हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

सांप्रदायिकता और सवर्णवाद का गढ़ हिन्दी विश्वविद्यालय

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/01/2013 03:00:00 AM


जब विभूतिनारायण राय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए तो यह सोचना मुश्किल था कि वह विश्वविद्यालय सांप्रदायिक ताकतों और सवर्णवादियों का गढ़ बनेगा. अब जबकि उनका कार्यकाल शायद ख़त्म होने को है यह एक विकट परिस्थिति को दर्शा रहा है. पिछले दिनो वहाँ के कई छात्रों और शोधार्थी मित्रों से किसी न किसी माध्यम से बातचीत होती रही और अब जबकि कुछ नई और जघन्य घटनाएँ सामने आ रही हैं इस पूरे कार्यकाल का मूल्यांकन करने का मन होता है वह इसलिए भी क्योंकि हम हिन्दी के लिए हिन्दी के जिन संस्थानों से उम्मीद करते थे, एक लोकतान्त्रिक संस्कृति बनाने की वे गुजरात बन रहे हैं और वहाँ मोदी पैदा हो रहे हैं. यह सब जीवन भर सांप्रदायिकता की खिलाफत में खड़े रहने वाले उस सख्श के कुलपतित्व काल में हो रहा है. शायद यह उनके बोले और लिखे जाने का आग्रह था जिसे मैंने पढ़ा और सुना था. उनके जाने के कुछ दिन बाद ही पहली बार छात्रों पर लाठीचार्ज हुए और कुलपति ने पुलिस का रुख अख्तियार कर लिया. राहुल कांबले का मसला पुराना है और पहला भी जिससे कुलपति विभूतिनारायण राय की दलित छात्रों के प्रति मंशा को सार्वजनिक तौर पर समझा जा सका. इसके पूर्व का कार्यकाल कुलपति गोपीनाथन का रहा और उन्हें एक दक्षिणपंथी ताकतों को शह देने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता रहा है. परंतु विभूतिनारायण ने कांग्रेसी और सेकुलर कहते हुए भी अपने को किस रूप में व्यवहारित किया इसे चंद उदाहरणों के तौर पर समझा जा सकता है. इनके कुलपति काल में दलित छात्रों और अध्यापकों पर जितने ज्यादा हमले हुए उतने विश्वविद्यालय के इतिहास में नही हुए. साहित्य के एक अध्यापक सुनील कुमार सुमन, प्रो. एल. कारुण्यकरा आदि को लगातार परेशान किया जाता रहा और यह अब भी जारी है. अंबेडकर जयंती पर ब्राह्मणवाद मुर्दावाद के नारे लगाने के कारण उन्हें अनुसाशन हीनता भंग करने की नोटिस विभूतिनारायण राय के ही कार्यकाल में दी गई. अब ब्राह्मणवादियों द्वारा हास्टल में जाप और पूजा-पाठ भी लाउडस्पीकर लगाकर कराया जाने लगा है जिसमे प्रशासन और वार्डेन सहयोगी व सहभागी की भूमिका निभाते हैं. इन ब्राह्मणवादी छात्रों द्वारा दलित छात्रों को उसमे शामिल न होने के कारण गालियाँ देना और अल्पसंख्यक छात्रों को लगातार परेशान किए जाने की घटनाएँ बताई जा रही हैं. क्या यह सब कुलपति से अनदेखा हो रहा है या इस बारे में उन तक खबर नही है जबकि विश्वविद्यालय में इस तरह का एक ढाँचा बना हुआ है कि हर खबर उन तक पहुँचती रही है. जबकि इस विश्वविद्यालय में कुल अध्यापकों जोकि बहुत कम संख्या में हैं संभव है कि यह 15-20 के आसपास हो इसमें से 5 अध्यापकों पर सेक्सुयल ह्रासमेंट के चार्ज लगे हुए हैं इनमे से कुछ की नियुक्ति भी इन मसलों के संज्ञान में आने के बाद हुई है और विभूतिनारायण ने इन्हें अपने ताकत से नियुक्त किया. विश्वविद्यालय में जबकि 10 से कम संख्या अल्पसंख्यक छात्रों की है जो लगातार ए.बी.वी.पी. के गुंडा छात्रों द्वारा प्रताणित होते रहे पर उनकी तमाम शिकायतों के बावजूद कोई भी कार्यवाही नहीं की गई क्योंकि ये छात्र सवर्ण वर्ग से आते हैं.  

