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बीच सफ़हे की लड़ाई

भूख के सवाल पर भरमाती सरकार

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/15/2013 03:39:00 PM

राजेंद्र शर्मा

पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में विचित्र दृश्य देखने को मिला। अगर इसके निहितार्थ वास्तव में इतने गंभीर न होते तो इसे एक प्रहसन मानकर हंसा जा सकता था। देश की सबसे ऊंची अदालत सरकार से यह जानना चाहती थी कि सार्वजनिक वितरण पण्राली में बड़े पैमाने पर मौजूद गड़बड़ियों को दूर करने के लिए, (जो भूख से मरते करोड़ों लोगों के लिए जिंदगी और मौत का सवाल है) सरकार क्या करने का इरादा रखती है? और सरकार का जवाब था कि वह संसद के अगले सत्र में खाद्य सुरक्षा कानून लाने जा रही है! सरकार की ओर से एटार्नी जनरल जीई वाहनवती ने अदालत को खूब विस्तार से यह तो बताया कि खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में सरकार आबादी के कितने हिस्से को लाने जा रही है, सब्सिडी पर कितना अतिरिक्त खर्च होने जा रहा है, आदि-आदि। उन्होंने विस्तार से यह भी बताया कि गेंद संसद के पाले में होने के चलते, सरकार अपनी ओर से निश्चित रूप से ज्यादा कुछ नहीं बता सकती है। लेकिन, उन्होंने इसका जिक्र तक नहीं आने दिया कि सार्वजनिक वितरण पण्राली की कमजोरियां दूर करने के लिए सरकार क्या करने जा रही है। यहां तक कि शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय बेंच को ही झल्लाकर यह सुझाना पड़ा कि जब तक खाद्य सुरक्षा कानून नहीं बन जाता, तब तक तो सरकार कुछ कदम उठा ही सकती है। 'हमारी चिंता यह है कि सार्वजनिक वितरण पण्राली कारगर हो। क्या आप (केंद्र) उक्त विधेयक के कानून बनने तक के लिए कोई प्रशासनिक तंत्र ला सकते हैं। यह बिना किसी अतिरिक्त खर्चे के किया जा सकता है। आप इस पर काम करना शुरू कर सकते हैं।' लेकिन सार्वजनिक वितरण पण्राली को कारगर बनाने की सरकार को चिंता ही कहां है!

याद रहे कि गरीबों के सस्ते खाद्यान्न के अधिकार पर कुछ नागरिक संगठनों की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट पिछले कई वर्षो से इस सवाल के विभिन्न पहलुओं पर निगाह रख रहा है। वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर निगाह रखते 11 साल से ज्यादा हो गए हैं, जिस दौरान पूरी 22 रिपोर्टें अदालत में पेश की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के निरंतर हस्तक्षेप के इसी सिलसिले के हिस्से के तौर पर, खासतौर पर सार्वजनिक वितरण पण्राली की गड़बड़ियों/कमजोरियों पर विचार कर अदालत को ही अपनी रिपोर्ट देने के लिए, 2006 में न्यायमूर्ति डीपी वाधवा की अध्यक्षता में एक कमेटी का भी गठन किया था। बहरहाल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के लिए वाधवा कमेटी की सिफारिशों में, सरकार ने शायद ही कोई दिलचस्पी दिखाई हो। अचरज नहीं कि पिछले अगस्त के आखिर में सुप्रीम कोर्ट को सार्वजनिक वितरण पण्राली में खाद्यान्न की चोरी रोकने में कोई दिलचस्पी न दिखाने के लिए सरकार को फटकार लगानी पड़ी थी। न्यायमूर्ति ठाकुर की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था, 'अगर आप (केंद्र) कदम नहीं उठाएंगे तो हमारे पास आदेश जारी करने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं रह जाएगा। हमें कहना पड़ेगा कि सरकार के अधिकारियों को सार्वजनिक वितरण पण्राली की कोई चिंता नहीं है और उनके पास इसके लिए कोई टाइम नहीं है।'

