हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

साम्राज्यवादी चेतना का पूरब

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/04/2013 07:38:00 PM



पिछले साल अंग्रेजी में आई पंकज मिश्रा की किताब फ्रॉम रूइन्स ऑफ एंपायर देश और दुनिया में काफी चर्चित रही थी. सत्यम सिंह यहां किताब और लेखक का एक विश्लेषण पेश कर रहे हैं.

पंकज मिश्र की फ्रॉम द रूइन्स ऑफ एम्पायर: द रिवोल्ट अगेंस्ट द वेस्ट ऐन्ड द रीमेकिंग ऑफ द एशिया किताब को इसलिए पढ़ा जाना चाहिए कि इससे ढेर सारी असहमतियों की तरफ हमारा ध्यान जाता है और वर्तमान विश्व व्यवस्था क्रम में ऐतिहासिक ‘वेंटेज प्वाइंट’ से पाठक की नई सहमति बृहद उप-महाद्वीपीय संवेदना की खोज की तरफ बढ़ती है. पुस्तक दो तरह के नामों के साथ आई है. कहा जा रहा है कि अमेरिकी संस्करण में द रिवोल्ट अगेंस्ट द वेस्ट ऐन्ड द रीमेकिंग ऑफ द एशिया की जगह इस पुस्तक का नाम बदलकर फ्रॉम द रूइन्स ऑफ एम्पायर: द इंटलेक्चुअल हू रिमेड द एशिया कर दिया गया है. निश्चित तौर पर पुस्तक को पढ़ते हुए इस छोटे से नाम का अंतरद्वंद्व चलता रहता है. एक ‘परसेप्सन’ पश्चिम के खिलाफ विद्रोह को बताता है तो दूसरा बौद्धिकों द्वारा एशिया की पुनर्निमिति को बताता है. कुछ भी हो तीन सौ अड़सठ (368) पेज और छह अध्यायों में फैली इस किताब की चर्चा काफी हुई है. चर्चा भी ऐसी कि कुछ ने इस किताब को एडवर्ड सईद की मास्टरपीस ओरियंटलिज्म के बाद पहली ‘ओरिजनल’ पुस्तक बताया है. ‘वर्ल्ड पॉलिटी जनरल में अनन्या ने इस किताब के बारे में लिखा है कि जो इतिहास के विद्वज्जनों में नज़रअंदाज कर दिए गए ऐसे शख्सियतों की पुस्तक और अपने ‘नैरेटिव्स’ में ग्राउंड ब्रेकिंग है.’

किताब की सबसे बड़ी खासियत उसके ‘नैरेटिव्स’ की और गहरे शोध व विस्तृत अध्ययन की ही बनती है. द इंडिपेंडेंट ने भी इस पुस्तक के बारे में लगभग यही प्रतिक्रिया दी. ओरहान पामुक इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं- ‘पंकज मिश्रा की ये नई किताब पूरब को पश्चिम से देखने के नजरिए को पलट देती है. साथ ही यह भी दिखाती है कि आधुनिक इतिहास की अधिकांश जनसंख्या, तुर्की स चीन तक उसे महसूस करती है.’ ये आश्चर्य जनक कथाएं आज के गुस्सैल एशियाई लोगों के पुरखों की हैं. सी ऑफ पॉपीज और रिवर ऑफ स्मोक के लेखक अमिताभ घोष इसे बहुत ज्यादा महत्वाकंक्षा वाली किंतु पूरी पढ़ी जाने वाली पुस्तक बताते हैं.

