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बीच सफ़हे की लड़ाई

‘सरपट’ विकास के दौर में श्रमिक: प्रधान हरिशंकर व्याख्यानमाला-II

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/01/2013 08:51:00 PM

(इस व्याख्यान का पहला हिस्सा यहां पढ़ें)


औद्योगिकीकरण का पैटर्न

श्रम कुशलता पर आधारित विकास पर जोर दो तरह से इस भूमंडलीकृत होती दुनिया के आर्थिक खुलेपन का नतीजा है. पहला महत्वपूर्ण पक्ष व्यापार को खोलना है. विश्व बाजार का कुल आकार और उसके विस्तार की दर किसी भी देश, मसलन भारत के नियंत्रण से बाहर की बात है. व्यापार आधारित आर्थिक नीति का जोर विश्व बाजार पर निर्यात के जरिए एक बड़े हिस्से पर कब्जा करना हो जाता है. इस मामले में भारत जैसे और भी देश एक विशाल कॉरपोरेशन जैसा व्यवहार करते हैं. वे इस कोशिश में रहते हैं कि उत्पादन की लागत में कटौती कर बाजार की तीखी प्रतियोगिता में एक बड़ा हिस्सा हासिल कर लें. इसका एक अर्थ है ऊंचे वेतन पर लगाम लगाना और दूसरा है श्रम उत्पादकता में वृद्घि, मशीन का प्रयोग और श्रम की संख्या में कमी करना. इसका अर्थ है श्रम बाजार की नीति में छूट हासिल हो़ यह विश्व व्यापार की बेहद तीखी प्रतियोगिता को शून्य पर ला पटकने वाला खेल है जहां एक देश अधिक निर्यात के जरिए हासिल करता है तो दूसरा देश अधिक आयात की वजह से क्षरित होता है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में कूदने के बाद उस देश को सीधे पूंजी निवेश का दबाव भी लेना होता है. इसके चलते उसकी विदेशी निर्भरता बढ़ती जाती है (ऐसेज इन द रीकंस्ट्रक्शन ऑफ पोलिटिकल इकोनॉमी, अमित भादुड़ी, पेज 30). इस बाजार, तकनीक और पूंजी के केंद्र में अमरीका और यूरोपीय देश हैं जहां से विश्व बाजार बनता और नियंत्रित होता है. इस नियंत्रण को बनाए रखने के लिए सामानांतर ‘वित्त बाजार’ का विस्तार हुआ. इसके ‘अनुशासन’ के पालन का अर्थ ‘सामाजिक खर्च में कटौती’ और ‘असमानता में तेजी से वृद्धि’ है.

भारत में ‘1975 उदारीकरण की लंबी प्रक्रिया शुरू करने का समय है. यहीं से आगे के क्रम जुड़ते हैं. 1975 की यह शुरुआत पिछले आर्थिक व्यवस्था के निष्पादन से असंतुष्ट होने के चलते हुई.’ ‘इंदिरा गांधी सरकार ने जो पहली ‘महत्वपूर्ण आर्थिक नीति बनाई वह जुलाई 1980 की उद्योगीकरण नीति है जिसने 1956 की उद्योगिक नीति प्रस्ताव को नया रूप दिया. 1974-75 के आर्थिक संकट के दौरान शुरू किए गए उदारीकरण को जारी रखते हुए इस नई नीति में अधिकांश उद्योगों के लिए पांच सालों में अपनी क्षमता में 25 फीसद की वृद्घि की अनुमति दे दी गई (लोकसभा बहस से उद्धृत, 23 जुलाई 1980, 367-82). सरकार ने आगे उद्योगिक कच्चा माल, कल पुर्जे और खासकर तकनीक आयात करने में उदार रवैया अख्तियार किया. ध्यान देने की बात है कि साल भर में विदेशी गठजोड़ अचानक ही दोगुना हो गया (इंडियाज ग्लोबलाइजेशन: इवैल्युएटिंग द इकोनॉमिक कांसिक्वेंसेज, बलदेव राज नैयर, ईस्ट वेस्ट सेंटर वाशिंगटन, पेज 12). यहां याद करना जरूरी है कि 1956 की उद्योगिक नीति प्रस्ताव में विदेशी तकनीक के प्रयोग को मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित रखा गया था. 

उद्योगों की सामाजिक संरचना

इस दौरान विशाल कंपनियों की स्थापना हुई. इन पर तकनीकी इजारेदारी विदेशी निवेशकों के हाथ में ही बनी रही़ प्रबंधन एक प्रमुख पक्ष था जिस पर सरकार और विदेशी निवेशकों की सहमति के अनुरूप नियुक्तियां होती थीं. इस प्रबंधन व्यवस्था में ट्रेड यूनियन और श्रम प्रतिनिधित्व की भागीदारी कराना एक अनिवार्य हिस्सा था. टापुओं की तरह चुने गए इलाकों में बसे इन उद्योगिक संस्थानों का साम्राज्य उस परिसर तक ही सीमित था जहां मजदूरों और कर्मचारियों को सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं. स्थानीय समुदाय से या तो कोई नियुक्ति नहीं ली जाती थी या उनसे ठेका मजदूर के तौर पर काम कराया जाता था. सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ उपक्रमों ने स्थानीय किसानों और ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी उठाने की नीति को अपनाया. लेकिन इसका प्रभाव काफी सीमित रहा़ आदिवासी बहुल इलाकों में इस तरह की जिम्मेदारी को भी दरकिनार कर दिया गया और बड़े पैमाने पर ‘विकास’ के नाम पर उन्हें विस्थापित किया गया. यह परंपरा बाद के समय में और खासकर 1995 के बाद नए तौर तरीकों के साथ जारी रखी गई. ‘विकास का यह मॉडल’ ‘कोलंबस के बाद जमीन की सबसे बड़ी लूट’ में बदल गया. मजदूरों के प्रति न्यूनतम जिम्मेदारियां लेने से भी मना कर दिया गया.

इन हालात में परिसर के भीतर रह रहे मजदूरों और कर्मचारियों को जो सुविधाएं हासिल होती थीं वे स्थानीय लोगों और उनमें से ठेका मजदूर के तौर पर भर्ती किए लोगों को नहीं मिलती थीं. यूनियन की गतिविधियां भी कारखाने की दीवार के भीतर ही सीमित होती थीं. उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र में सार्वजनिक क्षेत्र के बिजलीघर हों या गोरखपुर, इलाहाबाद के उर्वरक कारखाने, स्थानीय लोगों को नौकरी में नहीं रखा गया. यही वजह है कि गोरखपुर उर्वरक कारखाने में उत्पादन ठप पड़ने और कर्मचारियों और मजदूरों की विदाई के साथ ही उस इलाके में मरघट जैसा सन्नाटा छा गया. गोरखपुर शहर या गांव पर इसका प्रभाव चंद चर्चाओं से अधिक नहीं रहा़ 

भिलाई स्टील प्लांट

भिलाई स्टील प्लांट में 1959 में 55,000 मजदूर नियमित वेतनमान पर थे जबकि 12,000 ठेका मजदूर थे. इन ठेका मजदूरों की नौकरी भिलाई स्टील प्लांट के लिए काम कर रहे ठेकेदारों के काम की अवधि तक ही सीमित थी.  ठेकेदारों के काम की समाप्ति के साथ ही इन मजदूरों की नियुक्तियां रद्द हो जाती थीं. ठेकेदार मजदूरों की नियुक्ति स्थानीय और बाहरी लोगों में से अपने निचले ठेकेदारों के माध्यम से करता था. जाहिरा तौर पर मजदूरों की नियुक्ति ये ठेकेदार एक ही समुदाय से करते थे. स्थानीय लोगों को काम पर रखने से बचते थे. कारखाने की चारदीवारी के बाहर मजदूर जातीय और क्षेत्रीय विभाजनों के साथ बसते जाते थे. कारखाने की दीवार के भीतर काम कर रहे मजदूर अन्य मजदूरों को मिलने वाले महगांई भत्ते, वेतन, मेडिकल, पीएफ आदि सुविधाओं से वंचित थे.

भिलाई स्टील प्लांट की सहयोगी और अन्य कारखानों की स्थापना से ‘बड़ा व्यवसाय करने वाली कुछ नई कंपनियां उभरीं. अन्य उद्योगपतियों को यहां काम करने के लिए सुविधाएं दी गईं. इस समय यहां लगभग 200 कारखाने हैं. इनमें से गिनती का कोई ऐसा नहीं हैं जिसका मालिक छत्तीसगढ़ का हो़ इस विकास के अलावा दुर्ग जिले से रायपुर के बीच 40 किलोमीटर की एक पतली सी विकास की पट्टी है जिस पर कारखाने और हाउसिंग कोलोनियां बनी हुई हैं. (‘वर्किंग एंड सिकिंग इन भिलाई’, जोनाथन पेरी, शोध पत्र का समय: 1993-98, वर्ल्ड्स ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीयल लेबर, जोनाथन पेरी, जेन ब्रेमन, किरन कपाड़िया, पेज 111).

सत्तर के दशक के मध्य तक ऐसी ही उद्योग व्यवस्था का विकास हो रहा था जो मूलत: एक बंद व्यवस्था थी. यह उद्योगिक संरचना न केवल मजदूरों की नियुक्तियों को नियंत्रित किए हुए थी बल्कि खेती पर अतिरिक्त आबादी के प्रवास को भी नियंत्रित किए हुए थी. इन उद्योगों के आस पास बस रहे शहरों और छोटे कारखानों की नियुक्तियां योजनाबद्घ तरीके से विभाजित थीं जो आर्थिक संकट के समय सामाजिक, भाषाई और धार्मिक जातीय तनाव में बदल दी जाती थीं. ‘भिलाई के लिए खतरा भिलाई स्टील प्लांट के मेल्टिंग पॉट में मैं उन प्रवृत्तियों में देख रहा हूं जिनका प्रभाव बढ़ रहा है. प्लांट नियमित मजदूरों को हटाकर ठेका मजदूर रखने के दबाव में है. ये ठेका मजदूर ‘जमीन के बेटे’ हैं और जो इन्हें काम पर रखेंगे वह बाहरी लोग हैं. इससे तय है कि स्थानीयता की भावना बढ़ेगी (उपरोक्त; पेज 139). इस कारखाना संरचना में 1990 के दशक में जब दीवार के भीतर काम कर रहे मजदूर और कर्मचारी वीआरएस (स्वत: सेवा मुक्ति) लेकर परिसर को वीरान कर रहे थे तो दीवार के बाहर सांप्रदायिक या जातीय तनाव फैला हुआ था. कुछ ही जगहें थीं जहां मजदूर अपने अधिकार की लड़ाई में डटकर खड़ा था. ऐसे ही संघर्ष का उदाहरण दल्ली राजहरा में शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में चलने वाला मजदूरों का संघर्ष था.

