हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

छोटे शहर की लड़कियाँ

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/19/2013 02:46:00 PM

एक दलील, एक जिद और जिरह के ताने-बाने में बुनी हुई लाल्टू की ये कविताएं एक बहस के दौरान सामने आई थीं. और बहस के रूप में ही ये हाशिया पर पेश हैं. जल्दी ही लाल्टू द्वारा किया गया हावर्ड जिन की मशहूर किताब ए पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स के एक अध्याय का अनुवाद भी हाशिया पर होगा.

स्केच (?)

एक इंसान रो रहा है
औरत है
लेटर बॉक्स पर
दोनों हाथों पर सिर टिकाए
बिलख रही है
टेढ़ी काया की निचली ओर
दिखता है स्तनों का उभार
औरत है
औरत है
दिखता है स्तनों का उभार
टेढ़ी काया की निचली ओर
बिलख रही है
दोनों हाथों पर सिर टिकाए
लेटर बॉक्स पर
औरत है
एक इंसान रो रहा है
(1992)
पश्यंती - 1995; 'डायरी में तेईस अक्तूबर' में संकलित

अर्थ खोना ज़मीन का

मेरा है सिर्फ मेरा
सोचते सोचते उसे दे दिए
उँगलियों के नाखून
रोओं में बहती नदियाँ
स्तनों की थिरकन

उसके पैर मेरी नाभि पर थे
धीरे-धीरे पसलियों से फिसले
पिंडलियों को मथा परखा
और एक दिन छलाँग लगा चुके थे

सागर महासागरों में तैर तैर
लौट लौट आते उसके पैर
मैं बिछ जाती
मेरा नाम सिर्फ ज़मीन था
मेरी सोच थी सिर्फ उसके मेरे होने की

एक दिन वह लेटा हुआ
बहुत बेखबर कि उसके बदन से है टपकता कीचड़
सिर्फ मैं देखती लगातार अपना
कीचड़ बनना अर्थ खोना ज़मीन का।
(हंस, अप्रैल, 1998)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित



डरती हूँ

जब तुम बाहर से लौटते हो
और देख लेते हो एकबार फिर घर

जब तुम अंदर से बाहर जाते हो
और खुली हवा से अधिक खुली होती तुम्हारी स्वास
अंदर बाहर के किसी सतह पर होते जब
डरती हूँ

डरती हूँ जब अकेले होते हो
जब होते हो भीड़

जब होते हो बाप
जब होते हो पति आप

सबसे अधिक डरती हूँ
जब देखती तुम्हारी आँखों में

बढ़ते हुए डर का एक हिस्सा
मेरी अपनी आँखें।
(हंस, अप्रैल 1998)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित


एक और औरत

एक और औरत हाथ में साबुन लिए उल्लास की पराकाष्ठा पर है
गद्दे वाली कुर्सी पर बैठ एक और औरत कामुक निगाहों से ताक रही है
इश्तहार से खुली छातियों वाली औरत मुझे देखती मुस्कराती है
एक औरत फोन का डायल घुमा रही है और मैं सोचता हूँ वह मेरा ही नंबर मिला रही है

माँ छः घंटों बस की यात्रा कर आई है
माँ मुझसे मिल नहीं सकती, होस्टल में रात को औरत का आना मना है।
प्रगतिशील वसुधा-64 (मार्च, 2005)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

औरत बनने से पहले एक दिन

औरत बनने से पहले
(हालांकि सत्रह की है)
बैठी है कमरे में
परीक्षा दे रही है
तनाव से उसके गाल
फूले हैं और अधिक
गर्दन की त्वचा है महकती सी

यह लड़की
एक दिन गदराई हुई होगी
कई परीक्षाओं अनचाही मुस्कानों को
अपनाते बीत चुका होगा
कैशोर्य का अंतिम पड़ाव

सड़कों पर आँखें
अनदेखा करती गुजरेंगीं
आश्वस्त निरीह गदराई

आश्वस्त? या बहुत घबराई
बहुत घबराई!
(अक्षर पर्व – 1999)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

छोटे शहर की लड़कियाँ

कितना बोलती हैं
मौका मिलते ही
फव्वारों सी फूटती हैं
घर-बाहर की
कितनी उलझनें
कहानियाँ सुनाती हैं

फिर भी नहीं बोल पातीं
मन की बातें
छोटे शहर की लड़कियाँ
भूचाल हैं
सपनों में
लावा गर्म बहता
गहरी सुरंगों वाला आस्मान है
जिसमें से झाँक झाँक
टिमटिमाते तारे
कुछ कह जाते हैं

मुस्कराती हैं
तो रंग बिरंगी साड़ियाँ कमीज़ें
सिमट आती हैं
होंठों तक

रोती हैं
तो बीच कमरे खड़े खड़े
जाने किन कोनों में दुबक जाती हैं
जहाँ उन्हें कोई नहीं पकड़ सकता

