हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मनीऑडर पर टिकी अर्थव्यवस्था और राणा बाबा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/23/2013 03:39:00 AM

राकेश कुमार सिंह की हाल में प्रकाशित किताब बम संकर टन गनेस  का एक अध्याय. आगे भी इस किताब के अध्याय हाशिया पर मिलेंगे और शायद एक समीक्षा भी.

असोरा पर लकड़ी का एक बड़ा बाकस। बराबर में एक चौकी । चौकी  पर लुंगी और गंजी में एक तीस-बत्तीस बरस की काया। सामने प्लास्टिक का एक डिब्बा और फैले अंग्रेजी दवाइयों के कुछ पत्ते। अगल-बगल खड़े कुछ औरत-मर्द। लाख धकेलने के बाद भी स्मृति इसके पीछे नहीं जा पाती। यही राणा बाबा थे। मेरे पहले केमिस्ट। बाकस ही उनका गोदाम था। बाकस ही उनका शो रूम। अल्लसुबह से देर रात तक। चार में टंगी लालटेन की रौशनी में राणा बाबा लोगों को दवाइयां दिया करते थे। ऊंच-नीच और जात-धर्म का कोई फेर नहीं था। सुरदेव बाबा गांव में न हुए तो एमरजेंसी में उन्हें कभी-कभार सूई भी लगानी पड़ती थी। 

उन दिनों रेणू के पूर्णियां में फारबिसगंज मोड़ के पास आश्रमनुमा एक विद्यालय हुआ करता था। जिसकी न नाम-पट्टी थी, और न लेटर हेड और मोहर। सरकारी अध्यापकी से रिटायरमेंट के बाद स्वर्गीय सच्चिदानंद बाबु घर पर ही अपने शिष्यों के सगे-संबंधियों को पढाते थे। बच्चे उनके घर पर ही बने कुछ कमरों में रहते थे। बदले में अठारह किलो चावल, चार किलो दाल और पच्चीस रुपए या फिर सवा सौ रुपए देने होते थे। गरीब और मेधावी विद्यार्थियों के लिए इसमें भी रियायत थी। मेरे चचेरा भाई सुधांशु और मैं छठी कक्षा तक आश्रमवासी ही रहे। हमारे घर वालों ने बाद वाला विकल्प चुना था।

छुट्टियों की किल्लत रहती थी। सबसे लंबी होती थी गर्मी की। पंद्रह दिनों की। ‘एतियाना’  या ‘स्टेट ट्रांस्पोर्ट’ की बस से हम मुजफ्फरपुर आते थे। तब सुबोध भैया वहीं ‘घाट’  के ट्रांस्पोर्ट में नौकरी करते थे और डेरा पर रहते थे। हम रात को उनके पास रुकते थे। अगले दिन घाट के बस से ही अपने गांव तरियानी छपरा पहुंचते थे। उन दिनों दो-तीन लंबी-लंबी बसें गांव जाया करती थी। एक का नाम ‘जानकी एक्सप्रेस’ था। बाद में मिनी बसें चलने लगी और अब तो मिनी से भी मिनी बसें जाती हैं।

घर पर इया, माई और चाचियां हमारा इंतजार कर रही होती थीं। संयुक्त परिवार था। कुल छह चाचियां थीं। भाई-बहनों की संख्या लगभग दो दर्जन थी। सबसे बड़े सुबोध भइया और नीलम दिदिया अब बाबा-नाना और दाई-नानी बन चुके हैं।

सबके पास खिलाने के लिए कुछ खास होता था उस दिन। माई पेड़ा खिलाती थी। चाचियों की ओर से दही, खोआ, लड़ू, बगैरह मिलत थे। पर मुझे सबसे प्यारा लगता था इया के साथ डलिया में चाउर ले के भंसारी जाना। घिऊ, नून और मरीच वाला भुजा इया के साथ ही चला गया।

शेषा फुआ से ले कर रूप बाबा, कृपाल बाबा, रामा बाबा, अंदामा बाली दाई, बिंदा बाबा, सपाटु वाली दाई, बच्चा बाबा, पिपरा वाली दाई, जमदार साहब, शिवजी बाबा, रामदेव बाबा और कोठा फुआ तक : सबके आंगन में जाता था। आज भी बाबा-दाइयों का चरण स्पर्श करके एक अजीब से सुख और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है। हमउम्र चाचाओं और फुआओं के साथ घंटों खेला करता था। नेपाल वाली दाई के दुरा पर नारियल तेल के दो डिब्बों के बीच रस्सी लगा कर लाउड स्पीकर और हेलो-हेलो खेला करता था।