उपरोक्त दोनों स्थितियां 1956 में अपनाई गई उद्योगिक नीति प्रस्ताव के पालन से बनीं. यह भारतीय राज्य व्यवस्था की जान बूझकर अपनाई गई नीति थी जिससे खेती में लगी जरूरत से ज्यादा आबादी इन कारखानों में नियंत्रित तरीके से प्रवासित हो और शहर में संगठित रूप न ले सके. साथ ही मजदूरों और कर्मचारियों के इस ‘उच्च तबके’ से मध्य वर्ग को निर्मित करना था जो काम की स्थितियों, सुविधाओं और मौके से खुद को ‘इलीट’ समझे़ यह ‘उच्च समुदाय’ ही यूनियन में संगठित था. उसने दीवार के भीतर अपनी सुरक्षा की गांरटी को बनाए रखा.

छोटी इकाइयों का विस्तार

1960 से 1970 के दशक में बड़ी कंपनियों के लिए रास्ता खोला गया. 1977 में विदेशी कंपनियों को अपने 40 फीसद शेयर को भारतीय बाजार में बेच कर भारतीय कंपनी का दर्जा देना स्वीकार कर लिया गया. एक करोड़ तक के निवेश वाली कंपनियों को पंजीकरण की अनिवार्यता से भी मुक्त कर दिया गया. छोटी कंपनियों के उत्पादन इकाई का दायरा 180 से बढ़कर 500 से ऊपर हो गया. इस दौरान चंद बड़े शहरों को छोड़कर ‘क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने’ के लिए नई उद्योगिक इकाईयों का पंजीकरण रोक दिया गया. 1980 के दशक में छोटी कंपनी के लिए निवेश सीमा 20 लाख रुपए और सहयोगी कंपनी के लिए 25 लाख रुपए कर दी गई. इस दशक में तकनीक की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाने और लागत कम करने और मुनाफा बढ़ाने पर जोर दिया गया. उद्योगिक ठहराव के इस दौर में लोक क्षेत्र ही नहीं निजी क्षेत्र के बडे़ कारखानों और कंपनियों से मजदूरों की छंटनी हुई. उन्हें इन्हीं कंपनियों के इस्तेमाल की चीजें बनाने वाली सहयोगी इकाईयों की ओर धकेला गया.

खेती में नई तकनीक के प्रयोग और खेती पर निर्भर अतिरिक्त जन दबाव की समस्या को हल करने के लिए भी छोटी पूंजी वाली उत्पादन इकाईयों का विस्तार भारतीय समाज में बढ़ रहे असंतोष और जनांदोलनों को रोकने का एक कारगर उपाय था. ‘बहुत सारे विकासशील देशों में वस्तु निर्माण उद्योग कामगारों को भारी मात्रा में रोजगार उपलब्ध कराता है. लेकिन तीसरी दुनिया के उद्योगीकरण नीति की आलोचना करने वाले ठीक ही तर्क देते हैं कि पूंजी केंद्रित उद्योगिक प्रवृत्ति इस योगदान को भी खा जाती है (इंडस्ट्रियलाईजेशन एंड डेवेलपमेंट इन थर्ड वर्ल्ड, राजेश चंद्रा, पेज 80). खेती आधारित उद्यम और बड़ी कंपनियां द्वारा बड़े पैमाने पर सहयोगी कंपनियों की स्थापना के इस दौर में विदेशी पूंजी निवेश और निर्यात आधारित उत्पादन को बढ़ाने पर जोर तेजी से बढ़ा़ श्रम न केवल असंगठित था बल्कि उसकी बहुसंख्या ‘कुशलता’ की श्रेणी से बाहर भी थी. विश्व बाजार में भारतीय मजदूरों के श्रम का मूल्य अमरीकी श्रम के मूल्य का सातवां हिस्सा था.

सातवीं पंचवर्षीय योजना तक पूंजी की मांग, तकनीकी गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाने और लागत कम करने और निर्यात बढ़ाने के जोर ने विनिर्माण उद्योग को भी नष्ट करना शुरू कर दिया. इन छोटे उद्यमों के विस्तार के साथ साथ मजदूरों की फैली हुई बस्तियां इस नई उद्योगिक नीति का शिकार हो गईं. वहां न्यूनतम आवास, पीने के पानी, बिजली, दवा आदि की भी सुविधा उपलब्ध नहीं थी. इस पूरे दौर में न्यूनतम मजदूरी, प्रोविडेंट फंड, महंगाई भत्ता, जीवन सुरक्षा, यूनियन बनाने का अधिकार नहीं के बराबर बना रहा़ ज्यादातर मजदूर ठेके पर काम कर रहे थे. ‘1977-78 से 1993-94 के बीच अर्थव्यवस्था की विकास दर 5 फीसद थी जबकि जनसंख्या वृद्घि दर 2.2 फीसद थी. संगठित, कॉरपोरेट सेक्टर में रोजगार वृद्घि दर बमुश्किल 0.1 फीसद थी. औपचारिक सरकारी बहसों में राज्य की भूमिका कम बनाने पर जोर के बाद भी लोक क्षेत्र में रोजगार की वृद्घि दर 2.2 फीसद पर बनी हुई थी. असंगठित क्षेत्र में यह 2.6 फीसद की दर पर थी. अर्थव्यवस्था के विकास और रोजगार के बीच का यह भेद दिखाता है कि यह विकास कम मजदूरों को रोजगार दे रहा है.  इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर उद्योग श्रम की सबसे ऊंची उत्पादकता वाले क्षेत्र हैं. उपरोक्त समयावधि (1977-94) में संगठित क्षेत्र ने अनुमानत: आधी श्रम शक्ति को कार्यस्थल से बाहर कर दिया. इस दौरान कम लागत वाले क्षेत्र कर्ज भुगतान और घरेलू बाजार की मांग में ठहराव से बुरी तरह प्रभावित हुए (द वर्क फोर्स एंड इट्स सोशल स्ट्रक्चर: इंडियन वर्किंग क्लास, बारबरा हैरिस व्हाइट, पेज 18).

कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति के बावजूद ठहराव बना रहा. शहरी क्षेत्र में विनिर्माण उद्योग पर विदेशी पूंजी निवेश और निर्यात आधारित उद्योग नीति का तबाह करने वाला दबाव था. इसके चलते भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा असहनीय स्थिति का सामना कर रहा था. संचार और इंजीनियरिंग उद्योग पर जोर वाली नीतियों और वित्तीय क्षेत्र में ‘सुधार’ ने रोजगार की समस्या को विस्फोटक स्थिति में पहुंचा दिया था. यह नीति न तो भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के संकट को हल करने जा रही थी और न ही भारतीय उद्योगीकरण को आगे बढ़ाने जा रही थी. यह नीति विश्व बाजार में सबसे सस्ते श्रम को परोसने की पृष्ठभूमि बना रही थी.

1980 में अपनाई गई उद्योगिक ‘उदारवादी’ नीति को पिछले दशक के विश्व आर्थिक और तेल संकट के अलावा अमरीका और यूरोप के कृषि और निर्माण क्षेत्र के उत्पादों को जगह देने के संदर्भ में भी देखना चाहिए. भारतीय अर्थव्यवस्था एक पैर से उद्योगिक ‘विकास’ के लिए साम्राज्यवादी मॉडल का अनुकरण कर रही थी. दूसरे पैर से वह इससे उपजने वाले राजनीतिक संकट को क्रूरतम तरीकों से हल कर रही थी. विश्व अर्थव्यवस्था में साम्राज्यवादी देशों के लिए ऑटो उद्योग ही नहीं इससे चालित मशीनों के निर्यात का मसला महत्वपूर्ण हो गया. इसे तीसरी दुनिया में आम भाषा में ‘पुरानी पड़ गई तकनीकों का आयात’ भी कहा जाता है. उद्योगिक नीति में इसे ‘इंजीनियरिंग और संचार क्रांति’ करने की जरूरत पर बल देना कहा जाता है. 1980 में विश्व मुद्रा कोष के सहयोग के बदले ‘आवश्यक सुधार’ की जिम्मेदारी पूरी करनी थी. इसे छठी पंचवर्षीय योजना में लागू किया गया. यह राजनीति में ‘हर आम आदमी के लिए एक गाड़ी’ और ‘संचार क्रांति’ की दावेदारी का भी दौर था. मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड इसका एक प्रतिनिधि उदाहरण है.

‘जापानियों के लिए भारत की हाल ही में अपनाई गई उदारीकरण की नीति में सबसे आकर्षक हिस्सा सभी तरह के आयात पर सीमा शुल्क में दी गई छूट थी. जैसे मशीनरी, औजार और यंत्र, कंट्रोल गियर, संचार उपकरण, सहयोगी उपकरण के आयात पर. साथ ही इन सब को बनाने के लिए कच्चे माल (जो कारखाना बनाने के शुरुआती दौर में या किसी स्थापित उद्योगिक इकाई के विस्तार के लिए जरूरी होता है) के निर्यात पर सीमा कर में दी गई छूट थी (प्रॉस्पेक्ट फॉर सेल्फ रिलायंस एंड इंडीजेनाइजेशन इन ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री: केस ऑफ मारुति सुजुकी प्रोजेक्ट, टी हामागुशी, इपीडब्ल्यू, अगस्त 1985). भारत जापान के बीच 1982 से मार्च 1985 के दौरान 38 ऑटोमेटीव इंडस्ट्री गठजोड़ हुए. इसमें तकनीकी, डिजाइन और वित्तीय पक्ष शामिल था. गुड़गांव, नोएडा, ओखला और फरीदाबाद क्षेत्र में इटली, स्विट्जरलैंड, जापान और कोरिया से इसी तरह के गठजोड़ और सहयोगी कंपनियों के खुलने की श्रृंखला तेजी से बढ़ी.

उत्पादन की इस पद्घति में कंपनियां उत्पादन को श्रृंखलाबद्घ इकाइयों के माध्यम से नियोजित कर रही थीं. ‘मुख्यत: ऑटो की दुनिया में हमने सबकांट्रेक्टर की तीन स्तरीय संरचना देखी. ऑटो क्षेत्र में पहले नंबर की कंपनी मारुति सुजुकी के मामले में हमने पहले स्तर पर 38, दूसरे पर 30 और तीसरे पर 12 सबकांट्रेक्टर को पाया. स्तर एक के सभी सबकांट्रेक्टरों के पास अपने वैंडर हैं और स्तर दो के ज्यादातर के पास अपने वैंडर हैं जो व्यक्तिगत तौर पर या घरेलू स्तर पर काम करने वालों को काम देते हैं. यह कहना अधिक उचित होगा कि स्तर एक की इकाइयां बड़ी और मध्यम हैं. स्तर दो की इकाइयां मध्यम और छोटी हैं. स्तर तीन की इकाइयां छोटी या नाम भर की या घरेलू काम की प्रकृति वाली या एकल मजदूर वाली हैं  जिनके पास उत्पादन के कुछ साधन हैं’ (वर्कर वायसेज इन एन ऑटो प्रोडक्शन चेन: 1, एजेसी बोस और सुरेंद्र प्रताप, ईपीडब्ल्यू, 18 अगस्त 2012, पेज 48).

