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बीच सफ़हे की लड़ाई

वर्धा हिंदी विवि में अध्यापक के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न के आरोप

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/27/2013 02:10:00 AM

हालांकि यह रिपोर्ट ज्यादा तथ्यपूर्ण ढंग से और अधिक व्यवस्थित/औपचारिक तरीके से भी लिखी जा सकती थी, और ऐसा होता तो ज्यादा बेहतर होता, लेकिन इसके बावजूद अपने मौजूदा रूप में भी इस रिपोर्ट का प्रकाशित होना जरूरी है. यह वर्धा स्थित इस विवि के भीतर छात्र विरोधी, तानाशाह, गैर लोकतांत्रिक, स्त्री विरोधी, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक प्रशासन के चेहरे को एक बार फिर उजागर करती है. यह कैंपस के और उसके बाहर व्यापक समाज के जनवादी और प्रगतिशील ताकतों की जिम्मेदारी है कि पीड़िता के लिए इंसाफ को सुनिश्चित किया जाए और विवि प्रशासन में ऐसे आमूल बदलाव किए जाएं कि वहां छात्रों और व्यापक जनता के हित में एक जनवादी, लैंगिक न्यायपरस्त, सामाजिक न्याय पर आधारित अकादमिक माहौल कायम हो सके. प्रस्तुत है ई-मेल के जरिए प्राप्त हुई यह रिपोर्ट.
 
हमेशा विवादों में रहनेवाले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में आजकल एक अध्यापक द्वारा एक छात्रा के यौन-उत्पीड़न का मामला दबे मुंह चर्चा में है। साहित्य विभाग के एक युवा असिस्टेंट प्रोफेसर ने स्त्री अध्ययन विभाग की एक छात्रा को पढ़ाने के बहाने अपने घर बुलाकर उसके साथ कई बार शारीरिक छेड़छाड़ की और चुप रहने की धमकी भी दी। यहीं नहीं इस अध्यापक ने अपने प्रभावों का इस्तेमाल करके उस लड़की को एम.ए. कोर्स में फेल भी करा दिया। यह अध्यापक इसी विश्वविद्यालय में साहित्य विभाग का पूर्व छात्र रहा है और छात्र जीवन से ही अपनी लंपटई और कुकर्मों के लिए बदनाम है। सूत्रों की मानें तो इसके पहले भी यह कई लड़कियों के साथ ऐसे कुकृत्य कर चुका है। यह अध्यापक आए दिन लड़कों के हॉस्टल जाकर उनके साथ शराब-सिगरेट पीता हुआ पाया जाता है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह आदमी अपने विभाग में स्त्री-विमर्श का टॉपिक पढ़ाता है। 


भुक्तभोगी लड़की द्वारा शिकायत करने के बाद महिला सेल में अभी इसकी जांच चल रही है। लेकिन पूरे कैंपस को पता है कि विश्वविद्यालय के कुलपति, जो अपने स्त्री-विरोधी और दलित-विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने लगातार पड़ते बाहरी दबाव के बाद महिला सेल को यह निर्देश दिया है कि इस मामले को रफा-दफा कर दिया जाए। महिला सेल की चल रही ढुलमुल जांच-प्रकिया को देखते हुए यह बात सच लग रही है। कैंपस में सबको यह पता है आरोपी अध्यापक कुलपति के सामने जाकर अपनी गलती स्वीकार कर चुका है और पैर पकड़कर माफी भी मांग ली है। लड़की अल्पसंख्यक समुदाय की है और गरीब परिवार से है जबकि आरोपी ब्राह्मण वर्ग से है और इसका श्वसुर इस यूनिवर्सिटी में कर्मचारी रह चुका है। वह भी इस केस को खत्म करवाने के काम में जुटा हुआ है। कुछ लोग पैसे के लेन-देन की बात भी कह रहे हैं। बाकी इस वक्त विश्वविद्यालय के अधिकांश ब्राह्मण प्राध्यापक, कर्मचारी और छात्र आरोपी अध्यापक के समर्थन में खड़े हैं। कुछ प्रगतिशील छात्र-छात्राओं ने लड़की के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है। लेकिन कुलपति या महिला सेल पर उसका कोई असर नहीं है। महिला सेल की अध्यक्षा साहित्य विभाग की हैं और गर्ल्स हॉस्टल की वार्डेन भी हैं। वार्डेन साहिबा केवल लड़कियों को परेशान करने और उनको सताने के लिए जानी जाती हैं। इस कैंपस में लड़कियां पहले से ही सुरक्षित नहीं हैं और इस घटना के बाद उनमें और डर व्याप्त है । आरोपी अध्यापक के खिलाफ जांच जारी है लेकिन वह अभी भी कक्षाएँ ले रहा है, जो कि गैर-कानूनी है।इस बीच वह जांच कमेटी के कुछ सदस्यों के घर जाकर चाय-नाश्ता भी कर चुका है।

इस घटना से आम छात्र-छात्राओं में काफी आक्रोश है। कैम्पस के बाहर भी माहौल गरम है। लेकिन इस विश्वविद्यालय में केवल एक ही कानून चलता है और वह है कुलपति विभूति नारायण राय का और उनकी कृपा आरोपी अध्यापक पर है। सो मामला अब तक ठंडे बस्ते में है।

2010 दिसंबर में भी साहित्य विभाग के एक बूढ़े प्रोफेसर, जो विभागाध्यक्ष और डीन भी था, उसने एक युवा महिला कर्मचारी को अपने घर बुलाकर उसके साथ रेप करने की असफल कोशिश की थी। चूंकि वो प्रोफेसर कुलपति का पुराना दोस्त और 'वर्तमान साहित्य' में इनके साथ संपादक मण्डल में था, रोज शाम को कुलपति के साथ दारू पीता है, मॉर्निंग वाक करता है। सो वह बच गया। कुलपति ने पीड़ित लड़की को झांसा दिया की वह चुप हो जाएगी तो उसको परमानेंट नौकरी दे देंगे। वो डरकर चुप हो गई, फिर उसको ही नौकरी से निकाल दिया गया। इसके अलावा भी यहाँ यौन उत्पीड़न के कई किस्से हैं, लेकिन कोतवाल साहब के आतंक के चलते किसी की हिम्मत नहीं कि कोई शिकायत करे या आवाज़ उठाए। जो बोलेगा वो मारा जाएगा।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ वर्धा हिंदी विवि में अध्यापक के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न के आरोप ”

  2. By Abhishek Mishra on February 27, 2013 at 9:03 AM

    is nirakar nirgun report men gazab ki naitikta ka paalan kiya hai aur aaropit shikshak ke naam ka bhi khulasa nahi kiya gaya hai. yah adbhut hai.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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