हिन्दी विभाग के एक अध्यापक अरुणेश शुक्ला जो कि विभाग में स्त्री विमर्श पढ़ाते रहे हैं उनके द्वारा एक अल्पसंख्यक छात्रा का सेक्सुअल ह्रासमेंट की जाँच रिपोर्ट भी अभी नहीं आई है और पश्चात एक अन्य दलित छात्र के साथ सांप्रदायिक तत्वों द्वारा उत्पीड़न की घटना सामने आ रही है. जिसमे एक लिखित अपील के जरिए पूरी घटना को समझा जा सकता है।

पता चला कि दिनांक 27 फरवरी 2013, रात लगभग साढ़े दस बजे गोरख पाण्डेय छात्रावास के कक्ष संख्या 62 में बिरसा मुंडा छात्रावास के लगभग 20 छात्र घुसकर दलित छात्र अखिल गौतम के साथ झड़प किया. घटना में शामिल बिरसा मुंडा से आये सभी सवर्ण छात्र थे. जिनका आरोप था कि अखिल ने फेसबुक के माध्यम से उनमें से एक के बारे में अपमान जनक कमेंट किया है. जबकि छात्र अखिल का कहना है कि उन्होंने एक पशु के साथ किसी व्यक्ति के फोटो पर यह कमेंट किया था ‘कि जब आज मनुष्य की स्थिति इतनी दयनीय है तो इस तरह पशु प्यार का सेलिबरेशन कहां तक जायज है.  महज इतनी सी घटना इन फासिस्ट गुंडों को इतनी नागवार गुजरी कि झुंड में अपना पौरूष दिखाने के लिए दलित छात्र अखिल के कमरे में घुसकर उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट पर आमादा हो गये. घटना के शोर शराबे को सुनकर जब कुछ छात्र बीच-बचाव के लिए आये तो उनके साथ भी बद्तमीजी करते हुए धमकी देने लगे.

दरअसल इस घटना की पृष्ठभूमि इसी माह में बिरसा मुंडा छात्रावास में इन्हीं सांप्रदायिक छात्रों द्वारा आयोजित सरस्वती पूजन से शुरू हुई. जिसमें तीन दिनों तक लाउडस्पिकर और बाजे के साथ दिन रात हुड़दंगई की गई जिससे पूरा छात्रावास इनके उपद्रव से परेशान रहा. इस पूजन पर अखिल ने फेसबुक पर सार्वजनिक रूप से धार्मिक पूजन के आयोजन को संवैधानिक धर्मनिरक्षता के खिलाफ बताते हुए टिप्पणी की थी, तभी से ये छात्र अखिल को सबक सिखाने के फिराक में थे. पिछले वर्ष सरस्वती पूजन के सार्वजनिक आयोजन के खिलाफ अंबेडकर स्टूडेंट फोरम ने विश्वविद्यालय प्रशासन से यह आपत्ति दर्ज कराई थी जिस पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गई और कुलपति का रुख दलित छात्रों के प्रति हमेशा से द्वेषपूर्ण ही बना रहा. इसी माह में हुए सार्वजनिक सरस्वती पूजन की रोक के लिए दिये गये शिकायत पत्र पर अभी तक विश्वविद्यालय प्रशासन मौन बना हुआ है. इस घटना से अखिल व अन्य दलित छात्रों ने प्रशासन से उम्मीद भी छोड दी. कैंपस में लगातार छात्र विरोधी घटनाओं के जिम्मेदार तत्वों के चिन्हित होने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन अपने सवर्ण वर्चस्व के साथ उनकी तरफदारी में ही खड़ा नजर आता है. जबकि ऐसा तब है जब विश्वविद्यालय के कुलपति की धर्मनिरपेक्ष छवि का ढिढोरा खूब प्रचारित है.

नोट:- लेखक अपना नाम नहीं देना चाहते क्योंकि उन्हें भय है कि उनके माइग्रेशन और अन्य दस्तावेज विश्वविद्यालय के पास जमा हैं और पिछले दिनों एक दलित छात्र को झूठा माइग्रेशन देकर कुलपति और रजिस्ट्रार ने उस पर मुक़दमा दर्ज कर रखा है.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ सांप्रदायिकता और सवर्णवाद का गढ़ हिन्दी विश्वविद्यालय ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें