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दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामला: कुछ तकलीफदेह सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/27/2013 12:00:00 PM


नव-उदारवाद हर चीज को बाजार में बेचे जाने लायक उत्पाद मानता है और यह उपभोक्तावादी जज्बे वाले, आपस में होड़ में लगे व्यक्तियों को महत्व देता है. ताकतवरों के लिए औरतें उनकी तृप्ति के लिए उपभोग की वस्तु हैं. व्यापक बहुसंख्या के लिए, नव-उदारवाद द्वारा प्रोत्साहित की जा रही होड़ की भावना उनमें असुरक्षा पैदा कर रही है और इसके नतीजे में शक्तिहीनता की एक जबर्दस्त भावना उनमें भर रही है. एक औरत का बलात्कार शक्तिहीनता की इस भावना पर विजय का प्रतीक है. दिल्ली में युवा फिजियोथेरेपी इंटर्न के हमलावर और बलात्कारियों को इस रोशनी में जरूर देखा जाना चाहिए. उनको कानून के मुताबिक सजा जरूर होनी चाहिए, लेकिन इसी के साथ यह भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि इससे बीमारी का इलाज नहीं होगा. आनंद तेलतुंबड़े का विश्लेषण. ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित. अनुवाद: रेयाज उल हक

दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को एक 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी इंटर्न पर क्रूर हमले और सामूहिक बलात्कार ने देश भर में क्रुद्ध प्रतिक्रिया को जन्म दिया और इसने महिलाओं के खिलाफ आम तौर पर बढ़ते यौन हमले और खास तौर पर बलात्कारों के मुद्दे को प्रमुखता दिलाई. इसने आम तौर पर संवेदनहीन प्रशासन को कुछ असाधारण कदम उठाने पर बाध्य किया जैसे कि महिला को हवाई जहाज से सिंगापुर भेजा गया और फास्ट ट्रेक अदालत में उत्पीड़कों पर मामला चल रहा है. बदकिस्मती से पीड़िता को बचाया नहीं जा सका. अब जब वो जा चुकी है और मुद्दा टीवी पर्दों से गायब हो चुका है, तो इस पर धैर्य के साथ सोचा जा सकता है और कुछ सवाल उठाए जा सकते हैं जो उग्र विरोधों की लहर में दबे रह गए थे. मिसाल के लिए, वे दलित जो अपनी बेटियों के बलात्कार और हत्या की पीड़ा को अकेले ही भुगतते हैं, बलात्कार के लिए चिंता पर अचानक फूटे इस गुस्से से परेशान हुए, मानो देश में बलात्कार कोई असाधारण घटना हो. उन्होंने अपना गुस्सा अपने ब्लॉगों और ई-मेल समूहों के जरिए निकाला और पूछा कि खैरलांजी के ग्रामीणों द्वारा पूरे उत्सव के साथ किए गए सुरेखा और प्रियंका भोतमांगे के बलात्कार और हत्या पर क्यों इन मोमबत्ती जलाने वालों ने आंसू का एक कतरा भी नहीं बहाया. तब इन टीवी द्वारा प्रेरित आंदोलनकारियों का चरित्र असल में क्या है? क्या वे सचमुच सामाजिक बुराइयों को दूर करने का मकसद पूरा कर रहे हैं या उन्हें हल्का बना रहे हैं? मिसाल के लिए इन विरोध प्रदर्शनों ने स्त्रियों के सम्मान के लिए क्या किया?

सिर्फ निर्भया क्यों?