तकनीकी गठजोड़ और पूंजी निवेश की प्रकृति में बाद के समय में तेजी से बदलाव आया. इस दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए विशाल हाइवे के निर्माण का नया दौर शुरू हुआ. ऑटो सेक्टर और तेल की खपत बढ़ाने और इस पर कब्जेदारी को सुनिश्चित करने के लिए साम्राज्यवादी देशों ने तीसरी दुनिया के देशों पर दबाव, धौंस, तख्तापलट और युद्घ तक के तरीके अख्तियार किए. भारत में यह ‘गुलामी’ संसदीय रास्ते से स्वीकार की गई. तेल गैस की मांग और खपत तेजी से बढ़ी़ अक्टूबर 2012 तक तेल आयात का मूल्य 14.78 अरब डॉलर था जबकि गैर तेल आयात का मूल्य 29.42 डॉलर था (स्रोत: बिजनेस लाइन, 12 नवंबर 2012). आयातित तकनीक और तेल से जुड़े उद्योगों के अनुसार जमीन पर कब्जा और नए उद्योग क्षेत्र का निर्माण, नेशनल हाइवे का निर्माण और कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर हार्डवेयर के साथ सैटेलाइट उद्योग का तेजी से विस्तार किया गया. इससे पूरी अर्थव्यवस्था ही नहीं राजनीति का झुकाव भी बदलने लगा़ एसोचैम ने 18 अक्टूबर 2012 को अपने स्टेटमेंट में बताया कि सड़कें ठीक नहीं होने से हर साल 30,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है.  सड़क परिवहन मंत्री ने अगस्त 2010 में राज्य सभा में बताया कि कुल 441 नेशनल हाइवे परियोजनाओं में से 299 पर काम धीमा चल रहा है. अकेले नागपुर से बेतूल के बीच 174 किलोमीटर सड़क निर्माण के लिए कुल 2500 करोड़ रुपए का टेंडर दिया गया. हजारों करोड़ के घोटाले वाली इन परियोजनाओं की इस बाढ़ ने ऑटो इंडस्ट्री और तेल के लिए एक विशाल बाजार बनाया है. ठीक वैसे ही जैसे सैटेलाइट उद्योग ने संचार और आउटसोर्सिंग का बाजार और कालाबाजार बनाया है. 2 जी स्पेक्ट्रम से लेकर मोबाइल और इंटरनेट तक घोटालों का कारोबार इसी संचार क्रांति की देन है.

यहां याद दिलाना जरूरी है कि इस समयावधि के बीच मीसा, टाडा, पोटा जैसे कानून और अधिनियम लाए गए. इनका इस्तेमाल आदिवासी, दलित, मार्क्सवाद की रैडिकल धारा को अपनाने वाले लोग और मजदूर आंदोलन के खिलाफ प्रमुखता से किया गया.  इसी दौर में ‘एनकाउंटर’ कानून की वैध व्यवस्था में तब्दील हो गया. पुलिस और फौज ने इसका बड़े पैमाने पर जन आंदोलन और राष्ट्रीयताओं के संघर्ष करने वाले लोगों के खिलाफ किया.

भारतीय अर्थवयवस्था में 1980 के दशक में एक बड़ा बदलाव था रियल इस्टेट कारोबार का उभरना़ रेजिडेंस, व्यवसायिक, रिटेल, होटल और अन्य सेवाएं और एसईजेड के अलावा उद्योगिक विकास के नए पैटर्न में जमीन की विशाल खरीददारी से जमीन के दाम तेजी से आसमान छूने लगे. इस क्षेत्र का विकास उद्योगों के विकास से तीन से चार गुना ऊंची वृद्घि दर पर चलता रहा़ मुनाफा और कालाबाजार की वृद्घि दर उद्योग से हासिल होने वाले मुनाफों से कई गुना अधिक थी.

कृषि की उत्पादकता इसके बनिस्बत कुछ भी नहीं थी. भारत की विकास दर से किसानों की आत्महत्या की दर दो गुनी से ऊपर बनी रही जबकि दलित और स्त्री उत्पीड़न की दर इतनी तेज हो गई है कि उत्तर प्रदेश में तो मायावती सरकार ने एससीएसटी एक्ट के तहत ऐसे मामलों को दर्ज कराने से ही मना कर दिया. जमीन पर कामगारों का दबाव निरंतर बना रहा जबकि उनकी आय लगातार कम होती गई. शहरी विकास के पैटर्न ने कृषि पर जैसा दबाव बनाया उससे सामंती संस्थानों को और मजबूत होने का मौका मिला़ 1980 के बाद सामंती उत्पीड़न की घटनाओं में वृद्घि के पीछे भारतीय अर्थव्यवस्था की वह जकड़न है जिससे न तो खेती और उस पर होने वाले श्रम का संबंध हल हो पा रहा है और न ही शहर एक माकूल उद्योगिक संरचना विकसित कर उसे खपा पा रहा है. भारत में बेरोजगारी ‘रिजर्व सेना’ के तौर पर नहीं बल्कि जीविका के न्यूनतम साधनों की तलाश में शहर और गांव के बीच प्रवासित भूमिहीन किसान मजदूर के रूप में हैं जो जाति, कर्ज और सामंती संबंधों में जकड़े हैं.

उद्योगों और वित्त क्षेत्र में उदारीकरण की नीति ने जो रूप लिया उसमें ‘कुटीर उद्योग’ की विशाल नाव धीरे धीरे डूबने लगी. खासकर, कपड़ा और जूट उद्योग की तबाही ने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और उसकी राजनीति पर गहरा असर डाला़ विश्व बैंक और मुद्रा कोष द्वारा संरचनागत बदलाव और सब्सिडी को कम या खत्म कर वित्तीय क्षेत्र में अपनाई गई उदारीकरण की नीति ने विदेशी ही नहीं बल्कि देशी निजी बैंकों ने भी शहर से लेकर गांव तक अपना एक जाल सा बुन लिया. उद्योगिक उत्पादन की नियमित, ठेका और उप ठेका जैसी व्यवस्था के माध्यम से कर्ज वितरण और उसकी वसूली का नेटवर्क बनाया. माइक्रो डेबिट के नाम से (कु)ख्यात कर्ज वितरण पर किसानों और खेत मजदूरों से 25 फीसद तक ब्याज वसूला जाता है. खेती में विदेशी पूंजी निवेश और साधन उपलब्धता के नाम पर सूद उगाही से परंपरागत सूदखोरी की व्यवस्था और मजबूत हुई है. कर्ज में फंसे परिवार खेत और शहरी उद्योगों में श्रम विभाजित काम करने के लिए मजबूर है. यह मजदूर वर्ग के काम के हालात को और भी जटिल बना देता है. इन वित्तीय संस्थानों ने शहरों में जमीन के मूल्य की बढ़ोत्तरी को अपने हित में बदल लेने के लिए उसकी खरीद फरोख्त को और अधिक ‘आसान’ बनाया है. आज व्यक्गित कर्ज में गृह कर्ज का हिस्सा आधा हो चुका है. इसके माध्यम से ये संस्थान मध्य वर्ग की बचत का बड़ा हिस्सा हड़पे जा रहे हैं. दूसरी ओर शहर का व्यापक हिस्सा जरूरी जमीन के हिस्से से न केवल वंचित हो रहा है बल्कि अत्यंत घनी बसावट में बसने के लिए मजबूर हो रहा है.

मजदूरों की बसावट

1970 के दशक में दिल्ली में वजीरपुर, मायापुरी और मंगोलपुरी में इंडस्ट्रीयल एरिया को बसाया गया जहां छोटे छोटे कारखाने में लेथ मशीन और घिसाई, पैकिंग आदि का काम शुरू हुआ़ उस समय के दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों में बसे इन कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की मुख्य पात्रता उनकी शारीरिक ताकत हुआ करती थी. कारखानों के किनारे किनारे दूर तक स्लम बस्ती मजदूरों की रिहाइश थी. उजाड़ दिए जाने की जिल्लत और भय से मजदूर आमतौर पर स्लम की इस रिहाइश को ऐसे ही सामग्रियों से बनाते थे जिनका मूल्य कम से कम हो. काम और रिहाइश की इस अस्थिरता ने मजदूरों के प्रवास को समयावधियों में बांधे रखा. 1980 के दशक में ओखला और न्यू ओखला इंडस्ट्रीयल डेवेलपमेंट अथॉरिटी और फरीदाबाद इंडस्ट्रीयल डेवेलपमेंट अथॉरिटी का निर्माण हुआ़ निर्यात केंद्रित और उच्च तकनीक का इस्तेमाल करने वाले ये उद्योगिक संस्थान भारत में उद्योगिक विकास का एक नया मॉडल ला रहे थे.

दिल्ली के रिज और राष्ट्रीय क्षेत्र को हिस्सा बनाते हुए जो उद्योगिक संरचना उभरकर आई उसमें स्थानीय निवासियों के लिए कोई जगह नहीं थी. इन क्षेत्रों में पड़ने वाले गांवों को वैसे ही रहना दिया गया और उनकी जमीन का पर्याप्त मुआवजा देकर आधुनिक रिहाइश और उद्योग संस्थान बसाए गए. यहां के निवासी मुख्यत: ट्रांसपोर्ट, व्यवसाय, ठेका और इसी तरह के काम और अपने बचे रह गए मकानों का पुनर्निर्माण कर मजदूरों से किराया वसूली का काम करने लगे़ यहां मजदूरों की रिहाइश के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई. कारखानों की ऊंची दीवारों वाले अहाते के बाहर मध्य- निम्न मध्य वर्ग के लिए बने हुए मकानों की श्रृंखला थी. ओखला में मध्य निम्न मध्य वर्ग के रिहाइश की जगह इसके बाहरी किनारों पर था. तीनों ही क्षेत्रों में रीयल स्टेट के कारोबार की घुसपैठ हुई. यह बाद के दिनों में सबसे बड़ा व्यापार बन गया.

