हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

‘सरपट’ विकास के दौर में श्रमिक: प्रधान हरिशंकर व्याख्यानमाला-I

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/01/2013 08:49:00 PM


सरकार के आंकड़े दिखलाते रहे हैं कि औद्योगिक शांति कायम है. लेकिन देश भर में मजदूर असंतोष की घटनाएं सामने आ रही हैं. ऑटो और ऑटो पार्ट क्षेत्र में मजदूरों के असंतोष और ‘सुलगते गुस्से’ का फैलाव ‘विकास’ के अपनाए गए रास्ते का अनिवार्य हिस्सा है. यह गुस्सा फैलता ही जा रहा है. 18 जुलाई 2012 को मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में मजदूर और प्रबंधकों के बीच हुई झड़प में एक प्रबंधक की मौत और अन्य 33 प्रबंधकों का घायल होना प्रतिनिधि घटना के रूप में सामने आया. 2008 से 2012 के बीच घटी ऐसी सैकड़ों घटनाएं विश्व पूंजी के आर्थिक संकट के और भी बुरे और ‘कोमा’ में चले जाने का परिचायक है. यह ऐसी परिघटना है जिसका रिश्ता ‘विकास’ के उस पैटर्न से है जिसका जोर 1985 के बाद तेजी से बढ़ता गया और ऐसी चुनौतियां साथ लेकर आया जिससे पहले से बने बनाए तरीकों से निपटना कठिन था. जमीन की लूट, आदिवासी किसानों की जीविका, दलित समुदाय की अस्मिता और मजदूर वर्ग का भयावह शोषण दमन और उन्हें संस्तरों में विभाजित करती उत्पादन व्यवस्था आदि़ कहीं पर पुराने तरह की संगठन व्यवस्था को राजसत्ता ने या तो अपने भीतर पचा लिया या उसे तोड़ देने के लिए हर स्तर पर आमादा हो गया. मजदूर वर्ग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके संगठन बनाने के अधिकार को लेकर आई. पूंजी और मजदूर के बीच लगातार चलने वाले संघर्ष में यूनियन एक केंद्रीय मुद्दा बन गया. इस लेख में मजदूर असंतोष की कुछ प्रतिनिधिक घटनाओं के जरिए उद्योगिक विकास के तौर तरीके और तर्ज के साथ साथ उसकी राजनीतिक आर्थिकी और समाजशास्त्रीय पहलुओं को समझने की कोशिश की गई है. फिलहाल ट्रस्ट, पटना की ओर से आयोजित दसवें प्रधान हरिशंकर प्रसाद स्मृति व्याख्यान के अंतर्गत 24 नवंबर 2012 को गांधी संग्रहालय, पटना में दिए गए व्याख्यान का परिमार्जित और परिवर्धित रूप है.


जीवन और काम के हालात और संघर्ष

अंजनी कुमार


‘मजदूरों पर इतनी धक्काशाही नहीं करनी चाहिए कि वे नोएडा जैसा रास्ता अख्तियार कर लें. यह प्रबंधकों के लिए एक चेतावनी का काम करेगा.’ आस्कर फर्नांडीज, केंद्रीय श्रम मंत्री (इंडियन एक्सप्रेस, 24 सितंबर 2008, दिल्ली).

बाईस सितंबर 2008 को नोएडा में ग्रेजियानो कंपनी के मुख्य प्रबंधक की कारखाना परिसर में पीटकर हत्या कर दी गई थी. इस सिलसिले में दो दिन के भीतर 136 मजदूरों को जेल में डाल दिया गया था. श्रम मंत्री की इस चेतावनी की मीडिया, पूंजीपतियों और सरकार के पक्ष विपक्ष की पार्टियों ने खूब भर्त्सना की थी. मंत्री महोदय सफाई देने के बावजूद कुछ दिनों बाद ही अपने पद से विदा कर दिए गए. सरकार और पूंजीपतियों के लिए इस चेतावनी की कोई कीमत नहीं थी. ऑटो और ऑटो पार्ट क्षेत्र में मजदूरों के असंतोष और उपरोक्त मंत्री के शब्दों में ‘सुलगते गुस्से’ का फैलाव ‘विकास’ के अपनाए गए रास्ते का अनिवार्य हिस्सा था. यह गुस्सा फैलता ही गया.

मजदूर असंतोष

सरकार के आंकड़े दिखलाते रहे कि औद्योगिक शांति कायम है. लेकिन देश भर में मजदूर असंतोष की घटनाएं सामने आईं. कुछ प्रमुख घटनाएं हैं: महिंद्रा (नासिक) मई 2009, सनबीम ऑटो (गुड़गांव) मई 2009, बॉश चेसिस (पुणे) जुलाई 2009, होंडा मोटरसाइकिल (मानेसर) अगस्त 2009, रिको ऑटो (गुड़गांव) अगस्त 2009 (इसमें गुड़गांव में पूरे ऑटो उद्योग में हुई आम हड़ताल शामिल है), प्रिकोल (कोयंबटूर) सितंबर 2009, वोल्वो (होसकोटे, कर्नाटक) अगस्त 2010, एमआरएफ टायर्स (चेन्नई) अक्टूबर 2010 और जून 2011, जनरल मोटर्स (हलोल गुजरात) मार्च 2011, मारुति सुजुकी (मानेसर) जून-अक्टूबर 2011, बॉश (बेंगलूरू) सितंबर 2011, डनलप (हुगली) अक्टूबर 2011, कपारो (श्रीपेरूबंदूर, तमिलनाडु) दिसंबर 2011, डनलप (अंबत्तूर, तमिलनाडु) फरवरी 2012, हुंडई (चेन्नई) अप्रील और दिसंबर 2011 और जनवरी 2012 आदि (राहुल बर्मन, आस्पेक्ट्स ऑफ इंडियाज इकोनॉमी, जून 2012 अंक). यहां 13 नवंबर 2010 को साहिबाबाद सेक्टर 4 में स्थित एलाइड निप्पॉन कंपनी मजदूरों और कारखाना प्रबंधकों के बीच हुई झड़प में एक प्रबंधक की हुई मौत का जिक्र छूट गया है. सितंबर 2009 में कोयंबटूर के प्रीकोल कारखाना में 35 मजदूरों को बर्खास्त कर देने के विरोध में हड़ताल कर रहे मजदूरों ने एक प्रबंधक को मार डाला. जून 2010 में तमिलनाडु के हुंडई प्लांट में प्रबंधन द्वारा यूनियन को मान्यता न देने के खिलाफ 20 दिनों की हड़ताल का जिक्र भी छूट गया है. यह लेख लिखने तक वहां मजदूरों का आंदोलन रुका नहीं है. 2011 में ही जमशेदपुर में टाटा के मजदूरों की हड़ताल के खिलाफ आगजानी हुई.

यनम, पुद्दुचेरी में 28 जनवरी 2012 को मजदूरों ने अपने नेता की हत्या के खिलाफ कारखाने पर हमला कर एक प्रबंधक को मार डाला और पूरे शहर को अपने कब्जे में ले लिया. वहां पुलिस बल की भारी तैनाती के बाद ही ‘स्थिति गिरते पड़ते सामान्य हालत में वापस आ सकी (द हिंदू, 29 जनवरी 2012). 28 अगस्त 2012 को नासिक में एवरेस्ट इंडस्ट्रीज के मजदूरों ने कारखाने से बाहर आते तीन प्रबंधकों को चाकू मार कर घायल कर दिया. इस घटना के बाद नासिक दो दिन बंद रहा़ दिल्ली में उद्योग भवन पर ऊंची तकनीक वाला सीसीटीवी कैमरा लगाया गया. मार्च 2012 में गुड़गांव में मजदूरों ने बार बार अपने गुस्से का इजहार किया. कपड़ा कारखाना ओरिएंट क्राफ्ट पर मजदूरों ने हमला बोला और पुलिस वैन में आग लगा दी. वहां कई दिनों तक काम ठप पड़ा रहा़. एक और घटना में निर्माण मजदूरों ने मुख्य सड़क को जाम कर पुलिस वैन को आग के हवाले कर दिया. पुलिस को वहां से भागना पड़ा. अठारह जुलाई 2012 को मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में मजदूर और प्रबंधकों के बीच हुई झड़प में एक प्रबंधक की मौत और अन्य 33 प्रबंधकों का घायल होना प्रतिनिधि घटना के रूप में सामने आया. इसमें बड़ी संख्या में मजदूर घायल हुए जिसका जिक्र कम ही किया गया. इसकी गूंज अमरीकी अखबारों से लेकर जापान के पूंजीपतियों की चिंता तक में दिखाई दी.
भारत में ‘प्रगतिशील’ माने जाने वाले अखबार का संपादकीय आस्कर फर्नाडीज के बयान से एकदम अलग स्वर लेकर आया: ‘मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट के मजदूरों द्वारा की गई विकट हिंसा में कंपनी के एक मैनेजर की मौत हो गई. इसे किसी और तरीके से देखने का सवाल ही नहीं बनता़ यह खतरनाक और परेशान कर देने वाली घटना है. इसकी हर तरह से भर्त्सना करनी चाहिए. इस बर्बर हत्या की किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता़ यह रिपोर्ट पढ़ना बेचैनी पैदा करता है. इसमें एक मैनेजर की जल कर मौत इस वजह से हुई क्योंकि किसी मजदूर ने उसके पैर तोड़ दिए थे. मजदूरों द्वारा लगाई हुई आग से वह भाग ही नहीं सका़ मजदूरों की हिंसा इतनी बुरी थी कि 33 मैनेजर घायल होकर अब भी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं. पुलिस ने हिंसा में कथित भागीदारी के आरोप में 91 मजदूरों को गिरफ्तार किया है. दोषियों से कड़ाई से निपटना चाहिए. इस बात का खास खयाल रखना चाहिए कि हालिया समय में गुड़गांव-मानेसर बेल्ट में ऑटो और उनकी सहयोगी कंपनियों में इस तरह की मजदूर हिंसा लगातार हो रही है. (द हिंदू, 23 जुलाई 2012, दिल्ली). आस्कर फर्नांडीज की 2008 में दी गई चेतावनी 2012 में एक संपादक की कलम से मजदूरों पर ‘हिंसक कार्यवाई करने’ के निर्देश में बदल गई.