यह बहुचर्चित किताब सचमुच एशिया के इतिहास में गहरे झांकती है और पढ़ते वक्त लगभग दुनिया के सारे बौद्धिकों के नाम याद दिलाती है. इस पुस्तक में अनेक उद्धरणों के साथ उन ऐतिहासिक घटनाओं को जोड़ दिया गया है जो एशियाई विद्वानों को प्रभावित कर रही थीं या फिर जिनसे उनका सीधे सामना हो रहा था. किताब की शुरुआत ही ऐसे दो उद्धरणों से होती है जिनसे स्पष्टतः लेखक के विस्तृत अध्ययन का पता चलता है और इसी के साथ पाठक पुस्तक में प्रवेश भी पा लेते हैं. पहला उद्धरण हेगेल (1820) का है और दूसरा (1969) में रेमंड आरॉ का है. पहले उद्धरण में यह कहा गया है कि ‘चीन का इतिहास विकास नहीं दर्शाता, इसलिए हम इससे और ज्यादा संबंध नहीं रख सकते…क्योंकि चीन और भारत विश्व इतिहास के बाहर के विषय हैं’. दूसरा उद्धरण लगभग इसके विपरीत अर्थ देता है, इसका अर्थ लगभग ऐसा है कि ‘यूरोप अपने खूनी इतिहास से पलायन कर चुका है लेकिन अन्य करोड़ों लोग इसकी तरफ पुनः वापस लौट रहे हैं.’ पंकज मिश्रा मई 1905 के उन दो दिनों की लड़ाई को अपना प्रमुख आधार बनाते हैं जिसमें जापानी एडमिरल ने रूस की सेना को हरा दिया था, जो लगभग आधी पृथ्वी का सफर कर त्सुशिमा स्ट्रेट तक पहुंचे थे. इस घटना का प्रभाव किताब के शुरू से अंत तक और लाजिम तौर पर सभी एशियाई बौद्धिकों पर दिखाया गया.

पहला अध्याय एशिया के अधीनस्थ होने (एशिया सब-ओर्डिनेटेड) की कहानी कहता है, यह नेपोलियन के मिस्र पहुंचने से शुरू होकर उसके दुर्भाग्य की कहानी बताता है. पुनः अंतिम अध्याय ‘एशिया रिमेड’ है, जिसमें अनौपनिवेशीकरण, बौद्धिकों का अनौपनिवेशीकरण और राष्ट्र-राज्य के विजय की बात कही गयी है. इन पहले और अंतिम अर्थात एशिया के अधीनस्थ और पुनर्निर्माण के बीच के अध्यायों में मध्य एशिया से जमाल-अल-दिन अल-अफ़गानी, चीन से लियांग किचॉओ और भारत से रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों और उन पर पड़ रहे प्रभावों, उनकी राजनीतिक स्थितियों और उनकी वैचारिक पक्षधरता के परिस्थितिजन्य संदर्भों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है.

अपनी इस प्रविधि में पुस्तक सचमुच बेहद आकर्षित करती है. बीसवीं सदी के महान इतिहासकार एरिक हॉब्सबाम ने अपनी आत्मकथा इंटेरेस्टिंग टाइम्स में लिखा है कि उनकी आत्मकथा उन्हीं की पुस्तक एज ऑफ एक्स्ट्रीम्स का फ्लैप मात्र है क्योंकि बीसवीं सदी को ठीक से समझने के लिए सबसे सटीक माध्यम यह है कि उस युग के प्रमुख लेखकों, कलाकारों, राजनीतिक नेताओं की जीवनियों और अनुभवों को पढ़ लिया जाए, यह इतिहास के सबसे प्रामाणिक स्रोत की तरह  होते हैं. पंकज मिश्रा ने भी लगभग यही प्रविधि अपनाई है जो इसे बिना रुके पढ़ने का फ्लो देता है किंतु सैद्धांतिक रूप से और अपने विश्व दृष्टि में यह दोषपूर्ण ठहरता है.