दिल्ली और आसपास के इलाकों में बसे और बसाए गए उद्योगिक क्षेत्र का चेहरा 1990 के बाद बदलने लगा़ नई मुद्रा नीति, पूंजी निवेश और बैकिंग नीति, उद्योगिक और शहरी ग्रामीण विकास नीति आदि ने शहर के भीतर बसे छोटे मोटे उद्योगों को उठाकर बाहर फेंक दिया. 1990 से 2005 के बीच मास्टर प्लान और अवैध कब्जा को मुक्त कराने के नाम पर 15 से 20 लाख लोगों को उजाड़ दिया गया. जमीन के कब्जा अभियान और शहर सफाई के नाम पर निजी कंपनियों की सरकारी संस्थानों के साथ ‘भागीदारी’ के चलते लाखों परिवार अपनी जीविका खो बैठे़ चार हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर यमुना को सीवर लाइन में बदल देने वाली दिल्ली सरकार ने यमुना पुस्ता पर बसे मजदूरों को उजाड़ कर वहां कई किलोमीटर में फैले पार्क पर हाइवे और मेट्रो और आगे बढ़ने पर विशाल मंदिर का निर्माण जरूर करा दिया.

वजीरपुर इंडस्ट्रीयल एरिया में कारखानों की संख्या घट गई और वहां रेस्तरां, शादी या अन्य उत्सव के लिए मंडप, बहुमंजिली इमारत खड़ी हो गई. इसके एक हिस्से में कम्प्यूटर और इससे जुड़े सामानों का नया बाजार विकसित हो गया है. रियल स्टेट, उच्च तकनीक और सेवा क्षेत्र से जुड़े कामों की प्राथमिकता वाले उद्योगों की नई आमद हुई. इंटिग्रेटेड इंडस्ट्रीयल मॉडल टाउन, एसईजेड और एकीकृत निर्यात क्षेत्र जैसे उद्योगिक मॉडल उभर कर आए.

तकनीकी निर्भरता, निर्यात केंद्रित उत्पादन व्यवस्था ने भारत को साम्राज्यवादी विश्व बाजार के उस मैदान में पहुंचा दिया जहां पहले से ही गलाकाट प्रतियोगिता और एक दूसरे का बाजार हड़प कर जाने की होड़ लगी हुई थी. खासकर ऑटो क्षेत्र को बनाए रखने के लिए तेल पर कब्जा करने के अमरीकी और यूरोपीय अभियान ने पूरे मध्य एशिया को युद्घ के क्षेत्र में बदल दिया. जमीन और रियल स्टेट के कारोबार में दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियां तीसरी दुनिया के देशों की जमीन को ही कब्जे में ले लेने के लिए जी जान लगाए हुए हैं. भारत में 1980 के बाद रियल स्टेट और उद्योगिक विकास का मिलान एक शुरुआती रूप में दिखता है. 1990 के बाद कारखाने अपनी जरूरत से कई गुना जमीन पर कब्जा कर लेती हैं. मेट्रो रेल परियोजना भारत जैसे गरीब देश पर खर्चीला भार बनकर उतरती है. यह जमीन के एक बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा भी जमाती है जिसका इस्तेमाल रेल परिचालन में नहीं होता है. यह शुद्घ रियल स्टेट के कारोबार में आता है.

1970 में ही ठेका मजदूर (नियमन और निवारण) अधिनियम आया. मुंबई, कोलकाता, दिल्ली से लेकर सूरत तक में कपड़ा उद्योगों, खदानों और छोटी कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों को न्यूनतम सुविधा देने का प्रावधान करने वाला यह अधिनियम ठेठ दिल्ली में एक हिस्से के तौर पर भी कभी भी लागू नहीं हो सका़ तुगलकाबाद और इससे सटे इलाके में 2005 तक ठेके पर पत्थर खुदाई का काम करने वाले मजदूरों की हालत बंधुआ की बनी रही़ इस खदान की सबसे बड़ी खरीद खुद सरकार ही करती थी. हर साल सैकड़ों मजदूर सिलकोसिस से मरते रहे. इन खदानों के बंद होने तक यह प्रथा चलती रही़

1990 और 2002-05 में कारखानों को उजाड़ने के दौरान एक बड़ी समस्या मजदूरों और खुद कारखानों को फिर से बसाने की थी. कारखानों की एक बड़ी संख्या पंजीकृत नहीं थी. साथ ही 5 से 50 मजदूरों वाले कारखानों में मजदूर ठेके पर काम करते थे. उनकी कोई यूनियन नहीं थी. इस वजह से मजदूरों के न्यूनतम अधिकार भी उन्हें हासिल नहीं हो सके़ 1990 के बाद के दौर में सरकार ने यूनियन बनाने की शर्त को पारित करा कर और एसईजेड जैसे क्षेत्रों में यूनियन बनाने पर प्रतिबंध लगाकर ठेका मजदूरी पर रहा सहा नियंत्रण भी खत्म कर दिया. बाहर से आने वाली कंपनियों ने मजदूरों की सीधी भर्ती की जिम्मेवारी उठाने का ‘जोखिम’ स्थानीय स्तर पर काम कर रहे ठेकेदारों को सौंप दिया. इन बड़ी कंपनियों के ‘नो लोगो’ वाली सहयोगी कंपनियों की विशाल संख्या ने पंजीकरण और मजदूर ‘भर्ती’ की समस्या को भी हल कर दिया.

न्यूनतम मजदूरी, आठ घंटे की समयावधि, रीफ्रेशमेंट की सुविधा, स्वास्थ्य और भविष्य जीवन सुरक्षा आदि प्रावधान खुद सरकार के लिए भार महसूस होने लगे़ प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ‘मजदूर नियमन में नमनीयता’ की वकालत करने लगे. लेकिन वे ‘श्रम कानूनों पर आम सहमति नहीं बना पाए. मजबूरन उन्होंने मार्च 2007 में दस बिंदुओं वाला एक चार्टर पेश किया (एजेसी बोस, सुरेंद्र प्रताप, उपरोक्त). इस मुद्दे पर उद्योग घराने और राजसत्ता की सोच की मिसाल है किंगफिशर एयरलाइन का मामला. इसके कर्मचारी और मजदूर (6 महीने से) बिना तनख्वाह के जीवन गुजार रहे हैं और भले ही कर्ज में डूब रहे हैं. लेकिन इससे उनके मालिक और शेयर धारकों को कोई फर्क नहीं पड़ता़ 7650 करोड़ रुपए के कर्ज में डूबी इस कंपनी से सरकार की मिलीभगत ने जान बूझकर एयर इंडिया को कर्ज में डुबो दिया है. दूसरी ओर मंत्री और बड़े अधिकारियों ने करोड़ों रुपए बनाए हैं. इस कंपनी को लेकर जो धोखाधड़ी मची हुई है उसके लिए इस तथ्य पर गौर करना सही होगा: ‘किंगफिशर की अपनी ही कंपनी यूबी होल्डिंग लिमिटेड ने उसे 16,853 करोड़ रुपए की लोन गारंटी दी जबकि खुद इस कंपनी के पास कुल जमा संपत्ति 4713 करोड़ रुपए की है (आस्पेक्ट्स ऑफ इंडियाज इकोनॉमी, अंक 52, ‘कॉरपोरेट एफिशिएंसी’ इन इंडियाज इकोनॉमी, पेज 78). लूट के इस खेल में मजदूरों की स्थिति और भी भयावह है. किंगफिशर के एक कर्मचारी के परिवार में बनी आर्थिक तंगी और हताशा में उसकी पत्नी ने 4 अक्टूबर 2012 को आत्महत्या कर ली. मजदूरों को टॉर्चर करने और मार डालने का काम पहले कारखाना मालिक और उनके गुंडे स्थानीय थाने की पुलिस और सत्ताधारी नेताओं के बल पर करते थे. अब यह काम श्रम विभाग, न्यायालय, पुलिस, खाप पंचायत, सरकार और सत्ताधारी नेताओं के सहयोग के आपसी गठजोड़ से हो रहा है.

उद्योगीकरण के इस पैटर्न में 2011-12 में कुल जीडीपी का 55 फीसद हिस्सा विदेश व्यापार का हो गया है. इन्हीं सालों में 389 कंपनियों के ऊपर बैंकों के डूब गए कर्ज बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गए. सरकार का कर्ज 4.1 लाख करोड़ रुपए हो गया. विश्व बाजार के इस खेल में लोगों के बचत खाते में जमा रुपए के मूल्य में लगातार गिरावट आई है. इसके साथ ही पेंशन व्यवस्था और ‘कल्याणकारी व्यवस्था’ को खत्म कर कर्मचारियों और मजदूरों के परिवारों को ऐसे असुरक्षित जीवन की ओर धकेला जा रहा है जहां जीविका चला पाना ही मुश्किल हो रहा है. माइक्रो फाइनांस और कर्ज का जाल इस कदर फैला हुआ है कि उससे किसानों को निकल पाना असंभव होता जा रहा है. इनकी ज्यादतियों की बढ़ती घटना को रोकने के लिए सरकार को अलग से कुछ निर्देश देने पड़े हैं. लाखों की संख्या में एनजीओ गांव के स्तर पर ‘उद्यमिता’ और ‘बचत’ बढ़ाने के लिए उत्पादन की इकाईयां विकसित करने में लगे हुए हैं. दूसरी ओर 80 करोड़ आबादी 20 रुपए रोजाना के खर्च पर जीने के लिए मजबूर हो रही है. नई तकनीक, हाईब्रिड और पेस्टीसाइड का इतेमाल करने वाली खेती पिछले दस सालों में लाखों किसानों को मार चुकी है. छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर, परंपरागत जीविका के साधनों पर निर्भर जाति समूह और आदिवासी समुदाय सरकार और भूस्वामी और कॉरपोरेट घरानों का सबसे तेजी से शिकार हो रहा है. बाजार के दबाव में कृषि लागत में कमी लाने के लिए खेतीहर मजदूरों पर दबाव की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा पनप रही है. शहर में काम की तलाश में आए मजदूरों को नियंत्रित करने के लिए हिंसा के साधनों का इस्तेमाल भी बढ़ा रहा है. ‘निजी क्षेत्र में दलित समुदाय के लिए आरक्षण’ का प्रस्ताव पूंजीपतियों की ‘उत्पादक गुणवत्ता’ पर असर डालने लगता है. ‘समाज की चारित्रिक विशेषता को नियोक्ता भारत में अपनी खूबी के आधार पर एक निश्चित समुदाय (जैसे जाति, लिंग, क्षेत्र और समाज के अन्य विभेद) के मजदूरों का वेतन कम किए रहते हैं. इससे उन्हें निश्चय ही पूंजीवादी संचय में लाभ मिलता है (जयति घोष, फ्रंटलाइन, 5 अक्टूबर 2012, पेज 23). पूरे देश के स्तर पर आदिवासी, दलित और महिलाओं और राष्ट्रीय पहचानों वाले समूहों पर बढ़ती हिंसा से न्यूनतम बचाव का प्रस्ताव ठुकरा देने वाले ये उद्योगपति भाषा, क्षेत्र, धर्म, जाति के ठेकेदारों के माध्यम से भारतीय समाज और राजनीति को नियंत्रित करते हैं. जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल आपराधिक करतूतों में भी करते हैं.