असंतोष का संदर्भ

साल 2008 से 2012 के बीच घटी ऐसी सैकड़ों घटनाएं विश्व पूंजी के आर्थिक संकट के और भी बुरे और ‘कोमा’ में चले जाने का परिचायक है. यह ऐसी परिघटना है जिसका रिश्ता ‘विकास’ के उस पैटर्न से है जिसका जोर 1985 के बाद तेजी से बढ़ता गया और 2000 तक जिस शक्ल में हमारे सामने आया वह विकट और भयावह था. वह ऐसी चुनौतियां साथ लेकर आया जिससे पहले से बने बनाए तरीकों से निपटना कठिन था. यह साम्राज्यवादी पूंजी के संकट को लेकर हमारे यहां आया. साल 2000 के बाद यह संकट आम लोगों की तबाही का अभूतपूर्व मंजर खड़ा करने लगा. जमीन की लूट, आदिवासी किसानों की जीविका, दलित समुदाय की अस्मिता और मजदूर वर्ग का भयावह शोषण दमन और उन्हें संस्तरों में विभाजित करती उत्पादन व्यवस्था आदि़ कहीं पर पुराने तरह की संगठन व्यवस्था को राजसत्ता ने या तो अपने भीतर पचा लिया या उसे तोड़ देने के लिए हर स्तर पर आमादा हो गया. मजदूर वर्ग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके संगठन बनाने के अधिकार को लेकर आई. पूंजी और मजदूर के बीच लगातार चलने वाले संघर्ष में यूनियन एक केंद्रीय मुद्दा बन गया. ‘इस वर्ग संघर्ष में एक बड़ा मोर्चा ऑटो सेक्टर में स्वतंत्र यूनियन बनाने के अधिकार के खिलाफ अलिखित कानून का प्रयोग है. शायद हाल के दिनों में हुए मजदूर आंदोलन में मुख्य मांग उनकी खुद की ट्रेड यूनियन बनाने की मांग रही है. अधिकांश मामलों में मजदूरों को सफलता नहीं मिल सकी है. नियोक्ता इसके खिलाफ बर्खास्तगी, आपराधिक मामले लगाने, मार पीट करने और जान से मार देने जैसे तौर तरीके अख्तियार करते हैं. जर्मन ऑटो कंपनी बॉश ने यूनियन बनाने की तीन कोशिशों को नाकाम कर दिया. हुंडई, हीरो होंडा, वुंजिन, मारुति सुजुकी, ग्रेजियानो, रिको ऑटो सभी जगह यही कहानी है. जब हीरो होंडा के धारुहेड़ा इकाई के 1800 मजदूरों ने अपनी यूनियन हासिल करना तय किया तब उनके नेतृत्व पर आर्म्स एक्ट और भारतीय पीनल कोड की धारा 307 (हत्या का प्रयास) का मुकदमा लगा दिया गया. ’ (आस्पेक्ट्स ऑफ इंडियाज इकोनॉमी, अंक 52, पेज 9).

मजदूरों से ठेका और ट्रेनी के तौर पर अमानवीय तरीकों और शर्तों पर काम कराने और नियमित मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में कमी करने और यूनियन बनाने के नियम कानूनों की पेचीदगी और उसकी रुकावट से एक विस्फोटक हालात तैयार होता है जिसे परंपरागत या दलाल बन चुकी यूनियनें सारी कोशिशों के बावजूद रोकने में असफल साबित होती हैं. विशेष आर्थिक क्षेत्र से लेकर एकीकृत इंडस्ट्रीयल क्षेत्र में यूनियन बनने से रोकने के पीछे भारतीय अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर बैठे वे समूह हैं जिनकी चाहत भारत को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के शब्दों में (बजट भाषण 2012-13)‘विश्व की परेशानहाल होती पूंजी के लिए सुरक्षित क्षेत्र बना देने’ की है. इस ‘परेशानहाल पूंजी’ का मकसद ‘मजदूरों का दोहन करना है और यह जितना संभव है उतना करना है. पहले से स्थापित व्यवसाय में मुनाफा बढ़ाने के लिए सबसे पहला तरीका है लागत को कम करना़ ’ (एबीसी ऑफ द इकोनॉमिक क्राइसिस, फ्रेड मैग्डॉफ और मिशल डी यीट्स, पेज 49). लागत कम करने का सबसे मुफीद तरीका तकनीक का प्रयोग और मजदूर की संख्या में कमी कर उनके काम की अवधि को बढ़ाना. इसके लिए जरूरी है कि ‘ऐसे हालात बना दिए जाएं कि मजदूरों को यूनियन बनाना और नियोक्ता के साथ शर्तें तय करना कठिन हो जाए (एबीसी ऑफ द इकोनॉमिक क्रासिस,  फ्रेड मैग्डॉफ और मिशल डी यीट्स पेज 48). पहले से स्थापित यूनियनों से मजदूरों के लिए ‘कम प्रयास करने’ की हिदायत दे दी जाती है.

इन्हीं संदर्भों में साम्राज्यवादी देशों में 1980 के दशक में माग्रेट थैचर ने एक जुमला उछाला था: ‘और कोई विकल्प नहीं है.’ यह पूंजी के बुलडोजर का नया नवउदारवादी नारा था. यह बहुत कुछ ‘सेव द किंग’ के ब्रिटिश नारे जैसा था जिसका अर्थ गुलामी, दमन, लूट और विध्वंस था. बाद के समय में यही नारा ‘सेव द अमरीकन एम्पायर’ के नारे में तब्दील हो गया. अपने देश में विकल्पहीनता और अमरीकी साम्राज्य की सुरक्षा के नारे को बंदूक के बल पर मनवाने का एक अतिरिक्त प्रयास यहां की सत्ताधारी पार्टियों और उसकी सरकारों ने किया. इसके तहत ‘कॉरपोरेट रणनीति श्रम को ‘कम’ करता है जिससे ‘कृष और सक्षम कॉरपोरेशन’ बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सके. यह किसी एक कॉरपोरेशन के लिए फायदेमंद हो सकता है. लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में आपूर्ति या घरेलू बाजार के सिकुड़ने पर इसका नतीजा उल्टा भी हो सकता है (एसेज इन द रीकांस्टीट्यूशन ऑफ पोलिटिकल इकोनॉमी, अमित भादुड़ी, पेज 23).

भारत की उत्पादन प्रणाली और उसके वितरण का तरीका विश्व पूंजी के लिए एक विशिष्ट परिस्थिति का निर्माण करता है. इसकी कार्यशैली ही इसकी विशिष्टता है. इसकी पड़ताल करके हम विश्व पूंजी के हमारे यहां काम करने से उपजे हालात और मजदूर वर्ग के सामने चुनौतियों की समझदारी की ओर बढ़ सकते हैं. यह पड़ताल हम मजदूर असंतोष का केंद्र बने कुछ उद्योगों के हालात का अध्ययन करने के जरिए करेंगे. इसके बाद हम भारत में उद्योगीकरण के तौर तरीके और तर्ज पर राजनीतिक आर्थिक ही नहीं सामाजिक संरचना के संदर्भ में भी गौर करेंगे.

एक आकलन के मुताबिक नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कुल 3,000 उद्योग थे. इनमें श्रमिकों की संख्या 2.5 लाख थी. वहां के श्रम न्यायालय में 2500 मामले लंबित थे. यानी औसतन हर 100 मजदूर पर एक केस लंबित था. उस समय तक रोजाना औसतन 20 मामले श्रम विभाग के कमिश्नर के पास आ रहे थे. इसका दस फीसद हिस्सा हल न हो पाने की स्थिति में कोर्ट में जा रहा था. हिंदुस्तान टाइम्स, दिल्ली (28 सितंबर 2008) ने नवंबर 2007 से सितंबर 2008 के बीच मजदूरों और प्रबंधकों के बीच घटी उन सात घटनाओं का विवरण पेश किया जो हल न होने से हर बार पहले से अधिक उग्र होती गई. इस विवरण की पृष्ठभूमि में जुलाई 2005 में होंडा मोटर साइकल और स्कूटर इंडिया लिमिटेड के मजदूरों पर बेरहमी से पुलिस द्वारा लाठी चार्ज और इसके गुड़गांव बंद का अभूतपूर्व नजारा देखा जा चुका था. फरीदाबाद में पुलिस और प्रबंधकों की मिलीभगत के खिलाफ मजदूरों का गुस्सा निकलने की घटनाएं हो रही थीं. ओखला इंडस्ट्रीयल एरिया में संगठित और असंगठित मजदूर अपनी मजदूरी और कारखाने की बंदी के खिलाफ कानूनी और गैरकानूनी लड़ाई में लगे हुए थे. साल 2000 की शुरुआत से ही मजदूरों का गुस्सा बार बार सड़क पर प्रदर्शनों, जाम और मालिक मजदूरों के साथ मार पिटाई में दिख रहा था. यही दिल्ली और आसपास का उद्योगिक नजारा था जिसमें ग्रेजियानो जैसी घटना ‘चेतावनी’ जैसी दिख रही थी. नागरिक का संपादकीय शीर्षक था: ‘गुड़गांव रचोगे तो ग्रेटर नोएडा भी होगा’ (अंक 19, 1-15 अक्टूबर 2008). उस समय मजदूर वर्ग के प्रति प्रबंधकों का रवैया हम 24 सितंबर 2008 के द हिंदू में केंद्रीय श्रम मंत्री आस्कर फर्नांडीस के बयान में देख सकते हैं: ‘मेरी प्रबधंकों से अपील है कि वे मजदूरों के साथ धैर्य के साथ व्यवहार करें’ और ‘हम अगले भारतीय श्रम कांग्रेस में मनचाहा नियुक्ति बर्खास्तगी की नीति के मसले पर बातचीत करेंगे. इसका प्रयोग निगमों (पब्लिक सेक्टर यूनिट) में भी हो रहा है. पहले हम वहां इससे निपटेंगे और इसके बाद निजी प्रतिष्ठानों में इस पर काम होगा़’ लेकिन ये मसले आस्कर फर्नांडीस को ही ले डूबे.