बलात्कार हमारे माहौल का हिस्सा हैं. उनकी वास्तविक घटनाओं का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही सामने आ पाता है. इसकी वजह उनके साथ जुड़ा हुआ सामाजिक कलंक है. ज्यादातर ऐसी घटनाओं को पीड़िता और उसके परिवार वाले ही दबा देते हैं. कमोबेश पूरी दुनिया में ऐसा होता है. मिसाल के लिए अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (1995) मानता है कि यौन हिंसा और बलात्कार, खास तौर से, सबसे कम रिपोर्ट किया जाने वाला अपराध है. इस तरह, सिर्फ कुछ घटनाएं ही पुलिस रिकॉर्ड में आ पाती हैं और उनकी गिनती होती है. और तब भी, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा इस गिनती के आधार पर, भारत में बलात्कार हरेक 22 मिनट पर एक की दर से होते हैं. 2011 में कुल रिपोर्ट किए गए बलात्कार के मामले 24,206 थे. 1971 में 2487 से, जब एनसीआरबी ने बलात्कार के मामलों को दर्ज करना शुरू किया था, इसमें 873 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है! इस मापदंड पर तर्कसंगत रूप से संदेह हो सकता है क्योंकि देश में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, खास तौर से 1991 में हुए मुक्त बाजार सुधारों के नतीजे में लोगों के रवैए, मूल्यों, मान्यताओं और व्यवहारों में बदलाव आए हैं. लेकिन अगर कोई हालिया अवधि पर गौर करे, यानी 1991 से अब तक की अवधि पर, तो बलात्कार की घटनाओं में तेजी से वृद्धि दिखाई देगी. 1991 में 10,410 मामलों से 2011 में यह आंकड़ा 24,206 पर पहुंच गया. यह 230 फीसदी की वृद्धि है. दिल्ली भारत में बलात्कारों की राजधानी रही है, जहां यह क्रूर बलात्कार हुआ था. उक्त दो वर्षों के लिए दिल्ली के आंकड़े क्रमश: 214 और 572 हैं, यानी दो दशकों में 267 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है. इससे पहले इनमें से किसी भी घटना ने जरा सी भी सार्वजनिक प्रतिक्रिया पैदा नहीं की थी. सवाल उठता है कि सिर्फ इस घटना ने ऐसा जनाक्रोश क्यों पैदा किया?

पीड़ित लड़की पर की गई क्रूरताएं इसकी वजह बताई जा सकती हैं. लेकिन क्रूरता तो बलात्कार का एक अभिन्न हिस्सा है और ज्यादातर बलात्कारों से लगभग समान मात्रा में क्रूरता जुड़ी होती है. ज्यादातर मामलों में अपराध के सबूत मिटाने के लिए पीड़िता की हत्या कर दी जाती है. अगर हम ऐसे ज्यादा मामलों के बारे में नहीं जानते तो ऐसा इसलिए नहीं है कि वे कम क्रूर थे, बल्कि सिर्फ इसलिए क्योंकि मीडिया में कभी वे सुर्खी नहीं बने. अगर किसी को लगता है कि बढ़ रहे बलात्कार के मामलों के खिलाफ लोगों का गुस्सा स्वाभाविक रूप से बढ़ते हुए उस समय उस बिंदु पर पहुंच गया था, तब भी यह सवाल बचा रह जाता है कि तब क्यों उसके बाद हुए बलात्कारों को (और उनकी संख्या बहुत बड़ी है) सामान्य घटना के रूप में नजरअंदाज कर दिया गया. यह तथ्य कायम है कि हाल के वक्त में लोगों के भड़के गुस्से की तरह, इस मामले को असाधारण बनाने में मीडिया की एक बड़ी भूमिका थी.

जाति से उभरता अलगाव

जबकि मीडिया की बड़ी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, खबरों पर लोगों की प्रतिक्रिया भेदभावपरक है. जैसे कि अगर हम दलित महिला के बलात्कार के मामले को लेते हैं. मीडिया ने बहुत दिन पहले भी नहीं और दिल्ली से बहुत दूर भी नहीं, पड़ोस के हरियाणा में दलित महिलाओं के बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के बारे में बताया. मीडिया ने अकेले एक महीने में 19 बलात्कारों की चिंतित कर देने वाली परिघटना पर ध्यान दिया और उसने कुछ मात्रा में बहस-मुबाहिसों को जन्म दिया. लेकिन यह खुद दलितों को छोड़ कर जनता की प्रतिक्रिया को उभारने में नाकाम रहा. मीडिया पर दलितों के खिलाफ भेदभाव बरतने का आरोप लगाया जा सकता है, लेकिन इसकी व्याख्या इसके कारोबारी हितों के संदर्भ में की जा सकती है. बुनियादी तौर पर आज मीडिया एक कारोबार है और कारोबारी तर्क दलितों के खबरों के पक्ष में नहीं होगा क्योंकि वे न तो पाठकवर्ग/दर्शकवर्ग का निर्माण करते हैं और न ही व्यापक समाज को आकर्षित करने के लिए उनमें सनसनी के लिहाज से कोई मूल्य होता है. हालांकि दलितों की परेशानियों के प्रति समाज की उदासीनता साफ तौर पर इसके उस जातीय पूर्वाग्रहों से जोड़ी जा सकती है, जो दलितों के खिलाफ अब भी कायम हैं. पूरी दुनिया में बहुत कम दर्ज किए जाने वाले अपराध के रूप में बलात्कार भारत में और भी कम दर्ज किया जाता है और दलितों के मामले में तो काफी कम दर्ज किया जाता है, क्योंकि उनमें बदले के डर की वजह से प्रभुत्वशाली जातियों से आनेवाले उत्पीड़कों से दुश्मनी मोल लेने का साहस नहीं होगा, और अगर वे ऐसा करने का साहस जुटा भी लें तो पुलिस उन्हें ऐसा करने से रोक देगी. इसके बावजूद, व्यापक समाज के मुकाबले दलित औरतों के बलात्कार की घटनाओं की दर में तेज वृद्धि दिख रही है.