किताब से सबसे बड़े आपत्ति यह बनती है कि लेखक जिस एशिया के अधीनस्थ और पुनः उनके बौद्धिकों द्वारा पुनर्रचित किए जाने की बात कह रहे हैं उनके स्वाभिमान और चेतना को जापान द्वारा रूस की सेना को हराए जाने की घटना से निर्मित बता रहे हैं- एक विरोधाभास खड़ा करता है. एक युद्ध से बौद्धिक चेतना और आत्मजागरण की बात, बौद्धिक चेतना ही नहीं सामान्य चेतना की भी विरोधाभासी है. दूसरी असहमति यह कि ज्ञान या बौद्धिकता को खास एशियाई समाज की अस्मिता में परोसा जाना लगभग आज के जटिल और बृहद विस्तार पा चुके उग्र अस्मिताई चेतना से संचालित नजर आता है. भारत, चीन, मिस्र, जापान या फिर दक्षिण एशिया के कई वर्तमान राष्ट्र-राज्यों की जनसंख्या के खिलाफ, जैसा कि मिश्रा स्वयं लिखते हैं, ये सभी योरोप के भिन्न देशों के उपनिवेश थे, अलग इतिहास और संस्कृति का साझा करते थे परन्तु इनमे एक समान बात यह थी कि ये सभी उपनिवेश के दमन को साझा करते थे. इस्ट और वेस्ट में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पूरब की अपनी देशज व्यवस्था में सबकुछ न्याय संगत और शोषणहीन ही था. पश्चिम और पूर्व की इस सम्पूर्ण और एकीकृत धारणा का एक अमानवीय पहलू यह है कि हम किसी भी स्थिति में, कम से कम बौद्धिक चेतना में, यह नहीं कह सकते कि सम्पूर्ण पश्चिम सम्पूर्ण पूर्व को अधीनस्थ कर रहा था. पश्चिम में ही उसके विरोधाभास भी मौजूद थे जैसा कि पूर्व में. दरअसल लेखक की यह थीसिस “इंटलेक्चुअल” शब्द के अर्थ और संदर्भ के विपरीत चली जाती है क्योंकि जिन राष्ट्रवादी चिंतकों को उन्होंने शामिल किया है वे सभी कहीं न कहीं अपने जीवनशैलियों और विचारों में पश्चिम से बेहद प्रभावित थे. अगर लेखक इससे भी असहमत होते हैं तो भी एक तार्किक आधार यह है कि जिस राष्ट्रवाद की लहर में ये नेतृत्व उभरे थे वह बेहद नजदीकी तौर पर उपनिवेशीय दृष्टिकोण का ही परिणाम था. समाजशास्त्री हर्शमन ने ब्रिटिश सेंसस बनाने वाले लोगों की मनोवृत्ति का अध्ययन करते हुए यह बताया है कि तत्कालीन मलेशिया में किस तरह जनगणना के मुताबिक अस्मिताएं बन रही थी. इसके अलाबा थाई इतिहासकार थोक चाई के अध्ययन में हम इसे तलाश सकते हैं कि आज के राष्ट्र-राज्य का नक्शा आने से पहले किस तरह व्यवस्था और अस्मिता की पारंपरिक संरचना लोगों  के दिमाग में होती थी. जिससे वे अपनी अस्मिता निर्मित करते थे. राष्ट्र-राज्य की अस्मिता जितनी देशज और आत्माभिमानी दिखती है उतनी दरअसल है नहीं, वस्तुतः वह उपनिवेशी दिमाग से देखे गए पूर्व की आकृति मात्र है. एडवर्ड सईद के ओरिएंटलिज्म के बराबर प्रचारित इस पुस्तक के लिए ओरिएंटलिज्म से ही एक बिम्ब उठाया जा सकता है, जिसमें सईद पूरबी और पश्चिमी सभ्यताओं में एक बूढ़े का बिम्ब गढ़ते हैं, जिसकी आवाजाही दोनों (पूर्व-पश्चिम) तरफ है और उसे एमिग्रे-सेन्सीबिलिटी का नाम देते हैं.

इस पुस्तक पर सी ऑफ पॉपीज के लेखक अमिताभ घोष की राय चकित करती है. इसी पुस्तक में उन्होंने एक बेहद जटिल और मजबूत चरित्र को गढ़ा है बंगाल का एक हालदार जो आधुनिक ज्ञान और पश्चिम की समानता और बंधुत्व को मानने वाला है किन्तु उसकी अपनी जीवनशैली में इसके सांस्कृतिक द्वंद्व मौजूद मिलते हैं, साम्राज्यवादी शासन की कुटिलता में उसे काला पानी की सज़ा दी जाती है, जहाज के एक छोटे से कमरे में कैदी कई तरह बेपनाह कष्ट में इस व्यक्ति के उत्थान में लगभग डी-क्लास की प्रक्रिया दिखाई देती है. इस लिहाज से पूर्व और पश्चिम का दो अतिरेकी पक्ष इस किताब में मिलता है. पंकज मिश्रा की यह पुस्तक ज्ञान और चेतना द्वारा निर्मित एशिया कम दिखती है बल्कि पूर्व की रोशनी जिसमे बहुत छोटे-छोटे राष्ट्र-राज्य ने अपनी जख़्मी स्मृतियों की पैथोलॉजी की है, को भ्रमित करती है. इसके साथ ही इस पुस्तक पर अन्य आलोचकों ने भ्रमित विश्व-दृष्टि और धार्मिक आग्रहों के आरोप भी लगाए हैं.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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