भारतीय मजदूर वर्ग इन्हीं नियंत्रणों के बीच से उभरकर आया. भारतीय शासक वर्ग मजदूर वर्ग को नियंत्रित प्रवासी मजदूर बनाए रखने के सारे हथकंडे अपनाता रहा है. इसमें एक बड़ा हथियार भूमिहीन किसान मजदूरों की रिजर्व सेना है. इसका इस्तेमाल संगठित होते मजदूरों के खिलाफ करने का सिलसिला जारी है. नेशनल सैम्पल सर्वे 2004-05 के अनुसार कुल रोजगार का 92 फीसद हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में था. इसका 61 फीसद हिस्सा खेती में था. कुल 7.70 करोड़ मजदूर कृषि क्षेत्र से बाहर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे थे. सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम आबादी का 60 फीसद से ऊपर हिस्सा स्वरोजगार में है. ‘दलित समुदाय की सूदखोरों पर निर्भरता 1992 से 2002 के बीच 36.6 फीसद से बढ़कर 55.2 फीसद हो गई जबकि बैंक से कर्ज 1993 से 2004 के बीच प्रति व्यक्ति 495 रुपए से घटकर 225 रुपए हो गया. इस बीच सूद की दर 27.8 फीसद से बढ़कर 45.5 फीसद हो गई (आस्पेक्ट्स ऑफ इंडियाज इकोनॉमी, अंक 46, इंडियाज रनवे ‘ग्रोथ’: भाग 3, पेज 22).

संघर्ष की चुनौतियां

‘राजनीतिक बातों का सबसे अच्छा स्रोत मजदूर वर्ग है. यही वह पहला और अग्रवर्ती _ है जिसे सभी तरह के जीवंत राजनीतिक ज्ञान की जरूरत है. यही है जो इसे अपने सक्रिय संघर्ष में ढाल सकता है. ऐसा वह ‘सुस्पष्ट नतीजा’ मिलने की उम्मीद न होने के समय भी करता है.’ (क्या करें, लेनिन, संकलन: ऑन ट्रेड यूनियंस, पेज 119).

‘यूनियन सामाजिक जनवाद में संक्रमण के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है. उद्योगिक मजदूर शक्ति को यह आर्थिक परिक्षेत्र से राजनीतिक परिक्षेत्र में बदलना संभव बनाता है. इसी से यह संभव होता है कि पूरा समाज नागरिक और राजनीतिक आजादी को हासिल कर सके़ ऐतिहासिक तौर पर यूनियन के माध्यम से मजदूरों ने उद्योगिक बाजार व्यवस्था में घुस सकने का व्यापक आधार बनाया और लोकतांत्रिक संस्थानों के माध्यम से नागरिक राजनीतिक अधिकारों को हासिल कर सके’ (डिग्निटी एट वर्क: एवी जोस्से, ईपीडब्ल्यू, 2 अक्टूबर 2004, पेज 4447).

भारत में मजदूर यूनियन और सर्वहारा वर्ग की पार्टी का निर्माण एक ऐसी उपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर हुआ जिसमें जनवाद की ओर संक्रमण का रास्ता सीधा नहीं था. इसके लिए मजदूर यूनियनों के सामने उपनिवेशिक राजव्यवस्था, सामंती आर्थिक सामाजिक संरचना और पूंजी की लूट के खिलाफ लड़ते हुए जनवाद के रास्ते को साफ करना था. कम्युनिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन के निर्माण के समय तक कांग्रेस पार्टी और उस पर गांधी का नेतृत्व काफी आगे बढ़ चुका था. मजदूर और पूंजी के बीच के अंतर्विरोध का हल गांधी ‘पितृसत्तात्मक सामंती व्यवस्था’ के भीतर ही देखते थे जहां पूंजी का मालिक ‘पिता’ समान है और जिसे ‘अपने बेटों’ का खयाल रखना चाहिए. खुद भारतीय पूंजीपति वर्ग सूदखोरी, विदेशी माल की बिक्री और उपनिवेशिक पूंजी पर निर्भर छोटी सहयोगी कंपनियों का निर्माण करते हुए आया. औपनिवेशिक और भारतीय पूंजी मजदूरों का इस्तेमाल जाति पर आधारित ‘संघों’ के माध्यम से कर रहे थे. इसके लिए उन्हीं जाति समूहों से एजेंट चुने जाते थे. यह जॉबर व्यवस्था थी जिसमें गांव से शहर की ओर संक्रमण और शहर में बसावट का पैटर्न भारतीय समाज व्यवस्था में जातिगत और क्षेत्रीय विभाजन के अनुरूप बना रहा. गांव से शहर की ओर इस संक्रमण में न तो गांव की जाति आधारित श्रम की सामंती व्यवस्था टूटी और न ही इस संक्रमण से श्रम की गरिमा और चेतना ही बनी. जॉबर व्यवस्था में एकमुश्त पैसा एजेंटों को दे दिया जाता था. इसके तहत वह आमतौर पर एक ही जाति समुदाय और कभी कभी एक ही परिवार के लोगों को लेकर कारखाने में ठेके पर काम करने आ जाता था. यह ठेका एक निश्चित समय के लिए होता था. उसके बाद ये मजदूर अपने गांव लौट जाते थे या किसी और नौकरी की तलाश में लग जाते थे. ट्रेड यूनियनों के निर्माण में इन एजेंटों की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ये अपने से जुड़े पूरे समुदाय के साथ या तो किसी ट्रेड यूनियन में शामिल हो जाते थे या कारखाना मालिकों से सौदेबाजी के लिए खुद को ही ट्रेड यूनियन में ढाल लेते थे.

मजदूरों की यूनियन और संगठन बनाने और उसमें काम करते हुए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की संस्थापना में योग देने वाले अमृतपाद डांगे के विचार में शूद्र आदिकाल से ही सर्वहारा था. उनके इस इतिहास चिंतन को उनके राजनीतिक व्यवहार में जॉबर व्यवस्था से बन रहे मजदूर यूनियन के नेतृत्व को सीधे अपनाते हुए देखा जा सकता है. अंबेडकर ने समाज में श्रम विभाजन और श्रमिकों के विभाजन को रेखांकित कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चल रहे ट्रेड यूनियन आंदोलन को काफी हद तक विभाजित किया. मुंबई में मजदूरों का विभाजन सिर्फ जाति के आधार पर ही नहीं धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भी था. मुस्लिम समुदाय का मजदूर पहले से ही वहां बसा हुआ था जबकि (आमतौर) पर दलित समुदाय का अधिकांश हिस्सा तेजी से बस रहा था. मुबंई में यह विभाजन 1910 से 1920 के बीच वेतन वृद्घि के लिए मजदूरों के आंदोलन के दौरान तेजी से बढ़ा़ इस आंदोलन पर मुख्य असर कांग्रेस का बना रहा़ इसी बीच मुंबई, मद्रास, अहमदाबाद, कलकत्ता में मजदूर यूनियनों का निर्माण शुरू हो गया था.

मजदूरों ने 1930 के मंदी के दौर में मुंबई, कानपुर, सूरत में बड़ी हड़तालें कीं. मजदूरों की वर्गीय चेतना को तोड़ने के लिए न केवल गांवों से मजदूरों की नई आमद लाई गई बल्कि हड़ताल कर रहे मजदूरों को जाति और क्षेत्र आदि के आधार पर विभाजित कर हड़ताल को तोड़ने का काम किया गया. इस काम में कांग्रेस ने सक्रिय भूमिका निभाई. इस दौरान कम्युनिस्ट नेतृत्व को जेल में डाल दिया गया था. मजदूरों की ‘रिजर्व सेना’ में मूलत: गांवों से बुलाए गए भूमिहीन दलित मजदूर किसान थे. उन्हें फिलवक्त जीविका की जरूरत थी. पूंजी और इस मजदूर के बीच मध्यर्वितयों की श्रृंखला इन्हें ‘सर्वहारा’ बनने में एक ऐसी बाधा थी जिसका निवारण आज भी जनवादी ताकतों के लिए मुश्किल बना हुआ है.

इन मध्यवर्ती ताकतों के लिए जो हालात उस समय थे वे आज भी कायम हैं. ‘जॉबर व्यवस्था श्रम बाजार की अनिश्चितता से जूझते मजदूरों के लिए काम करती है. अच्छे मजदूरों को आकर्षित करने, मजदूरों की खपत को बनाए रखने और नौकरी की खोज में आने वालों का तांता बनाए रखने के लिए जॉबर कुछ नए मजदूरों को तरजीह देते हैं और उन मजदूरों पर रोक लगाते हैं जो काम की उपयुक्त निरंतरता को तोड़ देते हैं. इस तरह वे अनौपचारिक मजदूरों की एक रिजर्व सेना का निर्माण करते हैं. जॉबर इस तरह किसी भी मजदूर को बिना नियमित काम की गारंटी दिए उनको काम की उपलब्धता को बनाए रखता है और उन्हें श्रम करने के और विकल्प में जाने से रोक लेता है (राजनारायण चंदावरकर, द स्ट्रक्चर एंड डेवेलपमेंट ऑफ लेबर मार्केट: ओरिजिंस ऑफ इंडस्ट्रीयल कैपिटलिज्म इन इंडिया,  पेज 108). 1930 के दशक की महामंदी के दौर में शहर में बढ़ती गहरी निराशा और बेरोजगारी के आलम को नियंत्रण में रखने के मकसद से अंग्रेजों ने नागरिक अधिकार के नाम पर भारतीय राजनीति को उलझाने का काम किया.