दलितों का उत्पीड़न 1991 से लगातार बढ़ रहा है और मौजूदा समय में हरेक डेढ़ मिनट में एक घटना (2011 में 33,719) हो रही है, लेकिन वो कभी भी लोगों की प्रतिक्रिया पैदा कर पाने में सक्षम नहीं रही हैं. यहां तक कि जज्झर जैसे उत्पीड़न में जिसमें पांच दलितों को दिन दहाड़े सवर्ण हिंदू भीड़ द्वारा पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पीट-पीट कर मार डाला गया था, या गोहाना में जहां योजना बना कर और पुलिस की निगरानी में दलितों के 60 घर लूटे और जलाए गए थे, ऐसा नहीं हुआ. फिर परमकुडी जैसा मामला जहां अकारण ही पुलिस ने दलित भीड़ पर फायरिंग की और इसके बाद पीट-पीट कर छह दलित नौजवानों को मार डाला. या फिर धर्मापुरी को याद करें जहां दलितों के 268 घरों को लूट कर जला दिया गया, और खैरलांजी को जहां एक परिवार के चार सदस्यों को यातनाएं दे-दे कर मार डाला गया और उनमें से दो महिलाओं-मां और बेटी की निर्मम हत्या के पहले उनके साथ संभवत: सामूहिक बलात्कार किया गया. ये सारी घटनाएं बड़े पैमाने पर लोगों में गुस्से को पैदा कर पाने में नाकाम रहीं. क्या वे दिल्ली बलात्कार मामले से किसी मायने में कम भयावह थीं? मिसाल के लिए, खैरलांजी के मामले में, महाराष्ट्र और इसके बाहर महीने भर चले दलितों के स्वत:स्फूर्त विरोधों के बावजूद तथाकथित प्रगतिशील तक उनमें शामिल नहीं हुए. इसलिए दिल्ली बलात्कार मामले के खिलाफ संपन्न तबके के इस गुस्से से दलितों का खुद को अलग महसूस करना स्वाभाविक था. इस अलगाव को समझ पाने का कोई उपाय नहीं था क्योंकि महिला की पहचान को छुपाए रखा गया, जब तक कि 7 जनवरी को ब्रिटेन के डेली मिरर में लड़की के पिता ने इसे उजागर नहीं किया, जिसमें लड़की की जातीय पहचान दी गई थी. ऐसी भी अफवाहें थीं कि कम से कम एक बलात्कारी दलित था. जातीय पहचान के बारे में ऐसी सूचनाओं के साथ पूरे घटनाक्रम को अचानक एक संदर्भ मिल गया. कैसी शर्म की बात है कि ऐसे क्रूर अपराधों के वक्त भी हम अपनी जातीय पहचानों से ऊपर नहीं उठ सकते.