इस मामले में केंद्र सरकार की उदासीनता के सामने सुप्रीम कोर्ट का भी धीरज टूट रहा लगता है। शायद इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय बेंच को पिछले सप्ताह एटॉर्नी जनरल को यह याद दिलाना पड़ा कि जस्टिस वाधवा कमेटी की सिफारिशों से आमतौर पर सरकार ने भी सहमति जताई थी और वाधवा कमेटी की एक महत्वपूर्ण सिफारिश यह है कि निजी उचित दर की दुकानों की मौजूदा व्यवस्था की जगह, सरकारी दुकानों पर आधारित वितरण पण्राली खड़ी की जाए। और ये दुकानें स्थानीय संभावनाओं व जरूरतों के अनुसार सार्वजनिक निगमों, सहकारिताओं, महिला मंडलों, पंचायतों आदि एजेंसियों द्वारा चलाई जा सकती हैं। बहरहाल, एटॉर्नी जनरल का जवाब था कि कृषि मंत्रालय से पूछकर बताएंगे। सुप्रीम कोर्ट के एक दशक से ज्यादा समय से इस मामले पर निगाह रखे होने के बावजूद, अगर आम आदमी को सस्ता अनाज मुहैया कराने के मामले में कोई वास्तविक प्रगति नहीं हो रही है, तो यह आश्चर्यजनक नहीं है। इसकी सीधी वजह यह है कि आम आदमी के हितों की चिंता के तमाम दिखावे के बावजूद केंद्र सरकार की इस समस्या के सीधे तथा आसान समाधान में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। क्यों? क्योंकि हमारे जैसे देश में जहां आबादी का बहुत विशाल हिस्सा भूख की गिरफ्त में है, इस समस्या का सीधा समाधान यही हो सकता है कि सार्वभौम सार्वजनिक वितरण पण्राली के जरिए समूची जनता को सस्ता अनाज मुहैया कराया जाए। आबादी का छोटा-सा हिस्सा जो इस सुविधा का वास्तविक अधिकारी नहीं है, खुद ही इसके दायरे से बाहर हो जाएगा। वैसे भी इस छोटे से तबके पर होने वाला 'अनुचित' खर्चा, सिर्फ 'सुपात्रों' तक इस लाभ को सीमित करने की व्यवस्थाओं की भारी कीमत के सामने और सच्चे लाभार्थियों के बहुमत के इस लाभ के दायरे से बाहर रह जाने के नुकसान के सामने, कुछ भी नहीं है। लेकिन, यह आसान रास्ता सरकार को मंजूर नहीं है। क्योंकि इतना खर्चा करना उसे स्वीकार नहीं है!

इसलिए अचरज की बात नहीं है कि वर्तमान सरकार के बहुत ही महत्वाकांक्षी जनहितकारी कार्यक्रम बताए जा रहे खाद्य सुरक्षा विधेयक को लटके हुए तीन साल हो गए हैं। सरकार अब तक अपना मन नहीं बना पाई है कि देश की कुल आबादी के कितने हिस्से को इस ‘सुरक्षा’ का लाभ हासिल होगा और किस हद तक! यह तब है जबकि खुद एटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में यह माना कि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक से कुल 23 हजार करोड़ सालाना का अतिरिक्त भार सरकार पर पड़ रहा होगा। उद्योग जगत तथा संपन्न तबकों को हर साल तरह-तरह की कर छूटों में पूरे पांच लाख करोड़ रुपये की रियायतें देने वाली सरकार, इसका बीसवां हिस्सा देशवासियों को भूख के शिकंजे से छुड़ाने पर खर्च करने के लिए तंगी का रोना रोए तो इसे क्या कहा जाएगा? बहरहाल, सार्वजनिक वितरण पण्राली की दुर्दशा का किस्सा सिर्फ इतने पर ही खत्म नहीं हो जाता है। बाजारवाद और निजीकरण की हिमायती मौजूदा सरकार, सार्वजनिक वितरण पण्राली की निजी दुकानों की जगह, सार्वजनिक- सामूहिक रूप से संचालित व्यवस्था लाने पर गंभीरता से विचार तक करने के लिए तैयार होगी, इसमें शक है। लेकिन, यह मामला इससे आगे तक जाता है। मौजूदा सरकार तो खाद्य सुरक्षा कानून की आड़ में, कथित नकदी हस्तांतरण के जरिए, खाद्यान्न के हर तरह के सीधे वितरण से ही हाथ खींचने के लिए जोर लगा रही है। यह न सिर्फ सार्वजनिक वितरण पण्राली का सौ फीसद निजीकरण करने का रास्ता है बल्कि एक स्वतंत्र सरकार नियंत्रित व्यवस्था के रूप में सार्वजनिक वितरण पण्राली को और अंतत: सरकारी खरीद की पण्राली को खत्म कर देने का भी रास्ता है। साफ है कि खाद्य सुरक्षा के मामले में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार, एक-दूसरे के विरोधी रास्तों पर चल रहे हैं। इसीलिए, अदालत कुछ पूछ रही थी और सरकार कुछ और बता रही थी!

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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