ग्रेजियानो

ऑटो सेक्टर के लिए पुर्जे बनाने वाली ग्रेजियानो कंपनी 1998 में नोएडा में कायम हुई. 2003 में इसने अपना उत्पादन बढ़ाने के लिए पूंजी की मात्रा बढ़ा दी. इटली की इस कंपनी ने कुल 20 करोड़ रुपए लगाए थे जो 2008 में 400 करोड़ की पूंजी में बदल गई. इसे स्विट्जरलैंड की कंपनी आयरलिकन ने खरीद लिया. इस कंपनी में उत्पादन चौबीसों घंटे चलता रहता था. मजदूरों को बारह घंटे की दो शिफ्टों में काम करना होता था. किसी भी मजदूर के लिए 8+4 घंटे काम करना अनिवार्य था. लगभग एक हजार मजदूरों में से 350 स्थायी, 80 प्रशिक्षु और 500 ठेका मजदूर थे. इटली से आए प्रबंधकों ने 2005 में उत्पादन की वृद्घि के अनुरूप वेतनमान वृद्घि का वादा किया. लेकिन 2008 तक यह वादा पूरा नहीं हुआ. इस दौरान मजदूरों के साथ प्रबंधन और उसके गुर्गों की मार पिटाई और गाली गलौज बढ़ता गया. दिसंबर 2007 में यूनियन बनाने की कोशिश हुई. इसके चलते तीन मजदूरों को काम से निकाल दिया गया. कानपुर के श्रम विभाग में प्रबंधक और प्रशासन की मिलीभगत से यूनियन को मान्यता नहीं मिल सकी. साल भर बाद 100 अन्य मजदूरों को नौकरी से बाहर किया गया. मजदूरों के इस मसले में हिंद मजदूर सभा (हिमस), ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) जैसी यूनियनों ने अपने अपने तरीके से हस्तक्षेप किया. सोनिया गांधी के इटली से होने के चलते मजदूरों ने उनसे भी मिलने की कोशिश की और कांग्रेस के दफ्तर गए. उन्होंने इटली दूतावास को ज्ञापन दिया. प्रशासन के हस्तक्षेप से मजदूरों के पांच प्रतिनिधियों को मान्यता देकर प्रबंधक, मजदूर और प्रशासन के बीच बातचीत शुरू हुई और क्रमश: 1200, 1000 और 800 रुपए की वेतनमान वृद्घि दी गई. यूनियन की मान्यता और काम को आठ घंटे की तीन शिफ्ट में चलाने का मसला लंबित रहा.

यहां काम करने वाले मजदूरों की आय का औसत वितरण इस तरह था: ट्रेनी 4800 रुपए, ऑपरेटर(स्थाई) 7000 रुपए, ठेका 3500 रुपए. वेतनमान वृद्घि को लागू करने के पहले प्रबंधन पुराने सभी मजदूरों को छांटकर बाहर कर देना चाहता था ताकि यूनियन बनने की संभावना ही खत्म हो जाए. सो वार्ता के बाद फरवरी 2008 से सितंबर 2008 के बीच कारखानों के लिए गाड़ी का ठेका और मजदूरों को ‘नियंत्रण’ में रखने के लिए गुंडा पालने वाला विजेंद्र भाटी मुख्य प्रबंधक के साथ मिलकर मजदूरों को बर्खास्त करने, उनको अपने चैंबर में बिठा कर भद्दी गाली देने, गुंडों से धमकाने का काम करता रहा़ ‘आपकी यातायात व्यवस्था के मालिकान श्री विजेंद्र भाटी अपने 10-15 लोगों को गाड़ी में भरकर लाए और पहली पाली में काम कर बाहर निकल रहे श्रमिकों के साथ गाली गलौज करना शुरू कर दिया और मारपीट करने लगे. रोड से उठाकर पत्थर फेंकने लगे. इसमें कई मजदूर घायल हो गए. हमने इसकी प्राथमिकी दर्ज कराई. मजदूरों को मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया गया. (3 जून 2008 को ग्रेजियानो मजदूरों द्वारा सीटू के लेटरहेड से जारी पत्र का एक अंश). इस मामले में उल्टे 42 मजदूरों (जिनकी औसत उम्र 25 साल है) पर धारा 107 और 116 के तहत मुकदमा थोप दिया गया. इन मजदूरों को सब डिविजनल मजिस्ट्रेट, नोएडा ने एक लाख के मुचलके पर जमानत दी. सीटू, गौतमबुद्घ नगर को ग्रेजियानो प्रबंधक ने 6 जुलाई 2008 को जवाबी पत्र भेजा. ‘आपके भड़काने और उकसाने पर संबधित श्रमिकों ने धीमी गति से काम करने की नीति, हड़ताल, मारपीट और तोड़फोड़ की.’

बताना जरूरी है कि प्रबंधक की मौत के बाद सीटू के ऑफिस में बैठे पदाधिकारी ने ‘घटना’ को ‘मजदूरों की अराजकतावादी प्रवृत्ति’ का नतीजा बताया था. मजदूर विभिन्न यूनियनों के पास गए. लेकिन वे अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखना चाह रहे थे. इसके चलते कोई भी यूनियन इन मजदूरों को सहयोग देने में ‘अक्षम’ महसूस कर रहा था. बहरहाल 11 जुलाई 2008 को हिमस ने ‘मजूदरों की जेल से बहाली, कार्यस्थल पर सुरक्षा और शांति और बर्खास्तगी को वापस लेने’ की अपील मुख्यमंत्री सहित अन्य संबंधित विभागों को भेजी. लेकिन जवाब पहले जैसा ही था. मजदूरों की ओर से 8 अप्रील 2008 को सीटू ने प्रबंधन के नाम पत्र भेजा: ‘पानी अथवा बाथरूम जाने वाले सदस्यों को एक एक करके अधिकारीगण अपने चैंबर में बुलाकर उल्टे सीधे माफीनामे अथवा गलत पत्र लिखवा रहे हैं.’ हम मांग करते हैं कि ‘श्रमिकों को जॉब कार्ड दिया जाए और उत्पादन पूर्ण होने पर सुपरवाइजर अथवा शिफ्ट इंचार्ज से हस्ताक्षर करवाया जाए. ड्यूटी के समय में श्रमिकों को 15-15 मिनट के दो टी ब्रेक दिए जाएं और 8 घंटे ड्यूटी करने के बाद अतिरिक्त समय में काम करने वाले श्रमिकों के लिए चाय नाश्ते का प्रबंध किया जाए.’ मालूम हो कि पत्र के जारी होने तक कारखाने में दो ही शिफ्ट चल रहा था. 9 अप्रील 2008 को ग्रेजियानो कारखाना प्रबंधक ने इसी मसले पर एक मजदूर को पत्र जारी किया: ‘रात्रि आठ बजे आप अन्य सभी श्रमिकों के साथ भोजन करने के लिए कैंटीन में गए. कंपनी के नियमानुसार आपको भोजन के बाद 8.30 तक अपने विभाग में उपस्थित होना था. लेकिन आप और आपके सभी अन्य सहकर्मियों ने ऐसा नहीं किया. आपका उपरोक्त कार्य कंपनी के स्थाई आदेशों के अंतर्गत एक गंभीर दुराचरण है.’ प्रबंधन और मजदूरों के बीच 24 जनवरी 2008 को हुए समझौते की एक शर्त यह भी थी:  ‘यदि श्रमिक को एक साथ कई मशीनों पर काम करने के लिए कहा जाता है तो वह उन सभी मशीनों पर अपनी पूरी क्षमता के साथ उत्पादन कार्य करेंगे. दैनिक उत्पादन क्षमता निर्धारण के लिए जिस मशीन की क्षमता कम होगी उसको उस दिन की उत्पादन क्षमता माना जाएगा़’ और ‘इस समझौते के तीन सालों की अवधि में कोई श्रमिक या श्रमिकगण प्रतिष्ठान में प्रबंधकों के खिलाफ नारेबाजी, धरना, धीमी गति से काम करना और हड़ताल करना या अन्य किसी किस्म का कोई ऐसा काम नहीं करेगा जो असंवैधानिक की परिभाषा में आता है.’

पांच मजदूर प्रतिनिधियों के साथ प्रबंधन के इस समझौते के अगले महीने ही ठेकेदार विजेंद्र भाटी और दो अन्य ठेकेदारों ने 400 ‘मजदूरों’ की भर्ती कर प्रबंधन की ओर से किए वायदे को तोड़ दिया. इन चार सौ ‘मजदूरों’ की भर्ती के बाद सौ ठेका मजदूरों और सौ स्थाई मजदूरों को बाहर कर दिया गया.

सितंबर के महीने में प्रशासन ने दबाव डालकर मजदूरों से अपमानजनक शर्त पर काम पर वापस जाने का समझौता कराया. लेकिन प्रबंधक समूह इन मजदूरों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं था. पहले से भर्ती किए और बुलाए गए ‘मजदूरों’ ने प्रबंधकों द्वारा तैयार किए गए नए शर्तनामे पर हस्ताक्षर कर अंदर पहुंच रहे मजदूरों पर लगातार हमला किया. इसका प्रतिरोध होना लाजिमी था. इस प्रतिरोध में एक प्रबंधक की मौत हुई और 136 मजदूर जेल में डाल दिए गए. इसमें से 63 पर हत्या करने का केस लगाया गया और 74 पर शांति भंग करने का आरोप जड़ा गया. गिरफ्तारी से बचे एक मजदूर के बयान के अनुसार ये मजदूर ‘लठैत गुंडे’ थे और नोएडा के आस पास से बुलाए गए थे. ये मजदूर आमतौर पर कारखाने में बने रहते थे और काम नहीं करते थे. 22 सितंबर की झड़प में हड़ताल से वापसी कर रहे मजदूर गेट पर खड़े थे और अंदर विजेंद्र भाटी के ‘मजदूर’ एक एक कर अंदर जा रहे मजदूरों के साथ मार पिटाई कर रहे थे. दरअसल यह ‘बाउंसरों’ का प्रयोग था जिसे हम मारुति की घटना में भी इसी शक्ल में देख सकते हैं.

नोएडा के ग्रेजियानो कंपनी में मजदूरों के काम के हालात और उनके संघर्ष में बहुत कुछ नया था और बहुत कुछ पुराने की निरंतरता थी. यहां काम करने वाले मजदूर मुख्यत: उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश से थे. नोएडा के गांव और आसपास के लोगों को यहां के कारखाना मालिक आमतौर पर नौकरी पर नहीं रखते़ यहां के लोग मकान का किराया वसूलने और स्थानीय कारखानों के प्रबंधकों के साथ मिलकर छोटे बड़े व्यवसाय में लगे हुए हैं. गरीब लोगों ने रेहड़ी पट्टी का सहारा लिया है तो अमीरों ने यातायात, कैंटीन, सुरक्षा और प्रापर्टी डीलर, शराब का ठेका, छोटे मोटे निर्माण के काम में लगे हुए हैं.