समस्या पर नियंत्रण

ये विरोध प्रदर्शन बलात्कारों की भारी घटनाओं और हाल के वर्षों में इनके बढ़ने को लेकर समाज के भीतर आत्मविश्लेषण को जन्म दे सकते थे, लेकिन इनमें आक्रामक रूप से तुरत-फुरत समाधान पेश किए गए. इसके तहत डराने वाली सजा के रूप में बलात्कारियों के रासायनिक बधियाकरण या फांसी की सजा का प्रस्ताव था, जो दक्षिणपंथी राजनीति को मजबूत कर रहा था. इसमें कोई संदेह नहीं है कि बलात्कार के मामलों में दोषी साबित ठहराए जाने (कन्विक्शन) की बेहद कम दर को देखते हुए इंसाफ मुहैया करने वाली व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किए जाने की जरूरत है, लेकिन यह अंदाजा लगाना कि फांसी और अंगों को काटने जैसी कठोर सजाएं अपराधियों को ऐसे अपराध करने से रोकेंगी, पूरी तरह सतही है. अगर ऐसा हुआ होता, तो एक नाबालिग के बलात्कार के लिए धनंजय चटर्जी को दी गई फांसी ने बलात्कार के मामलों में, कम से कम पश्चिम बंगाल में, कमी लाई होती. तथ्य ये है कि असल में बलात्कार बढ़े हैं. इंसाफ मुहैया कराने वाली व्यवस्था की तरफ से संदेश यह जाना चाहिए कि अपराध पर निश्चित रूप से सजा मिलेगी, जो कि खुद ही अपराधी को अपराध करने से रोकेगी. आज अपराधी इसको लेकर आश्वस्त महसूस करते हैं कि वे सजा से बच सकते हैं चाहे वो जिस भी मात्रा में हो. कानूनसम्मत अमानवीय सजाएं निचले तबके के लिए सिर्फ और अधिक नाइंसाफी ही लाएंगी, जबकि ऊपरी तबका दोषी ठहराए जाने से हर हाल में बचता रहेगा.

बलात्कार पूरी दुनिया में व्याप्त पितृसत्ता की विचारधारा के साथ अंतरंगता के साथ जुड़े हुए हैं, जिसे निश्चित तौर पर उजागर करना जरूरी है. और ये पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियां विभिन्न समाजों की सांस्कृतिक विशिष्टताओं में थोड़े-बहुत फर्क के साथ संगीन हो जाती हैं. मिसाल के लिए भारत में परिवार के भीतर यौन उत्पीड़न व्याप्त हैं, क्योंकि यहां तक कहा जाता है कि देवता भी ऐसा करते हैं. असल में, अब भी प्रचलित देवदासी परंपरा बलात्कार को पवित्रता का जामा पहनाती है. दलित महिलाओं के साथ सजा के डर के बिना बलात्कार होते हैं, मानो दलित तो अपमानित किए जाने के लिए ही हैं. नई दुल्हनों को सामंतों को पेश किए जाने का रिवाज अब भी कुछ निश्चित इलाकों में चल रहा है. अगर प्रभावशाली संस्कृति में बलात्कार को ऐसी मौन स्वीकृति है, अगर यह औरतों को मर्दों के मातहत मानती है, और अगर न्यायिक व्यवस्था को पैसे के बूते मोड़ा जा सकता है, तो बलात्कार होते रहेंगे और बेधड़क होते रहेंगे. इसके बावजूद हाल के वर्षों में बलात्कार की घटनाओं के बढ़ने का रूझान क्या दिखाता है, जब भारत को एक आधुनिक हो रहा देश माना जा रहा है? क्या नव-उदारवादी विचारधारा इसके लिए जिम्मेदार है? नव-उदारवाद हर चीज को बाजार में बेचे जाने लायक उत्पाद मानता है और यह उपभोक्तावादी जज्बे वाले, आपस में होड़ में लगे व्यक्तियों को महत्व देता है. ताकतवरों के लिए औरतें उनकी तृप्ति के लिए उपभोग की वस्तु हैं. व्यापक बहुसंख्या के लिए, नव-उदारवाद द्वारा प्रोत्साहित की जा रही होड़ की भावना उनमें असुरक्षा पैदा कर रही है और इसके नतीजे में शक्तिहीनता की एक जबर्दस्त भावना उनमें भर रही है. एक औरत का बलात्कार शक्तिहीनता की इस भावना पर विजय का प्रतीक है. दिल्ली में युवा फिजियोथेरेपी इंटर्न के हमलावर और बलात्कारियों को इस रोशनी में जरूर देखा जाना चाहिए. उनको कानून के मुताबिक सजा जरूर होनी चाहिए, लेकिन इसी के साथ यह भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि इससे बीमारी का इलाज नहीं होगा.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामला: कुछ तकलीफदेह सवाल ”

  2. By mk shandilya on March 1, 2013 at 9:45 AM

    क्या है इलाज ???

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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