एक दिन
क्या करुँ
आप ही बतलाइए
क्या करुँ
कहती कहती
उठ पड़ेंगी
मुट्ठियाँ भींच लेंगी
बरस पड़ेंगी कमज़ोर मर्दों पर
कभी नहीं हटेंगी

फिर सड़कों पर
छोटे शहर की लड़कियाँ
भागेंगी, सरपट दौड़ेंगी
सबको शर्म में डुबोकर
खिलखिलाकर हँसेंगी
एक दिन पौ सी फटेंगी
छोटे शहर की लड़कियाँ।
(पल प्रतिपल -1989)
'एक झील थी बर्फ की' में संकलित

सखीकथा

हर रोज बतियाती सलोनी सखी
हर रोज समझाती दीवानी सखी
गीतों में मनके पिरोती सखी
सपनों में पलकें भिगोती सखी
नाचती है गाती इठलाती सखी
सुबह सुबह आग में जल जाती सखी

पानी की आग है
या तेल की है आग
झुलसी है चमड़ी
या फंदा या झाग

देखती हूँ आइने में खड़ी है सखी
सखी बन जाऊँ तो पूरी है सखी

न बतियाना समझाना, न मनके पिरोना
न गाना, इठलाना, न पलकें भिगोना

सखी मेरी सखी हाड़ मास मूर्त्त
निगल गई दुनिया
निष्ठुर और धूर्त्त।
(पश्यंती; अप्रैल-जून, 2001)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

सालों बाद मिलने पर

सालों बाद मिलने पर
वह दिखती है धरती का बोझ ढोती

स्मृति से बहन-भाई माता पिता लुप्त हो गए हैं
कभी कभी बेटी आकर साथ लेटती है
और हल्की सी याद आती है

उसे माँ की बहनों की
स्त्रियाँ थीं वे भीं

जिनकी धरती इस धरती से न ज्यादा न कम ठोस थी
बोझ ढोती रहीं वे भी इसी तरह आजीवन

बेटी सीख रही है सही गलत उपाय बोझ से उबरने के
उसने सीख लिए हैं राज शरीर के

जैसे उसकी माँ आसानी से भूल गई है
झुर्रियाँ समय से पहले ही दिखतीं त्वचा पर

जैसे बेटी के बदन में नहीं कहीं भी रोंए
उसे देखकर लगता है एकबारगी

कि स्त्री होती है विरक्त स्वभाव से
देखोगे अँधेरे में जब कदाचित खुली आँखें

खुश दिखेगी यह सोचती कि
समंदर चाहतों का उमड़ता बेटी के नखरों में।
***

एक समूची दुनिया होती है वह

जब लेंस सचमुच ढका जाता है
खत्म हो जाती है एक दुनिया
अचानक आ गिरता है अंधकार
अब तक रौशन समां में
उतारती है चमकीले कपड़े -
उसके एकमात्र करीबी दोस्त

सँभाल कर रखती है इन दोस्तों को
कि अगली किसी रौशन महफिल में
फिर हाजिर हो सके वह
इधर से उधर जाती और वापस आती
ब्रह्मांड की नज़रें साथ उसके घूमतीं

ऐसे मौकों पर वह वह नहीं
एक समूची दुनिया होती है
तमाम अँधेरे
सीने में समेटे होती है
सावधान कदमों से सँभाले हुए भार
नियत समय में पार करती
रोशनी से भरा अंधकार।
(प्रेरणा, 2007)
'लोग ही चुनेंगे रंग' में संकलित

सपनों में उनके भी

नीली आँखें भूरी आँखें
अथक श्रम से सँजोईं
आँसू आँसू से संपन्न
थिरकन कंपन स्पंदन
खबरों के बीच में आती हैं
नायिकाएँ

हमारे लिए ये इसी तरह रहेंगीं
जब तक इनकी कीमत रहेगी
वे तोड़ती हैं अपने ये क्षण
जब लेंस ढका जाता है
अचानक उतर आता है अँधेरा
आईने के सामने खड़ी हो
उतारती हैं तहें रासायनिक
मन ही मन होती तब चाँद पर कि
तिरछी नज़रों और लचकते कूल्हों से
वे काबिल हैं हम सबको धोखा देने में

कभी कभी चाँद हिल जाता है
कि गर हम जान जाएँ
उनके सच
कि सब कुछ उतर जाने पर
वे होती हैं औरतें
जैसी हर औरत होती है
हर कहीं किसी दीवार से जूझती

फिलहाल वे चल पड़ी हैं
अगले छल की तैयारी में
इस बीच कुछ देर वे लेट जाएँगी
सपनों में उनके भी आएँगे दानव
काँपेगी देह उनकी भी
जब गुजरेगा रात का पहरेदार
सीटियाँ बजाता।
(प्रेरणाः 2007)

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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