यहां के मजदूरों की शिकायत मुख्य प्रबंधक ललित कुमार चौधरी (जो मारा गया) और विजेंद्र भाटी से थी. उन्हें इटली के प्रबंधकों से उम्मीद बनी रही़ उन्हें यही लगता रहा कि ‘वे तो बात के पक्के हैं पर गड़बड़ी यहीं है.’ ग्रेजियानो के मजदूरों ने इटली के इन्हीं प्रबंधकों के आश्वासन पर 12 घंटे की दो शिफ्ट में उच्च श्रेणी के बेयरिंग बनाना शुरू किया और उत्पादन को कई गुना बढ़ा दिया. इटली में मजदूरों ने ग्रेजियानो के खिलाफ नोएडा के मजदूरों के समर्थन प्रदर्शन कर अपनी एकजुटता जाहिर की. लेकिन कहना मुश्किल है कि यह एकजुटता पूंजी के खिलाफ बनने वाली चेतना में ढल सकी. यह  ग्रेजियानो के मजदूरों के संघर्ष में ठेका, अप्रेंटिस और ट्रेनीज और स्थाई मजदूरों के बीच एकता बनी रही. ग्रेजियानो के मजदूरों के संघर्ष में काम के घंटे, रीफ्रेशमेंट-चाय, भोजनावकाश, यूनियन बनाने का अधिकार, यूनियन न होने की स्थिति में मजदूर प्रतिनिधियों को मान्यता, प्रबंधकों द्वारा व्यवहार, बाहरी तत्वों, गुंडों और बाउसंरों का प्रयोग, प्रशासन, पुलिस और राजनीतिक पार्टियों और उनकी यूनियनों का व्यवहार, श्रम विभाग की पूंजीपतियों के साथ सांठगांठ और उनकी पूंजीपतियों के प्रति खुली पक्षधरता, उत्पादन और मुनाफे के अनुरूप वेतन में बढ़ोत्तरी, मजदूरों को नियमितिकरण की मांग जैसे मुद्दे सामने आए.

मायावती सरकार ने श्रम प्राधिकरण और लेबर कमिश्नर को नोएडा और ग्रेटर नोएडा के मुख्य प्रबंधक के अधीन कर उद्योगपतियों की सुरक्षा के लिए एक विशेष सर्किल अधिकारी तैनात किया था.

यनम

‘साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के दौर में सरकारों ने मजदूर वर्ग पर खुले और छुपे तरीकों से पूंजी के लगातार, कठोर और क्रूर हमले की अनुमति और समर्थन दिया है. पिछले दशकों में जनवादी और मानवाधिकरों का अभूतपूर्व दमन किया है. इसी दौर में नौकरियां छीनी गईं. वास्तविक मजदूरी कम की गई. नौकरियों को ठेका मजदूरी में बदला गया. नवउदारवादी पूंजी मुनाफे की दर को बनाए रखने पर ही निर्भर है जबकि इस मुनाफे की प्रवृत्ति लगातार गिरावट की है. मुनाफे की दर को बढ़ाने के लिए मुख्यत: वेतन में कमी करने का रास्ता अपनाया जाता है. वेतन कम करने के लिए मजदूरों के अधिकार को दबाया जाता है. यही नवउदारवाद की केंद्रीय रणनीति है. (एन वासुदेवन, ट्रेड यूनियन सोलिडेरिटी कमेटी की ओर से यनम की घटना पर शुरुआती तथ्यात्मक रिपोर्ट, मई 2012).

नवउदारवाद की इस रणनीति की मिसाल है यनम, पुद्दुचेरी का रिजेंसी सिरेमिक्स कारखाना. यह सुदूरवर्ती क्षेत्र छोटी खेती और मछली पर आधारित अर्थव्यवस्था टिका हुआ है. यनम में जमीन की सबसे बड़ी मालिक रिजेंसी सिरेमिक्स ही है. उसके पास 500 एकड़ जमीन है. 1980 तक यहां चावल कूटने की कुछ मिलें थीं. 1982-85 के दौरान भारत सरकार ने इस क्षेत्र के उद्योगीकरण के लिए 25 फीसद की सब्सिडी देने की घोषणा की. 1983 में तेलुगू देशम पार्टी से संबंधित जी एन नायडु ने इटली की वेल्को इंडस्ट्रीयल स्पा के गठजोड़ में रिजेंसी सिरेमिक्स कंपनी उस समय के यनम के गर्वनर के सहयोग से लगाई. इसने इसका विस्तार चीन और इटली में भी किया. भारत में कंपनी के 700 डीलर्स हैं. कंपनी के उत्पादन बड़ा हिस्सा निर्यात होता है. इस कंपनी के वैश्विक ताने बाने के बावजूद इसके शेयर मूल्य कभी 5 रुपए से अधिक नहीं हुए और इसके शेयर धारकों को फायदे में हिस्सेदार नहीं बनाया गया. यह दुनिया की छह सबसे बड़ी सिरेमिक्स कंपनियों में से एक है. फिर भी स्टॉक एक्सचेंज में इसका नाम नहीं है. इसके शेयरधारक कंपनी से जुड़े नजदीकी लोग हैं. यह कंपनी कम उत्पादन दिखाकर बिजली की चोरी करती है और एक्साइज ड्यूटी से भी बच निकलती है. विदेशी खरीद बिक्री में लाभ का पैसा ‘हवाला’ के जरिए लाया जाता है.

इसी दौरान बड़े भूपतियों ने चावल की बड़ी मिलें लगाईं. वहां 2005-06 में 637 कारखाने थे. 2004-05 से 2005-06 के बीच कामगारों की वृद्घि दर 4.67 थी. इसमें महिलाओं की भागीदारी में 1.72 फीसद की गिरावट आई. ठेका मजदूरी में वृद्घि 13.17 फीसद थी. श्रमिकों से इतर काम करने वालों की वृद्घि दर 7.89 और सुपरवाइजर और प्रबंधन का काम करने वालों की वृद्घि दर 3.77 फीसद थी. 2004-05 में रसायन और रासायनिक उत्पादों के उत्पादन में 7949 लोग कार्यरत थे. इनमें से 1491 प्रबंधन और सुपरवाइजरी और ऐसे ही काम देखने वाले लोग थे. कपड़ा उद्योग में 5876 कार्यरत लोगों में से 757 प्रबंधन का काम देख रहे थे. इस दौरान कार्यकारी पूंजी में 7.39 फीसद की गिरावट आई जबकि फिक्स्ड पूंजी में 20.13 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई. इस फिक्स्ड पूंजी में 55.27 फीसद मूल्य जुड़ा. इसमें किराया हासिल करने की दर 31.62 फीसद थी. इस पर मुख्यत: आंध्र प्रदेश की कम्मा नायडु जाति समुदाय का मालिकाना है. पिछले 250 सालों के फ्रांसिसी उपनिवेशिक दौर से लेकर कम्मा नायडु के वर्चस्व बनने तक वहां कप्पू समुदाय ही शासक समुदाय था. कम्मा नायडु जाति समुदाय का चैंबर ऑफ कॉमर्स में भी वर्चस्व है.

‘1966-70 के बीच पंजीकृत सोसायटी की वृद्घि दर 1.30 फीसद थी जो 2001-2008 के दौरान 55.75 फीसद हो गई’ और इस दौरान आबादी की वृद्घि दर 1.32 से 1.49 फीसद ही हुई’. गृह निर्माण सोसायटी पंजीकरण की संख्या 1573 है. इनमें से 1099 अकेले कारायकल में और 3 माहे और यनम में है. यनम में रिजेंसी कंपनी के मालिक का ही स्कूलों, कॉलेजों पर कब्जा है. इसने रेग्मा पेपर प्रोडक्ट्स, रेग्मा ग्लेजियर और रेग्मा ट्रांसपोर्ट्स कंपनी का भी निर्माण किया. इन कारखानों में काम करने और स्कूलों में पढ़ाने के सिलसिले में आंध्र प्रदेश के लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती रही़. इस कारखाने के मालिक ने 85 फीसद से अधिक भर्ती आंध्र प्रदेश से ली और स्थानीय लोगों की भर्ती से बचता रहा. बाद के दिनों में लगभग 25 फीसद  तमिलभाषी मजदूर भर्ती हुए.

आंध्र प्रदेश के जमींदारों और पूंजीपतियों के हाथों अपने संसाधनों को लुटते देख यनम के लोगों ने उनके खिलाफ विद्रोह करना शुरू किया. 1975 में दलित बुद्घिजीवी नल्ला विशुमूर्ती ने ‘डॉ अंबेडकर रिक्शा मजदूर यूनियन’ बनाया. बाद में ‘कृषि कुली संघम’ का निर्माण किया गया. मछुआरों ने ‘नदी नाविका संघम’ का निर्माण किया. दलित आबादी को नेतृत्व देने वाला प्रभावी समूह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गया जबकि 1980 के बाद आंध्र प्रदेश से आने वाला समूह और स्थानीय सवर्ण समुदाय तेलुगु देशम से जुड़ा. इस रीजेंसी सिरेमिक्स कारखाने में 1987 में यूनियन बनी जो 1996 तक बनी रही़ आंध्र प्रदेश और पुलिस के सहयोग से प्रबंधकों ने यूनियन पदाधिकारियों और मजदूरों का काफी दमन किया.

यनम कारखाना और उसकी सहयोगी इकाई में 2000 ठेका मजदूर हैं जो सफाई और ढुलाई करते हैं. कारखाना द्वारा बहाल 970 मजदूर उत्पादन के काम में लगे हैं. 85 अनियमित मजदूर पैकिंग का काम करते हैं. इसमें महिलाएं अधिक हैं. सिरेमिक और मशीन पर काम करने वाले मजदूरों की लगभग बीस श्रेणियां हैं. सबसे सक्षम मजदूर को 9000 रुपए प्रति माह और सबसे कम 3000 रुपए है. मजदूरों की औसत आय 5000-6000 है. यह वेतनमान 15 साल के संघर्ष के बाद 2011 में हासिल हो सका. इसके पहले अनियमित मजदूरों को 1800 रुपए प्रति माह दिया जाता था. ऊंचे तापमान पर काम करने के दौरान दुर्घटना से बचने के लिए मास्क, जूते आदि का हक हासिल करने के लिए भी मजदूरों को कड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी. इसके बाद ही वहां कैंटीन की व्यवस्था हुई. इस संघर्ष में मजदूर नेताओं की बर्खास्तगी हुई. कोर्ट के आदेश के बाद भी मजदूरों को वेतन नहीं दिया गया.

