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अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएँ: फैज अहमद फैज

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/13/2013 06:31:00 PM


क्रांतिकारी शायर फैज अहमद फैज की जन्मतिथि पर उन्हें याद करते हुए उनका यह लेख, जिसमें वे प्रत्यक्ष औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त होने के बाद नई तरह की औपनिवेशिक गुलामी के शिकार समाजों की सांस्कृतिक समस्याओं और चुनौतियों के बारे में बात कर रहे हैं. हालांकि इस लेख में समस्याओं और समाधान की एक मोटी रूपरेखा ही दी गई है, लेकिन इससे जाहिर है कि फैज एक नई तरह के जनवादी समाज और सांस्कृतिक क्रांति की तरफ इशारा कर रहे हैं. अंग्रेजी से अनुवाद: भारत भूषण तिवारी.
 
इंसानी समाजों में संस्कृति के दो मुख्य पहलू होते हैं; एक बाहरी, औपचारिक और दूसरा आंतरिक, वैचारिक. संस्कृति के बाह्य स्वरूप, जैसे सामाजिक और कला-सम्बन्धी, संस्कृति के आंतरिक वैचारिक पहलू की संगठित अभिव्यक्ति मात्र होते है और दोनों ही किसी भी सामाजिक संरचना के स्वाभाविक घटक होते हैं. जब यह संरचना परिवर्तित होती है या बदलती है तब वे भी परिवर्तित होते हैं या बदलते हैं और इस जैविक कड़ी के कारण वे अपने मूल जनक जीव में भी ऐसे बदलाव लाने में असर रखते हैं या उसमें सहायता कर सकते हैं. इसीलिए सांस्कृतिक समस्याओं का अध्ययन या उन्हें समझना सामाजिक समस्याओं अर्थात राजनीतिक और आर्थिक संबंधों की समस्याओं से पृथक करके नहीं किया जा सकता. इसलिए अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में मतलब सामाजिक समस्याओं के सन्दर्भ में रखकर समझना और सुलझाना होगा.

फिर अविकसित देशों की मूलभूत सांस्कृतिक समस्याएँ क्या हैं? उनके उद्गम क्या हैं और उनके समाधान के रास्ते में कौन से अवरोध हैं?

मोटे तौर पर तो यह समस्याएँ मुख्यतः कुंठित विकास की समस्याएँ हैं; वे मुख्यतः लम्बे समय के साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी शासन और पिछड़ी, कालबाह्य सामाजिक संरचना के अवशेषों से उपजी हुई हैं. इस बात का और अधिक विस्तार से वर्णन करना ज़रूरी नहीं. सोलहवीं और उन्नीसवीं सदी के बीच एशिया, अफ्रीका और लातिन अमरीका के देश यूरोपीय साम्राज्यवाद से ग्रस्त हुए. उनमें से कुछ अच्छे-खासे विकसित सामंती समाज थे जिनमें विकसित सामंती संस्कृति की पुरातन परम्पराएँ प्रचलित थीं. औरों को अब भी प्रारम्भिक ग्रामीण कबीलावाद से परे जाकर विकास करना था. राजनीतिक पराधीनता के दौरान उन देशों का सामाजिक और सांस्कृतिक विकास जम सा गया और यह राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होने तक जमा ही रहा. तकनीकी और बौद्धिक श्रेष्ठता के बावजूद इन प्राचीन सामंतवादी समाजों की संस्कृति एक छोटे से सुविधासंपन्न वर्ग तक ही सीमित थी और उसका अंतर्मिश्रण जन साधारण की समानान्तर सीधी सहज लोक संस्कृति से कदाचित ही होता. अपनी बालसुलभ सुन्दरता के बावजूद आदिम कबीलाई संस्कृति में बौद्धिक तत्त्व कम ही था. एक ही वतन में पास पास रहने वाले कबीलाई और सामंतवादी समाज दोनों ही अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ लगातार कबीलाई, नस्ली और धार्मिक या दीगर झगड़ों में लगे रहते. अलग अलग कबीलाई या राष्ट्रीय समूहों के बीच का लम्बवत विभाजन (vertical division), और एक ही कबीलाई या राष्ट्रीय समूह के अंतर्गत विविध वर्गों के बीच का क्षैतिज विभाजन (horizontal division), इस दोहरे विखंडन को उपनिवेशवादी-साम्राज्यवादी प्रभुत्व से और बल मिला. यही वह सामाजिक और सांस्कृतिक मूलभूत ज़मीनी संरचना है जो नवस्वाधीन देशों को अपने भूतपूर्व मालिकों से विरासत में मिली है.

एक बुनियादी सांस्कृतिक समस्या जो इनमें से बहुत से देशों के आगे मुँह बाए खड़ी है, वह है सांस्कृतिक एकीकरण की समस्या. लम्बवत एकीकरण जिसका अर्थ है विविध राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जन समूह को एक से सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना. इसका मतलब यह कि उपनिवेशवाद से आज़ादी तक के गुणात्मक राजनीतिक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है.