राणा बाबा के पिता बिंदा बाबा बड़े मेहनती थे। गंजी कभी उनके बदन पर नहीं देखा। हमेशा कंधे पर अंगौछे के साथ रहती थी। खेत पथार कम ही थे। परिवार में हर तरह का संकट व्याप्त रहता था। चुन्नू और मुन्नू बाबा उनके छोटे भाई हैं। आगे चल कर दोनों दवा दुकानदारी में राणा बाबा के साथ जुड़ गए। राणा बाबा ने अब्दुल अजीज बीड़ी की एजेंसी भी ले ली थी। गांव-जवार के छोटे-छोटे फेरी वाले उनसे ही बीड़ी ले जाया करते थे। करीब 25-26 साल पहले राणा बाबा ने गांव के बाजार पर एक दुकान बनवा ली। दवा के साथ-साथ अन्य छोटी-मोटी जरूरत की चीजें उनके दुकान पर मिलने लगी थी।

हमारे छोटे, सुशांत चाचा की अच्छी उठ-बैठ थी राणा बाबा के साथ। दोनों एकतुरिया थे। नौजवानी में अपने संगतियों के साथ मिल कर उन्होंने गांव में एक पुस्तकालय की स्थापना की थी। काफी रचनात्मक काम हुई थे तब। ग्रामीण राजनीति में भी उनकी दखल थी। उनके लिए राजनीति का अर्थ पुस्तकालय के लिए कुछ सुविधा जुटा लेना होता था। पर अब पुस्तकालय के नाम पर जमीन भर रह गया है। सुनते हैं बाद में कुछ विवाद हुआ। लोगों ने अलमारियों, किताबों और अन्य संपत्तियों का बंदरबांट कर लिया। अब महावीर पुस्तकालय का नाम लेकर जैसे-तैसे दुर्गा पूजा का आयोजना हो जाता है।

मेहनत और आत्मीयता के अद्भुत मिसाल थे राणा बाबा। कुछेक अपवादों को छोड़ कर गांव की अर्थव्यवस्था कलकत्ता, गोहाटी, डिमापुर और पासीघाट से आए मनीऑडर पर टिकी थी। अब ये मनीऑडर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा से भी आते हैं। तब ‘संपन्नता’ का मतलब दाल, भात तरकारी था। ‘खानदानी’ परिवारों में भी पैसे की किल्लत रहती थी। विपन्न तो थे ही विपन्न। राणा बाबा ने कभी भी पैसे न होने पर किसी को दवा देने से इंकार नहीं किया। जातियों के बंधन को जिस हद तक अनजाने में तोड़ा जा सकता था, राणा बाबा का उद्यम उसमें सफल रहा। वे कोई समाज सुधारक या प्रबुद्ध विचारक नहीं थे। पर उनका काम सेवा से कम नहीं था। गांव में कभी-कभी खुलने वाले एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और दूर-दूर तक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के बीच राणा बाबा की दूकान छपरा, बेलहियां, डुमारा, सरपट्टी, हंसौर, कुंडल, मारड़, विशंभरपुर, ननौरा गिद्धा, फुलवरिया आदि आस-पड़ोस के गांव के लोगों के लिए एक बरदान था।

करीब दस-बारह साल पहले राणा बाबा ने बाजार पर थोड़ी जमीन ले ली। कुछ और दुकानें बनवाई। खुद दवा दुकान ही चलाते रहे। उनका बेटा धनंजय उनकी मदद करने लगा। मुन्नु बाबा के लिए किराने की दुकान शुरू की। चुन्नु बाबा को पंचायत सेवक की नौकरी मिल गयी थी। बदहाली के बाद खुशहाली का एक टुकड़ा उनके घर भी आया था। दो साल पहले, सर्दियों की एक शाम बाजार पर बीस-पच्चीस लोगों का झुंड आया। राणा सिंह की पहचान तस्दीक कर लेने के बाद उन पर ताबरतोड़ गोलियां बरसा दी। राणा बाबा वहीं ढेर हो गए। जमीन पर आलू की फेरी लगाने वाले अमरूल को भी निशाना बनाया गया। लंबी इलाज के बाद अमरूल बच गया। ये नहीं मालूम कि उसका शरीर अब कितना कारगर रह गया है।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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