सोलह साल बाद मजदूरों ने गुप्त तरीके से वहां यूनियन बना लिया. दिसंबर 2010 में प्रबंधकों को पता चल गया कि कारखानों में यूनियन है. प्रबंधकों ने 11 पदाधिकारियों को सहयोगी कारखानों में भेज दिया. इसके खिलाफ 5 दिन की हड़ताल हुई. रिजेंसी सिरेमिक्स ऑफिसर एंड वर्कर्स यूनियन ने 25 जनवरी 2011 को स्थापना दिन घोषित किया और गणतंत्र दिवस मनाने का फैसला किया. साथ ही 15 अगस्त और 1 मई को छुट्टी घोषित करने की मांग की़ 1 मई को 3,000 लोगों ने रैली निकाली. अगले दिन 54 ठेका मजदूरों को काम से बाहर कर दिया गया. इसमें 45 महिलाएं थीं. मई के अंतिम दिनों में यूनियन की नींव रखने वाले मुरली मोहन पर चोरी करने का केस लगा दिया गया. प्रबंधकों ने यूनियन के पंजीकरण के खिलाफ हाई कोर्ट में मुकदमा दर्ज किया. इस पर कोर्ट ने स्टे लगा दिया. सात सौ मजदूरों ने हस्ताक्षर कर हाल में बनी यूनियन की उसी कमिटी का प्रस्ताव प्रबंधकों के सामने भेज दिया. वेतनमान वृद्घि और यूनियन के पांच पदाधिकारियों की बर्खास्तगी को वापस कराने के लिए मजदूरों ने रैली की और गेट पर लगभग 1000 मजदूरों ने धरना देना शुरू कर दिया. चार जनवरी को मजदूरों ने अपने आंदोलन में स्थानीय लोगों की भागीदारी के लिए साइकिल रैली निकालकर इसे व्यापक बनाया. कोर्ट के आदेश के बाद धरना स्थल को यनम -आंध्र प्रदेश सीमा पर लाया गया. कुछ सीनियर कारखाना ऑपरेटरों के प्रबंधकों की बात में आ जाने के बाद उन्हें समझाने के लिए मुरली मोहन 50 मजदूरों के साथ 27 जनवरी को कारखाना गेट पर गए. वहां पुलिस ने उन पर हमला बोला. मुरली मोहन बुरी तरह घायल हुए. उनके साथ के मजदूरों के आग्रह पर भी पुलिस उन्हें अस्पताल नहीं ले गई.  उसी दिन थाने में ही उनकी मौत हो गई.

मजदूर नेता की हत्या के खिलाफ वहां की आम जनता ने मजदूरों के संघर्ष में खुलकर भागीदारी की. गुस्साए लोगों ने थाने का घेराव किया. घेराव कर रहे मजदूरों पर पुलिस ने खुलेआम गोलियां चलाईं. नौ लोग बुरी तरह से घायल हुए. ‘पांच सौ से ज्यादा दंगाई आंदोलनकर्मियों में मिल गए और कारखाने में घुस गए’ (टाईम्स ऑफ इंडिया, 28 जनवरी 2012, हैदराबाद). प्रदर्शनकारियों ने कारखाने में खड़ी 150 गाड़ियों में आग लगा दी. मजदूर और आम लोगों द्वारा कारखाने पर इस हमले में एक ऑपरेटर प्रबंधक की मौत हो गई. प्रबंधकों के अनुसार कारखाने में लूटपाट और आगजानी की गई. रिजेंसी सिरेमिक्स के मालिक से जुड़े अन्य संस्थानों पर भी हमला किया गया. कारखाना मालिक जी एन नायडु के अनुसार यह हिंसा बाहरी लोगों के भड़काने पर की गई. मुरली की हत्या के संदर्भ में संदेहास्पद मौत की धारा 176 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. कुल 51 लोगों को गिरफ्तार किया गया.

यनम की 60,000 हजार की आबादी में से 10,000 लोग रीजेंसी सिरेमिक्स कंपनी पर निर्भर हैं. एक बड़ी आबादी आंध्र प्रदेश से आकर बसी हुई है. काम न होने पर वापस लौटने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है. जीएन नायडु ने कारखाने को फिलवक्त बंद रखने का फैसला लिया है. लेकिन इस बीच इटली और जर्मनी की कंपनियों को वहां आने के लिए निमंत्रित किया गया. यह इन कंपनियों और प्रशासन के आश्वासन पर निर्भर करेगा कि यह फिर उत्पादन शुरू करता है या नहीं. दरअसल कारखाना मालिक, प्रबंधन और प्रशासन किसी भी सूरत में मजदूर यूनियन नहीं चाहते हैं. 1996 में एक यूनियन को खत्म करने के बाद मार्च 2011 में एक सक्रिय मजदूर को संदेहास्पद स्थिति में मार डाला गया. 2012 में यह हमला योजनाबद्घ तरीके से किया गया. रीजेंसी कंपनी ने स्थानीय लोगों से बचने के लिए उन्हें आमतौर पर ठेका और अनियमित मजदूर के रूप में ही रखा है. यनम में संगठित प्रतिरोध की परंपरा ने कारखाने के जातिवादी समीकरणों को तोड़ा और इसमें व्यापक आबादी को शामिल किया.

रीजेंसी कंपनी का सूत्र वाक्य है: ‘जीवन जीने की उत्कृष्ट कला़’ यह सूत्र वाक्य इस कारखाना के मालिकों और प्रबंधकों के लिए जितना भी सटीक बैठता हो, इसमें काम करने वाले मजदूरों और यनम की स्थानीय आबादी के लिए यह एक विद्रूप वाक्य था. पुद्दुचेरी की कुल 9 लाख की आबादी पर 30 से ऊपर उच्च शिक्षण संस्थान हैं. गोदावरी के तटीय क्षेत्रों पर हैदराबाद स्थित विशाल कंस्ट्रक्शन कंपनियों के कब्जे को लेकर वहां के मछुआरों को ही नहीं बल्कि मध्य वर्ग को भी दिक्कत हो रही है. इस लूट को लेकर सत्ताधारियों के बीच अंतर्विरोध खुलकर सामने आया और जांच आयोग बिठा दिया गया.

यहां के लोगों की जमीन पर रिजेंसी सिरेमिक्स का कब्जा, आंध्र प्रदेश से एक खास जाति समुदाय के लोगों की भर्ती, निजी स्कूलों की श्रृंखला और स्थानीय लोगों को दोयम दर्जे के काम और अनियमित और ठेका मजदूरों के तौर पर भर्ती करना, उन्हें न्यूनतम सुविधाओं से वंचित रखना और अत्यंत कम वेतनमान पर काम कराते रहना एक विशिष्ट कारखाना संरचना है जो नोएडा और गुड़गांव में किए जा रहे प्रयोगों से थोड़ा अलग है.

इस अलग तरह की उद्योगिक आर्थिक संरचना और पूंजीनिवेश की सुरक्षा के लिए जी एन नायडु अपनी जाति समुदाय, सत्ताधारी पार्टी, पुलिस प्रशासन और न्यायापालिका का सहारा लेता है और इस कारखाने से हासिल पूंजी निर्माण को अन्य क्षेत्रों में लगाता है. आज यह सुरक्षा एसईजेड के माध्यम से दी जा रही है. जैसे ही यह संतुलन भंग होता है पुलिस, प्रशासन, कोर्ट और सरकार ही नहीं. मीडिया भी मजदूर और स्थानीय निवासियों के खिलाफ उतर जाता है.

मारुति सुजुकी

‘जब जापानी और यूरोपियन कंपनियों ने भारत में आना शुरू किया तब उनका स्वागत सभी ने किया क्योंकि वे मजदूरों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए जाने जाते थे. इसमें काम के घंटे, चाय लंच और रिफ्रेशमेंट के लिए अच्छा समय मिलता था. लेकिन आज ये चीन के उदाहरण का अनुसरण कर रहे हैं और लंच और चाय के लिए 5 से 7 मिनट का ही समय दे रहे हैं. (इंडियन एक्सप्रेस, 13 फरवरी 2012, दिल्ली).

‘मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के मजदूरों को कारखाने में तानाशाह माहौल में हर 50 सेकेंड में एक कार तैयार करनी होती है. यहां के हालात चार्ली चैपलिन की प्रख्यात फिल्म मॉडर्न टाइम्स के उच्च तकनीकी उत्पादन के दमनकारी हालात से मेल खाते हैं. इस कंपनी के मजदूर आठ घंटे का कठिन काम करते हैं इस दौरान टॉयलेट के लिए साढ़े सात मिनट के दो ब्रेक और 30 मिनट का लंच ब्रेक मिलता है. कैंटीन और टॉयलेट दोनों ही आधे किलोमीटर दूर हैं. (‘ए जस्ट डील’, प्रफुल्ल बिदवई, फ्रंटलाइन, 11-24 अगस्त 2012).

मारुति सुजुकी में चल रहे मजदूरों के संघर्ष को अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूरों के हालात के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. मसलन, सालाना औद्योगिक सर्वे द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक ऑटो क्षेत्र में 2000-01 से 2009-10 के बीच वास्तविक वेतन में 18.90 फीसद की गिरावट दर्ज की गई जबकि इसी समयावधि में कुल मूल्य योग प्रति मजदूर 2.90 लाख रुपए से बढ़कर 7.90 लाख रुपए हो गया. कुल मूल्य योग में वेतन की हिस्सेदारी उपरोक्त समयावधि में ही 27.40 फीसद से घटकर 15.40 फीसद हो गई. यहां कुल अतिरिक्त मूल्य में काम की समयावधि एक अनिवार्य हिस्सा है. उच्च तकनीक, समय प्रबंधन, काम के घंटे का विस्तार और वेतन पर नियंत्रण ऐसे साधन हैं जिनके माध्यम से मुनाफे की दर को बढ़ाया जा सकता है. ऑटो इंडस्ट्रीज में उत्पादन के लिए मजदूरों के प्रबंधन में फ्रेडरिक टेलर ‘वैज्ञानिक प्रबंधन’ की व्यवस्था लेकर आया. इसे फोर्ड ने कारों के उत्पादन में लागू किया. मार्शल प्लान लागू करने के दौरान इस वैज्ञानिक प्रबंधन में ट्रेड यूनियनों को भी शामिल कर लिया गया. अमरीका समर्थित ब्रिटिश ट्रेड यूनियन कांग्रेस द्वारा मार्शल प्लान के संदर्भ में ‘ट्रेड यूनियन एंड प्रोडक्टीविटी’ शीर्षक पर्चे में लिखा: ‘जहां प्रबंधक उन्नत सोच रखते हैं और उत्पादन को बढ़ाने में ‘वैज्ञानिक प्रबंधन’ की तकनीक का तार्किक तरीके से प्रयोग कर रहे हैं, वहां यूनियन को मिलाकर चलना चाहिए.’ एंथनी कारेव ने अपनी पुस्तक (लेबर अंडर द मार्शल प्लान, पेज 152) के इस हवाले के बाद उसी पेज पर लिखा: ‘नियोक्ताओं के लिए अनिवार्य नहीं था कि वे अपने श्रमिकों से बात करें ही़ ट्रेड यूनियनों को प्रोत्साहित किया गया कि वे वैज्ञानिक प्रबंधन को शुरू करने के लिए दबाव बनाएं. इसके आने वाले नतीजों को ध्यान में रखे बिना ही वे इस काम को करें.’ अमरीकन फेडेरेशन ऑफ लेबर से लेकर मार्शल प्लॉन को जमीन पर उतारने वाली इकोनॉमिक कोऑपरेशन एजेंसी ने प्रबंधन के काम पर काफी जोर दिया.

भारत में यह टेलरिज्म, फोर्डिज्म और वैज्ञानिक प्रबंधन साम्राज्यवादियों की पूंजी के आग्रह के साथ आया. यहां यूनियनों को ‘ट्रेन’ करने की जरूरत नहीं थी. यूनियनें ‘राष्ट्रीय हित’ के लिए मजदूरों में ‘अराजकतावाद’ को रोकने की राजनीति को अपनी पार्टियों के माध्यम से सीख चुकी थीं. 1980 के बाद साम्राज्यवादी पूंजी की नई आमद ‘अच्छे, तेज और सस्ते’ उत्पादन के नारे के साथ हुई. यूनियनों के शीर्ष नेताओं की समझदारी में ‘विकास’ के लिए यह जरूरी था. ऐसे में ‘अराजकतावादी’ मजदूरों के लिए जरूरी था कि वे गुड कंडक्ट का पालन करें. इसमें यूनियन या संगठन न बनाने की शर्त अंतर्निहित थी. इसके साथ मजदूरों के ‘गार्जियन’ होने की यहां के प्रबंधकों की दावेदारी भी शामिल हो गई. ओढ़ी गई इस जिम्मेदारी का मकसद था पूंजी और श्रम के बीच होने वाले विवादों को ‘पारिवारिक मसला’ मानकर व्यक्तिगत तौर पर हल करने की दावेदारी करना और यूनियन का प्रतिस्थापन पेश करना. यह मजदूरों पर अतिरिक्त दबाव बनाने वाले (दु)र्व्यवहारों को सहनीय बनाने का भी एक तरीका था. ‘विकास’ के इस नए पैटर्न में उद्योगिक संरचना, योजना और भौगोलिक अवस्थिति और सामाजिक आर्थिक व्यवस्था का चुनाव मजदूरों को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हो गया. इसे हम मारुति के मजदूरों के संघर्ष में देख सकते हैं.

मानेसर में 18 जुलाई 2012 की घटना (जिसमें एक प्रबंधक की मौत हुई और 36 अन्य प्रबंधक घायल हुए थे) मजदूरों के संघर्ष का न तो चरम क्षण था और न ही इस संघर्ष का अंत़ यह पिछले एक साल से मजदूरों के खिलाफ प्रबंधन, सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही धोखाधड़ी, दमन और शोषण के खिलाफ एक प्रतिकार है. अपने साथी मजदूर के खिलाफ एक सुपरवाइजर द्वारा जाति सूचक गाली का प्रयोग दमन के खिलाफ इकट्ठा होते गुस्से के फूट पड़ने का एक कारण बन गया. दो शिफ्ट के मजदूरों ने गेट पर इकट्ठा होकर इसका विरोध करने का निर्णय लिया. मजदूरों के इस निर्णय के खिलाफ प्रबंधक ने आक्रामक रवैया अपनाया और बाउंसरों और सुपरवाइजरों से हमला करवाया. इसके बाद मजदूरों ने अपनी कार्रवाई की़ यह कार्रवाई ‘हिंसा’ में बदल गई और यह मीडिया की सुर्खियों में एक बड़ी ‘दुर्घटना’ और ‘साजिश’ के तौर पर चित्रित की जाने लगी. पूंजीपतियों और राज्य और केंद्र सरकार के लिए ‘निवेश’ का माहौल बिगड़ने लगा़ इन्हें मजदूरों के संघर्ष में ‘माओवादी’ षड्यंत्र दिखने लगा और इस छानबीन के लिए सरकार ने एक कमिटी का गठन भी कर दिया.  इस घटना में मुकदमा दर्ज कर 145 मजदूरों को जेल में डाल दिया गया है और 66 मजदूरों पर गैरजमानती वारंट जारी किया गया. प्रबंधकों द्वारा योजनाबद्घ तरीके से बाउंसरों के द्वारा मजदूरों पर कराया गया हमला और पुलिस प्रशासन के गठजोड़ से ढाया जा रहा दमन मजदूरों के हालात को और भी असहनीय बनाने का ही सिलसिला है. इस सिलसिले के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष अब भी जारी है. बहुत सारी बाधाओं के बावजूद यह संघर्ष गुड़गांव में एक व्यापक रूप लेने के लिए प्रयासरत है.

मारुति के मजदूरों ने वेतन रीविजन, यूनियन की मान्यता, अनियमित मजदूरों को नियमित करने जैसे मुद्दों को लेकर अपनी मांग को प्रबंधकों के सामने रखना शुरू किया. प्रबंधकों ने मजदूरों की मांग मानने के बजाय उनकी छंटनी का रास्ता अख्तियार किया. इसके खिलाफ मजदूरों ने जून के महीने में कारखाने को अपने कब्जे में ले लिया. सुपरवाइजर और प्रबंधकों की अपमानजनक भाषा और बदसलूकी, ठेका मजदूरों से मनमाना काम, अप्रेंटिस और ट्रेनी मजदूरों को नियमित कर देने के झांसे में लंबे समय से कम भुगतान के जरिए शोषण के खिलाफ मजदूरों की एकजुटता एक शानदार उदाहरण बन कर सामने आई. जून 2011 से अक्टूबर 2011 के बीच मजदूरों ने कुल 60 दिन तक काम को ठप कर दिया. शुरू के 20 दिनों तक मजदूरों ने कारखाने को अपने कब्जे में रखा. इस बीच हरियाणा सरकार ने मजदूरों की हड़ताल को अवैध घोषित कर दिया और प्रबंधकों ने बाउंसरों का इस्तेमाल किया. आसपास के 51 गांव के सरपंचों ने मिलकर इस आंदोलन के खिलाफ महापंचायत किया. इस संघर्ष में 15 कारखानों ने अपना टूल डाउन कर पूंजीपतियों और प्रशासन को चेतावनी दी.

मजदूरों के साथ प्रबंधकों ने समझौते में मजदूर प्रतिनिधियों को मान लिया. लेकिन यूनियन की मान्यता, लंबे समय से काम करने वाले मजदूरों की नौकरी नियमित करने और कार्यस्थल पर व्यवहारगत समस्याओं को हल करने का मुद्दा वैसे ही बना रहा़ मारुति की एक अन्य शाखा की यूनियन पर प्रबंधन का कब्जा था. सालों से वहां चुनाव ही नहीं हुआ था. इस यूनियन को प्रबंधन मानेसर में मान्यता देने के लिए तैयार था. समझौते का तीसरा बिंदु यह था कि ‘दोनों पक्षों ने यह भी तय किया था कि हड़ताल के कारण वेतन अदायगी अधिनियम 1936 के तहत और कंपनी के स्थाई आदेशों के अनुसार हर दिन की अनुपस्थिति के एवज में जुर्माने के तौर पर तीन दिनों के वेतन की कटौती की जाएगी़ यह भी तय हुआ कि फिलहाल हर दिन की अनुपस्थिति के लिए एक दिन का वेतन जुर्माने के तौर पर काटा जाएगा़ यदि सभी कामगार भविष्य में अच्छे आचरण, व्यवहार और कंपनी के अनुशासन का पालन नहीं करते तो बाकी दो दिनों का वेतन भी जुर्माने के तौर पर काटा जाएगा’ (औद्योगिक अधिनियम 1947 की धारा 12-3 के तहत 16 जून को श्रमायुक्त की उपस्थिति में हुआ समझौता).

इस समझौते के तुरंत बाद गुड कंडक्ड बांड की शर्त कारखाना गेट पर चिपका दी गई. यह कारखाना द्वारा किया गया लॉकआउट था. करीब चार महीने बाद श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में बताया कि ‘गुड कंडक्ट बांड अवैधानिक व्यवस्था है.’ इस दौरान हरियाणा सरकार और  श्रम विभाग इसे कंपनी का अधिकार क्षेत्र और वैध घोषित किए हुए था. अगस्त-सितंबर में 32 दिन के लॉकआउट के बाद भी बांड की शर्त बनी रही़ प्रबंधन अपनी मनमानी करता रहा. 1200 मजदूरों को निकाल बाहर किया और अन्य को बाहर करने का बहाना ढूंढ़ता रहा. गाली गलौज की. उनके स्टेशन को बदला. इस 32 दिन के लॉकआउट के एवज में कारखाना प्रबंधकों ने 64 दिन मुफ्त काम कराने की शर्त पर मजदूरों को अंदर आने दिया. इसे ही द इकोनॉमिस्ट  ने ‘ट्रबल्ड गुड़गांव’ (समस्याग्रस्त गुड़गांव) घोषित किया. हरियाणा सरकार ‘निवेश के लिए बिगड़ रहे हालात को हर हाल में ठीक करने के लिए जरूरी और कड़े कदम उठाने का’ भरोसा पूंजीपतियों को देने लगी.