एशियाई, अफ्रीकी और लातिन अमरीकी देशों पर जमाया गया साम्राज्यवादी प्रभुत्व विशुद्ध राजनीतिक आधिपत्य की निष्क्रिय प्रक्रिया मात्र नहीं था और वह ऐसा हो भी नहीं सकता था. इसे सामाजिक और सांस्कृतिक वंचन (deprivation) की क्रियाशील प्रक्रिया ही होना था और ऐसा था भी. पुराने सामंती या प्राक-सामंती समाजों में कलाओं, कौशल्य,प्रथाओं, रीतियों,प्रतिष्ठा, मानवीय मूल्यों और बौद्धिक प्रबोधन के माध्यम से जो कुछ भी अच्छा, प्रगतिशील और अग्रगामी था उसे साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने कमज़ोर करने और नष्ट करने की कोशिश की. और अज्ञान, अंधविश्वास, जीहुजूरी और वर्ग शोषण अर्थात जो कुछ भी उनमें बुरा, प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी था उसे बचाए और बनाए रखने की कोशिश की. इसलिए साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने नवस्वाधीन देशों को वह सामाजिक संरचना नहीं लौटाई जो उसे शुरुआत में मिली थी बल्कि उस संरचना के विकृत और खस्सी कर दिए गए अवशेष उन्हें प्राप्त हुए. और साम्राज्यवादी प्रभुत्व ने भाषा, प्रथा, रीतियों, कला की विधाओं और वैचारिक मूल्यों के माध्यम से इन अवशेषों पर अपने पूंजीवादी सांस्कृतिक प्रतिरूपों की घटिया, बनावटी, सेकण्ड-हैण्ड नकलें अध्यारोपित कीं.

अविकसित देशों के सामने इस वजह से बहुत सी सांस्कृतिक समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं. पहली समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार है, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मज़बूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करे. दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचना का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुद्ध हैं, और जो अधिक विवेक बुद्धिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं. तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौन्दर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधःपतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं.

तो ये सभी समस्याएँ नवीन सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की हैं. और इन समस्याओं का समाधान आमूल सामाजिक (अर्थात राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक) पुनर्विन्यास के बिना केवल सांस्कृतिक माध्यम से नहीं हो सकता.

इन सभी बातों के अलावा, अविकसित देशों में राजनीतिक स्वतंत्रता के आने से कुछ नई समस्याएँ भी आई हैं. पहली समस्या है उग्र-राष्ट्रवादी पुनरुत्थानवाद, और दूसरी है नव-साम्राज्यवादी सांस्कृतिक पैठ की समस्या.

इन देशों के प्रतिक्रियावादी सामाजिक हिस्से; पूंजीवादी, सामंती,प्राक-सामंती और उनके अभिज्ञ और अनभिज्ञ मित्रगण ज़ोर देते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा के अच्छे और मूल्यवान तत्वों का ही पुनःप्रवर्तन और पुनरुज्जीवन नहीं किया जाना चाहिए बल्कि बुरे और बेकार मूल्यों का भी पुनःप्रवर्तन और स्थायीकरण किया जाना चाहिए. आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति के बुरे और बेकार तत्वों का ही नहीं बल्कि उपयोगी और प्रगतिशील तत्वों का भी अस्वीकार और परित्याग किया जाना चाहिए. इस प्रवृत्ति के कारण एशियाई और अफ्रीकी देशों में कई आन्दोलन उभरे हैं. इन सारे आन्दोलनों के उद्देश्य मुख्यतः राजनीतिक हैं, अर्थात बुद्धिसम्पन्न सामाजिक जागरूकता के उभार में बाधा डालना और इस तरह शोषक वर्गों के हितों और विशेषाधिकारों की पुष्टि करना.

उसी समय नव-उपनिवेशवादी शक्तियाँ, मुख्यतः सं.रा.अमरीका, अपराध,हिंसा, सिनिसिज्म, विकार और लम्पटपन का महिमामंडन और गुणगान करने वाली दूषित फिल्मों, पुस्तकों, पत्रिकाओं, संगीत, नृत्यों, फैशनों के रूप में सांस्कृतिक कचरे, या ठीक-ठीक कहें तो असांस्कृतिक कचरे के आप्लावन से प्रत्येक अविकसित देश के समक्ष खड़े सांस्कृतिक शून्य को भरने की कोशिश कर रही हैं. ये सभी निर्यात अनिवार्यतः अमरीकी सहायता के माध्यम से होने वाले वित्तीय और माल के निर्यात के साथ साथ आते हैं और उनका उद्धेश्य भी मुख्यतः राजनीतिक है अर्थात अविकसित देशों में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ने से रोकना और इस तरह उनके राजनीतिक और बौद्धिक परावलंबन का स्थायीकरण करना. इसलिए इन दोनों समस्याओं का समाधान भी मुख्यतः राजनीतिक है अर्थात देशज और विदेशी प्रतिक्रियावादी प्रभावों की जगह पर प्रगतिशील प्रभावों को स्थानापन्न करना. और इस काम में समाज के अधिक प्रबुद्ध और जागरूक हलकों जैसे लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की प्रमुख भूमिका होगी. संक्षेप में, कुंठित विकास, आर्थिक विषमता, आंतरिक विसंगतियाँ, नकलचीपन आदि अविकसित देशों की प्रमुख सांस्कृतिक समस्याएँ मुख्यतः सामाजिक समस्याएँ हैं; वे एक पिछड़ी हुई सामाजिक संरचना के संगठन, मूल्यों और प्रथाओं से जुड़ी हुई समस्याएँ हैं. इन समस्याओं का प्रभावी समाधान तभी होगा जब राष्ट्रीय मुक्ति के लिए हुई राजनीतिक क्रान्ति के पश्चात राष्ट्रीय स्वाधीनता को पूर्ण करने के लिए सामाजिक क्रान्ति भी होगी. (नया पथ से साभार)

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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