरे हो गए। नथुनी के व्यक्तिगत जीवन के लिए अच्छा हुआ। बंधुआ मजदूरी से मुक्ति की शुरुअता हुई। कुछ समय तक उसने तरियानी चैक पर किसी दुकान पर काम किया और उसके बाद एक साइकिल दुकान पर रिपेयरिंग का काम सीखने लगा। काम सीख कर उसने काफी समय इधर-उधर नौकरी की। एक-आध दफे बाहर भी गया। हमारे एक चाचा की किसी रिश्तेदारी में पूणे भी गया था। कई साल हुए, गांव लौट आया। अब अपने घर पर ही साइकिल मरम्मत करता है। साथ में बटाई-उटाई पर थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी भी।

अनुपिया के तीनों बेटों का परिवार अलग-अलग हो गया है। आंगन भी एक नहीं रहा। असर्फी के बच्चे बड़े हो चुके हैं। बड़ा बेटा तो कमाने के लिए बाहर जाने लगा है। मझला पढने में ठीक-ठाक हैं। हाई स्कूल जाता है। मैट्रिक पास हो गया तो परिवार का पहला व्यक्ति होगा जो जाति-प्रमाणपत्र के लाभ की कोशिश करेगा। असर्फी ने अपनी गाढी कमाई और उधार-पैंचे के सहारे कुछ जमीन खरीद ली थी। अपने हल-बैल का इंतजाम कर लिया था। बटाई पर भी कुछ खेती-बाड़ी कर लेते थे। करीब आठ-दस साल पहले उनका एक बैल मर गया। वे भयानक सदमे का शिकार हो गए। काम-धंधा, बात-चीत, कहीं आना-जानाः सब छोड़ दिया था उन्होंने। भाइयों ने मिल-जुल कर इलाज करवाया। खर्च की चिंता नहीं की। स्थिति थोड़ी बेहतर हुई लेकिन असर्फी अब पहले की तरह नहीं रहे। सुस्त हो गए हैं। सुना है असर्फी की पत्नी बहुत सुशील स्वभाव की हैं। बच्चों के बड़े होने के बाद उन्होंने बाहर-भीतर करना शुरू कर दिया है। असर्फी जब से बेमत हुए हैं तब से घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी वे ही संभाल रही हैं।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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