अक्टूबर 2011 में मारुति के मजदूरों ने कारखाने को कब्जे में ले लिया. गुड़गांव के अन्य कारखाने के मजदूरों ने भी इस आंदोलन का खुलकर समर्थन किया. पुलिस, अर्धसेना और बाउंसरों का प्रयोग मजदूरों को कारखाना से निकाल बाहर करने के लिए किया गया. इस दौरान मजदूरों पर दबाव बनाने के लिए ठेकेदारों और पंचायतों का लगातार इस्तेमाल किया गया. हर छुट्टी पर 1200 से 1600 और तीन छुट्टी पर 5200 रुपए की कटौती करने वाले प्रबंधन, जापान के शेयर धारकों और कंपनी के मालिक तक से मारुति सुजुकी इंप्लाइज यूनियन के पदाधिकारियों की वीडियो कांफ्रेंसिंग कराई गई.  आखिरकार अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार इन पदाधिकारियों और कमेटी सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ का पैसा लेकर कारखाने से बाहर हो गया. प्रबंधकों की इस चाल और घात को मजदूरों ने धता बता दिया. ‘30 जनवरी 2012 को यूनियन का गठन और रजिस्ट्रेशन हो गया. प्रबंधकों ने शर्त रखी थी कि बाहरी यूनियनों से संपर्क न रखा जाए. अपनी गोपनीयता बनाए रखने और अन्य यूनियनों से संपर्क न बनाए रखने की शर्त को पूरा करने के चक्कर में मजदूर काफी नाराज थे. मारुति सुजुकी मजदूर यूनियन ने ठेका प्रथा खत्म करने की मांग की थी. लेकिन प्रबंधकों ने ठेका और ट्रेनी के बारे में बात करने से मना कर दिया. इस बीच मजदूरों पर अभद्रता करने का आरोप लगाया. मानेसर इकाई में एक हजार स्थाई और दो हजार अस्थाई मजदूर हैं. ‘मजदूरों की असली और लड़ाकू यूनियन पूंजीपति वर्ग के लिए काफी परेशानी की बात है. ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बेरोकटोक हासिल करने के लिए यह जरूरी है कि मजदूर पूर्णतया पूंजीपति के नियंत्रण में हों. वह उससे जो चाहे, जैसा चाहे करवा सके़ एक अकेला मजदूर पूंजीपति के सामने इसी असहाय स्थिति में रहता है. लेकिन यही अकेला मजदूर जब अपने कारखाने के बाकी मजदूरों के साथ एकताबद्घ हो जाता है तो स्थिति बदल जाती है’ (नागरिक, अंक, 1-15 अगस्त 2012).

प्रबंधक और यूनियन के बीच तनाव आर सी भागर्व के शब्दों में ‘वर्ग संघर्ष’ का रूप लेता गया. इस बीच यूनियन के पदाधिकारियों के चुनाव के अतिरिक्त इस पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए मजदूरों ने अनौपचारिक मजदूर कमिटी का गठन किया. मारुति के प्रबंधक न तो कार्यस्थल पर मजदूरों के साथ व्यवहार में तब्दीली करने को तैयार थे और न ही उनकी मांगों को मानने के लिए अपने रुख में बदलाव कर रहे थे. उन्होंने यूनियन में घुसपैठ के लिए एक बार फिर कोशिश की. मारुति सुजुकी प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन आर सी भार्गव ने कहा: ‘मजदूरों को लगातार प्रशिक्षण दिया जाता तो काम, कंपनी और इसके प्रबंधन के प्रति उसके व्यवहार में बदलाव दिखता... हम उनके (जापानियों के) तर्क को समझ सकते हैं और इसलिए पुराने तरह की संस्कृति को पूरी तरह बदल देना चाहते हैं. इस तरह हम मजदूरों, यूनियन और प्रबंधन के बीच के रिश्ते को आपसी लाभ के रिश्ते में बदल देना चाहते हैं’ (प्रत्यूष चंद्रा, रेडिकल नोट्स,12 सितंबर 2011, द मारुति स्टोरी). मजदूरों द्वारा अपने ऊपर बाउंसरों, प्रबंधकों और सरकार प्रशासन द्वारा किए जा रहे लगातार उत्पीड़न का विरोध जब उन्हीं की हिंसक भाषा में बदला तब सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियां ही नहीं गुड़गांव, मानेसर, धारूहेड़ा तक इंटिग्रेटेड इंडस्ट्रीयल एरिया में टापुओं की तरह बसे गांव की पंचायतें तक मजदूरों के खिलाफ खड़ी हो गईं. ‘तेईस जुलाई को सभी बड़ी पार्टियों से जुड़े स्थानीय नेता मारुति सुजुकी कारखाने में मजदूर यूनियन को बलपूर्वक दबाने और किसी भी तरह कारखाने को चलाने का निर्णय लेने वाली खाप पंचायत में शामिल हुए (आनंद तेलतुंबडे, ईपीडब्ल्यू, 25 अगस्त 2012). ‘ज्वाइंट पुलिस कमीश्नर, गुड़गांव अनिल कुमार ने बताया कि ‘पंचायत पदाधिकारी हमसे मिले और कंपनी के साथ अपनी एकता को जाहिर किया. उन्होंने कहा कि वे दोषियों को दंडित करने में प्रशासन के साथ हैं’ (इंडियन एक्सप्रेस, मानेसर, 21 जुलाई 2012, दिल्ली).

उधर मजदूरों ने प्रशासन और प्रबंधन के उत्पीड़न के खिलाफ 7 और 8 नवंबर 2012 को भूख हड़ताल की़ दिल्ली और अन्य प्रदेशों में काम करने वाले यूनियनों और छात्र संगठनों ने इस आंदोलन में भागीदारी कर मजदूरों के साथ मिलकर पुलिस और प्रशासन के दमन के खिलाफ गुड़गांव में रैली निकाली. पहली बार सीटू की गुड़गांव इकाई ने खुलेआम ‘बाहरी संगठनों’ के हस्तक्षेप के खिलाफ बयान दिया. उन्होंने दावा किया कि यह ‘हमारा मसला’ है. यह मजदूर वर्ग के संघर्ष को विभाजित करने की एक ऐसी नीति है जिसका इस्तेमाल मजदूर आंदोलन के इतिहास में होता रहा है. बहरहाल, मजदूरों के समर्थन में उनके परिवार के लोगों ने एकजुट होकर सरकार की दमन की नीति का विरोध दर्ज करा कर इस आंदोलन को और व्यापक रूप देने का प्रयास किया है. यह इस आंदोलन की एक उपलब्धि है. शहर के आंदोलन का गांव तक पहुंचना और उनका एकजुट होने का प्रयास भारतीय मजदूर आंदोलन के लिए एक दिशा सूचक की तरह काम करेगा.

ओरिएंट क्राफ्ट

भारत में उत्पादन की एक ऐसी अनौपचारिक व्यवस्था पिछले कोई बीस सालों में विकसित हुई है जिसकी साख अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है लेकिन वहां काम कर रहे मजदूरों को मजदूर का दर्जा भी हासिल नहीं हो पाता है. न्यूनतम वेतन मिलना तो दूर की बात है. मजदूरों का यूनियन निर्माण एक असंभव सी बात लगती है.

गुड़गांव में ही ओरिएंट क्राफ्ट के कुल 21 कारखानों में 25 हजार से ज्यादा मजदूर काम करते हैं. किसी भी कारखाने में मजदूरों की यूनियन नहीं है. अंतर्राष्ट्रीय साख वाले इस कारखाने में काम करने वाले मजदूरों को कपड़े की सिलाई पर 55 पैसे प्रति पीस हासिल होता है: ‘मुझे सिलाई के प्रति पीस पर 55 पैसे मिलते हैं. मैं आमतौर पर रोजाना 400 पीस बनाता हूं. इससे लगभग 200 रुपए मिल जाते हैं. मैं हर महीने 6000 से 7000 रुपए कमा लेता हूं (इंडियन एक्सप्रेस, 21 मार्च  2012, दिल्ली).

इस कारखाने में नियमित मजदूरों की एक संख्या कंपनी के रजिस्टर पर दर्ज होती है. लेकिन उसका अस्तित्व वस्तुत: श्रम विभाग को दिखाने के लिए ही होता है. वास्तविकता यही है कि ठेकेदारों के माध्यम से ही मजदूर नियुक्ति और पारिश्रमिक पाते हैं. इसके बदले में उनकी कमाई का एक हिस्सा कट जाता है. ठेका और अनियमित मजदूरों को 10 से 12 घंटे कारखाने में रहना अनिवार्य है. आर्डर बढ़ जाने पर 15 से 16 घंटे काम का दबाव भी होता है. ठेकेदार द्वारा काम पर कभी भी बुला लिया जाता है. इस अतिरिक्त दबाव और काम के लिए प्रति पीस के तय रेट पर ही काम करना होता है. इसमें काम करने वाले सुपरवाइजर काम की गुणवत्ता की परख करते हुए कुल निर्माण का 20 से 30 फीसद बेकार घोषित कर देते हैं. हेल्पर, कारीगर और फिनिशर की हर महीने औसत कमाई क्रमश: 4200-4500, 5200-5500 और 7000-7200 रुपए है. दसियों साल से काम करने वाले मजदूरों को भी न तो नियमित किया जाता है और न ही उनका रजिस्टर मेंटेन होता है.

गुड़गांव में मजदूरों से बात करने पर उन्होंने बताया कि बहुत सारे कारखानों के मालिक एक निश्चित समय बाद उसे नए नाम से पंजीकृत करा कर श्रम कानूनों से बच निकलते हैं. ठेकेदार, सुपरवाइजर, प्रबंधक, मालिक, प्रशासन और श्रम विभाग के ताने बाने में गारमेंट कारखानों के फैले जाल में मजदूर ‘गुलाम’ जैसा जीवन जीने के लिए मजबूर होते हैं.

तिरूपुर मॉडल

तिरूपुर में मालिकों और प्रबंधकों ने कारखानों में काम कराने का नायाब नुस्खा ईजाद किया है. उन्होंने मंहगाई और आर्थिक तबाही झेल रहे गांवों और कस्बों के लोगों को समाज में व्याप्त एक आम बुराई दहेज के भुगतान के लिए ‘सुमंगली योजना’ की ओर खींचा़ इसके तहत लड़की को उक्त कारखाने में पांच से सात साल तक काम करना होता है. उसे उस कारखाने के पास ही बने हॉस्टल में रहना होता है. लड़की को कारखाना और हॉस्टल के अलावा और कहीं भी जाने या किसी से मिलने की मनाही होती है. वह साल भर में एक या दो बार अपने घर जा सकती है और उसके चंद चुने हुए अभिभावक ही उससे मिलने आ सकते हैं.