इन हालात में रेडिकल राष्ट्रीय आंदोलन में किसान और मजदूरों की मुख्य भूमिका को चिह्नित किया जाने लगा और ‘हिंसा’ को एक बदलाव के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल की बात खुलेआम की गई.  शहीद भगत सिंह इस धारा के प्रतीक बन गए. यह समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के ‘विभाजन’ का दौर था. इसके साथ ट्रेड यूनियन में ‘वैचारिक विभाजन’ के आधार पर बिखराव हुआ़ इस मंदी के समय लाखों मजदूर वेतन वृद्घि और काम के समय को लेकर सड़क पर उतरे़ महीनों तक मजदूरों का आंदोलन चलता रहा़ 1928 से 1929 के बीच ट्रेड यूनियन पर कम्युनिस्ट पार्टी का बढ़ता प्रभाव अंग्रेज और भारतीय पूंजीपति के लिए एक चुनौती बन गया. मार्च 1929 में कम्युनिस्ट पार्टी के 33 नेताओं को राज्य के खिलाफ षड्यंत्र और बोल्शेविज्म का प्रचार करने के जुर्म में सालों तक मुकदमा चलाकर गंभीर सजा दी गई. विभाजित ट्रेड यूनियन के मालिक समर्थक नेता और जॉबर्स के माध्यम से नए मजदूरों की भर्ती ली गई और बड़ी संख्या में मजदूर वापस गांव की ओर चले गए. बाद के समय में इन्हीं विभाजनों और मजदूरों की वापसी का विस्तार जैसा दिखता है.

उपनिवेशिक काल में शहर की बसावट की केंद्रीय धुरी अंग्रेज और प्रशासन की व्यवस्था थी. इसके बाहर व्यापारी, कर्मचारी, मध्य-निम्नमध्यवर्ग और इनके रोजमर्रा के काम को निपटाने वाले छोटी मोटी नौकरी वाले लोग थे. सबसे बाहरी किनारों पर मजदूर वर्ग था जो कारखानों में काम कर ‘स्लम बस्तियां’ बसा रहा था. यह सिर्फ कार्य विभाजन ही नहीं जातियों का श्रम और रिहाइश विभाजन भी था.  मजदूर आंदोलन 1940 तक उपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना, जनवाद के मूल्य और वर्गीय एकता की जरूरत को समझने लगा था. 1940 से 1945 के बीच मजदूरों ने गौरवशाली संघर्ष को अंजाम दिया. इसके बाद के दिनों में ‘राष्ट्रीय चेतना’ को ‘भारत के राष्ट्रीय विकास’ के हवाले कर दिया गया. इस पूरी समयावधि में किसानों के संघर्ष में संक्रमण की स्थिति के बावजूद मजदूर वर्ग भागीदारी नहीं कर सका़ इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उपनिवेशिक व्यवस्था और भारतीय पूंजी द्वारा मजदूरों का ‘नियंत्रित संक्रमण’ था. इसके माध्यम से जाति, जमीन और जनवाद के सवाल कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘राष्ट्रीय चेतना’ के नीचे दब कर रह गए.

उपनिवेशिक राज्य व्यवस्था से हासिल अनुभवों को भारतीय पूंजीपतियों ने अपनी खूबी के साथ जारी रखा. उन्होंने शहर और गांव के बीच के पलायन के संतुलन को भी बनाए रखा. 1945 से 1955 के बीच राज्य का पुनर्गठन चल रहा था और उद्योगिक विकास की उस नींव को रखा जा रहा था जिसकी पूंजी के रथ का पहिया सीधे आसमान से टपक रहा था. ‘विकास की विशाल परियोजनाएं’ और ‘स्थापित हो रहे विशाल उद्योगों’ में काम करने वाले लोगों में उजड़ गए लोगों की कोई भागीदारी नहीं थी. इस औद्योगिक और विकास व्यवस्था से एक ओर विशाल मध्य वर्ग बना तो दूसरी ओर एकीकृत सर्वहारा वर्ग बना़ इस व्यवस्था में ‘मजदूर प्रबंधन’ के तहत मजदूर वर्ग सार्वजनिक क्षेत्र के विशाल अहाते में बनी हुई समस्या को हल करने से आगे नहीं जा सका़  रेलवे के मजदूर ही थे जिन्होंने अपने दायरे को लांघा. छोटे और बड़े कपड़ा और जूट मिलों में कमोबेश उपनिवेशिक समय की ही ‘मजदूर व्यवस्था’ बनी रही़ श्रम विभाजन में जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा का विभाजन इन शहरों में मजदूरों की बसावट में सबसे अधिक स्पष्टता से दिखता था. कृषि आाधारित उद्योगों में यह विभाजन और भी साफ दिखता है. मजदूरों के संक्रमण के पीछे एक बड़ा कारण साधनों से हीन होना नहीं बल्कि साल भर जीविका चलाने के साधन की कमी होना था. उपनिवेशिक लूट और 1947 के बाद के ‘विकास’ से उजड़ रहे मजदूर वर्ग के लिए न तो साल भर के लिए ग्रामीण क्षेत्र में जीविका का साधन था और न ही शहर में रोजगार हासिल कर सकने का वादा़ मजदूर गांव में परिवार को छोड़कर शहर आते और ‘मौसम’ और पैसे कमा कर वापस गांव चले जाते. वे इस चक्र से निकल नहीं सके.

भारतीय अर्थव्यवस्था जब भी आर्थिक संकट के चपेट में आई गांव और शहर दोनों ही जगहों पर तनाव की स्थिति बनी. गांव में यह संकट भूखमरी साथ लाता था तो शहर में बेरोजगारी. शहरी बसावट के पैटर्न में यह नई आमद एक नया रूप लेने के पहले ही दंगों और निष्कासनों का शिकार होने के लिए आज तक अभिशप्त है. यह नई आमद मजदूरों की ऐसी ‘रिजर्व सेना’ होती है जिसका इस्तेमाल पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग के आंदोलन को तोड़ने और शोषण का जोर बढ़ाने के उपकरण के तौर पर करता है. मजदूर संगठनों के निर्माण में यह एक ऐसी चुनौती है जिसका इस्तेमाल पूंजीपति और शासक वर्ग अपना हित साधने के लिए करता ही जा रहा है.

सत्तर के दशक में कृषि में विदेशी तकनीक का इस्तेमाल बेहद नियंत्रित तरीके से शुरू किया गया.  इसे उद्योगिक संकट और भारतीय गांवों की सामंती संरचना पर बढ़ते भार और भारतीय राजनीति और समाज को बदल देने वाले विस्फोटक हालात को रोकने के लिए लाया गया. ‘हरित क्रांति’ गरीब भूमिहीन और छोटे किसानों और खेत मजदूरों को एक व्यवस्थित प्रवासन की ओर धकेलने का एक तरीका था. पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विदेशी तकनीक के इस्तेमाल ने कृषि में जातीय संगठनों को मजबूत करने, क्षेत्र और भाषा के आधार पर संगठित होने की रफ्तार को बढ़ा दिया. उद्योग विश्व आर्थिक संकट में जिस तेजी से फंसा उससे लोक क्षेत्र और भारतीय पूंजीपतियों के विशाल उद्योगों का निकल पाना मुश्किल होने लगा.

रेलवे इन दो तरह की उत्पादन व्यवस्था का सम्मिलन केंद्र था जहां सबसे अधिक दबाव पड़ रहा था. अखिल भारतीय स्तर पर आवास और परिचालन की सुविधा प्रदान करने वाले इस विभाग में सबसे अधिक संगठित मजदूर आंदोलन उभर कर आया. इसने भारतीय राजनीति को तात्कालिक तौर पर प्रभावित किया. कृषि क्षेत्र में बढ़ते तनाव और उद्योग के संकट ने पूरी अर्थव्यवस्था को अपनी गिरफ्त में ले लिया. आपातकाल और इसके साथ ही उद्योगों में ‘नई तकनीक’ के इस्तेमाल को दी गई खुली छूट से न तो मजदूरों का प्रवास रुका और न ही भूमिहीन किसानों और मजदूरों को ‘नियंत्रित’ करने वाले किसान संगठनों के पुनर्गठन पर रोक लग सकी. शहर में प्रवास और जाति के आधार पर विभाजन को भी कम नहीं किया जा सका. इस दौर में शहर का फैलाव ‘स्लमों में मजदूरों की बसावट’ और छोटे और मध्यम कारखानों में कागजी काम करने वाले निम्न मध्य वर्ग के बसने से हो रहा था.

मजदूरों को अनियमित किए जाने की प्रक्रिया 1980 के बाद बढ़ती गई. बेरोजगारी बढ़ती गई. महंगाई बढ़ती गई. लेकिन गुजारे पर खर्च में गिरावट आती गई. सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में श्रमिक समुदाय का गतिविधि क्षेत्र सिकुड़ता गया. गांव की उजड़ती अर्थव्यवस्था और शहर में काम के मौके में कमी आती गई. सामाजिक सुरक्षा में गिरावट और वर्चस्वशाली वर्ग द्वारा बेरोकटोक बल प्रयोग जैसी स्थितियों में मजदूर यूनियन का बनना एक चुनौती बन गया. उत्पादन की अत्यंत छोटी इकाईयां तेजी से बढ़ीं. इनमें खुद परिवार के सदस्य या 5 से 10 मजदूर काम करते थे. बड़े कारखाने अपना काम एक श्रृंखला बनाकर ठेके के आधार पर करा रहे थे. पुराने कारखाने तेजी से बंद हो रहे थे. दिल्ली में ऐसे कारखानों के बंद होने से पूरे मुहल्ले की बसावट और व्यवसाय ही बदल गई. ‘कुटीर उद्योगों’ का यह विस्तार मजदूर यूनियन बनाने की एक ऐसी चुनौती थी जिसे भारतीय मजदूर आंदोलन साध नहीं सका.

‘निर्यात आधारित उद्योगों’ के बीच प्रतियोगिता और भारतीय बाजार पर कब्जेदारी वाले उद्योगों का जन्म नई परिघटनाएं लेकर आया. दत्ता सामंत के नेतृत्व में मजदूरों का नए तरह का संगठन उभरकर आया. इसकी कोई कमिटी ही नहीं थी. दत्ता सामंत समर्थक यूनियनें ही कमिटी बनाकर उनके निर्देशों का पालन कर रही थीं. दत्ता सामंत के निर्देश पर हड़ताल कर रहे लाखों मजदूरों को उनके गांव भेज दिया गया. बाल ठाकरे के नेतृत्व में भाषा, क्षेत्र और धर्म के आधार पर मजदूरों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया गया. सूरत से लेकर कानपुर में कपड़ा उद्योगों में धर्म के आधार पर राज्य की देखरेख में दंगों और आगजानी के आधार पर मजदूर के आंदोलन को न केवल तोड़ा गया बल्कि 1970 से उभरकर आई उत्पादन की व्यवस्था को उजड़ जाने दिया गया. मुंबई के कपड़ा उद्योग में 1982 में हुई ऐतिहासिक हड़ताल के दौरान लाखों प्रवासी मजदूर अफवाह, भय और आतंक में सालों तक जीते रहे. इस दौरान मुंबई का चेहरा बदलता गया. ऐटक, मुंबई के वरिष्ठ नेता गंगाधर चिटनिस ने लिखा:

गांवों से देरी से आए कामगारों को नौकरी से निकाल दिया गया था. ये संख्या भी हजारों में थी. अधिकृत संख्या के अनुसार भी एक लाख छह हजार श्रमिकों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था. काम बढ़ गया था. अधिकारियों के व्यवहार में बदलाव आ चुका था. हड़ताल के पहले दब कर व्यवहार करने वाले अधिकारियों की आवाज में जोर आ गया था. श्रमिकों के लिए आत्मसम्मान खत्म हो गया था. हालात ऐसे हो गए थे कि यूनियनों के पास जाने से मजदूर कतराने लगे थे. मान्यताप्राप्त गिरणी कामगार संघ (इंटक) वालों की जोर जबर्दस्ती फिर से शुरू हो गई. उनका विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं बची थी (मंजिल अब भी दूर, पेज 134). 

मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार के कोयला खदानों और लोक क्षेत्र में मजदूरों की बड़ी हड़तालों और रेडिकल संघर्षों का उभार 1980 के दशक में भी दिखता है. इस दशक में विश्व बैंक ने भारत की आर्थिक नीति में सीधा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था. 1982 में सिंगरैणी कोयला मजदूरों की यूनियन के खिलाफ प्रबंधन ने सिंगरैणी कोल फिल्ड वर्कर्स यूनियन बनाकर मजदूरों की एकता को तोड़ने का प्रयास किया. लगभग डेढ़ लाख मजदूरों के संघर्ष में दूसरे क्षेत्र के मजदूर और बुद्घिजीवी और छात्रों की भागीदारी से यह संघर्ष एक ऐतिहासिक घटना में बदल गया. इस आंदोलन के मद्देनजर विश्व बैंक ने 4 अगस्त 1997 को ड्राफ्ट पॉलिसी में लिखा:
निश्चित नतीजा हासिल करने के लिए विशाल सार्वजनिक इकाईयां आंध्र प्रदेश राज्य परिवहन निगम और सिंगरैणी कोयला खदान का निजीकरण कर देना चाहिए...सिंगरैणी का मसला थोड़ा राजनीतिक है. इसलिए सिंगरैणी और एपीएसआरटीसी में सुधार, निजीकरण और काम कर रहे लागों की छंटनी दूसरे दौर तक के लिए टाल दी जानी चाहिए. इस प्रयास को लागू करने के पहले वहां का जायजा लेना चाहिए.

इस काम के लिए और लोगों में निजीकरण का माहौल बनाने के लिए विश्वबैंक ने वहां विशेष सलाहकार नियुक्त किया. साम्राज्यवादी संस्थानों का यह सीधा हस्तक्षेप भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को निजीकरण की ओर ले गया. इस दौर में मजदूरों ने जुझारू संघर्षों को अंजाम दिया. दल्ली राजहरा में शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में चला संघर्ष छात्रों और बुद्घिजीवियों को मजदूर आंदोलन की ओर आकर्षित करने में कामयाब रहा.
विश्व बैंक की देखरेख में 1980 से ही औपचारिक उत्पादन की इकाईयों में मजदूरों की संरचना में बदलाव आना शुरू हुआ़  नियमित, ठेका और अप्रेंटिस के श्रम विभाजन के रूपों का प्रयोग संगठित क्षेत्र में सामने आने लगा. यह 1990 तक भारत की जातीय संरचना के अनुरूप उभरकर आया. यह विभाजन लंबे समय तक मजदूर एकता के लिए बड़ी बाधा बना रहा़ यह जातीय विभाजन वाले पूर्र्वग्रह और व्यवहार में अभिव्यक्त होता रहा. 2005 के बाद कुछ कुछ आंदोलनों में यह विभाजन एकता की ओर बढ़ा. विभिन्न श्रेणियों और तबकों के मजदूरों ने एक दूसरे के हक के लिए खड़ा होना शुरू किया. ग्रेजियानो इसका शुरुआती उदाहरण है जहां नियमित मजदूरों ने लंबे समय से काम कर रहे अप्रेंटिस और अस्थाई मजदूरों को नियमित करने की मांग को रखा.

कार्यक्षेत्र के कठिन हालात एक ओर यूनियन बनाने की जरूरत को आसन्न बनाते हैं तो दूसरी ओर इसकी औपचारिकता को पूरी करने के लिए जरूरी शर्तों के नाम पर वर्चस्ववाली वर्ग तरह तरह की बाधा खड़ी कर इस पर रोक भी लगाता है. 1990 के बाद का दौर विदेशी तकनीक के इस्तेमाल और पूंजी के आगमन के साथ साथ किसानों की आत्महत्या और मजदूरों के उजाड़ का समय है. 1970-80 में पैदा हुआ शहरी निम्न मध्य-मध्य वर्ग और गांवों के नवधनाढ्य जातीय समूह ने बेरोजगारी, बाजार के संकट और खेती पर बढ़ते दबाव को हल करने के लिए उन्हीं रास्तों को अख्तियार किया जिन्हें इस देश की राजनीतिक पार्टियों ने विश्व बैंक, मुद्राकोष, साम्राज्यवादी देश और भारतीय पूंजीपति वर्ग के हितों और सलाहों को मानते हुए पेश किया. राज्य के नेतृत्व में जातीय और धार्मिक दंगे व्यवसाय को नष्ट करने, बस्तियों को जलाने और काम से निकाल बाहर करने के रूप में सामने आए. ‘राष्ट्रवाद’ का इस्तेमाल मजदूर और किसान आदिवासी आंदोलन के खिलाफ होने लगा. उन पर ‘देशद्रोह’ के आरोप लगाए जाने लगे. उन पर खुला हमला करने की नीति अपनाई जाने लगी.

‘विकास’ की नई नीति जमीन के विशाल हिस्से पर कब्जा, रियल स्टेट का कारोबार, उत्पादन को विकेंद्रित और ठेके पर निर्भर करने और सामंती ताकतों के साथ गठजोड़ कर मजदूरों को नियंत्रण में रखने के माध्यम से सामने आई. टाटा से लेकर वेदांता तक और मारुति सुजुकी से लेकर कोयला माफिया रेड्डी बंधु और यनम के अंतर्राष्ट्रीय रिजेंसी सिरेमिक कंपनी तक इस तरह के प्रयोग में लगी हुई हैं. यह इन पूंजीपतियों का व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि राज्य की अपनाई गई वह पुरानी नीति है जिसके माध्यम से मजदूर वर्ग को नियंत्रित किया जा रहा है. यनम में रिजेंसी सिरेमिक कंपनी में मजदूर आंदोलन को लेकर तेलुगु देशम, कांग्रेस और यनम के स्थानीय व्यवसायी समुदाय और तमिलभाषी लोगों के नेतृत्व ने एक दूसरे पर जाति, क्षेत्र, भाषा का इस्तेमाल कर नुकसान पहुंचाने और इस घटना को अंजाम देने के लिए दोषी ठहराया.

मारुति मजदूरों का संघर्ष

मारुति सुजुकी में चल रहे मजदूर संघर्ष में भारतीय मजदूर वर्ग के सामने उपस्थित चुनौतियां संघनित रूप में सामने आई हैं. गुड़गांव से धारूहेड़ा के बीच लगभग 30 किलोमीटर के दायरे में 55 गांव हैं जिनकी अपनी खाप व्यवस्था है. पंचायतों और जिला परिषद चुनावों पर नियंत्रण के लिए खूनी जातिगत राजनीति की खबर यहां के उद्योगिक गतिविधियों की खबरों के साथ छपती रहती है. गुड़गांव से धारूहेड़ा के बीच यदुवंशी अहीर समुदाय का वर्चस्व है. इन्हीं का यहां की जमीन पर मुख्य कब्जा रहा है. सरकार ने उद्योगिक विकास के लिए जिस दर से जमीन खरीदी उसमें 20 फीसद अतिरिक्त जोड़कर रिहाइश के लिए जमीन की बिक्री की. यह उसकी ‘उद्योगीकरण’ के पक्ष की नीति थी. पूरे गुड़गांव और इस इंडस्ट्रीयल टाउन में मजदूर और कर्मचारियों को जमीन नहीं मिल सकी. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के रियल स्टेट कारोबारियों ने जमीन खरीद कर ‘उद्योग क्षेत्र’ का चेहरा बदल दिया है. इस खरीद में गांव के टापू बचे रहे.

इस उद्योगीकरण में भी गांव के लोगों को नौकरी नहीं देने का अलिखित फैसला लिया गया. भारतीय गांव संरचना में सभी के पास जमीन नहीं होती़ अधिकांश के पास छोटी जमीन होती है. आमतौर पर दलित समुदाय इन गांवों से रोजगार के लिए बाहर जाने को विवश हो गया. छोटी जमीन के मालिकों ने इन कारखानों के आस पास रेहड़ी पट्टी लगाकर चाय और भोजन की दुकान खोल ली या टैम्पो से सवारी ढोने लगे. हरियाणा सरकार ने मजदूरों की विशाल संख्या को ऐसी ही परिवहन व्यवस्था के हवाले कर रखा है जिससे कि इन गांववासियों की जीविका चल सके. गांव के लोगों ने अपने ही घरों की मरम्मत करा कर छोटे छोटे कमरों का निर्माण कर मजदूरों को रहने लिए दे दिया है. इन गांवों की जमीन पर भी स्थानीय रियल स्टेट के कारोबारी अपनी नजर टिकाए हुए हैं.

इन गांवों के ‘विकास’ की जिम्मेदारी इन कारखानों ने बांट रखी है. मारुति सुजुकी ने बांसगाव, अलियर और बसियार गांव की जिम्मेदारी ले रखी है. अलियर गांव में एक दड़बेनुमा प्रसूती गृह है. यही एकमात्र अस्पताल है. इसी हाल में एक प्राइमरी स्कूल है. इस विशाल क्षेत्र में अस्पताल की भी सुविधा नहीं है. दूसरी ओर वहां निर्यात के विश्व बाजार का जमघट लगा है और ऊंची तकनीक वाले कारखाने चल रहे हैं. दिल्ली-जयपुर हाइवे पर जाम एक आम बात है. उस पर से होते हुए गुड़गांव जाना और आना एक कठिन काम है. इस गांव और कारखाने में काम रहे मजदूरों के लिए आपातकालीन सुविधा हासिल करने के लिए इन्हीं कठिन हालात से गुजर कर जाना है.

