हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अफजल को फांसी: कुछ कविताएं

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/17/2013 06:24:00 PM

सूरज के लिए

वरवर राव

ओ दुश्मन
एक खुशनुमा सुबह की उनींदी घड़ियों में
उन हाथों को पीछे बांधने के बाद,
जो सूरज के लिए लड़े थे
उन आंखों पर पट्टियां बांधने के बाद
जिन्होंने सूरज की राह देखी थी
उस गले में फंदा डालने के बाद
जिसने सूरज की बात की थी
जब तुम पीछे मुड़े
तो तुम्हें मिला खून की तरह लाल आसमान
जिसकी सुर्ख गोद में
अभी अभी किसी की आंखें खुली थीं.

तुम्हारी आंखें

बनोज्योत्सना लाहिड़ी


अपनी सारी नफरत, गुस्से, हिकारत और खौफ के बावजूद
कितने बेबस थे वे

तुम्हारी शांत आंखों के आगे
मीडिया की चकाचौंध और पुलिस के रिकॉर्डों के बावजूद
सुकून से महरूम वे दसियों लाख लोग


तुम चुपचाप देखते रहे
सारे शोरशराबे से मजबूत थी तुम्हारी यह चुप्पी
उन्होंने पहनाया तुम्हारे चेहरे पर एक काला नकाब
लेकिन अफजल, क्या खुद उनके आंखों पर नहीं बंधी थी पट्टियां?

और इसलिए मैं पीछे हट रही हूं
क्योंकि हम उन शांत आंखों में देखने के काबिल नहीं हो पाएंगे कभी
जो काले नकाब के पीछे से देखे जा रही हैं हमारी तरफ
कब्र के भीतर से भी...

अफजल, मैंने तैयार की तुम्हारे लिए कब्र
मैंने लगाया तुम्हारे लिए फंदा
मैंने लिखीं बेदाग झूठ से भरी वे कहानियां
रातों को जाग-जाग कर

लेकिन देखो
मेरी सारी कोशिशों के बावजूद
कितने छेद रह गए
कहानियों में, नकाब में, कब्र में
उन कोशिशों में, जो लोकतंत्र को गढ़ने के लिए की गईं
उन सारे छेदों में से
तुम झांक रहे हो
अपनी शांत आंखों से
चुपचाप

और मैं भाग रही हूं
बेचैन और पागल.

हमारे शहीद हमारे परचम हैं

रेयाज

हम अपने शहीदों को
अपना परचम बना लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं
तुम समझते हो कि शहीदों को उनकी कब्रों में कैद किया जा सकता है
इसलिए बिठा देते हो तुम वहां पहरे
हम जानते हैं कि शहीदों को कहां रखना है

तुमने छीन लिया वो जिस्म
जिसे एक दिन बेजान होना था,
वो सांसें, जो एक दिन सर्द पड़ जानी थीं
तुम्हारे फंदे ने रोक दी खून की वो रफ्तार
जिसे ठहर जाना था एक दिन वैसे भी

लेकिन उसका चेहरा
हमारे परचमों की शक्ल में
हमारे गांवों और कस्बों में
हमारी सड़कों और बस्तियों में लहरा रहा है
तुम दफना सकोगे उसे
कैसे दफना सकोगे उसे, मेरे लोकतंत्र

अपने शहीदों को हम
अपने कदमों की रफ्तार देते है
अपनी सांसों में पूरी करते हैं उनकी अधूरी जिंदगियां
वो देखते हैं हमारी आंखों से अपने सपने
हमारे संघर्ष पूरी करते हैं वो दास्तानें
जो हमारे शहीदों से शुरू हुई थीं

हमारी कतारों में शामिल हैं हमारे शहीद
और हमारी रूहों में भरी हुई है उनकी महक
हमारी मिट्टी में भरा है उनका इस्पात

हमारा परचम हमारे शहीदों का चेहरा है
जो हमारे कंधों के ऊपर से
देख रहे हैं अपने लोगों को
आगे बढ़ते हुए

फसलें उग रही हैं
नहरों में पानी बह रहा है
भट्ठियां जल रही हैं
चूल्हों पर खदबदा रहा है भात का पानी
रोटियां सिंक रही हैं तवों पर
दड़बों में मुर्गियां फड़फड़ा रही हैं
नीम पर उड़ान भरती है गौरैया
चाक घूमता है, निहाई आवाज करती है
धूल उड़ती है सड़कों पर

और हमारे शहीद
हमारे परचमों में धड़कते हुए
हमारे पास होते हैं

तुम छीन लोगे उन परचमों को
लेकिन उन पत्तियों को कैसे मिटाओगे
जो पेड़ों पर लगी हैं
उन फसलों को जो खेतों में हमारे पसीने की औलादें हैं
वो पानी कैसे खत्म करोगे, जो नहरों में गाता फिरता है
वो आग जो चूल्हों और भट्टियों में तप रही है
वो धूल जो सड़कों पर उड़ती है हवा के झोंके के साथ

हम जानते हैं
कि अपने शहीदों को कैसे रखना है अपने पास
अपनी विजय तक, और उसे बाद भी.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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