‘डॉलर सिटी’ और ‘निटवियर राजधानी’ के नाम से जाने जाने वाले तिरूपुर में 2009 और  2010 में 1050 से ज्यादा आत्महत्याएं हुईं. 2010 में 1200 करोड़ रुपए का निर्यात करने वाले इस शहर की कुली लेबर कैंप की व्यवस्था में काम करने वाली इन लड़कियों को सालों काम करने (जितने समय का बांड है) के बाद उस समय तय किया हुआ रुपया दे दिया जाता है. यहां न तो प्रतिदिन का मसला है और न ही काम की समयावधि नापने का झंझट. 14 से 25 साल की बच्चियों को आमतौर पर तीन साल काम कराने के बाद 30,000 से 50,000 हजार रुपए दिए जाते हैं. इसका इस्तेमाल दहेज में होता है. द इकोनॉमिक टाइम्स (11 अक्टूबर 2012) के अनुसार ‘महीने की आय 900-3500 रुपए बैठती है.’ आम तौर पर यहां काम करने वाली लड़कियां दलित परिवारों से आती हैं. यूनियन बनाने का सवाल ही नहीं बनता. एजेंटों के माध्यम से गांव से बच्चियों को कारखाने तक लाने और काम कराने के दौरान निकाल बाहर करने, अभिभावक से शिकायत करने जैसे हथकंडे अपनाकर मालिक प्रबंधक लड़कियों पर काम का लगातार दबाव बनाए रखते हैं. 16 से 18 घंटे काम लेना सामान्य बात है. स्थिति और भी भयावह हो जाती है जब मालिक, गार्ड, प्रबंधक और एजेंट इनका शारीरिक शोषण करने लगते हैं. बहुत कम ही रिपोर्ट दर्ज हो पाता है. इस उत्पादन की व्यवस्था में कारखाना से होस्टल के बीच लड़कियों को ले जाने का काम प्रबंधक ही गाड़ियों से करते हैं. ऐसे में बाहरी हस्तक्षेप और वास्तविक स्थिति की जानकारी हासिल कर पाना एक मुश्किल काम हो जाता है. मनमाने काम और शोषण के खिलाफ विरोध का खामियाजा कई बार नौकरी से निकालने के तौर पर मिलता है. अगर भरे गए बांड की अवधि पूरी नहीं हुई हो तो तय रकम के भुगतान को रोक लिया जाता है. आत्महत्याओं के इस शहर में इस गुलाम व्यवस्था से मिलने वाले डॉलर के लिए भारत सरकार यहां के पूंजीपतियों को अलग से सब्सिडी देती है.

मेघालय की कोयला खदानें

हजारों करोड़ रुपए के गबन से लदा कोयला उद्योग कुटीर उद्योग जैसा फैला हुआ है. अत्याधुनिक कोयला खदानों से लेकर खुले खदानों की श्रृंखला में मजदूर का जीवन सबसे असुरक्षित क्षेत्र है. मेघालय में एक कोयला खदान के हाल को इंडियन एक्सप्रेस, (दिल्ली) ने 4 नवंबर 2012 को इस तरह बयान किया: ‘80 सालों से चल रहे कोयला और पत्थर खुदाई जैसे खदान के काम को अक्टूबर 2012 में मेघालय खनिज नीति 2010 के तहत लाया गया. मेघालय सरकार की खदान नीति का हनन होने के चलते कोर्ट ने उस पर 50, 000 हजार रुपए का जुर्माना लगाया. अंधाधुंध चल रहे खदानों को नियमित करने के लिए कोर्ट ने इसके बाद 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया.’ अरबों खरबों के धंधों में यह रकम दांत में फंसा तिनका भी नहीं है. जहां 2010 तक खदान संबंधी कोई नीति न हो वहां श्रम अधिकारों के हालात का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है.

कोयला और पत्थर खुदाई मेघालय की सबसे बड़ी इंडस्ट्री है. कोयला खदान मजदूरों में सबसे कम उम्र का बच्चा पांच साल का था. आमतौर पर ये 12 से 18 साल के होते हैं. मेघालय में फैले जइंता पहाड़ी में इस तरह की एक लाख खदानें हैं. इंपल्स एशिया रिपोर्ट के अनुसार इन खदानों में काम कर रहे ’43.50 फीसद बच्चे 14 साल या उससे कम उम्र के हैं. असम, बांग्लादेश, नागालैंड, पश्चिम बंगाल और नेपाल से आने वाले खदान मजदूरों में बच्चों की संख्या काफी होती है. लाद्रीम्बाई के बेहद अंधेरे 70 फीट गहरे खदानों में कई बार ‘सजा’ के तौर पर और कई बार दुर्घटना से बच्चे दब कर मर जाते हैं. बाद में इनके कंकाल मिलते हैं.’

खुले बाजार में 2500 से 7500 रुपए प्रति टन कोयला कहीं भी बेचने वाले मालिक खदान खुदाई का काम ठेका के माध्यम से कराते हैं. इन खदानों में लगभग 70,000 बच्चे औसतन 12 घंटे काम कर रहे हैं. इसी तरह शहरों में घरेलू काम करने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से बढ़ी है. यह सारा काम ठेका और ‘ट्रैफिकिंग’ के जरिए होता है. चौबीसों घंटे के इस काम में महिलाएं दास सेवक की तरह रहती हैं.

भवन निर्माण क्षेत्र

आउटसोर्सिंग का एक विशाल बाजार 1990 के बाद के बदलाव की देन है. इसमें विदेशी, खासकर अमरीकी और यूरोपीय देशों के लिए उन्हीं की भाषा में उनकी समस्याओं का निदान करना होता है. कंपनियों का जिस तरह का काम होता है उसी तरह की विशिष्ट जानकारी वाले युवाओं की जरूरत होती है. इस आउटसोर्सिंग के कई संस्तर हैं. इसके सबसे निचले पायदान पर वह युवा वर्ग होता है जो 12 घंटे की शिफ्ट में काम करता है.
शहर में सबसे तेजी से बढ़ने वाला एक और क्षेत्र है भवन निर्माण का जहां लाखों मजदूर खतरनाक हालात में काम कर रहे होते हैं. यहां भी ठेका के कई संस्तर हैं जिसके निचले पायदान पर मजदूर है. मौत और घायल होना एक आम बात है. जीवन की सुरक्षा और मौत के बाद शरीर हासिल करने की पेचिदगी के बीच काम कर रहे प्रवासी मजदूरों में असुरक्षा का बोध लगातार बना रहता है. 2012 में ही एक मजदूर के घायल होने पर इलाज कराने के बजाय ठेकेदारों द्वारा उसे ‘मर जाने देने’ और ‘लाश गायब करने’ की आशंका में मजदूरों का गुस्सा गुड़गांव में फूट पड़ा और ठेकेदार के ऑफिस और पुलिस के वैन को जला दिया गया. इन क्षेत्रों में काम के हालात में मजदूरों का यूनियन या संगठन बनना एक चुनौती की तरह सामने आया है जबकि इनकी बदौलत साम्राज्यवादी उदारीकरण का चेहरा सबसे अधिक ‘चमकता’ दिख रहा है.

आर्थिक ‘सुधारों’ और वैश्वीकरण ने भारत की अर्थव्यवस्था पर जिस तरह की जकड़बंदी की है उसका सबसे अधिक शिकार गांव में दलित, भूमिहीन खेत मजदूर, छोटे और मध्यम किसान और शहर में जीविका की तलाश कर रहे प्रवासी मजदूर और कारखानों और विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले मजदूर हैं.

कारखानों और अन्य संस्थाओं में काम का सबसे घिनौना रूप ठेका मजदूरी पर बढ़ता जोर है. 1993-94 से 2009-10 के बीच संगठित कारखाना क्षेत्र में ठेका मजदूरों में लगभग 33 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई. यह सरकारी आंकड़ा है. आमतौर पर कारखाना मालिक जिन्हें नियमित घोषित करते हैं वे बस कागजों में दर्ज होते हैं. उत्तराखंड के रूद्रपुर जिले में ठेकेदारों ने वहां के बड़े कारखानों के लिए मजदूर उपलब्ध कराने के लिए अपनी अपनी कंपनियों के बोर्ड लगा रखे हैं. मजदूर काम के लिए इनके यहां भर्ती होता है. लेकिन काम की जगह बड़े कारखाने होते हैं. मजदूर कार्यस्थल पर ठेकेदार की कंपनी को जानता है जबकि सारा उत्पादन वह बड़ी पूंजी के देशी विदेशी मालिकों के लिए करता होता है. ठेका पर काम करने वाले मजदूरों की एक बड़ी संख्या मौसम के आधार पर रोजगार लेती है. नियमित और ठेका मजदूरों के बीच विभाजन में एक बड़ा कारण यह भी होता है जिसका फायदा प्रबंधक मजदूरों की एकता तोड़ने में करता है. इन ठेका मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा खुद को मजदूर मानने से ही इन्कार करता है. पूंजी और मजदूर के बीच मध्यर्वितयों में सूदखोर भी इस ठेका मजदूर प्रथा में शामिल हैं.

गांव से शहर की ओर के प्रवास और शहर में कारखानों में काम और रिहाइश में न तो इन ठेकेदारों पर कोई नियंत्रण है और न ही कारखाना या कार्यस्थल पर मजदूरों के जीवन और वेतन की सुरक्षा की गारंटी़
मजदूरों के न्यूनतम कानूनी अधिकार भी देश के ‘विकास’ की भेंट चढ़ा दिए गए हैं. सरकार की नीतियों का विरोध ‘देशद्रोह’ के दायरे में आने लगा है. देश के विकास के चुने गए इस पैटर्न में रियल इस्टेट, वित्तीय कारोबार, निर्यात आधारित उद्योग, सट्टा और कालाबाजार और भ्रष्टाचार का खूब बोलबाला है. इनके मुनाफे का आधार हैं मजदूर जिसके पास श्रम है. आदिवासी और किसान हैं जिनके पास जमीन है. भूमिहीन किसान और खेतिहर मजदूर हैं जिनके पास परंपरागत कुशलता और जीविका के चंद साधन हैं. निम्न मध्य और मध्य वर्ग के लोग हैं जिनकी बचत का एक एक पाई बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों में जमा होता है. यही वह आम लोग हैं जिन्हें जरूरी भोजन के अंतिम हाशिए की ओर धकेलते हुए सत्ताधारी वर्ग अपना मुनाफा और संपत्ति बढ़ाने में लगा हुआ है.

(इस व्याख्यान का बाकी हिस्सा यहां पढ़ें)

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ ‘सरपट’ विकास के दौर में श्रमिक: प्रधान हरिशंकर व्याख्यानमाला-I ”

  2. By Jaya Karki on April 14, 2014 at 1:49 PM

    Harishankar ji ko bahut bahut sukriya. Bharatiye majdur aandolan ke barema bahut kuchha ham Nepali majduron ke liye malum ho gaya hai.Hamari halat bhi Bharatiya majdurka jaisa hi hai.

  3. By Jaya Karki on April 14, 2014 at 1:49 PM

    Harishankar ji ko bahut bahut sukriya. Bharatiye majdur aandolan ke barema bahut kuchha ham Nepali majduron ke liye malum ho gaya hai.Hamari halat bhi Bharatiya majdurka jaisa hi hai.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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