मारुति सुजुकी बीमारी की हालत, देर से आने और काम में ढिलाई के बदले 1200 से लेकर 5600 रुपए तक की कटौती करती है. वह कई मामलों में नौकरी से निकाल भी देती है. इस इलाके में गर्मी और सर्दी का तापमान 42 से 44 डिग्री सेल्सियस से लेकर 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक जाता है. उच्च तकनीक पर हर 42 सेकेंड में एक कार तैयार करते मजदूर को लगभग नौ घंटे की ड्यूटी करनी होती है. इस दौरान 7 मिनट का दो रिफ्रेशमेंट और 30 मिनट का लंच ब्रेक मिलता है. मजदूर सिर्फ श्रम विभाजन में ही नहीं श्रमिकों की विभिन्न श्रेणियों में विभाजित हैं. नियमित, ठेका, अप्रेंटिस, ट्रेनी जो शॉपफ्लोर पर काम करते हैं. अन्य काम में लगे मजदूर की गिनती इनमें नहीं है. इन मजदूरों की नियुक्ति और वेतन वितरण के लिए जिम्मेदारी भी अलग अलग है.

गुड़गांव में ठेकेदारों की एक विशाल संख्या और श्रृंखला है. ये विभिन्न तरह की क्षमता वाले मजदूरों को उपलब्ध कराती हैं और उन पर नियंत्रण भी रखते हैं. मारुति सुजुकी मजदूर आंदोलन पर ऐसे ही नियंत्रण करने के दौरान ठेकेदारों ने मजदूरों पर हमला किया जिसका जबाव मजदूरों ने दिया. ओरिएंट क्राफ्ट में भी ठेकेदारों द्वारा मजदूरों पर किए जा रहे नियंत्रण के चलते मजदूरों का गुस्सा फूट पड़ा. मारुति सुजुकी में 18 जुलाई की घटना के बाद मजदूरों के खिलाफ बयान देने, पंचायतें करने और मजदूरों के खिलाफ ‘मनमाफिक’ कार्रवाई की मांग करने में ये तीन गांव अग्रिम भूमिका में थे.

इस विशाल उद्योग क्षेत्र में मजदूरों के लिए कैंटीन या कम्युनिटी सेंटर तो दूर की बात टॉयलेट जाने के लिए भी कोई जगह नहीं है. लेकिन उनके लिए शराब के ठेके जरूर उपलब्ध हैं. चौड़ी सड़कों के किनारे कोई पेड़ नहीं है और कारखाना गेट से वह सौ मीटर का दायरा भी गायब हो गया है जहां से कोर्ट के ‘आदेश’ का पालन करते हुए धरना प्रदर्शन किया जा सके़ दिल्ली और आसपास के ऐसे इलाकों में स्थानीय समुदाय को नौकरी नहीं देने का अलिखित प्रावधान बनाते समय गांव के ‘प्रधानों’ ने निश्चय ही हामी भरी होगी. यह गरीब किसानों के भविष्य पर लात मारने जैसा है. लेकिन इन्हीं गांवों से सेक्योरिटी गार्ड, ड्राइवर और बाउंसरों की खपत ली गई है.

गांवों के बीच की अब तक चलती चली आ रही इस एकता के पीछे जाति और खाप संस्कृति की निर्णायक भूमिका है. ये ‘बाहरियों’ को नियंत्रित करने का एक और तरीका था जिसमें हरियाणा की पहलवानी की ‘संस्कृति’ का इस्तेमाल कर लिया गया. गांव और खाप, ठेकेदार, पुलिस प्रशासन, राजनीतिक र्पािटयां, राज्य सरकार और कारखाना मालिकों से बनी संरचना वाली इस उद्योगिक व्यवस्था में मजदूरों पर दबाव सिर्फ इन्हीं का नहीं है. अठारह जुलाई के बाद मजदूरों को जानबूझकर गांव जाने दिया गया और उनकी धरपकड़ के लिए उनके परिवारों को भी दबिश में लाया गया. खाप पंचायतें पहले ही मजदूरों के खिलाफ बयान और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर चुकी थीं. पुलिस प्रशासन के खिलाफ परिवार के लोगों ने कुरुक्षेत्र और गुड़गांव में प्रदर्शन कर इस तरह की कार्रवाई का विरोध किया. यहां प्रशासन और राज्य सरकार ने खाप का इस्तेमाल करने का जो हिंसक तरीका अख्तियार किया वह हरियाणा में लगातार चल रहा है. एक दलित बच्ची का बलात्कार करने के लिए पुलिस में मुकदमा दर्ज करने का खामियाजा न केवल उस शिकार परिवार को बल्कि उस दलित जाति समूह की अन्य बच्चियों को भी भुगतना पड़ा. मिर्चपुर, गोहाना और ऐसी ही घटनाओं में खाप और पुलिस प्रशासन, राजनीतिक पार्टियों और राज्य सरकार की घिनौनी भूमिका को देखा जा सकता है.

मानेसर के मजदूरों के सिलसिले में इन्हें वैसी सफलता हासिल नहीं हो सकी़ यहीं से एक उम्मीद की किरण भी दिखती है. मारुति के मजदूरों ने तमाम दमन के बावजूद अपने संघर्ष को जारी रखने का फैसला किया. उन्होंने गिरफ्तारी और दमन के खिलाफ 7 और 8 नवंबर 2012 को दो दिनों की भूख हड़ताल की. यह मजदूर आंदोलन के लिए शानदार उदाहरण है.  मजदूर आंदोलन के सामने चुनौतियां सिर्फ वही नहीं हैं जो कारखाना के भीतर हैं बल्कि बाहर वह विशाल वर्चस्वशाली वर्ग भी है जिसने गांव के किसान मजदूरों को गुलाम बना रखा है और शहर के मजदूरों को विभिन्न तरीकों से कब्जे में रखकर अपने मुनाफे का जरखरीद गुलाम बनाए रखना चाहता है. भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति विश्व की अर्थव्यवस्था और राजनीति से जुड़ी हुई है. 2005 से शुरू हुआ विश्वव्यापी मंदी का दौर 2007 में पूजीपतियों पर कहर लेकर आया. रियल स्टेट, सट्टा बाजार और युद्घ की विध्वंसक लूट का तरीका उन पर एक बोझ बन गया. कारखाना उत्पादन की वृद्घि दर शून्य दशमलव के आसपास बनी हुई है. टैक्स सिस्टम पर आधारित राज्य अर्थव्यवस्था के और अधिक ‘आस्टेरिटी मेजर’ को आम लोग बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं. तीसरी दुनिया के देशों की लूट पर बेरोजगारी भत्ता बांटने वाले साम्राज्यवादी देश ‘बॉटम लाइन’ में जाने के लिए तैयार नहीं हैं. लेकिन मजदूरों को असुरक्षित जीवन स्थितियों में डालकर वे आपस में बाजार के होड़ को जीत लेना चाहते हैं. आज पूरे यूरोप और अमरीका में मजदूर और आम जनता सड़क पर है. लाखों की संख्या में मजदूर सड़क पर उतर कर आंदोलन कर रहे हैं.
निष्कर्ष के बतौर

मजदूर वर्ग को आज के हालात में किस तरह संगठित किया जाए और ट्रेड यूनियन का क्या स्वरूप हो, इसका मेरे पास कोई ठोस उत्तर नहीं है. मैं इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं हूं. चुनौतियों के संदर्भ और आंदोलन में मजदूर वर्ग द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे तरीकों से सीखा जरूर जा सकता है और चले आ रहे आंदोलन की निरंतरता को आगे बढ़ाया जा सकता है.

मानेसर में मारुति सुजुकी के मजदूर पिछले एक साल से ऊपर से जिस लड़ाई को लड़ रहे हैं उसमें नए तरह के ट्रेड यूनियन और संगठन के स्वरूप दिखते हैं. उन्होंने सबसे पहले कारखाने के भीतर एक संयोजन कमिटी बनाकर अपनी यूनियन को पंजीकृत कराने और संगठित तौर पर प्रबंधक के सामने अपनी मांग को रखना शुरू किया. बाद में जब इस संयोजन कमिटी के कुछ सदस्यों को प्रबंधक तोड़ने में सफल हुआ तब मजदूरों ने अपनी पंजीकृत यूनियन के साथ साथ एक और गुप्त कमिटी का निर्माण किया. वस्तुत: यहीं निर्णय लेने का केंद्र है. यह कमिटी मजदूरों के द्वारा चुनी जाती है.

अठारह जुलाई 2012 की घटना के बाद पदाधिकारियों और मजदूरों की भारी गिरफ्तारी के बाद भी इस गुप्त कमिटी के सदस्यों के आपसी संयोजन और जेल में बंद पदाधिकारियों की सलाह से ली गई पहलकदमी को व्यापक समर्थन हासिल हुआ. इसके साथ साथ मजदूरों के परिवार के लोगों ने भी अपनी एकजुटता बनाई और रोहतक और गुड़गांव में सरकारी दमन के खिलाफ प्रदर्शन किया और मजदूरों का पक्ष लिया. इस तरह एक कारखाने के भीतर दमन और उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने के लिए संगठित प्रयोग उनके आंदोलन को आगे बढ़ाने में कारगर साबित हुए. एक कारखाने के भीतर यूनियन का निर्माण, उसकी गुप्त कमिटी, परिवार के लोगों का संगठन और गांव तक इसका विस्तार, व्यापक मोर्चा और पहलकदमी की स्वतंत्रता, आत्मरक्षा की तैयारी, विभिन्न कामों की जिम्मेवारी का बंटवारा, खाप पंचायतों से निपटने के लिए उनको संबोधित करने जैसे संगठित और व्यवहारिक प्रयोग से आज की चुनौतियों से जूझने के लिए सीखा जा सकता है और मजदूर वर्ग को संगठित करने वाले यूनियनों के निर्माण की ओर बढ़ा जा सकता है.

भारत में मजदूर आंदोलन की चुनौतियां भारतीय समाज की मुक्ति के लक्ष्य के साथ जुड़ी हुई हैं जहां से जनवाद का रास्ता साफ होता है. भारतीय मजदूर वर्ग पर न केवल देश के विशाल पूंजीपतियों का भार पड़ा हुआ है बल्कि उन पर साम्राज्यवादी लूट और शोषण का भीषण भार भी है. मजदूर वर्ग पर उन सामंती अंतर्संबंधों का भार है जिनको तोड़े बिना श्रम की गुलाम व्यवस्था से मुक्त होना संभव नहीं है. जमीन, जीविका और जनवाद की लड़ाई लड़ते हुए ही मजदूर वर्ग पूंजीवाद के खिलाफ अपने संघर्ष को तेज कर सकेगा और समाजवाद के रास्ते पर आगे बढ़ सकेगा.

(यह दसवें प्रधान हरिशंकर प्रसाद व्याख्यान के तहत अंजनी कुमार द्वारा पेश किया गया व्याख्यान है, जिसे ब्लॉग पर पोस्ट करने की मुश्किलों की वजह से हाशिया द्वारा दो हिस्सों में बांटा गया है. पहला हिस्सा यहां पढ़ें.)

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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